Saturday, 8 April 2017

अध्यात्म की ओर...

जीवन का उत्तरार्द्ध ईश्वर और अपने आध्यात्मिक सिद्धांतों को पूर्ण करने के लिए होता है। शायद इसीलिए हमारी संस्कृति में इस अवस्था को वानप्रस्थ आदि के रूप में प्रचारित किया गया है। वानप्रस्थ का तात्पर्य ही होता है, गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर सद्गति के मार्ग पर अग्रसर होना और अपने अनुभवों को लोक हित में समर्पित कर देना।

मुझे लगता है, मेरी भी यह अवस्था अब प्रारंभ हो चुकी है। वैसे अध्यात्म के प्रति मेरा झुकाव बचपन से ही रहा है। लेकिन गृहस्थ जीवन और साहित्य जगत में प्रवेश करने के पश्चात् इसमें कुछ कमी सी आ गई थी। खासकर साहित्य में जनवादी विचारों से प्रभावित होने के कारण हर प्रकार के शोषक वर्ग के प्रति आक्रोश और ईश्वर के प्रति अन्याय किए जाने का भाव।

इन सबके बीच 24 जुलाई 1994 नागपंचमी के दिन मेरे जीवन में अजीब मोड़ आया। एक सफेद वस्त्रधारी साधु दिन के करीब 10 - 10.30 बजे मेरे घर के सामने आकर रूक गये। मैं वहाँ बैठा गुड़ाखू (एक प्रकार का नशीला मंजन) घिस रहा था। वे रूके और मेरे पास आकर बोले-  'तुम्हें तर्जनी उंगली को जूठा नहीं करना चाहिए। यह देव स्थान होता है। मंजन ही करना है, तो मध्यमा उंगली से किया करो।* बस इतना बोले और वे चले गये।

आमतौर पर मैं ऐसे साधुओं की बातों पर ध्यान नहीं देता था। फिर भी जाने क्यों उनकी बातों को मानने की मन में इच्छा हुई। मैं उठा, घर के अंदर गया और तर्जनी उंगली को धोकर वापस बाहर आकर मध्यमा उंगली से गुड़ाखू घिसने लगा। ऐसा करते ही मुझे अपने अंदर मानसिक परिवर्तन का अहसास होने लगा। सावन का महीना चल ही रहा था, दो सोमवार अभी बचा हुआ था। उन दोनों सोमवार को व्रत रखने की इच्छा मेरे अंदर होने लगी। छात्र जीवन में मैं सावन सोमवार का व्रत रखता भी था, लेकिन जब हम हाई स्कूल में थे, तब हमारे दादा जी ऐसे ही सावन सोमवार को स्वर्ग सिधार गये थे, तब से व्रत का वह सिलसिला थम गया था।

फिर सोमवार आया और मैं व्रत रखकर बढिय़ा पूजा-पाठ करने लगा। इसी बीच रांवाभांठा (बंजारीधाम) वाले मेरे साहित्यिक मित्र डॉ. सीताराम साहू मुझसे मिलने मेरे रिकार्डिंग स्टूडियो पर आए। बातों ही बातों में मेरे सामने अनायास उपस्थित हो रही परेशानियों के समाधान के लिए उनके गाँव में संचालित 'भोले दरबारÓ में आकर समाधान प्राप्त करने की बात कही।

आमतौर पर मैं ऐसे दरबार और तंत्र-मंत्र वाले लोगों से दूर ही रहता था। लेकिन एक चिकित्सा पेशा के प्रतिष्ठित व्यक्ति और मेरे घनिष्ठ साहित्यिक मित्र ऐसा कह रहे थे। उनके बार-बार जोर मारने पर मैंने दरबार में का जाने का निश्चय किया। वहाँ शिव जी की हाजिरी आई हुई थी। मुझे सवा महीने तक निर्जला व्रत रखकर शिव उपासना का सुझाव दिया गया। जनवादी विचारधारा में बह रहे एक तार्किक पत्रकार-साहित्यकार के लिए इसे सहज रूप से स्वीकार कर लेना संभव नहीं था। केवल डॉ. सीताराम साहू की बार-बार समझाइश और आग्रह के चलते मैंने कठोर व्रत को करने का निर्णय लिया।

इसी सवामासी व्रत के 21 वें दिन मेरे जीवन में अद्भुत चमत्कार हुआ। बाबा स्वयं मेरे पास आए। मेरे जीवन के उद्देश्य और कारण से परिचित कराए और उसे पूर्ण करने के लिए नियम-विधि की शिक्षा दिए। तभी मुझे नागपंचमी के दिन आए श्वेतवस्त्र धारी साधु का रहस्य भी ज्ञात हुआ।

आज उस नियम और विधि के अंतर्गत जीवन जीते हुए मेरे साधना काल के 21 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। साधना काल के ये ही 21 वर्ष मेरे जीवन में सुशील से भोले बनने की प्रक्रिया भी है। इस बीच अब मेरे गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियां भी लगभग पूरी हो चुकीं हैं। अब जीवन के इस उत्तरार्द्ध को उस ईश्वरीय कार्य को समर्पित कर देने का विचार उत्पन्न हो रहा है, जिसके लिए मुझे तैयार किया गया। उनके द्वारा दिए गये ज्ञान, यहां की मूल संस्कृति और धर्म का वास्तविक स्वरूप, जिन्हें जानने-समझने में मुझे 21 वर्ष लग गये। उन्हें लोगों से परिचित कराने और सद्मार्ग पर आगे बढ़ाने का प्रयास करना। बस अब जीवन का यही अंतिम ध्येय रह गया है।

ईश्वर इस कार्य में सफलता और मार्गदर्शन प्रदान करें, बस इसी आग्रह के साथ......

* सुशील भोले     
चैत्र पूर्णिमा, 11 अप्रेैल 2017         

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