अप्पत होगे टूरा निच्चट नइ मानय एक्कोच बात खोरकिंजरा कस किंजरत रइथे दिन चिन्हय न रात महूं गुनथौं कहूं बेटी होतीस करतीस संवागा घर के हाथ बंटातीस दाई के अउ खवातीस चुरो के भात सुशील भोले
दिन आगे हे गरमी के नंगत झड़क ले बासी दही-मही के बोरे होवय चाहे होवय तियासी तन तो जुड़ लागबे करही मन घलो रही टन्नक काम-बुता म चेत रही नइ लागय कभू उदासी *सुशील भोले*
आ दरपन तैं देख जउंरिहा कइसे दिखथे चेहरा तोर रूप तो धंस गे हावय जइसे गड्ढा-दहरा का बात के भरम म हावस कइसे चिक्कन अंग हे करम के कालिख तो उपकत हे रंग घलो हे गहरा *सुशील भोले*
पहिली सुमरनी तोर गजानन तहीं विघ्ना के हरता दाना-दाना जोर-सकेल के शुभकारज के करता तहीं बिपत के संगी-साथी, सुख के तहीं मितान तोर सरन म जे-जे आथें, बनथस सबके भरता *सुशील भोले*