Friday, 9 January 2015

*आज मोर पारी हे* में सुशील भोले...

साधना न्यूज चैनल के लोकप्रिय कार्यक्रम *आज मोर पारी हे* के अंतर्गत प्रसारण के लिए गुरुवार 8 दिसंबर को वीडियो रिकार्डिग हुई... साधना न्यूज के स्टूडियो में कार्यक्रम संयोजक-वरिष्ठ पत्रकार अहफाज रशीद के साथ मैं....



Thursday, 8 January 2015

नाचा के पुरोधा मदन निषाद

(मदन निषाद, फोटो-गुरतुर गोठ ले)

दिन भर जांगर टोर मिहनत के सेती थके-मांगे मनखे के मनोरंजन खातिर हर युग म कोनो न कोनो साधन अवस कर के होवत रिहीसे। देश-काल के मुताबिक एमा बदलाव आवय, अउ एकर संगे-संग विषय-वस्तु घलोक बदलत जावय। आजादी के आंदोलन जब गुंगवा के भभके बर धर लिए रिहीसे, ठउका उही बेरा म छत्तीसगढ़ म एक लोक विधा के जनम होइस, जेला नाचा नांव दे गइस। राजनांदगांव के दाऊ मंदरा जी ल ए नाचा विधा के जनमदाता माने जाथे। जेन ह उन्नीसवीं सदी के तीसरा दशक म ए विधा ल जनरंजन के संगे-संग जनजागरण के माध्यम बनाइन।

दाऊ मंदरा जी के ही बेरा म एक अउ प्रतिभा के जनम होइस जेला मदन निषाद के नांव ले छत्तीसगढ़ के संगे-संग पूरा देश के लोककला प्रेमी जनता जानथें। जिला राजनांदगांव के डोंगरगांव तीर के गांव बिटाल म 2 फरवरी सन 1914 म मदन निषाद के जनम होइस। फेर भाग के लेखा वोला मात्र चार बछर के उमर म ही राजनांदगांव के मोहरा गांव म ले आइस। बताथें के वो बखत के परे दुकाल के सेती वोकर जनम भूमि बिटाल म रोजी-रोटी के बिकराल समस्या उत्पन्न होगे, इही पाय के वोकर पूरा परिवार ल मोहरा म बसे ले परगे।

बिटाल के आके मोहरा म बसे के एक फायदा ए होइस के मदन ल लइकईच उमर ले कलाकार मन के संगती मिल गे। मदन तो जनम जात कलाकार रिहीसे। कहिथें न के होनहार पूत के पांव पालनच म दिख जाथे। ठउका इही बानी वोकर भीतर के कलाकार ह लइकईच म दिखे बर धर लिए रिहीसे, तभे तो गांव के नाचा मंडली वाले मन आठ-नौ बछर के उमर म ही वोला अपन मंडली म शामिल कर लिए रिहीन हें। मोहरा गांव के ये नाचा मंडली म मदन के बड़े भाई ईतवारी निषाद घलो कलाकारी करय।

बीसवीं शताब्दी के तीस-चालीस के दशक म छत्तीसगढ़ म शिक्षा के अंजोर वतेक बगर नइ पाये रिहीसे, एकरे सेती वो बेरा म कोनो भी किसम के नाचा-गम्मत या मनोरंजन के अउ दिगर माध्यम म कोनो भी घर के सियान मन नारी परानी मनला वोमा भाग नइ लेवन देवत रिहीन हें। एकरे सेती अइसन जब कोनो उदिम करे जाय, त नारी पात्र के भूमिका ल पुरुष मन द्वारा ही पूरा करे जाय। मदन निषाद के अभी केंवची उमर रिहीसे। एकरे सेती वोला नजरिया (महिला पात्र) के भूमिका खातिर जोंगे गीस।

जेन लइका ह अभिमन्यू बरोबर महतारी के कोंख ले कलाकारी के ज्ञान ले के आए रिहीसे, वोला भला नजरिया या परी के रोल निभाए म कतेक बेरा लागतीस। छीन काहत वो नाचे अउ गाये बर सीखगे। वो नारी के भूमिका म अतेक बूडग़े के नारी मन के जीवन-चरित्र मन ऊपर आधारिज प्रहसन खुदे बनाये लागीस। वइसे घलोक वो दौर म नारी मन ऊपर आधारित प्रहसन मन के जादा मांग रहय, एकरे सेती वो ह मछरी वाली, डउकी के झगरा, केंवटीन-मरारीन, ठग्गू बइगा, बासी मंगइया, बइहा, सउत जइसे कतकों अकन प्रेरक अउ मनोरंजक प्रहसन बना डारीस।

नाचा के ये गम्मत मन न सिरिफ मनोरंजक होवय भलुक सामाजिक, आर्थिक अउ राजनैतिक जागरण के काम घलोक करयं, ए जगा ए बात ल बताना जरूरी लागत हे के द्वितीय विश्व युद्ध के खलबलावत बेरा म दुरुग जिला के आमदी गांव म रवेल वाले दाऊ मंदराजी के नाचा ल बंद कराये खातिर फिरंगी पुलिस पहुंचगे रिहीसे। काबर ते गम्मत के बीच म जेन गीत गाये जाथे वोमन म आजादी के गीत घलोक रहय। संग म संवाद मन घलोक अइसन भाव लिए रहय।

ये जुझारू बेरा के आवत ले मदन निषाद 20 बछर के बांका जवान होगे रिहीसे। मेछा के रेख गढ़ाए ले धर लिए रिहीसे, एकरे सेती अब वो परी के पाठ करई ल छोड़ के जोक्कड़ के पाठ करे लागीस। वइसे तो परी के पाठ करत ही श्रेष्ठ कलाकार के रूप म वोकर नांव के डंका बाजे बर धर लिए रिहीसे, फेर जोक्कड़ बने के बाद तो महानायक के श्रेणी म शामिल होगे। ठउका इही बखत ले वो ह नाचा के पितृपुरुष दाऊ मंदराजी संग शमिलहा कलाकारी करे लागीस। मंदराजी के रवेली अउ मदन के रिंगनी नाचा पार्टी के विलय होगे, तब एकर मन के शमिलहा नांव बनीस रवेली- रिंगनी साज। ये रवेली-रिंगनी साज ह अपन बेरा म भारी धूम मचाइस। वो बखत मदन अउ लालू के जोड़ी ह भारी चर्चित रिहीस।

जेन बखत नाचा ल खड़े साज, माने तबला, हारमोनिम, अउ चिकारा आदि बाजा-रुंजी मनला कनिहा म बांध के खड़े होके नाचयं, अंजोर खातिर माटी तेल म बोरे बरत मशाल ल धरे रहयं, वो बेरा म ये रवेली-रिंगनी साज जगा बड़े-बड़े नाटक थियेटर जइसन साजो समान रिहीसे। एकर मन जगा खुद के लाईट, माईक अउ जनरेटर रिहीसे। वो समय म नाचा ह पूरा रात भर चलय अउ बेरा जब पंगपंगाये ले धरय तहांले दर्शक मन अपन-अपन घर के काम-बुता के ओखा म भरभरा के उसले बर धर लोवयं एकरे सेती मदन निषाद ह ठउका मुंदरहा के पंचबज्जी के बेरा अइसे जोरदार गम्मत चालू करय ते लोगन वोकर सिरावत ले, माने सात-आठ के बजत ले बइठे रहि जावयं। मदन के कलाकारी म अतका आकर्षण रिहीसे, के लोगन अपन काम-बुता ल घलोक भुला जावयं।

वोकर अभिनय क्षमता अद्भुत रिहीसे, जेन समय म जनाना या परी बनय, त वोकर अंग-प्रत्यंग ले कोनो किसम ले अइसे नइ जनावय के वो असल म कोनो पुरुष आय। अइसने जब वो जोक्कड़ के पाठ करे लागीस त पुरुष पात्र के जम्मो ऊंचाई ल छुइस। जब वो बिलई ताके मुसवा बारी म सपट के गीत ल गावय त वोकर जम्मो हाव-भाव ल घलोक प्रदर्शित करय। वो एक अकेला बिलई के अउ मुसवा के वो सबो दृश्य ल जीवन्त कर देवय, जेन वो गीत के भीतर समाए रहय। अइसने हर गीत अउ दृश्य मन ल जीवन्त करय।

सन 1958 म वो ह अपन मंडली संग रायपुर के पं. माधव राव सप्रे स्कूल म अपन अभिनय के जौहर देखाइस, जिहां प्रसिद्ध रंगकर्मी अउ नाट्य निर्देशक हबीब तनवीर के मन-अंतस म वोकर अभिनय उतरगे। एकरे साथ वोकर जुड़ाव हबीब के संस्था नया थियेटर संग होगे, अउ फेर तहांले वोकर कलाकारी ह छत्तीसगढ़ के सीमा ल लांघ के देश-विदेश म अपन सफलता के परचम लहराए लागीस। वो ह हबीब तनवीर संग सन 1975 तक सरलग जुड़े रिहीस। वोकर निर्देशन म मिट्टी की गाड़ी, रूस्तम-सोहराब, मिर्जा सोहरत, आगरा बाजार, चार भाई चना, कुस्तियों का चपरासी, चरण दास चोर, गांव के नाम दमांद मोर नाम ससुर आदि मुख्य नाटक मन म काम करीस।

हबीब तनवीर के छोड़े अउ आने निर्देशक मन संग घलो मदन निषाद ह काम करे हे, एमा त्रिपुरारी शर्मा के निर्देशन म बिरसा मुंडा, राम हृदय तिवारी के निर्देशन म लोरिक चंदा, लक्ष्मण चन्द्राकर के निर्देशन म हरेली, दीपक चंद्राकर के निर्देशन म गम्मतिहा आदि प्रमुख हे।

ए नाटक के संगे-संग कई ठन धारावाहिक अउ फिलिम मन म घलोक काम करे हवय। देश के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल संग घलोक काम करे के अवसर मदन ल मिले हे, उंकर निर्देशन म बने फिलिम 'मैसी साहब* म अभिनय कर के वोहर मुंबई के बॉलीवुड ल घलोक अपन जौहर के जलवा देखाए हे।

वोकर कला जीवन के लम्बा अनुभव अउ योगदान ल देखत मध्यप्रदेश शासन ह सन 1988 म तुलसी सम्मान ले वोला सम्मानित करे रिहीसे।

जीवन के आखिरी बेरा तक कला-देवी के उपासना करइया मदन निषाद ह 19 फरवरी सन 2005 के ये नश्वर शरीर ल छोड़ के कला के देवी म ही समाहित होगे।

कहिथें न के विराट पुरुष मन सिरिफ अपन चोला बदलथें, अपन आत्मा अउ अनुभव ल अवइया पीढ़ी ल अरपित कर देथें। मदन निषाद घलोक अपन आत्मा अउ अनुभव ल गोविंद निर्मलकर जइसन कतकों ये रस्ता के रेंगइया मनला अरपित कर दिस, जेकर परसादे गोविंद निर्मलकर ल पद्मश्री जइसन प्रतिष्ठापूर्ण सम्मान ले सम्मानित करे गीस।

नाचा के रूप खड़े साज ले होवत सांस्कृतिक मंच अउ आर्केस्टा तक पहुंचगे हवय, फेर जब तक ए हर जिंदा रइही, अपन मनोरंजन के माध्यम ले लोगन के पीरा हरत रइही, तब तक मदन निषाद जइसन नाचा के पुरोधा मन अमर रइहीं।

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com

Sunday, 4 January 2015

छेरछेरा...


छत्तीसगढ़ में पौस माह की पूर्णिमा तिथि को *छेरछेरा* का जो पर्व मनाया जाता है, वह भगवान शिव द्वारा पार्वती के घर जाकर भिक्षा मांगने के प्रतीक स्वरूप मनाया जाने वाला पर्व है।
आप सभी को यह ज्ञात है कि पार्वती से विवाह पूर्व भोलेनाथ ने कई किस्म की परीक्षाएं ली थीं। उनमें एक परीक्षा यह भी थी कि वे नट बनकर नाचते-गाते पार्वती के निवास पर भिक्षा मांगने गये थे, और स्वयं ही अपनी (शिव की) निंदा करने लगे थे, ताकि पार्वती उनसे (शिव से) विवाह करने के लिए इंकार कर दें।
छत्तीसगढ़ में जो छेरछेरा का पर्व मनाया जाता है, उसमें भी लोग नट बनकर नाचते-गाते हुए भिक्षा मांगने के लिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ के मैदानी भागों में तो अब नट बनकर (विभिन्न प्रकार के स्वांग रचकर) नाचते-गाते हुए भिक्षा मांगने जाने का चलन कम हो गया है, लेकिन यहां के बस्तर क्षेत्र में अब भी यह प्रथा बहुतायत में देखी जा सकती है। वहां बिना नट बने इस दिन कोई भी व्यक्ति भिक्षाटन नहीं करता।
ज्ञात रहे इस दिन यहां के बड़े-छोटे सभी लोग भिक्षाटन करते हैं, और इसे किसी भी प्रकार से छोटी नजरों से नहीं देखा जाता, अपितु इसे पर्व के रूप में देखा और माना जाता है। और लोग बड़े उत्साह के साथ बढ़चढ़ कर दान देते हैं। इस दिन कोई भी व्य्क्ति किसी भी घर से खाली हाथ नहीं जाता। लोग आपस में ही दान लेते और देते हैं।
इस छेरछेरा पर्व के कारण यहां के कई गांवों में कई जनकल्याण के कार्य भी संपन्न हो जाते हैं। हम लोग जब मिडिल स्कूल में पढ़ते थे, तब हमारे गुरूजी पूरे स्कूल के बच्चों को बैंडबाजा के साथ पूरे गांव में भिक्षाटन करवाते थे, और उससे जो धन प्राप्त होता था, उससे बच्चों के खेलने के लिए और व्यायाम से संबंधित तमाम सामग्रियां लेते थे।
मुझे स्मरण है, हमारे गांव में कलाकारों की एक टोली थी, जो इस दिन पूरे रौ में होती थी। मांदर-ढोलक और झांझ-मंजीरा लिए जब नाचते-गाते, डंडा के ताल साथ कुहकी पारते (लोकनृत्य में यह एक शैली है ताल के साथ मुंह से आवाज निकालने की इसे ही कुहकी पारना कहते हैं) यह टोली निकलती थी तो लोग उन्हें दान देने के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा करते थे। उस टोली को अपने यहां आने का अनुरोध करते थे। छेरछेरा का असली रूप और असली मजा ऐसा ही होता था, जो अब कम ही देखने को मिलता है।
ज्ञात रहे कि छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति, जिसे मैं आदि धर्म कहता हूं वह सृष्टिकाल की संस्कृति है। युग निर्धारण की दृष्टि से कहें तो सतयुग की संस्कृति है, जिसे उसके मूल रूप में लोगों को समझाने के लिए हमें फिर से प्रयास करने की आवश्यकता है, क्योंकि कुछ लोग यहां के मूल धर्म और संस्कृति को अन्य प्रदेशों से लाये गये ग्रंथों और संस्कृति के साथ घालमेल कर लिखने और हमारी मूल पहचान को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।
मित्रों, सतयुग की यह गौरवशाली संस्कृति आज की तारीख में केवल छत्तीसगढ़ में ही जीवित रह गई है, उसे भी गलत-सलत व्याख्याओं के साथ जोड़कर भ्रमित किया जा रहा। मैं चाहता हूं कि मेरे इसे इसके मूल रूप में पुर्नप्रचारित करने के सद्प्रयास में आप सब सहभागी बनें...।
सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com

Friday, 2 January 2015

धुर्रा-गर्दा ल झटकारे के जरूरत..

मोला जब ले ये बात के जानबा होइस के इहां भगवान भोलेनाथ ह माता पार्वती संग सोला साल तक रहिके अपन जेठ बेटा कार्तिकेय ल वापस कैलाश लेगे खातिर डेरा डार के बइठे रिहीसे तब ले मोर मन म ए गुनान चालू होगे के त फेर आज हमन ल छत्तीसगढ़ी के जेन इतिहास देखाए जावत हे, वोहर आधा-अधूरा अउ बौना हे, जेला फेर नवा सिरा ले लिखे के जरूरत हे।

अभी तक इहां बगरे किताब मन के माध्यम ने सिरिफ अतके जान पाये रेहेन के छत्तीसगढ़ के इतिहास ह रमायन अउ महाभारत कालीन हे। फेर अब जानेन के सिरिफ अतके नहीं भलुक ए माटी के जुन्ना इतिहास सृष्टिकाल संग जुड़े हे, जेला युग निर्धारण के दृष्टि ले सतयुग घलोक कहि सकथन। त फेर मन म इहू बात उपजथे के इहां जे मनला  हमन इतिहासकार के रूप म जानथन वो मन ए सब बात ल काबर नइ लिखिन? त एक बात झक ले आगू म आ जथे के इहां जतका भी इतिहासकार होए हें, उन सबो के ज्ञान के स्रोत उत्तर भारत ले आये धारमिक ग्रंथ मन रेहे हें, एकरे सेती उन उहां ले जुड़े घटना संग जोड़ जाड़ के छत्तीसगढ़ के इतिहास ल लिख दिए हें। तभे तो वो इतिहास लेखन ह इहां के मूल संस्कृति अउ धारमिक रीति रिवाज संग जोड़ के देख ले त अन्ते-तन्ते जनाथे।

इहां के गांव-गांव अउ घर-घर म बूढ़ा देव, ठाकुर देव, साड़हा देव, शीतला दाई जइसन देवी-देवता काबर मिलथे। राम अउ कृष्ण संग जुड़े  संस्कृति या ए मनला कुल देवता के रूप म काबर नइ पाये जाय? कहूं छत्तीसगढ़ के धारमिक अउ सांस्कृतिक इतिहास सिरिफ रमायन अउ महाभारत कालीन तक सीमित होतीस त निश्चित रूप ले राम अउ कृष्ण ह इहां घरों-घर म कुल देवता के रूप म बिराजे रहितीस। फेर अइसन नइहे छत्तीसगढ़ ह सतयुग माने भगवान भोलेनाथ के संस्कृति ल जीथे तेकर असल कारन हे ये माटी के इतिहास ह सतयुग माने सृष्टिकाल तक जुन्ना हे। जेला फिर से लिखे-पढ़े के जरूरत हे।

बस्तर म एक लोक गीत मिलथे जेकर मुताबिक भगवान भोलेनाथ अउ माता पार्वती ह अपन जिनगी के सोला साल तक इहां रिहिन हें। अइसे कहे जाथे के उन इहां रहिके अपन जेठ बेटा कार्तिकेय ल कैलाश लेगे खातिर मनावत रिहीन हें। हमन ल धरम ग्रंथ के माध्यम ले ए जानकारी मिलथे के भगवान गणेश ल वोकर चतुराई अउ तेज बुद्धि के सेती प्रथम पूज्य के आशीर्वाद दे दिए गे रिहीसे, तेकरे सेती आज घलो जम्मो किसम के धरम-करम के कारज म हमन गणेश के ही सबले पहिली पूजा करथन। इही प्रथम पूज्य के आशीर्वाद के सेती वोकर बड़का भाई कार्तिकेय ह रिसा के दक्षिण भारत म आके रेहे बर धर लिए रिहीसे। तब भगवान भोलेनाथ अउ माता पार्वती ह वापिस कैलाश लेगे खातिर छत्तीसगढ़ के बस्तर म आके सोला बछर तक रिहिन हें।
निश्चित रूप ले एहर छत्तीसगढ़ खातिर गौरव के बात आय। शायद, एकरे सेती इहां के जम्मो संस्कृति म शिव अउ शिव परिवार ह रचे-बसे हावय। अपन लेख मन  म मैं ह इहां के मूल संस्कृति अउ धरम के कतकों पइत चरचा कर डारे हावौं जेकर ले ए बात साबित हो जाथे के हमर इतिहासकार अउ संस्कृति मर्मज्ञ मन हमन ला इहां के मूल संस्कृति अउ इतिहास के बलदा उत्तर भारत ले आए ग्रंथ अउ संस्कृति मन के मापदण्ड म चुरो-पको के उहां के रूप म इहां के संस्कृति अउ इतिहास ल देखाए -बताए हें।

ए बात ल सबो जानथें के इहां के मूल निवासी मन शिक्षा ले, पढ़ई-लिखई ले कतकों कोस दुरिहा रिहीन हें। एकरे सेती उन अपन गौरवशाली संस्कृति अउ इतिहास ल नइ लिख पाइन। इही बात के फायदा उठावत बाहिर ले आके इहां बसे मनखे मन अपन संग वोती ले लाने संस्कृति अउ इतिहास ल इहां के रूप म लिख-पढ़ के रख दिन। इही कटु सत्य आय जेकर सेती इहां के मूल संस्कृति अउ इतिहास ह किताब म बगरे संस्कृति अउ इतिहास ले अलग दिखथे। अब जब इहां के मूल निवासी मन घलो पढ़-लिख डारे हें, अउ संग म ए समझ डारे हें, के हमला जेन बताए अउ पढ़ाए जावत हे, वो हर हमर नहीं भलुक आने क्षेत्र के संस्कृति अउ इतिहास आय त निश्चित रूप ले वो बाहिर के संस्कृति अउ इतिहास ल अपन-अपन मुड़ ले उतार के इहां के मूल संस्कृति, गौरव अउ इतिहास ल अपन-अपन मुड़ म चढ़ाना चाही, अपन ल मानना चाही।

सुशील भोले
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल -  sushilbhole2@gmail.com

Wednesday, 31 December 2014

नव वर्ष की शुभकामनाएं...

नया वर्ष आपके जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली लेकर आये...शुभकामनाएं...

                                                                                                          * सुशील भोले *  

Tuesday, 30 December 2014

भोरमदेव का मंड़वा महल...

एेसा कहा जाता हैं कि इस मंदिर को बनवाने वाले राजा ने शादी में उपहार स्वरूप दिया था..  इसीलिए यहां मंदिर की दीवारों पर यौन प्रतिमाएं बहुतायत में उकेरी गई हैं।

Saturday, 27 December 2014

भोरम देव का झील....

छत्तीसगढ़ के खजुराहो के नाम से प्रसिद्ध भोरम देव मंदिर परिसर में प्रवेश करने के पहले ही एक खूबसूरत झील है.. छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल की ओर से आजकल इसमें बोटिंग की व्यवस्था की गई है। कभी बोटिंग का भी मजा लीजिये...


मंदिर परिसर के पहले उद्यान बनाया गया है, यह उसका प्रवेश द्वार है...