Saturday, 13 February 2016
Friday, 12 February 2016
Friday, 5 February 2016
Monday, 1 February 2016
इतिहास लेखन की सत्यता...
इतिहास के नाम पर छत्तीसगढ़ में जितने भी लेखन हुए हैं, उनमें से किसी को भी निष्पक्ष और सत्यता के मापदण्ड पर खरा नहीं माना जा सकता. मैं हमेशा कहता रहा हूँ कि यहां के मूलधर्म और संस्कृति के साथ ही साथ तमाम ऐतिहासिक लेखन को एक निष्पक्ष समिति के माध्यम से पुर्नलेखन किया जाना आवश्यक है.
अभी-अभी एक ताजातरीन किताब हाथ में आयी है- "छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन का इतिहास" छत्तीसगढ़ी सेवा मंडल, छत्तीसगढ़ी भवन हांडीपारा रायपुर द्वारा प्रकाशित इस किताब के संपादक मंडल में जागेश्वर प्रसाद, जी.पी. चंद्राकर, दीनदयाल वर्मा एवं अनिल दुबे के नाम अंकित हैं. कुल 290 पृष्ठों वाली किताब का मूल्य 90 रुपए है.
चूंकि हम लोग भी छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन, भाषा और संस्कृति आंदोलन से जुड़े रहे हैं, इसलिए इच्छा हुई कि इस किताब को पूरा पढ़ा जाए. लेकिन पुस्तक को पढऩे के बाद घोर निराशा इसलिए हुई, क्योंकि इस "छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन का इतिहास" नामक किताब में एक अकेली छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी ने जो आंदोलन किया है, केवल उसके ही बारे में लिखा गया है. एक अकेली पार्टी के द्वारा किया गया, आंदोलन, संपूर्ण राज्य आंदोलन का इतिहास कैसे हो सकता है. यदि इस किताब का नाम "'छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन" में छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी की भागीदारी जैसा कोई नाम होता तो भले ही स्वीकार किया जा सकता था।
इस बात को सभी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन में प्रदेश के सैकड़ों संगठन और सभी जातीय समाज द्वारा अपने-अपने स्तर पर आवाज बुलंद किया गया था. सबसे ज्यादा यहां के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों ने इस मुद्दे को उठाया है. जहां कहीं भी छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य, संस्कृति से संबंधित कोई भी कार्यक्रम होता, तो उसमें पृथक राज्य से संबंधित कविता या वक्तव्य अवश्य गूंजता.
आश्चर्य होता है, इस तरह के इतिहास लेखन से लोगों को संकोच कैसे नहीं होता. जितने की इस तरह के लेखन देखे जा रहे हैं, सभी में केवल अपने आसपास के लोगों को ही उल्लेखित किया जाता है, ऐसे में उन्हें संपूर्ण इतिहास का दर्पण कैसे माना जा सकता है.
सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com
Friday, 29 January 2016
गीत मेरा बन जाता है...
जब-जब पाँवों में कोई कहीं, कांटा बन चुभ जाता है।
दर्द कहीं भी होता हो, गीत मेरा बन जाता है।।
मैं वाल्मीकि का वंशज हूं, हर दर्द से नाता रखता हूं
कोई फूल टूटे या शूल चुभे, हर जख्म मैं ही सहता हूँ
क्रंदन करता क्रौंच पक्षी, पर मन मेरा कंप जाता है.....
मैं सावन का घुमड़ता बादल हूँ, सुख की फसलें उपजाता हूँ
कोई राजा हो या रंक सभी को, जीवन गीत सुनाता हूँ
आँखों में किसी की तिनका चुभे, तो आँसू मेरा बह जाता है..
मैं श्रमवीरों का सहोदर हूँ, कल-पुर्जों को धड़काता हूँ
देश की हर गौरव-गाथा में, ऊर्जा बन बह जाता हूँ
सीमा पर कभी फन उठता तो, लहू मेरा बह जाता है...
सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com
Wednesday, 27 January 2016
महाशिवरात्रि मेला - महादेव के नाम पर या किसी अन्य के नाम पर..?
छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति को बिगाड़ने, भ्रमित करने और उसे गलत संदर्भों के साथ जोड़कर लिखने का कुत्सित कार्य कई वर्षों से चल रहा है। अन्य प्रदेशों से लाये गये ग्रंथों और संदर्भों के मापदण्ड पर लिखे जा रहे इन कारगुजारियों के चलते यहां के वास्तविक धर्म और संस्कृति के समक्ष अस्तित्व रक्षा का संकट उत्पन्न हो गया है, लेकिन आश्चर्य होता है इन सब दृश्यों के चलते भी यहां के कथित विद्वान खामोश कैसे रह जाते हैं..?
छत्तीसगढ़ के प्राय: सभी गांव-कस्बों में मड़ई या मेला का आयोजन होता है। ये छोटे स्तर के मड़ई-मेले गांव के बाजार स्थल पर या किसी अन्य स्थल पर आयोजित कर लिए जाते हैं। लेकिन जो बड़े स्तर के मेले होते हैं वे सभी किसी न किसी सिद्ध शिव स्थलों पर ही होते हैं। इसलिए हम यह प्राचीन समय से सुनते और देखते आ रहे हैं कि राजिम मेला कुलेश्वर महादेव के नाम पर भरने वाला मेला कहलाता था।
एक गीत हम बचपन में सुनते थे- *चल ना चल राजिम के मेला जाबो, कुलेसर महादेव के दरस कर आबो...* लेकिन जब से इस मेला को कुंभ के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है, तब से इसे राजीव लोचन के नाम पर भरने वाला कुंभ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जो कि यहां की मूल संस्कृति को समाप्त कर उसके ऊपर अन्य संस्कृति को थोपने का षडयंत्र मात्र है।
मुझे लगता है कि इस मेला के राजीव लोचन नामकरण के पीछे राजनीतिक षडयंत्र भी एक मुख्य कारण है। आप सब इस बात को जानते हैं कि राजीव लोचन भगवान राम का ही एक नाम है, और राम भारतीय जनता पार्टी का चुनावी एजेंडा भी है। शायद इसीलिए भारतीय जनता पार्टी के शासन में परिवर्तित इस आयोजन को कुलेश्वर महादेव के स्थान पर राजीव लोचन के नाम पर भराने वाला मेला के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।
मेरा प्रश्न है कि केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं अपितु पूरे देश में जो कुंभ का आयोजन होता है, वह केवल शिव स्थलों पर और उसी से संबंधित तिथियों पर आयोजित होता है, तब भला वह राजीव लोचन या राम के नाम पर आयोजित होने वाला कुंभ कैसे हो सकता है? राम के नाम पर तो अयोध्या में भी मेला या कुंभ नहीं भरता तो फिर राजिम में कैसे भर सकता है? वह भी महाशिवरात्रि के अवसर पर?
महाशिवरात्रि के अवसर पर लगने वाला मेला या कुंभ कुलेश्वर महादेव के नाम पर भरना चाहिए या राजीव लोचन के नाम पर?
मुझे छत्तीसगढ़ के तथाकथित बुद्धिजीवियों पर, उनके क्रियाकलापों पर आश्चर्य होता है। वे इस तरह की सांस्कृतिक विकृतियों पर कैसे खामोश रहकर सरकार की जी-हुजूरी में लगे रहते हैं..?
सुशील भोले
डॉ. बघेल गली, संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com
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