11 मई पुण्यतिथि म सुरता//
संत कोटि के अलमस्त कवि बद्रीबिशाल परमानंद
जेन मनखे के रचना मन भले कभू पत्र-पत्रिका के मुंह नइ देखिन, फेर लोगन के कंठ म बिना वोकर रचनाकार के नांव जाने बइठिस अउ सुर धर के निकलिस, उही तो लोककवि होइस.
सन् 1917 के रथयात्रा परब के दिन रायपुर जिला के गाँव छतौना (मंदिर हसौद) म महतारी फुलबाई अउ ददा रामचरण यदु जी के घर जनमे बद्रीबिशाल यदु 'परमानंद' जी के संग अइसने होए हे. उनला उंकर जीयत काल म ही लोककवि के रूप म चिन्हारी मिलगे रिहिसे.
वोकर लोकप्रियता अतेक रिहिसे, जेला देख के हमूं मनला गरब होवय. मोला सुरता हे, बसंत पंचमी के दिन हर बछर गुरु पूजा के रूप म उंकर सम्मान होवय. पूरा छत्तीसगढ़ म चारों मुड़ा सैकड़ों के संख्या म बगरे उंकर चेला मन अपन-अपन मंडली संग सकलावयं. हर बछर ए आयोजन ह अलग-अलग जगा म होवय, तेकर सेती मैं दुरिहा वाले आयोजन म तो नइ जा सकत रेहेंव, फेर भांठागांव म दू-चार बखत संघरे रेहेंव.
वो बखत के लोकप्रिय गायक केदार यादव, साधना यादव, कुलेश्वर ताम्रकार, छन्नू यादव, नरेश निर्मलकर जइसन कतकों नवा अउ जुन्ना गायक-गायिका मन परमानंद जी के पूजा-सम्मान करयं अउ रात भर उंकरेच लिखे गीत मन के प्रस्तुति देवयं. परमानंद जी के संग म हमर मन असन नेवरिया मनला ल घलो उंकर संग मंच म बइठार के गुरु-पूजा के सम्मान देवयं.
सन् 1947-48 म परमानंद जी स्व. हनुमान प्रसाद यदु जी ले साहित्य विशारद के शिक्षा लिए रिहिन हें. तब हरि ठाकुर, देवीप्रसाद वर्मा 'बच्चू जांजगिरी जइसन साहित्यकार मन उंकर गुरु-भाई रिहिन.
परमानंद जी माटी के कवि रिहिन. उंकर रचना मन म छत्तीसगढ़ माटी के महक जनाथे. भले उन रायपुर जइसन शहर म रहंय, फेर ग्रामीण संस्कार अउ परिवेश ह उंकर गीत म सांस लेवय. बसंत के आगमन म लिखे एक गीत देखव-
मातगे हे सरसों के फूल, गंधिरवा मातगे हे रे..
मातगे हे परसा, मातगे हे कउहा
अरसी के झूल माते, गहूं के घूल माते
तिंवरा के लाज गे हे रे
गंधिरवा मातगे हे रे..
बसंत के ये प्राकृतिक मादकता बेरा म लइका, सियान, जवान सब मदमस्त होगे हें, देखव-
मातगे हे लइका मन गुदु-गुदु हांसी
मातगे बुढुवा घलो लागे खुदबुदासी
झुमर झुमर झुमर झुमर माते जवानी
सुवा पड़की नाचगे हे रे..
गंधिरवा मातगे हे रे..
किसान के दुख-पीरा ल समझत कवि वोकर जोहार करत कहिथे-
तोला बंदव हो,
तोला संवरंव हो, मोर नगरिहा देवता.
मोर अलकरहा, मोर बलकरहा
तोर भरोसा तीन परोसा दुनिया ह खाथे नेवता..
* * * * *
नगरिहा नइ उपजय तोर बिन धान.
धरती पूजीं, धरती रुजीं धरती पूत किसान.
दाई के थन म दूध भरे हे
लइका बर भगवान गढ़े हे
तइसे तोला गढ़ के भेजिस
भुइंया बर भगवान..
परमानंद जी के नांव ले सैकड़ों भजन अउ फाग मंडली रिहिस, जेकर बर उन भजन के संगे-संग फाग घलो लिखंय. उंकर लिखे कतकों फाग मन आज घलो जनमानस म व्याप्त हे, जेला लोगन पारंपरिक गीत या फाग के रूप म गावत रहिथें-
एक गीत म देखव, गोप बाला दही बेचे बर निकले हे, अउ कन्हैया वोला छेंक के दही मांगत हे-
मांगे कन्हैया माखन देबे का वो
नहीं नहीं काहत वो हां हां म आगे.
दही बेचत बेचत दही वाली बेचागे..
परमानंद जी सैकड़ों के संख्या म गीत, भजन अउ फाग लिखिन, फेर कभू वोला सकेल के नइ राखिन. मैं तो कतकों बेर अइसनो देखे हौं, कोनो उंकर चेला या गायक कलाकार रचना मांगे बर या लिखवाए बर आए राहय, वोला वो लिख के ओरिजिनल प्रति ल ही दे देवत रिहिन हे. न वोकर दूसरा प्रति बनावय, न अउ कुछू करय. एकरे सेती उंकर रचना मन के बारे म निश्चित कह पाना कठिन हे, के उन कतेक लिखिन, कोन-कोन संदर्भ म लिखिन. एकदम फक्कड़ किसम के संत मन होथें न, न कुछू के चिंता न फिकर. बस अपन म मस्त. तभो ले उंकर मंडली अउ चेला मन जगा ले खोज-निमार के 45 ठन रचना मनला छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति डहार ले 'पिंवरी लिखे तोर भाग' के नांव ले एक संकलन के रूप म निकाले गे हे.
अइसने सब परिस्थिति के सेती परमानंद जी के कतकों रचना मन के बारे म लोगन ए नइ जानंय, के वो काकर लिखे आय. मैं तो इहाँ तक देखे हौं. धमतरी क्षेत्र एक कवि सम्मेलन म उहिच डहार के एक झन कवि ह परमानंद जी के गीत ल अपन रचना आय कहिके मंच म बड़ा शान से पढ़त रिहिसे. संयोग ले महूं वो मंच म आमंत्रित कवि के रूप म उपस्थित रेहेंव.
परमानंद जी जिनगी के आखिरी बेरा म थोरिक बनेच शारीरिक कष्ट पाइन हें. वइसे ए बात ल मैं आध्यात्मिक मनखे होय के सेती समझथौं, काबर ते ऊपर वाला जेला मोक्ष या सद्गति देथे, वोकर पिछला जनम मन के हिसाब-किताब ल बरोबर करे बर जिनगी म कुछ अइसन तकलीफ के बेरा देथे. अध्यात्म म इही ल 'प्रारब्ध भोग' केहे गे हे. प्रारब्ध भोग ल पूरा करे बिना कोनो भी मनखे ल सद्गति नइ मिलय.
परमानंद जी 11 मई 1993 के ए दुनिया ले बिदागरी ले लेइन. जब उंकर सरग सिधारे के खबर वोकर मंडली के लोगन ल मिलिस, त उनला भजन-कीर्तन करत अंतिम यात्रा म लेगे के व्यवस्था करे गिस. रायपुर के रामकुंड म आमा तरिया हे, एकरे पार म उनला स्थान दिए गइस. वतका बखत महूं वो जगा उपस्थित रेहेंव. तब दू किसम के विचार चलत रिहिसे, के उनला समाधि दिए जाय दाह संस्कार करे जाय.
कतकों झन कहंय, के उंकर जिनगी तो एक संत बरोबर रेहे हे, तेकर सेती उनला समाधि देना उचित रइही. कतकों दाह संस्कार कर के वो जगा स्मारक बनाय के बात काहंय. आखिर म दाह संस्कार कर के उही जगा म चबूतरा बनाए के निर्णय लिए गइस. आज वो चबूतरा ल 'परमानंद चबूतरा' के नांव म लोगन जानथें. कोनो परब-विशेष म उंकर चेला मन वोमा दीया-अगरबत्ती कर नरियर-फूल चढ़ा के उंकर आशीर्वाद लेवत रहिथें.
उंकर सुरता ल डंडासरन पैलगी🙏🌹🙏
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Saturday, 19 March 2022
अलमस्त कवि बद्रीबिशाल परमानंद
Thursday, 17 March 2022
छत्तीसगढ़ी ढाबा.. हेमनाथ यदु
जन्म 1 अप्रैल , निधन 5 अप्रैल
छत्तीसगढ़ी ढाबा ल पोठ करइया हेमनाथ यदु
छत्तीसगढ़ राज निर्माण खातिर जब ले हमर पुरखा मन सन् 1950 के दशक म आन्दोलन के जोंग जमाइन, ओकरेच संगे-संग इहाँ के गुनिक साहित्यकार मन घलो एकर भाखा-साहित्य के कोठी ल जबर भरे बर मिशन बना के छत्तीसगढ़ी म गजबेच लिखिन. ए रद्दा म ठोसहा बुता करइया वाले मन के अगुवा के डांड़ म हेमनाथ यदु जी के नांव सोनहा आखर म लिखाय जगजग ले दिखथे.
रायपुर के महामाई पारा म 1 अप्रैल 1924 के बृजलाल यदु अउ महतारी गोदावरी देवी के घर जनमे हेमनाथ जी नान्हे उमर ले ही लिखे ले धर लिए रिहिन हे, फेर उनला वतका सफलता नइ मिल पावत रिहिसे. ठउका उही बेरा उन सुप्रसिद्ध लोककवि बद्रीबिशाल यदु 'परमानंद' जी के संगत धरिन. बद्रीबिशाल जी अउ हेमनाथ जी दूनों कका-बड़ा के भाई रिहिन, तभो ले हेमनाथ जी उनला अपन साहित्यिक गुरु के पदवी दिन. इहाँ ए जानना जरूरी हे, परमानंद जी वो बखत के सुविख्यात लोक गीतकार के रूप म जाने जावंय. पूरा छत्तीसगढ़ म परमानंद भजन मंडली के नांव म उंकर पचासों मंडली चलय, उही म जुड़ के हेमनाथ जी घलो उहाँ के प्रमुख कवि अउ भजन लिखइया बन गइन.
वइसे तो हेमनाथ जी अपन जिनगी के शुरूआत शिक्षकीय कार्य ले करिन. डिस्ट्रिक्ट कौंसिल के जमाना म रायपुर ले ही लगे गाँव कांदुल म 2-3 बछर पढ़ाइन, फेर सन् 1953 म लोक निर्माण विभाग म अनुरेखक के पद म चल दिन, इही बेरा म उंकर भेंट बड़का साहित्यकार हरि ठाकुर जी संग होइस. इहें ले फेर उनला साहित्य लेखन के एक ठोस रस्ता मिलिस. फेर धीरे धीरे उन आस-पास के आने साहित्यकार मन संग मेल-भेंट करे लगिन. तहाँ ले शारदा चौक रायपुर के उदयराम साहू जी के घर म होवइया गोष्ठी आदि म जाए लागिन. संगे-संग कवि सम्मेलन मन म घलो संघरे लागिन. उंकर एक छत्तीसगढ़ी गीत तब जगबेच लोकप्रिय होय रिहिसे, जेला उन प्रायः हर मंच म सुनावंय-
सुरता राखे रा संगवारी
तोर बर खुल्ला हवे दुवारी
मोर राहत ले कोनो तोला
कइसे देही गारी...
हेमनाथ जी के कुछ गीत मनके वो बखत ग्रामोफोन रिकार्ड घलो बने रिहिसे, जेला गंगाराम शिवारे जी अपन आवाज दे रिहिन हें. हेमनाथ जी के एक गीत ल दाऊ रामचंद्र देशमुख ह अपन ऐतिहासिक प्रस्तुति 'चंदैनी गोंदा' म घलो लिए रिहिन हें-
चल शहर जातेन रे भाई
गाँव ल छोड़ के शहर जातेन
ए गीत ल भैयालाल हेड़ाउ जी अपन स्वर दिए रिहिन हें. सन् 1974 म उंकर मयारुक रचना मन के संग्रह 'सोन चिरइया' छपे रिहिसे, जेकर भूमिका म प्यारेलाल गुप्त जी ए डांड़ ल उद्घृत करे रिहिन हें-
छत्तीसगढ़ी के मनखे सुघ्घर, गजब मीठ उनकर बोली
महानदी के जल म जइसे, मधुरस ला देइन घोली
हेमनाथ जी 1970 के आसपास दैनिक युगधर्म म 'अपन बात' शीर्षक ले एक साप्ताहिक कालम घलो लिखत रिहिन हें, जेन वो बखत गजबेच लोकप्रिय होय रिहिसे. उंकर कतकों लेख, कविता अउ निबंध आदि दैनिक युगधर्म, नवभारत, राष्ट्रबंधु अउ छत्तीसगढ़ी सेवक आदि मन म छपत राहय. आकाशवाणी रायपुर ले घलो कतकोन कविता मनके प्रसारण होवत राहय.
हेमनाथ जी गजबेच लिखत रिहिन हें, फेर वोमा के कुछ रचना मन ही किताब के रूप धरे पाइन अउ अबड़ अकन पाण्डुलिपि मन अभी घलो प्रकाशन के रद्दा जोहत हे. उंकर छपे किताब मन म हे- छत्तीसगढ़ के गउ गोहार, सोन चिरइया, छत्तीसगढ़ी रामायण सुंदरकांड, नवा सुरुज के अगवानी, हेमनाथ यदु : व्यक्तित्व एवं कृतित्व, मन के कलपना, छत्तीसगढ़ दरसन, सुरता राखे रा संगवारी. जेन अभी छपे के बाट जोहत हे वोमा- छत्तीसगढ़ी रामायण अरण्य कांड प्रमुख हे. एकर संग अउ कतकों लेखनी हे, जिनला पाठक वर्ग के बीच म आना चाही.
हेमनाथ जी अउ उंकर सुवारी बिन्दा बाई के तीन बेटा हें- बसंत, बसनू अउ मन्नू. एमा के बड़े बेटा बसंत ह साहित्य के रद्दा म रेंगत रेहे हे. उंकर तीसरा पीढ़ी म घलो सबले छोटे बेटा मन्नू के सपूत देवकांत ह 'परमानंद' उपनाम ल धर के अपन पुरखा मन के रद्दा म रेंगे के उदिम करत हे. वोला शुभकामना हे- अपन पुरखा मन के ठोसहा बुता ल आगू बढ़ावय, संग म वोकर मन के वो जम्मो रचना, जे मन प्रकाशन के अगोरा करत हें, उहू मनला छपवा के छत्तीसगढ़ी भाखा के कोठी-ढाबा ल लबलब ले भरय.
कहिथें न सोनहा-रतन मन कमती दिन खातिर ये लोक म आए रहिथें. बस झपाझपा काम-बुता करथें, अउ हब ले रेंग देथें. हेमनाथ जी घलो बहुत जल्दी ए दुनिया ले बिदागरी ले लेइन. जिनगी के संझौती बेरा म उनला टोटा के कैंसर होगे रिहिसे. दू बछर तक जमराज संग लड़त रिहिन, फेर अपन रचना धरम ल छोड़िन नहीं. उन अपन आखिरी रचना म महामाया दाई ल अरजी लिखिन-
दाई कोरा के भर दे दुलार
पिया के घर जाना हे
कोन जानत हे अब कब आना हे
पिया के घर जाना हे...
परम धारमिक, महामाया दाई के परमभक्त हेमनाथ जी रामनवमी के दिन 5 अप्रैल 1979 के अपन पिया के घर सिरतो म चल दिन. आज उन शारीरिक रूप म भले हमर बीच नइहें, फेर उंकर साहित्य, उंकर गीत हमेशा उंकर सुरता देवावत रइही-
नजरे नजर म गम लेवत रइहव मोर मितान
नजरे नजर म
रस्ता ल आवत-जावत देखत रइहव मोर मितान
नजरे नजर म....
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Tuesday, 15 March 2022
कुवांरी आगी अउ रोग-राई के दहन..
कुवांरी आगी अउ रोग-राई के दहन..
होली परब म होले डांड़ म जलाए खातिर जेन लकड़ी, छेना या अन्य जिनिस सकलाय रहिथे, वोला जलाए बर कुवांरी आगी के उपयोग करे जाथे, अउ वोमा जम्मो जीव-जन्तु अउ गाँव ल जम्मो किसम के रोग-राई ले बचा के राखे के प्रतीक स्वरूप घलो कुछ खून चूसक किटाणु मन ल वोमा डार के भसम कर दिए जाथे.
हमन गाँव म राहन त अपन बबा संग होले डांड़ जावन. वो हमन ल पांच ठन छेना धरे बर घलो काहय. ए पांच छेना ह कोनो भी मृतक के दाह संस्कार के बेरा पंचलकड़िया दिए जाथे, तेकरे प्रतीक स्वरूप होवय.
हमर गाँव म वइसे फाग गीत गाए-बजाए खातिर कतकों ठउर राहय. सबो पारा वाले मन अपन-अपन पारा म चौक-चातर असन जगा देख के गावयं-बजावयं, फेर होले बारे के परंपरा ल पूरा बस्ती म एकेच जगा निभाए जाय.
गाँव के बइगा ह अपन जम्मो तैयारी-संवागा संग होले डांड़ म आवय अउ चिकमिक पखरा म लोहा के एक नान्हे खुरदुरा टुकड़ा म छनडाती असन मारय, जेमा ले आगी के लुक छटकय तहाँ ले ओमा रखाय छोटे असन पोनी ह वो लुक के संपर्क म आए ले गुंगवाय बर धर लेवय. तहाँ ले वोला फूंक-फूंक के बने सिपचावय, अउ वो जगा सकलाय-रचाय लकड़ी के ढेरी म ढील देवय.
बइगा जेन चिकमिक पखरा ले आगी सिपचावय, उही ल कुवांरी आगी कहे जाथे. एमा चिकमिक पखरा म जेन पोनी या रूई के उपयोग होथे, वोहा सेम्हरा पेड़ के फर ले निकलने वाला पोनी होथे. कतकों गाँव म शायद अब ए परंपरा नइ दिखत होही. अब चिकमिक पखरा ले आगी सिपचाए के बदला कोनो मंदिर-देवाला या अन्य माध्यम ले आगी सिपचाए के जोखा करे जावत होही.
होले म आगी सिपचे के बाद सबो झन वोकर आंवर-भांवर किंजरन अउ संग म लेगे पांच ठन छेना ल पचलकड़िया के प्रतीक स्वरूप वोमा डार देवन. कतकों झन अपन घर ले ढेकना, किन्नी, पिस्सू जइसे खून चूसक किटाणु मन ल घलो लेके जावय अउ वो बरत होले म डार देवय. सियान मन बतावयं- ए ह गार-गरु अउ जम्मो गाँव ल खुरहा-चपका के संगे-संग अउ अन्य किसम के फैलने वाले बीमारी अउ महामारी मनले बचाए खातिर उंकर मनके किटाणु के प्रतीक स्वरूप डारे जाथे.
होले जब अच्छा से बर जाय अउ जब वोमा ले राख निकले लगय, त फेर सब झन वोमा के राख ल धर के एक-दूसर के माथ म लगावन तहाँ ले अपन-अपन घर लहुट आवन.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Monday, 14 March 2022
वो पबरित भुइयाॅं जिहां किशोरावस्था ले....
सुरता//
वो पबरित भुइयाॅं जिहां किशोरावस्था ले युवावस्था म पॉंव रखेंव...
छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर आज अतका चौंक-चाकर म बगरगे हावय, ते हमन ल घलो कतकों नवा-नवा पारा अउ कालोनी मन के जानकारी नइए. एक बेरा रिहिसे, जब हमन सइकिल सीखे अउ चलाए के सउंख म पूरा रायपुर ल कैंची फांस म आधा पैडिल मारत किंजर देवत रेहेन.
कक्षा 8 वीं पढ़े ले मैं रायपुर आए हंव. तब हमन अभी के पुरानी बस्ती थाना के आगू म हमरे गाँव वाले के एक घर हे तिहां राहन. वोकर बाद महामाया मंदिर के थोरके पहिली नवदुर्गा चौक म. तब तक हमन किराया के घर म राहत रेहेन. बाद म हमर सियान ह संजय नगर म अपन खुद के घर बनाइन, तब ले अभी इहें राहत हावन.
मैं वो जुन्ना बेरा अउ पारा के आज एकर सेती सुरता करत हौं, काबर ते वो पूरा इलाका ह छत्तीसगढ़ी भाखा-साहित्य खातिर गजबेच उपजाऊ अउ पबरित भुइयाॅं रहे हे.
हमर नवदुर्गा चौक के डेरी हाथ म महामाया मंदिर हे, ठीक एकरे ले लगे हे सुप्रसिद्ध लोककवि रहे बद्रीविशाल यदु 'परमानंद' जी के घर, अउ उहुच तीर रिहिसे हेमनाथ यदु जी के घर. एमन दूनों कका-बड़ा के भाई रिहिन. हमर नवदुर्गा चौक के जेवनी डहर छत्तीसगढ़ी भाखा के पहिली कवयित्री डॉ. निरुपमा शर्मा जी के घर रिहिस अउ ठीक वोकर तीन घर के आड़ म डॉ. सुखदेव राम साहू 'सरस' जी के घर.
नवदुर्गा चौक के ठीक पाछू म बिरंची नारायण मंदिर हे, बूढ़ेश्वर मंदिर ले लगे हुए, उहाँ एक चाल बने हे, जेला बिरंची मंदिर चाल कहिथें, इही चाल म लक्ष्मण मस्तुरिया जी राहत रिहिन तब उन वामन राव लाखे स्कूल म पढ़ावत रिहिन. एती पुरानी बस्ती थाना के ठीक आगू ले एक गली हे, जे ह कंकाली मंदिर जाथे, ए गली म डॉ. शालिक राम अग्रवाल 'शलभ' जी राहत रिहिन. अउ वोकरे थोरके आगू म रसिक बिहारी अवधिया अउ हरिप्रसाद अवधिया जी.
कंकाली तरिया के बाजू ले लगे आनंद समाज वाचनालय के आगू म एक गली हे, जिहां हरि ठाकुर जी राहत रिहिन. ठीक एकर ले ऊपर डहर ब्राम्हणपारा म आहू त केयूर भूषण जी के बसेरा ल भेंटहू अउ वोकर वो पार सोहागा मंदिर के पाछू म सुशील यदु के घर. वोकर ले थोरके आगू बढ़ेव त आजाद चौक के ए बाजू म हांडीपारा के गली आ जथे, जिहां टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जी राहंय अउ वोकर परोस म हावय छत्तीसगढ़ी सेवक जागेश्वर प्रसाद जी के बसेरा, जिहां पूरा छत्तीसगढ़ ले छत्तीसगढ़ी के मयारु मन सरलग आवत-जावत राहंय, अभी घलो आवत रहिथें.
अब गुनव, ए नान्हे असन दिखत भुइयाॅं म कतका ठोस अउ महत्वपूर्ण व्यक्तित्व मन कोनो बेरा म राहत रिहिन. आज भले उन एती-तेती होगे हें या सरग म आसन पागे हें, तभो ए भुइयाॅं के जब कभू सुरता आथे त श्रद्धा अउ गरब के अद्भुत भाव जागथे.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Sunday, 13 March 2022
भोंड़ू वाले पइसा अउ दोना भर जलेबी
सुरता//
भोंड़ू वाले पइसा अउ दोना भर जलेबी
अपन लइकई के कतकों घटना अउ उदिम मन ल आज जिनगी के संझौती बेरा म आके गुनबे त गजब निक लागथे. इही मनला गुनत एक पइत मैं एक गीत घलो लिख डारे रेहेंव-
तैं कहाँ गंवा गे मोर लइकई के हांसी
सुरता कर देथे अब तोर रोवासी...
कन्हैया कस महूं ह फुदुर-फुदुर रेंगवं
मंद पीए कस फेर भुदरूस ले गिरवं
महतारी ह धरारपटा उठावय
ठउका कूदे हस कहिके हंसावय
फेर पलथिया के झडंकौं मैं बासी...
वाजिब म इही जिनगी के सबले सुनहरा बेरा होथे. मोर जनम भाठापारा शहर म होए हे, अउ मैं उहाँ कक्षा 4 तक मेन हिंदी स्कूल म पढ़े घलो हौं. तब हमन शक्ति वार्ड म राहत रेहेन.
हमर सियान रामचंद्र वर्मा जी घलो उहीच स्कूल म पढ़ावंय. फेर मैं वोकर संग स्कूल नइ जावत रेहेंव. मैं उहेंच एक अउ गुरुजी रिहिन लेखराम साहू जी उंकर संग सइकिल म चढ़ के स्कूल जावौं.
मोला सुरता हे. तब मोला हमर सियान ह स्कूल जाए के पहिली रोज एक ठन तांबा के भोंड़ू वाला सिक्का देवय. वो एक पइसा के सिक्का ह गोल तो राहय, फेर बीच म भोंड़ू (छेदा) राहय, तेकर सेती हमन वोला भोंड़ू वाला पइसा ही काहन.
हमन उहाँ जेन घर म राहन, वोकरेच तीर म एक ठन होटल असन दुकान राहय, जिहां बड़े बिहनिया ले भजिया, जलेबी आदि कतकों किसम के चाय-नाश्ता मिलय. हमन वो भोंड़ू वाले एक पइसा ल धर के उहाँ जावन, त दुकान वाले ह पूरा एक दोना जलेबी धरा देवय. तहाँ ले जलेबी झड़कत घर आवन, अउ जलेबी जब पूरा सिरा जावय, त घर म खुसरन.
हमर मन के रोज के बुता राहय. वो दुकान वाला कतकों बखत हमर मन संग ठट्ठा-दिल्लगी घलो करय. वो पइसा धर के जावन, त वोला वो ह ढुला के देखय, अउ जब वो ह गोल-गोल ढुल जावय, त हां चलगे कहिके दोना भर जलेबी दे देवय. अउ कोनो दिन जान बुझके तिरछा ढुलो के गिरा देवय, त सिक्का ह नइ चलय (ढुलय), त जा तोर पइसा ह नइ चलिस कहिके घर भेज देवय. तहाँ ले हमर मनके रोना हो जावय.
वो दुकान वाले के अइसन मजाक ह जादा करके छुट्टी के दिन ही होवय. बस तहाँ ले हमन रोवत-रोवत घर आवन. घर वाले मन जान डरयं, के दुकान वाले ह मजा ले बर नइ चलय काहत हे कहिके. तभो हमन ल वो पइसा ल ढुला के देखावय अउ एदे चलगे कहिके फेर उहिच सिक्का ल दे देवय. तभो हमन रोवन. नहीं ये नइ चले हे दूसर दे कहिके.
आखिर थक-हार के घर वाले मन दूसर सिक्का देवय, हमन वोला घर ले लेके दुकान तक ढुलावत-ढुलावत जावन अउ एदे देख ले चलत हे कहिके देवन, त दुकान वाला हांसत जलेबी दे देवय, अउ वो तीर खड़े लोगन संग गोठियावत काहय- देखे गुरुजी के लइका ल लुढ़ारे म कतका मजा आथे, कहिके हांसय.
बस वो भोंड़ू वाले सिक्का ल कुछेच दिन देख पाएन तहाँ ले, निंधा (बिना छेद) वाले सिक्का ह चलन म आगे.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Saturday, 12 March 2022
भूमिका.. (ढेंकी संकलन के..)
भूमिका ('ढेंकी' संकलन के)
सुशील भोले के कहिनी मन छत्तीसगढ़ी के प्रतिनिधि कहिनी माने जा सकत हें. ए कहिनी मन म छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़ी अस्मिता के परान समाये हे. छत्तीसगढ़ी म कतका अर्थ-संप्रेषणीयता हो सकत हे कहिनी मन एखर उदाहरण हें.
धार-धार लेखनी के आज हमर छत्तीसगढ़ ल बड़ जरूरत हे. चारों कोती सोसक मन लहलहावत हें अउ जम्मो भुंइया ल परदेसिया मन बिसावत हें. छत्तीसगढ़ एक उपनिवेस बनत जात हे. ईस्ट इंडिया कंपनी कस कतकों कंपनी गाँव-गाँव आवत हें. हमर भुंइया, खेत, नदिया अउ कोयला-माटी ल कब्जावत हें. का जान को छत्तीसगढ़ ल सी.जी. कहे गे हे. मय तव कहिथौं के सी.जी. हा हिन्दी के चारा गाह के संक्षेपीकरण ए. तभे तव चारों कोती ल जानवर मन कस मनखे आवत हें, चरत हें, जावत हें.
छत्तीसगढ़ ल चारागाह बने ल बचाय बर ए कहिनी मन आगी-पानी के काम कर सकत हें. कहिनी मन म पीरा के संगे-संग सुते मनखे ल जगाय के ताकत हे. इही ताकत ल जाने के जरूरत हे अउ ढेंकी के सहारा म हमन ये ताकत ल पहिचानबो अइसे मय बिसवास करत हवं.
सुशील भोले के कहिनी के शिल्प जोरदार हे, तव ओखर ले जोरदार ओखर भाखा हे. ढेंकी के जम्मो कहिनी हिंदी म अनुवाद करके परोसे के लाइक हे. ए कहिनी मन के आत्मा म जेन घुसर पाही तेन बड़ छटपटाही. अपन माटी, अपन महतारी के सेती. आओ ढेंकी के ढांक ल सुनव अउ देखव छत्तीसगढ़ के आज के दरपन म.
-डॉ. सुधीर शर्मा
(कहानी संकलन 'ढेंकी' के भूमिका)
धरम युद्ध कहानी
कहानी// धरम युद्ध
कोल्हान नरवा के खंड़ म एक ठन पांच हाथ चउंच-चाकर के मंदिर बने हे, फेर वोमा आज तक कलस नइ चघे हे. सुराजी बबा बताथे, के एला एक नवंबर सन् दू हजार म बनवाए रिहिसे, जब ए भुइयाॅं ल अलग राज के रूप म चिन्हारी मिले रिहिसे. मंदिर भीतर जाबे त बड़ा अचरज लागथे. उहाँ एक ठन नक्शा के छोड़ अउ कुछू नइए, फेर रोज संझा-बिहनिया दीया-अगरबत्ती जलबेच करथे. सुराजी बबा खाए-पीए बर भुला जाही, फेर उहाँ दीया-अगरबत्ती करे बर कभू नइ भुलावय. कतकों जुड़, घाम या पानी-बादर राहय, वो अपन कोकानी लाठी ल धरे बस्ती ले रेंगत ठाकुर देव-बोहरही दाई के खंड म पहुँची जाथे. चार कोरी ले उप्पर अकन होगे होही वोकर उम्मर ह, फेर बीस बछर के नेवरिया टूरा मन घिलर जाहीं वोकर रेंगई म. मार किलो भर के गरू पनही ल पहिर के खड़ंग-खड़ंग रेंगथे, त अच्छा-अच्छा बर वो ह देखनी हो जाथे. चक-उज्जर धोती, तेकर उप्पर म खादी के कुरता अब्बड़ फभथे सुराजी बबा ल. पूरा ऐतराब के गाँव-बस्ती म वोकर नांव के डंका बाजथे. सत्, धरम अउ ईमान के जब कहूँ चर्चा होथे, त लोगन वोकरे नांव के किरिया खाथें.
गाँव म एकक झन सेठ, पुरोहित अउ गौंटिया घलो हें, फेर वोमन ल मीठ-मीठ गोठिया के लोगन ल लूटे-खसोटे अउ भरमाए के छोड़, अउ कुछू नइ आवय. नवा राज बने के बाद एकरे मन के बुगबुगी ह बाढ़गे हे. जब देखबे त हरहा बिजार मन बरोबर बोरक्का मारत रहिथें. एकर मन के सबले बड़े गुन एक ठन ए हे, के जेन कोनो दल के सरकार बनथे, उही दल के मुखौटा ल अपन टोटा म ओरमा लेथें. राजधानी के जुड़वासा कुरिया म खुसरे लोगन का जानयं, के कोन लोगन के हितु-पिरुतु आय, अउ कोन लंदी-फंदी? वोमन तो सिरिफ टोटा म ओरमाए मुखौटा भर ल देखथें. एकरे सेती आजो इहाँ के मनखे सुराज के सेवाद ल चीखे नइ पाए हें. ए भुइयाॅं ल सरग बनाए बर हमर पुरखा मन अपन खून-पछीना ल कतेक एक नइ करिन हें, फेर दिन के दिन नरक के रद्दा ह चाकर होवत जावत हे.
सुराजी बबा काहत रिहिसे- 'जब तक हमर मन के वोट ह दारू-कुकरी अउ चिटिक पइसा-कौड़ी के लालच म गलत मनखे मन के खीसा म हमावत जाही, तब तक ए सोनहा भुइयाॅं के सुख के मुंहाटी म लोहाटी तारा ओरमे रइही. हमन अपने घर-कुरिया म जेल कस धंधाए रहिबो अउ बाहिरी मनखे हमर जम्मो खेत-खार, बारी-बखरी अउ जंगल-झाड़ी म रार मचावत रइही. धरती दाई के गरभ म समाए हीरा, लोहा अउ आनी-बानी के रतन-खजाना मन म लूट मचावत रइही. का इही दिन ल देखे खातिर हमन सुराज के लड़ई लड़ेन, अउ वोकर पाछू नवा राज के सपना संजोएन?
सुराजी बबा बतावत रिहिसे- 'मैं कोल्हान खंड़ म बनाए अपन मंदिर म एकरे सेती कलस नइ चघाए हौं, काबर ते सिरिफ अलग राज बने भर ले मोर नमसुभा ह पूरा नइ हो पाए हे. जब तक इहाँ के जम्मो हवा-पानी, रोजी-रोजगार, उद्योग-बैपार अउ शासन-प्रशासन म मोर जम्मो दुलरवा मन नइ बइठ जाहीं, तब तक मैं वो छत्तीसगढ़ महतारी के मंदिर म कलस नइ चघावौं. महतारी ल अपन मंदिर म कलस चघवाए के सउंख होही, त मोर मन के साध ल पूरा करही.'
एक दिन मैं सुराजी बबा ल पूछ परेंव-' कस बबा! अपन माटी के दुलरवा बेटा तैं काला मानथस?'
बबा कहिस- 'जेन ये माटी संग मया करथे. एकर बोली-भाखा अउ संस्कृति ल जीथे, एकर मान-सम्मान अउ गौरव के रकछा खातिर अपन तन-मन अउ धन-दोगानी ल अरपन करे बर तियार रहिथे, अउ सबले बड़का बात इहाँ के लोगन संग मया करथे, इंकर मनके बढ़वार खातिर जम्मो किसम के बुता करथे.
अउ बबा ह जेन मनला दुलरवा नइ मानय, तेकर मनके थाह ले खातिर मैं सुराजी बबा ल फेर पूछेंव. त वो कहिस-' ए माटी म जनम धरे भर म कोनो ल इहाँ खातिर ईमानदार नइ माने जा सकय. कतकों अइसन हें, जेन इहाँ के खाथें-पीथें अउ बाहिर के गुन गाथें. बाहिर ले आए कतकों मनखे मन संग कुछ इहों के मन अइसनेच करत हें. राष्ट्रीयता-राष्ट्रीयता कइहीं अउ बाहिर ले अपन संग लाने बोली-भाखा अउ संस्कृति ल इहाँ लादे के उदिम रचहीं... अरे इहाँ हें, त ए माटी खातिर ईमानदार बनयं. इहाँ के बोलयं-गोठियावंय अउ अपन मन-अंतस म धारन करयं तब तो.'
मैं बीच म टोकत केहेंव-' फेर बबा ये देश म कोनो मनखे ल कोनो भाग म आए-जाए अउ रहे-बसे के अधिकार हे न?'
-हां-हां राहय-बसय न, फेर जिहां रहिथें, तिहां के लोगन के, उहाँ के अस्मिता के उपेक्षा करे के अधिकार या नियम-कायदा तो नइ बने हे न?'
बबा के ए बात मोला ठउका लागिस. जिहां तक शासन करे अउ योग्यता के बात हे, त अंगरेज मन घलोक आज इहाँ जेन शासन के नांव हमेरी बघारत हें, तेकर मन ले कम नइ रिहिन हें, त फेर वोमन ल इहाँ ले खदेरे के का जरूरत परगे?
मोर मन म राज-धरम अउ शासन-सत्ता के बारे म अउ जाने-समझे के भाव जागिस, त मैं बबा जगा पूछ परेंव-' अच्छा बबा, ये बतावौ के राज-धरम का होथे, राजा के कर्तव्य कइसे होना चाही?'
सुराजी बबा कहिस-' सबले पहिली तो ए हे, के जेन मनखे जिहां हे, वोला उहें अतका रोजी-रोजगार अउ सुख-समृद्धि दे जाय, तेमा वो ह कोनो दूसर के भुइयाॅं या अधिकार म बरपेली जाके झपा मत जावय. काबर ते कोनो भी दूसर मनखे के अधिकार म हिस्सा मंगई ह कोनो भी दृष्टि ले न्याय के बात नइ माने जा सकय. ए भुइयाॅं ल अलग राज के दर्जा मिले हे, त उही सबला गुन के मिले हे. हर राज के अपन भाखा होथे, संस्कृति होथे, गौरव होथे, इतिहास होथे, रीति-नीति अउ अधिकार होथे, वो सबके रक्षा करे जाना चाही. इही ल न्याय या राज धरम कहिथें. शासन के मतलब कोनो ल सटासट पीटना अउ वोकर मन के जम्मो अस्मिता के लरी-लरी करना नइ होवय.
सुराजी बबा थोरिक चुप रहिस, तहाँ ले फेर कहिस-'बेटा! भगवान मनके जीवन-दरसन अउ बोली-बचन ह हमर मन बर सुग्घर आदर्श होथे.'
भगवान राम ल देख, वोहर अइसन बेरा आइस, ते बाली ल मारना परिस, रावन ल मारिस. फेर वोकर मन के राज म राजा बनके बइठिस का, ते अपन भाई-बंद मनला उहाँ के राजा बना के बइठारिस? नहीं न... वो उहें के मनखे मनला, चाहे वो सुग्रीव के रूप म होय चाहे विभीषण के रूप म होय, उहिच मनला बइठारिस न. एकर असली कारन इही आय, के जेन जिहां के मूल निवासी होथे, उही उहाँ के पीरा ल जानथे, उहाँ के बोली-भाखा, संस्कृति अउ जम्मो गौरव के मरम अउ महत्व ल समझथे. एकरे सेती भगवान ह उहाँ के मूल निवासी मनला उहाँ के राजा बनाइस. भगवान राम के इही सब शासन व्यवस्था ल वोकरे सेती सबले आदर्श, सुखी अउ लोकप्रिय माने जाथे, के वोहर कोनो मनखे के मूल अधिकार ऊपर कोनो दूसर ल नइ बइठन दिस.
सुराजी बबा के ए बात महूं ल सोला आना सच लागिस. हर मनखे के मौलिक अधिकार के रक्षा होना चाही. वोकर बोली-भाखा, संस्कृति अउ इतिहास ऊपर दूसर डहार के बोली-भाखा, संस्कृति ल नइ थोपे जाना चाही. न राष्ट्रीयता जइसन लोक-लुभावन नारा के नांव म कोनो भी बाहिर के मनखे ल वोकर ऊपर राजा के रूप म लादे जाना चाही. तभे तो राज धरम के स्थापना होही. सही अरथ म रामराज के स्थापना होही.
सुराजी बबा के एकक ठन बात ह मोला अमरित के बूंद पियाए कस लागे लागिस. अभी तक महूं ह परबुधिया भरम म बूड़े रेहेंव. हां भई राष्ट्रीयता के मापदंड क्षेत्रीय उपेक्षा कभू नइ होय. जे मन अइसन कहिथें या करथें, वो मन लोगन ल भरमाथें अउ बदमासी करथें. तब तो अइसन करइया मनके जरूर विरोध होना चाही. उंकर मनके गलत काम ल रोके अउ छेकें जाना चाही. सुराजी बबा करा ले जइसे-जइसे सत् गियान के अमरित बूंद मोर कान म परत गिस, तइसे-तइसे मोर मन-अंतस जागे अउ अन्याय संग लड़े बर टांठ अउ चेम्मर होवत गिस.
सुराजी बबा मोला चिंतन-मनन के समुंदर म लहरा मारत देखिस, त कहिस-' इही धरम ये बेटा, अउ एकर रकछा के बुता ह धरम युद्ध'.
धरम युद्ध के बात सुनके मैं हड़बड़ा गेंव. मैं आजतक सोचत रेहे हौं, के पूजा-पाठ अउ देवता-धामी के नांव मन म जेन लड़ई-झगरा अउ युद्ध होथे, उही ह धरम युद्ध आय कहिके, फेर सुराजी बबा ह तो अपन अधिकार अउ गौरव के रक्षा खातिर लड़ई ल धरम युद्ध काहत हे. मैं ए बात ल बने फोरिया के बताए ल कहेंव, त बबा कहिस-' बेटा! तैं ये बता, भगवान कृष्ण ह कुरुक्षेत्र के मैदान म अरजुन ल काला धरम युद्ध केहे रिहिसे? अपन अधिकार अउ गौरव के रक्षा करना ल न? त फेर तैं काबर अन्ते-तन्ते अउ एती-तेती के बात म बूड़े हस? जे मन पूजापाठ के विधि अउ अलग-अलग देवता के नांव म लड़ाथें, वो ह तो सिरिफ बदमासी आय. तोर देवता अउ मोर देवता के नांव म लड़ई ह हमर मनके अज्ञानता अउ मुरखता आय. धरम युद्ध तो सिरिफ अपन भाखा, संस्कृति, गौरव, अधिकार अउ अपन सम्पूर्ण अस्मिता के रक्षा खातिर संघर्ष करई ल कहे जाथे.
सुराजी बबा के रूप ह आज मोला साकछात भगवान के रूप लागे लागिस. मोला अइसे लागिस, जइसे वो मोला अपन विराट रूप के दरसन करावत हे, अउ मैं वोकर आगू म हाथ जोड़ के मुड़ी नवाए खड़े हौं. वो काहत रिहिसे-' बेटा! अपन ये धरम या अस्मिता अधिकार के रकछा खातिर हमन ल अपन सगा, संबंधी या नता-गोता के चिंता-फिकर नइ करना चाही. भगवान कहे हे न-' अरजुन, दुसमन संग खड़ा होवइया मन घलो तोर दुसमन आय, एकरो मनके संहार जरूरी हे. वो मुड़ा म जतका झन खड़े हें, वोमा के एको झन तोर कका-बबा या गुरु नोहय. न कोनो हितवा या भाई-बंद यें. सोसक, अत्याचारी अउ दूसर के अधिकार म बंटमारी करइया दुसमन संग खांध म खांध मिलाके रेंगने वाला घलोक सिरिफ दुसमन होथे. अउ जब दुसमन के संहार के बात आथे, त वोमा कोनो किसम के कानून-कायदा लागू नइ होवय. अइसन बेरा म एकमात्र लक्ष्य होथे, सिरिफ दुसमन के संहार.
-'फेर लोकतंत्र म अइसन कइसे हो सकथे बबा? हमर इहाँ तो कानून के राज चलथे?'
मोर बात ल सुनके बबा कहिस-' बेटा! लोकतंत्र म चुनावी व्यवस्था ह हमर धरम युद्ध के दूसरा रूप आय. इही म बने-गिनहा अउ अउ अपन-बिरान के बेवस्था ल पूरा करे जा सकथे.
मोर मन म फेर एक ठन शंका के पीका फूटिस, मैं बबा सो पूछेंव-' बबा, फेर उहाँ राजधानी म बइठे मनखे मन चुनावी टिकिस बांटे म जेन भेदभाव करथें, तेकर का उपाय हे?'
बबा झट कहिस-' अपन हाथ ले टिकिट बांटे के काम करव, अउ एकर एके ठन उपाय हे- अपन खुद के पारटी बनावौ. जब तक दूसर के मुंह देखिहौ तब तक दुसरेच ल अपन मुड़ म बइठे पाहव. चाहे कुछू काम-बुता खातिर होवय, एकरे सेती बड़े-बड़े गुनिक अउ पुरखा सियान मन कहें हें- 'अपन दीया खुदे बनौ... अपन मारग घलो खुदे बनावौ.'
सुराजी बबा संग गियान चरचा के बाद महूं कोल्हान के खंड़ म बने छत्तीसगढ़ महतारी के मंदिर म संझा-बिहनिया जाए लगेंव. सुराजी बबा संग भितरी म माढ़े नक्शा के आरती अउ हूम-धूप करे लागेंव, संग म गाँव के जम्मो जउंरिहा लइका मनला घलो एकक दू-दू करके उहाँ लेगे लागेंव. सुराजी बबा के संगत म आके जम्मो लइका मन के ऊपर ले भरम के भूत उतरे लागिस. धीरे-धीरे करके हमन एक गाँव ले दूसर गाँव, अउ दूसर ले तीसर करत चारों मुड़ा के गाँव मन म धरम युद्ध के बाजा गदकाए लागेन.
हमर मन के जवनहा जोश म परलोखिया मनके पेट पिराए लागिस, उन लइका मनला भरमाए के, स्वारथ के दलदल म बोरे के अउ एती-तेती के गलत आरोप म डरवाए-फंसवाए के घलोक खेल खेले लागिन. फेर जवानी तो जवानी होथे, जब तक वो नइ जागे राहय, तभे तक वोला कोनो ठग सकथे या वोकर ऊपर राज कर सकथे. अउ कहूँ जागगे त फेर ककरो छेंके नइ छेंकावय, बिल्कुल नंदिया के उफनत धारा कस.
नंदिया के उफनत धारा ल कोनो रोके सकथे जी? वोला कतकों रोक ले, तोप ले, छेंक ले, मूंद ले, फेर वो अपन आगू बढ़े के रद्दा निकालिच लेथे. कतकों बड़े-बड़े बांधा आ जाय, वोकर रद्दा म तभो वोला घेपय नहीं. कइसनो न कइसनो करके बांधा के गरब ल टोरिच देथे. अइसने जवानी के जोश घलो होथे. सुराजी बबा के संग जुड़े जम्मो दुधरू जवान मन चारों मुड़ा धरम युद्ध के जागरन अउ अपन खुद के पारटी-बेनर के जयकारा बोलाए लागिन.
ठउका उहिच बखत चुनाव के घोसना होइस. जम्मो लइका मन खाए-पीए ल तियाग दिन. वोकर मन जगा पइसा-कौड़ी के तो कमी रिहिसे, फेर सुराजी बबा के ये भाखा सबो झनला सुरता रिहिसे-' लोकतंत्र म भीड़ संपन्न मनखे सबले बड़े होथे. जेकर संग भीड़ या बहुमत हे, वोकर जगा सबकुछ हे. बस तुंहर मनके एकता कभू मत टूटय, कोनो विभिसन कस घर फोरुक मनखे ह तुंहर मनके दल म मत खुसरय, अतके भर के चेत राखिहौ, तहाँ ले सब ठीक-ठाक निपट जाही.'
लइका मन के पंदरा दिन ले बइहा-भुतहा सहीं किंदरई ह आखिर सुफल होइस. पइसा-कौड़ी, लाठी-बेड़गा अउ छल-छिद्र के ऊपर आखिर सत्-विसवास अउ एकता के जीत होइस. आज जम्मो लोगन ल भरोसा होगे के परमात्मा आखिर सत्-नियाय के रद्दा म रेंगइया मनला साथ देथे. परीक्षा जबड़ लेथे, फेर जीतवाथे घलोक उहिच ल जेन सत् के मारग ल धरे रहिथे.
सुराजी बबा के आज खुशी के ठिकाना नइए. जतका खुशी वोला पंदरा अगस्त सन् सैंतालिस के होए रिहिसे, वतकेच खुशी आजो लागत हे. वो देश के आजाद होए के खुशी रिहिसे, आज अपन घर-कुरिया अउ अस्मिता के आजाद होए के खुशी ए. कोनो मनखे चाहे कतकों गरीब-गुरबा राहय, अप्पढ़ राहय तभो अपन घर के सियानी ल कोनो दूसर ल नइ देवय. जे मन अइसन सोचथें-गुनथें, ते मन सिरिफ उपद्रव के गोठ करथें.
जवनहा लइका मन बाजा गदकावत सुराजी बबा मेर आइन अउ वोला फूल-माला म लाद दिन. चारों मुड़ा सिरिफ उमंग अउ उत्साह दिखत राहय. चारों मुड़ा, जिहां तक नजर जाय, कटकट ले मनखेच-मनखे. सुराजी बबा जम्मो मनखे मनला सबासी देवत कहिस-' बाबू हो, तुंहर मनके परसादे आज मोर सपना सुफल होइस. अब सबले पहिली छत्तीसगढ़ महतारी के मंदिर म कलस जघाबो, उहाँ छत्तीसगढ़ महतारी के साकछात मुरति बइठारबो, तेकर पाछू फेर राजधानी म अपन सरकार के शपथ ग्रहन करवाबो. तुमन जेकर जइसन योग्यता हे, तेकर मुताबिक पद अउ विभाग के बंटवारा खातिर लेखा-जोखा कर लेवौ. अब महूं ए बस्ती भीतर के घर-कुरिया ल बेंच-भांज के कोल्हान खंड म छत्तीसगढ़ महतारी के मंदिर करा एकाद खंड़ के अपन रेहे बर खोली बना लेहूं, अउ बांचे जिनगी ल इंहचे महतारी के सेवा करत बिताहूं. अब मोला लागत हे, के मोर चोला ले परान ह हांसी-खुसी निकल जाही.'
दुरिहा ले सुराजी बबा के मंदिर ले छत्तीसगढ़ महतारी के आरती-वंदना के आवाज सुनावत राहय-
अरपा-पइरी के धार
महानदी हे अपार
इंदरावती ह पखारय तोर पइयां
महूं पांवें परंव तोर भुइयाॅं
जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मइया...
(कहानी संकलन 'ढेंकी' ले साभार)
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811