वो गरमी के छुट्टी...
सुरता आथे वो लइकई के दिन
साल भर पढ़ई के
सिला मिलही तेकर आस म
30 अप्रैल के अगोरा राहय
पास-नपास के रिजल्ट झोंकबो
तेकरो ले जादा
दू महीना रगड़ के
छुट्टी म किंजरबो
तेकरे उछाह राहय.
तहाँ आमा-अमली अउ
तरिया पार
नजरे-नजर म झूलय.
अमली के लाटा
अउ उल्हवा कुरमा पान
झड़के बर
नून अउ मिरचा के
बुरका धरन
कभू मंझनी-मंझनिया
बोइर खोइला कुचरन
त कभू
डंडा पचरंगा खेलन
इही सीजन म
बर-बिहाव के घलो
गजब आरो लेवन
काकर बरात जाना हे
काकर परघनी म
गंड़वा बाजा छेंकना हे.
सबके सरेखा राहय.
ममा गाँव के घलो
आरो तब लेवन
रंग-रंग के खई-खजेना
अउ गरती आमा झड़कन
बेरा पहवाए बर
कभू बांटी-भौंरा
ते कभू तिरी-पासा खेलन.
देखते-देखत कइसे
दू महीना ह
झप ले पहा जाय
ममादाई तभो
बेल के शरबत पियावय
ठउका स्कूल जाए के दिन फेर लहुट-लहुट आवय.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Thursday, 14 April 2022
वो गरमी के छुट्टी
Tuesday, 12 April 2022
गुरतुर गीत.. कवि लक्ष्मण मस्तुरिया
जन्म -7 जून 1949
निधन - 3 नवंबर 2018
गुरतुर गीत के माध्यम ले जन-जन के कंठ म बिराजे कवि लक्ष्मण मस्तुरिया
मोर गंवई गंगा ए, मोर गंवई गंगा ए,
छोड़ के गंवई सहर डहर झन जा झन जा झन जा रे...
ए मया के बादर ए, धरती माँ के काजर ए
ए भुंइया के अंचरा, ए धरती के गजरा
जुगुर-जागर रात इहाँ के, चुहुल-पुहुल संझा रे...
लक्ष्मण मस्तुरिया छत्तीसगढ़ी जनमानस म बसे एक अइसे नांव आय, जेकर बारे म जादा गोठियाए के उदिम करे के जरूरते मोला नइ जनावय. लोगन उनला कोनो गीतकार के रूप म, त कोनो गायक के रूप म, त कोनो कवि अउ लेखक के रूप म जानबेच करथें. फेर ए ह मोर सौभाग्य आय के उंकर सबोच रूप ल थोर-बहुत जानबेच करथौं. एकर असल कारण ए आय, के हमन एके इलाका म राहत रेहेन, साहित्य के एके रद्दा म रेंगत रेहेन, तेकर सेती कतकों कार्यक्रम म संग म आवन-जावन. एक-दूसर के घर घलो पहुँच जावत रेहेन.
लक्ष्मण मस्तुरिया जी अपन गीत लेखन के शुरुआत के बारे म बतावयं- 'मैं तो छात्र जीवन ले ही लिखे बर धर लिए रेहेंव. वो बखत हमन ल आकाशवाणी ले 'तोला भालू कुदावय रे दोस' जइसन गीत सुने ल मिलय, तब मोर तरुवा धमके बर धर लेवय, अउ मन म विचार उठय के मैं छत्तीसगढ़ी म अइसे गीत लिखहूं, जेला सुनके लोगन के मन म गरब के भाव जागय. अइसने गुनत मैं सबले पहिली 'झन होवे मोर भुइयां उदास' लिखेंव. इही ह मोर पहिली रचना आय.
जब मैं मिशन स्कूल म पढ़त रेहेंव, त कवि सम्मेलन म घलो जाए लगे रेहेंव. उहाँ ले आकाशवाणी वाले लाल रामकुमार सिंह ह पहुँच के रिकार्डिंग घलो कर लेवत रिहिसे. वइसने बेरा म 'मोर धरती मइया जय होवय तोर' गीत ह रिकार्ड होके लोगन ल सुनाय लगिस. इही गीत ह मोर जिनगी के टर्निंग पाइंट बनिस. एला चारों मुड़ा प्रसिद्धि मिलिस तब मैं पवन दीवान, कृष्णा रंजन जइसन वो बखत के चर्चित लोगन संग घलो मंच म संघरे लगेंव. दाऊ रामचंद्र देशमुख जी घलो आकाशवाणी ले ए गीत ल सुन के मोर ले संपर्क करिस. तब तक वोमन देवार मन के गाए गीत मनला रिकार्ड करवा डारे रिहिन हें. फेर वोमन सम्मान जनक नइ जनावत रिहिसे. फेर वोकर धुन मन बड़ा लाजवाब राहय, तब हमन वोमन के शब्द अउ थोड़ा बहुत संगीत म सुधार-परिमार्जन कर देवत रेहेन. आज उही गीत मन छत्तीसगढ़ी के कालजयी गीत बनगे हवंय. जइसे- चंदर छबेला रे बघली ल .. एला मैं लिखेंव- मंगनी म मांगे मया नइ मिलय रे.. अइसने- दोऊना म गोंदा केजुआ आबे बारी म काल रे... एला सुधार के.. चौंरा म गोंदा रसिया मोर बारी म पताल रे... अइसने सुधार करे ले देवार डेरा के गीत मन चंदैनी गोंदा के गीत बनगे.
मस्तुरिया जी आज मनोरंजन के नांव म जेन फूहड़ अउ दूअर्थी गीत लिखे अउ गाए जावत हे, तेकर ले भारी नाराज राहय. उन कहंय- 'कुछ विशुद्ध व्यापारी किसम के लोगन अधकचरा लेखक अउ गायक मन के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी बजार ल मटियामेट करत हें. वोमन सांस्कृतिक कार्यक्रम के मंच के संगे-संग कवि सम्मेलन के मंच म घलो हास्य के नांव म चुटकिला ढकेलत लोगन बर भारी खिसियावंय. अइसने एक तथाकथित हास्य कवि ल जवाब देवत उन एक मंच म कविता पढ़े रिहिन हें- डंडे को बेलन कहोगे क्या? टुनटुन को हेलन कहोगे? चुटकुले सुनाने वाले को कवि सम्मेलन कहोगे क्या? उन कहयं- मोर मानना हे, कवि अपन युग के स्वर होथे. वोला अपन युग के बात. लोगन के बात लिखना चाही, उंकर दुख-पीरा अउ अधिकार के बात ल लिखना चाही. विषय वस्तु अउ शील्प के महत्व समझना चाही.
मस्तुरिया जी गीत के छोड़े निबंध, कहानी अउ कालम लेखन घलो करिन. उंकर एक कहानी ल तो मैं अपन 'मयारु माटी' म घलो छापे रेहेंव. दैनिक भास्कर, जेन शुरू म 'नव भास्कर' के नांव ले निकलत रिहिस एमा वोमन 'माटी कहे कुम्हार से' शीर्षक ले कालम लिखिन, तब महूं उहिच म 'तरकश अउ तीर' शीर्षक ले कालम लिखत रेहेंव. बाद म मस्तुरिया जी अपन खुद के पत्रिका 'लोक सुर' चालू करिन तब एमा 'पीरा ल तो कहिबो साहेब' शीर्षक ले कालम लिखिन. कुछ बेरा तक दैनिक समवेत शिखर म एक छत्तीसगढ़ी परिशिष्ट घलो निकालिन, तब मोला काहयं- भइगे भाई तोरे 'मयारु माटी' के कटिंग चलावत रहिथंव. देखत तो हावस, छत्तीसगढ़ी म गद्य लिखइया मन के का हाल हे तेला?
वइसे उंकर 'हमू बेटा भुंइया के, घुनही बंसुरिया, माटी कहे कुम्हार से ( ए ह नव भास्कर म छपे कालम के ही संकलन रिहिसे), मोर संग चलव, सिर्फ सत्य के लिए, छत्तीसगढ़ के महान क्रांतिकारी शहीद वीर नारायण सिंह के जीवन गाथा ऊपर बड़का कविता 'सोनाखान के आगी' जइसन किताब छप चुके रिहिसे.
फेर मैं व्यक्तिगत रूप ले मस्तुरिया जी के गीतकार रूप के जादा प्रशंसक रेहेंव, काबर ते महूं गीत लिखत रेहेंव अउ सस्वर गाये के उदिम घलो कर लेवत रेहेंव. मस्तुरिया जी काहय- मोला गाये ले जादा गवाए म आनंद मिलथे. उन बतावंय- पहिली केदार यादव ह कार्यक्रम म सिरिफ तबला भर बजावय. 'मोर झुल तरी गोंदा सेम्हर फुलगे अगास तरी' ए गीत ल महीं वोला गवाएंव. असल म वो गीत ल गावत बेरा मैं भुला जावत रेहेंव, तब केदार ल गवाएंव. वोकर बाद तो फेर केदार पूरा के पूरा गायन म आगे. हो सकथे के ए बेरा वोला नइ मिले रहितीस त तबला म ही जिनगी भर रमे रहितीस. तब महूं ह सांस्कृतिक मंच म गीत गवई के बलदा कवि मन के मंच ल प्राथमिकता देंव. एकर एक अउ कारण हे, सांस्कृतिक मंच के श्रोता वर्ग अउ कवि मंच के श्रोता वर्ग म बहुतेच अंतर होथे. मोला कवि या कहिन साहित्यिक मंच के बौद्धिक श्रोता वर्ग जादा बने लागत रिहिसे.
उन गीत लिखे के प्रेरणा कहाँ ले मिलथे, एकर संबंध म पूछे म कहंय- ए तो नइ जानंव के मोला कोन लिखवाथे या लिखे बर कोन प्रेरित करथे? फेर जब मन म वोकर तरंग आथे त 4-5 मिनट म ही एक पूरा गीत लिखा जाथे. अउ कहूँ वो तरंग नइ मिलिस त चार घंटा म घलो चार लाईन नइ लिखावत रिहिसे. जिनगी के आखिरी बेरा तक उंकर मन म वो तरंग उमड़ परत रिहिसे. एकरे सेती वो सरलग लेखन म रमे रिहिन हें.
मस्तुरिया जी संग हमर मन के एकदम घरोबहा कस संबंध रिहिसे, एकरे सेती सुख-दुख के बेरा म एक-दूसर के घर आना-जाना हो जावत रिहिसे. फेर वो 3 नवंबर 2018 के दिन ल मैं कभू नइ भुलावौं जब उन ए दुनिया ले बिदागरी लेइन. ठउका वोकर 10 दिन पहिली 24 अक्टूबर के मोला लकवा के अटैक आए रिहिसे, तेकर सेती मैं एम्स अस्पताल म भर्ती रेहेंव. उहाँ सब साहित्यकार मन मोला देखे के नांव म आवंय, वोकरे मनले जानकारी मिलिस के मस्तुरिया जी ए दुनिया ले बिदागरी ले लिए हें. बड़ा दुख होइस, मैं उंकर अंतिम यात्रा म संघर नइ पाएंव. उंकर बड़े बेटा दिनेश जब मोला देखे बर मोर जगा आइस तभो ए बात ल गोठियाए रेहेंव.
आज उंकर बिदागरी तिथि म फेर उही बात के सुरता आवत हे. उंकर सुरता ल पैलगी जोहार करत उंकरेच ये कालजयी गीत...
मोर संग चलव रे, मोर संग चलव जी
ओ गिरे-थके हपटे मन, अउ परे-डरे मनखे मन..
अमरइया कस जुड़ छांव म मोर संग बइठ जुड़ा लव,
पानी पी लव मैं सागर अवं, दुख-पीरा बिसरा लव,
नवा जोत लव, नवा गाँव बर, रस्ता नवा गढ़व रे...
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Saturday, 9 April 2022
मंच के मयारु कवि बिसंभर यादव 'मरहा'
10 सितंबर पुण्यतिथि म सुरता//
मंच के मयारु कवि रहिन बिसंभर यादव 'मरहा'
छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत म कुछ अइसनों साहित्यकार होए हें, जिंकर चिन्हारी आरुग मंचीय रचनाकार के रूप म जादा होए हे. बिसंभर यादव 'मरहा' जी इही कड़ी के कवि रिहिन हें, जेकर बिना इहाँ के कवि सम्मेलन, रामायण अउ आने सांस्कृतिक मंच मन सुन्ना असन लागय.
6 अप्रैल 1931 के दुरुग तीर के गाँव बघेरा म कुशल यादव अउ महतारी चैती बाई के कोरा म अवतरे बिसंभर जी संग मोर चिन्हारी सन् 1987 के दिसंबर महीना म तब होए रिहिसे, जब छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के विमोचन खातिर नेवता दे बर मैं चंदैनी गोंदा के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी घर बघेरा गे रेहेंव. जतका बेरा मैं दाऊ जी के घर पहुंचेंव वतका बेरा मरहा जी घलो उहें बइठे रिहिन हें. तब दाऊ जी ह उंकर संग मोर परिचय करवाए रिहिन हें अउ मरहा जी ल घलो 'मयारु माटी' के विमोचन के नेवता दिए खातिर कहे रिहिन हें. तब मरहा जी मोला विमोचन के नेवता झोंकत अपन एक कविता 'अस्पताल के एक्सरा' ल 'मयारु माटी' म छापे खातिर दिए रिहिन हें.
फेर उंकर संग जादा गोठ-बात तब होवय, जब दाऊ जी मोला कभू-कभार बघेरा म ही रात रहे खातिर कहि देवत रिहिन हें. तब मोर बेरा के पहवई ह मरहा जी संग ही जादा होवय. अइसने बेरा म मरहा जी ल जादा जाने अउ समझे के अवसर मिलय. उंकर संग दाऊ जी ऊपर बने विडियो 'यात्रा जारी है' ल घलो संगे म देखे रेहेन.
मरहा जी मंच के जतका मयारु अउ लोकप्रिय कवि रिहिन हें, वतकेच मयारु मनखे घलो रिहिन हें. उंकर संग कतकों मंच म संग म कविता पाठ करे के अवसर मिले रिहिसे. मरहा जी एक अइसन रचनाकार रिहिन हें, जेला अपन जम्मो रचना कंठस्थ राहय. मैं वोला कभू कागज-पातर धर के रचनापाठ करत नइ देखेंव. हाँ, डायरी के नांव म एक नान्हे असन पाकेट डायरी जरूर धरे राहयं, जेमा जिहां-जिहां कार्यक्रम म संघरंय उंकर दिन, बेरा अउ आयोजक के नांव लिख के वोमा दस्तखत करवा लेवत रिहिन हें. एक-दू पइत तो महूं उंकर डायरी म लिख के दस्तखत करे रेहेंव.
अपन 'मरहा' उपनाम धरे के बारे म उन बतावंय- एक पइत एक बड़का कार्यक्रम के माईपहुना दाऊ रामचंद्र देशमुख जी रहिन, अध्यक्षता संत कवि पवन दीवान जी करत रिहिन हें अउ संचालन श्यामलाल चतुर्वेदी जी. इही म बिसंभर जी के देंह-पांव ल देख के दाऊ रामचंद्र देशमुख जी पवन दीवान जी ल मजा लेवत असन कहिन के एकर 'मरहा' उपनाम कइसे रइही? दीवान जी के कट्ठल के हंसई तो दुनिया भर म जाने जाय, उन ए 'मरहा' शब्द ल सुनिन त अपन चिरपरिचित शैली म ठहाका लगावत हुंकारू भर दिन. तब ले बिसंभर यादव जी अपन उपनाम 'मरहा' लिखे लागिन. ए बात ल मोला मरहा जी अउ दाऊ जी दूनों झन बताए रिहिन हें.
मरहा जी ल काव्य शिरोमणि के सम्मान ले घलो सम्मानित करे गे रिहिसे, जब बिलासपुर म 'मरहा नाईट' के आयोजन डाॅ. गिरधर शर्मा जी के माध्यम ले होए रिहिसे. बिलासपुर के प्रसिद्ध राघवेंद्र भवन म आयोजित 'मरहा नाईट' म खचाखच भीड़ राहय, जेकर दिल ल मरहा जी अपन लाजवाब प्रस्तुति के माध्यम ले जीत ले रिहिन हें. मरहा जी के सम्मान म तब उच्च न्यायालय बिलासपुर के न्यायाधीश रमेश गर्ग जी ह कहे रिहिन हें- 'पहिली मैं संत कबीर जी के बारे म अड़बड़ सुने रेहेंव पढ़े घलो रेहेंव, फेर आज ओला मैं ह मरहा जी के रूप म साक्षात सुने हौं. इही कार्यक्रम म मरहा जी ल 'काव्य शिरोमणि' के उपाधि ले सम्मानित करे गे रिहिसे.
मरहा जी के दू काव्य संग्रह 'हमर अमर तिरंगा' अउ 'माटी के लाल' डाॅ. गिरधर शर्मा अध्यक्ष- छत्तीसगढ़ साहित्यकार परिषद बिलासपुर के संपादन म छपे रिहिसे.
बिसंभर यादव जी अपन कविता लिखे के शुरू करे के बारे म बतावंय- जब उन 14-15 बछर के रहिन, तब गाँव वाले अउ दाऊ के बीच के मनमुटाव ह बघेरा गाँव के शांति अउ सद्भाव ल बिगाड़े ले धर ले रिहिसे. तब एक दिन बाड़ा म गाँव के दस मनखे अपन-अपन विचार ल कागज म लिख के लिफाफा म भरेन अउ दे देन. दसों लिफाफा ल जब खोधिया के दाऊ जी निकालिन त वोमा मोरे लिफाफा ह उंकर हाथ म आगे. लिफाफा ल हेर के जब वोमन कागज ल पढ़िन त वोमा लिखाय राहय-
प्रजा पालन राजा करे,
पुत्र पालन करे माँ-बाप.
का दूसर के कहिनी म,
लड़त हवव सब आप.
वो कविता ल पढ़तेच दाऊ जी के आंखी ले आंसू बोहाए लगिस. तहाँ ले कोतवाल करा हांका परवा के गुड़ी म गाँव वाले मनके बइठका सकेलिस. तहाँ ले गुटबाजी अउ मनमुटाव के जम्मो किस्सा के बिदागरी होगे. ए घटना ले बिसंभर जी सोचिस- जब चार डांड़ के कविता म गाँव के अतेक बड़े समस्या के समाधान होगे, त फेर तो अउ कविता लिखहूं, तेमा देश के बड़े-बड़े समस्या के निपटारा हो सकय.
मरहा जी कविता पाठ करे के संगे-संग मंच के सिद्धहस्त अभिनेता घलो रिहिन. ऐतिहासिक सांस्कृतिक प्रस्तुति 'चंदैनी गोंदा' म जीपरहा कवि के अभिनय उंकर अविस्मरणीय भूमिका हे. अइसने लोक नाट्य 'कारी' म घलो पटइल के अभिनय म जनमानस ल अपन प्रशंसक बना लेवत रिहिन हें. अपन जीपरहा कवि वाले अभिनय ल तो उन कतकों रामायण अउ आने सांस्कृतिक मंच मन म घलो देखा देवत रिहिन हें.
जनता के दुख-पीरा अउ नीति-नियाव के अलख जगावत ए जनकवि ह 10 सितंबर 2011 के रतिहा 9 बजे ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लेइस. आज उंकर सुरता म उंकरेच ए चार डांड़ के सुरता आवत हे-
मान मर्यादा नियाव ल छोड़ के,
सब कपटिच मन सुख पावत हें.
सत धरम म चल के सिधवा मन,
जिनगी भर दुख पावत हें.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Thursday, 7 April 2022
छत्तीसगढ़ी के पहिली कहानी
छत्तीसगढ़ी के पहिली कहानी
डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के किताब 'छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास' के अनुसार छत्तीसगढ़ी के पहिली कहानी हीरालाल काव्योपाध्याय के 'श्री रामचंद्र की कथा' ल माने जा सकथे। पुस्तक म लिखाय हे- "छत्तीसगढ़ी में हीरालाल काव्योपाध्याय ने ही सर्वप्रथम कथालेखन का श्रीगणेश किया था। उनके व्याकरण ग्रंथ में छत्तीसगढ़ी में 'श्री रामचंद्र की कथा', 'ढोला की कहानी' और 'चँदैनी की कहानी' निबद्ध है।" क्रम ल देखे जाय तो पहिली नंबर म ' श्री रामचंद्र की कथा' हवय तौ इही ल छत्तीसगढ़ी के पहिली कहानी अउ एखर रचनाकाल व्याकरण ग्रंथ के रचनाकाल ल ही माने जाना चाही। ये व्याकरण ग्रंथ सन् 1885 म लिखे अउ 1890 म प्रकाशित करे गे रिहिस।
श्री रामचंद्र की कथा...
"अजोद्धा के राजा दसरथ के तीन रानी कौसिल्ला, कैकेई अउ सुमितरा रहिन। अउ चार लइका सुंदर-सुंदर रहिन, रामचंद्र, लछमन, भरथ अउ सतरुघन। इनमा रामचंद्र तो गजबेच सुंदर रहिन। ए लइका रहिन तभेच अपन गुरू विस्वामित्तर के संग माँ बन का गइन अउ बड़े-बड़े राछस मन ला मारिन। छोटे भाई लछमनो राम के संग म रहिन अउ राछस मन ला मारिन। अइसे काबर नइ होही? का हे के रामचंद्र तो भगवान के औतार रहिन अउ लछमन सेस के औतार रहिन। तहाँ ले दूनो भाई अपन गुरू के संग माँ जनकपुर माँ आइन। इहाँ जनकपुर माँ राजा जनक के राज रहिस। इंकरो एक कैना रहिन। इंकर नाँव छीता (सीता) रहिस। ए तो गजबेच सुंदर रहिन। छीता के सुंदरई तो कुछ कहे नहीं जात रहिस। इहाँ राजा जनक के परन रहिस के जउन कोनो मोर इहाँ के महादेव के धनुस ला टोरही तेही ला अपन छीता ला बिहाव म देहौं। एही मारे इहाँ खुबी अकन राजा मन देस-देस ले आय रहिन।"
डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के पुस्तक म अतके कथा के वर्णन हे। बाद म एखरे हिन्दी अनुवाद घलो देय गे हे।
जय छत्तीसगढ़.. जय छत्तीसगढ़ी..
सुरूज बाई खांडे भरथरी गायन
10 मार्च पुण्यतिथि म सुरता/)
सुरूज बाई खांडे अउ छत्तीसगढ़ म भरथरी गायन
छत्तीसगढ़ म अइसन कई ठन लोक गाथा गायन के परंपरा हे, जेन कोनो न कोनो ऐतिहासिक पात्र मन ऊपर आधारित ग्रंथ या धर्मग्रंथ के मानक म गाये जाथे. फेर ए ह शास्त्र ले लोक के कंठ म आवत-आवत अपन एक अलगेच स्वरूप धारण कर लेथे. इहाँ के पंडवानी गायन विधा ल देख लेवौ, मूल रूप ले वो ह महाभारत के प्रमुख पात्र पांडव मन ऊपर आधारित हे. फेर ए विधा के प्रवर्तक नारायण प्रसाद वर्मा ह एला छत्तीसगढ़ी लोक गीत अउ संगीत मन संग समो के सबल सिंह चौहान के लिखे किताब ल एक अलगेच विधा के रूप म विकसित कर दिस. ठउका अइसनेच राजा भृर्तृहरि के ऐतिहासिक कथा ल छत्तीसगढ़ी के लोक विधा म पिरो के भरथरी गायन के परंपरा विकसित करे गे हवय.
रायपुर के मोती बाग म पहिली हर बछर 'जगार' कार्यक्रम के आयोजन होवय. इहें मैं सबले पहिली सुरूज बाई खांडे के भरथरी गायन के प्रस्तुति देखे रेहेंव. तब ओकर संग मुंहाचाही घलो करे रेहेंव. तब वोमन बताए रिहिन हें, के एकर कथा ल ओमन अपन बबा (नाना) जगा सुने रिहिन हें. सुरूज बाई बताए रिहिन हें- मैं पढ़े लिखे तो नइ हौं, फेर मोर नाना ह जेन बतावय अउ सिखोवय तेन मोला कंठस्थ हो जावत रिहिसे.
आगू चलके रेखादेवी जलक्षत्री अउ सफरी मरकाम ल घलो भरथरी गायन करत सुनेंव. रेखादेवी जलक्षत्री अउ मोर गाँव तो आपस म जुड़े हे. हमर मनके एक-दूसर के घर घलो आना-जाना होवत रहिथे. रेखा घलो अइसने बताए रिहिसे, के सिरिफ सुन-सुन के ही ए गायन विधा ल सीखे हावय. एकरे सेती उन सबो के गायन म लगभग एके असन शैली अउ शब्द देखे बर मिलथे-
घोड़ा रोवय घोड़ेसार म, घोड़ेसार म वो,
हाथी रोवय हाथीसार म
मोर रानी ये वो, महलों म रोवय
मोर रानी ये या, महलों म रोवय
एदे धरती म दिए लोटाए वो, ये लोटाए वो, भाई येदे जी...
सुन लेबे नारी ये बाते ल, मोर बाते ल या, का तो जवानी ये दिए हे
भगवाने ह वो, मोर कर्मे म न
भगवाने ह या, मोर कर्मे म न
येदे काये जोनी मोला दिए हे, येदे दिए हे, भाई येदे जी...
भरथरी के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे म बताए जाथे, के परमार वंश के महान सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भृर्तृहरि ह ए गाथा के मुख्य पात्र आय. एला संस्कृत के महान कवि भर्तृहरि घलो माने जाथे. अइसे बताए जाथे, के भरथरी कथा ह बिहार, उत्तर प्रदेश अउ बंगाल म पहिलिच ले प्रचलित रिहिसे, उही मन डहार ले होवत ए ह छत्तीसगढ़ आए हे. बताए जाथे, पहिली बंगाल के जोगी मन उज्जैन आवत-जावत राहंय. छत्तीसगढ़ एकर मनके बीच म परय, तेकर सेती वोमन इहाँ ले नहाक के ही आवयं-जावयं, इही यात्रा के खातिर ए ह छत्तीसगढ़ म घलो अपन बसेरा बना डारिस. वइसे भरथरी के इहाँ आए अउ एकर कथा प्रसंग के संबंध म अलग-अलग विद्वान मन के अलग-अलग विचार हे.
भरथरी एक अइसन चरित्र आय, जेकर संबंध म बहुत अकन किंवदंती घलो हे. भरथरी योगी कइसे बनीस? वो तो उज्जैन के राजा रिहिसे. फेर वो राजकाज ल छोड़ के काबर चल दिस? अलग-अलग कहानी हे. फेर आखिर म गोरखनाथ जी के किरपा ले सब ठीक हो जाथे. तब भरथरी ह गोरखनाथ के चेला बन जाथे. एकरे सेती एकर एक लोक प्रचलित नांव बाबा भरथरी घलो हे.
छत्तीसगढ़ म भरथरी गायन के क्षेत्र म वइसे तो बहुत झन आवत रेहे हें, फेर जेन लोकप्रियता अउ ऊंचाई सुरूज बाई खांडे ल मिलिस, अभी तक अउ दूसर मनला नइ मिल पाए हे.
सुरूज बाई खाडे के जनम 12 जून 1949 के बिलासपुर जिला के एक ग्रामीण परिवार म होए रिहिसे. जब वो सात बछर के होइस, तभेच ले अपन बबा (नाना) रामसाय टंडन के मार्गदर्शन म गाए ले धर लिए रिहिसे. वोहर अपन नाना जगा ले भरथरी के संगे-संग ढोला-मारू, चंदैनी जइसन लोक गाथा मनला घलो सीखे रिहिसे. पहली बेर उनला रतनपुर मेला म गाये के मौका मिले रिहिसे, फेर रूस म सन् 1986-87 म होए 'भारत महोत्सव' म उनला विशेष चिन्हारी अउ प्रसिद्धि मिलिस. रूस के छोड़े करीब 18 अउ देश मनमा वोमन अपन कला के डंका बजाए रिहिन हें. जेकर सेती उनला दाऊ रामचंद्र देशमुख अउ स्व. देवदास बंजारे स्मृति सम्मान मिले रिहिसे. वोमन ल मध्यप्रदेश शासन के देवी अहिल्या बाई सम्मान घलो मिले रिहिसे. 10 मार्च 2018 म वोमन ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी ले लिए रिहिन हें.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Wednesday, 6 April 2022
मयारु रचनाकार मुकुंद कौशल
7 नवंबर जयंती म सुरता//
मयारुक गीत मन के मयारु रचनाकार मुकुंद कौशल
सन् 1980 के दशक ह छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत के स्वर्ण काल रिहिसे. तब इहाँ मनोरंजन के मुख्य साधन आकाशवाणी ले बजइया गीत मन ही प्रमुख राहयं. तब तावा, जेला ग्रामोफोन काहयं, तेहू म बर-बिहाव अउ छट्ठी-बरही आदि मन म नंगत के छत्तीसगढ़ी गीत चलय.
वो बखत एक ले बढ़के एक छत्तीसगढ़ी के कर्णप्रिय गीत सुने ले मिलय. वो गीत मनमा-
मोर भाखा संग दया मया के सुग्घर हवय मिलाप रे
अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा कोनो संग झन नाप रे...
* * * * *
धर ले कुदारी गा किसान
आज डिपरा ल खन के डबरा पाट देबो गा..
आदि गीत कतकोन गीत सुने बर मिलय. वो बखत छत्तीसगढ़ के मोहम्मद रफी के नांव ले चिन्हारी करइया केदार यादव के आवाज अउ मुकुंद कौशल के रचना के लगभग जुगलबंदी के मोहक रूप गजबेच सुने बर मिलय. मुकुंद कौशल जी मोला एक पइत बताए रिहिन हें, के उन अपन जम्मो गीत मनके धुन ल घलो खुदे बनावंय, जेमा थोड़ा-बहुत परिमार्जन कर के गायक-गायिका मन गा लेवत रिहिन हें.
7 नवंबर 1947 के दुरुग के सोनी जेठालाल धोलकिया अउ महतारी उजम बेन के घर जनमे मुकुंद कौशल जी के चिन्हारी वइसे तो हिन्दी, छत्तीसगढ़ी, गुजराती अउ उर्दू सबो भाखा म समान अधिकार रखने अउ लिखने वाला के रूप म रिहिसे, फेर मैं उंकर छत्तीसगढ़ी रूप, उहू म खास करके गीतकार रूप ले जादा प्रभावित रेहेंव.
मोर वोकर संग चिन्हारी वइसे तो 1983 म जबले मैं साहित्य जगत म पांव रखेंव तबले रिहिसे, फेर घनिष्ठता सन् 1987 म जब छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' निकाले के चालू करेन तब ले बाढ़िस. वो बखत मैं दुरुग-बघेरा दाऊ रामचंद्र देशमुख अउ महासिंग चंद्राकर जी संग भेंट करे बर जावत राहंव, तब मुकुंद कौशल जी अउ वोकर दूकान के तीरेच म रहइया केदार यादव संग घलो भेंट करके आवत रेहेंव. फेर उंकर संग जादा बइठकी तब होइस जब 1993-94 म मैं छत्तीसगढ़ के पहला रिकार्डिंग स्टूडियो चालू करेंव. तब हमर स्टूडियो म मुकुंद कौशल जी के संगे-संग वो बखत के प्रायः जम्मो प्रसिद्ध गायक-गायिका, गीतकार अउ संगीतकार मन संग घंटों बइठना अउ विविध विषय म गोठियाना चलय. काबर ते उन सब रिकार्डिंग के बुता म कोनो न कोनो किसम ले संघरत रिहिन हें.
मुकुंद कौशल जी साहित्य के संगे-संग ज्योतिष शास्त्र के घलो बने जानकार रिहिन हें. एक पइत मोला बताय रिहिन हें, पहिली उन मुकुंद लाल सोनी के नांव ले लिखयं. फेर उनला वतका सफलता नइ मिलिस, तब अंक ज्योतिष के अनुसार अपन जन्म मूलांक 7 के शुभांक खातिर मुकुंद नांव ले लाल अउ सोनी ल निकाल के वोमा कौशल शब्द जोड़ देंव कहिके. ए प्रकार फेर उन अपन नांव मुकुंद कौशल लिखे लगिन. उन बतावंय के अंक ज्योतिष के अनुसार ए बदले नांव ले वोला साहित्य के संगे-संग रोजगार-व्यापार म घलो अच्छा सफलता मिले लगिस.
मुकुंद कौशल जी के पहला रचना उंकर पढ़ई करत बेरा ही सन् 1964 म 'प्रयास' नांव के स्मारिका म छपे रिहिसे. वोकर पाछू डाॅ. विनय पाठक के संपादन म छपइया तिमाही 'भोजली' म. उंकर पहला काव्य संकलन 'लालटेन जलने दो' 1993 म छपिस. फेर तो लगातार लेखन अउ प्रकाशन के सिलसिला चल परिस, जेमा करीब 18 किताब शामिल हें. एमा के एक-दू छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी संग्रह के प्रूफ उन मोरो जगा पढ़वाए रिहिन हें, जेन वैभव प्रकाशन ले निकले रिहिसे.
मुकुंद कौशल जनता के कवि रहिन हें. उंकर रचना म ए बात जगजग ले दिख जावय-
जे बनिहारिन बर-बिहाव म
बत्ती धर चलत रथे
ओकर अंधियारी जिनगी म
दीया बारौ तब बनही
* * * * *
बिन सुरुज के जग अंधियारी, बिन परेम के दुनिया
बिना बजाए मया-पिरित के, नई बाजय हरमुनिया
आज संग नइ गा पाएन तौ अउ कब गाबोन वो
छिन भर कहुंचो बइठ क सुख-दुख ल गोठियाबो वो
मुकुंद कौशल जी मोला एक पइत बताए रिहिन हें, मैं अपन रचना मनला तीनों भाखा म एक साथ लिख लेथौं. पहिली हिन्दी म लिखथौं, फेर गुजराती म अउ ओकर बाद छत्तीसगढ़ी म. मुकुंद कौशल जी एक अच्छा रचनाकार, अच्छा वक्ता के संगे-संग एक बहुत ही अच्छा कवि मंच के संचालन करइया घलो रिहिन हें. मोला उंकर संचालन म आकाशवाणी के संगे-संग कतकों कवि सम्मेलन के मंच मन म घलो कविता पाठ करे के अवसर मिले रिहिसे.
मुकुंद कौशल जी संग मोर उंकर जिनगी के आखिरी बेरा तक संपर्क बने रिहिसे. ए दुनिया ले बिदागरी के ठउका पंदरही पहिली 19-20 मार्च 2021 के रायपुर के होटल क्लार्क इन म होए दू दिनी छत्तीसगढ़ी साहित्य के जलसा के पहला दिन हमन पूरा कार्यक्रम म एके संग बइठे रेहेन. हमर मनके संग म नंदकिशोर तिवारी जी अउ डाॅ. विनय पाठक जी घलो रिहिन. वो दिन हम चारों के ओ मंच ले एके संग सम्मान होए रिहिसे. तब जनावत रिहिसे, के मुकुंद जी के तबियत बने नइ चलत ए. विश्वव्यापी महामारी कोरोना के दौर चालू होगे रिहिसे, फेर मुकुंद जी मास्क नइ लगाए रिहिन हें. तब मैं पूछे रेहेंव- भैया... त उन कहे रिहिन हें- भाई मोला सांस ले म तकलीफ होथे, भारी अकबकासी लागथे, तेकर सेती मास्क नइ लगाए औं. अउ ठउका ओकर पंदरही के बीतते 4 अप्रैल के खबर आगे के उंकर देवलोक गमन होगे.
उंकर सुरता ल डंडासरन पैलगी.. जोहार 🙏
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Friday, 1 April 2022
बुढ़ादेव यात्रा तभे सार्थक हे...
तभे सार्थक होही 'बुढ़ादेव यात्रा'
छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के बेनर म सोमवार 18 अप्रैल के छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर के ऐतिहासिक बूढ़ा तरिया पार म होवइया 'बुढ़ादेव यात्रा' के सफलता खातिर शुभकामना हे, फेर 'अइसन किसम के यात्रा निकाले के तभे सार्थकता हे, जब हम एकर असल कारन ल जानन-समझन अउ फेर उही दिशा म पोठ कारज करन.
आज ए बात ल तो सबो समझगें हावय, के राष्ट्रीयता अउ हिन्दुत्व के नांव म बाहरी संस्कृति अउ महापुरुष मनला छत्तीसगढ़ म खपले के कारज ह भारी बिधुन होके चलत हे. एकर दुष्परिणाम अब जगजग ले चारों मुड़ा दिखे बर धर लिए हे. एकरे सेती आज हमर नवा पीढ़ी के लइका मन जतका दूसर प्रदेश के संस्कृति, गौरव अउ महापुरुष मन के बारे म जानथें-समझथें, वतका अपन खुद के घर छत्तीसगढ़ के बारे म नइ जानयं.
अइसन भयावह बेरा ले बांचे बर अब हमला सचेत होए बर लागही. पूरा निष्ठा अउ कट्टरता के साथ सिरिफ अउ सिरिफ अपन इहाँ के भाखा, संस्कृति, इतिहास, गौरव अउ महापुरुष मन के स्थापना अउ जयगान करे बर लागही. मैं तो आध्यात्मिक पूजा-उपासना के विधि, जीवन पद्धति अउ पूजा-प्रतीक ल घलो आरुग छत्तीसगढ़ी होना चाही कहिथौं. तभे हमर अस्मिता अउ अस्तित्व बांच पाही. छत्तीसगढ़िया राज अउ राजनीतिक आजादी के बात करथन तेनो ह एकरेच ले सिध परही. काबर ते आज इही धर्म अउ संस्कृति ह राजनीतिक सत्ता पाए के सबले सरल अउ मजबूत आधार बनगे हे.
अभी 18 अप्रैल के जेन 'बुढ़ादेव यात्रा' के जोंग मढ़ाए गे हावय, जेमा पूरा छत्तीसगढ़ ले अपन-अपन देवगुड़ी, मातादेवाला अउ जम्मो पबरित ठीहा मन ले मुठा-मुठा भर माटी लान के बूढ़ा तरिया म चौंरा बनाए के निर्णय लिए गे हे, वोकरेच ले हमर ए बड़का उद्देश्य के शुरुआत करव. बूढ़ा तरिया, जेकर नांव ल अभी सरकारी रिकार्ड म विवेकानंद सरोवर कर दिए गे हे, वोला वापस सरकारी रिकॉर्ड म तइहा के जुन्ना नांव 'बूढ़ा तरिया' करवाए बर परन ठानव संग म वो तरिया के बीच के बगीचा म बूढ़ा देव के मूर्ति सबले ऊंचा चारों मुड़ा ले जगजग ले दिखय अइसन स्थापना करवाए के उदिम करौ.
आज हमन अब सब जान-समझ डारे हावन, के जे मनखे मनला इहाँ के इतिहास अउ संस्कृति के समझ नइए, तइसन मनला इहाँ के मुखिया पद म बइठारे ले कतका अभियावन दृश्य देखे म आवत हे. अब बेरा आगे हे, कोनों किसम के भावनात्मक नारा मन म झन फंस के सिरिफ अपन पुरखा अउ पुरखौती खातिर चेत करव. बस अतके आसरा हे. शुभकामना हे..
जय छत्तीसगढ़.. जोहार छत्तीसगढ़..
-सुशील भोले-9826992811