Thursday, 20 April 2017

धरती के नवा सिंगार आय नवा बछर

भारतीय नववर्ष माने चैत महीना के अंजोरी पाख के पहिली तिथि। मोला लागथे, हमर पुरखा मन प्रकृति के नवा सिंगार ल ही आधार मान के ए तिथि ल जोंगिन होहीं। काबर ते इही बखत प्रकृति ह पतझड़ के पाछू नवा सिंगार करथे। जम्मो रूख-राई म नवा-नवा कोंवर पान बड़ मयारुक दिखथे। हरर-हरर झांझ के बड़ोरा चारोंखुंट नाचे-कूदे ले धर ले रहिथे, तभो ले उल्हवा पान के छांव जम्मो जीव-जंत मनला अपन कोरा म बिसराम देथे, दुलार करथे।

हमर संस्कृति म परमात्मा के संगे-संग प्रकृति के घलो पूजा होथे। रूख-राई, तरिया-नंदिया, डोंगरी-पहाड़, धरती-अगास, सुरूज-चंदा सबो के। ए बहुत अच्छा बात आय काबर ते अइसन दृष्टिकोण ले, अइसन जम्मो जिनिस ल माने अउ जाने के बोध होथे, सबके सम्मान अउ संरक्षण के भाव जागथे, परमात्मा के हर कृति ल वोकरे रूप माने के सोच उपजथे।  हमर इहां बहुदेव पूजा के रिवाज हे, इहू हर इही सोच के उपज आय। अइसन किसम के बात मनखे के मन म सबला अपन माने के भाव पैदा करथे। जबकि केवल एके देवता ल माने, जाने अउ पूजे के उपदेश ले लोगन म संकीर्णता के सोच उपजथे। अपन ईष्टदेव के छोड़ दूसर बर मन म ईरखा भाव पैदा होथे। अउ फेर जेकर मन म दूसर के ईष्ट खातिर ईरखा भाव पैदा होगे, त फेर वो मनखे दुनिया म कोनो काम के नइ रहि जाय।

आज दुनिया भर म धर्म अउ वोकर ले संबंधित उपदेश या नियम-कायदा के नाम म जेन मार-काट अउ खून-खराबा देखे जावत हे, सब अइसने एके देवता के नाम म कुंठित होए लोगन मन के सेती आय। हमर इहां कोनो भी देवी-देवता के पूजा के पहिली गौरी-गणेश के पूजा के विधान हे, इहू ह इही बात के संदेश देथे के सिरिफ एके झन के पूजा नहीं भलुक संग म मातृशक्ति अउ गणशक्ति के घलोक पूजा करव तब जाके पितृशक्ति के पूजा ह पूरा होही।

चैत नवरात ले नवा बछर के शुरूवात माने के आध्यात्कि कारण घलोक हे। हमर इहां जतका भी धर्म ग्रंथ हे, जम्मो म सृष्टिक्रम प्रारंभ होए के तिथि इही ल माने गे हे। साधना काल म घलो ए बात के ज्ञान करवाए जाथे। साधना के अंतर्गत जतका नवा काम होथे, सब इहें ले चालू होथे। देवारी माने के बाद कोनो भी नवा कारज के भूमिका बने ले धर लेथे, फेर चालू होथे वो ह चैत नवरात ले ही। इहां इहू जानना जरूरी हे के हमर देव मंडल ह एकरे आधार म चलथे। माने भारतीय गणना अउ पद्धति के मुताबिक, संग म चंद्रमा के घट-बढ़ के आधार म तिथि के निर्धारण के अनुसार ही अपन-अपन तिथि म अपन विशेष उपस्थिति के अनुभव कराथें।

नवा बछर अउ नवरात के चरचा होवत हे, त महतारी के घलोक नवा अउ जुन्ना आगमन के चरचा होना चाही। हमर इहां नवरात माने माता के उपासना के परब साल म दू बेर काबर मनाए जाथे? सब देवता के तो साल म सिरिफ एके बार परब मनाये जाथे, फेर माता के साल म दू पइत परब आथे। एकर असल कारण ये आय के माता के दू अलग-अलग बार मानव रूप म प्रागट्य होए हे। पहिली बार उन सती के रूप म राजा दक्ष के घर अवतरे रिहिन हें, बाद म पार्वती के रूप म राजा हिमालय के इहां। एकरे सेती माता के उपासना के परब ल साल म दू बेर मनाए जाथे। सती के रूप म उन चैत महीना म अउ पार्वती के रूप म कुंवार महीना म अवतरे रिहिन हें।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
54/191, डॉ. बघेल गली, संजय नगर
(टिकरापारा) रायपुर (छ. ग.)-492001
मो. 98269 92811, 79747 25684

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