Tuesday, 25 May 2021

छै आगर छै कोरी तरिया

सुरता//
छै आगर छै कोरी तरिया
   हमर जुन्ना ग्रामीण जीवन म तरिया समृद्धि अउ संस्कार के प्रतीक रिहिसे. अइसे माने जावय के जेन गाँव म जतका जादा तरिया वो वतके संपन्न अउ खुशहाल. काबर ते जादा तरिया के रहे ले वो गाँव म पानी के जादा संरक्षण, अउ पानी के जादा संरक्षण ले खेत-खार म अन्न के जादा पैदावार. तब इही उपज ह लोगन के संपन्नता के मानक रिहिसे न. एकरे सेती तब जादा ले जादा तरिया कोड़वाय के चलन रिहिसे.
   हमन ल आज घलो सुने बर मिल जाथे, के फलाना गाँव म छै आगर छै कोरी तरिया रिहिसे. आज घलो छत्तीसगढ़ के इतिहास म अइसन गाँव मन के उल्लेख मिलथे, जिहां छै आगर छै कोरी तरिया रिहिसे. इहाँ हमर आसपास म हमर गाँव ले कोस भर के दुरिहा म बसे बड़का गाँव कूंरा (कुंवरगढ़) के नांव सुनन. हमन कतकों बेर तो उहाँ तरियच देखे के नांव म गे हावन. अब छै आगर छै कोरी तो नइ होही तरिया मन, फेर अभो अतका हे, जेकर ले भरोसा हो जाथे, के वाजिब म उहाँ छै आगर छै कोरी तरिया रिहिस होही.
   हमर लोक साहित्य म अहिमन रानी अउ रेवा रानी के गाथा तरिया म नहाएच ले होथे. नौ लाख ओड़िया, नौ लाख ओड़निन के उल्लेख म तरिया कोड़ाथे अउ फुलबासन के गाथा म मायावी तरिया रहिथे. जेमा एक लाख माल-मत्ता के जबर बरदी धर के रेंगइया बंजारा अउ नायक मन के स्वामीभक्त कुकुर के कुकुरदेव मंदिर के संगे-संग उंकर कोड़वाए तरिया के जानबा खपरी, दुर्ग, मंदिर हसौद, पांडुका तीर, रतनपुर जगा करमा-बसहा, बलौदा जगा महुदा जइसन कतकों गाँव म लोक मान्यता के अनुसार जानबा मिलथे.
   छत्तीसगढ़ म छै आगर छै कोरी तरिया होए के जानबा तो रतनपुर, मल्हार, खरौद, महंत, नवागढ़, अड़भार, आरंग अउ धमधा जइसन कतकों गाँव म होए के जानबा मिलथे. फेर ए सबो म पानी के संरक्षण के सबले अच्छा उदाहरण धमधा म देखे बर मिलथे. इहाँ सबले खास बात ए हे के इहाँ के जम्मो तरिया मनला बरसात के पानी ले भरे खातिर मानव निर्मित एक नरवा  बनाए गे रिहिसे, जेला "बूढ़ा नरवा" कहे जाथे.
  इहाँ ए जानना जरूरी हे, हमर इहाँ पानी निकासी के छोटे रद्दा ल नाली, वोकर ले थोकन बड़े ल ढोंड़गा या ढोंड़गी, अउ फेर वोकर बड़े ल नरवा, अउ नरवा ले बड़े ल नंदिया कहे जाथे. आखिरी म जम्मो स्रोत ले आवत पानी ह नंदिया के माध्यम ले समुंदर म समा जाथे. ए सब प्राकृतिक होथे. फेर धमधा म जेन नरवा हे, वो ह मानव निर्मित आय.
  ए नरवा ह आजकाल के नहीं, भलुक आठ सौ साल बछर पहिली उहाँ के गोंडवाना साम्राज्य द्वारा बनवाए गे रिहिसे, तेमा उहाँ के छै आगर छै कोरी तरिया, माने 126 तरिया के विशाल श्रृंखला ल भरे जा सकय.
    धमधा के महत्व पुरातात्त्विक अउ ऐतिहासिक रूप म घलो हे. ए नरवा ह ठउका वइसने हे, जइसे बांधा के कैचमेंट बने होथे.
   हमर पुरखा मन के पानी खातिर अइसन जागरूकता अउ संरक्षण के उदिम ल देख के गरब होथे. फेर आजकाल जेन अइसन ठिकाना मनके दुर्दशा होवत हे, तेला देख के रिस घलो लागथे. खासकर शहरी क्षेत्र म तो अतिच होवथे. हमन लइका राहन त सइकिल सीखे अउ चलाए के नांव रायपुर शहर ल चारों मुड़ा किंजरन. छुट्टी के दिन तो तीर-तखार के कोनो गाँव जइसे सरोना या रायपुरा के महादेव घाट घलो चल देवत राहन. तब रायपुर शहर पुरानी बस्ती इलाका म ही सकलाए बरोबर राहय. एकर छोड़ थोर-बहुत जय स्तंभ चौक के जावत ले एती-तेती बगरे असन. तब चारों मुड़ा जलरंग तरिया अउ रूख-राई दिख जावत रिहिसे. आज के रायपुर ल देखबे त एकर दुर्दशा बनगे हे तइसे जनाथे.
  हमर मनके देखतेच देखत कतकों अकन तरिया मन पटागें अउ उंकर जगा म आंखी ततेरत बड़े-बड़े बिल्डिंग, पारा, नगर अउ कालोनी दिखथे.
  नवा छत्तीसगढ़ राज बने के बाद इहाँ के पहिली मुख्यमंत्री अजित जोगी ह एक अच्छा बुता चालू करे रिहिसे, गाँव गाँव म 'जोगी डबरा' के निर्माण के माध्यम ले पानी के संरक्षण करे के एक नान्हे प्रयास चालू करवाए रिहिसे. फेर वोकर बाद के सरकार मन ए डहर चेत नइ करिन. उल्टा ए जरूर होइस, के बड़े बड़े उद्योग चालू करवाए के उदिम करिन. जेकर ले लगभग नंदावत पानी के स्रोत मन अउ जादा गति ले सूखाय लागिन.
  अभी घलो चेत करे जाय, त इहाँ के किसानी अउ निस्तारी के संगे-संग उद्योग मन खातिर घलो पानी के भरपूर संरक्षण करे जा सकथे. इहाँ जतका भी छोटे-बड़े नंदिया नरवा हे, सबो म हर दू-चार किलोमीटर के आड़ म छोटे छोटे स्टाप डेम बनाए के जोखा करे जाय. एकर ले इहाँ के बरसात के जम्मो पानी जेन बोहा के समुंदर म चले जाथे, वोला बहुत कुछ छेंके जा सकथे. एकर एक अउ फायदा ए होही के चारों मुड़ा के कुआँ-बावली अउ बोरिंग मन के जल स्तर म बढ़वार होही. फेर देखव अइसन नीति कब बनही?
छत्तीसगढ़ म 36 नंदिया फेर 36 गति हो जाथे
खेत-खार सुक्खा रहिथे कारखाना मजा उड़ाथे
जीना होही मुश्किल जब तक बनही अइसे नीति
कुआँ-बावली-बोरिंग सबके मरे कस होही गति
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Friday, 21 May 2021

रतिहा के किसबीन नाचा

सुरता//
रतिहा के वो 'किसबीन नाचा'
  हमर इहाँ के संस्कृति के मूल स्वरूप ल आने-आने क्षेत्र अउ राज ले लाने गे ग्रंथ अउ संस्कृति संग घालमेल कर के कइसे बदल दिए गे हे, एकर उदाहरण खातिर "किसबीन नाचा" के कारण ल जानना अउ समझना बहुत जरूरी हे.
  मोर जनम भाठापारा शहर म होए हे. उहाँ हमन हथनीपारा म राहत रेहेन. सिरिफ चौथी कक्षा के शिक्षा तक ही उहाँ रहि पाएंव. फेर उहाँ हर बछर होली बखत कोनो छुट्टी के दिन राहय, तेकर आगू रतिहा रात भर किसबीन नाचा चलय. तेमा बिहान भर के छुट्टी म लोगन घर म रहि के आराम कर सकंय. ए बात के सुरता मोला आजो ले हे.
   चौथी ले आगू के पढ़ई खातिर मैं अपन पैतृक गाँव नगरगांव आएंव, त इहों होली बखत 'किसबीन नाचा' के परंपरा ल देखेंव. हमर गाँव म तो कुछ जादच होवय. प्रतियोगिता करे बरोबर. एक पारा के मन अतका पइसा दे के नचाए बर लाने हे, त हमन जादा पइसा वाली ल लानबो.
   तब ए किसबीन नाचा ल काबर करे जाथे? ए बात ल नइ समझत रेहेन. अपन मूल संस्कृति के ज्ञान के अभाव म तब लोगन एला गलत नजरिया ले घलो देखयं अउ समझयं. छत्तीसगढ़ राज्य के स्वपनदृष्टा डॉ. खूबचंद बघेल जी एकरे सेती ए परंपरा के घोर विरोध करंय. डॉ. खूबचंद बघेल अउ हमर गाँव के खार एके म जुड़े हे. सियान मन बतावंय, ए परंपरा ल खतम करे खातिर डॉक्टर साहब लोगन ल इहाँ तक कहि देवत रिहिन हें- तुमन ल होले डांड़ म परी नचवाए के अतेक सउंखे हे, त मोर डाक्टरीन (अपन धर्मपत्नी) ल लेग जावव नचवाए बर, फेर ए किसबीन नचाए के परंपरा ल बंद करव भई.
   ए बात तो हे. वो बखत महिला कलाकार मन कोनो भी सार्वजनिक जगा म अपन कला के प्रदर्शन नइ करत रिहिन हें. तब शायद उनला आज के जइसे सम्मान के नजर ले नइ देखे जावत रिहिसे. एकरे सेती वो बखत के नाचा, नाटक या लीला आदि म पुरुष मन ही महिला पात्र के भूमिका ल निभावंय.
   महूं तब किसबीन नाचा के मूल कारण ल नइ जान पाए रेहेंव. काबर के किसबीन नाचा के होली परब के जेन प्रचारित रूप हे, तेकर संग तो कोनो संबंध नइए. त फेर ए नाचा के कारण का हे?
  होली के संबंध म तो तब हमन अतके सुनन अउ पढ़न न के भक्त प्रहलाद ल अपन कोरा म बइठार के वोकर फूफू होलिका ह चीता म बइठ गे रिहिसे, फेर भगवान के कृपा ले प्रहलाद तो बांचगे अउ होलिका खुदे वो चीता म बर के स्वाहा होगे. त फेर ए प्रसंग म किसबीन नाचा के का संबंध हे?
  साहित्य अउ पत्रकारिता ले जुड़े रेहे के सेती महूं कोनो कोनो विषय ऊपर तुतारी लेके भीड़ जावत रेहेंव. फेर वोकर कारण नइ समझ आइस. आगू चलके जब मैं साधना के रद्दा म आएंव, अउ कुछ अइसे संयोग जमे लगिस जब इहाँ के संस्कृति के मूल (वास्तविक) स्वरूप के ज्ञान मिले लगिस, तब समझेंव के छत्तीसगढ़ म जेन होली मनाए जाथे, वोला होलिका दहन के सेती नहीं, भलुक कामदहन के सेती मनाए जाथे. एकरे सेती ए परब ल वसंतोत्सव या मदनोत्सव घलो कहे जाथे.
   हमन कथा सुने हावन न,  शिव पुत्र के हाथ म मरे के वरदान पाए के बाद असुर ताड़कासुर भारी अत्याचार करे लागिस. काबर के वो अपनआप ल अमर होगेंव समझे बर धर लिए रिहिसे. काबर ते, शिव जी तो सती आत्मदाह के बाद घोर तपस्या म बिधुन होगे रिहिन हें. त फेर कहाँ ले उंकर लइका आतीस, अउ कइसे ताड़कासुर के अंत होतीस?
   देवता मन चारों मुड़ा ले चिथियागे रिहिन हें. तब सब सुन्ता होके कामदेव ल शिव तपस्या भंग करे खातिर भेजिन. तब कामदेव अपन सुवारी रति संग जाके शिव तपस्या भंग करे के उदिम करे लागिस.
  एकर खातिर वो ह वसंत के मादकता भरे मौसम के चयन करे रिहिसे. एकरे सेती हमन बसंत पंचमी के दिन होले डांड़ म जेन अंडा (अरंडी) के पौधा गड़ियाथन न तेन उही कामदेव के आए के प्रतीक स्वरूप आय. तहाँ ले वोकरे संग वासनात्मक गीत, नृत्य अउ दृश्य के चलन होथे, तेन सब वोकरे कारण आय. तेमा शिव जी के अंदर काम के उदय होवय, अउ वो ह पार्वती संग बिहाव कर लेवय, तेमा शिव पुत्र के हाथ ले मरे के वरदान पाये आततायी के संहार खातिर शिव पुत्र के जनम हो सकय.
  ए सब प्रसंग ल समझे के बाद मोला किसबीन नाचा के मूल कारण समझ म आइस, के ए ह उही कामदेव के सुवारी रति के नृत्य के प्रतीक स्वरूप आयोजन करे जाने वाला आयोजन आय.
  ए सब समझे के बाद मन म गौरवबोध होइस के हम कतेक गौरवशाली संस्कृति ल इहाँ जीयत हावन. संग म इहू समझ म आइस के ए परब ल बसंत पंचमी ले लेके फागुन पुन्नी तक लगभग चालीस दिन के एकरे सेती मनाए जाथे, काबर के कामदेव अउ रति अतके दिन तक शिव तपस्या भंग करे खातिर लगातार प्रयास करत रिहिन हें. आप खुदे सोचव, होलिका तो सिरिफ एके दिन म चीता रचिस, वोमा आगी ढिलवा के प्रहलाद ल अपन गोदी म धर के बइठिस, अउ खुदे भसम होगे, त फेर वोकर बर चालीस दिन के परब काबर???
  मैं छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति ल इहाँ के लोक परंपरा के आधार म नवा सिरा ले लिखे के बात हमेशा करथौं, तेकर इही सब कारण आय. फेर ए दुखद बात आय, के इहाँ के बुद्धिजीवी वर्ग आज घलो आने प्रदेश ले लाने गे ग्रंथ मन के आधार म गोठ करइया मन के ही पाछू किंजरे के ही बुता करत हें.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Thursday, 20 May 2021

जिनगी के साठा..

जिनगी के साठा
   अंगरेजी काल गणना पद्धति के अनुसार आज 2 जुलाई'21 के मैं साठ बछर के हो गेंव. हमर मितानी भाखा म कहिन त सठियागेंव. ए बात अलग हे, के हमर देशी कालगणना पद्धति के अनुसार ए तिथि ह असाढ़ अंधियारी पाख म पंचमी के आथे. फेर जेन देश के संसद अउ जम्मो प्रशासनिक व्यवस्था ह जेन गणना पद्धति ल अपना लिए हे, तेला आंखी तोप के कइसे छोड़े जा सकथे?
    जिनगी के सठियाना ल अपन करम-धरम के लेखा-सरेखा के बेरा आगे घलो कहे जाथे तइसे लागथे, तभे तो लोगन इही अवस्था ल चिंतन-मनन के रद्दा म लामी-लामा हो जाना चाही कहिथें. तब तक गृहस्थ जीवन के जिम्मेदारी ले मुक्त होए के आरो मिले ले धर लेथे. देंह-पांव घलो वोकर गवाही दे ले धर लेथे. मोर देंह तो दू बछर पहिलीच ले लकवा रोग के सपेटा म आके एकर सोर करत हे, के अब राहन दे तोर एती-तेती के पल्ला भगई ल. बस अब एके जगा बइठे राह या परे राह अउ का-का करे. कामा पास होए, अउ कामा नपास? अब बिन जांगर के का करे सकबे? इही ल गुन...
जिनगी के साठा अब पढ़ावत हावय पाठा
करम के खेती हरियाइस ते परे हे बंजर-भाठा
का मिल जाही अतकेच म परलोक के बांटा
बने माई कोठी के भरत ले ते सिरिफ खोंची-काठा
  सिरतोन आय. अब सिरिफ गुनइच भर रही गे हे. जेन उद्देश्य ल लेके जिनगी भर लिखेन-पढ़ेन, मिशन मान के जांगर टोर चारों मुड़ा भागेन-कूदेन. सब अधूरा छूट जही तइसे जनाथे.
  मोर साहित्य के लेखा-सरेखा मन तो जब साधना म गेंव, तभेच छदर-बदर होए ले धर लिए रिहिसे. एकर मनके महत्व ल जान-समझ के चेत करइया घर म कोनो नइ रेहे के सेती ऐतिहासिक जिनिस मन घलो छूछू-मुसवा के जेवन बनगें. साधना ले लहुटे के बाद ए रद्दा म सकेल ज्ञान अउ जरूरी जिनिस मनला जनता म बगराए के जतन ठउका करे ले धरत रेहेन, तइसनेच म लकवा के सोंटा परगे. सबो उद्देश्य अउ मिशन मोरेच देंह कस लरी-लरी होगे.
  अब तो दू बछर ले आगर होगे हे. दुनिया भर के जोखा करत फेर बिन ककरो थेगहा के घर ले निकले के लायक घलो नइ हो पाइस ए देंह ह. मोला अपन देंह के ए पीरा ले जादा वो ह जियानथे, के अतेक कूदे-फांदे अउ खोजे-खाजे के बाद घलो अभी मोर ए मिशन ल अपन खांध म बोह के आगू के रद्दा धरा देने वाला कोनो नइ मिल पाइस.
  संग म तो अबड़ झन संघरिन फेर सब संग म रेंगने वाला ही. मोर सिद्धांत अउ उद्देश्य ल लेके नेतृत्व करइया के अभी घलो अगोरा हे. अब तो धीरे- धीरे मोर लिखे कागज-किताब मन घलो जुन्ना होके अनपढ़ना बानी के होए ले धर ले हवय. कतकों मन तो अब  खोजे म घलो मुहिंच ल नइ मिलत हे. फेर आज के ए आधुनिक तकनीक के सहारा बने इंटरनेट म मोर एक ब्लाग www.mayarumati.blogspot.in बनगे हवय जेमा, अलवा-जलवा लिखे-पढ़े कुछ जिनिस मन तो सकलागे हवय. कोनो चतुर सुजान के नजर एमा पर जाही, अउ वो ह इंकर मन के गहराई ल समझ जाही, त निश्चित रूप ले मोर ए मिशन ल एक ठोसहा खांधा मिल जाही. देखव वो दिन कब आही?
  इहाँ के मूल आध्यात्मिक संस्कृति के पूजा-उपासना अउ जीवन पद्धति ल जन-जन म बगरा के बाहिर ले आवत आध्यात्मिक अतिक्रमण ल छेंके के जेन मोर उद्देश्य अउ मिशन रिहिसे, ते ह सिध पर पाही. बस इही आस लगाए अतकेच कहना हे...
जम्मो जीव-जगत जुरियावौ आदि धर्म के छइहां म
सृष्टि जेकर ले उपजे हे, उही मूल तत्व के बइहां म
सगुण- निर्गुण सब वोकरेच रूप, तेज-शक्ति के स्रोत
ऊंच- नीच के खंचका पाटव, जगावौ परमारथ के जोत
-सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Monday, 17 May 2021

कवि नाचा' के सुरता//

सुरता वो 'कवि नाचा' के
   तब कवि सम्मेलन के जादा चलन नइ रिहिसे. रायपुर म राठौर चौक के गंज स्कूल मैदान म साल म एक बार अखिल भारतीय कवि सम्मेलन होवय, जेमा जम्मो प्रदेश भर के कविता प्रेमी मन रात भर जुरियाए राहंय. एकर छोड़ एकाद-दू ठन अउ कभू भोरहा म हो जावत रिहिसे. छत्तीसगढ़ी के नांव म तब 'छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति' के गोष्ठी ही जादा होवय. लोहार चौक अउ लाखेनगर चौक के बीच म देवबती सोनकर स्मृति धरमशाला म. गाँव-गंवई म तो कवि सम्मेलन का होथे, तेनो ल बने गढ़न के जानत नइ रिहिन हें. कोनो शिक्षित अउ बड़का गाँव जेन शहर के तीर म राहय ते मन म भले एकर सोर बगरगे रिहिसे, फेर आम गाँव मन म बिल्कुल नहीं.
    हमर पुरखा साहित्यकार केयूर भूषण जी तब रायपुर लोकसभा के सांसद रिहिन हें. ब्राह्मण पारा के उंकर जुन्ना घर म हमर मन के आना-जाना राहय. सुशील यदु अउ रामप्रसाद कोसरिया तो ठउका पहुंची जावंय. सुशील यदु के घर घलो उहीच जगा राहय, तेकर सेती वोकर जवई जादा राहय.
   रायपुर लोकसभा के सांसद होए के सेती केयूर भूषण जी के इहाँ जम्मो किसम के लोगन जुरियावंय. हमन तब "मयारु माटी" म उंकर  उपन्यास "कुल के मरजाद" ल धारावाहिक छापत रेहेन. तेकर सेती केयूर भूषण जी के पीए मेहतरलाल साहू हमन ल बनेच चिनहय. हमन ल देखतीस, तहाँ ले एक बगल वाला दरवाजा राहय तेमा ले लेग के केयूर भूषण जी के सीधा कुरिया म लेग के बइठार देवय. ए दृश्य ल देख के बाहर बइठक म बइठे लोगन ल लागय, के हमन भारी एप्रोच वाला हवन, तेकर सेती सोझ कुरिया म जा के गोठिया लेथे. जबकि बात अइसन नइ राहय. केयूर भूषण जी के मेहतरलाल ल आदेश रिहिसे के साहित्यकार मन कोनो आवंय, उंनला सोझ मोर कुरिया म ले आए करव कहिके.
   उहाँ एक दिन सिमगा तीर के गाँव हरिनभट्ठा के सरपंच पहुंचे राहय. वोकर नांव के तो अभी मोला सुरता नइ आवत हे, फेर अतका हे, के उहाँ घेरी-भेरी जवई के सेती सुशील यदु संग वोकर बनेच चिन्हारी होगे राहय. तब सुशील यदु छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन खातिर उहाँ पहुंचे लोगन मन जगा जुगाड़ जमावत राहय. हरिनभट्ठा के सरपंच एक दिन तैयार होगे, हव हमर गाँव म कवि सम्मेलन करवाबो कहिके. वो गुनिस होही के एमन भारी एप्रोच वाला यें, एमन ल कवि सम्मेलन करवा के खुश कर देहूं, त एमन केयूर भूषण जी ल कहिके मोरो काम ल करवा देही.
    अवई-जवई अउ कुछु-कांही के गोठ-बात सुशील यदु दूनों वोमन कर डारिन. देवारी के आगू-पाछू अइसने कोनो छुट्टी के दिन राहय. तब जाड़ घलो नंगत दंदोरय. अब तो रूख-राई जंगल-झाड़ी मन के नंदई के सेती पहिली कस जाड़ेच नइ परय.
   निश्चित दिन अउ बेरा म हमन रायपुर के जुन्ना बस स्टैंड म सकलाएन. उहाँ देखेन त सिरिफ पांचे झन- बद्री विशाल यदु 'परमानंद', सूरजबली शर्मा, रामप्रसाद कोसरिया, सुशील यदु अउ मैं. अतका ल देख के परमानंद डोकरा सुशील ऊपर भड़कगे- पांचे झन म कवि सम्मेलन कइसे होही? त सुशील बताइस, के सिमगा क्षेत्र के एक-दू अउ कवि मनला खबर भेज डारे हंव वो मन उही डहार ले शामिल हो जाहीं.
   रायपुर ले बस चढ़ के हमन सिमगा म उतरेन. उहाँ हमन ल हरिनभट्ठा लेगे खातिर कोनो नइ आए राहय. सुशील यदु बताए राहय के हमन ल लेगे खातिर लोगन वो गाँव ले आहीं. काबर ते हमन वो क्षेत्र बर एकदम नवा राहन. वो गाँव ल देखई तो दुरिहा जाय, वोकर नांव तक कभू नइ सुने राहन.
   जब बेरा बुड़े असन होए ले धरिस, त डोकरा फेर भड़किस. आखिर सुशील यदु के जोजियई म रेंगत हरिनभट्ठा जाए के जोम जमाएन. वो पांचों म मैं सबले छोटे राहंव, फेर गाँव गंवई के मनखे, मोर बर एकाद कोस के रेंगई ह जादा मुसकिल के बात नइ रिहिसे. फेर बद्री विशाल यदु 'परमानंद' अउ सूरजबली शर्मा ए दूनों सत्तर बछर के आसपास के होगे रिहिन हें. एकर मन के बारे म सोचे जा सकथे, का स्थिति रिहिस होही? मैं अपन जिनगी म पहिली बेर तब परमानंद डोकरा ल सुशील यदु ल वतका भारी-भरकम गारी देवत सुने रेहेंव.
   कइसनो कर के हरिनभट्ठा पहुंचेन. गाँव म जाड़ के दिन म लोगन जल्दी बियारी करके खटिया जठना म ओधे ले धर लेथें. हमन सरपंच घर गेन तब तक उहू मन बोर-सकेल डरे राहंय. हमन ल देखिन त फेर खाना बनाए बर कहिस. अउ बताइस के मैं तो कवि सम्मेलन के बात ल भुलागे रेहेंव. तुमन आइच गे हव त कोनो मेर चार ठन बांस ल गड़िया के बोरा उरा टंगवा देथंव.
   सरपंच ह अपन एक-दू झन कार्यकर्ता मन ल बांस गड़ियाए बर भेज दिस. अउ हमन ल चाय-पानी खातिर घर म बइठारिस.
    अइसे-तइसे करत रात के नौ साढ़े नौ असन होगे. हमन ल कवि सम्मेलन ठउर म लेगिन. उहाँ चार ठन बांस गड़े राहय, तेकर ऊपर एक ठन बोरा ल सिल के बनाए तरपाल लगे राहय. वो तरपाल म एक ठन नानचुक बलफ ह जुगुर-जुगुर करत राहय. फेर आदमी के नांव म वो जगा वो सरपंच के दू-चार कार्यकर्ता के छोड़ अउ कोनो नइ राहय. सरपंच घलो मोला बिहनिया ले कछेरी जाना हे, कहिके अपन घर जाके सूतगे राहय.
   वो जगा जेन चार-पांच मनखे रहयं, वोमन हमन ल वो ठउर म बिछे बोरा म बइठार के गोठियावत राहंय. एक झन काहत राहय-'मोला तो ए दूनों डोकरा जोक्कड़ बनत होहीं तइसे लागथे. अउ ए सब झनले छोटे हे, तेन ह परी बनत होही.'
   दूसरइया कहिस- 'हो सकथे भई, फेर मोला ए समझ म नइ आवते, के ए मन बिन बाजा- रूंजी के कइसे 'कवि नाचा' करहीं? ए मन तो बाजा के नांव म कुछू लानेच नइए?'
   मैं अउ रामप्रसाद उंकर गोठ-बात ल सुन के मुसकावत राहन. तभे परमानंद डोकर सुशील ऊपर खिसियाइस- कइसे कवि सम्मेलन होही इहाँ? न तो सुनइया कोनो हे, न माईक. बस जाड़ भर मरत ले लागत हे.
   सुशील यदु कहिस- हमला का करना हे, कोनो राहय ते झन राहय. हमला अपन 'लिफाफा' ले के काम ल तो करनच हे. कहिके वो खड़ा होइस, अउ कवि सम्मेलन के भूमिका बांधत सबके परिचय कराए लागिस. तहाँ ले पहला कवि के रूप म रामप्रसाद कोसरिया ल बलाइस.
   हमन ल लागत रिहिसे, के हमर मन के आवाज ल सुन के गाँव वाले मन सकलाहीं. फेर उल्टा होगे. रामप्रसाद जइसे अपन गीत -'गाड़ा रावन तोर गर के माला' ल गाए के चालू करिस, तहाँ ले वो मेर जेन सरपंच के कार्यकर्ता राहंय, तेनों मन अपन-अपन घर डहार रेंग दिन. तहाँ ले हमूं मन सरपंच घर जाके, उहाँ हमर मन बर बिछाए पैरा ऊपर बोरा म सूत गेन.
   बिहनिया उठेन, त परमानंद डोकरा सुशील ल कहिस -'लिफाफा' देख ले जल्दी रायपुर पहुंचना हे. सुशील ह सरपंच ल पता करिस, त पता चलिस के वो तो हमर मन ले पहिलिच ले उठ के सिमगा जाए बर निकलगे हे.
   सब तरुवा धर लिन. आखिर कइसनो कर के गिरत-हपटत रायपुर पहुंचेन. हमन कभू मजा ले खातिर ए घटना के चर्चा करन, त डोकरा मन तो भड़क जंय- हरिनभट्ठा म लेग के हमर मन के भट्ठा बोर दिस कहिके, फेर हम तीनों जवनहा जब भी वोकर सुरता करन, त पेट ल चपक-चपक के हांसन, जय हो 'कवि नाचा' के काहत-काहत.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Wednesday, 12 May 2021

अक्ति परब (संशोधित)

अक्ति : कृषि का नव वर्ष....
छत्तीसगढ़ में जो अक्ति (अक्षय तृतीया) का पर्व मनाया जाता है, उसे कृषि के नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। पुतरा-पुतरी का बिहाव या उस दिन विवाह के लिए अखण्ड शुभमुहुर्त जैसी बातें तो उसका एक अंग मात्र है। वैसे पुतरा-पुतरी का इस दिन बच्चों के द्वारा विवाह करने के संबंध में एक धारणा यह है, कि बच्चों के अंदर गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों के प्रति बचपन से ही अहसास कराना, ताकि परिपक्व अवस्था आने पर वे आसानी से इस दायित्व का निर्वहन कर सकें.

   हमारे यहां इस दिन किसान अपने-अपने खेतों में नई फसल के लिए बीजारोपण की शुरूआत करते हैं। इसे यहां की भाषा में "मूठ धरना" कहा जाता है। इसके लिए गांव के सभी किसान अपने यहां से धान का बीज लेकर एक स्थान विशेष पर एकत्रित होते हैं, जहां गांव का बैगा उन सभी बीजों को मिलाकर मंत्र के द्वारा अभिमंत्रित करता है, फिर उस अभिमंत्रित बीज को सभी किसानों में अापस में बांट दिया जाता है। कृषक इसी बीज को लेकर अपने-अपने खेतों में ले जाकर उसकी बुआई करते हैं।

   जिन गांवों में बैगा द्वारा बीज अभिमंत्रित करने की परंपरा नहीं है, वहां कृषक अपने बीज को कुल देवता, ग्राम देवता आदि को समर्पित करने के पश्चात बचे हुए बीज को अपने खेत में बो देता है। बीज बोनी यह का कार्य दिन में ही संपन्न कर लिया जाता है. फिर इसी दिन शाम को कृषि तथा पौनी- पसारी से संबंधित कामगारों की नई  नियुक्ति भी की जाती है। इसके साथ ही इस दिन से कई अन्य कार्य की भी शुरूवात की जाती है। जैसे कई लोग नए घड़े में पानी पीना प्रारंभ करते हैं, कई लोग आम जैसे अन्य मौसमी फलों को इसी दिन से तोड़ने या खाने की शुरूवात करते हैं।

    अक्ति म ढाबा भरे के घलो रिवाज हवय. किसान मन ए दिन अपन अंगना म गोबर के तीन ठिक खंचवा बनाथें जेला ढाबा कहे जाथे. ढाबा म धान , उन्हारी, जैसे-तिंवरा या राहेर अउ पानी भरे जाथे उहू म टिपटिप ले फेर ओकर आगू म हूमधूप देके पूजा करे जाथे तेकर बाद फेर बीजबोनी टुकनी म बीजहा, कुदारी, आगी पानी हूमधूप धर के खेत म बोंवाई के मूठ धरे जाथे। घर के देवाला म नवा फल ल नवा करसी के पानी ल चढ़ाय जाथे ।अउ अपन पुरखा मन ल सुरता  कर के तरिया या नंदिया म उराई गड़ा के नवा करसी या फेर तांबा के चरु म पानी डारथें अउ पितर पुरखा मन ल पानी देहे जाथे अर्थात पितर तरपन वाला पानी दे जाथे.

अक्ति आगे घाम ठठागे चलव जी मूठ धरबो
हमर किसानी के शुरुवात सुम्मत ले सब करबो
बइगा बबा पूजा करके पहिली सबला सिरजाही
फेर पाछू हम ओरी-ओरी बिजहा ल ओरियाबो

* सुशील भोले
मो. 98269-92811