Sunday, 4 October 2015

कुल देवता-मूल देवता


काली जुवर एक झन बाबू पिला ह मोर जगा पूछिस- 'गुरुजी.. हमन अभी तक अतेक पिछड़ा अउ गरीब काबर हावन.. जबकि रोज मेहनत-मजदूरी अउ भगवान के पूजा करथन?"

मैं वोकर जगा पूछेंव- 'मेहनत-मजदूरी तो ठीक हे, फेर ये बता के कोन भगवान के पूजा करथस?"

वो कहिस- 'महराज ह जेन देवता के बताये हे तेकर करथन।"

मैं पूछेंव- 'ये बता, तैं अपन कुल देवता के पूजा करथस के नहीं?"

वो कहिस- 'नहीं गुरुजी, अपन कुल देवता के तो नइ करन। महराज ह हमर घर के पूजा म जेन देवता ल अपन झोला म धर के लाने रिहिसे, तेकरे पूजा करथन।"

मोला बड़ा ताज्जुब लागिस। अरे भई जब तक तोर कुल देवता के पूजा-पाठ नइ होही तब तक तोर घर म सुख-शांति कइसे आही। जब तोर कुल देवता खुश होही तभे तो तोर घर म खुशी आही। दूसर के देवता के पूजा करबे तब तो उही ह पोठाही जेकर वो देवता आय। देख ले दुनिया के हाल ल, कोन इहां खुश हे अउ काकर राज हे।

तोला अपन घर म खुशी चाही, त अपन कुल देंवता के अउ अपन राज-शासन चाही त अपन मूल देवता के पूजा के परंपरा चालू करे बर लागही। नहीं त फेर हमेशा बस अइसने हटर-हटर करइया बने रहि जाबे। हमेशा दूसर के गुलामी भोगत रहि जाबे। काबर के धरम अउ संस्कृति ह लोगन ल गुलाम बनाये के सबले सरल अउ ठोस रस्ता आय। देख ले जेमन ल हमन धरम के नांव म अपन मुड़ म बइठार डारे रेहेन, वो मन आज जम्मो जिनिस म कइसे काबिज होवत जावत हें।

मैं वोकर ले फेर पूछेंव- 'कस बाबू तोला ये सब ले मुक्ति चाही के नइ चाही?"

वो कहिस- 'चाही गुरुजी"।

त मैं वोला फेर कहेंव- 'तोला राजनीतिक, सामाजिक अउ आर्थिक सबो किसम के गुलामी ले मुक्ति चाही त सबले पहिली धारमिक अउ सांस्कृतिक गुलामी ले मुक्त होना परही। बाहिर ले लाने देवता मन के पूजा-पाठ ल छोंड़ के अपन कुल देवता अउ मूल देवता के पूजा के परंपरा ल फेर से अपनाये बर लागही। तभे पहिली जइसन सुखी होबे, अउ पहिलीच जइसे राज-शासन घलोक तोर हाथ म आही"।

सुशील भोले
 डॉ. बघेल गली, संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल -  sushilbhole2@gmail.com

2 comments:

  1. सत गोठ गुरु जी बने लगीस महु ला

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