Sunday, 6 December 2015

मनहर चौहान का कहानी पाठ...


राजधानी रायपुर की सक्रिय साहित्यिक संस्थाओं की ओर से हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार एवं संपादक (दमखम, मुंबई)  मनहर चौहान जी का कहानी पाठ का आयोजन  शनिवार 5 दिसंबर 2015  को, वृन्दावन सभाकक्ष में रखा गया था । उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व से परिचय कराने का सुखद अवसर मुझे प्राप्त हुआ।
ज्ञातव्य है,  चौहान जी की अब तक 50 से अधिक किताबें प्रकाशित-समादृत हो चुकी हैं, उन्हें म.प्र. साहित्य परिषद, शिक्षा मंत्रालय (भारत सरकार), उ.प्र. हिंदी संस्थान, संस्कृति मंत्रालय (भारत सरकार) के साथ-साथ सारिका कहानी पुरस्कार, जीवन गौरव पुरस्कार, समाज गौरव सम्मान, सृजनगाथा सम्मान आदि सम्मानों व पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है। उन्हें बधाई एवं भविष्य के लिए शुभकामनाएँ.....

Saturday, 5 December 2015

जउंरिहा ल का हो जाथे...


















जउंरिहा ल का हो जाथे रे, धनी ल का हो जाथे
बिहनिया आथे संझा चले जाथे, रतिहा ल कहां बिताथे...

मंदिर मस्जिद खोज डरे हौं, गुरुद्वारा म झांके हौं
चारों मुड़ा के चर्च मन म बही-भूति कस ताके हौं
निरगुन घाट म जाके घलो आंखी पथराथे रे... धनी ल....

मन बैरी मानय नहीं जिवरा धुक-धुक करथे
कोनो सउत के संसो म तन म आगी कस बरथे
करिया जाथे रे लाली रंग के सपना ह करिया जाथे...धनी...

चंदा उतरगे गांव म, जुग-जुग ले हे गली-खोर
फेर मोर मयारु संग जुड़ही कइसे मया के डोर
जमो आस सिरागे रे, बइरी बिरहा बिजराथे...धनी ल...

सुशील भोले
डॉ. बघेल गली, संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 098269-92811, 080853-05931

Thursday, 3 December 2015

मोर अंगना म आबे चिरइया......















मोर अंगना म आबे चिरइया मया के गीत सुनाबे
ये जग तो निरमोही होगे, तैं जीवन राग ल गाबे...

जंगल झाड़ी कस मोरो घर ह तिल-तिल करके उजरत हे
नता-गोता के चिन्हारी नइये सिरतोन सब्बो छूटत हे
पुरखा मन के ये कुंदरा ल फिर से तैं चहकाबे ... चिरइया.....

मन मंदिर म नइ तो जलत ये ककरो मया के जोती ह
न तो ककरो किस्सा कहानी नइए कागज अउ पोथी ह
बंजर बने ये जिवरा के हिरदय ल हरसाबे.... चिरइया.....

छम-छम बाजय पैरी पहिली ये अंगना अउ डेहरी म
सुख-दुख संग म नाचय गावय राग मिलावय मोहरी म
फिर से तैं ह वो बेरा के सुरता ल करवाबे... चिरइया....

तन तंबूरा कस होगे हे, अब तुन-तुन सिरिफ बाजत हे
छिन म टूट जाही तार एकर तो तइसे मोला जनावत हे
अब तो भइगे तोरे आसा जिनगी के स्वांसा चलाबे.. चिरइया...

सुशील भोले 
54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811

बचपन वापस आ जाए....














ऐसा कर दो कोई करिश्मा, बचपन वापस आ जाए
जीवन चक्र घुमा दो मेरा, शाम, सवेरा हो जाए.....

मां की लोरी फिर कानों में, गूंज रही है सांझ-सवेरे
दादी किस्से सुना रही है, बाल सखाओं को घेरे
फिर आंगन में हाथों के बल, धमा-चौकड़ी हो जाए...

स्कूल के दिन फिर ललचाते, अक्षर-अक्षर मुझे बुलाते
दोहे और पहाड़े गाते, जाने क्या-क्या राग सुनाते
ऐसा कर दो कोई गुरुजी, छड़ी फिर से चमकाए....

मुझे बुलाती हैं वो गलियां, जहां कभी कंचा खेला
जीवन की पगदंडी पकड़ी, और देखा इंसा का रेला
ऐसा कर दो कोई उस पथ पर, कदम मेरा फिर चल जाए...

सुशील भोले 
54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811

गनपति के पहिली पूजा काबर..?


मोर माथा बड़ दिन ले चिथियाये रिहिसे। आखिर गनपति ल पहिली पूजा के आशीष काबर दे दिये गिस? न तो वो कार्तिक ले बड़े ये, न दुनिया ल किंजर के आये वाला प्रतियोगिता म बने गतर के दुनिया ल घूमे हे? बस दुनिया के जगा म अपन दाई-ददा के परिक्रमा करके उंकर आगू म बइठ गे। तभो ले उही ल पहिली पूजा के वरदान?

मोला भोलेनाथ ऊपर खिसियानी लागय। अइसे जनावय के कार्तिक संग अन्याय होए हे। एकरे सेती कार्तिक ह रिसा के कैलाश ल छोड़ के दक्षिण भारत आगे रिहिसि हावय। महादेव-पार्वती वोला गजब मनाईन तभो ले दक्षिण ल नइ छोडि़स।

अब जब थोक-बहुत गुने-समझे के लाइक होए हावन त समझ म आवत हे के गनपति ल पहिली पूजा के वरदान काबर मिलिस?
दूनों भाई के बीच जेन शरत होए रिहिसे तेकर मुताबिक जेन पहिली दुनिया (पृथ्वी) ल किंजर के आ जाही वोही ल पहिली पूजा के वरदान मिलही। कार्तिक बलशाली रिहिसे, वोकर वाहन मयूर घलोक तेज रफ्तार म उडिय़ाने वाला, फेर गणेश के सवारी तो मुसवा बपरा। वो कइसे दुनिया ल किंजर के आतीस?

फेर गनपति रिहिस तेज बुद्धि अउ तर्क शक्ति वाला। वोला ये बात के जानकारी रिहिस हवय के महतारी ल घलोक पृथ्वी के रूप माने जाथे। एकरे सेती वो अपन महतारी-ददा के परिक्रमा करके उंकर आगू म आके बइठ गे।

भोलेनाथ एकरे सेती गनपति ल पहिली पूजा के वरदान दे दिस। असल म ये ह ज्ञान के महत्व ल बताये के बात आय, के ज्ञान अउ तर्क के स्थान सबले ऊपर हे। जेकर जगा ज्ञान अउ तर्क शक्ति हे वोकर स्थान सबले ऊपर हे। उही ह विघ्न विनाशक माने हर समस्या के समाधान करने वाला घलो हो सकथे, जेकर जगा ज्ञान हे, तर्क शक्ति हे।
त संगी हो हमूं मन ला पद, पइसा अउ शक्ति के पाछू भटके ल छोड़ के ज्ञान अउ तर्क के रद्दा म आना चाही, काबर ते असल बड़प्पन या कहिन प्रथम पूज्य के अधिकार एकरे ले मिलथे। त बोलव गणपति महराज के जय🙏🙏🙏

सुशील भोले 
54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811

 


Tuesday, 1 December 2015

सतयुग आही कइसे...?


कलियुग के हाहाकार ले हलाकान होके जब कभू अच्छा दिन के सुरता करथन त सिरिफ एक्के बेरा के सुरता आथे... सतयुग के। नानपन ले सुने हावन सतयुग के मनखे सदाचारी, सत्यवादी अउ भगवान के मयारुक रहय। एकरे सेती उन कभू एक-दूसर के पीरा के सौदा नइ करत रिहिन।

आज के बेरा तो मार-काट, छीना-झपटी, ठगिक-ठगा, झूठ-लबारी, तोर-मोर, अपन-पराया के दलदल में बूड़े हावय। पेपर -गजट मन हत्या, बलात्कार, डकैती, भ्रष्टाचार, आतंकी अउ सीमा म गोलीबारी ले भरे रहिथे। त बतावव अइसन म शांत, सुंदर अउ संयम ले भरे युग के सुरता कइसे नइ आही?

फेर मन म इहू गुनान आथे.. आखिर अइसन बेरा आही कइसे..?  का सिरिफ सोचे भर म... ते ए ये रद्दा म रेंगे म? संगी हो, मैं हमेशा छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति के बात करथौं। आखिर का आय ये मूल संस्कृति ह? असल कहिन त उही ह सतयुग के संस्कृति आय, जेकर ऊपर द्वापर, त्रेता अउ न जाने काकर-काकर किस्सा-कहिली ल जोड़-सकेल के वोकर मूल रूप ल बिगाड़ दे गे हवय।

मैं कभू गुनथौं... का एकरे सेती इहां कलियुग ह डेरा डार के बइठ गे हवय? जाये के नामे नइ लेवत हे? फेर कभू मन म बिचार आथे- का सतयुग के देंवता ल छोड़ के अन्ते-तन्ते म उलझ गे हावन तेकर सेती उन शांत स्वरूप वाला मन रिसागे हवंय अउ याहा तरह के आगी-होरा भूंजे वाला खेल ल आज करत हावंय? का एकरे सेती हम कलियुग के आगी म धधकत हावन?

त का सतयुग के वापसी खातिर हमला फेर उही सतयुग के संस्कृति ल, सतयुग के देंवता ल अपन जिनगी के आधार  बनाये बर लागही? वोकर मूल रूप ल, मूल संस्कृति ल फेर चारों खुंट बगराये अउ लोगन के मन म बसाये पर परही? हां... अइसन तो करेच बर लागही। जइसन मन के पूजा-उपासना करबे... वइसने तो गुन-जस पाबे?

त आवव संगी हो... फेर उही सतयुग के रद्दा... सत्यम्... शिवम्... सुन्दरम् के रद्दा म... अपन मूल संस्कृति के रद्दा म... अपन मूल देंवता के रद्दा म... मूल म पानी रितोबो तभे जिनगी रूपी पेंड़ हरियाही... सिरिफ डारा-शाखा म पानी रितोबो त जड़ अउ पेंड़ के जिनगी सिरा जही..संग म हमरो मन के जिनगी के हरियाली सिरा जाही... जय कुल देंवता... जय मूल देंवता...

सुशील भोले 
54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811

Monday, 30 November 2015

सतयुग आयेगा कैसे ...?


जब कभी हम कलियुग की भयावहता से निजात पाना चाहते हैं, तो केवल सतयुग की ही याद करते हैं। हम सोचते हैं कि आखिर वह सतयुग आयेगा कब, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सत्यवादियों का, सदाचारियों का युग था। सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का युग था। हमें बताया गया है कि समय का चक्र निरंतर चलता है। सतयुग के पश्चात त्रेता, उसके पश्चात द्वपर फिर कलियुग और कलियुग के पश्चात पुन: सतयुग आता है।

तो फिर आज का यह उन्मादीभरा समय, युद्ध की विभिषिका, हिंसा और प्रतिहिंसा, हत्या, लूट, बलात्कार जैसी अपराधों की निरंतर श्रृंखला कब रुकेगी। मन उकता सा गया है। आखिर सत्यम्... शिवम्... शिवम्... आयेगा कैसे... कब... प्रश्न वाचक चिन्हों का काफिला तैयार होने लगता है। क्या हम लोगों के उस दिशा में सोच लेने मात्र से या उसके लिए प्रयास भी करने से?

मित्रों, मैं छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति की बात हमेशा करता हूं। हमेशा कहता हूं कि यहां की संस्कृति पर किसी अन्य संस्कृति को थोपा जा रहा है। इसके मूल स्वरूप को बिगाड़ कर उस पर किसी अन्य संदर्भ को जोड़ा जा रहा है। ये छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति आखिर है क्या? वास्तव में यह सतयुग की ही संस्कृति है, जिसके ऊपर द्वापर और त्रेता की कथानकों को जोड़कर उसे छिपाया और भुलाया जा रहा है। मुझे कई बार ऐसा लगता है कि कहीं सतयुग की उस संस्कृति को छिपाने या उसे भुलाने के कारण ही तो हम कलियुग की इस भयावहता को आज भोग रहे हैं?

क्या सतयुग की वापसी के लिए हमें उस सतयुग की संस्कृति को पुनस्र्थापित करना होगा? उसे उसके मूल रूप में लाकर पुन: सतयुग के देवताओं की आराधना प्रारंभ करनी होगी? शायद हां... हम सतयुग की वापसी चाहते हैं, तो सतयुग के देवता और उसकी संस्कृति को पुन: अपने जीवन और उपासना में आत्मसात करना होगा।
तो आईये .. उस सतयुग की ओर... आज से ही... अभी से ही... उसकी संस्कृति की ओर... अपने मूल की ओर... सत्यम्... शिवम्... सुन्दरम् की ओर...

सुशील भोले 
54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811