Tuesday, 3 December 2013

जड़कल्ला जब आथे....


































आंखी रमजत मुंह ल फारत, जड़कल्ला जब आथे
सुरुज नरायण लजकुरहा कस, दुरिहच ले मुसकाथे...

घर ले बाहिर गली-खोर म, कनकनी खूब बरसथे
नवा तरइया के पानी हर, चांय ले कइसे करथे
नंदिया के पानी करा बरोबर, छाती धक ले करथे
दहरा जाड़ के मारे सरबस, हू..हू..हू..हू.. करथे....

सुर सुर सुर सुर सुर्रा के संग, देंह डार कस  डोलय
कटकट कटकट दांत ह कइसे, दुख के बोली बोलय
लाठी टेंकत जिनकर जिनगी, भीख के सेती चलथे
जाड़ इंकर बर काल बरोबर, सूतत-जागत रहिथे.....

दारू-कुकरा संग जिनकर जिनगी, कुंकरू कूं कस करथे
अइसन बलकरहा मनखे बर, जड़कल्ला खूब ठनकथे
सब के सुख ह इंकर बगल म, कइसे कलपत रहिथे
बियापथे नस-नस म जाड़ा, रकत सबो के जमथे....

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com

Wednesday, 27 November 2013

छत्तीसगढ़ी दिवस...

छत्तीसगढ़ राज के महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी ल 28 नवंबर 2007 के छत्तीसगढ़ विधानसभा म सर्वसम्मति ले पास करके ये राज के *राजभाषा* के रूप म स्वीकृत करे गे रिहिसे। एकरे सेती ये राज के जम्मो भाखा प्रेमी साहित्यकार, पत्रकार, समाजसेवी अउ बुद्धिजीवी मन मिलके हर बछर 28 नवंबर के *छत्तीसगढ़ी दिवस* मनाये के निर्णय लिए हें।
त आवव वो निर्णय ल माथ नवावत अपन महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी के बढ़वार खातिर परन ठानन के आज ले हर काम-काज अउ लेखा-जोखा छत्तीसगढ़ी म करबोन, सरकार ल येला प्राथमिक कक्षा ले शिक्षा के माध्यम बनाये खातिर जोर देबोन...
जय छत्तीसगढ़ी... जय महतारी भाखा...  

सुशील भोले
 संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो.नं. 080853-05931, 098269-92811

Tuesday, 26 November 2013

अपन भाखा...

(28 नवंबर को छत्तीसगढ़ी भाषा दिवस पर....)

अबड़ मयारु अपन भाखा, अंतस म बस जाथे
महतारी के गोरस जइसे, सबले मीठ जनाथे.....

छनर-छनर घुंघरु कस बोली, मन म मया जगाथे
कोन अपन अउ कोन बिरान, भेद जमो भुलवाथे
देश-दुनिया संग मेल करवाथे, मितानी बदवाथे.....

कभू ददरिया कभू सुआ, अउ करमा रोज सुनाथे
गौरा-गौरी कस सज-धज के भड़भड़ बोकरा जगाथे
रउताही के अरा-ररा-रा, झुम-झुम के नचवाथे......

राजभाखा तो बनगे हावय, अब गुरुजी ह पढ़वाही
आनी-बानी के किस्सा-कहिनी, जनउला घलो जनाही
राजकाज घलो अब चलही, तइसे मोला सुनाथे.....

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल -  sushilbhole2@gmail.com

Monday, 25 November 2013

अमृत महोत्सव.....

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, पर्यावरण विद् और संस्कृति मर्मज्ञ डॉ. दशरथ लाल निषाद *विद्रोही* के पचहत्तरवें जन्म दिवस को संगम साहित्य समिति, मगरलोड द्वारा *अमृत महोत्सव* के रूप में मनाया गया।
साहित्यकार सुशील भोले के मुख्यआतिथ्य एवं डुमन लाल धु्रव की अध्यक्षता में रविवार 24 नवंबर को संगम भवन, मगरलोड में आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम में प्रदेश भर से बड़ी संख्या में पहुंचे साहित्यकार, बुद्धिजीवी एवं समाजसेवी उपस्थित थे। मुख्य अतिथि की आसंदी से बोलते हुए सुशील भोले ने संस्था के पदाधिकारियों से अनुरोध किया कि *विद्रोही* जी की कृतियों को आधुनिक तकनालाजी के माध्यम से संरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि उनमें संग्रहित मौलिक एवं बहुमूल्य ज्ञान को आने वाली पीढ़ी के साथ ही साथ पूरी दुनिया के लिए  सुरक्षित रखा जा सके।
इस अवसर पर *विद्रोही* जी की 29 वीं कृति *साहिल* का विमोचन भी किया गया, तथा उन्हें उनकी ही साहित्यिक कृतियों से तौला गया।
संस्था के अध्यक्ष जे. आर. साहू, सचिव पुनूराम साहू राज, भोलाराम सिन्हा, वीरेन्द्र सरल, आत्माराम साहू, ललित पटेल, रमेश ठाकुर, अधमरहा जी, सोनवानी जी सहित समिति के सभी सदस्यों ने आमंत्रित अतिथियों के साथ *विद्रोही* जी का शाल, श्रीफल, प्रशस्ति-पत्र एवं पुष्प गुच्छ के साथ अभिनंदन किया एवं उनकी दीर्घायु के लिए कामना की। कार्यक्रम का सफल संचालन प्रसिद्ध हास्य कवि वीरेन्द्र सरल ने किया।




Friday, 22 November 2013

फुदुक-फुदुक भई फुदुक-फुदुक....

(छत्तीसगढ़ी भाषा के इस बालगीत को मैं अपनी मझली बेटी के लिए तब लिखा था, जब वह करीब एक वर्ष की थी, और थोड़ा-बहुत लडख़ड़ा कर चलने की कोशिश कर रही थी। उस समय भी आज की ही तरह ठंड का आगमन हो चुका था, और वह बिना कपड़ा पहने घर के आंगन में इधर-उधर खेल रही थी....)












फुदुक-फुदुक भई फुदुक-फुदुक
खेलत हे नोनी फुदुक-फुदुक....

बिन कपड़ा बिन सेटर के
जाड़ ल बिजरावत हे।
कौड़ा-गोरसी घलो ल,
एहर ठेंगा देखावत हे।
बिन संसो बिन फिकर के,
कुलकत हे ये गुदुक-गुदुक......

कभू गिरथे, कभू उठथे,
कभू घोनडइया ये मारथे।
कभू तो मडिय़ावत ये,
अंगना-परछी किंजर आथे।
कभू-कभू तो जलपरी कस,
पानी खेलथे चुभुक-चुभुक.....

सुशील भोले 
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
ई-मेल - sushilbhole2@gmail.com
मो.नं. 08085305931, 098269 92811

Wednesday, 20 November 2013

चलो गांव की ओर...

चलो गांव की ओर जहां सूरज गीत सुनाता है
तारों के घुंघरू बांध, चंद्रमा नृत्य दिखाता है.....

अल्हड़ बाला-सी इठलाती, नदी जहां से बहती है
मंद महकती पुरवाई, जहां प्रेम की गाथा कहती है
बूढ़ा बरगद पुरखों की, झलक जहां दिखलाता है....

रिश्ते-नाते जहां अभी भी मन को पुलकित करते हैं
दादी-नानी के नुस्खे, जीवन में रस-रंग भरते हैं
पूरा कस्बा परिवार सरीखा जहां अभी भी रहता है...

भाषा जिसकी भोली-भाली, तुतलाती बेटी-सी प्यारी
जहां संस्कृति पल्लवित होती जैसे मालिन की फुलवारी
धर्म जहां हिमालय जैसा, अडिग आशीष लुटाता है.....

सांझ ढले जब ग्वाले की, बंशी की तान बजती है
गो-धूली गुलाल सरीखी, जब माथे पर सजती है
तब पूरा परिवेश जहां का, गोकुल-सा बन जाता है....
सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
ई-मेल - sushilbhole2@gmail.com
मो.नं. 08085305931, 098269 92811,
http://www.youtube.com/watch?v=93Kvenj3nZ8

Tuesday, 19 November 2013

कथरी ह गोई रतिहा ....

(अगहन माह प्रारंभ हो गया है, इसी के ठंड अपना असर दिखाने लगी है। ऐसे में यह छत्तीसगढ़ी गीत प्रासंगिक लगने लगा है।)



कथरी ह गोई रतिहा गजब सुहाथे
उत्ती के घाम असन कुनकुन जनाथे...

धुंका-धुर्री के संग म जब ले जाड़ आए हे
लइका-सियान सब्बो ल कंपकंप ले कंपाए हे
तब ले गउकिन चुरुमुरु सुतई ह सुहाथे....कथरी ह....

अग्घन-पूस के बेरा ह सुटरुंग ले पहाथे
फेर रतिहा जुलमी ह नंगत के सताथे
धन तो गोरसी के अंगरा ह देंह ल दंदकाथे... कथरी ह...

तरिया-नंदिया के पानी ले कुहरा तो उडिय़ाथे
बने ताते-तात होही, मनला वो भरमाथे
फेर छूते साथ गोई करा कस जनाथे... कथरी ह ...

अइसने बेरा म आथे जब काकरो सुरता
मन मुचमुचाथे अउ मया के होथे बरसा
अंतस के भीतर तब ताते-तात जनाथे... कथरी ह...

सुशील भोले
संपर्क : 41-191, कस्टम कालोनी के सामने,
 डॉ. बघेल गली, संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
 मो.नं. 080853-05931, 098269-92811