Saturday, 5 January 2019

परंपरा का संरक्षण : ध्वज की परंपरा......

संदर्भ : परंपरा का संरक्षण.....
छत्तीसगढ़ी संस्कृति में ध्वज की परंपरा.......
विश्व की प्राय:  सभी संस्कृतियों में ध्वज की अपनी विशिष्ट परंपरा है। अपने क्षेत्र विशेष की पहचान या अपने ईष्ट देव के प्रतीकों के आधार पर ध्वज के रंग और आकार-प्रकार का निर्माण लोग करते रहे हैं। ऐसे ध्वजों को देखकर ही यह ज्ञात हो जाता है कि वह किस राज्य अथवा देश का है, या फिर किस धर्म विशेष का है। कभी-कभी एक ही धर्म या संप्रदाय में ही अलग-अलग रंग और आकार-प्रकार के ध्वज दिख जाते हैं।

जहाँ तक छत्तीसगढ़ की बात है, तो यहां की मूल संस्कृति में तीन अलग-अलग रंगों के ध्वज का प्रयोग देखा जाता है। सबसे पहले सफेद रंग का और फिर लाल रंग का और उसके बाद फिर काला रंग का। ये तीनों ही रंग के ध्वज यहां की उपासना पद्धति और उनसे संबंधित देवताओं को प्रतिबिंबित करते हैं।

सफेद रंग यहां के मूल उपास्य देव भगवान शिव का प्रतीक है, जिसे यहां बूढ़ादेव, ठाकुर देव या ईसर देव भी कहा जाता है।

लाल रंग माता शक्ति का प्रतीक है, जिसे यहां बमलाई, चंडी, बूढ़ीमाई जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है।
इसी प्रकार काला रंग यहां की उपास्य महामाया का प्रतीक है।

यहां की मूल संस्कृति को जीने वाले मांत्रिक, जिसे स्थानीय भाषा में बइगा या पंडा भी कहा जाता है, इन्हीं तीन रंगों के ध्वज का प्रयोग अपने सभी कार्यों में करते हैं। यहां के प्राचीन मंदिरों में जहां की पूजा मूल निवासी समुदाय का पंडा करता है, वहां अब भी यही तीन रंग आयताकार ध्वज के रूप में लहराते हुए देखे जा सकते हैं। उसके आधार पर दूर से ही यह जाना जा सकता है कि वह मंदिर किस देव अथवा देवी का है?

लेकिन आजकल एक अलग ही रंग के ध्वज यहां के मंदिर और पूजा स्थलों पर लहराते देखे जा रहे हैं। भगवा रंग का ध्वज। वह भी सभी मंदिरों और धार्मिक स्थलों तथा ऐसे सभी आयोजनों में, जिनका संबंध किसी न किसी आध्यात्मिक कार्यक्रमोंं से होता है। जबकि यह सर्वविदित है कि भगवा रंग का संबंध छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति में दूर-दूर तक भी नहीं है। दरअसल यह अन्य प्रदेशों से लाकर यहां की संस्कृति को विकृत कर उस पर बाहरी पूजा प्रतीकों को थोप रहे लोगों की पहचान का रंग है, जिसे किसी भी सूरत में यहां की मूल संस्कृति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

आश्चर्य है, कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को जिस बेहूदगी के साथ परिवर्तित कर मिटाने का प्रयास किया जा रहा है, उस पर बोलने वाला यहां कोई भी नहीं है। आखिर क्यों ऐसा हो रहा है? यहां का कोई भी मूल निवासी समाज इस पर क्यों आवाज नहीं उठाता? कहीं ऐसा तो नहीं कि लोग रंगों पर आधारित ध्वज का महत्व ही समझना भूल गये हैं, अथवा ऐसा तो नहीं कि बाहर से लाकर थोपे जा रहे धार्मिक प्रतीकों को अपनाने के लिए यहां का समाज विवश हो गया है? कहीं इसीलिए तो उनके पूजा स्थलों से उन्हें बेदखल कर बाहर के लोगों को वहां स्थापित करने का काम चौतरफा देखा जा रहा है?

राजधानी रायपुर का ऐतिहासिक बूढ़ातालाब,  बूढ़ापारा और बूढ़ेश्वर मंदिर को उदाहरण के रूप में रखा जा सकता है। ये तीनों ही स्थल एक जगह पर स्थित हैं, और यहां के मूल देवता बूढ़ादेव के प्रतीक स्वरूप हैं। लेकिन आज इन तीनों के साथ जो हो रहा है, उसे किसी भी प्रकार से यहां की पहचान को सुरक्षित और संरक्षित करने का उपक्रम नहीं कहा जा सकता। बूढ़ातालाब को विवेकानंद सरोवर के रूप में नई पहचान दे दी गई है, और बूढ़़ेश्वर मंदिर पर अन्य प्रदेश  से आये हुए लोग अवैध कब्जा कर वहां अपनी परंपरा के अनुसार पूजा-उपासना और विविध आयोजन करने लगे हैं। अर्थात यहां की मूल परंपरा का अब वहां कोई नामलेवा भी नहीं रहा।

इस कड़ी में राजिम में आयोजित होने वाले पारंपरिक मेले को रखा जा सकता है, जिसे  पिछली सरकार ने "कुंभ" का नाम देकर अन्य प्रदेशों से आने वाले कथित साधु-संतों के लिए चारागाह बना दिया गया था। यह तो वर्तमान सरकार का समझ भरा निर्णय है, कि "कुंभ" का नाम परिवर्तित कर उसे पारम्परिक रूप से "पुन्नी महोत्सव" का नामकरण किया गया है।

यह बात सभी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ के प्राय: सभी गांव-कस्बों में मड़ई या मेला का आयोजन लगातार  होता है। ये छोटे स्तर के मड़ई-मेले गांव के बाजार स्थल पर या किसी अन्य स्थल पर आयोजित कर लिए जाते हैं। लेकिन जो बड़े स्तर के मेले होते हैं वे सभी किसी न किसी सिद्ध शिव स्थलों पर ही होते हैं। इसलिए हम यह प्राचीन समय से सुनते और देखते आ रहे हैं कि राजिम मेला कुलेश्वर महादेव के नाम पर भरने वाला मेला कहलाता था। एक गीत हम बचपन में सुनते थे- *चल ना चल राजिम के मेला जाबो, कुलेसर महादेव के दरस कर आबो...*  लेकिन जब से इस मेला को "कुंभ" के रूप में परिवर्तित किया गया था, तब से इसे "राजीव लोचन" के नाम पर भरने वाला कुंभ के रूप में प्रचारित किया जा रहाथा, जो कि यहां की मूल संस्कृति को समाप्त कर उसके ऊपर अन्य संस्कृति को थोपने का षडयंत्र मात्र था।

छत्तीसगढ़ के तथाकथित बुद्धिजीवियों पर, उनके क्रियाकलापों पर आश्चर्य होता थख। वे इस तरह की सांस्कृतिक विकृतियों पर कैसे खामोश रहकर सरकार की जी-हुजूरी में लगे रहते थे?

अब देखना यह है, हमारी धार्मिक एवं सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक "ध्वज" कब स्वतंत्र होकर खुले आसमान में लहरायेगा? यही प्रश्न अब जनमानस को उद्वेलित कर रहा है। क्या वर्तमान सकार इस दिशा में भी कोई दिशा-निर्देश जारी करेगी?

सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं.98269-92811

Friday, 4 January 2019

फर्जी कुंभ के बंठाधार.....

फर्जी कुंभ के अब होइस बंठाधार
जय होवय जी तुंहर नवा सरकार
मूल संस्कृति के अब होय  बढ़वार
इतिहास-गरब के बनव खेवनहार
-सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान
संजय नगर, रायपुर
मो। 9826992811

Wednesday, 2 January 2019

इतिहास लेखन और सच्चाई....

संदर्भ : ऐतिहासिक लेखन की सच्चाई.....
धुर्रा-गर्दा ल झटकारे के जरूरत.....?
मोला जब ले ये बात के जानबा होइस के इहां भगवान भोलेनाथ ह माता पार्वती संग सोला साल तक रहिके अपन जेठ बेटा कार्तिकेय ल वापस कैलास लेगे खातिर डेरा डार के बइठे रिहीसे तब ले मोर मन म ए गुनान चालू होगे के त फेर आज हमन ल छत्तीसगढ़ के जेन इतिहास देखाए जावत हे, बताए अउ पढ़ाए जावत हे, वोहर आधा-अधूरा अउ बौना हे, जेला फेर से नवा सिरा ले लिखे के जरूरत हे।

अभी तक इहां बगरे किताब मन के माध्यम ले सिरिफ अतके जान पाये रेहेन के छत्तीसगढ़ के इतिहास ह रमायन अउ महाभारत कालीन हे। फेर अब जानेन के सिरिफ अतके नहीं भलुक ए माटी के जुन्ना इतिहास सृष्टिकाल संग जुड़े हे, जेला युग निर्धारण के दृष्टि ले सतयुग घलोक कहि सकथन। त फेर मन म इहू बात उपजथे के इहां जे मनला  हमन इतिहासकार के रूप म जानथन वो मन ए सब बात ल काबर नइ लिखिन? त एक बात झक ले आगू म आ जथे के इहां जतका भी इतिहासकार होए हें, उन सबो के ज्ञान के स्रोत उत्तर भारत ले आये धारमिक ग्रंथ मन रेहे हें, एकरे सेती उन उहां ले जुड़े घटना संग जोड़ जाड़ के छत्तीसगढ़ के इतिहास ल लिख दिए हें। तभे तो वो इतिहास लेखन ह इहां के मूल संस्कृति अउ धारमिक रीति रिवाज संग जोड़ के देखे ले  अन्ते-तन्ते जनाथे।

इहां के गांव-गांव अउ घर-घर म बूढ़ा देव, ठाकुर देव, साड़हा देव, शीतला दाई जइसन देवी-देवता काबर मिलथे। राम अउ कृष्ण संग जुड़े  संस्कृति या ए मनला कुल देवता के रूप म काबर नइ पाये जाय? कहूं छत्तीसगढ़ के धारमिक अउ सांस्कृतिक इतिहास सिरिफ रमायन अउ महाभारत कालीन तक सीमित होतीस त निश्चित रूप ले राम अउ कृष्ण ह इहां घरों-घर म कुल देवता के रूप म बिराजे रहितीस। फेर अइसन नइहे छत्तीसगढ़ ह सतयुग माने भगवान भोलेनाथ के संस्कृति ल जीथे तेकर असल कारन हे ये माटी के इतिहास ह सतयुग माने सृष्टिकाल तक जुन्ना हे। जेला फिर से लिखे-पढ़े के जरूरत हे।

बस्तर म एक लोक गीत मिलथे जेकर मुताबिक भगवान भोलेनाथ अउ माता पार्वती ह अपन जिनगी के सोला साल तक इहां रिहिन हें। अइसे कहे जाथे के उन इहां रहिके अपन जेठ बेटा कार्तिकेय ल कैलाश लेगे खातिर मनावत रिहीन हें। हमन ल धरम ग्रंथ के माध्यम ले ए जानकारी मिलथे के भगवान गणेश ल वोकर चतुराई अउ तेज बुद्धि के सेती प्रथम पूज्य के आशीर्वाद दे दिए गे रिहीसे, तेकरे सेती आज घलो जम्मो किसम के धरम-करम के कारज म हमन गणेश के ही सबले पहिली पूजा करथन। इही प्रथम पूज्य के आशीर्वाद के सेती वोकर बड़का भाई कार्तिकेय ह रिसा के दक्षिण भारत म आके रेहे बर धर लिए रिहीसे। तब भगवान भोलेनाथ अउ माता पार्वती ह वोला वापिस कैलाश लेगे खातिर छत्तीसगढ़ के बस्तर म आके सोला बछर तक रिहिन हें।
निश्चित रूप ले एहर छत्तीसगढ़ खातिर गौरव के बात आय। अपन लेख मन  म मैं ह इहां के मूल संस्कृति अउ धरम के कतकों पइत चरचा कर डारे हावौं जेकर ले ए बात साबित हो जाथे के हमर इतिहासकार अउ संस्कृति मर्मज्ञ मन हमन ला इहां के मूल संस्कृति अउ इतिहास के बलदा उत्तर भारत ले लाए ग्रंथ अउ संस्कृति मन के मापदण्ड म चुरो-पको के उहां के रूप म इहां के संस्कृति अउ इतिहास ल देखाए -बताए हें।

ए बात ल सबो जानथें के इहां के मूल निवासी मन शिक्षा ले, पढ़ई-लिखई ले कतकों कोस दुरिहा रिहीन हें। एकरे सेती उन अपन गौरवशाली संस्कृति अउ इतिहास ल नइ लिख पाइन। इही बात के फायदा उठावत बाहिर ले आके इहां बसे मनखे मन अपन संग वोती ले लाने संस्कृति अउ इतिहास ल इहां के रूप म लिख-पढ़ के रख दिन। इही कटु सत्य आय जेकर सेती इहां के मूल संस्कृति अउ इतिहास ह किताब मन म बगरे संस्कृति अउ इतिहास ले अलग दिखथे। अब जब इहां के मूल निवासी मन घलो पढ़-लिख डारे हें, अउ संग म ए समझ डारे हें, के हमला जेन बताए अउ पढ़ाए जावत हे, वो हर हमर नहीं भलुक आने क्षेत्र के संस्कृति अउ इतिहास आय त निश्चित रूप ले वो बाहिर के संस्कृति अउ इतिहास ल अपन-अपन मुड़ ले उतार के इहां के मूल संस्कृति, गौरव अउ इतिहास ल अपन-अपन मुड़ म चढ़ाना चाही, अपन ल मानना चाही।

सुशील भोले
डॉ. बघेल गली,संजय नगर, रायपुर
मो. 098269-92811

Tuesday, 1 January 2019

छेरछेरा का पर्व और मान्यताएं....

दान देने और लेने का पर्व छेरछेरा....
छत्तीसगढ़ में पौस माह की पूर्णिमा तिथि को  *छेरछेरा* का जो पर्व मनाया जाता है, वह अलग-अलग वर्ग के लोगों के द्वारा अलग-अलग मान्यताओं के अंतर्गत मनाया जाता है।
यहां के मूल निवासी वर्ग के लोग, जो गोंडवाना या कहें, आदिवासी संस्कृति को जीते हैं, वे इसे पौस पूर्णिमा के अवसर पर गोटुल/घोटुल की शिक्षा में पारंगत हो जाने के पश्चात् तीन दिनों का पर्व मनाते हैं। जबकि यहां के मैदानी भाग में निवासरत अन्य सामान्यजन खरीफ की फसल की लुवाई-मिसाई के पश्चात उल्लास के रूप में एक दिन का दान पर्व के रूप में मनाते हैं।
इन दोनों ही मान्यताओं से इतर मुझे अपने साधनाकाल में इसके आध्यात्मिक स्वरूप का जो.ज्ञान प्राप्त हुआ, उसके अनुसार यह पर्व महादेव द्वारा विवाह के पूर्व देवी पार्वती से परीक्षा लेने के निमित्त,उनके घर जाकर भिक्षा मांगने के प्रतीक स्वरूप मनाया जाने वाला पर्व है।

आप सभी को यह ज्ञात है कि पार्वती से विवाह पूर्व भोलेनाथ ने कई किस्म की परीक्षाएं ली थीं। उनमें से एक परीक्षा यह भी थी कि वे नट बनकर नाचते-गाते पार्वती के निवास पर भिक्षा मांगने गये थे, और स्वयं ही अपनी (शिव की) निंदा करने लगे थे, ताकि पार्वती उनसे  (शिव से) विवाह करने के लिए इंकार कर दें।

छत्तीसगढ़ में जो छेरछेरा का पर्व मनाया जाता है, उसमें भी लोग नट बनकर नाचते-गाते हुए भिक्षा मांगने के लिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ के मैदानी भागों में तो अब नट बनकर (विभिन्न प्रकार के स्वांग रचकर) नाचते-गाते हुए भिक्षा मांगने जाने का चलन कम हो गया है, लेकिन यहां के बस्तर क्षेत्र में अब भी यह प्रथा बहुतायत में देखी जा सकती है। वहां बिना नट बने इस दिन कोई भी व्यक्ति भिक्षाटन नहीं करता। 

ज्ञात रहे इस दिन यहां के बड़े-छोटे सभी लोग भिक्षाटन करते हैं, और इसे किसी भी प्रकार से छोटी नजरों से नहीं देखा जाता, अपितु इसे पर्व के रूप में देखा और माना जाता है। और लोग बड़े उत्साह के साथ बढ़चढ़ कर दान देते हैं। इस दिन कोई भी व्यक्ति किसी भी घर से खाली हाथ नहीं जाता। लोग आपस में ही दान लेते और देते हैं।

इस छेरछेरा पर्व के कारण यहां के कई गांवों में कई जनकल्याण के कार्य भी संपन्न हो जाते हैं। हम लोग जब मिडिल स्कूल में पढ़ते थे, तब हमारे गुरूजी पूरे स्कूल के बच्चों को बैंडबाजा के साथ गांव में भिक्षाटन करवाते थे, और उससे जो धन प्राप्त होता था, उससे बच्चों के खेलने के लिए और व्यायाम से संबंधित तमाम सामग्रियां लेते थे।

मुझे स्मरण है, हमारे गांव में कलाकारों की एक टोली थी, जो इस दिन पूरे रौ में होती थी। मांदर-ढोलक और झांझ-मंजीरा लिए जब नाचते-गाते, डंडा के ताल साथ कुहकी पारते (लोकनृत्य में यह एक शैली है ताल के साथ मुंह से आवाज निकालने की इसे ही कुहकी पारना कहते हैं) यह टोली निकलती थी तो लोग उन्हें दान देने के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा करते थे। उस टोली को अपने यहां आने का अनुरोध करते थे। छेरछेरा का असली रूप और असली मजा ऐसा ही होता था, जो अब कम ही देखने को मिलता है।

ज्ञात रहे कि छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति, जिसे मैं "आदि धर्म" कहता हूं वह सृष्टिकाल की संस्कृति है। युग निर्धारण की दृष्टि से कहें तो सतयुग की संस्कृति है, जिसे उसके मूल रूप में लोगों को समझाने के लिए हमें फिर से प्रयास करने की आवश्यकता है, क्योंकि कुछ लोग यहां के मूल धर्म और संस्कृति को अन्य प्रदेशों से लाये गये ग्रंथों और संस्कृति के साथ घालमेल कर लिखने और हमारी मूल पहचान को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।

मित्रों, सतयुग की यह गौरवशाली संस्कृति आज की तारीख में केवल छत्तीसगढ़ में ही जीवित रह गई है, उसे भी गलत-सलत व्याख्याओं के साथ जोड़कर भ्रमित किया जा रहा। मैं चाहता हूं कि मेरे इसे इसके मूल रूप में पुर्नप्रचारित करने के सद्प्रयास में आप सब सहभागी बनें...।

सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 98269-92811

Saturday, 29 December 2018

संस्कृति और सम्मान......

संस्कृति और सम्मान......
हमारी संस्कृति दुनिया की हर संस्कृति और  सभ्यता का  सम्मान करना सिखाती है, इसीलिए "वसुधैव कुटुम्बकम" के माध्यम से पूरे विश्व को अपना परिवार मानने की शिक्षा दी जाती है। इसके इतर, जो लोग अन्य संस्कृति, परंपरा या सभ्यता का सम्मान करने के बजाय उसके विपरित विष वमन करते हैं, ऐसे लोग कदापि धर्म के जानकार या रक्षक नहीं हो सकते। ऐसे लोगों को मूर्ख और उससे भी बढकर धूर्त कहा जाना उचित होगा। साथ ही यह भी उचित होगा कि ऐसे लोगों की बातों की उपेक्षा की जाए, उन्हें अमान्य किया जाए।
-सुशील भोले
अध्यक्ष, आदि धर्म जागृति संस्थान
संजय नगर, रायपुर
मो नं 9826992811

Friday, 28 December 2018

नये संस्कृति मंत्री श्री ताम्रध्वज साहू से अपेक्षा.....

छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति की उपेक्षा और नये संस्कृति मंत्री से अपेक्षा...
प्रति,
श्री ताम्रध्वज साहू जी,
संस्कृति मंत्री, छत्तीसगढ़ शासन

महोदय,
छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुए दो दशक से होने जा रहा है, लेकिन अभी भी यहां की मूल-संस्कृति की स्वतंत्र पहचान नहीं बन पायी है। आज भी जब छत्तीसगढ़ की संस्कृति की बात होती है, तो अन्य प्रदेशों से लाये गये ग्रंथों के मापदण्ड पर इसे परिभाषित कर दिया जाता है।

आप तो इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि किसी भी प्रदेश की संस्कृति का मानक वहां के मूल निवासियों की संस्कृति होती है, न कि अन्य प्रदेशों से आये हुए लोगों की संस्कृति। लेकिन यह छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य है कि यहां आज भी मूल-निवासियों की संस्कृति को दरकिनार कर अन्य प्रदेशों की संस्कृति को छत्तीसगढ़ की संस्कृति के रूप में चिन्हित किया जा रहा है।

आप इस बात से भी वाकिफ हैं कि यहां का मूल निवासी समाज सदियों तक शिक्षा की रोशनी से काफी दूर रहा है, जिसके कारण वह अपनी संस्कृति और इतिहास को लिखित रूप नहीं दे पाया। परिणाम स्वरूप अन्य प्रदेशों से आये हुए लोग यहां की संस्कृति और इतिहास को लिखने लगे।

लेकिन यहां पर एक गलती यह हुई कि वे यहां की मूल-संस्कृति और इतिहास को वास्तविक रूप में लिखने के बजाय अपने साथ अन्य प्रदेशों से लाये गये ग्रंथों और संस्कृति के साथ घालमेल कर लिखने लगे। यही मूल कारण है, जिसके कारण छत्तीसगढ़ की मूल-संस्कृति और इतिहास का स्वतंत्र और वास्तविक रूप आज तक लोगों के समक्ष नहीं आ सका है।

यहां पर यह जान लेना भी आवश्यक है कि कला और संस्कृति दो अलग-अलग चीजें हैं। इसे इसलिए अलग-अलग चिन्हित किया जाना आवश्यक है, क्योंकि छत्तीसगढ़ी संस्कृति के नाम पर यहां की कुछ कला को और कला-मंडलियों को उपकृत कर संपूर्ण छत्तीसगढ़ी संस्कृति को कृतार्थ कर लेने का कर्तव्य पूर्ण हो जाना मान लिया जाता है।

कला और संस्कृति के मूल अंतर को समझने के लिए हम यह कह सकते हैं कि मंच के माध्यम से जो प्रदर्शन किया जाता है वह कला है, और जिन्हें हम पर्वों एवं संस्कार के रूप में जीते हैं वह संस्कृति है।
आप यहां के मूल-निवासी समाज के हैं, इसलिए यहां की पीड़ा को अच्छी तरह से जानते और समझते हैं। इसीलिए आपसे अपेक्षा भी ज्यादा की जा रही है, कि आप इस दिशा में ठोस कदम उठायेंगे और छत्तीसगढ़ को उसकी मूल-सांस्कृतिक पहचान से गर्वान्वित करेंगे।

मुझे लगता है कि यहां की मूल-संस्कृति की तार्किक रूप से संक्षिप्त चर्चा कर लेना भी आवश्यक है।
वास्तव में छत्तीसगढ़ की संस्कृति एक मौलिक संस्कृति है, जिसे हम सृष्टिकाल की या युग निर्धारण के मानक पर कहें तो सतयुग की संस्कृति कह सकते हैं। यहां पर कई ऐसे पर्व और संस्कार हैं, जिन्हें इस देश के किसी अन्य अंचल में नहीं जिया जाता। ऐसे ही कई ऐसे भी पर्व हैं, जिन्हें आज उसके मूल स्वरूप से परिवर्तित कर किसी अन्य घटना के साथ जोड़कर प्रचारित किया जा रहा है। आइए कुछ ऐसे ही दृश्यों पर तार्किक चर्चा कर लें।

सबसे पहले उस बहुप्रचारित व्यवस्था पर, जिसे हम चातुर्मास के नाम पर जानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी तक) में देवता सो जाते हैं, (कुछ लोग इसे योग निद्रा कहकर बचने का प्रयास करते हैं।) इसलिए इन चारों महीनों में किसी भी प्रकार का मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए। अब छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखें, तो यह व्यवस्था यहां लागू ही नहीं होती। यहां चातुर्मास पूर्ण होने के दस दिन पहले ही ईसर देव और गौरा का विवाह पर्व 'गौरा-गौरी उत्स, के रूप में मनाया जाता है। अब जब भगवान की ही शादी देवउठनी से पहले हो जाती है, तो फिर उनके सोने (शयन करना) या फिर इन महीनों को मांगलिक कार्यों के लिए किसी भी प्रकार से अशुभ मानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। बल्कि यहां पर यह कहना ज्यादा अच्छा होगा कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति में चातुर्मास के इन चारों महीनों को ही सबसे ज्यादा शुभ और पवित्र माना जाता है, क्योंकि इन्हीं चारों महीनों में यहां के सभी प्रमुख पर्व संपन्न होते हैं।

श्रावण अमावस्या को मनाए जाने वाले पर्व 'हरेली" से लेकर देखें तो इस महीने की शुक्ल पक्ष पंचमी को 'नागपंचमी" तथा पूर्णिमा को 'शिव लिंग प्राकट्य" दिवस के रूप में मनाया जाता है। भादो मास में कृष्ण पक्ष षष्ठी को स्वामी कार्तिकेय का जन्मोत्सव पर्व 'कमर छठ" के रूप में, अमावस्या तिथि को नंदीश्वर का जन्मोत्सव 'पोला" के रूप में, शुक्ल पक्ष तृतीया को देवी पार्वती द्वारा भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए किए गए कठोर तप के प्रतीक स्वरूप मनाया जाने वाला पर्व 'तीजा" तथा चतुर्थी तिथि को विघ्नहर्ता और देव मंडल के प्रथम पूज्य भगवान गणेश का जन्मोत्सव पर्व।

क्वांर मास का कृष्ण पक्ष हमारी संस्कृति में स्वर्गवासी हो चुके पूर्वजों के स्मरण के लिए मातृ एवं पितृ पक्ष के रूप में मनाया जाता है। शुक्ल पक्ष माता पार्वती (आदि शक्ति) के जन्मोत्सव का पर्व नवरात्र के रूप में (यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यहां की संस्कृति में वर्ष में दो बार जो नवरात्र मनाया जाता है, उसका कारण आदि शक्ति के दो बार अवतरण को कारण माना जाता है। प्रथम बार वे सती के रूप में आयी थीं और दूसरी बार पार्वती के रूप में। सती के रूप में चैत्र मास में तथा पार्वती के रूप में क्वांर मास में)। क्वांर शुक्ल पक्ष दशमीं तिथि को समुद्र मंथन से निकले विष का हरण पर्व दंसहरा (दशहरा) के रूप में मनाया जाता है। (बस्तर में इस अवसर पर जो रथयात्रा का आयोजन किया जाता है, वह वास्तव में मंदराचल पर्वत के माध्यम से समुद्र मंथन का पर्व है। आगे इसकी विस्तृत चर्चा करेंगे)। तथा विष हरण के पांच दिनों के बाद क्वांर पूर्णिमा को अमृत प्राप्ति का पर्व 'शरद पूर्णिमा" के रूप में मनाया जाता है।

इसी प्रकार कार्तिक मास में अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला ईसरदेव तथा गौरा का विवाह पर्व 'गौरा-गौरी उत्सव" में सम्मिलित होने के लिए लोगों को संदेश देने का आयोजन 'सुआ नृत्य" के रूप में किया जाता है, जो पूरे कृष्ण पक्ष में पंद्रह दिनों तक उत्सव के रूप में चलता है। इन पंद्रह दिनों में यहां की कुंवारी कन्याएं 'कार्तिक स्नान" का भी पर्व मनाती हैं। यहां की संस्कृति में मेला-मड़ई के रूप में मनाया जाने वाला उत्सव भी कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि से ही प्रारंभ होता है, जो भगवान शंकर के जटाधारी रूप में प्रागट्य होने के पर्व महाशिवरात्रि तक चलता है।

चातुर्मास के अंतर्गत हम 'दंसहरा" की चर्चा कर रहे थे। तो यहां यह जान लेना आवश्यक है दशहरा (वास्तव में दंस+हरा) और विजया दशमी दो अलग-अलग पर्व हैं। दशहरा या दंसहरा सृष्टिकाल के समय संपन्न हुए समुद्र मंथन से निकले दंस विष के हरण का पर्व है तो विजयी दशमी आततायी रावण पर भगवान राम के विजय का पर्व है। यहां के बस्तर में दशहरा के अवसर पर जो 'रथयात्रा" का पर्व मनाया जाता है, वह वास्तव में दंस+हरा अर्थात दंस (विष) हरण का पर्व है, जिसके कारण शिवजी को 'नीलकंठ" कहा गया। इसीलिए इस तिथि को नीलकंठ पक्षी (टेहर्रा चिरई) को देखना शुभ माना जाता है, क्योंकि इस दिन उसे विषपान करने वाले शिवजी का प्रतीक माना जाता है।

बस्तर के रथयात्रा को वर्तमान में कुछ परिवर्तित कर उसके कारण को अलग रूप में बताया जा रहा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे राजिम के प्रसिद्ध पारंपरिक 'मेले" के स्वरूप को परिवर्तित कर 'कुंभ" का नाम देकर उसके स्वरूप और कारण को परिवर्तित कर दिया गया है। पहले दशहरा के अवसर पर प्रतिवर्ष नया रथ बनाया जाता था, जो कि मंदराचल पर्वत का प्रतीक होता था, क्योंकि मंदराचल पर्वत के माध्यम से ही समुद्र मंथन किया गया था। चूंकि मंदराचल पर्वत को मथने (आगे-पीछे खींचने) के कार्य को देवता और दानवों के द्वारा किया गया था, इसीलिए इस अवसर पर बस्तर क्षेत्र के सभी ग्राम देवताओं को इस दिन रथयात्रा स्थल पर लाया जाता था। उसके पश्चात रथ को आगे-पीछे खींचा जाता था, और जब आगे-पीछे खींचे जाने के कारण रथ टूट-फूट जाता था, तब विष निकलने का दृश्यि उपस्थित करने के लिए उस रथ को खींचने वाले लोग इधर-उधर भाग जाते थे। बाद में जब वे पुन: एकत्रित होते थे, तब उन्हें विष वितरण के रूप में दोने में मंद (शराब) दिया जाता था।

इस बात से प्राय: सभी परिचित हैं कि समुद्र मंथन से निकले 'विष" के हरण के पांच दिनों के पश्चात 'अमृत" की प्राप्ति हुई थी। इसीलिए हम लोग आज भी दंसहरा तिथि के पांच दिनों के पश्चात अमृत प्राप्ति का पर्व 'शरद पूर्णिमा" के रूप में मनाते हैं।

यहां के मूल पर्व को किसी अन्य घटना के साथ जोड़कर लिखे जाने के संदर्भ में हम 'होली" को उदाहरण के रूप में ले सकते हैं। छत्तीसगढ़ में जो होली मनाई जाती है वह वास्तव में 'काम दहन" का पर्व है, न कि 'होलिका दहन" का। यह काम दहन का पर्व है, इसीलिए इसे मदनोत्सव या वसंतोत्सव के रूप में भी स्मरण किया जाता है, जिसे माघ महीने की शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि से लेकर फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि तक लगभग चालीस दिनों तक मनाया जाता है।

सती आत्मदाह के पश्चात तपस्यारत शिव के पास आततायी असुर के संहार के लिए शिव-पुत्र प्राप्ति हेतु देवताओं द्वारा कामदेव को भेजा जाता है, ताकि उसके (शिव) अंदर काम वासना का उदय हो और वे पार्वती के साथ विवाह करें, जिससे शिव-पुत्र के हाथों मरने का वरदान प्राप्त असुर के संहार के लिए शिव-पुत्र (कार्तिकेय) की प्राप्ति हो। देवमंडल के अनुरोध पर कामदेव बसंत के मादकता भरे मौसम का चयन कर अपनी पत्नी रति के साथ माघु शुक्ल पक्ष पंचमीं को तपस्यारत शिव के सम्मुख जाता है। उसके पश्चात वासनात्मक शब्दों, दृश्यों और नृत्यों के माध्यम से शिव-तपस्या भंग करने की कोशिश की जाती है, जो फाल्गुन पूर्णिमा को शिव द्वारा अपना तीसरा नेत्र खोलकर उसे (कामदेव को) भस्म करने तक चलती है।

छत्तीसगढ़ में बसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) को काम दहन स्थल पर अंडा (अरंडी) नामक पेड़  गड़ाया जाता है, वह वास्तव में कामदेव के आगमन का प्रतीक स्वरूप होता है। इसके साथ ही यहां वासनात्मक शब्दों, दृश्यों और नृत्यों के माध्यम से मदनोत्सव का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। इस अवसर पर पहले यहां 'किसबीन नाच" की भी प्रथा थी, जिसे रति नृत्य के प्रतीक स्वरूप आयोजित किया जाता था। 'होलिका दहन" का संबंध छत्तीसगढ़ में मनाए जाने वाले पर्व के साथ कहीं पर भी दृष्टिगोचर नहीं होता। होलिका तो केवल एक ही दिन में चिता रचवाकर उसमें आग लगवाती है, और उस आग में स्वयं जलकर भस्म हो जाती है, तब भला उसके लिए चालीस दिनों का पर्व मनाने का सवाल ही कहां पैदा होता है? और फिर वासनात्मक शब्दों, दृश्यों और गीत-नृत्यों का होलिका से क्या संबंध है?

मूल संस्कृति की चर्चा करते हुए कुछ बातें यहां के इतिहास लेखन की भी हो जाए तो बेहतर होगा, क्योंकि यहां की मूल संस्कृति के नाम पर अभी तक हम सृष्टिकाल या कहें कि सतयुग की संस्कृति की चर्चा करते आए हैं तो फिर प्रश्न उठता है कि छत्तीसगढ़ के इतिहास को केवल रामायण और महाभारत कालीन ही क्यों कहा जाता है? इसे सतयुग या सृष्टिकाल तक विस्तारित क्यों नहीं कहा जाता?

मुझे ऐसा लगता है कि इन सबका एकमात्र कारण है, उनके द्वारा मानक स्रोत का गलत चयन। वे जिन ग्रंथों को यहां के इतिहास एवं संस्कृति के मानक के रूप में उद्घृत करते हैं, वास्तव में उन्हें छत्तीसगढ़ के मापदंड पर लिखा ही नहीं गया है। इस बात से तो सभी परिचित हैं कि यहां के मूल निवासी शिक्षा के प्रकाश से कोसों दूर थे, इसलिए वे अपनी संस्कृति और इतिहास को लिखित स्वरूप नहीं दे पाए। इसलिए जब अन्य प्रदेशों से यहां आकर बस जाने वाले लोगों ने यहां के इतिहास और संस्कृति को लिखित रूप देना प्रारंभ किया तो वे अपने साथ अपने मूल प्रदेशों से लाए गए ग्रंथों और संस्कृति को मानक मानकर 'छत्तीसगढ़" को परिभाषित करने लगे।

आज उस लिखित स्वरूप और यहां की मूल (अलिखित) स्वरूप में जो अंतर दिखाई देता है, उसका वास्तविक कारण यही है। इसलिए यहां के मूल निवासी जो अब स्वयं भी शिक्षित हो चुके हैं, वे चाहते हैं कि यहां की संस्कृति एवं इतिहास का पुनर्लेखन हो, और उस लेखन का आधार अन्य प्रदेशों से लाए गए ग्रंथों की बजाय यहां की मूल संस्कृति और लोक परंपरा हो।

सुशील भोले
अध्यक्ष, एवं समस्त पदाधिकारी तथा सदस्य गण
आदि धर्म जागृति संस्थान
41-191, डॉ. बघेल गली,
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हस्ताक्षर :
समस्त सदस्य......।