Thursday, 16 June 2022

अस्मिता के सजग प्रहरी सुशील भोले

2 जुलाई जनमदिन
छत्तीसगढ़ी अस्मिता के सजग प्रहरी सुशील भोले

जा रे मोर गीत तैं खदर बन जाबे
बिना घर के मनखे बर घर बन जाबे...
बने अस देखत जाबे कोनो भूख झन मरय
पेट के अगनिया बर लइका कोनो झन बेचय
अइसन कहूँ देखबे त चाउंर बन जाबे...
जा रे मोर गीत तैं खदर बन जाबे...

    सुशील भोले के ए वो गीत आय, जेला आकाशवाणी ले प्रसारित कविता पाठ म सुन के मैं उंकर नाम ले पहिली बार परिचित होए रेहेंव. बाद म आकाशवाणी ले उंकर कतकों कविता पाठ के संगे-संग ढेंकी, एॅंहवाती जइसन कतकों कहानी अउ वार्ता घलो सुने बर मिलिस. फेर उंकर संग पहिली बेर भेंट तब होइस, जब वोमन हमर 'संगम साहित्य एवं सांस्कृतिक समिति मगरलोड के कार्यक्रम म पहुना बन के पहुंचीन. फेर तो लगातार भेंट-मुलाकात होए लागिस, काबर ते उन हमर संगम साहित्य के हर कार्यक्रम म आए लगिन. इहाँ रतिहा बिताए लगिन. तब उंकर संग म लगातार बइठे अउ गोठ बात के अवसर मिलत गिस. इही बेरा म उंकर सम्पूर्ण व्यक्तित्व कृतित्व ले परिचित घलो होएंव. एक बेर हमर गाँव डाभा म होए कवि सम्मेलन म घलो उन पहुंचे रिहिन हें, तब हमर घर म बइठे बर घलो पधारे रिहिन हें.

    2 जुलाई सन् 1961 के महतारी उर्मिला देवी अउ पिता रामचंद्र वर्मा जी के दूसरा संतान के रूप म भाठापारा शहर म जनमे सुशील भोले जी के पैतृक गाँव रायपुर जिला के गाँव नगरगांव आय, जेन हमर राजधानी रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ विधानसभा भवन ले उत्तर दिशा म करीब 10 कि.मी. के दुरिहा म हावय. इहाँ ए बताना बने जनावत हे के इंकरे मन के गाँव ले बोहाने वाला कोल्हान नरवा के खंड़ म वो जगा के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल बोहरही धाम हे.

    सुशील भोले जी ल मैं साहित्यकार ले जादा इहाँ के अस्मिता के सजग प्रहरी जादा मानथौं. काबर ते उनला मैं इहाँ के मूल संस्कृति, जीवन पद्धति अउ उपासना विधि खातिर जादा काम करत देखे हौं. हमर इहाँ के कार्यक्रम म उन आवयं त इही विषय म उंकर उद्बोधन जादा सुने बर मिलय. वोमन एकर खातिर एक समिति 'आदि धर्म जागृति संस्थान' घलो बनाए हें, जेकर माध्यम ले जनजागरण के बुता करत रहिथें. ए विषय म उंकर चार डांड़ के सुरता आवत हे-
सुशील भोले के गुन लेवौ ये आय मोती बानी
सार-सार म सबो सार हे, नोहय कथा-कहानी
कहाँ भटकथस पोथी-पतरा अउ जंगल झाड़ी
बस अतके ल गांठ बांध लौ सिरतो बनहू ज्ञानी

    भोले जी सन् 1983 ले दैनिक अखबार म जुड़े रहे हे, तेकर सेती उनला प्रकाशन के मंच घलो जल्दी मिलगे रिहिसे. उंकर रचना मन सन् 83 ले ही अखबार म छपे ले धर लिए रिहिसे. आकाशवाणी म घलो सन् 84 ले उंकर रचना के प्रसारण होवत हे. वोमन बतायंव- वो बखर कविता पाठ के जीवंत प्रसारण होवय. जीवंत माने, एती बोलत जा अउ वोती वोहा रेडियो ले सुनावत जाही. अब तो अइसन कोनो भी कार्यक्रम के पहिली रिकार्डिंग  कर लिए जाथे. बाद म फेर वोकर प्रसारण होथे.

   भोले जी के लगातार अखबार म जुड़े रहे के सेती छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य खातिर घलो बने काम होए हे. एक तो वोमन खुद छत्तीसगढ़ी म लगातार कालम लेखन करत राहंय, संग म हमर जइसन नवा लिखइया मनला प्रकाशन मंच दे खातिर छत्तीसगढ़ी परिशिष्ट घलो  निकालत राहंय. दैनिक अमृत संदेश म जब 'अपन डेरा' निकाले के चालू करिन, तब ले महूं ल अपन छत्तीसगढ़ी रचना मनला प्रकाशित करे खातिर एक अच्छा मंच मिले लागिस.  वइसे इहाँ ए जानना महत्वपूर्ण हे, भोले जी छत्तीसगढ़ी भाषा के पहला सम्पूर्ण मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के स्वयं प्रकाशन-संपादन करे हें. 9 दिसम्बर 1987 ले शुरू होय मयारु माटी के ऐतिहासिक महत्व हे. तब वोमन अपन नाम सुशील वर्मा लिखत रहिन. बाद म आध्यात्मिक दीक्षा ले के बाद 'वर्मा' के जगा अपन इष्टदेव 'भोले' ल अपन पहचान बनाइन.

    सुशील भोले जी सन् 1983 ले ही छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन म जमीनी रूप ले जुड़गे रिहिन, तेकर सेती उंकर मन-मतिष्क ह पूरा के पूरा छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया होगे हे. वोमन कहिथें- छत्तीसगढ़ ह हर दृष्टि ले अतका समृद्ध हे, हमला कोनो किसम ले बाहिरी लोगन ऊपर आश्रित होए के जरूरत नइए. वोमन धर्म अउ संस्कृति के संबंध म घलो अइसने कहिथें- न तो हमला बाहिर के कोनो ग्रंथ चाही न संत चाही. इहाँ सबकुछ हे. बस जरूरी हे, त सिरिफ अपन मूल ल जाने, समझे अउ आत्मसात करे के. वोमन छत्तीसगढ़ राज्य बने के बाद घलो आज के राजनीतिक परिदृश्य ले संतुष्ट नइहें. वोमन कहिथें- हमर पुरखा मन जेन उद्देश्य ल लेके राज्य आन्दोलन के नेंव रचे रिहिन हें, वो तो कोनो मेर छाहित होवत नइ दिखत हे. आज घलो उहि परिदृश्य दिखथे, जेन राज्य बने के पहिली रिहिसे. ए विषय म उन एक गीत घलो लिखे हें, जेला कतकों मंच म सुने ले मिलय-
राज बनगे राज बनगे देखे सपना धुआँ होगे
चारोंमुड़ा कोलिहा मन के देखौ हुआँ हुआँ होगे...
का-का सपना देखे रहिन पुरखा अपन राज बर
नइ चाही उधार के राजा हमला सुख-सुराज बर
राजनीति के पासा लगथे महाभारत के जुआ होगे...

    सुशील भोले जी के स्पष्ट कहना हे- जब तक छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति, भाषा अउ आध्यात्मिक जीवन पद्धति के स्वतंत्र पहचान नइ बन जाही, तब तक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के अवधारणा अधूरा रइही.

    पाछू तीन-चार बछर ले उन लकवा रोग ले ग्रसित होय के सेती एक किसम के घर रखवार होगे हें. तभो ले उंकर छत्तीसगढ़ी खातिर निष्ठा अउ सक्रियता ह देखते बनथे. सोशलमीडिया म रोज बिहनिया चार डांड़ के कविता संग एक समसामयिक फोटो देख के गजब सुग्घर लागथे. अइसने उन जुन्ना बेरा के बात ल अउ वोकर संग जुड़े साहित्यकार कलाकार आदि मन के जेन जानकारी 'सुरता' के माध्यम ले देवत हें, वो ह हमर जइसन नवा पीढ़ी खातिर एक धरोहर के रूप म सदा दिन सुरता करे जाही.

    आज 2 जुलाई के उंकर जनमदिन के बेरा म उनला शुभकामना देवत छत्तीसगढ़ महतारी ले अरजी हे, उनला जल्दी स्वस्थ करंय, तेमा उन अपन उद्देश्य के रद्दा म सरलग बुता करत राहंय, संग म उंकर जम्मो मनोकामना ल पूरा करंय. छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन म संघरे खातिर उंकर मन म जतका भावना रिहिसे, वोला छाहित करय.
जय छत्तीसगढ़.. जय छत्तीसगढ़ी..

-भोलाराम सिन्हा, गुरुजी
ग्राम- डाभा, पो. करेली छोटी
वि.खं.मगरलोड, जिला-धमतरी-493662
मो. नं. 9165640803

Monday, 13 June 2022

अपन गोठ.. चार डांड़.. बिहनिया जोहार

अपन गोठ...
  
   सोशलमीडिया के आए ले अपन टाईम लाईन के संगे-संग संगी-जहुरिया मनला बिहनिया के जोहार-पैलगी करे के उदिम ह बनेच बाढ़गे हे. इही परंपरा ह मोला 'चार डांड़' लिखे खातिर प्रेरित करिस. मैं गुनेंव- रोज सुग्घर बिहान या रतिहा जोहार करे ले अच्छा हे, कुछू दू-चार डांड़ के सामयिक गोठ लिखे जाय.
     फेर मैं जिनगी भर दैनिक अखबार म बुता करे हौं. उहाँ 'फोटो कैप्शन' दे के परंपरा हे. फोटो कैप्शन माने दिन-बादर के या कुछू फोटो विशेष संग दू आखर लिख के अखबार के कोनो विशेष जगा म वोला ठउर दिए जाथे. मोर अखबार लाईन के आदत ह ए 'चार डांड़' मनला फोटो संग सोशलमीडिया म पठोए के आदत बनिस.
     कतकों लोगन एला गजब पसंद करंय. कहाँ ले सुग्घर- सुग्घर फोटो खोज के वोकर संग चार डांड़ लिखथस कहंय. फेर ए सबला एक जगा सकेल के किताब के रूप दे के बात न मैं सोचे रेहेंव न संगी मन कहे रिहिन.
    एक दिन वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. सत्यभामा आड़िल जी कहिन के एमन के तैं किताब छपवा, भूमिका ल मैं लिखहौं. फेर मैं कहेंव- मैं तो अभी लकवा रोग के अभेरा के सेती पाछू चार बछर अकन ले खटिया के रखवारी करत हौं, अइसन म एला छपवाए खातिर भाग-दौड़ कोन करही? त दीदी सुझाव देइन, कोनो साहित्यकार मनला जोंग. मैं एकर खातिर शिक्षक साहित्यकार  अशोक पटेल 'आशु' जी ल खंधोलेंव. उन तुरते तइयार होगे. अशोक जी के भाग-दौड़ अउ सहयोग के सेती ए 'चार डांड़' मन आज किताब के रूप धर पावत हें.
    एमा का साहित्य हे, का नहीं एला तो गुनिक सुजान मन ही टमड़ पाहीं. मैं तो सिरिफ बीमारी के बेरा ल खटिया म बइठे पहवाय बर लिखत चलत हौं. ठउका अइसने 'सुरता' घलो लिखत हौं. एमन सिरिफ मोर बीमारी के बेरा ल पहवाय खातिर लिखे गे उदिम आय. तभो ले सुरता मन के घलो एक किताब 'सुरता के संसार' नाॅंव ले छप के आगे हे. आगू अउ आही अइसे जनाथे, काबर ते लिखई अभी चलतेच हे.
   आप सबके मया, दुलार अउ आशीष के अगोरा म-
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Thursday, 9 June 2022

अमर रचनाकार मुकुटधर पाण्डेय जी

30 सितम्बर जयंती म सुरता//
हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के अमर रचनाकार पद्मश्री मुकुटधर जी पाण्डेय
    भीड़ ले अलग हट के कुछ मौलिक अउ आरुग अंतस के गोठ लिखने वाला साहित्यकार ल एती-तेती के गाड़ा-गाड़ा रचना लिख के खरही गाँजे के जरूरत नइ परय. वो वतकेच म ही अमर अउ कालजयी रचनाकार हो जाथे.
    जांजगीर-चांपा जिला के गाँव बालपुर म 30 सितम्बर 1895 म महतारी देवहुती देवी अउ सियान पं. चिंतामणि जी के घर जनमे पद्मश्री पं. मुकुटधर पाण्डेय जी अइसने साहित्यकार रिहिन हें, जेन मन दू-चार रचना म ही साहित्य जगत म अमर हो गय हें. एकर खातिर 'सरस्वती' के संपादक रहे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के वो पाती उंकर बर रस्ता देखाए के बुता करे रिहिसे, जेमा लिखाय रिहिसे- 'आप साल भर म तीन रचना ही भेजे करौ. उंकर सीख रिहिसे के, कम लिखौ फेर पोठ लिखौ. अच्छा लिखे म रचनाकार दू-चार रचना म ही अमर हो जाथे. जबकि जादा लिखे म घलो लोगन उनला चालीस-पचास बछर म बिसर डारथें.' आचार्य द्विवेदी जी के ए पाती ह मुकुटधर पाण्डेय जी खातिर गुरु मंत्र साबित होए रिहिसे.
    मोला पं. मुकुटधर पाण्डेय जी के दर्शन अउ घंटा भर बइठ के उंकर संग मुंहाचाही करे के सौभाग्य तब मिले रिहिसे, जब हमन सन् 1988 के दिसंबर महीना म 'छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य प्रचार समिति' के प्रदेश स्तरीय जलसा रायपुर के रामदयाल तिवारी स्कूल म करवाए रेहेन.
    असल म ए जलसा म छत्तीसगढ़ी के सियान साहित्यकार मन के सम्मान घलो होना रिहिसे, जेमा मुकुटधर पाण्डेय जी के नॉंव घलो शामिल रिहिसे, फेर उन स्वास्थ्य गत कारण के सेती रायपुर नइ आ पाए रिहिन हें. तब हमन डाॅ. व्यास नारायण दुबे जी, जागेश्वर प्रसाद जी अउ मैं, हम तीनों रायगढ़ जाके उंकर घर म ही समिति के डहार ले सम्मान करे रेहेन. ए कारज म डाॅ. बलदेव साव के संगे-संग रायगढ़ के अउ साहित्यकार मन के अच्छा सहयोग मिले रिहिसे. ए बेरा म श्रद्धेय पाण्डेय जी ह रायपुर ले गए हम तीनों झनला महाकवि कालिदास के अमरकृति 'मेघदूतम्' के छत्तीसगढ़ी अनुवाद के प्रति ल अपन हस्ताक्षर कर के दिए रिहिन हें. उही छत्तीसगढ़ी कृति के माध्यम ले ही मैं 'मेघदूत' ल पढ़ पाए रेहेंव, अउ वोकर ले प्रभावित होके छत्तीसगढ़ी म एक गीत लिखे रेहेंव-
अरे कालिदास के सोरिहा बादर, कहाँ जाथस संदेशा लेके
हमरो गाँव म धान बोवागे, नंगत बरस तैं इहाँ बिलम के
थोरिक बिलम जाबे त का यक्ष के सुवारी रिसा जाही
ते तोर सोरिहा के चोला म कोनो किसम के दागी लगही
तोला पठोवत बेर चेताय हे, जोते भुइयाॅं म बरसबे कहिके
अरे कालिदास के सोरिहा बादर...

    छत्तीसगढ़ी मेघदूत के  भाषा ल पढ़ के अइसे नइ जनावय, के ए ह अनुवाद आय. वोला पढ़े म अइसे जनाथे, के एहि ह मूल प्रति आय. देखव छत्तीसगढ़ी मेघदूत के दू डांड़-
बता मित्र के काम करे बर तैं हर मन म ठाने?
उत्तर देबे तभे तोर स्वीकृति का जाही जाने?
बिन गरजे याचक चातक ला देथस तैं जल, जलधर,
काम कर दिहिन जन के पूरा, यही सुजन के उत्तर..

    मुकुटधर पाण्डेय जी ल छायावाद के प्रवर्तक के रूप म जेन कविता 'कुररी के प्रति' ह स्थापित करिस, वो ह जुलाई 1920 के 'सरस्वती' के अंक म छपे रिहिसे-
बता मुझे, हे विहग विदेशी, अपने जी की बात.
पिछड़ा था तू कहाँ, आ रहा जो कर इतनी रात?
निद्रा में जा पड़े कभी के, ग्राम्य मनुज स्वच्छंद.
अन्य विहग भी निज खेतों में सोते हैं सानंद.
इस नीरव घटिका में उड़ता है तू चित्रित गात.
पिछड़ा था तू कहाँ, हुई क्यों तुझको इतनी रात?
    मुकुटधर पाण्डेय जी बतावंय के वोमन 'कुररी' ऊपर तीन कविता लिखे रहिन हें. शायद उंकर दूसर रचना 1917 म छपे रिहिसे-
सच पूछो तो तुममे मुझमे भेद नहीं कुछ भारी
मैं हूँ थल चारी तो तू है विस्तृत व्योम विहारी
    तीसर रचना शायद 1939 म लिखे गे रिहिसे-

सुना, स्वर्ण मय भूमि वहाँ की मणिमय है आकाश
वहाँ न तम का नाम, कहीं है रहता सदा प्रकाश

     मुकुटधर पाण्डेय जी रामायण के उत्तरा कांड ल घलो छत्तीसगढ़ी ल लिखे रिहिन हें. वोकर एक झलक देखौ-
अब तो करम के रहिस एक दिन बाकी
कब देखन पाबो राम लला के झांकी

हे भाल पांच में परिन सवेच नर नारी
देहे दुबराइस राम विरह मा भारी

दोहा - सगुन होय सुन्दर सकल सबके मन आनंद।
पुर सोभा जइसे कहे, आवत रघुकुल चंद॥

महतारी मन ला लग, अब पूरिस मन काम
कोनो अव कहतेव हवे, आवत्त वन ले राम

जेवनी आंखी औ भूजा, फरके बारंबार
भरत सगुन ला जनके मन मा करे विचार

अअब तो करार के रहिस एक दिन बाकी
दुख भइस सोच हिरदे मंचल राम टांकी

कइसे का कारण भइस राम नई आईन
का जान पाखंडी मोला प्रभु बिसराईन

धन धन तैं लक्ष्मिन तैं हर अस बड़भागी
श्रीरामचंद्र के चरन कवल अनुरागी

चिन्हिन अड़बड़ कपटी पाखंडी चोला
ते कारन अपन संग नई लेईन मोला

करनी ला मोर कभू मन मा प्रभू धरही
तो कलप कलप के दास कभू नई तरही

जन के अवगुन ला कभू चित नई लावै
बड़ दयावंत प्रभु दीन दयाल कहावै

जी मा अब मोर भरोसा एकोच आवै
झट मिलहि राम सगुन सुभ मोला जनावै

बीते करार घर मा परान रह जाही
पापी ना मोर कस देखे मा कहूं आही

दोहा
राम विरह के सिन्धु मा, भरत मगन मत होत।
विप्र रूप धर पवन सुत, पहुंचिन जइसे पोत॥

    हर मनखे ल अपन माटी, अपन भाषा अउ संस्कृति खातिर गजब मया होथे. वो एकर बखान ल कोनो न कोनो रूप म जरूर करथे. तब छत्तीसगढ़ राज एक स्वतंत्र राज के चिन्हारी पा जाही या नइ पाही, तेकर कोनो भरोसा नइ रिहिसे. तभो ले इहाँ के गुनी साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ के एक स्वतंत्र अस्तित्व के कल्पना करत ओकर जोहार-पैलगी अउ वंदन जरूर करीन. मुकुटधर पाण्डेय जी के 'प्रशस्ति' शीर्षक ले लिखे ए रचना ल देखौ-
सरगुजा के रामगिरि ह मस्तक-मुकुट संवारे.
महानदी ह निरमल जल मा जेकर चरन पखारे..
राजिम अउ शिवरीनारायन क्षेत्र जहाँ छवि पावै.
ओ छत्तीसगढ़ के महिमा ला भला कवन कवि गावै?
हैहयवंशी राजा मन के रतनपुर रजधानी.
गाइस कवि गोपाल 'राम परताप' सुअमरित बानी..
जहाँ वीर गोपालराय का करो करय नइ संका.
जेकर नांव के जग जाहिर दिल्ली म बाजिस डंका..
मंदिर, देउर डहर-डहर आजो ले खड़े निसानी.
कारीगरी गजब के जेमा, मुरती आनी-बानी..
ये पथरा के लिखा, ताम के पट्टा अउ शिवाला.
दान-धरम अउ बल-विकरम के देवत हवै हवाला..

    आचार्य द्विवेदी जी के बताए गुरुमंत्र ल धरे उन वाजिब म कम ही लिखिन, फेर गजब पोठ अउ अंतस ल छूने वाला साहित्य रचिन. उंकर प्रमुख लेखन म- पूजा फूल, लच्छमा अनूदित उपन्यास, हृदय दान कहानी, परिश्रम निबंध संग्रह, शैलबाला अनूदित उपन्यास, मामा अनूदित उपन्यास, छायावाद एवं अन्य निबंध, स्मृति पुंज, मेघदूत के छत्तीसगढ़ी अनुवाद, विश्वबोध काव्य संकलन आदि प्रमुख हे. एकर संगे-संग उंकर व्यक्तित्व-कृतित्व ले संबंधित अउ कतकों किताब प्रकाशन के अगोरा म हे.

    मुकुटधर पाण्डेय जी के तीन किताब - पूजा फूल (काव्य संग्रह) अउ उड़िया ले अनुदित उपन्यास 'शैलबाला', अउ 'लच्छमा' के लेखक पं. मुकुटधर शर्मा (पाण्डेय) के संगे-संग उंकर बड़े भाई मुरलीधर शर्मा (पाण्डेय) घलो हे. रायगढ़ के साहित्यकार बसंत राघव (सुपुत्र डाॅ. बलदेव साव) ए बात ल प्रमाण सहित कहिन हें.

    मोर सौभाग्य आय मोर पहला कविता संकलन 'छितका कुरिया' खातिर वोमन छत्तीसगढ़ी म अपन शुभकामना संदेश दिए रिहिन हें, अउ कहे रिहिन हें- मैं अपन जिनगी म पहिली बेर ककरो खातिर छत्तीसगढ़ी म संदेश लिखे हौं. उंकर ए संदेश के पांडुलिपि ल तब मैं ब्लाक बनवा के अपन संग्रह म छपवाए रेहेंव. आज घलो उंकर वो पाती ह मोर बर धरोहर बने हुए हे.

    6 नवंबर 1989 के 94 बछर के उमर म वोमन ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लेइन. उंकर सुरता ल पैलगी- जोहार🙏
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Friday, 3 June 2022

डाॅ. बलदेव के लिखे भूमिका 'छितका कुरिया'

सुरता//
'छितका कुरिया' खातिर डाॅ. बलदेव के लिखे भूमिका
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    'छितका कुरिया' सुशील वर्मा के कविता के पहिली किताब आये। नानकन बीज में सइघो पेड़ समाय रइथे, वोइसने ए संकलन म एक जनवादी कवि के संभावना छिपे हवय | एमा उवत सूरज के अंजोर हे , जेमा लुकाय हुए चीज अउ बदले हुए मनखे के सकल-सूरत दिखे लागथे। कवि के किशोर भावना इहाँ जीवन के कटु यथार्थ ले उपजे हे। ओमा युग व्यापी असंतोष, रोष अउ विद्रोह ल व्यक्त करे के भारी छटपटाहत देखे जा सकत हे। इहाँ कवि कहूं मेर कल्पना के सरग रचत या हवाई महल खड़े करत नजर नइ आवत हे, ओकर जमीन ठोस हे, वो मुरमी जमीन म खड़े हे, एकरेच कारन वोकर बानी म ठनक हे, ओकर कविता के सेवाद अउ गंध पसीना जइसे नमकीन हवय।
      कवि परम्परा के पोषक नोहय, ओकर सोंच सुराज के बाद जटिल परिस्थिति ले उपजे सोच आय, आज के कवि के वास्तविक चिन्ता का होना चाहिए, ए बात के प्रमान ए किताव म जगा जगा मिलथे-
         गांधी के सपना सुराज आत्ते - आत नंदागे
        रोटी के दौरी म तन मन आज फंदागे
            बियाज सही बाढ़त हे छन छन म भूख
            खाता म लिखागे जिनगी भर बर दुख

   अन्तिम डांड़ सूजी के नोक असन नुकीला हे, घाव के मुड़ी ल छुवाय के देरी हे। ए देस म खास करके छत्तीसगढ़ जइसन पिछड़ा इलाका म हर साल अंकाल पड़थे। सावन म हरियर खेत उजर जाथे। चारों मुड़ा पलायन होथे, गरीब के दुख के ओर छोर नइये। नकटी के नाक कस मंहगाई बाढ़त हे। आदमी बन्धवा मजदूर हो गय हे, सुशील वर्मा ए स्थिति ल पंचतंत्र जइसन पात्र के निर्मान करकें अभिव्यक्ति देथें-
      पीठ म सील लादे आवत / बेलदार के गदहा •   
      तरिया ले गठरी आदे आवत / धोबी के गदहा ल
                                               पूछिस-
      कस जी ! बन्धवा मजदूर काला कइथें?

    दूसर डहर फक् उज्जर कपड़ा पहिने खद्दर धारी हें, जउन मौका बेमौका मेचका कस टर्राथें। इन देस के बेंदरा बिनास कर दीन इंकर सह म पनपत हे बयपारी, अप्सर, खाकी वर्दीधारी अउ पटवारी थाना म कुकरी अउ दारू के जोर हे। बहू-बेटी के इज्जत लूटे जात हे। थाना म पुलिस के मार ले कोनो मर जाही त ओहर हत्या नोहय, कानून जइसे कोनो चीज नइ रह गइस, जेकर लाठी अउ पइसा तेकर कानून। सब जगह सोसन अउ अत्याचार के बोलबाला हे। कवि ल कार्य - कारन के स्पष्ट पहिचान हे, ओकर चोट सधे हुए हवय -

      सिट्ठागे अब तो सेवा के गोठ ह
      चोरहा ल राजा बना दिस हमर वोट ह

      कवि अइसन स्थिति म खटिया म सूते नइ बर्रावें, वो अन्याय अउ सोसन के विरोध म जोमियाय लागथे, ओकर आवहान सुनो-

      अरे चलव बढ़व लाठी - गोली खाए बर फेर आघू  आवव
      अंगरेजवा के नास करेव अव अंगरेजियत के नास करव
            लेकिन आज नवा पीढ़ी दिसाहीन हे, ओती ले कवि निरास हे- ' नान- नान पतरेंगवा टुरा होगे रे मुड़पिरवा ' जइसन पंक्ति में कवि के दुख अउ रोष हर प्रकट होवत हे ।
        सन् १८५७ के गदर के बाद इहाँ लगातार दुकाल पड़िस आदमी पलायन करिन अउ महामारी के सिकार होइन, अइ समय हमर देस म पूंजीवादी सभ्यता के फैलाव होइस, वो आज ले जारी हे, कवि के व्यंग देखे लाइक हे-

     अंटावत तरिया के पिलवा मछरी पूछिस
     कस दाई - पानी नइ गिरे ले / दुकाल हर
     हमरेच बर काबर परथे?
     वो 'सादा' पांख वाला / कोकड़ा बर तो
     एकर ले एकदम सुकाल होथे

'छितका कुरिया' शीर्षक कविता कवि के विचारधारा के केन्द्रीय बिन्दु आय। एकर बहाना म वो पूरा देश के गरीबी अउ दुरदसा के बरनन करें हावय। मनखे के भाग जइसन कविता म कवि के व्यंग्य बड़ बारीक अउ असरदार हे। वो नियतवाद ' जइसन धारना के खुल के मखौल उड़ाय हे-

       कइसे के आय बगीचा विधाता
       एके जगा सब फूल फूले हे
       एक ठन देव के सीस चघत हे
       अउ एक ठन ह अइंला के मरत हे

संस्कृत के कोनो कवि के कथन हे-
         कुसुमस्तबकस्येंव द्वयी वृत्तिर्मनस्विनः
         मूदिर्नवा सर्वलोकस्य विशीर्येतवनेऽथवा

लेकिन सुशील वर्मा आज के कवि आंय 'विधाता' के नकाब ल उन खींच के निकाल देहे म भय नई करें। राजनीति के दांव - पेंच ल भले ही जुन्ना - फुन्ना पटन्तर के दुवारा व्यक्त करथे, फेर लोक प्रचलित धारना घलउ ल उन कगरिया के असली मार के जगह पहुंच जाथें। एक ठन उदाहरन देखा-

      बसन्त के उमंग ह। राँड़ी बर आन अउ
      एंहवाती बर आन होथे
      लोहा ह । कसाई बर आन, अउ मंदिर बर आन होथे

आगे उंकर व्यंग्य हर धारदार हो जाथे-

    वोइसनेच | ए पानी के कमी हवय ।
    हमर बर आन, अउ
    कोकड़ा बर आन होथे ।

     देस के संस्कृति कृषि प्रधान आय। छत्तीसगढ़ तो ठेठ खेतिहर इलाका आय। लेकिन आजो ले इहाँ जमीन रोकाय जमींदार अउ मालगुजार भरे हें, उंकर हुकूमत पहिलीच कस चले आत हे। श्रम करे म आदमी कतराय लगे हें - दुधारी कविता के मार देखा-

    जांगर खातिर जब ककरो खेती परिया परथे
   अउ बिन खेती के जब कोनो जांगर परिया परथे

कवि अपन किशोरे अवस्था म जिम्मेदार सियान कस बात करे लगत हे, ए समय तो ओला आन संगी जंवरिहा कस अपन उमर के गीत गाना रहिसें। फेर जब छय महीना के लइका ल वो खड़े मंझनिया, टूटहा घर के रखवारी करत देखथे, त अवाक हो जाथे। महतारी बेटा के बीच म गउंटिया के भूती लछमन रेखा कस खिंचाय जउन हावय। तभ्भो ले ओ गंवई - गांव के सरलता, सहज , सरस जीवन अउ प्रकृति के सुन्दरता ल अपन कल्पना के रंग देहे म नइ चूके हे। बसन्त अउ जड़कल्ला के बरतन म तो उन कमाल कर देहे हावय। कवि प्रचलित मुहाविरा के भरपूर उपयोग करे हे, लेकिन ओमा मौलिकता के भी कमी नइये। सुशील वर्मा अपन ज्येष्ठ कवि हरि ठाकुर , श्यामलाल चतुर्वेदी, नारायण लाल परमार जइसन कवि से बड़ परभावित हे। उन इंकर कविता से अपन काव्य - संस्कार ल बड़ सुघ्घर रूप में विकसित करे हाबंय। कवि समर्थ कवि मन के प्रभाव ग्रहण करय अउ उंकर मंजिल ले आघू के यात्रा सुरू करय , अइ हर जातीय चेतना कहलाथे, जे साहित्य म बहुत बड़े चीज आय। कवि सुशील वर्मा म एकर पूरा पूरा संभावना हे, संक्षेप म उन सचेत कवि आय, अउ अपन समय ले बेखवर नइये। उंकर कविता के मूल स्वर व्यंग्य आय। आवा ए निडर अउ साहसी कवि के संग मुखा - माखी करा, इंकर से, इंकर कविता से चिन्हारी करा-

    अरे एही हर तो । पंचाइती राज के सुरूआत ये .    
    अब तो रोज हत्या होही। बैंक लुटाही। इज्जत      बेचाही
    अउ राजनीति के यज्ञ म । तभे तो गांधी के भारत
    एक्कीसवीं सदी म जाही ।

                डॉ . बलदेव
  श्री शारदा साहित्य सदन,बैकुण्ठपुर ,

रायगढ़ १०-३-१९ ८ ९

मुकुटधर पाण्डेय जी के आशीर्वचन

सुरता//
मोर पहला कविता संग्रह 'छितका कुरिया' म पद्मश्री पं. मुकुटधर पाण्डेय जी के आशीर्वचन...
    छायावाद के प्रवर्तक, पद्मश्री, साहित्य वाचस्पति पं. मुकुटधर पाण्डेय जी के आशीर्वचन के सौभाग्य मोला तब मिले रिहिसे, जब मैं अपन नान्हे उमर मनके कविता ल 'छितका कुरिया' के नॉंव ले अपन जिनगी के पहला काव्य संकलन निकलवाए रेहेंव.
     महाशिवरात्रि 8 मार्च 1989 के लिखे अपन आशीर्वचन ल देवत श्रद्धेय पाण्डेय जी तब कहे रिहिन हें- 'मैं अपन जिनगी म कोनो रचनाकार खातिर पहिली बेर छत्तीसगढ़ी भाषा म संदेश या आशीर्वचन लिखे हौं.'
    वो बखत आज जइसे कम्प्यूटर अउ आफसेट प्रिंटिंग के जमाना नइ रिहिसे, तेकर सेती मैं उंकर वो आशीर्वचन के ब्लाक बनवा के संकलन म छपवाए रेहेंव. आशीर्वचन के लेखा देखव-
"श्रीराम"
नवोदित कवि सुशील वर्मा (वो बखत मैं अपन नाम सुशील वर्मा ही लिखत रेहेंव) के काव्य संकलन 'छितका कुरिया' म नाम के अनुरूप गरीबी रेखा ल पार करइया हमर मजदूर किसान मन के जीवन के विदग्धता पूर्ण चित्रण हवय. एमा एक तरफ तो गंवई गाँव के उमंग, उत्साह अउ भोलापन हे, प्रकृति सौंदर्य के सुघ्घर झॉंकी हे, तो दूसर तरफ शोषण कर्ता मन के विरुद्ध आक्रोश हे. कवि म यथार्थ अउ कल्पना के बढ़िया मेल हवय. कवि म प्रतिभा हे. उनमें अपन माटी के पीरा अउ महक समाय हवय. एतके नहीं उन मा युग के पहिचान अउ ओला वाणी देहे के सामरथ घलो हवय. भाषा शिल्प म मार्जन के जरूरत हवय. लेखनी धीरे 2 मंजाथे, ए बात ल ध्यान म रखना चाही.
    अभी तक मैं उनकर सम्पादकीय रूप के प्रशंसक रहेंव. उन कर दुवारा सम्पादित 'मयारु माटी' के छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास म स्थायी महत्व रइही, ए बात जानत हौं. फेर उन कर कवि रूप ल देख के अउ ज्यादा खुशी होइस. 'छितका कुरिया' संकलन पढ़ के मोला 'होनहार बिरवान के होत चीकने पात' वाला उक्ति याद आ गइस.
    उज्जवल भविष्य के कामना सहित..
मुकुटधर पाण्डेय
रायगढ़
महाशिवरात्रि

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