Wednesday, 27 February 2013

बइहा होगेंव.....

                                           
(इस भजन को मैंने अपने साधनाकाल में लिखा था। दरअसल लोग मुझे तब पागल हो गया है कहकर मेरे आस-पास भी नहीं आते थे। मेरे घनिष्ठ मित्र भी मुझसे दूर भागते थे। तब मैंने उन्हीं परिस्थितियों को रेखांकित करते हुए छत्तीसगढ़ी भाषा में इस भजननुमा गीत को लिखा था। मैं सन् 1994 से 2009 तक (करीब चौदह-पंद्रह वर्षों तक) आध्यात्मिक साधना में था, उसी समय से मेरे गरुजी के आदेश पर भोले लिखना लगा। उसके पहले मुझे सुशील वर्मा के नाम पर जाना जाता था।)

                                               
                                                  बइहा होगेंव...

                                          मैं तो बइहा होगेंव शिव-भोले,
                                          तोर मया म सिरतोन बइहा होगेंव.....

                                         घर-कुरिया मोर छूटगे संगी, छूटगे मया-बैपार
                                         जब ले होये हे तोर संग जोड़ा, मोरे गा चिन्हार
                                        लोग-लइका बर चिक्कन पखरा कइहा होगेंव गा.....

                                                     खेत-खार सब परिया परगे, बारी-बखरी बांझ
                                                     चिरई घलो मन लांघन मरथे, का फजर का सांझ
                                                     ऊपरे-ऊपर देखइया मन बर निरदइया होगेंव गा......

                                       संग-संगवारी नइ सोझ गोठियावय, देथे मुंह ला फेर
                                       बिन समझे धरम के रस्ता, उन आंखी देथे गुरेर
                                       मैं तो संगी तोरे सही बस आंसू पोछइया होगेंव गा... 



सुशील भोले
संपर्क : 41-191, कस्टम कालोनी के सामने,
 डॉ. बघेल गली, संजय नगर (टिकरापारा)
रायपुर (छ.ग.) मोबा. नं. 098269 92811

                                                                                                                       sushilbhole2@gmail.com

Tuesday, 26 February 2013

हीरा गंवाए हे बनकचरा म...


(नोट- छत्तीसगढ़ी व्याकरण के सर्जक हीरालाल चन्नाहू, जिन्हें कलकत्ता में मिली 'काव्योपाध्यायÓ की उपाधि के कारण हम हीरालाल काव्योपाध्याय के नाम से भी हम जानते हैं। उनकी स्मृति में नव उजियारा साहित्य एवं संस्कृति समिति रायपुर द्वारा सन् 2011-12 में एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया था। उस स्मारिका में मेरे द्वारा छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखे गये संपादकीय को यहां साभार प्रकाशित किया जा रहा है।)

ए ह छत्तीसगढ़ महतारी के दुर्भाग्य आय के वोकर असल 'हीराÓ बेटा मनला चुन-चुन के बनकचरा म फेंके अउ लुकाए के जेन बुता इहाँ के इतिहास लिखे के संग ले चालू होए हे, तेन ह आजो ले चलत हे। एकरे सेती हमला आज हीरालाल काव्योपाध्याय जइसन युगपुरुष मनला लोगन ल जनवाए के उदीम करे बर लागत हे।
 ए ह कतेक लाज के बात आय के छत्तीसगढ़ी लेखन के जेन ह गंगोत्री आय तेने ल इहाँ के इतिहास लेखन ले दुरिहाए के उदीम करे गे हवय। मोला लागथे के अइसन किसम के उजबक बुता ल उही मन करे हें, जिनला इहाँ के मूल निवासी मन के धरम, संस्कृति, इतिहास अउ गौरव ले कोनो किसम के इरखा या दुसमनी रहिस होही। काबर ते, इहाँ के ए सब जिनीस संग जतका दोगलाई करे गे हवय वइसन सिरिफ कोनो दुसमन-बैरीच ह कर सकथे, कोनो हितु-पिरितु अउ संगी-संगवारी मन नहीं।
आप मनला ए जान के आश्चर्य होही के जब कभू छत्तीसगढ़ी लेखन के शुरूवात के बात आथे, त झट ले सुंदर लाल शर्मा के नाम ले देथन, ए कहिके के प्रकाशित रूप म उंकर लिखे 'दान लीलाÓ ह सबले पहिली किताब आय। फेर ए बात ल कइसे भुला जाथन के उंकर ले कतकों बछर पहिली सन् 1885 म हीरालाल काव्योपाध्याय ह 'छत्तीसगढ़ी व्याकरणÓ लिखे रिहीन हें, जेमा व्याकरण के संगे-संग लोक गीत अउ साहित्य ल घलोक सकेले गे रिहीस हे। ए व्याकरण ल वो बखत के दुनिया के सबले बड़का व्याकरणाचार्य सर जार्ज ग्रियर्सन ह अंगरेजी म अनुवाद करके छत्तीसगढ़ी अउ अंगरेजी के समिलहा रूप म सन्् 1890 म छपवाए रिहिस हे।
इहाँ एक अउ बात के चरचा करना चाहथौं के जब सुंदर लाल शर्मा ले आगू निकले के बात होथे, त संत कबीर दास के बड़का चेला धनी धरम दास के बात करे जाथे, उंकर लिखे निरगुन भजन- 'जामुनिया के डार मोर टोर देव होÓ जइसन मन के उदाहरन दिए जाथे। ए ह बिलकुल दोगलाई के बात आय, काबर ते धरम दास के एको ठन रचना मनला छत्तीसगढ़ी के आरुग रूप के अंतर्गत नइ रखे जा सकय। उंकर रचना मन म मिश्रित भाषा के उपयोग करे गे हवय, जइसन कबीर दास जी ह अपन रचना मन म करयं। एकर सेती धरम दास ल छत्तीसगढ़ी के रचनाकार नइ माने जा सकय। अइसने अउ बहुत झन हें, जे मन छत्तीसगढ़ म रहयं भले फेर उन ब्रज, अवधी या खड़ी बोली म रचना करयं। हम जब छत्तीसगढ़ी के बात करथन, त आज के जेन छत्तीसगढ़ी के आरुग रूप हे तेकर बात करथन, अउ आज के रूप म सिरिफ हीरालाल जी के 'छत्तीसगढ़ी व्याकरणÓ ल ही प्रकाशित रूप म सबले जुन्ना किताब या लेखनी माने जा सकथे, अउ कोनो दूसर ल नहीं।
मैं ह इहाँ के मूल संस्कृति अउ इतिहास के बात हमेशा करथौं, अउ जम्मो जगा ए बात ल कहिथौं के इहाँ के साँस्कृतिक इतिहास ल, इहाँ जेन सृष्टिकाल या युग निर्धारण के हिसाब ले कहिन ते सतयुग के  संस्कृति ल नवा सिरा ले लिखे जाना चाही। जेन छत्तीसगढ़ ह आदिकाल ले बूढ़ादेव के रूप म सृष्टिकाल के संस्कृति ल जीथे, वोकर प्रचीनता ह सिरिफ रामायण अउ महाभारत (द्वापर-त्रेता) तक सीमित कइसे हो सकथे? बस्तर के लोकगीत म ए बात के जानकारी मिलथे के जब गणेश  जी ल प्रथमपूज्य के आर्शीवाद दे दिए जाथे, त वोकर बड़का भाई कार्तिक ह रिसा के दक्षिण भारत आ जाथे। कार्तिक ल मना के वापस हिमालय लेगे खातिर भगवान शंकर अउ देवी पार्वती ह सोला साल तक बस्तर म रहे हावयं। जब शिव जी ये छत्तीसगढ़ म रहे हावयं, त निश्चित रूप ले इहाँ के इतिहास ह वतका जुन्ना हे। त फेर अइसन काबर लिखे जाथे के इहाँ के इतिहास ह सिरिफ रामायण-महाभात काल तक सीमित हे।
ए तो जुन्ना बेरा के गोठ होइस अब कुछ आज के बात। इतिहास लेखन के जब गोठ करत हावन त आजो जेन लिखे जावत हे, तेला खलहारना जरूरी हावय, काबर ते आजो वइसनेच चाल चले जावत हे, जइसे पहिली चले गे रिहिसे। अभी कुछ दिन पहिली इहाँ रायपुर म छत्तीसगढ़ी  राजभाषा आयोग के कार्यक्रम होइस, जेमा इहाँ के साहित्यकार अउ पत्रिका के ऊपर जतका भी वक्ता मन बोलिन वोमा छत्तीसगढ़ी भाखा के एकमात्र संपूर्ण मासिक पत्रिका 'मयारु माटीÓ के नाम के उल्लेख एको झन वक्ता मन नइ करीन। अब एला का कहे जाना चाही? वक्ता मन के अधूरा ज्ञान ते जानबूझ के करे गे बदमासी। जबकि ए बात सोला आना सच आय के इहाँ पत्रिका के नाम म जतका भी पत्रिका निकले हे वोमा सिरिफ 'मयारु माटीÓ ल ही संपूर्ण पत्रिका कहे जा सकथे, बाकी अउ कोनो ल नहीं। बाकी मन कोनो कविता संकलन के रूप म निकलत हें, त कोनो कहानी अउ गद्य संकलन के रूप म। एक संपूर्ण पत्रिका के जेन मानक रूप होथे, वोमा कोनो ल पूर्ण रूप से नइ रखे जा सकय।
अइसने बात साहित्यकार मन के संबंध म घलोक हे, लेख लिखने वाला या सभा म वक्ता के रूप म बोलने वाला मन के जतका चिन-चिन्हार के होथे, तेकर मन के नाम ह तो बने जग-जग ले लिखे मिलथे, भले वोकर  रचना के स्तर ह खातू-कचरा किसम के राहय, फेर जे मन सहीं म बहुत अच्छा लिखत हावयं या पहिली लिखे हावयं वोकर मन के नाम ह कोनो मेर खोजे नइ मिलय। ए सबला का कहे जाना चाही? अज्ञानता, मूर्खता या बदमासी?
इहाँ के इतिहास लेखन म अंगरी उठाए के मोर जेन उद्देश्य हे, वो ह कोनो मनखे ल दोसी बताना नइए, फेर अतका जरूर हे के अइसन किसम के काम ल पूरा ईमानदारी अउ पूरा-पूरा जानकारी के आधार म होना चाही, मात्र सुने-सुनाय या अपन-बिरान के आधार म नइ करे जाना चाही। काबर ते इहाँ अइसन मनखे मन के संख्या जादा हावय, जेन मनला 'कौंवा लेगे कान लÓ कहि दे, त उन कान ल टमड़े ल छोड़ के कौंवा के पाछू भागे म अगुवा जाथें।
आज हीरालाल जी ल सुरता करत अउ गजब अकन गोठ करे के मन होवत हे, फेर अभी हर साल उंकर सुरता म ए कारज ल करना हे, तेकर सेती बाकी विषय मनला अउ अवइया बछर खातिर छोडऩा ह ठीक रइही।

सुशील भोले
संपर्क : 41-191, कस्टम कालोनी के सामने,
 डॉ. बघेल गली, संजय नगर (टिकरापारा)
रायपुर (छ.ग.) मोबा. नं. 098269 92811
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Monday, 18 February 2013

राजिम कुंभ बनाम राजिम मेला




छत्तीसगढ़ की संस्कृति मेला-मड़ाई की संस्कृति है, लेकिन यहां जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है, तब से यहां की संस्कृति में कुछ जोड़-तोड़ कर परिवर्तित किया जा रहा है। राजिम कुंभ भी इसी प्रकार की एक परिवर्तित संस्कृति का रूप धारण करता जा रहा है, जिसे उचित नहीं कहा जा सकता।
जहां तक मेला को कुंभ कहा जाना तो स्वीकार योग्य है, लेकिन उसके कारण को परिवर्तित किया जाना स्वीकार नहीं है। यहां यह याद रखा जाना चाहिए कि छत्तीसगढ़ में कार्तिक पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक जो मेला-मड़ई का आयोजन किया जाता है, यहां के तमाम सिद्ध शिव स्थलों पर ही किया जाता है। इसलिए हम यह प्राचीन समय से सुनते और देखते आ रहे हैं कि राजिम मेला कुलेश्वर महादेव के नाम पर भरने वाला मेला कहलाता था। लेकिन जब से इसे कुंभ के रूप में परिवर्तित नाम दिया गया है, तब से इसे राजीव लेचन के नाम पर भरने वाला कुंभ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जो कि यहां की मूल संस्कृति को समाप्त कर उसके ऊपर बाहरी संस्कृति को थोपने का षडयंत्र मात्र है।
मुझे लगता है कि राजीव लोचन नामकरण के पीछे  राजनीतिक षडयंत्र भी एक मुख्य कारण है। आप सब इस बात को जानते हैं कि राजीव लोचन भगवान राम का ही एक नाम है, और राम भारतीय जनता पार्टी का चुनावी एजेंडा है। शायद इसीलिए इस आयोजन को कुलेश्वर महादेव के स्थान पर राजीव लोचन के नाम पर भराने वाला प्रचारित किया जा रहा है।
मेरा प्रश्न है कि केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं अपितु पूरे देश में जो कुंभ का आयोजन होता है, वह केवल शिव स्थलों पर और उसी से संबंधित तिथियों पर आयोजित होता है, तब भला वह राजीव लोचन या राम के नाम पर आयोजित होने वाला कुंभ कैसे हो सकता है? राम के नाम पर तो अयोध्या में भी मेला या कुंभ नहीं भरता तो फिर राजिम में कैसे भर सकता है? वह भी महाशिवरात्रि के अवसर पर?
महाशिवरात्रि के अवसर पर लगने वाला मेला या कुंभ कुलेश्वर महादेव के नाम पर भरना चाहिए या राजीव लोचन के नाम पर?
मुझे छत्तीसगढ़ के तथाकथित बुद्धिजीवियों पर, उनके क्रियाकलापों पर आश्चर्य होता है। वे इस तरह की सांस्कृतिक विकृतियों पर कैसे खामोश रहकर सरकार की जी-हुजूरी में लगे रहते हैं।

 छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति के संबंध में अधिक जानकारी के लिए मेरे ब्लॉग-   - को या पुस्तक -आखर अंजोर - को भी पढ़ा जा सकता है।

सुशील भोले
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Wednesday, 13 February 2013

जय मां शारदे


        



जय मां शारदे.. मां शारदे.. मां शारदे,
सप्तसुरों को झंकृत कर दे, ज्ञान-कला भर दे। जय मां...

श्वेत हंस पर चढ़कर मैया,
        मेरे दर पर आजा।
अपनी वीणा के सरगम से,
        तन-मन ये झनकाजा।।
फिर गंूजे मेरा भी स्वर, यहां ऐसा कुछ कर दे। जय मां...



                                                                      -सुशील भोले

Tuesday, 12 February 2013

बसंत पंचमी और छत्तीसगढ़


                                                     
छत्तीसगढ़ में बसंत पंचमी के अवसर पर दो प्रमुख पर्वों का आयोजन होता है। एक तो ज्ञान और कला की देवी सरस्वती की जयंती का आयोजन होता है, जिसे पूरे देश में एक साथ मनाया जाता है। लेकिन दूसरा - तपस्यारत शिव की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव के आगमन स्वरूप होली दहन या काम दहन स्थलों पर अरंडी (अंडा) नामक पेड़ गाड़ा जाता है, जो कि संभवत: पूरे देश में केवल छत्तीसगढ़ में ही होता है।
यहां यह जान लेना आवश्यक है कि छत्तीसगढ़ में जो होली का पर्व मनाया जाता है, वह होलिका दहन के रूप में नहीं मनाया जाता, अपितु काम दहन या मदन दहन के रूप में मनाया जाता है। लेकिन यह दुखद है कि यहां की मूल संस्कृति को विकृत कर अन्य प्रदेशों की संस्कृति के साथ घालमेल कर लिखा जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में होली का पर्व बसंत पंचमी को अंडा (अरंडी) का पेड़ गाडऩे से लेकर फाल्गुन पूर्णिमा को शिव जी के द्वारा अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म करने तक अर्थात लगभग चालीस दिनों तक चलता। इस अवसर पर वासनात्मक शब्दों, दृश्यों और नृत्य-गीतों का बहुतायत में प्रयोग होता है, उसका असल कारण कामदेव द्वारा शिव तपस्या भंग करने के लिए अपनी पत्नी रति के साथ किये गये ऐसे ही दृश्यों का निर्माण करना है।
मेरा प्रश्न है- होलिका तो केवल एक दिन में ही चिता रचती है, उसमें बैठती है और स्वयं ही भस्म हो जाती है। फिर उसके लिए चालीस दिनों का पर्व मनाने का क्या कारण है? इस अवसर पर जो वासनात्मक नृत्य-गीतों का प्रयोग होता है उसका होलिका से क्या संबंध है?
अधिक जानकारी के लिए मेरे अन्य लेखों को या 'आखर अंजोरÓ नामक किताब को पढ़ा जा सकता है।
                                                                                                        (फोटो गूगल से साभार)

सुशील भोले
संपर्क : 41-191, कस्टम कालोनी के सामने,
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मयारू माटी के कुछ अंक


छत्तीसगढ़ी भाषा की एकमात्र संपूर्ण मासिक पत्रिका 'मयारु माटीÓ का विमोचन 9 दिसंबर 1987 को रायपुर के कुर्मी बोर्डिंग के सभाकक्ष में संध्या 7 बजे छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच के जन्मदाता दाऊ रामचंद्र देशमुख के मुख्य आतिथ्य एवं दैनिक नवभारत के स्थानीय संपादक कुमार साहू की अध्यक्षता में संपन्न हुआ था। इस अवसर पर कला मर्मज्ञ दाऊ महासिंग चंद्राकर विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थे। मयारु माटी के संपादक सुशील वर्मा (भोले), टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा, हरि ठाकुर, लक्ष्मण मस्तुरिया, सुशील यदु, पंचराम सोनी सहित बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यकार एवं प्रेमीजन उपस्थित थे।
'मयारु माटीÓ के कुछ अंकों के कव्हर पृष्ठ यहां प्रकाशित किये जा रहे हैं। विस्तृत जानकारी के लिए संपर्क किया जा सकता है।









Monday, 11 February 2013

संस्कृति के उजले पक्ष के लिए कार्य करें : कोदूराम


 छत्तीसगढ़ के एकमात्र शब्दभेदी बाण अनुसंधानकर्ता कोदूराम वर्मा राज्य निर्माण के पश्चात् यहाँ की मूल संस्कृति के विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों से संतुष्ट नहीं हैं। उनका मानना है कि यहाँ के नई पीढ़ी के कलाकारों की रुचि भी अपनी अस्मिता के गौरवशाली रूप को जीवित रखने के बजाय उस ओर ज्यादा है कि कैसे क्षणिक प्रयास मात्र से प्रसिद्धि और पैसा बना लिया जाए। इसीलिए वे विशुद्ध व्यवसायी नजरिया से ग्रसित लोगों के जाल में उलझ जाते हैं। 87 वर्ष की अवस्था पूर्ण कर लेने के पश्चात् भी कोदूराम जी आज भी यहाँ की लोककला के उजले पक्ष को जन-जन तक पहुँचाने के प्रयास में उतने ही सक्रिय हैं, जितना वे अपने कला जीवन के शुरूआती दिनों में थे। पिछले 13 अक्टूबर 2011 को धमतरी जिला के ग्राम मगरलोड में संगम साहित्य समिति की ओर से उन्हें ‘संगम कला सम्मान’ से सम्मानित किया गया, इसी अवसर पर उनसे हुई बातचीत के अंश यहाँ प्रस्तुत है-

0 कोदूराम जी सबसे पहले तो आप यह बताएं कि आपका जन्म कब और कहाँ हुआ? 
मेरा जन्म मेरे मूल ग्राम भिंभौरी जिला-दुर्ग में 1 अप्रैल 1924 को हुआ है। मेरी माता का नाम बेलसिया बाई तथा पिता का नाम बुधराम वर्मा है। 

0 अच्छा अब यह बताएं कि आप पहले लोककला के क्षेत्र में आए या फिर शब्दभेदी बाण चलाने के क्षेत्र में?

सबसे पहले लोककला के क्षेत्र में। बात उन दिनों की है जब मैं 18 वर्ष का था, तब आज के जैसा वाद्ययंत्र नहीं होते थे। उन दिनों कुछ पारंपरिक लोकवाद्य ही उपलब्ध हो पाते थे, जिसमें करताल, तम्बुरा आदि ही मुख्य होते थे। इसीलिए मैंने भी करताल और तम्बुरा के साथ भजन गायन प्रारंभ किया। चँूकि मेरी रुचि अध्यात्म की ओर शुरू से रही है, इसलिए मेरा कला के क्षेत्र में जो पदार्पण हुआ वह भजन के माध्यम से हुआ। 

0 हाँ, तो फिर लोककला की ओर कब आए? 
यही करीब 1947-48 के आसपास। तब मैं पहले नाचा की ओर आकर्षित हुआ। नाचा में मैं जोकर का काम करता था। 

0 अच्छा... पहले नाचा में खड़े साज का चलन था, आप लोग किस तरह की प्रस्तुति देते थे? 
हाँ, तब खड़े साज और मशाल नाच का दौर था, लेकिन हम लोग दाऊ मंदरा जी से प्रभावित होकर तबला हारमोनियम के साथ बैठकर प्रस्तुति देते थे। 

0 अच्छा... नाचा का विषय क्या होता था? 
 उस समय ब्रिटिश शासन था, मालगुजारी प्रथा थी, इसलिए स्वाभाविक था कि इनकी विसंगतियाँ हमारे विषय होते थे। 

0 आप तो आकाशवाणी के भी गायक रहे हैं, कुछ उसके बारे में भी बताइए? 
आकाशवाणी में मैं सन् 1955-56 के आसपास लोकगायक के रूप में पंजीकृत हुआ। तब मैं ज्यादातर भजन ही गाया करता था। मेरे द्वारा गाये गये भजनों में - ‘अंधाधुंध अंधियारा, कोई जाने न जानन हारा’, ‘भजन बिना हीरा जमन गंवाया’ जैसे भजन उन दिनों काफी लोकप्रिय हुए थे। अब भी कभी अवसर मिलता है, तो मैं इन भजनों को थोड़ा-बहुत गुनगुना लेता हूँ। मुझे इससे आत्मिक शांति का अनुभव होता है। 

0 अच्छा, आप लोक सांस्कृतिक पार्टी भी तो चलाते थे? 
हां चलाते थे... अभी भी चला रहे हैं ‘गंवई के फूल’ के नाम से। इसमें पहले 40-45 कलाकार होते थे, अब स्वरूप कुछ छोटा हो गया है। यह साठ के दशक की बात है। तब दाऊ रामचंद्र देशमुख की अमर प्रस्तुति ‘चंदैनी गोंदा’ का जमाना था, उन्हीं से प्रभावित होकर ही हम लोगों ने ‘गंवई के फूल’ का सृजन किया था। 

0 अच्छा.. यह बताएं कि तब की प्रस्तुति और अब की प्रस्तुति में आपको कोई अंतर नजर आता है? 
हाँ... काफी आता है। पहले के कलाकार स्वाधीनता आन्दोलन के दौर से गुजरे हुए थे, इसलिए उनमें अपनी माटी के प्रति, अपनी कला और संस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा थी, जो अब के कलाकारों में दिखाई नहीं देती। अब तो संस्कृति के नाम पर अपसंस्कृति का प्रचार ज्यादा हो रहा है। लोगों के अंदर से अपनी अस्मिता के प्रति आकर्षण कम हुआ है, और उनकी नजरिया पूरी तरह व्यावसायिक हो गयी है। निश्चित रूप से इसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। 

0 क्या यहाँ का शासन भी इस दिशा में उदासीन नजर आता है? 
पूरी तरह से तो नहीं कह सकते, लेकिन राज्य निर्माण के पश्चात जो अपेक्षा थी वह पूरी नहीं हो पा रही है। 

0 अच्छा... अब आपके उस विषय पर आते हैं, जिसके कारण आपको सर्वाधिक ख्याति मिली है। आप बताएं कि आपने शब्दभेदी बाण चलाना कैसे सीखा? 
ये उन दिनों की बात है जब मैं भजन गायन के साथ ही साथ दुर्ग के हीरालाल जी शास्त्री की रामायण सेवा समिति के साथ जुड़ा हुआ था। तब हम इस सेवा समिति के माध्यम से मांस-मदिरा जैसे तमाम दुव्र्यवसनों से मुक्ति का आव्हान करते हुए लोगों में जन-जागरण का कार्य करते थे। उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश से बालकृष्ण शर्मा जी आए हुए थे। जब शास्त्री जी रामायण का कार्यक्रम प्रस्तुत करते तो कार्यक्रम के अंत में बालकृष्ण जी से शब्दभेदी बाण का प्रदर्शन करने को कहते। बालकृष्ण जी इस विद्या में पूर्णत: पारंगत थे। वे आँखों पर पट्टी बांधकर 25-30 फीट की दूरी से एक लकड़ी के सहारे से घूमते हुए धागे को आसानी के साथ काट देते थे। मैं उनकी इस प्रतिभा से काफी प्रभावित हुआ और उनसे अनुरोध करने लगा कि वे मुझे भी इस विद्या में पारंगत कर दें। बालकृष्ण जी पहले तो ना-नुकुर करते रहे, फिर बाद में इन शर्तों के साथ मुझे इस विद्या को सिखाने के लिए तैयार हो गये कि मैं जीवन भर सभी तरह के दुव्र्यवसनों से दूर रहूँगा। मैं उनके साथ करीब तीन महीने तक रहा। इसी दरम्यान वे मुझे इस विद्या की बारीकियों को सीखाते, और मैं उन्हें सीखकर अपने घर में आकर उन्हें दोहराता रहता। इस तरह इस विद्या में मैं पारंगत हो गया। 

0 तो क्या आपने भी अन्य लोगों को इसमें पारंगत किया है? 
अभी तक तो ऐसा नहीं हो पाया है।
0 क्यों ऐसा नहीं हो पाया? 
असल में यह विद्या मात्र कला नहीं, अपितु एक प्रकार से साधना है। लोग इसे सीखना तो चाहते हैं, लेकिन साधना नहीं करना चाहते। इसे सीखने के लिए सभी प्रकार के दुव्र्यवसनों से मुक्त होना जरूरी है। मुझे कुछ संस्थाओं की ओर से भी वहाँ के छात्रों को धनुर्विद्या सीखाने के लिए कहा गया। मैं उन संस्थानों में गया भी, लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि मुझे खाली हाथ लौटना पड़ा। 

0 क्या आपको इस धनुर्विद्या के लिए शासन के द्वारा कभी सम्मानित किया गया है? 
नहीं धनुर्विद्या के लिए तो नहीं, लेकिन कला के लिए राज्य और केन्द्र दोनों के ही द्वारा सम्मानित किया गया है। केन्द्र सरकार द्वारा मुझे सन् 2003-04 में गणतंत्र दिवस परेड में करमा नृत्य प्रदर्शन के लिए बुलाया गया था, जिसमें मैं 65 बच्चों को लेकर गया था। इस परेड में हमारी कला मंडली को सर्वश्रेष्ठ कला मंडली का पुरस्कार मिला था, तथा मुझे ‘करमा सम्राट’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था। इसी तरह राज्य शासन द्वारा सन् 2007 में राज्योत्सव के दौरान कला के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए दिए जाने वाले ‘दाऊ मंदरा जी सम्मान’ से सम्मानित किया गया था। 

0 नई पीढ़ी के लिए कुछ कहना चाहेंगे? 
बस इतना ही कि वे अपनी मूल संस्कृति को अक्षण्णु बनाये रखने की दिशा में ठोस कार्य करें। 


सुशील भोले
संपर्क : 41-191, कस्टम कालोनी के सामने,
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