Tuesday, 8 January 2019

अस्मिता की आत्मा : संस्कृति

अस्मिता के आत्मा आय संस्कृति.....
आजकाल 'अस्मिता" शब्द के चलन ह भारी बाढग़े हवय। हर कहूँ मेर एकर उच्चारन होवत रहिथे, तभो ले कतकों मनखे अभी घलोक एकर अरथ ल समझ नइ पाए हे, एकरे सेती उन अस्मिता के अन्ते-तन्ते अरथ निकालत रहिथें, लोगन ल बतावत रहिथें, व्याख्या करत रहिथें।

अस्मिता असल म संस्कृत भाषा के शब्द आय, जेहा 'अस्मि" ले बने हे। अस्मि के अर्थ होथे 'हूँ"। अउ जब अस्मि म 'ता" जुड़ जाथे त हो जाथे 'अस्मिता" अउ ये दूनों जुड़े शब्द के अरथ होथे- 'मैं कोन आँव?", मैं कौन हूँ?, मेरी पहचान क्या है?, मोर चिन्हारी का आय? अब ये बात ल तो सबो जानथें के हर मनखे के या क्षेत्र के चिन्हारी वोकर संस्कृति होथे। एकरे सेती हमन कहिथन के जे मन छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल जीथे वोमन छत्तीसगढिय़ा। अइसने जम्मो क्षेत्र के लोगन के निर्धारण उंकर संस्कृति संग होथे।

एक बात इहाँ ध्यान दे के लाइक हे के भाषा ह संस्कृति के संवाहक होथे, वोकर प्रवक्ता होथे, एकरे सेती कोनो क्षेत्र विशेष के भाषा भर ल बोले म कोनो मनखे ल वो क्षेत्र के मूल निवासी नइ माने जा सकय। अब हमन छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखन। इहाँ के मातृभाषा छत्तीसगढ़ी ल आज इहाँ के मूल निवासी मन के संगे-संग बाहिर ले आके रहत लगभग अउ जम्मो लोगन थोक-बहुत बोलबेच करथें, तभो ले उनला हम छत्तीसगढ़ के मूल निवासी नइ मानन, काबर उन आजो इहाँ रहि के घलोक अपन मूल प्रदेश के संस्कृति ल जीथें।

पंजाब ले आये मनखे पंजाब के संस्कृति ल जीथे, बंगाल ले आये मनखे बंगाल के संस्कृति ल जीथे, अउ अइसने आने लोगन घलो अपन-अपन मूल प्रदेश के संस्कृति ल ही जीथें, उही संस्कृति के अंतर्गत इहाँ कतकों किसम के आयोजन  घलोक करत रहिथें। ए ह ए बात के चिन्हारी आय के वो ह आज घलोक छत्तीसगढ़ के 'चिन्हारी" ल अपन 'चिन्हारी" नइ बना पाए हे, इहाँ के अस्मिता ल आत्मसात नइ कर पाए हें। अउ जब तक वो ह इहाँ के अस्मिता ल आत्मसात नइ कर लेही तब तक वोला छत्तीसगढिय़ा नइ माने जा सकय।

हम ए उदाहरण म भारत ले जा के विदेश म बसे लोगन मनला घलोक शामिल कर सकथन। आज घलो अइसन लोगन ल हम भारतीय मूल के लोगन कहिथन, भारतीय संस्कृति ल विदेश म बगराने वाला कहिथन काबर ते उन आने देश म रहि के घलोक भारत के संस्कृति ल जीथें, भारत के तिहार-बार ल मनाथें। जबकि उहाँ बसे अइसे कतकों लोगन हें, जे मन भारत के भाषा ल भुलागे हवंय, फेर संस्कृति ल आजो धरे बइठे हावंय।

क्रिकेट खेले बर इहाँ वेस्ट इंडीज के जेन टीम आथे, वोमा अइसन कतकों झन रहिथें, जे मन भारतीय मूल के होथें, उंकर मनके नाम घलोक शिवराम चंद्रपाल जइसन भारतीय किसम के होथे, फेर उन इहाँ के भाषा ल नइ बोले सकयं। भाषा उहें के बोलथें जिहाँ अब रहिथें, तभो ले उनला भारतीय मूल के कहे जाथे, काबर ते वोकर पहिचान के या कहिन के चिन्हारी के मानक संस्कृति होथे।

अब हम छत्तीसगढ़ के संस्कृति के बात करन या कहिन के अस्मिता के बात करन। त सबले पहिली ए बात उठथे के छत्तीसगढ़ के संस्कृति का देश के आने भाग म पाए जाने वाला संस्कृति ले अलग हे? त एकर जवाब हे- हाँ बहुत अकन परब-तिहार अउ रिति-रिवाज अलग हे, अउ उही अलगे मनके सेती हम छत्तीसगढ़ ल एक अलग साँस्कृतिक इकाई मानथन, जेकर सेती ए क्षेत्र ल एक अलग राज के रूप म मान्यता दे गे हवय। वइसे कुछ अइसे घलोक तिहार-बार हे, जेला पूरा देश के संगे-संग छत्तीसगढ़ म घलोक मनाए जाथे, फेर जब अलग चिन्हारी के बात आथे त अइसन मनला अलगिया दिए जाथे।

अब प्रश्न ये उठथे के अइसन का अलग हे, जेन संस्कृति ल आने प्रदेश म नइ जिए जाय? त ए बात ल सब जानथें के मैं ह इहाँ के मूल संस्कृति ऊपर पहिली घलोक अड़बड़ लिखे हौं, अउ बेरा-बेरा म एकर ऊपर चरचा-भासन घलोक दिए हौं, तभो ले कुछ रोटहा बात ल थोक-मोक फेर करत हावंव।

सबले पहिली छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति का आय, तेला फोरिया लेथन? काबर ते आज इहां के संस्कृति के जेन रूप देखाए जावत हे, वोकर मानकीकरण ल गलत करे जावत हे। असल म कोनो भी क्षेत्र या प्रदेश के संस्कृति के मानक उहाँ के मूल निवासी मन के संस्कृति होथे, बाहिर ले आके इहाँ बस गे लोगन मन के संस्कृति ह नइ होवय, फेर कोन जनी इहाँ के तथाकथित विद्वान मनला का मनसा भरम धर लिए हे, ते उन इहाँ के मूल निवासी मनके संस्कृति ल एक डहर तिरिया दिए हें, अउ बाहिर ले आए लोगन मन के संस्कृति ल छत्तीसगढ़ के संस्कृति के रूप म लिखत-पढ़त हें।

ये ह असल म इतिहास लेखन संग दोगलागिरी करना आय, तभो ले कुछ लोगन ए दोगलागिरी ल पूरा बेसरमी के साथ करत हें। एमा वो लोगन मन के संख्या जादा हे, जे मन उत्तर भारत ले आ के इहाँ बसे हवंय, एकरे सेती उन अस्मिता के आत्मा के रूप म संस्कृति ल छोड़ के भाषा ल बतावत रहिथें। काबर ते उन ए बात ल अच्छा से जानथें के जब इहाँ के मूल संस्कृति के बात करबो तब तो हमूँ मन गैर छत्तीसगढिय़ा हो जाबो, बाहिरी हो जाबो, काबर ते छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल तो उहू मन नइ जीययं।

अब कुछ मूल संस्कृति के बात। त सबले पहिली वो चातुर्मास के बात जेला चारोंखुंट मनाथें, फेर जे छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति म लागू नइ होय। अइसे कहिथें के चातुर्मास के चार महीना म देंवता मन बिसराम करथें या कहिन के सूत जाथें, एकरे सेती ए चार महीना (सावन, भादो, कुंवार अउ कातिक) म कोनो भी किसम के शुभ कारज (माँगलिक कार्य, जइसे- बर-बिहाव आदि) नइ करे जाय।

अब हम छत्तीसगढ़ के परब-तिहार के बात करन त देखथन के इहाँ ईसरदेव अउ गौरा के बिहाव के परब ल 'गौरा पूजा" या 'गौरी-गौरा" के रूप म इही चातुर्मास के भीतर माने कातिक महीना के अमावस्या तिथि म मनाए जाथे। अब प्रश्न उठथे, के जब इहां के बड़का भगवान के बिहाव ह देवउठनी माने  चातुर्मास सिराये के पहिली हो जाथे, त ए चातुर्मास के रिवाज ह हमर छत्तीसगढ़ के संस्कृति म कहाँ लागू होइस?

मोर तो ए कहना हे के छत्तीसगढ़ के संस्कृति म चातुर्मास के इही चारों महीना ल सबले जादा शुभ अउ पवित्र माने जाथे, काबर ते इही चारों महीना- सावन, भादो, कुंवार, कातिक म ही छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति के जम्मो बड़का परब मन आथें, जेमा हरेली ले लेके कातिक पुन्नी ले चालू होवइया मेला-मड़ई परब ह आथे।

अब एक अइसे बड़का तिहार के चरचा जेला पूरा देश म मनाए जाथे, फेर वोकर कारण अउ स्वरूप म बाहिर म अउ छत्तीसगढ़ म थोर-बहुत फरक होथे, वो तिहार आय होली। होली के बारे ए बात ल जानना जरूरी हे के छत्तीसगढ़ म एला 'काम दहन" के रूप म मनाए जाथे, जबकि देश के आने भाग म 'होलिका दहन" के सेती। होलिका दहन ल सिरिफ पाँच दिन के मनाए जाथे, जे ह फागुन पुन्नी ले लेके रंग पंचमी (चइत महीना के अंधियारी पाख के पंचमी) तक चलथे। छत्तीसगढ़ म जेन 'काम दहन" मनाए जाथे वोला चालीस दिन के मनाए जाथे- बसंत पंचमी (माघ महीना अंजोरी पाख के पंचमी) ले लेके फागुन पुन्नी तक।

बिल्कुल अइसने दसरहा के बारे म जानना घलोक जरूरी हे। काबर के इहू परब ल छत्तीसगढ़ म अउ देश के आने भाग म अलग-अलग कारण के सेती मनाए जाथे। जिहाँ देश के आने भाग म एला 'रावण वध"  के सेती मनाए जाथे, उहें छत्तीसगढ़ म 'विष हरण" माने 'दंस हरन" के रूप म मनाए जाथे। हमर बस्तर म जेन रथ यात्रा के परब मनाए जाथे वो असल म मंदराचल पर्वत के मंथन अउ वोकर बाद निकले विष के हरण के परब आय।

अस्मिता के जब बात होथे त भाषा अउ इतिहास के बात घलोक होथे। काबर ते इहू मन अस्मिता माने 'चिन्हारी" के अंग आयं। जिहाँ तक भाषा के बात हे त हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा सन् 1885 म लिखे छत्तीसगढ़ी भाखा के व्याकरण संग एकर प्रकाशित रूप हमर आगू म हवय, जेला अब इहाँ के राज सरकार ह प्रदेश म 'राजभासा" के दरजा दे दिए हवय, फेर केन्द्र सरकार के माध्यम ले संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल करे के बुता ह अभी घलोक बाँचे हवय।

आज छत्तीसगढ़ी भाखा म हर विधा के अंतर्गत रचना करे जावत हे, अउ अच्छा रचना करे जावत हे, जेला राष्ट्रीय स्तर के आने भाखा के साहित्य  मन संग तुलना करे जा सकथे। नवा पीढ़ी के रचनाकार मन म अच्छा उत्साह देखे जावत हे, जे मन ल इहां के पत्र-पत्रिका मन म प्रकाशन के अवसर घलोक अच्छा मिलत हे। सबले बढिय़ा बात ये हे के इंटरनेट के आधुनिक तकनीक के प्रयोग घलोक ह छत्तीसगढ़ी भाखा ल देश-दुनिया के चारों खुंट म पहुंचावत हे। ए सबला देख के लागथे के छत्तीसगढ़ी के आने वाला बेरा ह चमकदार रइही।

आखिरी म इतिहास के घलोक खोंची भर बात हो जाय। काबर ते इहाँ जेन किसम के इतिहास लेखन होवत हे वोकर ले मैं भारी नराज हावंव। ए देखे म आवत हे के अधकचरा जानकारी रखने वाले मन इहां इतिहासकार अउ गुन्निक बनके सबला चौपट करत हवयं। संग म इहू देखे म आवत हवय के कुछ वर्ग विशेष के मनखे मन जानबूझ के आने वर्ग के लोगन मन के बड़े-बड़े कारज मन के घलोक उपेक्षा करत हें। एमा विश्वविद्यालय मनके भूमिका घलोक ह बने नइ लागत हे। भलुक ए कहना जादा ठीक होही के आँखी मूंद के पीएचडी के डिगरी ल बांटे जावत हे। ए सब दुखद हे। भरोसा हे के ईमानदार आँखी के माध्यम ले ये सबला नवा सिरा से देखे जाही।

सुशील भोले
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर
मो.नं. 098269-92811

Saturday, 5 January 2019

परंपरा का संरक्षण : ध्वज की परंपरा......

संदर्भ : परंपरा का संरक्षण.....
छत्तीसगढ़ी संस्कृति में ध्वज की परंपरा.......
विश्व की प्राय:  सभी संस्कृतियों में ध्वज की अपनी विशिष्ट परंपरा है। अपने क्षेत्र विशेष की पहचान या अपने ईष्ट देव के प्रतीकों के आधार पर ध्वज के रंग और आकार-प्रकार का निर्माण लोग करते रहे हैं। ऐसे ध्वजों को देखकर ही यह ज्ञात हो जाता है कि वह किस राज्य अथवा देश का है, या फिर किस धर्म विशेष का है। कभी-कभी एक ही धर्म या संप्रदाय में ही अलग-अलग रंग और आकार-प्रकार के ध्वज दिख जाते हैं।

जहाँ तक छत्तीसगढ़ की बात है, तो यहां की मूल संस्कृति में तीन अलग-अलग रंगों के ध्वज का प्रयोग देखा जाता है। सबसे पहले सफेद रंग का और फिर लाल रंग का और उसके बाद फिर काला रंग का। ये तीनों ही रंग के ध्वज यहां की उपासना पद्धति और उनसे संबंधित देवताओं को प्रतिबिंबित करते हैं।

सफेद रंग यहां के मूल उपास्य देव भगवान शिव का प्रतीक है, जिसे यहां बूढ़ादेव, ठाकुर देव या ईसर देव भी कहा जाता है।

लाल रंग माता शक्ति का प्रतीक है, जिसे यहां बमलाई, चंडी, बूढ़ीमाई जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है।
इसी प्रकार काला रंग यहां की उपास्य महामाया का प्रतीक है।

यहां की मूल संस्कृति को जीने वाले मांत्रिक, जिसे स्थानीय भाषा में बइगा या पंडा भी कहा जाता है, इन्हीं तीन रंगों के ध्वज का प्रयोग अपने सभी कार्यों में करते हैं। यहां के प्राचीन मंदिरों में जहां की पूजा मूल निवासी समुदाय का पंडा करता है, वहां अब भी यही तीन रंग आयताकार ध्वज के रूप में लहराते हुए देखे जा सकते हैं। उसके आधार पर दूर से ही यह जाना जा सकता है कि वह मंदिर किस देव अथवा देवी का है?

लेकिन आजकल एक अलग ही रंग के ध्वज यहां के मंदिर और पूजा स्थलों पर लहराते देखे जा रहे हैं। भगवा रंग का ध्वज। वह भी सभी मंदिरों और धार्मिक स्थलों तथा ऐसे सभी आयोजनों में, जिनका संबंध किसी न किसी आध्यात्मिक कार्यक्रमोंं से होता है। जबकि यह सर्वविदित है कि भगवा रंग का संबंध छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति में दूर-दूर तक भी नहीं है। दरअसल यह अन्य प्रदेशों से लाकर यहां की संस्कृति को विकृत कर उस पर बाहरी पूजा प्रतीकों को थोप रहे लोगों की पहचान का रंग है, जिसे किसी भी सूरत में यहां की मूल संस्कृति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

आश्चर्य है, कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को जिस बेहूदगी के साथ परिवर्तित कर मिटाने का प्रयास किया जा रहा है, उस पर बोलने वाला यहां कोई भी नहीं है। आखिर क्यों ऐसा हो रहा है? यहां का कोई भी मूल निवासी समाज इस पर क्यों आवाज नहीं उठाता? कहीं ऐसा तो नहीं कि लोग रंगों पर आधारित ध्वज का महत्व ही समझना भूल गये हैं, अथवा ऐसा तो नहीं कि बाहर से लाकर थोपे जा रहे धार्मिक प्रतीकों को अपनाने के लिए यहां का समाज विवश हो गया है? कहीं इसीलिए तो उनके पूजा स्थलों से उन्हें बेदखल कर बाहर के लोगों को वहां स्थापित करने का काम चौतरफा देखा जा रहा है?

राजधानी रायपुर का ऐतिहासिक बूढ़ातालाब,  बूढ़ापारा और बूढ़ेश्वर मंदिर को उदाहरण के रूप में रखा जा सकता है। ये तीनों ही स्थल एक जगह पर स्थित हैं, और यहां के मूल देवता बूढ़ादेव के प्रतीक स्वरूप हैं। लेकिन आज इन तीनों के साथ जो हो रहा है, उसे किसी भी प्रकार से यहां की पहचान को सुरक्षित और संरक्षित करने का उपक्रम नहीं कहा जा सकता। बूढ़ातालाब को विवेकानंद सरोवर के रूप में नई पहचान दे दी गई है, और बूढ़़ेश्वर मंदिर पर अन्य प्रदेश  से आये हुए लोग अवैध कब्जा कर वहां अपनी परंपरा के अनुसार पूजा-उपासना और विविध आयोजन करने लगे हैं। अर्थात यहां की मूल परंपरा का अब वहां कोई नामलेवा भी नहीं रहा।

इस कड़ी में राजिम में आयोजित होने वाले पारंपरिक मेले को रखा जा सकता है, जिसे  पिछली सरकार ने "कुंभ" का नाम देकर अन्य प्रदेशों से आने वाले कथित साधु-संतों के लिए चारागाह बना दिया गया था। यह तो वर्तमान सरकार का समझ भरा निर्णय है, कि "कुंभ" का नाम परिवर्तित कर उसे पारम्परिक रूप से "पुन्नी महोत्सव" का नामकरण किया गया है।

यह बात सभी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ के प्राय: सभी गांव-कस्बों में मड़ई या मेला का आयोजन लगातार  होता है। ये छोटे स्तर के मड़ई-मेले गांव के बाजार स्थल पर या किसी अन्य स्थल पर आयोजित कर लिए जाते हैं। लेकिन जो बड़े स्तर के मेले होते हैं वे सभी किसी न किसी सिद्ध शिव स्थलों पर ही होते हैं। इसलिए हम यह प्राचीन समय से सुनते और देखते आ रहे हैं कि राजिम मेला कुलेश्वर महादेव के नाम पर भरने वाला मेला कहलाता था। एक गीत हम बचपन में सुनते थे- *चल ना चल राजिम के मेला जाबो, कुलेसर महादेव के दरस कर आबो...*  लेकिन जब से इस मेला को "कुंभ" के रूप में परिवर्तित किया गया था, तब से इसे "राजीव लोचन" के नाम पर भरने वाला कुंभ के रूप में प्रचारित किया जा रहाथा, जो कि यहां की मूल संस्कृति को समाप्त कर उसके ऊपर अन्य संस्कृति को थोपने का षडयंत्र मात्र था।

छत्तीसगढ़ के तथाकथित बुद्धिजीवियों पर, उनके क्रियाकलापों पर आश्चर्य होता थख। वे इस तरह की सांस्कृतिक विकृतियों पर कैसे खामोश रहकर सरकार की जी-हुजूरी में लगे रहते थे?

अब देखना यह है, हमारी धार्मिक एवं सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक "ध्वज" कब स्वतंत्र होकर खुले आसमान में लहरायेगा? यही प्रश्न अब जनमानस को उद्वेलित कर रहा है। क्या वर्तमान सकार इस दिशा में भी कोई दिशा-निर्देश जारी करेगी?

सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं.98269-92811

Friday, 4 January 2019

फर्जी कुंभ के बंठाधार.....

फर्जी कुंभ के अब होइस बंठाधार
जय होवय जी तुंहर नवा सरकार
मूल संस्कृति के अब होय  बढ़वार
इतिहास-गरब के बनव खेवनहार
-सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान
संजय नगर, रायपुर
मो। 9826992811

Wednesday, 2 January 2019

इतिहास लेखन और सच्चाई....

संदर्भ : ऐतिहासिक लेखन की सच्चाई.....
धुर्रा-गर्दा ल झटकारे के जरूरत.....?
मोला जब ले ये बात के जानबा होइस के इहां भगवान भोलेनाथ ह माता पार्वती संग सोला साल तक रहिके अपन जेठ बेटा कार्तिकेय ल वापस कैलास लेगे खातिर डेरा डार के बइठे रिहीसे तब ले मोर मन म ए गुनान चालू होगे के त फेर आज हमन ल छत्तीसगढ़ के जेन इतिहास देखाए जावत हे, बताए अउ पढ़ाए जावत हे, वोहर आधा-अधूरा अउ बौना हे, जेला फेर से नवा सिरा ले लिखे के जरूरत हे।

अभी तक इहां बगरे किताब मन के माध्यम ले सिरिफ अतके जान पाये रेहेन के छत्तीसगढ़ के इतिहास ह रमायन अउ महाभारत कालीन हे। फेर अब जानेन के सिरिफ अतके नहीं भलुक ए माटी के जुन्ना इतिहास सृष्टिकाल संग जुड़े हे, जेला युग निर्धारण के दृष्टि ले सतयुग घलोक कहि सकथन। त फेर मन म इहू बात उपजथे के इहां जे मनला  हमन इतिहासकार के रूप म जानथन वो मन ए सब बात ल काबर नइ लिखिन? त एक बात झक ले आगू म आ जथे के इहां जतका भी इतिहासकार होए हें, उन सबो के ज्ञान के स्रोत उत्तर भारत ले आये धारमिक ग्रंथ मन रेहे हें, एकरे सेती उन उहां ले जुड़े घटना संग जोड़ जाड़ के छत्तीसगढ़ के इतिहास ल लिख दिए हें। तभे तो वो इतिहास लेखन ह इहां के मूल संस्कृति अउ धारमिक रीति रिवाज संग जोड़ के देखे ले  अन्ते-तन्ते जनाथे।

इहां के गांव-गांव अउ घर-घर म बूढ़ा देव, ठाकुर देव, साड़हा देव, शीतला दाई जइसन देवी-देवता काबर मिलथे। राम अउ कृष्ण संग जुड़े  संस्कृति या ए मनला कुल देवता के रूप म काबर नइ पाये जाय? कहूं छत्तीसगढ़ के धारमिक अउ सांस्कृतिक इतिहास सिरिफ रमायन अउ महाभारत कालीन तक सीमित होतीस त निश्चित रूप ले राम अउ कृष्ण ह इहां घरों-घर म कुल देवता के रूप म बिराजे रहितीस। फेर अइसन नइहे छत्तीसगढ़ ह सतयुग माने भगवान भोलेनाथ के संस्कृति ल जीथे तेकर असल कारन हे ये माटी के इतिहास ह सतयुग माने सृष्टिकाल तक जुन्ना हे। जेला फिर से लिखे-पढ़े के जरूरत हे।

बस्तर म एक लोक गीत मिलथे जेकर मुताबिक भगवान भोलेनाथ अउ माता पार्वती ह अपन जिनगी के सोला साल तक इहां रिहिन हें। अइसे कहे जाथे के उन इहां रहिके अपन जेठ बेटा कार्तिकेय ल कैलाश लेगे खातिर मनावत रिहीन हें। हमन ल धरम ग्रंथ के माध्यम ले ए जानकारी मिलथे के भगवान गणेश ल वोकर चतुराई अउ तेज बुद्धि के सेती प्रथम पूज्य के आशीर्वाद दे दिए गे रिहीसे, तेकरे सेती आज घलो जम्मो किसम के धरम-करम के कारज म हमन गणेश के ही सबले पहिली पूजा करथन। इही प्रथम पूज्य के आशीर्वाद के सेती वोकर बड़का भाई कार्तिकेय ह रिसा के दक्षिण भारत म आके रेहे बर धर लिए रिहीसे। तब भगवान भोलेनाथ अउ माता पार्वती ह वोला वापिस कैलाश लेगे खातिर छत्तीसगढ़ के बस्तर म आके सोला बछर तक रिहिन हें।
निश्चित रूप ले एहर छत्तीसगढ़ खातिर गौरव के बात आय। अपन लेख मन  म मैं ह इहां के मूल संस्कृति अउ धरम के कतकों पइत चरचा कर डारे हावौं जेकर ले ए बात साबित हो जाथे के हमर इतिहासकार अउ संस्कृति मर्मज्ञ मन हमन ला इहां के मूल संस्कृति अउ इतिहास के बलदा उत्तर भारत ले लाए ग्रंथ अउ संस्कृति मन के मापदण्ड म चुरो-पको के उहां के रूप म इहां के संस्कृति अउ इतिहास ल देखाए -बताए हें।

ए बात ल सबो जानथें के इहां के मूल निवासी मन शिक्षा ले, पढ़ई-लिखई ले कतकों कोस दुरिहा रिहीन हें। एकरे सेती उन अपन गौरवशाली संस्कृति अउ इतिहास ल नइ लिख पाइन। इही बात के फायदा उठावत बाहिर ले आके इहां बसे मनखे मन अपन संग वोती ले लाने संस्कृति अउ इतिहास ल इहां के रूप म लिख-पढ़ के रख दिन। इही कटु सत्य आय जेकर सेती इहां के मूल संस्कृति अउ इतिहास ह किताब मन म बगरे संस्कृति अउ इतिहास ले अलग दिखथे। अब जब इहां के मूल निवासी मन घलो पढ़-लिख डारे हें, अउ संग म ए समझ डारे हें, के हमला जेन बताए अउ पढ़ाए जावत हे, वो हर हमर नहीं भलुक आने क्षेत्र के संस्कृति अउ इतिहास आय त निश्चित रूप ले वो बाहिर के संस्कृति अउ इतिहास ल अपन-अपन मुड़ ले उतार के इहां के मूल संस्कृति, गौरव अउ इतिहास ल अपन-अपन मुड़ म चढ़ाना चाही, अपन ल मानना चाही।

सुशील भोले
डॉ. बघेल गली,संजय नगर, रायपुर
मो. 098269-92811

Tuesday, 1 January 2019

छेरछेरा का पर्व और मान्यताएं....

दान देने और लेने का पर्व छेरछेरा....
छत्तीसगढ़ में पौस माह की पूर्णिमा तिथि को  *छेरछेरा* का जो पर्व मनाया जाता है, वह अलग-अलग वर्ग के लोगों के द्वारा अलग-अलग मान्यताओं के अंतर्गत मनाया जाता है।
यहां के मूल निवासी वर्ग के लोग, जो गोंडवाना या कहें, आदिवासी संस्कृति को जीते हैं, वे इसे पौस पूर्णिमा के अवसर पर गोटुल/घोटुल की शिक्षा में पारंगत हो जाने के पश्चात् तीन दिनों का पर्व मनाते हैं। जबकि यहां के मैदानी भाग में निवासरत अन्य सामान्यजन खरीफ की फसल की लुवाई-मिसाई के पश्चात उल्लास के रूप में एक दिन का दान पर्व के रूप में मनाते हैं।
इन दोनों ही मान्यताओं से इतर मुझे अपने साधनाकाल में इसके आध्यात्मिक स्वरूप का जो.ज्ञान प्राप्त हुआ, उसके अनुसार यह पर्व महादेव द्वारा विवाह के पूर्व देवी पार्वती से परीक्षा लेने के निमित्त,उनके घर जाकर भिक्षा मांगने के प्रतीक स्वरूप मनाया जाने वाला पर्व है।

आप सभी को यह ज्ञात है कि पार्वती से विवाह पूर्व भोलेनाथ ने कई किस्म की परीक्षाएं ली थीं। उनमें से एक परीक्षा यह भी थी कि वे नट बनकर नाचते-गाते पार्वती के निवास पर भिक्षा मांगने गये थे, और स्वयं ही अपनी (शिव की) निंदा करने लगे थे, ताकि पार्वती उनसे  (शिव से) विवाह करने के लिए इंकार कर दें।

छत्तीसगढ़ में जो छेरछेरा का पर्व मनाया जाता है, उसमें भी लोग नट बनकर नाचते-गाते हुए भिक्षा मांगने के लिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ के मैदानी भागों में तो अब नट बनकर (विभिन्न प्रकार के स्वांग रचकर) नाचते-गाते हुए भिक्षा मांगने जाने का चलन कम हो गया है, लेकिन यहां के बस्तर क्षेत्र में अब भी यह प्रथा बहुतायत में देखी जा सकती है। वहां बिना नट बने इस दिन कोई भी व्यक्ति भिक्षाटन नहीं करता। 

ज्ञात रहे इस दिन यहां के बड़े-छोटे सभी लोग भिक्षाटन करते हैं, और इसे किसी भी प्रकार से छोटी नजरों से नहीं देखा जाता, अपितु इसे पर्व के रूप में देखा और माना जाता है। और लोग बड़े उत्साह के साथ बढ़चढ़ कर दान देते हैं। इस दिन कोई भी व्यक्ति किसी भी घर से खाली हाथ नहीं जाता। लोग आपस में ही दान लेते और देते हैं।

इस छेरछेरा पर्व के कारण यहां के कई गांवों में कई जनकल्याण के कार्य भी संपन्न हो जाते हैं। हम लोग जब मिडिल स्कूल में पढ़ते थे, तब हमारे गुरूजी पूरे स्कूल के बच्चों को बैंडबाजा के साथ गांव में भिक्षाटन करवाते थे, और उससे जो धन प्राप्त होता था, उससे बच्चों के खेलने के लिए और व्यायाम से संबंधित तमाम सामग्रियां लेते थे।

मुझे स्मरण है, हमारे गांव में कलाकारों की एक टोली थी, जो इस दिन पूरे रौ में होती थी। मांदर-ढोलक और झांझ-मंजीरा लिए जब नाचते-गाते, डंडा के ताल साथ कुहकी पारते (लोकनृत्य में यह एक शैली है ताल के साथ मुंह से आवाज निकालने की इसे ही कुहकी पारना कहते हैं) यह टोली निकलती थी तो लोग उन्हें दान देने के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा करते थे। उस टोली को अपने यहां आने का अनुरोध करते थे। छेरछेरा का असली रूप और असली मजा ऐसा ही होता था, जो अब कम ही देखने को मिलता है।

ज्ञात रहे कि छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति, जिसे मैं "आदि धर्म" कहता हूं वह सृष्टिकाल की संस्कृति है। युग निर्धारण की दृष्टि से कहें तो सतयुग की संस्कृति है, जिसे उसके मूल रूप में लोगों को समझाने के लिए हमें फिर से प्रयास करने की आवश्यकता है, क्योंकि कुछ लोग यहां के मूल धर्म और संस्कृति को अन्य प्रदेशों से लाये गये ग्रंथों और संस्कृति के साथ घालमेल कर लिखने और हमारी मूल पहचान को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।

मित्रों, सतयुग की यह गौरवशाली संस्कृति आज की तारीख में केवल छत्तीसगढ़ में ही जीवित रह गई है, उसे भी गलत-सलत व्याख्याओं के साथ जोड़कर भ्रमित किया जा रहा। मैं चाहता हूं कि मेरे इसे इसके मूल रूप में पुर्नप्रचारित करने के सद्प्रयास में आप सब सहभागी बनें...।

सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 98269-92811