Wednesday, 30 September 2015

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में छत्तीसगढ़ी...

छत्तीसगढ़ राज्य से प्रसारित होने वाले  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कई चैनल  छत्तीसगढ़ी भाषा में भी समाचार तथा कुछेक अन्य कार्यक्रम प्रस्तुत करने लगे हैं। सबसे पहले तो उन्हें साधुवाद, यहाँ की जनभाषा को प्रसारण का माध्यम बनाने के लिए, साथ ही एक अनुरोध भी कि वे भाषा के स्तर और शुद्धता को सुधारें। समाचारों के साथ दिखाए जाने वाले कैप्शन को भी ठीक करें। हिन्दी या अंगरेजी भाषा के शब्दों को छत्तीसगढी करण करने के लिए अनावश्यक रूप से टोड़ें-मरोड़े नहीं... और हो सके तो नागरी लिपि के सभी वर्णौं का प्रयोग करें। ज्यादा अच्छा होगा कि सभी चैनल वाले छत्तीसगढ़ी के अच्छे जानकारों को अपने साथ जोड़े। हम लोग छत्तीसगढ़ी में बनने वाली फिल्मों के लिए जिस तरह से आलोचनात्मक  शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, वैसा  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए ना करना पड़े तो बहुत अच्छा होगा।

धन्यवाद,
सुशील भोले
मो. 080853-05931, 098269-92811

झालर उतरही बाबू के....










झालर उतरही बाबू के, फूफू लेही सकेल
मरदनिया तो छूरा टेंवत, पाछू देथे ढकेल
कहिथें कोंख ले महतारी के जे चूंदी ह आथे
झोंक के अंचरा म वोला नंदिया म देही झेल
सुशील भोले
मो. 080853-05931, 098269-92811

Sunday, 27 September 2015

पितर पाख के.....














बरा-बोबरा संग चुरे हे आज तो गुरहा चीला
नंगत झड़कबोन हम सिरतो जम्मो माईपिला
पितर पाख के तेरस के बबा धमकही पक्का
रहिथें पुरखन पाख भर देखाथें अपन लीला

 सुशील भोले
 मो. 080853-05931, 098269-92811

Saturday, 26 September 2015

तीरथगढ़ के झरने ...

तीरथगढ़ के झरने छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले में कांगेर घाटी पर स्थित हैं। ये झरने जगदलपुर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में 35 कि.मी. की दूरी पर हैं। "कांगेर घाटी के जादूगर" के नाम से मशहूर तीरथगढ़ झरने भारत के सबसे ऊँचे झरनों में से हैं। छत्तीसगढ़ के सबसे ऊंचे जलप्रपात में इसे गिना जाता है। यहां 300 फुट ऊपर से पानी नीचे गिरता है। कांगेर और उसकी सहायक नदियां 'मनुगा' और 'बहार' मिलकर इस सुंदर जलप्रपात का निर्माण करती हैं।
तीरथगढ़ के झरने 

तीरथगढ़ जलप्रपात 

लेखक सुशील भोले कांगेर घाटी पर जहां यह जल प्रपात स्थित है

Friday, 25 September 2015

छत्तीसगढ़ में सांस्कृतिक आन्दोलन की आवश्यकता....

किसी भी राज्य की पहचान वहां की भाषा और संस्कृति के माध्यम से होती है। इसी को आधार मानकर इस देश में भाषाई एवं सांस्कृतिक आधार पर राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापन की गई थी, और नये राज्यों का निर्माण भी हुआ।

छत्तीसगढ़ को अलग राज्य के रूप में स्वतंत्र अस्तित्व में आये 15 वर्ष होने वाला है। लेकिन अभी भी उसकी स्वतंत्र भाषाई एवं सांस्कृतिक पहचान नहीं बन पाई है। स्थानीय स्तर पर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की स्थापना कर छत्तीसगढ़ी को हिन्दी के साथ राजभाषा के रूप में मान्यता दे दी गई है, लेकिन अभी तक उसका उपयोग केवल खानापूर्ति कर लोगों को ठगने के रूप में ही किया जा रहा है। यहां के राजकाज या शिक्षा में इसकी कहीं कोई उपस्थिति नहीं है।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान के क्षेत्र में तो और भी दयनीय स्थिति है। यहां की मूल संस्कृति की तो कहीं पर चर्चा ही नहीं होती। अलबत्ता यह बताने का प्रयास जरूर किया जाता है, कि अन्य प्रदेश से लाये गये ग्रंथ और उस पर आधारित संस्कृति ही छत्तीसगढ़ की संस्कृति है।

छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया के नाम पर यहां समय-समय पर आन्दोलन होते रहे हैं, और आगे भी होते रहेंगे। लेकिन एक बात जो अधिकांशतः देखने में आयी, वह यह कि कुछ लोग इसे राजनीतिक चंदाखोरी के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करते रहे। जब राजनीतिक स्थिति डांवाडोल दिखती तो छत्तीसगढ़िया का नारा बुलंद करने लगते, और रात के अंधेरे में उन्हीं लोगों से पद या पैसा की दलाली करने लगते, जिनके कारण मूल छत्तीसगढ़िया आज भी उपेक्षित है।

आश्चर्यजनक बात यह है कि आज तक इस राज्य में यहां की मूल संस्कृति के नाम पर कहीं कोई आन्दोलन नहीं हुआ है। जो लोग छत्तीसगढ़िया या छत्तीसगढ़ी भाषा के नाम पर आवाज बुलंद करते रहे हैं, एेसे लोग भी संस्कृति की बात करने से बचते रहे हैं। मैंने अनुभव किया है, कि ये वही लोग हैं, जो वास्तव में आज भी जिन प्रदेशों से आये हैं, वहां की संस्कृति को ही जीते हैं, और केवल भाषा के नाम छत्तीसगढ़िया होने का ढोंग रचते हैं। जबकि यह बात सर्व विदित है कि किसी भी राज्य या व्यक्ति की पहचान उसकी संस्कृति ही होती है।

एेसे लोग एक और बात कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के मूल निवासी तो केवल आदिवासी हैं, उसके बाद जितने भी यहां हैं वे सभी बाहरी हैं, तो फिर यहां की मूल  संस्कृति उन सभी का मानक कैसे हो सकती है? एेसे लोगों को मैं याद दिलाना चाहता हूं कि यहां पूर्व में दो किस्म के लोगों आना हुआ है। एक वे जो यहां कमाने-खाने के लिए कुदाल-फावड़ा लेकर आये और एक वे जो  जीने के साधन के रूप में केवल पोथी-पतरा लेकर आये। जो लोग कुदाल-फावड़ा लेकर आये वे धार्मिक- सांस्कृतिक रूप से अपने साथ कोई विशेष सामान नहीं लाए थे, इसलिए यहां जो भी पर्व-संस्कार था, उसे आत्मसात कर लिए। लेकिन जो लोग अपने साथ पोथी-पतरा लेकर आये थे, वे यहां की संस्कृति को आत्मसात करने के बजाय अपने साथ लाये पोथी कोे ही यहां के लोगों पर थोपने का उपक्रम करने लगे, जो आज भी जारी है।  इसीलिए ये लोग आज भी यहां की मूल संस्कृति के प्रति ईमानदार नहीं हैं।

जहां तक भाषा की बात है, तो  भाषा को तो कोई भी व्यक्ति कुछ दिन यहां रहकर सीख और बोल सकता है। हम कई एेसे लोगों को देख भी रहे हैं, जो यहां के मूल निवासियों से ज्यादा अच्छा छत्तीसगढ़ी बोलते हैं, लेकिन क्या वे यहां की संस्कृति को भी जीते हैं? उनके घरों में जाकर देखिए वे आज भी वहीं की संस्कृति को जीते हैं, जहां से लोटा लेकर आये थे। एेसे में उन्हें छत्तीसगढ़िया की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है ? एेसे लोग यहां की कुछ कला को जिसे मंच पर प्रस्तुत किया जाता है, उसे ही संस्कृति के रूप में प्रचारित कर लोगों को भ्रमित करने की कुचेष्ठा जरूर करते हैं। जबकि संस्कृति वह है, जिसे हम संस्कारों के रूप में जीते हैं, पर्वों के रूप में जीते हैं।

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है, कि हम अपनी मूल संस्कृति को जानें, समझें, उसकी मूल रूप में पहचान कायम रखने का प्रयास करें और उसके नाम पर पाखण्ड करने वालों के नकाब भी नोचें। छत्तीसगढ़ी या छत्तीसगढ़िया आन्दोलन तब तक पूरा नहीं सकता, जब तक उसकी आत्मा अर्थात संस्कृति उसके साथ नहीं जुड़ जाती।

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com

Thursday, 24 September 2015

आज बड़ा अलकरहा होगे.....











आज बड़ा अलकरहा होगे, कोंदा टूरा लपरहा होगे
रिंंगी-चिंगी मन हीरा-मोती, टन्नक माल बजरहा होगे....
हमर गांव म देवता-धामी, अउ सरग बरोबर डेरा हे
तभो ले कइसे सूत-उठके, दरुहा मन के फेरा हे
ज्ञानी-ध्यानी जकला-भकला, पोथी पढ़इया अड़हा होगे.....
आज देश के हवा बदलगे, धरती के जम्मो पेड़ उजरगे
एसी-फ्रीज के चक्कर म, तन म कतकों रोग संचरगे
बड़े बिहनिया ले दंड-पेलइया, पहलवान बीमरहा होगे....
धरम-करम के साफा बांधे, अब तो भोगी, जोगी हे
सतयुग के आभा देखाथे, फेर मन के बिल्कुल रोगी हे
झकझक ले कपड़ा चमकाये, उज्जर रूप कजरहा होगे...
सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com

Wednesday, 23 September 2015

अब छेरी चराथन गांव म...














ममता माया जया अउ सुषमा, सब रहिथन एकेच ठांव म
सोनिया घलो संघरगे हावय, अब छेरी चराथन गांव म...
दाई-ददा मन स्कूल के बदला, भेजीन हमला खार म
बरदिहा के पाछू किंजरत, कभू जावन नदी-कछार म
हर्रो-हर्रो चिचियावत गोई, कांटा गड़ जावय पांव म.....
हमूं कहूं थोरको पढ़तेन त, राजनीति म अव्वल रहितेन
हमरे सहीं नांव वाली कस, अलग-अलग झंडा धरतेन
तब छेरी-भेंड़ी कस मनखे के रेला, गिरतीन हमरो पांव म....
सुशील भोले 
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मो.नं. 080853-05931, 098269-92811
ई-मेल - sushilbhole2@gmail.com