Sunday, 14 March 2021

वो शरद पुन्नी के रतिहा... सुरता.

सुरता//
वो शरद पुन्नी के रतिहा..
    शरद ऋतु के आतेच मौसम म कोंवर कोंवर जुड़ जनाए लगथे. रतिहा के 8 असन बज गे रिहिसे. चंदा अपन दुधिया अंजोर बगरावत शरद पुन्नी के परसाद बांटे बर धर ले रिहिसे.
   आमदी नगर, भिलाई के अगासदिया परिसर म छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय कलाकार अउ मयारुक शब्दभेदी बाण के संधानी रहे, स्व. कोदूराम वर्मा जी के सुरता म  आयोजित 'शरदोत्सव' कार्यक्रम अपन पूरा जवानी म रिहिसे. इही बीच कार्यक्रम के संयोजक अउ अंचल के सुप्रसिद्ध कथाकार डा. परदेशी राम वर्मा जी माइक म आइन अउ कार्यक्रम के रस म थोर बदलाव करत मोला कविता पाठ खातिर आमंत्रित करिन.
     शरद पुन्नी हमर छत्तीसगढ़ बर आध्यात्मिक तिहार होए के संगे- संग एक गरब करे के दिन घलो आय. काबर के हमन जेन महर्षि वाल्मीकि जी ल दुनिया के पहला कवि मानथन, उंकर आश्रम हमर छत्तीसगढ़ के तुरतुरिया म हावय. एकरे सेती पीरा ले उपजे उंकर जिनगी के पहला कविता के सुरता करावत. वो पीरा ल ए पंक्ति के माध्यम ले आगू बढ़ाए के उदिम करेंव-"जब-जब पांवों में कोई कहीं कांटा बन चुभ जाता है, दर्द कहीं भी होता हो गीत मेरा बन जाता है ".
    गीत के सिराते लोगन के ताली गड़गड़ाए के आवाज मोर कान म सुनाइस. (एकर बाद का होइस मैं नइ जानत हंव. जे मन वो जगा उपस्थित रहिन, उंकर कहना हे, के मैं उही जगा गिर परेंव.)
बाद म मोला कोनो मंच ले उठा के नीचे लानिन अउ कुर्सी म बइठाए लागिन, फेर मैं कुर्सी म बइठे नइ पाएंव, त फेर मोला उठा के तीरेच के एक कुरिया म लेगिन अउ भुइयांच म सूता देइन.
     तब तक थोर थोर मोर चेत आए ले धर ले रिहिसे. तभे एक झन मोला पूछिस- 'पहिली घलो अइसन हो चुके हे का?' मैं नहीं कहेंव. मोर आवाज अरझे असन तोतराए बानी कस लागे ले धर ले रिहिसे. तभे ककरो आवाज मोर कान म सुनाइस- 'जा, एला तो पैरालिसिस (लकवा) होगे हे.'
     वो बछर (2018 म) शरद पुन्नी 24 अक्टूबर के परे रिहिसे. मोर तबियत के बारे म जानते, कार्यक्रम संयोजक परदेशी राम जी तुरते कार्यक्रम ल स्थगित करे के घोषणा करिन अउ मोला इलाज खातिर हमर घर म फोन करके रायपुर लानिन. तब ले लेके अब तक कतकों किसम के इलाज के उदिम होगे, फेर अभी घलो अकेल्ला घर ले बाहिर जाके कोनो कार्यक्रम म संघर जातेंव अइसन नइ हो पाए हंव.
हाँ, ए बीच अइसन जरूर होइस, के हजारों लोगन मोला देखे बर आइन, अपन शुभकामना देइन. उंकरे मन के शुभकामना के परसादे मैं लाठी धर के दू-चार कदम रेंग डारथौं, फेर अभी घलो एला स्वस्थ होना नइ कहे जा सकय. तब खटिया म बइठे-बइठे ए पंक्ति कागज म उतरे लागिस-
हाय रे हाय रे काया लोंदा होगे रे,
अहंकार के बुढ़ना झरगे, काया लोंदा होगे रे...

ज्ञान-गरब के चादर ओढ़े काया फूले रिहिस
कर्म-दोष अनदेखना बनके एती-वोती झूले रिहिस
हिरना कस मेछरावत सपना तब गोंदा-गोंदा होगे रे..

शरद के वो रात रहिस, अमरित बरसे के आस रहिस
भोलेनाथ के किरपा बर मोला तो बड़ बिसवास रहिस
फेर कोन कोती ले कारी छाया आइस कवि कोंदा होगे रे..

धूप -छांव तो जिनगी म हमेशा आगू-पाछू आथे
फेर अइसन बेरा ह लोगन ल आत्म समीक्षा करवाथे
तब जानबा होथे कोन अपन अउ कोन स्वारथ के बोंडा हे..

    एकदम सिरतोन आय. हमर ऋषि मुनि अउ गुनिक मन जेन कहे हें न, के बीपत के बेरा म ही सही मायने म अपन अउ बिरान के चिन्हारी होथे. ए बीपत के बेरा म मोला देखे खातिर हजारों लोगन आइन. अभी घलो कतकों संगी आतेच रहिथें. फेर एक अचरित करइया बात इहू आय, के ए मिले खातिर अवइया मन म वोकर मन के हाजिरी अभी तक नइ लग पाए हे, जेकर मन ले मोला सबले जादा भरोसा रहिस. जिंकर मन खातिर मैं कभू दिन- रात एक कर देवत रेहेंव. तब अंतस ले ए डांड़ अपने अपन निकल परिस-
बीपत के बेरा होथे अपन-बिरान के पहचान
ठउका कहे हें हमर पुरखा अउ गुनिक-सुजान
जिंकर बर हम कभू रात-दिन एक कर देवन
नइ आरो ले आइन जेकर बर जी दे देवन
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Tuesday, 9 March 2021

पुतरी अउ करनफुल ...

पुतरी... करनफूल….
                 साथियो, हमारा छत्तीसगढ़ विभिन्न पारंपरिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ-साथ आभूषणों के मामले में भी समृद्ध है। हमारे पारंपरिक आभूषण हमें अन्य राज्यों और देश में पृथक पहचान दिलाते हैं। इस वर्ष जनसंपर्क विभाग द्वारा राष्ट्रीय पर्व 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली में इन छत्तीसगढ़ी आभूषणों की झांकी भी प्रदर्शित की गयी थी जिसे लोगों ने खूब सराहा। यह झांकी प्रथम स्थान पर भी रही। पिछले दिनों मातृ भाखा (भाषा) दिवस पर विभाग द्वारा प्रेसक्लब में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में हमारी माताएं- बहनें ज्यादातर छत्तीसगढ़ी परिधान में ही आई थीं और साथ ही सब तरह-तरह के छत्तीसगढ़ी गहनें पहनी हुई थीं। फोटो में इन दो बहनों द्वारा पहने गए आभूषण लोगों के बीच आकर्षण के केन्द्र में रहे। पहले चित्र में गले में जो गहना पहनी हैं उसे “पुतरी” कहते हैं (यही गहना जब चांदी का बनाया जाता है तो उसे रुपिया कहते हैं और सोने से बने इस गहने को पुतरी कहते हैं) दूसरे चित्र में कान में जो गहना है उसे “करनफूल” कहते हैं। यह झुमके की तरह और आकार में काफी बड़ा होता है।
                             आप सबकी जानकारी के लिए यहां कुछ पारंपरिक गहनों के नाम बताना चाहता हूं। हालांकि आप सब जानते हैं। नाक में पहने जाने वाले गहनों में फुल्ली, नथ, सरजा, गले के गहने सूता, सूतिया, पुतरी, औरीदाना, हंसूली, चैन, माला, सुर्रा, गेहूंदाना, कान के लिए खिनवा, बारी, तितरी, झुमका, करनफूल, ठार, कलाई के लिए पट्टा, अंइठी, चूरी, कड़ा, ककनी, पैरों के लिए कोतरी बिछिया, जाली बिछिया, चुटकी, देवरहा, सांटी/पैरपट्टी, पायल, लच्छा, ठोढ़िया चेनकास करहा, बांह के लिए पहुंचा (बाजूबंद) इसके अलावा ऐंठी, ककनी, बनुरिया, बालों के लिए क्लिप, झाबा आदि।पुतरी... करनफूल….
                 साथियो, हमारा छत्तीसगढ़ विभिन्न पारंपरिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ-साथ आभूषणों के मामले में भी समृद्ध है। हमारे पारंपरिक आभूषण हमें अन्य राज्यों और देश में पृथक पहचान दिलाते हैं। इस वर्ष जनसंपर्क विभाग द्वारा राष्ट्रीय पर्व 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली में इन छत्तीसगढ़ी आभूषणों की झांकी भी प्रदर्शित की गयी थी जिसे लोगों ने खूब सराहा। यह झांकी प्रथम स्थान पर भी रही। पिछले दिनों मातृ भाखा (भाषा) दिवस पर विभाग द्वारा प्रेसक्लब में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में हमारी माताएं- बहनें ज्यादातर छत्तीसगढ़ी परिधान में ही आई थीं और साथ ही सब तरह-तरह के छत्तीसगढ़ी गहनें पहनी हुई थीं। फोटो में इन दो बहनों द्वारा पहने गए आभूषण लोगों के बीच आकर्षण के केन्द्र में रहे। पहले चित्र में गले में जो गहना पहनी हैं उसे “पुतरी” कहते हैं (यही गहना जब चांदी का बनाया जाता है तो उसे रुपिया कहते हैं और सोने से बने इस गहने को पुतरी कहते हैं) दूसरे चित्र में कान में जो गहना है उसे “करनफूल” कहते हैं। यह झुमके की तरह और आकार में काफी बड़ा होता है।
                             आप सबकी जानकारी के लिए यहां कुछ पारंपरिक गहनों के नाम बताना चाहता हूं। हालांकि आप सब जानते हैं। नाक में पहने जाने वाले गहनों में फुल्ली, नथ, सरजा, गले के गहने सूता, सूतिया, पुतरी, औरीदाना, हंसूली, चैन, माला, सुर्रा, गेहूंदाना, कान के लिए खिनवा, बारी, तितरी, झुमका, करनफूल, ठार, कलाई के लिए पट्टा, अंइठी, चूरी, कड़ा, ककनी, पैरों के लिए कोतरी बिछिया, जाली बिछिया, चुटकी, देवरहा, सांटी/पैरपट्टी, पायल, लच्छा, ठोढ़िया चेनकास करहा, बांह के लिए पहुंचा (बाजूबंद) इसके अलावा ऐंठी, ककनी, बनुरिया, बालों के लिए क्लिप, झाबा आदि।
(गोकुल सोनी जी के वाल से)

Monday, 8 March 2021

शिवरात्रि कथा...

भगवान शिव की उपासना का महापर्व : महाशिवरात्रि                      
  भगवान शिव की उपासना का पर्व शिवरात्रि इस वर्ष गुरुवार 11 मार्च 2021 को मनाई जाएगी। इस मौके पर लाखों श्रद्धालु शिव मंदिरों में जाकर रुद्राभिषेक करेंगे । बहुत से लोग शिवरात्रि का व्रत करेंगे और रात्रि जागरण भी करेंगे । भगवान शिव में आस्था रखने वाले और महाशिवरात्रि का व्रत करने वाले लोग  इस दिन शिवरात्रि कथा जरूर पढ़ते या सुनते हैं। मान्यता है कि इससे भक्त की आस्था और ज्यादा मजबूत होती है, तो आइए पढ़ते हैं, महाशिवरात्रि व्रत कथा-

शिव पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। साहूकार के घर पूजा हो रही थी तो शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी।

शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधेरा गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा।

बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बिल्वपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची।

शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।'

शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया।

कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई।

तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली, 'हे शिकारी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे। उत्तर में हिरणी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करों, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।

हिरणी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके।, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।

अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिव जी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जान कर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए।
(प्रस्तुति : सुशील भोले-9826992811)
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Friday, 5 March 2021

पवन दीवान.... सुरता..

सुरता//
छत्तीसगढ़ी अस्मिता बर समर्पित रहिन पवन दीवान ....
   छत्तीसगढ़ी कला, साहित्य के संगे- संग छत्तीसगढ़ राज आन्दोलन म लइकई उमर ले रुचि रखे अउ संघरे के सेती संत कवि पवन दीवान जी के नांव अउ काम ले तो मैं आगूच ले परिचित रेहेंव, फेर उंकर दर्शन पहिली बेर तब होइस, जब उन पृथक छत्तीसगढ़ पार्टी के बैनर म रायपुर लोकसभा ले गाड़ी छाप म चुनाव लड़िन.
  तब मैं पढ़त रेहेंव. मोला सुरता हे, वो बखत हमन रायपुर के अमीनपारा म नव दुर्गा चौक म राहत रेहेन. दीवान जी अपन चुनाव प्रचार खातिर शीतला मंदिर डहर ले रेंगत रेंगत सब झन ल जोहार करत महामाया मंदिर डहर आवत रहिन. हमर घर दूनों मंदिर के बीच म रिहिसे, तेकर सेती दीवान जी ल देखइया अउ भेंट करइया मन के ए जगा भारी भीड़ होगे राहय.
  हमूं मनला जब जानकारी होइस, के दीवान जी इही डहार रेंगत रेंगत आवत हें, त हमूं मन घर ले निकल के बाहिर आगेन. उन माईलोगिन मन ल हाथ जोर के जोहार करंय अउ आदमी जात मन संग हाथ घलो मिला लेवंय. मन तो मोरो होइस के हाथ मिलाए जाय, फेर नइ मिला पाएन.
   जब हमन पढ़त राहन त हर शनिच्चर इतवार के छुट्टी म अपन गाँव नगरगांव जावन. दीवान जी ल रायपुर म चुनाव प्रचार करत देखे के बाद जब गाँव गेंव, त उहों इही चुनावे के गोठ होवत राहय. गाँव म हमर पारा के जम्मो सियान मन सकला के दीवान जी ल ही वोट दे के बात करत रहिन. हमूं मन उंकर चुनाव प्रचार करे के नांव अपन गाँव के संग म तीर तखार के अउ गाँव मन म जाके उंकर चुनाव चिनहा गाड़ी छाप बनावन.
   बाद म जब साहित्य जगत म आएन, तेकर पाछू तो फेर कतकों जगा उंकर संग मेल भेंट होवय. तहाँ ले तो अइसनो बेरा आइस, के उंकर संग एके मंच म बइठ के कविता पाठ घलो करे ले मिल जावय.
    तब के रायपुर जिला (अब गरियाबंद) के गाँव किरवई म 1 जनवरी 1945 के जन्मे पवन दीवान जी के चिन्हारी कवि, साहित्यकार के संगे-संग भागवत के प्रसिद्ध प्रवचनकार के रूप म घलो रिहिसे. उंकर आध्यात्मिक नांव स्वामी अमृतानंद सरस्वती रिहिसे. फेर हमला उंकर भागवत प्रवचन सुने के मौका तो नइ मिलिस. हां, एक पइत जरूर उंकर भागवत कथा के अंतिम बेरा के पांच मिनट देखे बर मिलिस.
   हमन मीर अली मीर, संजय शर्मा 'कबीर' अउ मैं कवि सम्मेलन म संघरे खातिर रायपुर ले थान खम्हरिया जावत रेहेन. रद्दा म जानबा होइस, के आदरणीय दीवान जी के भागवत आगू के एक गाँव म होवत हे. हमन आपस म चर्चा करेन, चलौ दीवान जी ल घलो अपन संग म ले चलथन, कवि सम्मेलन के गरिमा बाढ़ जाही.
   गाँव के भांठा म स्कूल तीर भारी पंडाल लगे राहय. हमन वो मेर पहुंचेन, त कथा समापन के पाछू आरती होवत राहय. आरती के पाछू दीवान जी व्यास गद्दी ले खाल्हे आइन. एती हमन ल देख के अपन परिचित शैली म उन हांसिन, अउ कहिन- अरे तहूं मन भागवत सुने बर आए हव, अतेक दुरिहा? हमन उंनला बताएन के कवि सम्मेलन म जावत हन, बीच रद्दा म आपके भागवत के जानकारी मिलिस, त गुनेन आपो ल संग म ले चलिन. उन हांसिन अउ कहिन, अरे का बतावंव, भागवत चलत हे तेकर ए, नइते सिरतोन म चल देतेंव. मोला तो कवि सम्मेलन म जादा मजा आथे.
    वइसे तो उंकर संग चारों मुड़ा अबड़ संघरन. मैं उनला हमर समाज के कार्यक्रम म घलो बलावंव. छत्तीसगढ़ राज के स्वप्नदृष्टा डा. खूबचंद बघेल के जयंती के बेरा म हमर समाज द्वारा रायपुर के तात्यापारा वाले कुर्मी बोर्डिंग म  एक सप्ताह के अलग अलग कार्यक्रम रखे जावय. एकर साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रम के संयोजक मुंही ल बना देवंय. तेकर सेती एमा छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन के संगे संग संगोष्ठी अउ कुछू आने कार्यक्रम घलो राखन, त दीवान जी ल पहुना के रूप म बलावन. एक बछर इही मंच म डा. परदेशी राम वर्मा जी मोला डा. खूबचंद बघेल अगासदिया सम्मान दीवान जी के हाथ ले देवाए रिहिन हें, अउ संग म मोर कविता संकलन 'सब वोकरे संतान ए संगी' के विमोचन घरो करे रिहिन हें.
   अपन जिनगी के संझौती बेरा म उंकर डा. परदेशी राम वर्मा जी संग भारी मयारुक संबंध रिहिस. कहूँ जावयं त दूनों, कुछू करयं त दूनों. वोमन भगवान राम के महतारी माता कौशल्या के नांव ले एक ठन समिति घलो बनाए रिहिन हें. एकर जगा-जगा कार्यक्रम करंय. तब मैं सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ म रेहेंव. वोमन दूनों समाचार दे खातिर प्रेस मन म घलोक पहुँच जावंय. हमर प्रेस म आवंय, त मोला पहिलिच के फोन कर देवंय, हमन नीचे म खड़े हावन तैं जल्दी आ अउ ए समाचार ल आजेच छपवा देबे.
   माता कौशल्या वाले अभियान म आदरणीय दीवान जी एक बात ल हर मंच म कहंय- 'बंगाल के मन अपन देवता ल धर के आइन, हम उंकरो पांव परेन. गुजरात के मन अपन देवता ल धर के आइन हम उंकरो पांव परेन. उत्तर प्रदेश अउ बिहार के मन अपन देवता धर के आइन, हम उंकरो पांव परेन. पंजाब अउ महाराष्ट्र के मन अपन देवता धर के आइन, हम उंकरो पांव परेन. भइगे चारों मुड़ा के देवता मन के पांव परई चलत हे. फेर मैं पूछथौं, अरे ददा हो, भइगे दूसरेच मन के देवता के पांव परत रहिबो त अपन देवता के कब पांव परबो?
   मोला उंकर ये बात बहुत अच्छा लागय. सिरतोन आय, हम दूसर सब के सम्मान करथन ए तो बने बात आय, फेर उंकर चक्कर म अपन देवता, अपन परंपरा मन के उपेक्षा करई ह तो सही नोहय न?  इही बात ल लेके हमूं मन इहाँ के मूल आध्यात्मिक संस्कृति अउ पूजा उपासना के विधि मनला के प्रचार प्रसार खातिर एक समिति 'आदि धर्म जागृति संस्थान' बनाए हवन, अउ वोकर बेनर म मैदानी काम घलो करत रहिथन.
   अइसने सब बात मन के सेती हमन जब राजिम के प्रसिद्ध पारंपरिक पुन्नी मेला के नांव ल बदल के 'राजिम कुंभ' कर दिए गे रिहिसे, तेकर नंगत विरोध करन. कतकों पत्र-पत्रिका म लेख अउ समाचार घलो छपवाए रेहेन. एकर संबंध म आदरणीय दीवान जी मोर तारीफ करे रिहिन हें. उन काहंय, ए परदेसिया मन हमर परंपरा अउ संस्कृति के सत्यानाश करत हें. इहाँ के मूल संस्कृति खातिर उंकर मन म वाजिब म भारी पीरा रिहिसे.
   राजिम कुंभ के नांव ले जेन आयोजन होवय. वोमा संत समागम घलो होवय. एक पइत हम दूनों उहाँ संघर परेन. मैं दैनिक छत्तीसगढ़ के साप्ताहिक पत्रिका 'इतवारी अखबार' के संपादन ल वो पइत  देखंव. वोमा राजिम ऊपर विशेषांक निकाले रेहेन, तेकर विमोचन उही मंच म होना रिहिसे. तेकर सेती प्रेस ले मोला भेज दे गे रिहिसे, अउ दीवान जी ल राजिम के रहवइया होए के सेती हाथ-पांव जोर के बलाए गे रिहिसे. संत समागम के ए मंच म विशेषांक के संपादन करे के सेती मोर सम्मान घलो करे गे रिहिसे.
   बाद म जब दूनों मिलेन त हांस डरेन. उन कहिन-' का करबे सुशील, तैं प्रेस म नौकरी करथस तेकर मजबूरी म इहाँ आए हस, ठउका अइसने मैं इहाँ रहिथंव, त बरपेली हाथ पांव ल जोर के मोला इहाँ तीर के लान लेथें.'
  आदरणीय दीवान जी 2 मार्च 2016 के ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले के परमधाम के रद्दा धर लेइन. हमन ल मीडिया ले जानबा मिलिस, के गुरुग्राम (हरियाणा) के एक अस्पताल म उन आखिरी सांस लेइन. मंझनिया करीब 2 बजे उंकर राजिम आश्रम म उनला  समाधि दिए जाही. मैं ए खबर ल सुनते डा. परदेशी राम वर्मा जी ल फोन करेंव, त उन बताइन के हव खबर ह  सिरतोन आय. हमन राजिम जाए बर निकल गे हवन. तब महूं ह उनला आवत हंव कहिके तुरते राजिम बर निकल गेंव.
   जावत-जावत रद्दा म मोर मन म उंकर बर श्रद्धांजलि के ए चार डांड़ गूंजे लागिस-
आंधी का रूप दिखाकर क्यों शांत हो गये पवन
तेरे ठहाकों से गूंज रहा है, अब भी धरा-गगन
काम अभी भी कई शेष हैं, जो तुमने प्रारंभ किए
छत्तीसगढ़ियों के सपनों को कुछ कुछ पूर्ण किए
उन्हें पूर्ण करने का हम तो, अब देते हैं वचन
यही हमारी श्रद्धांजलि है, शत-शत तुम्हे नमन
   उन महान आत्मा के सुरता ल डंडासरन पैलगी 🙏
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811