कहानी// धरमिन दाई
आज गाँव म चलत पुरवाही म गजब उछाह दिखत हे. सरर-सरर एती सरर-सरर वोती, जम्मो पेंड़ के डारा-पाना मन हरर-हरर हालत-डोलत हें. चिरई-चिरगुन मन घलो वोकर मन के संग म पांखी फड़फड़ावत हें. तरिया के लहरा मन घठौंदा के पखरा मनला मार छपाछप पोटार-पोटार के मया करत हें. चारों मुड़ा उमंग-उत्साह, गाय-गरु मन अपन डहार ले बोरक्का मारत हें, त मनखे मन घलो हांसत-गावत अउ कुलकुलावत हे. अइसन म सुरूज नरायन कइसे लोगन के संग म नइ संघरतीन? उहू ठउका बेरा म चकचक ले ऊ के सीत म सिला बिनइया लइका मनला कुनकुनावत ले मजा देवत हे.
गाँव म आज अतका उमंग-उत्साह दिखत हे, तेकर असल कारन आय- धरमिन दाई. गाँव के बीचो-बीच महमाई चौक म आज वोकर कांसा के बने मुरति के मुंह-उघरई होही. ए राज के मुख्यमंत्री के संगे-संग बड़े-बड़े नेता, समाज-सेवक अउ साहेब-सिपाही मन अवइया हें. कोतवाल काली रतिहा हांका पारत बताए रिहिसे- ठउका दस बजे हेलीकॉप्टर ह स्कूल भांठा म उतर जाही, तहाँ ले सबो मंत्री मनला गंड़वा बाजा म परघा के महमाई चउंक लाने जाही, तेकर पाछू फेर मुख्यमंत्री ह धरमिन दाई के मुरति म ढंकाए कपड़ा ल अलगिया के वोला फूल-माला पहिराही तहाँ ले चंदन-बंदन बुक के जोहार-पैलगी करही.
एकरे सेती आज लोगन आठ के बजतीच-बजती अपन-अपन काम-बुता ल सकेल-जोर के महमाई चउंक म जुरियाए लगे हें. खोरवा मंडल के उछाह ह आज देखतेच बनत हे. आज के कार्यक्रम के पगरइत घलो तो उहिच हर हे, काबर ते धरमिन दाई के नता-रिश्ता कहाए के लइक मनखे म एक उही तो हे, भले लरा-जरा के आय. फेर आय तो भतीजच. तहाँ ले तो अउ वोकर कोनोच नइए.
खोरवा मंडल के मन म आज कतका गरब जनावत हे तेला तो उहिच ह जान सकत हे. जतका झन मंत्री अउ साहेब-सिपाही आहीं, सब वोकरेच संग तो भेंट करहीं. आखिर वोकरे संग किंजर-किंजर के धरमिन दाई ह आज जेन मान-सम्मान अउ पूजापाठ होवत हे, तेकर लाइक बने हे. खोरवच मंडल ह तो धरमिन दाई के लाठी-बेड़गा अउ सटका ये, वोकरेच अंगरी ल धर-धर के वोहा दान-दच्छिना के जम्मो रद्दा म आगू बढ़य, तेकरे सेती ए गाँव के संगे-संग तीर-तखार के जम्मो गाँव मन म वोकरे दान के पइसा म स्कूल, अस्पताल अउ धरमशाला बन-बन के लोगन के दुख-पीरा अउ शिक्षा के बेवस्था ल पूरा करत हे. ए गाँव म जतका बड़का कुआँ-बावली अउ पानी के आने जोखा हे, सब धरमिन दाई के परसादे हे.
खोरवा मंडल के तीर म बइठ के जब कहूँ धरमिन दाई के गोठ कर देते, त वो अतका मगन हो जाय के गोठियावत-गोठियावत दूसरेच दुनिया म पहुँच जावय, तहाँ ले अपनेच-अपन वोकर मुंह ले बोली फूटे लागय- 'होत मुंदरहा धरमिन दाई के एक्केच बुता राहय. अपन कोकानी लउठी ल धर के बारी कोती जाना, उहाँ कुआँ म गड़े टेंड़ा ल टेंड़-टेंड़ के जम्मो साग-भाजी मन म पानी पलोना. बेरा के उवत ले जम्मो मांदा मन म पानी रेंग जाय, तब फेर दतवन-मुखारी अउ नहाना-धोना करय. तहाँ ले कच्चा लुगरा ल पहिरेच-पहिरे साग-भाजी अउ जम्मो पेड़-पौधा मन के आरती करना. तेकर पाछू फेर जुक्खा लुगरा पहिर के पचकठिया टुकना भर के पुरती साग मनला बजार म बेचे खातिर टोरना.
वोकर बारी के साग-भाजी मन अतका गुरतुर लागय के घर ले बजार जावत ले रद्दच म आधा ह बेचा जावय, अउ बांचे आधा ह बजार म बइठतेच बेचा जावय. धरमिन दाई बजार म बने असन बइठे घलो नइ पावय, अउ लहुटे के बेरा हो जाय.
धरमिन दाई के असली नांव बिन्नी बाई हे, फेर एतराब के मनखे वोकर दान-दच्छिना अउ धरम-करम म बूड़े जीवन ल देख के धरमिन दाई ही कहिथें. बारीच म लगे वोकर घर घलो हे. अब वोला घर कहिले के छितका कुरिया दूनों एकेच बरोबर हे. सत्तर साल के धरमिन दाई अउ वोकर घर एकेच बरोबर दिखथें. जइसे घर के कांड़ अउ मिंयार मन टूट के पेचके असन होगे हे, तइसने वोकर मुंह के दांत मन घलो टूट के पेचके असन होगे हे. एके खोली के घर म वोहा राहय घलो अकेल्ला. कभू जर-बुखार धर लेतीस त वोला देखइया घलो कोनो नइ मिलतीस, तइसे केहे कस.
वइसे तो धरमिन दाई जगा बारी-बखरी अउ खेत-खार अतका अकन रिहिसे के वोकर ले बनिहार-सौंजिया के भरोसा बइठे-बइठे खा सकत रिहिसे, फेर वो ह खुद मिहनत करके साग-भाजी उपजावय अउ उही ल बेंच के गुजर-बसर करे के बुता ल सांस के टूटत ले नइ छोड़िस. कतकों जाड़ राहय, घाम के तालाबेली होवय, या फेर करा-पानी रटाटोर दमोरत राहय, फेर वो जम्मो जोखा ल पूरा करके टुकनी धरय अउ बजार चउंक म पहुंची जाय.
कतकों अपढ़ किसम के मनखे मन वोकर घिलर-घिलर के साग-भाजी बेचई ल देख के हांसय घलो, उन बेलबेलाय अस कहि देवॅंय घलो- 'ये डोकरी ल अतेक का हदरही धर लेहे भई, घर म अतेक खाए-पीए के जिनिस हे तभो ले. फेर जे मन समझदार किसम के राहयं ते मन वोकर बड़ई करयं, वो मन आपस म गोठियावयं घलो- ' वाजिब म मनखे ल अइसने होना चाही ग, जीयत अपन जांगर के भरोसच जीना चाही. अइसन म देंह-पांव घलो बने रहिथे अउ उप्पर ले लछमी दाई के किरपा घलो छाहित रहिथे.
खोरवा मंडल बतावय- संझा के बेरा धरमिन दाई के कुरिया म किस्सा-कहिनी सुनइया मनके दरबार सजय. पारा भर के माईलोगिन उहाँ जुरिया जाए रहयं, तहाँ ले फेर एक झन के हुंकारू देके ओसरी लगय अउ धरमिन दाई ह कहानी सुनावय. रोज नवा कहानी, कोन जनी वोकर अंतस ले कइसे उदगरय ते उही जानय? एको कनिक पढ़े लिखे नइ रिहिसे, तभो ले उंकर कंठ म सरसती दाई के साकछात बसेरा रिहिसे. जइसन दिन, तिथि, परब अउ महीना राहय, तइसने वाला कहानी सुनते वोकर जगा. तीजा-पोरा, कमर छठ, सवनाही या फेर अगहन महीना आतीस त वोकर जगा चारों मुड़ा ले नेवता आवय, कथा-कहानी सुनाए बर. मंदिर-देवाला के पुजेरी तको मन तो नरियर धर के पहुँच जायं धरमिन दाई ल नेवता दे बर. वो जावय घलो, कोनो मनखे ल निरास नइ करय. अपन सख के पुरती सबो जगा जाय.
धरमिन दाई अतेक सब करय फेर ककरो जगा पाॅंच पइसा तो झोंक लेतिस दान-दक्छिना के नांव म. कभू नहीं. वोकर सोझ कहना राहय-' अतका करे-धरे के बलदा मैं कुछू लेहूं, त फेर पुन्न ल कइसे पाहूं? जेन परमात्मा के दिए मोला गियान अउ बोली-भाखा मिले हे, तेन सब उही ल अरपन हे. मोर का हे... ए जांगर के छोड़ अउ कुछू तो नइए, त फेर इही जांगर के परसादे खाहूं, कुछू बनाना अउ खाना होही तेला.'
दान-दक्छिना के संबंध म घलो वोकर सफा कहना राहय-' मैं उही जिनिस खातिर दान करहूं जेकर ले लोगन ल सोज्झे-सोझ फायदा पहुंचथे. ठलहा बइठ के पेट ल फूलोवत मनखे मनला देवई ह मोला पाप करे असन लागथे. मैं जीव सेवा ल ही शिव सेवा मानथौं, एकरे सेती रोज बिहन्चे नहाते साथ अपन बारी के भाजी-पाला मनके आरती करथौं, काबर ते उही मन मोर भगवान आय. मैं तो सबके जीव म परमात्मा रूपी शिव देखथौं, काबर उहिच मन तो मोर पालन करथें, अउ जे मन पालन करथें, उही मन भगवान होथें.
धरमिन दाई अपन जाए के बेरा ल जान डरे रिहिसे, वोकरे सेती वो जाए के पहिली रात के खोरवा मंडल ल चेता डारे रिहिसे-' आज तक तो मैं जतका दान-दच्छिना करेंव तेन हर मोर साग-भाजी बेच-बेच के सकेले पइसा के आय, एकरे सेती जगा-जगा नानमुन स्कूल, अस्पताल, धरमशाला अउ कुआँ-बावली, बोरिंग कोड़वा देंव, फेर मोर इच्छा हे के ए गाँव म बेटी मनके पढ़े खातिर बड़का वाले कालेज बनय. मोर जाए के बाद जतका भी खेती-खार अउ बारी-बखरी हे, तेन मनला बेंच के बेटी मनके पढ़े खातिर बड़का वाला कालेज इही हमर गाँव म बनवा देबे. मोर जगा कहानी सुने ले अवइया नोनी मन काहत रहिथें-' का करबे दाई, हमरो मनके गाँव म या तीर-तखार म एको ठन बड़े वाला कालेज होतीस, त हमूं मन वोमा पढ़ के बड़का पद म जाके बइठ जातेन ओ..! फेर बेटी के जात.. टूरा पीला मन बरोबर दुरिहा तो जाए नइ सकन, तेकरे सेती मन मार के रहि जाथन.' बतावत-बतावत खोरवा मंडल के आॅंसू बोहाए लागिस.
ठउका वतकेच बेरा राजधानी मुड़ा ले हेलीकॉप्टर आए के आवाज सुनाए लगिस. लोगन महमाई चउंक ले स्कूल भांठा डहर भागे लागिन. खोरवा मंडल घलो लकर-धकर फूल-माला के संवागा करे लागिस. जम्मो पंच-सरपंच, गाँव के आने सियान मन जुरिया गिन. आसपास के गाँव के सियान-सरपंच मन घलो आए राहयं, तेनो मन सब जुरिया के गंड़वा बाजा वाले मन संग मंत्री मनला परघाए बर गिन.
स्कूल भांठा ह मनखे मन के समुंदर बरोबर दिखत राहय. चारों खुंट मुड़ीच-मुड़ी. ए बस्ती म आज के पहिली अतका भीड़ कभू सुरता म घलो देखे ले नइ मिले रिहिसे. गाँव म मड़ई-मातर होवय, अठवाही बजार भरावय, तभो स्कूल भांठा म अतका जगा बांची जाय ते मनखे बने हेल-मेल रेंग जावय. फेर आज तो खड़े जगा ले एक ठन पांव के उसलई ह घलो मुसकुल कस होगे हे. भांठा के एक मुड़ा म हेलीकॉप्टर उतरे खातिर ठउर बनाए गे रिहिसे, तेकर बीच म दू ठन आड़ी-आड़ा डांड़ खींचे गे रिहिसे. हेलीकॉप्टर ह भुन्नाटी मारत आके वोकरे उप्पर ठाढ़ होगे. वोकर डेना मनके आंवर-भांवर घूमत ले चारों मुड़ा धुर्रच-धुर्रा पट्टागे राहय. थोरके पाछू जब सबो ह थीर-थार होइस, तब हेलीकॉप्टर ले जम्मो मंत्री मन निकल के बांस के बने घेरा ले बाहिर आइन.
मंत्री मनला फूल-माला पहिराए के बाद सबले पहिली खोरवा मंडल ले मिलवाए गिस. सरपंच ह बताइस, के इही ह धरमिन दाई के भतीजा आय, जेकर संग घूम-घूम के वोहर जम्मो दान-पुन्न के काम ल करय, वोकर मनके सोर-संदेशा लेवय. मुख्यमंत्री ह खोरवा मंडल ल पोटार के वोकर पीठ ल थपथपाइस, तहाँ ले फूल-माला माँग के वोला पहिरावत कहिस-' तुमन तो बड़े-बड़े सेठ-महाजन अउ गौंटिया ले बढ़के हौ जी. कोनो मंदिर-देवाला के पुजेरी ह तुंहर मनके सत्-चरित अउ आदर्श जीवन ल नइ पा सकय, न तुंहर अतका पुन्न कमा सकय.
धरमिन दाई के मुरति ऊपर ढंकाय कपड़ा ह मुख्यमंत्री के बटन दबाते घुंचिस, तहाँ ले लोगन के ताली चारों मुड़ा ले गड़गड़ागे. मुरति म चंदन-बंदन अउ फूल-माला पहिराए के बाद मुख्यमंत्री कहिस-' आज के दिन ल मैं कभू नइ भुलावौं, धन भाग ये गाँव के जिहां धरमिन दाई अपन जिनगी बीताइस. हमन बड़े-बड़े राजा-महाराजा अउ सेठ-साहूकार मन के कहानी सुने हावन, फेर धरमिन दाई के जीवन-दरसन के आगू म सब नान्हे हे. मोरो धन भाग हे, के ये गाँव के माटी ल मोला अपन माथा म लगाए के सौभाग्य मिले हे. ए गाँव के धुर्रा म पट्टाए मोर कपड़ा-लत्ता ह मोला गंगा म चिभोरा मार के निकले असन जनावत हे. आज धरमिन दाई के पहिली बरसी के दिन इहाँ के लोगन वोकर मुरति स्थापना करा के वोकर खातिर अपन मया अउ सरधा ल समरपित करत हें, तेनो ह हमर मनके माथ नवाए कस बुता ये. आज मैं घोसना करत हौं, धरमिन दाई के जयंती के दिन हमर सरकार डहर ले हर साल दू अइसन लोगन या संस्था के सम्मान करे जाही, जे मन सच्चा समाज सेवा के डगर म धरमिन दाई कस आदर्श स्थापित कर के देखाए रही. अउ हां... ए सम्मान ल धरमिन दाई के सुरता म वोकरे नांव ले दिए जाही.
(कहानी संकलन 'ढेंकी' ले साभार)
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Tuesday, 8 March 2022
धरमिन दाई .. कहानी
Saturday, 5 March 2022
विरासत : रामसेवक वर्मा
विरासत : संघर्ष के रद्दा रेंगइया ल मिलथे सम्मान
साहित्य ल समाज के दर्पण कहे जाथे. ए ह सोला आना बात आय. जब हमला कोनो समाज विशेष ल जानना-समझना होथे त वोकर ले संबंधित साहित्य ल खोज-निमार के पढ़े बर लागथे. ठउका अइसने कोनो मनखे विशेष के जिनगी ल पूरा जानना हे, तभो अइसने करे बर लागथे.
मैं हमर समाज के दू बेर केन्द्रीय महामंत्री रहे रामसेवक वर्मा जी ल पहिली सिरिफ मनवा कुर्मी समाज के महामंत्री के रूप म ही जानत रेहेंव. काबर ते महूं ल एक पत्रकार अउ साहित्यकार होए के सेती हमर रायपुर के सामाजिक पदाधिकारी मन सामाजिक गतिविधि म संघारत राहंय, तब वर्मा जी संग भेंट-मुलाकात हो जावत रिहिसे.
फेर पाछू जब वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. परदेशी राम वर्मा जी के अगासदिया के आयोजन म कभू-कभार भिलाई जाना होवय, त उहों भेंट-जोहार हो जावत रिहिसे. एक पइत उंकर छोटे भाई विष्णु वर्मा जी मोर एक किताब 'आखर अंजोर' ल पढ़ के प्रभावित होइन अउ मोर संग भेंट करे बर हमर घर आइन, त बाते-बात म जानेंव के, रामसेवक जी आध्यात्मिक रूप ले आचार्य रजनीश 'ओशो' ले प्रभावित हें, अउ उंकर संस्था संग पूरा समर्पित भाव ले जुड़े हें.
तभो ले उंकर बारे म वतका नइ जानत रेहेंव, जतका उंकर अभी छप के आए किताब 'विरासत' ल पढ़े के बाद जान पाएंव. मजेदार बात तो ए हे, के ए 'विरासत' ल पढ़े के बाद मोला इहू जानकारी मिलिस, उंकर ससुर स्व. श्री लखन लाल जी अउ मोर बूढ़ी सास स्व. हिरौंदी देवी जी सगे भाई अउ बहिनी रिहिन.
रामसेवक वर्मा जी दाऊ श्यामाचरण बघेल जी के अध्यक्षीय कार्यकाल म दू बेर सन् 1997-99 अउ 2013-15 तक तीन-तीन बछर के दू कार्यकाल म हमर समाज के केन्द्रीय महामंत्री के रूप म कारज पूरा करे हें. उंकर ए दूनों कार्यकाल ल समाज म करे गे क्रांतिकारी बदलाव के रूप म हमेशा सुरता करे जाही.
छत्तीसगढ़ म निवासरत समाज मन म हमर समाज ल मैं बहुते प्रगतिशील अउ क्रांतिकारी समाज मानथौं. काबर के, ए समाज के योगदान ह सामाजिक, सांस्कृतिक अउ राजनीतिक उत्थान के संगे-संग देश के आजादी खातिर होए सुराजी आन्दोलन अउ वोकर बाद अलग छत्तीसगढ़ राज के आन्दोलन अउ स्थापना म छत्तीसगढ़िया मनके अगुवा के भूमिका निभाए हे. ए बात ल पूरा छत्तीसगढ़ स्वीकार करथे.
'विरासत' शीर्षक ले प्रकाशित ए किताब ल पढ़े के बाद जान पाएंव, के रामसेवक जी कतका संघर्ष के रद्दा रेंगत आगू बढ़े हे, अउ एक आदर्श मनखे के जिनगी जीयत संझौती बेरा म खड़े हें.
आदरणीय रामसेवक जी के ए जम्मो संघर्ष पूर्ण अउ एक आदर्श जीवन ल देखत मोर मन म ये चार डांड़ गूंजत हे...
बिन घिसाय लगय नहीं माथ म ककरो चंदन
न होवय पूरा एकर बिन 'भोले' के पूजा-वंदन
अइसनेच होथे जिनगी म घलो महके खातिर
जे धरथे संघर्ष के रद्दा वोकरे होथे अभिनंदन
-सुशील वर्मा 'भोले'
नगरगांव वाले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Wednesday, 2 March 2022
एॅंहवाती कहानी
कहानी// एॅंहवाती
भूरी के भाग आज नंठागे. अब्बड़ सेवा-जतन करिस. डॉक्टर-बइद मन जइसन कहिन तइसन दवई-दारू करिस, फेर वोकर चूरी छरियाइच गे. माँग के सेंदुर बने जात के गढ़ा नइ पाइस अउ जम्मो ह धोवई धोए कस धोवा गे. पारा-परोस के मन आनी-बानी के गोठियावयं, कोनो कहय- रांड़ी ह जवान गोसइयां ल खा डरिस. आॅंखी हर तो बिटबिट ले दिखबे करथे, फेर एला अपनेच घर के ह मिलिस वो... कोनो कहय- मोला तो वो छोकरा बपरा ल दवई-दारू म कुछू-कांही करके देदे हे ताइसे लागथे. देवर संग लुहुर-टुपुर करत रहिथे, तेकरे सेती जोड़ी ह अब सिट्ठाए कस लागत रिहिस होही. कोनो कहय- हहो ठउका काहत हस, तभे तो टूरा बपरा ह बेमारी के मारे कल्हरत परे राहय अउ ए ह छछिंदरिन कस किंजरत राहय. कभू तो बपरा ल तेल-पानी चुपरत देखतेन, जब देखतेन त सोन-परी बरोबर सज-सम्हर के हांसत भकभकावत देखतेन!
भूरी के अंतस के पीरा ल भूरिच ह जानत रिहिसे, ते वोकर भगवान ह. दूसर म अउ कोनो जाने-टमड़े के लइक रिहिसे ते वोकर देवर कमल ह, जेन ह दुख के बेरा म भइया-भउजी के सेवा-चाकरी म रात-दिन भीड़े राहय. बाकी सबो झनला सिरिफ भूरी के चारी करे म मजा आवय. उहू चारी अइसन, जेकर कोनो गोड़-मुड़ी नइ राहय. एको झन तो भूरी के पीरा म आंसू बोहा लेतिन! बपरी ह भरे जवानी म अपन जोड़ी ल बिसार डारिस. ओकर टीबी के जबर बेमारी के इलाज म अपन जम्मो गहना-गुरिया, बारी-बखरी ल बेंच डारिस फेर वोला बचाए नइ पाइस. अब कुल सम्पत्ति वोकर दू झन लइका के छोड़ अउ कुछू नइए. एक झन पांच बछर के रिंकू अउ दू बछर के टिंकू. कइसे करके अतेक बड़ जिनगी ल पहाही, नान-नान लइका मनला कइसे करके पढ़ाही-लिखाही, उनला पांव म खड़ा करही..?
घर-परिवार अउ समाज के असली चेहरा ल अइसने बेरा देखे-परखे बर मिलथे. जतका झन समाज सेवा के नांव म मुड़ म पागा खापे किंजरत रहिथें. वो मनला तो सिरिफ खात-खवई भर के चिंता रहिथे. भूरी ह अपन गोसइयां के किरिया-करम म लाड़ू-पपची खवाही नहीं? अउ बरा-सोंहारी के सेवाद चिखवाही नहीं? सबो घर तो अपन ह किंजर-किंजर के खाए हे, तब सोझ म उहू ल खवाए बर लागही. अउ कहूँ नइ खवाही, त सोझ-बाय वोला डांड़-बोड़ी खाए बर लागही. बस समाज अतके म मगन राहय. एको झन लइका मनला अनाथ होए ले कइसे बचाए जा सकही, वोकर मरनी-हरनी के बेवस्था ल कर पाही धुन नहीं ते? कभू नइ गुनय!
* * * * *
किरिया-करम के पाछू भूरी ल लइका मनके चिंता बजुरा-पहार बरोबर लागे लागिस. बाप ह कतकों बीमार रिहिसे तभो लइका मनके मुंह म चारा डारे के अलवा-जलवा बेवस्था करिच डारत रिहिसे. अब घर म सियान के नांव म एक झन सास भर ह रहिगे हे, तेनो ह दिन-रात खांसी-खोखी म बूड़े रहिथे. कभू कनिहा पीरा ते कभू छाती पीरा, बस वो ह वतके म बिपतियाए रहिथे. देवर कमल ह छोटे-मोटे रोजी-मजूरी करथे, फेर वतकेच म का होथे? दिन के दिन बाढ़त मंहगाई के सेती अब ककरो घर के पेट-पसिया बने गतर के नइ चल सकत हे. भूरी के आंखी म रतिहा नींद नइ आवय. वो गुनथे अब महूं ल घर के डेहरी नहाक के कहूँ काम-बुता म जाए बर लागही तभे बनही. आज लइका मन नान-नान हें, साल दू साल म स्कूल जाए के लाइक हो जाहीं, तहाँ ले खरचा अउ बाढ़ जाही. फेर सबले बड़े बात तो ए हे, के कमल एक ले दू हो जाही, अउ वोकर सुवारी कहूँ थोरको खइटकार होइस, तहाँ ले तो मरे बिहान हो जाही.
भूरी अपन भविष्य के ताना-बाना म बिपतियाए रिहिसे, तभे वोकर छोटे बेटा चिंकू सूते खातिर रोए लागिस. भूरी वोला लोरी सुना-सुना के रोजे सुतावय, तेकर सेती वोकर सूते के पहिली लोरी सुने के टकर परगे राहय. भूरी समझगे ये लोरी सुने बर रोवथे कहिके. तब अंतस के पीरा अपने-अपन वोकर मुंह ले फूट परिस-
कइसे झुलावौं झुलना गरीब के लाल,
डेहरी म खड़े हे लेगे बर मोला काल...
भरे जुवानी म ददा तोर बिसरगे, बेटा ल चुमे बिन सुरता म सजगे.
जीते-जी मरे कस आज होगे मोर हाल..
डेहरी म खड़े हे लेगे बर मोला काल...
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रतिहा जब जादा होवय त वोकर सास कइसनो करके सूती जावय, फेर देवर कमल ह भूरी के पीरा ल समझ के वोला टकटकी लगाए देखत राहय. वो मने-मन गुनय घलो एकर दुख ल मैं कइसे कम कर सकथौं? वो भूरी संग एती-वोती के गोठ करके वोकर मन ल हरू करे के उदिम रचय, फेर भूरी के अंतस तो दुख के खदान बनगे राहय. वो कमल ल कहिस-' कइसे करबे बाबू.. तोर अकेल्ला के कमई म तो घर के खरचा चलई ह मुसकुल जनाथे, कोनो मेर मोरो लइक बुता-काम देखना.'
भूरी के बात म कमल के अंतस रो डारिस. वो गुनथे- हे भगवान, अइसनो दिन देखे के बदे रिहिसे? हमर घर के मरजाद ल डेहरी ले पांव निकाले के दिन आगे? वो कहिस-' मैं तो कमातेच हौं न, कइसनो करके पेज-पसिया के बेवस्था होइच जाथे. तब तोला घर के डेहरी छोड़े के का जरूरत हे?'
अइसने म के दिन चलही बाबू, फेर आज नहीं ते काल तहूं एक ले दू होबे, तहाँ ले तोरो लोग-लइका होही, तब एके झन के कमई म सबो झन कइसे जीबो?'
-अउ मैं बिहाव नइ करहूं त?
-कइसे बइहा बानी के गोठियाथस तैं ह.
-सिरतोन काहत हौं, मैं तुंहरे मनके सेवा-जतन म ए जिनगी ल बिता देहूं, इही लइका मनला देख के अपन लइका के सपना ल पूरा कर लेहूं.
-कइसे गोठियाथस बाबू... तहाँ ले ए समाज ह मोला जीयन देही? आज अतेक दुख-पीरा के पहार म चपकाए हौं, तब तो रकम-रकम के गोठियाथें, काली कहूँ तैं बिहाव नइ करबे त मोला का-का कइहीं तेकर सरेखच नइए. मोर बर तो मरे बिहान हो जाही- काहत भूरी रो डारिस.
कमल वोला पोटार के चुप कराइस तहाँ ले कहिस-' ले ठीक हे, मैं तोर लइक कोनो मेर बुता-काम देखत हौं. काल बिहन्चे संगवारी मन करा गोठियाहूं काहत भूरी ल वोकर जठना म सूता के कथरी ल ओढ़ा दिस, अउ अपनो ह अपन कुरिया म आके सूतगे.
* * * * *
कुकरा बासत कमल के नींद खुलगे. रोजे सहीं वोहा लोटा-मुखारी धर के तरिया कोती चल दिस. तरिया म रोजे कस गुरुजी संग भेंट होइस. दूनों के जोहार-पैलगी होइस, तहाँ ले गुरुजी वोला पूछ परिस-' कइसे कमल आज तैं पछुवा गेस, नइते आन दिन तोर ले पाछू मैं आवत रेहेंव?'
-का करबे गुरुजी रात भर आंखी म टकटकी धरे रहिथे, तेकर सेती अतका बेर देरी से नींद खुलथे.
-कइसे का होगे जी?
-जानत तो हस गुरुजी घर म घटे घटना ल. अब भौजी ह काम खोजदे काहत हे.
-बने तो काहत हे कमल. अपन लोग-लइका खातिर तो वोला घर के डेहरी ल नाहकेच बर लागही.
-त मैं ह तो कमातेच हौं न गुरुजी, अलवा-जलवा तो चलतेच हे पेज-पसिया ह.
-तोर कमई म वोकर जीवन कइसे चलही कमल, फेर तहूं ल अभी एक ले दू होना हे, त फेर वो ह कइसे करही?
कमल मुखारी चगलत घठौंदा के पखरा म बइठत कहिस-' अउ मैं जीवन भर बिहाव नइ करहूं त गुरुजी?'
गुरुजी नहाए के बाद कपड़ा ल फलियारत कहिस-' अइसे कइसे हो सकथे, ए तो जीवन के रिवाज आय. सबो ल एक ले दू अउ दू ले चार होना परथे, तभे तो सृष्टि के क्रम ह चलथे बेटा.'
-कुछू होवय गुरुजी.. फेर मैं अपन घर के मरजाद ल डेहरी ले बाहिर नइ निकलन देवौ.
गुरुजी लोटा म पानी धरके शिव मंदिर म जल चढ़ाए जावत कहिस-' अइसन हे, त एक रस्ता हे बेटा...
-का गुरुजी?
-तैं अपन भौजी संग बिहाव कर ले, कहिके गुरुजी मंदिर भीतर खुसरगे. महादेव म जल चढ़ा के निकलिस, त कमल कमल कथे-' कस गुरुजी तैं काहत हस तेन फभे के लइक हे? अरे भई तुहीं सियान मन तो कहिथौ, देवर-भौजी के नता ह महतारी-बेटा कस होथे कहिके.'
गुरुजी कच्चा कपड़ा मनला सकेल के सुक्खा कपड़ा पहिनत कहिथे-' सब परिस्थिति अउ समय के बात आय बेटा. ए पुरुष प्रधान समाज ह सबो नियम-कायदा ल अपन स्वारथ के मुताबिक बनाय हे. अउ वोला बेरा-बखत म एती-वोती घलो करत रहिथे. जब कोनो आदमी के घरवाली मर जथे, त बहिनी के लोग-लइका मनला सम्हालही कहिके वोहा अपन सारी ल बिहा के लान लेथे. अइसने इहू काबर नइ सोचे जाय के बड़े भाई के लोग-लइका मनला अनाथ होए ले बचाए खातिर देवर संग वोकर भौजी के बिहाव करवा दिए जाय. दूनों झन तो आखिर हमजोली होथे. फेर उहू बपरी ल तो एक जीवन साथी के जरूरत होथे, त फेर वोकरो व्यवस्था काबर नइ होना चाही?'
-फेर मैं तो अपन भौजी ल अइसन नजर ले कभू सपना म तक नइ देखे हौं गुरुजी.
-ए तो तोर अच्छा नीयत अउ चरित्र के परमान आय बेटा, फेर अब एला समय अउ परिस्थिति के अनुसार बदल. आखिर भगवान मन घलो तो अइसन व्यवस्था ल चलाए हे. त फेर हमन ल वोला काबर नइ मानना चाही?
-भगवान मन अइसना व्यवस्था चलाए रिहिन हें? कमल ल बड़ा अचरज लागिस. त गुरुजी वोला समझाइस-' हां बेटा, भगवान मन घलो अइसन व्यवस्था करे रिहिन हें. अच्छा ए बता, भगवान राम ह बाली ल मारे के बाद वोकर सुवारी अउ बेटा अंगद ल सुग्रीव ल सौंप के वोकर मन के पालन-पोसन के जम्मो व्यवस्था ल पूरा करे के जवाबदारी दे रिहिसे के नहीं?'
कमल ह मुड़ खजवावत कहिस-' हां ए बात तो सही हे.'
गुरुजी फेर पूछिस-' अच्छा ए बता, वोकर बाद रावन ल मारे के बाद, वोकरो गोसइन मंदोदरी ल विभिसन ल सौंप के वोकर जम्मो व्यवस्था ल पूरा करे के जवाबदारी दे रिहिसे के नहीं?'
कमल फेर हां म मुड़ डोलाइस.
-त फेर अउ का बात हे?' कहिके गुरुजी घर कोती रेंगे लागिस, त कमल वोला फेर कहिस-' केहे बर तो तैं ठउका कहिथस गुरुजी, फेर मैं भौजी अउ अपन दाई संग अइसन बात ल कइसे केहे सकहूं?
गुरुजी थोरिक ठाढ़ होए कस होके कहिस-' अरे बेटा एकर चिंता ल तैं काबर करथस? मैं करहूं सबो संग गोठबात ल. घर, परिवार, समाज, पंच-पंचायत, मंदिर-देवाला सबो जगा मैं खड़ा होहूं.' कहिके गुरुजी अपन घर कोती चल दिस.
गुरुजी के बात ल सुन के कमल के मुड़ के चिंता ह थोरिक हरू होए असन लागिस. तहाँ ले उहू जल्दी-जल्दी नहाइस अउ घर कोती रेंग दिस.
फागुन तिहार के मनाते कमल के अंगना म बाजा गदके लागिस. गाँव के पढ़े-लिखे लइका मन अपन गाँव म एक नवा इतिहास लिखे जाय के खुशी म गदकत राहयं. वोमन ल हांसत-नाचत देख के कुछ रूढ़िवादी मन कुलबुलावयं घलो, फेर गुरुजी के तर्क-वितर्क अउ वोकर चेला मनके उत्साह ल देख के उन जुड़ा जायं घलो. भूरी के मड़वा ल गुरुजी खुद अपन अंगना म गड़िया के वोकर कन्यादान करिस.
चारे महीना म भूरी फेर एॅंहवाती के एॅंहवाती होगे. वोकर लइका मनके मुड़ म फेर बाप के छांव आगे. कमल घलो नवा साल म जब बड़े बेटा रिंकू ल पढ़े खातिर पहली कक्षा म भरती करिस, त वोकर बाप के नांव के जगा म अपन नांव ल लिखा के लइका मनला घलो पूरा के पूरा अपन बना लिस.
(कहानी संकलन 'ढेंकी' ले साभार)
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811