Wednesday, 15 October 2014

एक पतरी रैनी-बैनी



शास्त्र आधारित संस्कृति अउ लोक संस्कृति के अलग-अलग रूप ल देख के कई परत अकचकासी तको लाग जथे। तब मन म बात उठथे के का शास्त्र मनला हमर तइहा ले चले आवत परंपरा के आधाार म नइ लिखे गे हे? अब छत्तीसगढ़ के सबले मयारुक परब गौरी-गौरा पूजा के लोक रूप अउ ये देस के धारमिक आस्था के भारतीय रूप ल देखन। हिन्दू धरम म ये मान्यता हे के सावन, भादो, कुंवार अउ कातिक के ये चार महीना म देवता मन सूते रहिथें तेकर सेती कोनो किसम के मांगलिक कार्यक्रम नइ होना चाही। फेर हम गौरा पूजा के लोक रूप ल देखन त ए बात के खंडन देखे म आथे।

गौरा-पूजा जेला गौरा-गौरी घलोक कहे जाथे ए हा इहां के परंपरा के मुताबिक भगवान शिव अउ पारवती के बिहाव के परब आय। अउ ए ह होथे कब? कातिक अमावस्या माने देवउठनी के दस दिन पहिली। जब देवउठनी के दस दिन पहिली हमर सबले बड़का भगवान के बिहाव होगे त फेर वोकर मन के सूते रेहे के या फेर ये चातुरमास ल कोनो भी मांगलिक कार्य खातिर अशुभ माने के प्रश्ने कहां उठथे? एकरे सेती अइसे लागथे के हमन ल जेन धरम ग्रंथ के रूप म साहित्य उपलब्ध करवाए जावत हे, वो ह लोक परंपरा के अनुरूप बिल्कुल नइए।

गौरा-गौरी के परब वइसे तो कातिक अमावस्या के दिन संपन्न होथे, फेर एकर शुरूवात लगते कातिक ले छोकरी मन के बिहनिया कातिक नहाए अउ संझा सुवा नाचे ले शुरू हो जाथे। इहां कातिक नहाए के रिवाज एकरे सेती हे के ये महीना म भगवान भोलेनाथ संग पार्वती के बिहाव होथे एकरे सेती नोनी मन कातिक नहा के शिव पूजा करथें, तेमा उहू मनला वोकरो सही योग्य वर मिलय। अइसने सुवा गीत ह घलोक गौरा-गौरी परब संग जुड़े हे। जेमन गौरा-गौरी पूजा के आयोजन करथें, ते मन ए गीत-नृत्य के माध्यम ले लोगन घर जा-जा के शिव-बिहाव म आए के नेवता देथें अउ संगे-संग वो दिन आने वाला खरचा के बेवस्था खतिर सेर सिधा अउ पइसा-कउड़ी सकेलथें।

गौरा जगाय के बुता गौरा-पूजा के नौ दिन पहिली हो जाथे। गौरा चौरा ल गोबर पानी म लीपे-पोते जाथे। सुरहुत्ती के दिन मुंदरहा ले कुंवारी माटी जेला कोनो भिंभोरा ले कोड़ के लाने जाथे। तेकर पाछू गांव के बइगा ह रंग-बिरंग के चमकीला कागज म सजावत वोला गौरा-गौरी के अलग-अलग मूर्ति बनाथे। गौरा-गौरी परब के हर एक रिवाज खातिर अलग-अलग लोक गीत के गायन करे जाथे। जइसे-
मारे कुदारी ईसर देव के
उहां कुम्हरा भइया करे ल बसेर
०००

भइया ले कहेंव, भइया बढ़ई
हमर ईसर ल दे
हाथ खंगे नोनी गोड़ खंगे
कइसे ईसर ल देवंव
०००

लाले-लाले परसा
लाले हे खमार
लाले हे ईसर राजा
घोड़वा सवार          
०००

आठे कोसन के अंखरा छोलइले
नवे कोसर के फेर
अंखरा-अंखरा झन रट बाबू
अंखरा होथे बढ़ फेर
०००

जागव गौरा मोर जागव गौरी ओ
जागव ओ सहर के लोग
०००

एक पतरी रैनी-बैनी रायरतन मोर दुरगा देवी
तोरे शीतल छांव
०००

ये जम्मो लोक गीत ल गौरा-गौरी के बिहाव परब म वइसने गाये जाथे जइसे हमन अपन इहां होने वाला बर-बिहाव म अलग-अलग नेंग खातिर गाथन-नाचथन-बाजा बजवाथन।
सुरहुत्ती के आधा रात के गौरा-गौरी के मुख्य आयोजन शुरू होथे, जेन ह बिहनिया कोनो नंदिया या तरिया म वोकर मन के  विसरजन तक चलथे। एकर पहिली गौरा चौरा ले तरिया या विसर्जन स्थल तक लेगे के पहिली रस्ता म परने वाला जम्मो घर के दुवारी म रूकत-रूकत जाथें जेकर संंबंधित घर वाले मन पूजा-आराधना करथें।

गौरा-गौरी पूजा के संगे-संग अब लक्ष्मी पूजा घलोक करे जाथे, जेला भगवान राम के वनवास काल के बाद वापस अयोध्या लहुटे के प्रतीक स्वरूप मनाये जाथे। अइसने सुरहुत्ती के बिहान दिन भगवान कृष्ण द्वारा इंद्र के कोप ले गोकुल ल बचाए खातिर उठाए के गोवर्धन पर्वत के प्रतीक स्वरूप गोवर्धन पूजा अउ वोकर बिहान दिन मातर के आयोजन करे जाथे।

सुशील भोले
संपर्क : 54-191, कस्टम कालोनी के सामने,
डॉ. बघेल गली, संजय नगर (टिकरापारा)
रायपुर (छ.ग.) मोबा. नं. 098269 92811
ईमेल ः  sushilbhole2@gmail.com

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