Thursday, 15 April 2021

छत्तीसगढ़ में पंडवानी प्रसंग..

छत्तीसगढ़ में पंडवानी प्रसङ्ग
पण्डवानी का स्वरूप-----–

पाण्डवों की कथा महाभारत की कथा है। महाभारत की कथा भारत के सांस्कृतिक स्पन्दन की कथा है। महाभारत के पात्र, विषय, मूल्य, द्वन्द्व, नीति और समाज शास्त्र हमारे स्मृति मंत्र हैं। जीवन के संग्राम में हम उनको स्मरण करते हैं। भारतीय मानस की कठोर शिला पर खड़े होकर कहीं हम महाभारत के करुण कोमल प्रसंगों को उठाते हैं, तो कहीं ओजस्वी प्रसंगों को। ग्रामीण अंचल तो मानो महाभारतमय है। १८ पर्वो को एक एक कर अपने ताने बाने में पिरोकर नई लोक शैली की उद्भावना कर दी गई है।

छत्तीसगढ़ में महाभारत की कथा को कई रूपों में गाया जाता है। कहीं किवदंती के रूप में और कहीं शास्त्रीय गायन के रूप में। 'पण्डवानी' के रूप में प्रचलित लोकगायन शैली छत्तीसगढ़ के हृदय की करुण गाथा है, साथ ही दर्शन भी। पूरा भारतीय धर्म व दर्शन, परिभाषित होकर, नीतियाँ सोदाहरण उल्लिखित होकर, समन्वित ज्ञान कथा का भण्डार, करुणा से आप्लावित हो जाता है।

'पण्डवानी' की गौरवशाली परंपरा में स्व. नारायण वर्मा भजनहा, स्व. सूबेदार आडिल, झाडूराम देवांगन, पूनाराम निषाद का नाम अमर रहेगा, जिन्होंने पण्डवानी को रोचक, लोकप्रिय व शास्त्रसम्मत बनाने का प्रयास किया। तीजन बाई, तक आते आते पण्डवानी का स्वरूप व्यावसायिक हो गया एवं नाटकीयता अधिक आ गई।

"पण्डवानी" छत्तीसगढ़ की संस्कृति में एक उदात्त लोकशैली का जीवंत रूप है।

"पण्डवानी" का उत्स यदि महाभारत की कथा है, तो दूसरी ओर लोकमानस का धर्म प्राण, संवेदनशील, आस्थावान होना भी है। संगीत की कलात्मक शैली में उसे आबद्ध करना, मानो छत्तीसगढ़ के लोकजीवन की रागात्मकता को व्यक्त करना है। पण्डवानी भारतीय आख्यान का मानवीकरण है।

महान् क्लासिक संस्कृत साहित्य की गौरवपूर्ण भारतीय परंपरा में महाभारत का महत्व असंदिग्ध रूप से स्थापित है। लोकजीवन में इस क्लासिक के प्रभाव की एक दूसरी दुनिया एक महान भारतीय आख्यान के मानवीकरण का 'पण्डवानी' जैसा उदाहरण कठिनाई से मिलेगा।

महाभारत की कथा को लिपिबद्ध करने के संबंध में कहा जाता है कि व्यास के आग्रह पर गणेश ने इस कथा को लिपिबद्ध करना स्वीकार किया, किंतु पण्डवानी नामक छत्तीसगढ़ी लोक गाथा के इस छोटे से कथा प्रसंग में कथा को लिपिबद्ध करने वाले और कथावाचक रूपी दो व्यक्तियों का आख्यान इस कथा के जनश्रुति होने की बात को प्रतिनिधित्व करता है। महाभारत की संपूर्ण कथा (पाण्डव संबंधी) लोक शैली में एक
सूत्र में पिरोई गई ,छोटी लोककथाओं का अद्भुत संग्रह है। संभवतः इसी कारण संपूर्ण भारत में महाभारत की कथा स्थानीय लोक विश्वासों के साथ आज भी जीवित है। भारत के अन्य अंचलों की तरह छत्तीसगढ़ अंचल का अपना विशेष महत्व है। ऐसी धारण है कि पाण्डवों ने इस अंचल की यात्रा की थी। छत्तीसगढ़ में प्रचलित "पण्डवानी" महाभारत की कथा का छत्तीसगढ़ी रूप है। इसके अंतर्गत पण्डवानी गायक सम्पूर्ण मर्यादा के साथ, कथा को लौकशैली में प्रस्तुत करते हैं।

पण्डवानी की शैली------

छत्तीसगढ़ में "पण्डवानी" की दो शैलियां है (१) कापालिक शाखा (२) वेदमती शाखा

कापालिक गायकों की “पण्डवानी" की कथा पाण्डवों से संबंधित होती है। परंतु संपूर्ण “पण्डवानी” का नायक भीम होता है। इसमें अनेक उपकथाओं का समावेश है महाभारत के पात्र केवल मिथकीय रूप में कथा से जुड़े होते हैं। कापालिक गायक स्थानीय लोक विश्वासों, घटनाओं आदि को आधार बनाकर पण्डवानी की संरचना करता है। कथा पूर्णतया उनके मस्तिष्क की उपज होती है इसलिए इसे “कापालिक" कहा जाता है।

वेदमती शाखा- ----वेदमती अर्थात् वेदों, शास्त्रों के द्वारा प्रमाणित पाण्डवों की कथा। इस शाखा के पण्डवानी गायकों की कथा जनश्रुति से अलग भगवान व्यास के महाभारत की कथा के आसपास और लोकशैली में निर्मित महाभारत की ही कथा होती है। इसमें भी गायकों की दो परंपराएं- १. मौलिक परंपरा या लोक परंपरा (२) सबल सिंह चौहानकृत महाभारत की कथा की लोकशैली में गायकों की परंपरा। मौलिक परंपरा कथा शाखा, शास्त्र सम्मत कथा के काफी नजदीक होती है। इसमें लोकरंग की अभिव्यक्ति सशक्त होती है।

   
पण्डवानी गायकों की परंपरा  में  मामाभांजा की जोड़ी-
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छत्तीसगढ़ में पण्डवानी गायकों की परंपरा में पहला नाम अर्जुनी क्षेत्र में, ग्राम झीपन (जिला बलौदाबाजार) के मालगुजार स्व. नारायण वर्मा “भजनहा" का लिया जाता है। इस परंपरा में दूसरा नाम स्व. रामचंद्र वर्मा का आता है जो सरसेनी ग्राम के संपन्न खेतिहार कृषक थे। सरसेनी ग्राम भी बलौदाबाजार जिला के अंतर्गत है। तीसरा व महत्वपूर्ण नाम स्व. सूबेदारजी का आता है जो बोड़तरा ग्राम के मालगुजार थे। बोड़तरा ग्राम भाटापारा से ४ कि.मी. दूर हथबन्ध की ओर बसा हुआ है।

आज जब भी “पण्डवानी" प्रसंग, परंपरा और विकास की चर्चा होती है, “पण्डवानी” के प्रख्यात गायकों“मामा-भांजा" की जोड़ियों को भुला दिया जाता है।। छत्तीसगढ़ में “पण्डवानी” का प्रसंग “मामा-भांजा" गायकों के स्मरण के बिना अधूरा है।
सन् १८८० के दशक में झीपन के मालगुजार नारायण वर्मा ने अपने भांजे को अपने साथ जोड़कर पण्डवानी गायकी की शुरूआत की। यह पण्डवानी की वेदमती शाखा की उदात्त शैली का प्रारंभिक रूप था। गायकों की यह पहली जोड़ी "मामा भांजा" की जोड़ी के रूप में प्रसिद्ध हुई। सन् १९०३ में ग्राम बोड़तरा में जन्मे मालगुजार सूबेदार जी १५-१६ वर्ष की आयु से ही पण्डवानी गायन एवं भगवत् प्रसंग की ओर आकृष्ट हुए। धार्मिक रूझान वाले सूबेदार दाऊ अपने रिश्ते के भाई, पण्डवानी गायक दाऊ नारायण वर्मा की मण्डली में शामिल होने लगे। दाऊ नारायण “भजनहा" के वृद्ध होने के बाद दाऊ सूबेदार “भजनहा” ने अपने भांजे किरीतराम व शालिगराम को लेकर अलग मण्डली बनाई। मामा भांजा की वह दूसरी जोड़ी को और भी अधिक प्रसिद्धि मिली, व व्यापक मंच मिला।
वस्तुत: उस समय पण्डवानी गायन का स्वरूप धार्मिक आस्था से जुड़ा था। मर्यादा, और व्यास गद्दी के प्रति सम्मान से भरा हुआ जन मानस पण्डवानी गायकों को श्रद्धा से देखता था। बरसात में “आल्हा ऊदल", ठण्ड व गरमी में “पण्डवानी’ - छत्तीसगढ़  की संस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं। इस ग्रामीण संस्कृति की परम्परा को विस्मृत करके या नकारकर हम अपनी ही धरती के साथ बेईमानी करेंगे।
आज “पण्डवानी” मनोरंजन का साधन बन रहा है , पर कल तक यही “पण्डवानी"  एक सामाजिक धार्मिक आयोजन के संस्कारों में बँधा था। यह " पाण्डवानी” शाम चार  बजे प्रारंभ होता, गोधूलि बेला में समाप्त होता। “रतिहा जेवन के बेरा” के पूर्व खत्म होता। अर्थात् भोजन के करीब ३ घण्टे पूर्व खत्म होता।

ब्यास गद्दी “गुड़ी” के बीचों बीच, ऊँचा चौरा में बनाते या तखत की व्यवस्था  करते। इस वेदमती शाखा की पण्डवानी गायकी में सबल सिंह चौहान के महाभारत की कथा को आधार मानते थे। गणेशवन्दना, सरस्वती वंदना, से गायन प्रारंभ करते। इसमें “चढ़ोत्तरी" भी चढ़ाते थे। गायन का प्रारंभ व अंत “वृन्दावन बिहारीलाल की जय" से होता था। इस प्रारंभिक काल के पण्डवानी गायन में वाद्य------खंजेड़ी, करताल और तंबूरा होता था। पण्डवानी गायक के दोनों हाथों में करताल व तंबूरा होता था। खंजेड़ी वाला गायक के सुर में सुर मिलाता । खंजेड़ी वाले की संख्या एक से तीन तक होती थी। “हुंकारू” तीसरा व्यक्ति देता था ।

पण्डवानी गायक की वेशभूषा में, सलूखा, धोती, गमछा (लाल या सफेद) हाथ में चाँदी का चूड़ा, वैष्णवी तिलक, लंबे बाल होते थे। पण्डवानी में भावों की प्रधानता (Emotions) अधिक होती थी। गायकी का संचालन भी रस से भरा हुआ होता था।
दर्शक व श्रोता पूर्णरूपेण उस भावना या रस में बह जाते थे।

"मामा-भांजा" की दोनों गायक जोड़ियों का पण्डवानी गायन महासिंग चंद्राकर एवं रामचंद्र देशमुख ने सुना था। ये दोनों उनसे अत्यधिक प्रभावित थे। चंद्राकर एवं देशमुख ने दाऊ सूबेदार भजनहा की "पण्डवानी" दुर्ग ग्राम पन्दर और तरेंगा में देखा। वे दोनों “मामा-भांजा" के पण्डवानी गायन के मुग्ध प्रशंसक थे।

• छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के उन्नायकों में यहां के मालगुजारों का विशिष्ट स्थान
है। उन्होंने अपने कलाकारों का पोषण किया, उन्हें जीविका दी, प्रेम दिया, नैतिक बल दिया। लोकसंस्कृति की यह अभूतपूर्व घटना छत्तीसगढ़ के इतिहास में अंकित करने लायक है। सामाजिक जीवन के अध्येताओं के लिए यह एक शोध का विषय है कि सामाजिक समरसता एवं समन्वय, छत्तीसगढ़ी संस्कृति का मूल आधार है। वेदमती शाखा शैली के प्रारंभिक काल के प्रमुख गायक सूबेदार जी का व्यक्तित्व दबंग पर बेहद आकर्षक और मध्यकालीन संत की तरह आध्यात्मिक था। उन्होंने पंडवानी को शास्त्र सम्मत आयाम दिया। उन्हें‘“द्रौपदी का चीर-हरण" प्रसंग तथा "घटोत्कच" प्रसंग विशेष प्रिय था। महाभारत के ८ पर्वों के खास-खास प्रसंगों को उन्होंने गद्य-पद्य- पण्डवानी शैली में लिखा है---- जो अभी प्रकाशनाधीन है। उनकी हस्तलिखित पाण्डुलिपियां संकलित की जा रही हैं ,जो ग्राम बोड़तरा में उपलब्ध है। छत्तीसगढ़ी का पुट देकर पण्डवानी कथा गायन को शब्दबद्ध करना, अपने आप में श्लाघनीय प्रयास है।
सूबेदार जी के साथ संगत पर रागी बैठते थे। करताल, तंबूरा, खंजेड़ी और इकतारा ये ४ वाद्य रहते थे। इकतारा में २ तार होते थे- दीर्घ व ह्रस्व। सूबेदारजी से पूर्व ,सारंगी में नंदुआ- घटोत्कच की कथा, दंतकथा के रूप में गाया जाता था। आधुनिक पण्डवानी को
शास्त्रीय  शैली में सूबेदारजी ने ही ढाला।
सूबेदारजी के बाद झाडूराम देवांगन व पूनाराम निषाद इसी वेदमती शैली के गायक हैं। सूबेदारजी की मृत्यु १६ अप्रैल १९७५ में हुई। इस समय वे ७३ वर्ष के थे। उनकी गायकी की लोकप्रियता में एक कथा जुड़ गई है कि वे जहाँ भी किसी बारात में सम्मिलित होते-उनकी पण्डवानी सुनने के लिए बारात को २-३ दिन तक रोक लिया जाता था। उस गांव के लोग बारातियों के भोजन व आवभगत की व्यवस्था सामूहिक रूप से करते थे।
उसी परंपरा में आगे झाडूराम देवांगन को १९८४ में म.प्र. सरकार का सर्वोच्च शिख पुरस्कार, लोककला के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए दिया गया। पूनाराम निषाद भी बहुत सम्मानित व लोकप्रिय हुए।
“पण्डवानी" किसी जाति विशेष की कला नहीं है। सभी जाति के लोग पण्डवानी गया सकते हैं!
झाडूराम देवांगन के साथ मंच पर ५ व्यक्ति बैठते रहे (१ श्री झाडूराम देवांगन (२) रामनाथ यादव (३) कुंज बिहारी (४) लखनलालवर्मा (५) विक्रम दास
इनमें रागी एक है- रामनाथ यादव ।झाडूराम देवांगन भी सबल सिंह चौहान कृत महाभारत को आधार मानकर गायकी करते हैं। इन्होंने विदेश में भी (म.प्र. सरकार की ओर से) अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया--

(लंदन, पूर्वी पश्चिमी जर्मनी, एडिनबरा, पेरिस आदि देशों में) इसका जन्म १९२६ मे, ग्राम बासिन, भिलाई के पास हुआ। ये चंदन टीका नहीं लगाते। वेशभूषा साधारण और हाथ में इकतारा रखते हैं।

पूनाराम निषाद- पूनाराम निषाद का जन्म सन् १९४१ में ग्राम रिंगनी में हुआ संगीत नाटक अकादमी द्वारा सन् १९७५ में राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद के करकमलों द्वारा ताम्रपदक तथा ५ हजार रू. से सम्मानित। ये १९८१ से म.प्र. आदिवासी कला परिषद के सदस्य बने। १९७९ में इन्होंने "लोक कला पण्डवानी" की स्थापना की। १९७६ में ये विदेश गए। १९८२ मार्च में भारत सरकार द्वारा नई दिल्ली के सांस्कृतिक मण्डल के सदस्य मनोनीत किए गए।
इनकी विशेभूषा साधारण रहती थी--- पीली धोती और लाख की माला। पण्डवानी गाते समय कमीज नहीं पहनते। चाहे वह ठंड का मौसम हो या गर्मी, बरसात का। वे चंदन टीका लाल रंग का लगाते थे। मंच पर इनके साथ ५ व्यक्ति बैठते थे----
(१) पूनाराम निषाद (२) दल्लूराम बंछोर, (३) सुकालूराम निषाद (४) जगेसर राम
साहू (५) गनपतलाल
तमूरा (इकतारा), करताल, मंजीरा, पेटी (हारमोनियम), तबला, बेन्जो आदि वाद्य का उपयोग गायकी के समय करते थे। इनके गुरू  झाडूराम देवांगन थे।

पूनाराम निषाद के प्रिय कथा प्रसंग रहे--- कर्णजन्म, भीष्म जन्म, पाण्डव जन्म कथा, द्रौपदी स्वयंवर, सुभ्रद्राहरण, अर्जुन हनुमान संवाद, शिशुपालवध, द्रौपदी चीर हरण, कीचकवध, भीष्म अर्जुन युद्ध, कुंती का पंच बाण मांगना, दुःशासन वध आदि।

विदेश प्रवास- अमेरिका, वाशिंगटन, शिकागो, कनाडा, टोरन्टो, पेरिस, इंग्लैंड, पूर्वी पश्चिमी, जर्मनी चेकोस्लोवाकिया आदि।

कापालिक शाखा--------

पण्डवानी गायकी में महिलाओं का प्रवेश और कपालिक शाखा का उभरना लोककला के क्षेत्र में रोचक घटना है। कपालिक शाखा शैली में मस्तिष्क की कल्पना का सहारा .लेकर (शास्त्र सम्मत नही), खड़े होकर, अभिनयात्मक ढंग से पण्डवानी गायकी प्रस्तुत की जाती है। इस शैली में महिलाएँ आगे आई। उनमें तीजन बाई, पूर्णिमाबाई, प्रभा यादव, लक्ष्मी बाई, ऋतु वर्मा आदि प्रमुख है।

कपालिक शाखा में अभिनय तत्व की प्रधानता होती है तथा अनेकों काल्पनिक कथाएँ एवं वर्तमान देशकाल परिस्थिति के अनुसार उपदेशात्मक तत्व भी जोड़ दिए जाते हैं। तीजन बाई भिलाई के पास गनियारी ग्राम में रहती हैं। पाटन में बीता बचपन उनकी यादों का सागर है। जीवन भर संघर्ष करने वाली यह लोक कलाकार शोषण की भी शिकार हुई। भिलाई इस्पात कारखाने में इन्हें जीविका के लिए नौकरी दी गई। पण्डवानी गायकी में अभिनय तत्व को जोड़कर पौरुष और ओज की बानगी देने वाली तीजन बाई ने विदेशों में भी नाम कमाया। महिला होने के नाते, पौरुष युक्त अभिनय का आकर्षण मनोरंजन व औत्सुक्य का, कला के साथ जोड़ने का काम किया।

पण्डवानी गायन में आज मनोरंजन अधिक आ गया है। आध्यात्मिक भाव व उदात्तता विलुप्त हो गई। इकतारा बजाया नहीं जाता। इकतारा को गायक “शो पीस" की तरह पकड़ते हैं। इन सब दोषों के समाविष्ट हो जाने से पण्डवानी का शुद्ध रूप दिखाई नहीं देता। परंतु पण्डवानी कथा गायन की लोकप्रियता बरकरार है। पहले भक्तितत्व की प्रधानता थी- धीरे धीरे मनोरंजन तत्व की प्रधानता हो गई। निश्चित रूप से नगरीय शैली व्यस्तता में पण्डवानी हमें बाँध लेती है।

तीजन बाई को पहले पद्मश्री फिर पद्‌मभूषण का सम्मान मिला ।

पंडवानी प्रसङ्ग के इतिहास में सबसे दुखद बात यह  है कि, पंडवानी के उद्भव व विकास के इतिहास में दोनों मामा  भांजा की जोडियों को कभी स्मरण नहीं किया गया।
जबकि ये दोनों छत्तीसगढ़ में पंडवानी गायन के प्रवर्तक रहे। कारण यह हो सकता है की भजनहा नारायण वर्मा एवं भजनहा सूबेदार आडिल स्वाभिमानी मालगुजार व शुद्ध भक्त थे।वे दोनों निःस्पृह  थे।यश, मान सम्मान की आकांक्षा से दूर,जहां भक्त पुकारते वहां चले जाते थे। उस समय न तो दूरदर्शन ,न आकाशवाणी से सम्पर्क रहा उनका,और न ही सरकारी लोक कला विभाग से।न ही वे राजनीति के सम्पर्क में रहे।
भजनहा सूबेदारजी तो मध्यकालीन संतों की तरह निस्पृह, भक्ति आस्था में डूबे,केवल गायन ही करते रहे।पंडवानी के  प्रवर्तक द्वय को नमन! पण्डवानी के इतिहास में ,लोक मानस में इनका नाम अमर रहेगा!
१६अप्रैल भजनहा सूबेदार आडिलजी का स्मरण दिवस!शत शत नमन!
--डॉ, सत्यभामा  आडिल
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सुरता. स्वामी आत्मानंद..

सुरता...
छत्तीसगढ़ी लेखन ल अध्यात्म संग जोड़े बर जोर देवइया स्वामी आत्मानंद..
   स्वामी आत्मानंद जी के जनमभूमि ग्राम बरबंदा अउ मोर पैतृक गाँव नगरगांव एक-दूसर के परोसी हे. हमर दूनों गाँव के खार ह आपस म जुड़े हे. फेर मोला स्वामी जी संग पहिली बेर संग म बइठ के गोठियाए के सौभाग्य सन् 1988 के दिसंबर महीना म तब  मिले रिहिसे, जब  हमन छत्तीसगढ़ी भाखा साहित्य प्रचार समिति के प्रादेशिक जलसा रायपुर के रामदयाल तिवारी स्कूल म करे रेहेन.
   ए समिति के संयोजक छत्तीसगढ़ी सेवक के संपादक जागेश्वर प्रसाद जी रहिन. अध्यक्ष भाषाविद डा. व्यास नारायण दुबे जी अउ मैं सचिव रहेंव. तब मैं अपन नांव सुशील वर्मा लिखत रेहेंव. बाद म आध्यात्मिक दीक्षा ले के बाद गुरु आदेश ले जातिसूचक शब्द के जगा अपन इष्टदेव के नांव ल जोड़ेंव. हमन ए समिति के बइठका म तय करे रेहेन  के ए जलसा के मुख्य अतिथि स्वामी आत्मानंद जी ल बनाबोन कहिके.
   इही जोखा के सेती हम तीनों रायपुर के विवेकानंद आश्रम गे रेहेन स्वामी जी ले  कार्यक्रम म आए के अनुमति ले खातिर. उही दिन मैं स्वामी जी संग पहिली बेर बइठ के गोठियाएंव. संग म बइठ के गोठियाएन त आत्मा ह तृप्त होए असन लागिस. कार्यक्रम के होवत ले दू-तीन पइत भेंट होइस. स्वामी जी हमर मन  संग आरुग छत्तीसगढ़ी म गोठियावंय गजब नीक लागय. वइसे तो स्वामी जी के प्रवचन सुने के अवसर कतकों जगा मिलत रहय. कभू विवेकानंद आश्रम के वाचनालय म अखबार पढ़े खातिर जावन त दरस मिल जावय. एकाद-दू पइत आकाशवाणी म घलो दरस हो जावय, जब वोमन चिंतन कार्यक्रम के रिकार्डिंग खातिर पहुंचे राहंय अउ महूं कोनो कार्यक्रम के सिलसिला म तब. फेर संग म बइठ के गोठियाए के अवसर  उही जलसा के आयोजन बखत मिले रिहिसे.
   जलसा म मुख्य अतिथि के रूप म कहे उंकर एक बात के मोला आज तक सुरता हे- उन कहे रिहिन के "छत्तीसगढ़ी लेखन ल जन-जन म लोकप्रिय बनाना हे, त एला अध्यात्म संग जोड़व. उन उदाहरण देवत कहिन के  तुलसीदास जी, सूरदास जी, कबीरदास जी अउ मीराबाई जइसन मन के रचना आज घलो सबले जादा पढ़े अउ सुने जाथे, एकर असल कारण आय, एकर मन के अध्यात्म संग जुड़े होना. जबकि साहित्यिक दृष्टि ले देखहू, त  एकर मन ले श्रेष्ठ रचना अउ दूसर मन के लेखन म आप मन ला देखे बर  मिल सकथे, फेर जेन लोकप्रियता ए मनला मिलिस, वो ह दूसर मनला मुश्किल हे."
    स्वामी आत्मानंद जी के जनम 6 अक्टूबर 1929 के गाँव बरबंदा, थाना- धरसींवा जिला- रायपुर म होए रिहिसे. बचपन के उंकर नांव तुलेन्द्र रिहिसे. उंकर सियान धनीराम वर्मा जी उही तीर के बड़का गाँव मांढर म तब गुरुजी रिहिन हें. कुछ बेरा के पाछू धनीराम जी के चयन उच्च शिक्षा के प्रशिक्षण खातिर वर्धा म होगे रिहिसे. एकरे सेती वोमन पूरा परिवार सहित वर्धा चले गे रिहिन हें. इहाँ ए जानना महत्वपूर्ण हे के स्वामी आत्मानंद जी के छोटे भाई अउ हमर छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार अउ राजगीत के रचनाकार डा. नरेंद्र देव वर्मा जी के जनम धनीराम जी के वर्धा म राहत ही वर्धा म होए रिहिसे.
   वर्धा म ही स्वामी आत्मानंद जी (बालक तुलेन्द्र)  सेवाग्राम आश्रम म महात्मा गाँधी जी के संपर्क म आइन. तुलेन्द्र बचपन ले ही बहुत प्रतिभा संपन्न रिहिन. उन बड़ मयारुक ढंग ले भजन गावंय. एकरे सेती उन गांधी जी के बड़ मयारुक होगे रिहिन. वर्धा आश्रम ले कुछ दिन बाद धनीराम जी अपन परिवार संग फेर वापस रायपुर आगे रिहिन अउ इहाँ के शक्ति बाजार म श्रीराम स्टोर खोल के जीवनयापन करे लागिन.
    इहाँ तुलेन्द्र ह सेंटपाल स्कूल ले प्रथम श्रेणी म हाईस्कूल के परीक्षा पास करीस अउ उच्च शिक्षा खातिर नागपुर के साइंस कालेज चले गेइन. उहाँ छात्रावास म उनला रेहे खातिर जगा नइ मिलिस, त उन उहाँ के  रामकृष्ण आश्रम म रेहे लागिन. इहें ले तुलेन्द्र के मन म स्वामी विवेकानंद के आदर्श ह संचरे लागिस. तुलेन्द्र नागपुर ले गणित म एम. एससी. के परीक्षा पास करीस. अउ संगवारी मन के सलाह म आईएएस के परीक्षा म शामिल होगें, जेमा उन दस झन पास होए लोगन म शामिल रिहिन. फेर मानव सेवा अउ विवेक दर्शन के जेन जोत उंकर मन म जलगे रिहिसे, तेकर सेती नौकरी के मोह म नइ परिन. आईएएस के मौखिक परीक्षा म शामिल नइ होइन.
   देश ल आजादी मिले के बाद उन रामकृष्ण मिशन म जुड़ गिन. 1957 म रामकृष्ण मिशन के महाध्यक्ष स्वामी शंकरानंद जी ह तुलेन्द्र के प्रतिभा ले प्रभावित होके उनला ब्रम्हचर्य के दीक्षा देइन, अउ उंकर संन्यास जीवन के नांव धरिन स्वामी तेज चैतन्य. तेज चैतन्य ह अपन नांव के अनुरूप मिशन ल आलोकित करीस. सरलग विकास अउ साधना सिद्धि खातिर उन एक बछर तक हिमालय के स्वर्गाश्रम म रहिन. उहाँ कठिन साधना ल पूरा करे  के  पाछू फेर रायपुर आइन. इहाँ स्वामी भास्करेश्वरानंद  जी के संग म रहिके संस्कार के शिक्षा लेइन, इहें फेर उनला स्वामी आत्मानंद के नवा नांव मिलिस.
  आत्मानंद जी स्वामी विवेकानन्द जी के रायपुर म बीताए दिन के सुरता ल अविस्मरणीय बनाए खातिर रायपुर म विवेकानंद आश्रम बनाए के बड़का कारज चालू  करिन. फेर एकर खातिर वोमन मिशन ले विधिवत अनुमति नइ लिए रिहिन हें, तेकर सेती बेलूर मठ ले उनला एकर स्वीकृति नइ मिलिस. तभो उन आश्रम के कारज ल पूरा करिन. फेर बाद म उनला बेलूर मठ ले संबद्धता घलो मिलगे. वोमन शासन द्वारा अनुरोध करे म इहाँ बस्तर के घोर जंगल के बीच नारायणपुर म घलो उच्च स्तरीय शिक्षा के केन्द्र स्थापित करिन.
  वोमन अपन पूरा जिनगी ल नर रूपी नारायण के सेवा अउ शिक्षा म बीता देइन. 27 अगस्त 1989 के उन जब भोपाल ले रायपुर सड़क के रस्ता ले आवत रिहिन हें, तब राजनांदगाँव के तीर सड़क दुर्घटना म अपन आखिरी सांस लेइन.
    स्वामी जी के परमधाम जाए के समाचार रायपुर के सबो पेपर मन म पहला पेज के खबर बने रिहिसे. हमन पहिली बेर इहाँ देखेन के सबो पेपर वाले मन ए समाचार ल रिवर्स माने पूरा के पूरा करिया रंग म छापे रिहिन हें. अइसन समाचार रायपुर के इतिहास म दुबारा तब देखे बर मिलिस जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्या होए रिहिसे.
    स्वामी जी ल समाधि दे खातिर जब इहाँ के महादेव घाट ले जाए गिस तभो जेन जनसैलाब  देखे गिस वो आज तक रायपुर के इतिहास म देखे ले नइ मिले हे, जेन ह स्वामी जी के जनमानस के बीच के लोकप्रियता ल बताथे. वो बखत विवेकानंद आश्रम ले लेके महादेव घाट तक सिरिफ लोगन के मुड़िच मुड़ी दिखय, एको जगा पांव राखे के जगा तक नइ दिखत राहय.
    बहुत आगू दिन बीते के बाद मोर मन म स्वामी जी के ऊपर कुछ भजन लिखे के विचार होइस, त आठ-दस ठन रचना लिख के मैं स्वामी जी के सबले छोटे भाई अउ विवेकानंद विद्यापीठ के सचिव डा. ओमप्रकाश वर्मा जी ल देखाएंव. उंकर अनुमति मिले के पाछू रामकुंड रायपुर के प्रसिद्ध भजन गायक सुरेश ठाकुर 'पंडा' के माध्यम ले वोला संगीत अउ स्वरबद्ध कर के कैसेट के रूप दे रेहेन. उही म एक रचना ए मेर स्वामी जी न नमन करत प्रस्तुत हे....
आत्मा म आनंद भरइया स्वामी आत्मानंद
तोर संग मिल के लागिस जइसे मिलगे परमानंद...
जय हो स्वामी आत्मानंद...

मन मोर मइलाए रहिस हिरदे रहिस करिया
चिक्कन-चांदन उज्जर करे धोके तैं ह बढ़िया
मोह-माया अउ कपट के छोड़ाए तैं दुरगंध... जय हो..

राग-रंग म बूड़े राहन नइ जानन कुछू सेवा
तरी-उप्पर नाचत राहय पंड़की अउ परेवा
मिरगिन कस उछलन-कूदन ठाढ़ेच अड़दंग.. जय हो...

नाचा-गम्मत खेल-तमासा जिनगी इही लागय
दया-धरम के पाठ-पढ़ौना एतीच-तेती भागय
तोर सुर म सुर मिलाए कस अब जुड़ागे सबो अंग.. जय हो...
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Friday, 9 April 2021

बाल लीला....

बाल लीला...
    लोगों को अक्सर यह कहते सुनते रहे हैं, कि बच्चों में भगवान का वास होता है. अनेक किताबों में भी ऐसा पढ़ने को मिल जाता था, लेकिन ऐसा अनुभव करने का अवसर पहले कभी मिला नहीं था.
  पहला कारण तो यह था, कि मैं घर पर ज्यादा रहता ही नहीं था. शुरू से सामाजिक, साहित्यिक और पत्रकारिता से जुड़ जाने के कारण घर पर चैन से रहने के लिए समय ही नहीं मिलता था. हां इतना अवश्य है कि अपनी बेटी को बचपन में खेलते देखकर कुछ बाल गीत जरूर लिख लिया करता था. जैसे-
फुदुक फुदुक भई फुदुक फुदुक
खेलत हे नोनी फुदुक फुदुक...
बिन कपड़ा बिन सेटर के जाड़ ल बिजरावत हे
कौड़ा-गोरसी घलो ल ए हर ठेंगा देखावत हे
बिन संसो बिन फिकर के कुलकत हे ये गुदुक गुदुक...
फुदुक फुदुक भई...

  अपने बचपन का स्मरण कर भी उसे फिर से पाने की आस लिए भी लिखा था-

तैं कहाँ गंवा गेस मोर लइकई के हांसी
सुरता कर देथे तोर अब तो रोवासी....
कन्हैया कस महूं ह फुदुर फुदुर रेंगव
मंद पिए कस फेर भुदरुस ले गिरवं
महतारी ह धरा-रपटा उठावय
ठउका कूदे हस कहिके हंसावय
फेर पलथिया के झड़कंव मैं बासी...
तैं कहाँ गंवा गेस मोर लइकई के हांसी....
   यह अपने बचपन का स्मरण और अपनी बेटी को खेलते हुए देखकर लिखने का प्रयास मात्र था. बाल लीला का साक्षात नहीं, जिसमें बच्चों में भगवान का वास होता है कहा जाता है.
  वैसे मेरी पहचान मेरे घर में एक अच्छे पिता के रूप में कभी नहीं बन पायी, क्योंकि मुझे बच्चों की शैतानी पर उन्हें प्यार करने के बजाय गुस्सा आ जाता था. बच्चों को मैं डांटने और कभी तो हाथ उठाने भी लग जाता था.
  शायद ऐसा मेरी अत्यधिक व्यस्तता के कारण भी होता रहा हो. लेकिन अब जब से अपने स्वास्थ्य के कारण मैं घर पर ही  रहने लगा हूँ, बच्चों के साथ ही साथ अन्य परिवार जनों के प्रति भी मेरा व्यवहार परिवर्तित होता आभास हो रहा है.
  मुझे दो वर्ष पूरे हो गये घर पर रहते हुए. पहला वर्ष तो अत्यधिक शारीरिक कष्ट और मिलने आने वाले लोगों के साथ बीत गया. दूसरे वर्ष में मिलने वालों की संख्या कम हुई, शारीरिक अक्षमता का अहसास भी कम हुआ. इस बीच हमारे घर पर एक नये मेहमान का भी आगमन हुआ. जिसके बाल्यकाल को मुझे बहुत निकट से देखने और समझने का अवसर  मिला.
  रुद्राक्ष मेरा नाती है. इसे देखते ही मेरा मन प्रफुल्लित हो जाता है. इसकी शैतानियों पर अब पहले के बच्चों की तरह गुस्सा नहीं आता, अपितु चेहरे पर मुस्कान खिल जाता है. इसे शरारत करते देखकर यह पंक्ति निकल गई-

लुड़बुड़ ले रेंगत देख धुक ले करथे छाती
फेर मड़िया के वो खेल देथे उलांदबाटी
घर के जतका बर्तन भांड़ा तेला नंगत ठठाथे
रार मचाथे दिन भर मोर उतियइल नाती..
   रुद्राक्ष अभी मात्र एक वर्ष का ही हुआ है. ठीक से चल भी नहीं पाता. लेकिन मेरे दृष्टिकोण को परिवर्तित करने में सक्षम हो गया है. इसकी बाल लीलाओं को देखकर अब सच में अहसास होने लगा है, कि बच्चों के अंदर वाकई  किसी दिव्य आत्मा का वास होता है, जिन्हें हम भगवान का रूप मान लेते हैं.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Monday, 5 April 2021

दाऊ कल्याण सिंह...

दानशीलता के मुकुटमणि दाऊ कल्याण सिंह
  पूरा दुनिया म छत्तीसगढ़ एक अइसे राज्य आय जिहां दान देवई अउ लेवई ल परब के रूप म मनाए जाथे. एकरे सेती ए दान के छेरछेरा परब ह इहाँ के लोगन म औघड़़दानी कस समागे हे दिखथे.
  इतिहास के सबले बड़े दानदाता राजा मोरध्वज ह अपन बेटा ताम्रध्वज ल सउंहे आरा म दू फांकी चीर के परीक्षा लेवत भगवान कृष्ण के आगू म रख दिए रिहिसे, तइसने दाऊ कल्याण सिंह जी ह अपन जम्मो संपत्ति ल जन हित के कारज म दान कर कर के दानशीलता के मुकुटमणि के रूप म अपन चिन्हारी बनाइन. इही डांड़ म मैं रायपुर नगर निगम द्वारा "नगर माता" के उपाधि ले सम्मानित बिन्नी बाई सोनकर ल घलो गिनथंव, जेन ह साग-भाजी बेंच-बेंच के जोरे अपन जिनगी भर के कमाई ल जन कल्याण के कारज खातिर दान कर देइस.
  मोर जनम भाठापारा म होए हे. उहाँ के प्रसिद्ध तरिया 'कल्याण सागर' म हमन लइकई म गर्मी के दिन म कूद-कूद के नाहवन, तेकर आजो ले सुरता हे. बाद म रायपुर आएन, त इहाँ छत्तीसगढ़ के सबले बड़े अस्पताल के रूप म चिन्हारी करे जवइया 'दाऊ कल्याण सिंह अस्पताल' ल देखेन. उहाँ कतकों बखत इलाज कराएन, अपनो अउ नता-रिश्तादार मन के घलो. तब वो ठउर मन कइसे बनिस, काकर दान म बनिस, ए बात के न जानबा रिहिसे, न समझ. अइसने अउ कतकों जन कल्याण के जगा मन के दान देवइया दाऊ कल्याण सिंह जी के दान अउ दानवीरता के बारे म बाद म जानेन-समझेन त माथा ह श्रद्धा के साथ नवगे.
  दाऊ कल्याण सिंह के जनम नवा बने जिला भाठापारा- बलौदाबाजार के गाँव तरेंगा म 4 अप्रैल 1876 म दाई पार्वती अउ ददा बिसेसर नाथ जी के घर होए रिहिसे. उंकर ददा ए नान्हे गाँव के गौंटिया रिहिन. ए गौंटियई के जोम 1828 म जागे रिहिसे, तब ए ह  बिलासपुर संभाग के अन्तर्गत आवत रिहिसे.
  कल्याण सिंह जी जब सिरिफ 14 बछर के रहिन, तभे उंकर सियान देवलोक के रद्दा धर लेइन. तब वोमन 14 बछर के उमरेच म गौंटियई ल संभालिन. अतकेच नहीं, उन एला अतका आगू बढ़ाइन, के 1911 म उनला 'राय बहादुर' अउ 1944 म 'दीवान बहादुर' के पदवी मिलगे.
सन् 1937 म उन वो जमाना म 70 हजार रुपिया के राजस्व पटाए रिहिन हें. ए बात ले समझे जा सकथे, के उन तब कतका अकन संपत्ति के मालिक होगे रिहिन हें. फेर जइसे जइसे उंकर संपत्ति बाढ़त गेइस, तइसनेच तइसे उंकर दिल अउ कार्यकुशलता घलो बाढ़त गेइस. जतका धन आवत गेइस ततकेच उन वोला जनकल्याण के कारज म लगावत गेइन.
  रायपुर के प्रसिद्ध डी. के. अस्पताल ल खोले खातिर उन सन् 1944 म न सिरिफ अपन जमीन ल देइन, भलुक 1.25 लाख रुपिया घलो वो बखत देइन. आज के हिसाब म नापिन, त सौ करोड़ अकन के पुरती हो जाही. रायपुर के लभांडी म 1784 एकड़ कृषि विश्वविद्यालय, जेकर गिनती एशिया के सबले बड़े विश्वविद्यालय मन म होथे, वोला दान दे रिहिन. संग म गरीब पढ़इया लइका मन के रहे खातिर हास्टल बर जमीन घलो दे रिहिन. संग म 1.12 लाख रुपिया.
  रायपुर के टीबी अस्पताल अउ काली बाड़ी स्कूल खातिर जमीन अउ जगन्नाथ मंदिर खातिर पूरा के पूरा खैरा गाँव ल दे दिए रिहिन हें. उंकर आने अउ योगदान म- भाठापारा म अकाल परे के बेरा कल्याण सागर तरिया के निर्माण, दू ठन धर्मशाला अपन सुवारी के नांव ले. पशु अस्पताल, थाना, कतकोन तरिया, बलौदाबाजार अउ बरोंडा गाँव म कालेज, कृषि रिसर्च सेंटर, गौशाला, कांजीहाऊस, बाजार- हाट, पुस्तकालय, मंदिर, चर्च आदि मन खातिर जमीन.
   मानव धर्म के उपासक दाऊजी जाति पांति, सम्प्रदाय या क्षेत्र- राज्य नइ देखिन. नागपुर म लेडी डफरिन अस्पताल (कटक, करांची अउ क्वेटा आदि म घलो ए अस्पताल हवय) वर्धा म महिला महाविद्यालय खातिर उन जमीन अउ रुपिया देइन. बिहार के भूकम्प अउ वर्धा के बाढ़ प्रभावित मन खातिर घलो उन अपन हाथ बढ़ाइन.
   ए भुइयां के समृद्ध दान परंपरा के उन सच्चा उपासक रिहिन. उंकर बारे म जान के ही अइसे लागथे, के कोनो पइसा वाले होवय, त दाऊजी कस ही होवय. धन संपत्ति के खरही गांज के बइठे मनला दाऊजी ले प्रेरणा लेना चाही, के उंकर जनम के डेढ़ सौ बछर बीते के बाद घलो कइसे लोगन के हिरदे म उन बइठे अउ आदर संग  सम्मान पावत हें.
  उंकर सुरता ल डंडासरन पैलगी. 🙏🙏
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811