25 अक्टूबर जयंती म सुरता//
छत्तीसगढ़ म सांस्कृतिक जागरण के पुरोधा दाऊ रामचंद्र देशमुख
सन् 1971 के 7 नवंबर के जुड़हा रतिहा के सुरता छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास म सबर दिन अंजोरी बगरावत जगजग ले अमर रइही. काबर ते इही दिन दुरूग तीर के गाँव बघेरा म लोक-संस्कृति के जागरण काल के जयघोष "चंदैनी गोंदा" के प्रथम प्रस्तुति के रूप म होए रिहिसे.
दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के संयोजन म होए ए ऐतिहासिक प्रस्तुति ल तो मोला देखे के सौभाग्य नइ मिल पाए रिहिसे, फेर संगीतकार खुमान साव जी के संचालन म प्रदर्शित होए ए 'चंदैनी गोंदा' ल मैं जरूर देखे रेहेंव. भिलाई पावर हाउस म होए वो कार्यक्रम के जानकारी मोला खुद दाऊ जी ही दे रिहिन हें. तब वो मंच म दाऊ जी के सम्मान होए रिहिसे. तब मैं छत्तीसगढ़ी सिनेमा के नायक अउ बरछाबारी के संपादक रहे चंद्रशेखर चकोर संग उहाँ पहुंचे रेहेंव.
दुरुग जिला (अब बालोद) के गाँव पिनकापार म महतारी मालती देवी अउ सियान गोविन्द प्रसाद जी के घर 25 अक्टूबर 1916 के जनमे दाऊ रामचंद्र देशमुख जी संग मोर चिन्हारी सन् 1987 के नवंबर-दिसंबर महीना म तब होए रिहिसे, जब छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला मासिक पत्रिका "मयारु माटी" के विमोचन करे खातिर उंकर जगा कार्यक्रम के पहुना बने खातिर अनुमति ले बर वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जी संग उंकर घर पहुंचे रेहेन. बाद म तो हमेशा मेल-भेंट होवत राहय. कतकों बखत मैं उंकर घर बघेरा म रतिहा घलो रहि जावत रेहेंव. तब दाऊ जी संग चंदैनी गोंदा के संगे-संग छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया मन ले जुड़े विविध विषय म चर्चा होवय. तब जनावय, के दाऊ जी के भीतर छत्तीसगढ़ ल लेके कतका पीरा भरे हे, अउ ए सबके समाधान खातिर उंकर मन म का-का उपाय या रद्दा हे.
ए बात सही आय के दाऊ जी ल चंदैनी गोंदा के माध्यम ले ही राष्ट्रीय अउ अंतर्राष्ट्रीय स्तर म जादा प्रतिष्ठा अउ चिन्हारी मिलिस, फेर लोककला के संरक्षण अउ संवर्धन खातिर उन सन् 1950 ले ही 'छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंच' के गठन के साथ ही लगगे रिहिन हें. एकर माध्यम ले उन तब के नाचा शैली म परिमार्जन करिन अउ वोला एक सम्मानजनक रूप देइन. वोमन कला के मनोरंजनात्मक रूप ल एक विचारधारा म जोड़त वैचारिक क्रांति के रद्दा तक लेगे के भगीरथ उदिम करिन. आज हम छत्तीसगढ़ी गीत संगीत म, इहाँ के सांस्कृतिक मंच मन म, नवा पीढ़ी के रचनाकार मन म छत्तीसगढ़ी अस्मिता ले जुड़े विषय म बेधड़क बोलत अउ लिखत देखथन, सब उंकरे बोए बिजहा के परसादे देखथन-सुनथन.
आज तो छत्तीसगढ़ राज बने के कोरी भर बछर ले आगर होगे हे. इहाँ के भाखा संस्कृति अउ कला खातिर इहाँ के सरकार ह कतकों उदिम करत रहिथे, तभो वो सब उदिम ह अधूरा जनाथे. तब वो बेरा के बात गुनव, जब लोगन छत्तीसगढ़ी बोले-बताए अउ अउ अपन चिन्हारी बताए म लजाए असन करय. वो बखत अइसन बुता ल धर के आगू अवई ह कतेक जब्बर छाती वाले के बुता रिहिस होही? फेर दाऊ जी अपन धुन के पक्का रिहिन. उन पूरा छत्तीसगढ़ ले कलाकार मनला छांट-निमार के अपन संग जोड़त गिन. इनमा मदन निषाद, लालूराम, ठाकुरराम, भुलवा दास, बाबूदास, मालाबाई, फिदा बाई आदि प्रमुख रिहिन. दाऊ जी ए बखत कला के संवर्धन के संगे-संग जनसेवा अउ समाज सुधार के कारज म ही लगावंय.
दाऊ जी एक बखत मोला बताए रिहिन हें- छत्तीसगढ़ राज्य के स्वपनदृष्टा जेन रिश्ता म उंकर ससुर जी घलो रिहिन डाॅ. खूबचंद बघेल जी के चिट्ठी जेन वोमन 22 फरवरी 1969 के लिखे रिहिन हें, वोकर ले प्रभावित होके वोमन 'चंदैनी गोंदा' के सिरजन म आगू बढ़िन.' दाऊ जी बताए रिहिन के, डाॅ. खूबचंद बघेल जी उनला छत्तीसगढ़ के नवनिर्माण खातिर आव्हान करत लिखे रहिन हें, के समाज के जनजागरण म आपके स्थायी भूमिका बनत हे. मैं चाहथौं आप समाज म वो भूमिका म आवौ, जेन अभी मैं करत हौं. हमला आपके कलात्मक प्रतिभा के घलो जरूरत हे. अब आप वइसन नइ रेहेव, जइसन पहिली रेहेव. आप सिरिफ चिंतन, लेखन अउ निर्देशन के दृष्टि ले सोचव. महू योगदान देहूं. हमला छत्तीसगढ़ के हर हालत म नवनिर्माण करना हे.'
डॉ. खूबचंद बघेल जी के वो चिट्ठी ह 'चंदैनी गोंदा' के सिरजन के इतिहास रचे म जबर बुता करिस. चंदैनी गोंदा के भव्यता अउ लोकप्रियता के डंका बजे लगिस. बताथें- एक बेर पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी के कार्यक्रम रिहिसे अउ उहिच बेरा म थोरके दुरिहा म 'चंदैनी गोंदा' के कार्यक्रम घलो रिहिसे. बताथें, इंदिरा गाँधी जी के कार्यक्रम म लोगन के उपस्थिति नहीं के बरोबर रिहिसे. एकर कारण जाने खातिर जब इंदिरा जी पूछिन, त उनला बताए गिस के बाजू के गाँव म 'चंदैनी गोंदा' के कार्यक्रम चलत हे, जिहां लोगन उमड़े परे हे, वोकरे सेती इहाँ उपस्थिति नहीं के बरोबर हे.
'चंदैनी गोंदा' के प्रस्तुति छत्तीसगढ़ म तो होबेच करय, एकर छोड़े उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली, मध्यप्रदेश आदि राज्य मन म घलो सफलता पूर्वक होइस. अखिल भारतीय लोककला महोत्सव यूनेस्को द्वारा आयोजित भोपाल के सम्मेलन म एला भारी सराहना मिलिस.
दाऊ जी अपन जिनगी के आखरी बेरा तक छत्तीसगढ़ी कला संसार खातिर समर्पित रिहिन. मोर सौभाग्य आय, छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के विमोचन 9 दिसंबर 1987 के मैं उंकरेच पबरित हाथ ले करवाए रेहेंव. तब छत्तीसगढ़ी मंच के एक अउ साधक दाऊ महासिंह चंद्राकर जी वो कार्यक्रम के अध्यक्षता करे रिहिन हें.
कला, साहित्य अउ संस्कृति के त्रिवेणी संगम दाऊ रामचंद्र जी देशमुख 13 जनवरी 1998 के रतिहा ए नश्वर दुनिया ले बिदागरी लेइन. फेर जब तक छत्तीसगढ़ म गौरवशाली कला-संस्कृति के गोठ होवत रइही, तब तक दाऊ जी ल सम्मान के साथ सुरता करे जाही.
अभी दाऊ जी के व्यक्तित्व कृतित्व ऊपर डाॅ. सुरेश देशमुख जी के संपादन म एक अच्छा ग्रंथ 'चंदैनी गोंदा : छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा' नाॅंव ले आए हे. जे लोगन या शोधार्थी मन छत्तीसगढ़ी कला ऊपर कारज करत हें, वोकर मन बर ए ह बड़ उपयोगी साबित हो सकत हे.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Wednesday, 18 May 2022
छत्तीसगढ़ म सांस्कृतिक जागरण के पुरोधा दाऊ रामचंद्र देशमुख
Saturday, 14 May 2022
छत्तीसगढ़ी व्याकरण के सर्जक काव्योपाध्याय
11 सितम्बर स्मरण दिवस//
छत्तीसगढ़ी व्याकरण के सर्जक काव्योपाध्याय हीरालाल चंद्रनाहू
छत्तीसगढ़ी भाखा ह आज अंतर्राष्ट्रीय अगास म पाॅंखी लगाके उड़ान भरत हे, त एकर नेंव म 11 सितम्बर सन् 1984 के काव्योपाध्याय के उपाधि ले सम्मानित होय हीरालाल जी चंद्रनाहू के दूरदर्शी सोच अउ कारज ह पोठ बुता करे हे, कहिबो त कुछू अनफभिक नइ होही.
हीरालाल जी वो बखत छत्तीसगढ़ी व्याकरण के रचना करिन जब हिन्दी के घलो कोनो सर्वमान्य व्याकरण प्रकाशित नइ हो पाए रिहिसे. एकरे सेती सन् 1881 ले 1985 तक म लिखे उंकर ए व्याकरण ल सन् 1890 म अंगरेजी म अनुवाद कर के छत्तीसगढ़ी अउ अंगरेजी म समिलहा छपवाने वाला विश्वप्रसिद्ध व्याकरणाचार्य सर जार्ज ए ग्रियर्सन ह हीरालाल जी के आभार व्यक्त करत लिखे रिहिन हें- "हीरालाल जैसे विद्वानों के कारण ही हम भिन्न-भिन्न भाषाओं के बीच सेतु बनाने के अपने प्रयास में सफल हो पाते हैं."
हीरालाल जी के जनम रायपुर के तात्यापारा म सन् 1856 म महतारी राधाबाई अउ सियान बालाराम चंद्रनाहू जी के घर होए रिहिसे. वइसे उंकर मूल गाँव धमतरी जिला के कुरूद तहसील के गाँव राखी (भाठागाॅंव) आय. इहाँ एक बात ल जानना जरूरी हे, के हीरालाल जी के जन्म अउ निधन के निश्चित अउ प्रमाणित तिथि के जानकारी अभी नइ मिल पाए हे. हमर अपन समिति 'नव उजियारा साहित्य एवं सांस्कृतिक संस्था ' के माध्यम ले गजब खोजबीन करेन, फेर सफल नइ हो पाएन. अइसने उंकर मूल फोटो घलो नइ मिल पाइस. तब सब इतिहासकार, साहित्यकार अउ सामाजिक विद्वान मन के सलाह अउ सुझाव म एक मानक रेखाचित्र (ए लेख संग संलग्न हे) बनवाए रेहेन. सौभाग्य ले आज इही रेखाचित्र ह सरकारी, गैरसरकारी, साहित्यिक अउ सामाजिक सबो जगा के आयोजन म चलत हे. वइसने जन्म अउ निधन के प्रमाणित जानकारी नइ मिले के सेती वोमन ल जेन 11 सितम्बर 1884 के 'काव्योपाध्याय' के उपाधि मिले रिहिसे, तेने तिथि ल सबो विद्वान मन के सर्वसम्मति निर्णय ले 'स्मरण दिवस' के रूप म मनाथन, हीरालाल जी के सुरता करथन, उंकर छत्तीसगढ़ी खातिर करे गे कारज के सेती आभार व्यक्त करथन.
हीरालाल जी के प्राथमिक शिक्षा रायपुर म ही होए रिहिसे. सन् 1874 म उन जबलपुर ले मेट्रिक पास करिन तब सिरिफ 19 बछर के उमर म सन् 1875 म ही उन रायपुर जिला म सहायक शिक्षक के पद म नियुक्ति पागे रिहिन हें. हीरालाल जी लइकई ले ही पढ़ाकू मनखे रिहिन, एकरे सेती उन खुद के प्रयास ले ही उर्दू, उड़िया, बांग्ला, मराठी अउ गुजराती भाषा सीख गये रिहिन अउ उन जम्मो भाखा म वो बखत उपलब्ध रेहे मुख्य पोथी मनला पढ़ डारे रिहिन.
सन् 1881 म उंकर लिखे 'शाला गीत चंद्रिका' नवल किशोर प्रकाशन नई दिल्ली ले छप के आइस, कुछ विद्वान प्रकाशन संस्था ल लखनऊ के बताथें. इही कृति खातिर बंगाल के राजा सौरेन्द्र मोहन टैगोर (ठाकुर) उनला सम्मानित करे रिहिन हें. हीरालाल जी के एक अउ अमर कृति 'दुर्गायन' खातिर सन् 1884 म राजा सौरेन्द्र मोहन टैगोर उनला स्वर्ण पदक देके सम्मानित करे रिहिन हें. 'दुर्गायन' म हीरालाल जी दुर्गा सप्तशती के दोहा मनला प्रस्तुत करे रिहिन हें. इही कृति खातिर बंगाल संगीत अकादमी कलकत्ता द्वारा उनला "काव्योपाध्याय' के उपाधि ले सम्मानित करे गे रिहिसे. काव्योपाध्याय के उपाधि ल वो बखत के सबले प्रतिष्ठित उपाधि माने जावत रिहिसे. हीरालाल जी के मूल नाम हीरालाल चंद्रनाहू रिहिसे, एकरे सेती उन अपन नाम हीरालाल चंद्रनाहू ही लिखंय, फेर काव्योपाध्याय के उपाधि मिले के बाद उन हीरालाल काव्योपाध्याय लिखे लागिन. फेर हमर मनके जिहाॅं तक सुझाव हे, के अब उंकर नॉंव ल 'काव्योपाध्याय हीरालाल चंद्रनाहू' लिखे जाना चाही. काबर ते उपाधि ल हमेशा नाम के पहिली लिखे जाथे, नाम के बाद नहीं. जइसे- भारतरत्न फलाना, पद्मभूषण फलाना या पद्मश्री फलाना आदि आदि... नाम के बाद वो मनखे के सरनेम या उपनाम ल ही लिखे के परंपरा हे, उपाधि ल नहीं.
आगू चलके हीरालाल जी ल धमतरी के एंग्लो वर्नाकुलर टाऊन स्कूल म प्रधान पाठक के नौकरी मिलगे रिहिसे. एकर पहिली कुछ दिन उन बिलासपुर म घलो पढ़ावत रिहिन हें. हीरालाल जी एक योग्य अउ समर्पित शिक्षक होए के संगे-संग अग्रणी सामाजिक कार्यकर्ता घलो रिहिन हें, एकरे सेती उनला धमतरी नगर पालिका के अध्यक्ष बने के सम्मान घलो मिले रिहिसे.
हीरालाल जी लइका मन खातिर बाल मनोविज्ञान ऊपर आधारित हिन्दी म 'बालोपयोगी गीत' अउ अंगरेजी म 'रायल रीडर भाग-1 अउ रायल रीडर भाग-2 लिखिन. बालोपयोगी गीत संगीतबद्ध रिहिसे, तेकरो खातिर उनला बंगाल संगीत अकादमी डहार ले सम्मानित करे गे रिहिसे.
हीरालाल जी के लिखे छत्तीसगढ़ी व्याकरण ह सबले जादा प्रसिद्ध होइस. एकर कतकों भाषा म अनुवाद होए हे. विश्वप्रसिद्ध व्याकरणाचार्य सर जार्ज ए ग्रियर्सन ह वो बखत पूरा भारत के लगभग सबोच भाषा मनके सर्वेक्षण करवाए रिहिन हें, तब ए बेरा म उनला सिरिफ छत्तीसगढ़ी भर के व्याकरण ह वैज्ञानिक दृष्टिकोण ले व्यवस्थित देखे बर मिले रिहिसे. एला देख के उन अतेक प्रभावित होइन, के हीरालाल जी के सम्मान करत उंकर नाम ल लिखत 'एशियाटिक सोसाइटी आॅफ बंगाल' शोध पत्रिका के खंड 49 भाग 1 म अनुवाद अउ संपादित कर छपवाए रिहिन हें. एकर सेती हीरालाल जी के संगे-संग छत्तीसगढ़ी भाखा ल घलो अंतर्राष्ट्रीय स्तर म चिन्हारी मिलिस.
आगू चलके हीरालाल जी के छत्तीसगढ़ी व्याकरण म थोर-बहुत संशोधन करके लोचन प्रसाद पाण्डेय जी ह राय बहादुर हीरालाल जी के मार्गदर्शन म विस्तारित करत मध्यप्रदेश शासन के माध्यम ले छपवाए रिहिन हें. हमर रायपुर के इतिहासकार प्रभूलाल मिश्रा अउ डाॅ. रमेन्द्रनाथ मिश्रा मन घलो उंकर व्याकरण ऊपर आधारित एक ग्रंथ लिख के छपवाए हें.
हीरालाल जी सामाजिक अउ साहित्यिक गतिविधि मन म अतेक जादा मगन राहंय, के अपन सेहत डहार जादा चेत नइ कर पावत रिहिन हें. एकरे सेती उन सन् 1890 के अक्टूबर महीना म सिरिफ 34 बछर के उमर म ही ए दुनिया ले बिरादरी ले लेइन. फेर अतकेच नान्हे उमर उन छत्तीसगढ़ी भाखा अउ साहित्य खातिर जेन बड़का अउ पोठ बुता करे हें, वो ह अतुलनीय हे. उंकरे भरोसा आज छत्तीसगढ़ी ल अंतर्राष्ट्रीय स्तर म चिन्हारी मिले हे. उंकरेच भरोसा हम छाती ठोक के छत्तीसगढ़ी ल भाषा आय कहिके बता सकथन. उंकर सुरता ल नमन करत सरकार डहार ले अभनपुर के महाविद्यालय मन के नाम ल उंकर सुरता म रखे गे हावय.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Monday, 9 May 2022
वो चिट्ठी पाती के दिन..
सुरता//
वो चिट्ठी-पाती के दिन...
इंटरनेट अउ मोबाइल के आविष्कार होए के बाद आज भले पोस्ट कार्ड, अंतर्देशीय पत्र अउ लिफाफा के दिन ह इतिहास के अंग बनगे हवय, फेर एक बेरा अइसनो रिहिसे, जब इंकर मन के अगोरा म डॅंकहार बाबू के सइकिल के घंटी सुने बर कान हमेशा बेचैन राहय. कभू महीना भर म त कभू अठोरिया म त कभू बिहाने दिन डॅंकहार बाबू के आरो संग मयारु संगी के आरो मिल जावत रिहिसे.
सन् 1869 म आस्ट्रेलिया ले शुरू होय पोस्टकार्ड ह भारत म सन् 1879 के जुलाई महीना म आइस हे. तब इहाँ एकर कीमत 3 पइसा रिहिस. फेर हमन तब एकर माध्यम ले सोर संदेशा ले दे के चालू करेन जब ए ह 15 पइसा के होगे रिहिस, जेन ह 50 पइसा के होवत ले चलिस. तब मैं हाईस्कूल म पढ़त रेहेंव. रायपुर के रामदयाल तिवारी स्कूल म. तब हमर गाँव के संगी मन कभू-कभार एकाद पाती पठो देवत रिहिन हें. जवाब म महूं वोमन ल पठो देवत रेहेंव. फेर वोकर सुरता ह गंज अकन दिन ले राहय. फलाना ह का-का लिखे रिहिसे, अउ मैं ह जवाब म का लिखेंव. स्कूल के किताब मन के आखर ल भुला जावत रेहेन फेर संगी संग होए पाती के गोठबात ल कभू नइ भुलावत रेहेन. अइसन भुलाए बिसराए के तब चालू होइस जब मोला नंगत के चिट्ठी-पाती भेजे बर लागय अउ मोर जगा घलो नंगत के आए के जोंग माढ़िस. ए बेरा तब आइस जब 9 दिसंबर 1987 के मैं छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला मासिक पत्रिका "मयारु माटी" के प्रकाशन संपादन शुरू करेंव. तब अतका जादा पाती आवय, के वोमन ल पढ़े अउ जवाब दे म ही घंटों पहा जावत रिहिसे. वोमा के कतकों जेन विशेष किसम के लागय, कोनो वरिष्ठ साहित्यकार के या कोनो बड़का नेता या मंत्री आदि के तेला तो फाइल बना के धर घलो लेवत रेहेंव.
हमन इतिहास के जुन्ना पन्ना ल लहुटाथन त इहू जाने ल मिलथे, के पोस्टकार्ड के जनम होए के पहिली घलो संदेश देके चलन रिहिसे. पहिली ए बुता खातिर पोंसे अउ सिखोए-पढ़ोए परेवा मन के माध्यम ले सोर-संदेशा भेजे जावत रिहिसे. पहिली के राजा-महाराजा मन एकर खातिर विशेष संदेशिया घलो राखत रिहिन हें, जेमा पल्ला दौड़इया घोड़ा मनला एकर खातिर विशेष रूप ले खवा-पिया के राखे जावय.
आज इंटरनेट अउ मोबाइल के आविष्कार ह ए सबो उदिम अउ जिनिस ल इतिहास के अंग बना देइस. फेर मोला आजो सुरता हे, जब कुछु खास पाती ल हमन महीनों धरे राहन. कापी-किताब म लुका छिपा के राखन. मोला सुरता हे, छायावाद के प्रवर्तक कवि पद्मश्री पं. मुकुटधर पाण्डेय जी के एक पाती (संदेश) ल तो मैं अपन पहला कविता संकलन 'छितका कुरिया' म ब्लाक बनवा के छपवाए घलो रेहेंव. अब अइसन किसम के संदेश ह घलो ईमेल या व्हाट्सएप के माध्यम ले मिल जाथे. तब काकरो हाथ के लिखे पाती या संदेश ल सुरक्षित राखे के बात ह भुसभुसहा असन जनाथे. अब तो सइघो किताब घलो ह पीडीएफ के माध्यम ले मिनट भर म एती ले ओती चल देथे. पूरा दुनिया भर म बगर जाथे. तब काकरो मयारुक पाती अउ मोती कस लिखे अक्षर के सुरता कहाँ ले आही?
आज तो मोला खुद सुरता नइए के मैं आखरी पाती कोन ल अउ कब लिखे रेहेंव. फेर जो हो, चिट्ठी-पाती के माध्यम ले जे अपनापन अउ खुशी तब मिलत रिहिसे वो ह आज के विडियो कालिंग के माध्यम ले होवइया मुंह देखिक-देखा गोठ-बात म घलो नइ मिलय.
जय हो मोर संगी के पाती
तोर सुरता आथे दिन-राती
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Wednesday, 4 May 2022
सुशील ले भोले तक के रेंगान
सुरता//
सुशील ले भोले तक के रेंगान...
जानकर मन नाम के गजब महिमा बताथें. एकरे सेती उन भारी सोच-विचार अउ लगिन-पतरा देख-पढ़ के काकरो भी नाम ल धरथें. शायद ए परंपरा ह शिक्षा के अंजोर संग बगरत रहे हे. फेर हमर गाँव-गॅंवई म आजो ए चलन ह समाज के आखरी मुड़ा तक नइ पहुँच पाए हे. एकरे सेती आज घलो बुधवार के दिन होए लइका के नाम ल बुधारू या बुधियारिन धर दिए जाथे. फेर जिहाॅं तक हमर घर या मोर नाम के बात हे, त हमर सियान गुरुजी रिहिन हें. शहर म राहत रिहिन हें. जे मन बेरा अउ काल के चक्र अउ महत्व ल समझत रिहिन हें, तेकर मन संग संगति करत रिहिन हें. एकरे सेती उन मन काल चक्र अउ बेरा के महत्व ल घलो थोर-बहुत समझत रिहिन हें. एकरे सेती हमर सबो भाई-बहिनी मन के जनम बेरा अउ दिन-बादर ह एकक मिनट अउ सेकंड के मुताबिक उंकर डायरी म लिखाय हे. अउ वोकरेच मुताबिक मोर नाम सुशील कुमार वर्मा धराए हे.
सरकारी रिकॉर्ड म तो आजो इहिच नाॅंव हे, फेर सार्वजनिक गतिविधि मन म एमा थोर-बहुत बदलाव आवत रेहे हे. सन् 1984 के बात आय. तब मैं दैनिक अग्रदूत प्रेस म काम करत रेहेंव. इही बछर अक्ती परब म हमर बिहाव-बंधना होइस. बिहाव तक तो सब बने-बने रिहिस. फेर बिहाव के बाद हमर संग काम करइया नोनी मन मोला ताना मारे असन गोठियावंय- 'का सर जी, तोर बिहाव होगे, तभो ले अभी तक कइसे तैं ह कुमार लिखथस? हमन तो बिहाव होइस तहाँ कुमारी ले श्रीमती लिखे ले धर लेथन, त तहूं मनला अइसने नइ करना चाही?
वोमन बनेच ठेसरा मारंय. वो बखत अग्रदूत के आफिस म संख्या घलो वोकरे मनके जादा राहय. आखिर थक-हार के मैं ह सुशील कुमार वर्मा ले कुमार शब्द ल निकाल के सिरिफ सुशील वर्मा लिखे लगेंव. तब वोमन हाॅं अतका म चल जाही कहिके खुश होगे रिहिन हें.
एकर ठीक दस बछर बाद सन् 1994 म मोर जीवन म अद्भुत घटना घटिस, जेकर चलत मैं नागपंचमी 24 जुलाई 1994 ले अध्यात्म के रद्दा म आएंव. (एकर उल्लेख मोर पहिली के आलेख 'अध्यात्म के रद्दा' म आगे हे, तेकर सेती घेरी-भेरी नइ ओरियावौं). वइसे मोर मस्तिष्क परिवर्तन तो नागपंचमी के दिन ही होए रिहिसे, फेर मैं विधिवत आध्यात्मिक दीक्षा अगहन महीना (तब दिसंबर म परे रिहिसे) म लिए रेहेंव. तब मैं पत्रकारिता अउ साहित्यिक गतिविधि मनला पूरा छोड़-छाड़ के अध्यात्म म बूड़ गे रेहेंव. उही बखत एक दिन मोर आध्यात्मिक रद्दा बतइया ह कहिस- 'तोला अब अपन नाम ले जातिसूचक शब्द ल निकाल देना चाही.'
पहिली तो मोला वोकर बात समझ म नइ आइस. अउ मैं वो डहार जादा चेत घलो नइ करेंव. सन् 1995 के सावन महीना म फेर मोला वो इही बात ल कहिस. त मैं वोकरे जगा पूछेंव- 'त तहीं बता भई, का लिखे जाना चाही?' वो कहिस- 'तोर पहचान, तोर जाति के माध्यम ले नहीं, भलुक तोर ईष्ट के माध्यम ले होना चाही. तहाँ ले ज्योतिष शास्त्र के अंक मन के कुछ गुणा भाग करिस अउ कहिस- आज ले तैं अपन नाम ल सुशील भोले लिख.
बस उही दिन ले फेर मोर सार्वजनिक गतिविधि के नाम सुशील भोले होगे. वोकरेच बताए अउ रद्दा देखाय म मैं साधना के रद्दा म बढ़तेच गेंव, जेन ह सात-सात बछर के तीन अलग-अलग चक्र (स्तर) म कुल 21 बछर तक चलिस. एमा के पहला सात बछर तो बहुतेच कठोर रिहिस, वोकर बाद के दूसरा सात बछर म थोरिक शिथिलता करिस अउ फेर तीसरा सात बछर म थोरिक अउ शिथिलता देइस. जब सात-सात बछर के तीनों चक्र, माने कुल 21 बछर पूरा होइस, तब फेर पहिली जइसे आम आदमी के जीवन जीए के अनुमति मिलिस.
जय भोले.. ऊँ नमः शिवाय..
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Monday, 2 May 2022
भाषा बिन संस्कृति कइसे बाॅंचही??
भाषा बिन संस्कृति कइसे बाॅंचही सरकार..?
हमर घर
बारों महीना खाए जाथे
बासी अउ बोरे
तभो ले
श्रमिक संगी मनला
सम्मान दे खातिर
1 मई के अउ खाएन
माई-पिल्ला खाएन
संग म फोटू खिंचाएन.
आने बछर घलो खाबो
श्रमिक संगी मन संग
खाॅंध म खॉंध जोरबो.
फेर एक बात के मोला
समझ नइ आवत हे,
बिन भाषा के
अकेल्ला संस्कृति भर ह
कइसे बॉंचे पाही?
एकर जबर संसो होवत हे.
हम सब जानथन-
अस्मिता के चिन्हारी तो
दूनों होथे-
भाषा अउ संस्कृति.
इंकरे माध्यम ले
दुनिया म लोगन
हमला जान अउ
पहचान पाथें.
फेर अभी तक तो
सरकार ह
न राजभाषा आयोग के
गठन करे हे
न तो
छत्तीसगढ़ी ल
शिक्षा के माध्यम बनाए हे.
तब तहीं बता
एक आॅंखी ल मूंदे रहिबे
अउ एके आॅंखी भर म
नटेर के देखत रहिबे,
त का
हमर जम्मो चिन्हारी ल
जगजग ले देखे पाबे ?
तब तैं
कइसे गुन डरे सरकार
संस्कृति के नाॅंव म
कुछ कला अउ परंपरा भर के
आरो ले म
जम्मो अस्मिता के
चिन्हारी अउ बढ़वार हो जाही?
सिरतोन म तोला
इहाँ के अस्मिता के संसो हे
त तोला
भाषा अउ संस्कृति
दूनों के
संगे-संग
सुध ले बर परही
तभे
हमर अस्मिता के सोर
पूरा दुनिया म बगरही.
-सुशील भोले
मो/व्हा. 9826992811
Sunday, 1 May 2022
बासी काबर खावन समझव
बासी काबर खावन समझव...
कार्बोहाइड्रेट 79•2-- 78℅,
खनिज पदार्थ 0•5--0•7℅
फाइबर 0--0℅
कैल्शियम 0•01-- 0•01℅
फॉस्फोरस 0•11--0•17℅
प्रति 100 ग्राम में-----
लौह तत्व 1•0--2•8mg
विटामिन बी 20--60 lU
प्रति 300 ग्राम में--
विटामिन A -- 0--4 IU
कैलोरी प्रति 100 ग्राम- 348- 351
यह वैज्ञानिक विश्लेषण चावल का है, लेकिन हम चावल नहीं खाते, उसे पका कर खाते हैं। पकाना एक प्रसंस्करण क्रिया है।प्रसंस्करण से पदार्थ के गुण-धर्म बदल जाते हैं इसलिए उपरोक्त वैज्ञानिक निर्धारण को व्यवहारिक नहीं माना जा सकता।
चावल को पका कर अनेक खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं।प्रत्येक के गुण, स्वाद और पौष्टिकता में अन्तर होता है।अतः चावल से निर्मित विविध व्यंजनों के पौष्टिकता का वैज्ञानिक निर्धारण अभी किया जाना है।
आयुर्वेद में विभिन्न रोगों में पथ्य के रूप में चावल के अलग अलग प्रकल्प दिए जाते हैं।
भात-- चावल को जल में उबाल कर अथवा भाप में पका कर भात बनाया जाता है, इसे दाल-सब्जी आदि भक्ष्य पदार्थो के साथ खाया जाता है। यह स्वस्थ व्यक्ति का पूर्ण आहार होता है।
कृशरा- (खिचड़ी)
चावल, दाल, कुछ पत्र शक, नमक, मिर्च, हल्दी आदि को एक साथ कुछ अधिक जल के साथ अधिक नरम होते तक पकाया जाता है उसे कृशरा कहा गया है। जिस रोगी की जठराग्नि मन्द हो जाती है उसे सुपाच्य और पूर्ण पौष्टिक आहार के रूप में कृशरा दिया जाता है।
यवागू (पेज)---
सामान्यतः व्यक्ति जितना चावल खाता है उसकी एक चौथाई मात्रा की चार गुना जल में पकाया जाता है उसे यवागू कहा गया है। यह अल्प पौष्टिक और अधिक सुपाच्य होता है।दुर्बल तथा क्षीण जठराग्नि रोगी को यवागू देने का विधान है।
पेया ( घोटो)-
थोड़े से चावल को दस गुना जल में अधिक देर तक पकाया जाता है। चावल के दाने यदि दिखाई दें तो उसे मथानी से मथ कर उसे पीने योग्य बना लिया जाता है। इसे पेया कहा जाता है। थोड़े अन्न से पेट भरने का अच्छा साधन है यह। यह और भी अधिक सुपाच्य होता है।
मण्ड (पसिया)--
कुछ लोग चावल को अधिक जल में पका कर जलीय अंश को निथार देते हैं। निथारने की इस प्रक्रिया को पसाना कहते हैं तथा पसाने से निकले मण्ड को पसिया कहा जाता है। यह सर्वाधिक सुपाच्य साथ ही पौष्टिक भी होता है।
पेया और मण्ड (घोटो और पसिया) नमक डालकर दिया जाता है तो यह Oral rehydration के लिए अति उत्तम कार्य करता है। मैं अपने चिकित्सा अभ्यास में इसका प्रयोग करता हूँ। अतिसार वमन (उल्टी) के रोगी शरीर का जलीय अंश निकल जाने से अत्यधिक दुर्बल हो जाते हैं साथ ही उनकी अंतड़ियों से पाचक रस मल के साथ निकल जाने के कारण जठराग्नि अत्यन्त क्षीण हो जाती है। तब oral rehydration अथवा intraveinous rehydration दिया जाता है। इस प्रकार दिए जाने वाले rehydration में पौष्टिकता अत्यल्प होती है। यदि रोगी मुख मार्ग से ले सकता हो तो पेया या मण्ड नमक डालकर देने से रोगी की स्थिति से शीघ्र सुधार होता है और पाचन की समस्या भी नहीं होती।
आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। छत्तीसगढ़ उष्ण कटिबंधीय प्रदेश है, यहाँ के निवासी मुख्यतः कृषक हैं। आदर्श विधि से भोजन निर्माण और उसका सेवन इनकी जीवन शैली से मेल नहीं खाता। सुबह से शाम तक खेत खार में खटने वाला ताजा गरम भोजन की व्यवस्था कैसे कर सकता है, इसलिए उसने पानी जीवन पद्धति के अनुरूप वैकल्पिक व्यवस्था कर ली। बोर बासी और बासी ऐसी ही वैकल्पिक व्यवस्था है। सैद्धांतिक रूप से बासी अन्न को निषिद्ध माना गया है परन्तु वह सिद्धांत बोरे बासी और बासी पर लागू नहीं होता। भात को गरम ही खाना चाहिए। ठण्डा हो जाने पर उसका स्वाद और पौष्टिकता दोनों हीन हो जाते हैं क्योंकि उसका जलीय अंश सूख जाता है। यदि भात ठण्डा होने लगे उस समय उसमें पर्याप्त जल डाल दिया जाए तो सजा विशिष्ट स्वाद और पौष्टिकता का निर्माण होता है। इसे बोरे बासी कहा जाता है। इसमें नमक, प्याज डालकर अचार, चटनी या सब्जी के साथ खाने पर अत्यधिक स्वादिष्ट होता है तथा इसकी पौष्टिकता भी बनी रहती है। इसमें दही या मट्ठा डालकर खाने से और भी अधिक स्वादिष्ट हो जाता है।
भात को जल में डुबाने पर वह बोरे बासी बनता है और छः घंटे से अधिक बीत जाने पर इसे ही बासी कहा जाता है। बासी में चावल के fermentation होने के कारण खमीर उठता है, उसमें कुछ खट्टापन आ जाता है।यह अधिक सुपाच्य और ऊर्जादायक बन जाता है।इसीलिए छत्तीसगढ़ में बासी खाने को प्राथमिकता दी जाती है।
बोरे बासी या बासी खाने से प्यास कम लगती है। इससे सिद्ध होता है कि बासी पुनर्जलीकरण का उत्तम साधन है। लू में गोंदली (प्याज ) की उपयोगिता से सभी परिचित हैं। हमने देखा है कि बासी खाने वाले श्रमिक की कार्यक्षमता अधिक होती है।
अनुभव सिद्ध सत्य है कि *बासी सड़ा हुआ भोजन नहीं,अतिउत्तम खाद्य प्रसंस्करण है।*
-डॉ सुरेन्द्र यदु