Tuesday, 3 November 2020

डॉ. नरेंद्र देव वर्मा.. कुशल चितेरे...

डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा : छत्तीसगढ़ महतारी की महिमा के चितेरे - डॉ. चन्द्रकुमार जैन
छत्तीसगढ़ की माटी को धन्य करने वाले जिन महामानवों पर हम गर्व कर सकते हैं उनमें डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा का नाम अग्रगण्य है। वे सही अर्थ में छत्तीसगढ़ के सोनहा बिहान के स्वप्न दृष्टा और सृजेता भी थे। धन्य पिता धनीराम जी की आँखों के दो ज्योति पुंज बनकर स्वामी आत्मानंद जी और डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा ने यहाँ के जन-मन की अभिलाषाओं को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर मानो पूर्ण करने का बीड़ा उठाया। स्वामी आत्मानंद तथा डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा दोनों अपने-अपने क्षेत्र की विभूतियाँ बनकर अमर हो गए।
यह सुखद संयोग है कि छत्तीसगढ़ के राज गीत अरपा पैरी के धार के सर्जक डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा की लाड़ली मुक्तेश्वरी देवी हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की जीवन संगिनी हैं। स्वामी आत्मानंद की अनोखी वक्तृत्व कला और उनके पारदर्शी व हृदयस्पर्शी चिंतन के तो लोग दीवाने थे और आज भी हैं। डॉ.वर्मा वाग्देवी की आराधना माटी-महतारी की सेवा को समर्पित हो गए। दोनों सपूतों ने इस धरती का शुभ भावों से श्रृंगार कर अपने कर्तव्य कर्म के साथ-साथ इस माटी का भी गौरव बढ़ाया है। दोनों महतारी की अस्मिता और मानवता की तेजस्विता के प्रतीक बन गए।
छोटी सी उम्र पाकर भी मानव जीवन को एक न्यास यानी ट्रस्ट की तरह कैसे जिया जा सकता है इसकी मिसाल हमें डॉ. वर्मा के जीवन से मिलती है। जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मैया की धुन सुनते ही लोग स्तंभित हो जाते हैं। जैसे कि राष्ट्र्गान के स्वर गूँज रहे हैं।  वैसे भी वह राजगीत तो है ही। माता की ऐसी वंदना सचमुच बड़ी दुर्लभ बात है।  यह कोई बिरला सपूत ही कर पाता है।  यह गीत जैसे डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा की आत्मा का संगीत है। छत्तीसगढ़ महतारी की यह वंदना ही नहीं, सम्पूर्ण भुइँया की महिमा और उसकी खुशहाली की प्रार्थना है। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा की इस अमर रचना में समूचे छत्तीसगढ़ का वैभव एकबारगी साकार हो उठा है। यही कारण है कि स्वामी आत्मानंद ने अपने अनुज डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के बारे में स्मरण स्वरूप लिखे लेख में कहा है कि सोनहा बिहान की चतुर्दिक ख्याति की खबरें सुनकर वे भी इसकी प्रस्तुति देखने के लिए लालायित हो उठे। 1978 के अंत में महासमुंद में एक प्रदर्शन तय हुआ । स्वामी जी को डाक्टर साहब ने बताया कि आप चाहें तो उस दिन प्रदर्शन देख सकते हैं । महासमुंद में विराट दर्शक वृंद को देखकर स्वामी जी रोमांचित हो उठे । उनके भक्तों ने उन्हें विशिष्ट स्थान में बिठाने का प्रयत्न किया लेकिन डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने स्वामी जी को दर्शकों के बीच जमीन पर बैठकर देखने का आग्रह किया । स्वामी जी उनकी इस व्यवस्था से अभिभूत हो उठे । उन्होंने उस घटना को याद करते हुए लिखा है – ‘नरेन्द्र तुम सचमुच मेरे अनुज थे ।‘
वास्तव में सोनहा बिहान छत्तीसगढ़ के लिए सुबह की तलाश का पर्याय बना। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने घर परिवार, माता-पिता के लिए विवाहित जीवन को कर्त्तव्य भाव से स्वीकार किया । धनीराम जी का केवल यह सपूत ही विवाहित हुआ । उनके शेष चार बेटों में तीन तो सन्यासी हो गए, मगर एक पुत्र अविवाहित रहकर विवेकानंद विचारधारा के लिए समर्पित होकर अमूल्य सेवाएं दे रहे हैं । सही माने में डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा छत्तीसगढ़ के जागरण-पुरुष थे। इतिहास रचने वाले महामानव बनकर उनका व्यक्तित्व स्वयं एक इतिहास की मानिंद बन गया। उनका जीवन संगीत में ढला ही नहीं, खुद संगीत बन गया। सोनहा बिहान से प्रेरित होकर छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने न जाने कितनी संस्थाएं गठित कीं , होड़ सी मच गयी।  हरेक के मन में जैसे अपने हिस्से की बिहान की साझेदारी की ललक सी पैदा हो गयी।
दरअसल सच्ची साधना कभी अकेले मुक्ति के पक्ष में नहीं रहती। वह सबके कल्याण, सबकी मुक्ति का पथ प्रशस्त करने में ही अपनी मुक्ति को सार्थक मानती है। यही सार्थकता डॉ. वर्मा के जीवन की पहचान बन गयी। ऐसा जीवन मात्र सफल नहीं, सुफलदायी कहलाता है। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने हर मोर्चे पर अपनी ताकत का अहसास करवाया । वे एकांतवासी शब्द साधक या संगीत आराधक बनकर बैठ नहीं गए, बल्कि  लोगों के जीवन की राह आसान बनाने के लिए  सच्चे माटीपुत्र के रूप में काम करते रहे। उपेक्षा, तिरस्कार,  शोषण और अत्याचार के विरुद्ध उनकी आवाज़ कभी मद्धिम नहीं हुई। वे लोगों के भीतर हर तरह की पराधीनता के खिलाफ लड़ने की ताकत की पुकार बने रहे। वे कथाकार, कवि, गीतकार और दार्शनिक तो थे ही, छत्तीसगढ़ के ख्याति प्राप्त भाषा-विज्ञानी और अत्यंत कुशल मंच संचालक भी थे। गीत सृजन के साथ स्वर रचना में भी वे निष्णात थे।
अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार,

इंदरावती हा पखारे तोर पइयां,

जय हो, जय हो छत्तीसगढ़ मइयां।
ये पंक्तियाँ डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा की पहचान और छत्तीसगढ़ के मान के रूप में ढल गयीं।
स्मरणीय है कि नरेन्द्र देव वर्मा अपनी बुनियादी तालीम के दौरान एक आम विद्यार्थी ही थे। बाद में उनकी प्रतिभा में निखार आया। बी.ए. में उनकी प्रखर मेधा उभरी। यह सचमुच बड़े गर्व की बात रही कि वे सागर विश्वविद्यालय में प्रख्यात समालोचक और लेखक आचार्य नंददुलारे बाजपेयी के शिष्य थे । डॉ. नरेन्द्र देव ने सागर विश्वविद्यालय से श्रेष्ठ वक्ता के रूप में अलग पहचान बनायी। वादविवाद प्रतियोगिता में अव्वल रहे।
डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा की शादी मात्र साढ़े अठारह वर्ष की उम्र में हो गई । धनीराम जी वर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे तुलेन्द्र। यही तुलेन्द्र आगे चलकर छत्तीसगढ़ के विवेकानंद स्वामी आत्मानंद कहलाये । उसके बाद क्रमश: दूसरे क्रम के पुत्र देवेन्द्र भी बड़े भाई से प्रभावित होते दिखे । इसीलिए देवेन्द्र का ब्याह सुनिश्चित हुआ।  परन्तु, अग्रज से प्रभावित इस होनहार अनुज के बारे में याद भी रखना चाहिए कि नरेन्द्र देव वर्मा ने बार-बार लिखा है कि बड़े भैय्या का आशीष अगर उन्हें भी मिला होता तो वे भी विवाह बंधन से मुक्त होकर उन्हीं की तरह सन्यासी जीवन बिताते । स्वामी आत्मानंद ने उन्हें समझाया भी कि शायद ईश्वर उन्हें विवाहित जीवन बिताते हुए ही सेवा का दायित्व देना चाहते थे । इसलिए विचलित हुए बगैर ईश्वरीय इच्छा को मानकर कार्य करना है ।
साहित्यकार डॉ. परदेशीराम वर्मा ने बहुत सटीक लिखा है कि स्वामी जी की उदार परंपरा में ही गृहस्थ डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा भी ढले थे । उन्होंने जीवन भर जागृति और परोपकार का काम किया । भाषा एवं संस्कृति के लिए उनका नाम स्तुत्य है तो धर्म एवं लोकमंच के लिए उनका अवदान भी ऐतिहासिक है । वे विवेक ज्योति पत्रिका के संपादक रहे । स्वामी विवेकानंद जी की जन्म शताब्दी 1963 में मनाई गई । स्वामी आत्मानंद के सपनों को साकार करने के लिए नरेन्द्र देव वर्मा ने दिन रात काम किया । उन्होंने जीवन भर शाम के तीन घंटों को आश्रम के लिए सुरक्षित रखा । वे नौ बजे रात्रि तक आश्रम के कामों में व्यस्त रहते । उसके बाद घर आकर मित्रों से मिलते-जुलते और रात्रि चार बजे तक लेखन अध्ययन करते ।
यह भी कि डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा छत्तीसगढ़ के पहले बड़े लेखक है जो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समान रूप से लिखकर मूल्यवान थाती सौंप गए । वे चाहते तो केवल हिन्दी में लिखकर यश प्राप्त कर लेते । लेकिन उन्होंने छत्तीसगढ़ी की समृद्धि के लिए खुद को खपा दिया । वे पहले बड़े लेखक थे जो मंच संचालक के रूप में बेहद यशस्वी बने । सोनहा बिहान में मंच संचालक ही सबसे प्रभावी अभिनेता सिद्ध हुआ । वे कविताओं की स्वर लिपियाँ रचने वाले छत्तीसगढ़ के पहले बड़े रचनाकार सिद्ध हुए ।
डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के अग्रज स्वामी आत्मानंद ने लिखा है कि मां शारदा देवी की पावन जन्म स्थली जयरामवाटी जाकर डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने मां से वरदान मांगा कि उन्हें वे अपना पुत्र बना लें । और मां शारदा की कृपा से उसी दिन से नरेन्द्र देव की लेखनी में चमत्कार दिखने लगा । बेशक वे जीवन भर वे अपने अग्रज को आदर्श मानते रहे लेकिन सदगृहस्थ बनकर अपने दायित्वों का पूर्ण मनोयोग से निर्वाह भी करते रहे । इस धरती पर मात्र चार दशक की अपनी यात्रा पूरी कर डॉ. वर्मा चल बसे परन्तु  छत्तीसगढ़ महतारी के ये सपूत अपने छोटे से जीवन में वह काम कर गये जो सैकड़ों वर्षों का जीवन पाकर भी सामान्य प्रतिभा का व्यक्ति नहीं कर पाता । उन्होंने सोनहा बिहान के माध्यम से छत्तीसगढ़ को कई रत्न दिए , कई रत्नों को तराशा।  कई पत्थरों को मूरत गढ़ी और कई ज़िंदगियों में नयी उम्मीदों का संचार कर अपनी ज़िंदगी का चित्र पूरा कर इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया।

नरेंद्र देव वर्मा.. स्वामी जी..

'नरेंद्र - मेरा अनुज'
-परम पूज्य स्वामी आत्मानंद जी
स्वामी आत्मानंद ने लिखा है- डा.नरेंद्र देव वर्मा द्वारा रचित 'सोनहा बिहान' की मैंने बहुत प्रशंसा सुनी थी। एक दिन मैंने नरेंद्र से कहा, अरे जरा एक बार तो अपना वह 'सोनहा बिहान' सुनवाओ। 1978 के अंत में एक दिन उसने सूचना दी कि महासमुंद में 'सोनहा बिहान' का प्रदर्शन है और मैं चाहूं तो वहां जाकर देख सकता हूं। हम कुछ लोग रायपुर से गए। महासमुंद पहुंचने में कुछ देर हो गई। सर्वसाधारण के साथ ही उसने मेरी भी बैठने की व्यवस्था की। किसी ने उससे कहा कि अरे स्वामी जी को यहां बिठा रहे हो? सबके साथ? वहां अलग से एक कुर्सी क्यों नहीं दे देते? नरेंद्र का उत्तर तो मैं नहीं सुन पाया, पर मुझे सबके साथ ही जमीन पर बैठना पड़ा। बाद में पता चला कि नरेंद्र नहीं चाहता था कि मेरे कारण दूसरों को किसी प्रकार की असुविधा हो अथवा कार्यक्रम में किसी प्रकार से कोई विघ्न उत्पन्न हो। उसकी भावना ने मुझे भाव-विभोर कर दिया और मेरी आत्मा पुकार उठी- 'नरेंद्र, तुम सचमुच मेरे अनुज हो।'
मैंने 'सोनहा बिहान' देखा और सुना। नरेंद्र उसकी कमेंटरी (कार्यक्रम का संचालन) कर रहा था। सब कुछ अपूर्व था। उसकी तेजस्विता और स्वाभिमान के उस दिन मुझे दर्शन हुए। वह दबंग था, अन्याय के समक्ष वह झुकना नहीं जानता था, पर वह अविनयी नहीं था। अपनी जन्मभूमि छत्तीसगढ़ के प्रति उसका आहत अभिमान उसकी कमेंटरी में मानो फूट- फूट पड़ रहा था, पर मुझे लगा कि जनसभा में एक शासकीय कर्मचारी को इतना स्पष्ट होकर अपने विचार को अभिव्यक्ति देना ठीक नहीं है। 'सोनहा बिहान' में छत्तीसगढ़ के शोषण का वर्णन है। शोषण के विरुद्ध माटी की तड़प नरेंद्र के स्वर में अभिव्यंजित हुई थी। वह जब दूसरे दिन मुझसे आश्रम में मिला तो मैंने उसकी कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की, पर साथ ही यह कहते हुए मैं नहीं चूका कि शासकीय नौकरी में रहते हुए तुम्हारी इस प्रकार दोटूक बात को शायद कुछ लोग पसंद न करें। उसने मुझसे तो कुछ नहीं कहा, पर अपने एक मित्र से उसने कहा था, भैया को मेरी कमेंटरी शायद उतनी रास नहीं आई। अब क्या करूं? अपनी इस जन्मभूमि का शोषण सहा भी तो नहीं जाता। इसी के माध्यम से मैं अपनी व्यथा, अपनी टीस प्रकट किया करता हूं। मेरी यही अभिलाषा है कि धरती पुत्र जागें, अपना शोषण समझ सकें। अगर मेरे इस कार्य से रुष्ट होकर सरकार मेरी नौकरी छीन ले तो जिन लोगों के लिए मैं अपना रक्त सूखा रहा हूं, वे मेरे छत्तीसगढ़ के लोग क्या मुझे दो जून की रोटी भी नहीं देंगे?
स्वामी आत्मानंद लिखते हैं कि मैंने इस नरेंद्र को अब तक नहीं पहचाना था। उसमें अपनी माटी के लिए इतना गौरव है, उसके शोषण के लिए इतनी टीस है, उसकी उन्नति के लिए इतनी तड़पहै, यह तो मैंने पहले न जाना था और जब मुझे उसके भीतर जलने वाली आग का पता चला तो मैं अभिभूत हुए बिना नहीं रहा। छत्तीसगढ़ की पीड़ा से उसका हृदय करा रहा था। संभवतः शिक्षा के क्षेत्र में रहकर छत्तीसगढ़ के लिए कुछ न कर पाने की विवशता ही उसे कुछ क्षणों के लिए राजनीति की ओर ले गई थी। मैंने बाद में जाना था कि वह 1977 में चुनाव में भाग लेने की इच्छा रखता था। एक आज्ञाकारी अनुज की भांति उसने मेरी नाही को सम्मान दिया, पर छत्तीसगढ़ के लिए कुछ करने की भावना उसमें इतनी गहरी पैठी थी कि वह छत्तीसगढ़ी गीतों, नाटकों और लोककथाओं के माध्यम से शतधाराओं में फूट पड़ी और उसका फल वह विपुल प्रकाशित और उससे भी विपुल अप्रकाशित साहित्य है, जो वह अपने पीछे छोड़ गया है। छत्तीसगढ़ की धरती माता ने अपने इस कृती पुत्र को, लाड़ले बेटे को लेकर भविष्य के कितने सुनहरे सपने संजोए थे, पर वह तो ममता के सारे बंधन तोड़कर अस्तित्व के महासागर में जा मिला।

Monday, 19 October 2020

शक्ति लहरी सप्तधरा धाम..

शक्ति लहरी सतधरा धाम : जहाँ लगता है मकर संक्रांति पर विशाल मेला.....
छत्तीसगढ की शक्तिपीठों में अब शक्ति लहरी सतधरा धाम का नाम भी प्रमुखता से जुड़ने लगा है। लगभग पिछले एक शताब्दी पूर्व से स्थापित माता के इस मंदिर में भक्तजनों का आना निरंतर बढ़ता जा रहा है।
सात नदियों के एक साथ मिलने से सतधरा या सप्तधारा के नाम से जाने जाना वाला यह स्थल गरियाबंद जिला महासमुंद जिला और रायपुर जिला की सीमारेखा पर ग्राम हथखोज के अंतर्गत स्थित है। ऐसी मान्यता है कि यहां महानदी, सोढुल नदी और पैरी नदी की तीन धाराओं के साथ सूखा नदी, सरगी नदी, केशवा नदी और बगनई नदी आपस में एक साथ मिलती हैं, इसीलिए इस विराट भू-भाग में फैले संगम को सप्तधारा या सतधरा कहते हैं।
यहां यह उल्लेखनीय है कि संभवतः समूचे छत्तीसगढ में नदियों का संगम स्थल इतना विस्तारित कहीं पर नहीं है, जितना विस्तारित यहां का संगम पाट है।
माता जी के यहां पर स्थापित होने के संबंध में बताया जाता है, कि माता की यह बिना शीश वाली प्रतिमा नदी में बहकर आयी है, जो एक यादव को यह प्राप्त हुई है। बताया जाता है कि वह व्यक्ति अपनी भैंसों को लेकर संगम स्थल पर जाया करता था, वहां उसकी भैंस एक स्थान विशेष पर हमेशा चमक जाती थी। यादव को आश्चर्य होता था कि आखिर भैंस यहां पर चमक या झिझक क्यों जाती है। उसने उस स्थल को ठीक से देखकर रेत में टटोलने लगा कि आखिर यहां है क्या? तब यह प्रतिमा उसके हाथों में आयी।
बताया जाता है, कि तब माता ने उस यादव को स्वप्न दिया कि मुझे यहां से निकालकर अन्य स्थल पर स्थापित करवा दो। उन्होंने बताया कि मुझे उठाकर ले जाते समय हर कदम पर एक-एक नारियल रखते जाना और जहां पर नारियल अपने आप फूट जाए उस स्थल पर मुझे स्थापित कर देना। वर्तमान में स्थापित जगह पर ही नारियल के फूटे जाने का जिक्र किया जाता है।
वर्तमान में यह स्थल देवी उपासना के प्रमुख पीठ के रूप में विकसित हो रहा है। राजिम से महासमुंद को जोड़ने वाले इस मार्ग पर स्थित सूखा नदी पर भव्य पुल बन जाने के कारण यहां से होकर गुजरने वालों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, इसका प्रतिफल मंदिर के दर्शनार्थियों के लिए भी सार्थक रहा है, उनकी संख्या में भी वृद्धि हुई है।
यहां पर प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर तीन दिनों का मेला भरता है। मेला का स्वरूप दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। इसी अवसर पर यहां सूखा लहरा लिया जाता है। बताया जाता है, कि संगम स्थल की रेत पर लोग लोट कर लहरा लेते हैं। जिसके भाग्य में होता है, वह उंगली के स्पर्श मात्र से काफी दूर तक लुढ़कते हुए चला जाता है, और निढाल होने के पश्चात ही रूकता पाता है।
माता के इस स्थल पर  नवरात्र के दोनों ही अवसर पर ज्योति कलश की स्थापना की जाती है, जहां श्रद्धालु अपनी मनोकामना को लेकर ज्योति प्रज्वलित करते हैं।
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

अंगारमोती माँ...

भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाली माँ अंगारमोती...
  छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 90 किमी की दूरी पर धमतरी  जिले के ग्राम चंवर में अंगारमोती माँ का मंदिर स्थापित है।
बताया जाता है कि अंगार मोती का यह मंदिर 600 वर्ष पुराना है, जो गंगरेल बाँध बनने के बाद डूब गया था। लोगों के अनुसार चंवर गांव के बीहड़ जंगल में माँ स्वयं प्रगट हुईं और अपने तेज के प्रभाव से पूरे क्षेत्र को आलोकित कर दिया, जिससेे प्रभावित होकर लोगों ने सन् 1972 में गंगरेल बाँध के पास ही माँ अंगारमोती का मंदिर पुनः स्थापित किया।इनके पास ही शीतला माता, माँ दन्तेशवरी और भैरव बाबा भी स्थापित है। इनके दर्शन के लिए लोग देश - विदेश से आते हैं।
    मान्यता है कि श्रद्धा के साथ  जो  भी भक्त नारियल बाँधता है, माँ उसकी मुराद जरुर पूरा करती है। यहाँ नवरात्र में भक्त मनोकामना ज्योति भी जलाते हैं।
    ऐसा कहा जाता है कि अंगार मोती अगारा ऋषि की पुत्री है, ये सभी वन देवियों की बहन मानी जाती हैं। इन्हें प्रकृति और हरी भरी वादियों से विशेष लगाव है, शायद इसीलिए इन्हें वनदेवी कहा जाता है.
         बताया जाता है कि माता बहुत चमत्कारी हैं, इनके आशीर्वाद से नि:संतान महिलाओं की सूनी गोद भी  हरी-भरी हो जाती है ।
    माँ विंध्यवासिनी की बहन मानी जाने वाली अंगारमोती
माँ की कृपा सदियों से भक्तों पर बरसती आ रही है. श्रध्दालु भी पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ माता की आराधना करते हैं ।।
🙏जय माँ अंगारमोती 🙏

शीतला मंदिर के बइगा...

शीतला मंदिर के बइगा मेर ले लाने हावौं आगी
जोत-जंवारा के बदना म हमूं बने हावन भागी
खुल जाही अब भाग हमरो दाई सउंहत आही
बरसाही असीस के बरसा संग खुशहाली लाही

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 98269-92811

Tuesday, 29 September 2020

टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा

पुरखा के सुरता....
टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा, जिनके नाटकों ने जनमानस का अंतस छू लिया

छतीसगढ़ी साहित्य परम्परा में एक ऐसा उज्ज्वल व्यक्तित्व हुआ जिसकी लेखनी की आभा ने जनमानस के अंतस को सहज ही आकर्षित कर लिया। साहित्य की नाट्य लेखन विधा में उन्हें महारथ हासिल थी। व्यवस्था पर कटाक्ष, सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार से लेकर मानवीय जीवन का कोमल पक्ष कुछ भी उनकी लेखनी से अछूता नहीं रहा।
छतीसगढ़ी नाटक में उच्चतम स्थान रखने वाले ये व्यक्ति है टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा। सत्य ,ईमानदारी, और सादगी जैसे मूल्यों को आत्मसात कर, उन्होंने अपना पूरा जीवन लेखन को समर्पित किया। वे उच्च कोटि के संपादक, नाटककार और रचनाकार थे। उन्होंने आजीवन नाटक, कहानी, कविता और लेख लिखा। वे सन् 1964 में दैनिक सांध्य अग्रदूत से जुड़े और जीवनपर्यन्त ( 7 अक्टूबर 2004 तक) उस अखबार के लिए संपादकीय लिखा।
नौंवी कक्षा में की थी पहली रचना
साल 1926 में फरवरी माह की पहली तारीख को जन्मे टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा के पिता श्यामलाल टिकरिहा शिक्षक थे। चाचा सुकलाल टिकरिहा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे बताया करते थे कि नौंवी कक्षा में उन्होंने पहली बार लिखना शुरू किया और फिर लेखन से ऐसा अनुराग हुआ जो अंतिम सांस तक बना रहा। वास्तव में वे पुरस्कारों की होड़ में कभी नहीं रहे। जब वे दैनिक अग्रदूत में कार्यरत थे, उस दौरान बड़े-बड़े अखबारों के प्रस्ताव उनके सामने आए। हिंदी,अंग्रेजी,और छत्तीसगढ़ी में समान अधिकार रखने वाले और अद्भुत  लेखकीय कौशल के धनी टिकरिहा  के सामने मुम्बई, दिल्ली, जैसे महानगरों के दरवाजे हमेशा खुले रहे। हर बार उन्होंने विनम्रता से इन प्रस्तावों को  अस्वीकार कर दिया। वे आजीवन सांध्य खबर दैनिक अग्रदूत में अपनी सेवाएं देते रहे।
गांधी जी के विचारों का गहरा प्रभाव।
परिवेश और शैशवास्था में मिले संस्कार का ऐसा सकारात्मक प्रभाव था कि बचपन से ही उन्हें लगने लगा कि व्यक्ति किसी एक घर या समाज का न होकर सम्पूर्ण मानव समाज का होता है। मैट्रिक पास कर उन्होंने वर्धा कॉलेज से बी.कॉम की डिग्री ली। वर्धा में अध्ययन के दौरान गांधी जी के विचारों का , उनके साहचर्य का उन पर ऐसा असर हुआ कि आजीवन उन्होंने मोटी खादी का वस्त्र ही उपयोग किया और सत्य, ईमानदारी, जैसे मूल्यों को अपनाए रहे । सरलता, सहजता उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत थी।
मूल्यों से समझौता नहीं, खाद्य अधिकारी जैसा पद त्याग दिया
अगर आज कोई कहे कि अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करने के लिए एक व्यक्ति ने अधिकारी पद छोड़ दिया था,तो शायद लोग विश्वास न करें। टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा ने वाकई ऐसा किया था। कॉलेज की पढ़ाई के बाद वे खाद्य अधिकारी के पद पर नियुक्त हो गए थे। उन्हें यह नौकरी रास नहीं आई  और कुछ ही दिनों के भीतर उन्होंने इस्तीफा दे दिया। सिद्धांतों के लिए टिकेन्द्र टिकरिहा जैसा व्यक्ति रोजगार को भी ताक पर रख देता है। क्या आज के युवा ऐसा करने की कल्पना भी कर सकते हैं? आज युवाओं के सामने ऐसे आदर्शों को रखने की जरूरत है।
टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा का रचना संसार
टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा को नाटककार के रूप में विशेष तौर पर स्मरण किया जाता है। "गंवइहा" उनके द्वारा रचित पहला नाटक था। पहली बार इसका मंचन डॉ. खूबचंद बघेल के गांव पथरी में हुआ। जनसमूह ने इस नाटक की  अपार सराहना की। भिलाई इस्पात संयंत्र और वहां के गांवों के किसानों के विस्थापन पर लिखे गए "गंवइहा" नाटक को छत्तीसगढ़ी साहित्य की अमर कृतियों में शामिल किया गया। इस नाटक का मंचन रंग मंदिर रायपुर समेत राज्य के कई स्थानों पर हुआ। टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा ने सौ से भी अधिक नाटक लिखे जिनमें, गंवइहा, साहूकार ले छुटकारा, पितर पिंडा, सौत के डर, नवा बिहान,चूना उल्लेखनीय है। इनके तेरह नाटकों का प्रसारण आकाशवाणी से हुआ। कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले एकमात्र जातीय पत्रिका कूर्मि जागरण में उनके विचारोत्तेजक लेख छपते रहे। इसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा के कविता, नाटक,कहानी और निबंध छपते रहते थे। लेखन का यह कार्य उन्होंने जीवनपर्यंत किया।
राज्य को टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा के साहित्य को संरक्षित करने की आवश्यकता
टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जैसे नाटककार संत कोटि के होते हैं। वे पुरस्कार,सम्मान या किसी पद के लिए नहीं लिखते बल्कि उनका लेखन सम्पूर्ण समाज को दिशा देता है और समाज में व्याप्त कुरीतियों को सामने रखता है। सवाल यह है कि राज्य बनने के इतने वर्षों बाद भी  टिकेन्द्र टिकरिहा जैसे साहित्यकारों की रचनाओं को संरक्षित करने, उन्हें जनसामान्य के सामने रखने की दिशा में कदम क्यों नहीं उठाया जा सका? क्यों सरकारें छत्तीसगढ़ के एक महान नाटककार को भूल गई है?  टिकेन्द्र टिकरिहा का पूरा जीवन हांडी पारा स्थित उनके पैतृक निवास में गुजरा। वह घर सिर्फ घर नहीं बल्कि सैकड़ों डॉक्टरों, इंजीनियरों के लिए आश्रय स्थल रहा। छत्तीसगढ़ के स्वप्नदृष्टा डॉ. खूबचंद बघेल, आध्यात्मिक जगत सूर्य स्वामी आत्मानंद, रंगकर्मी हबीब तनवीर, लक्ष्मण मस्तुरिया इत्यादि सभी लोग टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा के उस घर में अक्सर आते और फिर देर तक चर्चा चलती। टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा की साहित्य साधना अविराम चल सकी तो इसका बड़ा कारण यह भी था कि घर की सारी जिम्मेदारी उनकी पत्नी पूर्णिमा टिकरिहा ने उठा ली थी। श्रीमती टिकरिहा आज भी उसी घर में रह रही हैं। अपने नाती-नातिनों को वे टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा के साहित्य में पगी स्मृतियां सुनाती है। हांडीपारा के उस ऐतिहासिक घर की गाथा सुनाती हैं। हांडीपारा स्थित टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा का यह आवास पूरे साल लोगों से भरा रहता। बहुतों ने वहां से पढ़कर अपना जीवन संवार लिया। यहां तक कि वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तक बचपन से लेकर बड़े होते तक यहां खूब आते रहे। आज यह परतें इस लिए खोली जा रही हैं कि ऐसे मूर्धन्य नाटककार की रचनाओं का संरक्षण छत्तीसगढ़ के साहित्यप्रेमियों और जिम्मेदार सरकारी निकायों को गम्भीरता से करना होगा क्योंकि तब ही छतीसगढ़ी साहित्य की समृद्धि बनी रहेगी।
सरलता, सहजता, त्याग,निष्ठा, ईमानदारी जैसे मूल्यों को आचरण में ढालने वाले, लेखन से समाज के गूढ़ सत्य को उद्घाटित करने वाले नाटककार टिकेंद्र नाथ टिकरिहा साहित्य के आकाश में सदैव सितारा बनकर चमकते रहेंगे। आने वाली नई पीढ़ियां उनके रचना संसार और व्यक्तिव के आलोक से प्रेरणा पाती रहेंगी।
-नम्रता वर्मा