Tuesday, 18 April 2017

साधना ले सहजता तक

साधना के नांव सुनते लोगन बहुत कठोर जीवन पद्धति के कल्पना करे लगथे। एला नइ खांव, वोला नइ खांव, इहां नइ जांव, उहां नइ जांव, अइसे नइ करंव, वइसे नइ करंव... अइसन किसम के विचार तब तक मन म किंजरत-फिरत रहिथे, जब तक हमला वास्तविक ज्ञान के चिन्हार नइ हो जाय। कोनो सत्गुरु हे, सत्य ज्ञान के चिन्हार हे, मर्मज्ञ हे, तब तो हमला वोकर ले सोज्झे रस्ता मिल जाथे, नइते जिनगी भटकाव के चकर-घिन्नी म भटकत रहिथे। सत्गुरु के एक रूप सत्साहित्य घलोक आय। कोनो सत्य के जानकार द्वारा लिखे गे ग्रंथ या किताब घलो हमला सत्य के रस्ता के चिन्हारी कराथे। सत्य पुरुष ल चिन्हे के, पाये के उपाय बताथे।

फेर इहू बात सही हे, के आज कतका अकन ग्रंथ, किताब या साहित्य ह सत्साहित्य के सीमारेखा म शामिल हो पाथे? काबर ते आज चारोंखुंट अधकचरा, अनगढ़ अउ अनभरोसी मनखे अउ किताब मन के फैलाव होगे हे।  नकली मन असली ले जादा चमचमावत अउ रोटहा दिखथें। जेन मनखे सिरिफ ऊपरे ऊपर ले चकाचक ल देख के मोहा जाथे ते मन एकर मन के चक्रव्यूह म फंस जाथें। तहां ले  मरत ले उहां ले बाहिर निकले के रस्ता खोजत सिरा जाथें, मर-खप जाथें।  आज इही नकली-चकली मन के बढ़वार जादा होगे हे, तेकर सेती सत्य के रस्ता  म  चलना, वोला पाना जादा मुसकुल होगे हे।  एकरे सेती अब सिरिफ एके जिनिस ऊपर चिन्हारी के आखिरी बरोसा बांचे रहिथे, अउ वो हे 'आत्म ज्ञानÓ के भरोसा।

सिरिफ आत्म ज्ञान के द्वारा हम असल रस्ता, असल ज्ञान, असल पहिचान अउ असल भगवान ल पा सकथन। अउ ये आत्म ज्ञान मिलथे साधना ले।  अइसन सुव्यवस्थित आध्यात्मिक जीवन पद्धति खातिर सबले श्रेष्ठ युवा अवस्था होथे। काबर ते ए बखत थोर-बहुत समझे-जाने अउ दुख-पीरा, उपास-धास ल सहे के लाइक देंह-पांव होथे, जबकि नान्हेपन पन म कोनो भी आदमी के बुद्धि कमजोर या कम विकसित होथे, त बुढ़ापा या प्रौढ़ावस्था म देंह-पांव ह उपास-धास या कोनो किसम के कठोर जीवन पद्धति ल सहे के लाइक नइ राहय। ये विशेष साधना के अवस्था ल जम्मो मनखे ल अपन जीवन काल में एक बेर जरूर पूरा करना चाही। जादा नहीं ते सात ले लेके चौदा बछर तक आत्म ज्ञान खातिर लगाना चाही। एकर ले मनखे ल हर क्षेत्र के, हर विषय के ज्ञान होही, अनुभव होही, जेकर ले कोनो भी किसम के ठग-जग करइया मन के भटकाव अउ भरमाय ले मुक्ति मिलही।

विशेष साधना काल के बाद मनखे ल फिर से सामान्य अवस्था म आके अपन पाये ज्ञान अउ अनुभव ल समाज म बांटे अउ बगराए के उदिम करना चाही। जीवन भर वो कठोर जीवन पद्धति ल धरे नइ बइठे रहना चाही। काबर ते गुरु या मार्गदर्शक जेन होथे, वोकर जीवन पद्धति ल देख-सुन के वोकर अनुयायी मन घलोक आचरण करथें, तेकर सेती जरूरी हे, अनावश्यक के कठोरता या देखावा नइ करे जाना चाही। मार्गदर्शक ल ये बात के सुरता राखना चाही के वोकर जिम्मेदारी एक आम गृहस्थ मनखे ल जम्मो सांसारिक कर्तव्य ल पूरा करत परमात्मा पाए के रस्ता म ले जाए के बुता करना घलोक होथे। इही सत्मार्ग ये, सच्चा ज्ञान ये, अउ साधना ले सहजता तक के यात्रा ये।

सुशील भोले
संस्थापक, आदि धर्म सभा
54/191, डॉ. बघेल गली, संजय नगर
(टिकरापारा) रायपुर (छ. ग.)-492001
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