सुरता//
देवारी अउ जिमीकांदा के साग...
वइसे तो हमर छत्तीसगढ़ म जिमीकांदा के साग खाए बर बारों महीना मिल जाथे, फेर देवरिहा सुरहुत्ती के बिहान दिन, जे दिन गरुवा मनला खिचरी खवाए जाथे वो दिन अवस करके खाए बर मिल जाथे. ए परंपरा लगभग सबो घर देखे बर मिल जाथे. हमन मैदानी भाग म एला अन्नकूट के रूप म 'नवा खाई' घलो कहिथन.
घर के सियान ए दिन चुरे जिमीकांदा (मखना अउ कोचई मिले) के साग अउ खिचरी ल घर के देवता म चढ़ाए के बाद गरुवा मनला खवाथे, तहाँ ले खुद घलो खाथे. लइका राहन त हमर बबा हमू मनला खाए बर देवय. पहिली तो छिनमिनावन. काला-काला खवाथे कहिके बिदके असन करन, तभो ले खाएच बर लागय, काबर ते ए दिन घर के जम्मो सदस्य खातिर जिमीकांदा के साग चुरे राहय. संग म दूसर साग घलो चुरे राहय, फेर जिमीकांदा ल खाना अनिवार्य राहय.
आज जब बड़े बाढ़ेन अउ जिमीकांदा के आयुर्वेदिक महत्व ल जानेन त लागथे, के हमर पुरखा मन कतेक वैज्ञानिक सोच के रिहिन हें, जेन विविध परंपरा के नाम म कतेक महत्वपूर्ण जिनिस मनला हमर स्वास्थ्य खातिर जोड़ दिए रिहिन हें.
आज वैज्ञानिक शोध के माध्यम ले जानकारी पाएन, के जिमीकांदा म फास्फोरस के गजबे मात्रा पाए जाथे. सिरिफ ए देवारी के दिन ही एके पइत जिमीकांदा खा लेइन त हमर शरीर म कई महीना तक फास्फोरस के कमी नइ होही. ए ह बवासीर ले लेके कैंसर जइसन कतकों जबर रोग के बचाके राखथे. एमा फाइबर, विटामिन सी, विटामिन बी 1 अउ फोलिक एसिड होथे. संगे-संग पोटैशियम, आयरन, मैग्नीशियम अउ कैल्शियम घलो पाए जाथे.
संगी हो आजकल बजार म हाइब्रिड वाले जिमीकांदा घलो देखे बर मिलथे, फेर एमा आयुर्वेदिक तत्व के थोर कमी होथे. अच्छा हे, के देशी किसम के ही जिमीकांदा के उपयोग करे जाय.
हमर छत्तीसगढ़ म तो वइसे घरों घर जिमीकांदा बोए अउ खाए जाथे. एकर कनसइया (पोंगा) के घलो कतकों झन साग रांध के खाथें. कतकों झन एकर ले बरी घलो बनाथें, जे ह 'लेड़गा बरी' के रूप म जगप्रसिद्ध हे. ए सबो ल खाना चाही. कभू-कभार मुंह खजवाए असन लागथे, फेर एकर ले डर्राना घबराना या छिनमिनाना नइ चाही.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Wednesday, 19 October 2022
देवारी अउ जिमीकांदा के साग..
Tuesday, 4 October 2022
मानकीकरण के रद्दा म छत्तीसगढ़ी
मानकीकरण के रद्दा म छत्तीसगढ़ी..
छत्तीसगढ़ी भाखा म साहित्य सिरजन तो सैकड़ों बछर ले होवत हे. आज हमर आगू म लोकसाहित्य मनके अथाह खजाना दिखथे, तेन ह वोकरे परसादे आय. फेर ए भाखा ल एकरूपता दिए खातिर उदिम थोर कमतिच दिखथे. एकरे सेती लोगन अपन-अपन सोच अउ उच्चारण के मुताबिक लिखत अउ बउरत रेहे हें, अभी घलो वइसने च बउरत हें.
छत्तीसगढ़ी व्याकरण खातिर उदिम तो काव्योपाध्याय हीरालाल जी के सन् 1885 म लिखे 'छत्तीसगढ़ी बोली का व्याकरण' किताब ले देखे बर मिलत हे. एकर पाछू अउ कतकों विद्वान मनके घलो किताब आइस, फेर सर्वस्वीकारिता कोनो ल नइ मिलिस. सन् 2000 म अलग छत्तीसगढ़ राज के गठन के बाद ए बुता म अउ जादा गति देखे बर मिलिस. खास करके 'छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग' के गठन के बाद एक भरोसा जागिस के सरकारी मंच के माध्यम ले जेन निर्णय लिए जाही, तेला सबो एक सुर म मानहीं, अउ वोकरे मुताबिक छत्तीसगढ़ी के लेखन करहीं.
राजभाषा आयोग के पहला अध्यक्ष श्यामलाल चतुर्वेदी जी संग ए संबंध म गोठ करे गिस, त उन कहिन- 'मोला लागथे, के अभी हमन ल मानकीकरण ले जादा साहित्य के लेखन डहार जादा जोर देना चाही. जादा ले जादा साहित्य लोगन के आगू म आही. सब एक-दूसर के रचना ल पढ़हीं. वोमा के अच्छा-अच्छा शब्द मनला बउरत जाहीं, तहाँ ले अपने-अपन मानकीकरण हो जाही.
राजभाषा आयोग के दूसरा अध्यक्ष दानेश्वर शर्मा जी संग घलो ए विषय म गोठ करेन, त उन हाँ एकर ऊपर तो ठोस बुता होना चाही, कहिन अउ सिरतोन म ए रद्दा म पाॅंव घलो राखिन. एक दिन पूरा प्रदेश भर के पोठहा साहित्यकार भाषाविद मनला सकेल के आयोग के ही हाल म एकर ऊपर चर्चा करवाइन. ए चर्चा म सबो विद्वान मन डहार ले एक बात ऊभर के आइस, के देवनागरी लिपि के जम्मो 52 वर्ण ल छत्तीसगढ़ी लेखन म बउरे जाना चाही, छत्तीसगढ़ी के लेखन म कहूँ दूसर भाखा के शब्द ल बउरथन त वोला जस के तस लेना चाही. वोमा कोनो किसम के टोर-फोर नइ करना चाही.अब शिक्षा के अंजोर के संग लोगन आने भाखा ले आने वाला शब्द मनके उच्चारण शुद्ध रूप म करथें, त लेखन म घलो शुद्ध रूप के ही उपयोग करना चाही.
ए बइठका के पाछू एक अउ बइठका कर के वोमा मानकीकरण खातिर अंतिम निर्णय लेबोन कहे गिस, फेर दूसरइया बइठका के आरो शर्मा जी के कार्यकाल के सिरावत ले नइ मिलिस.
हाँ, दानेश्वर शर्मा जी के कार्यकाल म राजभाषा आयोग डहार ले सलाना जलसा के बेरा एक स्मारिका छपवाए के उदिम घलो करे गिस. ए स्मारिका खातिर चार झन साहित्यकार मनके संपादक मंडल बनाए गिस, जेमा- डाॅ. परदेशी राम वर्मा, जागेश्वर प्रसाद, रामेश्वर शर्मा अउ सुशील भोले ल संघारे गिस. वइसे तो संपादक मंडल म चार सदस्य रेहेन, फेर एकर जम्मो पोठहा बुता ल मोर जगा करवाए गे रिहिसे, तब मैं आयोग के अध्यक्ष, सचिव, जम्मो सदस्य अउ संपादक मंडल के सदस्य मनले स्मारिका के भाखा ल मानकीकरण के अन्तर्गत रखे जाय का? कहिके पूछे रेहेंव, तब कहे गे रिहिसे- जब तक मानकीकरण के बुता ह सर्वसम्मति ले पूरा नइ हो जाय, तब तक लोगन जइसे लिख के दिए हें, वइसने छापे जाय कहे गे रिहिसे.
मानकीकरण ले रद्दा म राजभाषा आयोग के तीसरा अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार पाठक जी के कार्यकाल म पोठहा बुता होइस. 22 जुलाई 2018 के दिन बिलासपुर म डाॅ. विनोद कुमार वर्मा जी के संयोजन म आयोजित राज्यस्तरीय संगोष्ठी म सर्वसम्मति ले प्रस्ताव पारित करे गिस- "छत्तीसगढ़ के राज्यपाल द्वारा 11 जुलाई 2018 के अधिसूचित राजभाषा (संशोधन) अधिनियम 2007 (धारा 2) के संशोधन के अनुरूप छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण बर देवनागरी लिपि (वोकर 52 वर्ण मन) ल यथा-रूप अंगीकृत करे जाही, जेला केन्द्र शासन ह हिन्दी भाषा खातिर अंगीकृत करे हे.
ए राज्यस्तरीय संगोष्ठी म छत्तीसगढ़ के जम्मो ठोसहा साहित्यकार अउ भाषाविद मन संघरे रिहिन हें. ए पूरा कार्यक्रम के लेखाजोखा राजभाषा आयोग के कार्यवाही रजिस्टर म लिखाय हे, तभो ले आज खुद राजभाषा आयोग अउ वोकर ले जुड़े लोगन काबर वोकर पालन या अनुसरण नइ करत हें? ए ह ताज्जुब के बात आय. काबर आज अध्यक्षविहिन आयोग के सचिव ह छत्तीसगढ़ी के व्याकरण अउ मानकीकरण खातिर एक-दू पइत अउ बइठका कर डारे हे. अभी राजभाषा आयोग द्वारा साहित्यकार मनला दिए जाने वाला प्रशस्ति पत्र म घलो 'जुन्ना ढर्रा' ल लिखाय शब्द मनके दर्शन होवत हे. तेन ह एकर सोर देवत हे. जबकि राजभाषा आयोग के 2018 के संगोष्ठी म पारित प्रस्ताव के मुताबिक वोकर जम्मो कारज होवत रहना रिहिस.
मन म एक बात इहू उठथे- का सत्ता म आए बदलाव के संग पहिली के सरकार के बेरा म पारित प्रस्ताव घलो बदलगे या वोला राजनीतिक प्रस्ताव जइसन कचरा के संदूक म झपा दिए गिस? जबकि होना तो ए रिहिस, के वो प्रस्ताव ल शासन प्रशासन के संगे-संग जतका भी ठीहा म छत्तीसगढ़ी भाखा ल कोनो न कोनो रूप म बउरे जावत हे, सबो म लागू करवाय के उदिम करे जाना रिहिसे. भरोसा हे, जिम्मेदार लोगन के ए मुड़ा म चेत जाही.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
भूमिका.. चार डांड़.. बिहनिया के जोहार
भूमिका//
"बिहनिया के जोहार"
( सुशील भोले के चार " डांड़")
समसामयिक जिनगी के चित्र/फोटो ल " चार डांड़" (पंक्ति) म लिख के उजागर कर देना, सुशील भोले के खासियत अउ साहित्य म नवा प्रयोग बनगे। आज सोशल मिडिया के मोबाइल संस्कृति म ये कमाल के बात ये होगे कि हमर गोठ बात, बिन कागज म लिखे, लोगन तक पहुंचत हे। बिहनिया बेरा म "जोहार","जय जोहार"," सुप्रभात", अंग्रेजी म "गुडमॉर्निंग"--हमर
तक पहुंच जथे। तहां ले मन "हरियर"जो जथे,
"गदगद" हो जथे। "चार डांड़ " के कवित्त म हम चित्र के इतिहास, सामयिक जिनगी,
संस्कृति, खेती बाड़ी, तीज-तिहार, जिनगी के संघर्ष, सुख-दुख, मय-मितान, मरनी-हरनी, धरम-करम, प्रेम-वियोग, सिंगार, नता-गोता, व्यवहार,
श्रद्धा, अंधविश्वास--- सबके कहिनी जान डरथन! ये सब "चार डांड़" के कवित्त म उतर जथे।
"जोहार","सुप्रभात"---कहत-कहत, सुशील भोले-- दार्शनिक बन जथे। पूरा जीवन दर्शन "चार डांड़ " म उंडेल देथे।
सुशील भोले ह पत्रकार घलो रहिस। उहि पत्रकारिता म ये चित्रमय कवित्त, अखबार के एक कोंटा म डारे के/छापे के--आदत बनगे रहिस। उहि आदत आजो ले बने हे। आज सुशील ह शरीर से अशक्त होगे हे, लकवा ग्रस्त होगे हे।फेर एक अंग हाथ अउ अंगरी ह चलथे--त सोशल मीडिया ह ओखर बर वरदान बनगे हे।मन चलथे, बुध चलथे, सपना देखई , अउ चिंतन चलथे। ये " चार डांड़'"-ओखर प्रमाण आय। जिनगी जिये के , समय बिताये के, एक सहारा बनगे सोशल मीडिया ह!सकारात्मक ऊर्जा से भरे सुशील के लेखनी सरलग चलथे।
छत्तीसगढ़िया मनखे के जीवनचर्या के विविध रूप सुशील के "चित्रमय चार डांड़" म उजागर होथे, ओखर उदाहरण देवथंव---
1--- मनखे अउ नीति के बात----
अ-- "सत के साधक, लुलुवा हो जाय, फेर रद्दा ले टरय नहीं।," (सच्चा साधक मनखे ह सत के रद्दा म चलथे)।
ब-- "सरी मंझनिया साथ देवइया केवल बिरला होथे,
रिश्ता नाता कहत भर के, भाई भतीजा बोचकथे,
तब बिन मुंह के अईसन साथी, रिश्ता के लाज बचाथे।(चित्र-बनिहारिन संग कुकुर ह लउठी धर के चलत हे)!
स--आज के लईका मन दाई ददा ल बंटवारा म बांट लेथें,
कोन काकर संग रइही, अपन हिस्सा म छांट लेथे
तब बज्जुर छाती करना परथे ये विपत ल सहे के।(माता पिता के बंटवारा)
द---- "हर उमर के जोश निराला, कभु खेलौना, कभु भाला,
मयारु बर चूरी फुंदरी, त मोक्ष बर मिरगा छाला,
जइसे-जइसे उमर बढ़थे, मन के लोभ घलो बदलथे,
इहि ल तो संगी गुनिक मन, जीवन के गति कहिथे!" (जीवन के गति अउ परिवर्तन)
क--- "बिन घिसाए लगय नहीं माथ म ककरो चंदन,
जो धरथे संघर्ष के रद्दा, होथे ओखर अभिनन्दन।" (संघर्ष के बात)
ख-- "बिना मंजाय कोनो गहना म चमक आ नई सकय"! (संघर्ष )
ग-- हीरा उगलत धरती छोड़ के , कोन देस तंय जाबे,
करबे चाकरी पर के, अउ बोझा लेबे डोहार",
(पलायन बर नीति के बात)
घ-- "आ संगी जोर खांध म खांध, रहिबों सब मिलजुर के,
आ एक ले एक ग्यारा हो जाइन, दिन बितहि मुसकुल के"! (एकता के सन्देश)
घ--- छत्तीसगढ़ म 36 नदियां, फेर 36 गति हो जाथे"! (पानी के अकाल, व्यवस्थित नहीं)
च--- "सबले ऊंचा पबरित हे आत्मज्ञान के ठउर, तब काबर भटकत हाबस तैं पोथी पतरा के रद्दा म।" (आत्मज्ञान)
छ-- "कोनो काम करे के पहिली। ,मन म थोरिक गन लेवव,
कोन कहात हे का-का, इहू बात ल गुनना चाही।
( मन की सीख-नीति के बात)
ज-- "सोन पांखी के फांफ़ा--मिरगा या बिखहर हो जीव,
सबके भीतर बनके रहिथे, एकेच आत्मा शिव,
तब कइसे कोनो छोटे बड़े, ऊंचहा या नीच,
सब ओकरे सन्तान हे संगी, जतक़ा जीव सजीव" (मनखे मनखे एक समान)!
सुशील भोले ह आदिधर्म, सनातन धर्म के रद्दा म चलथे। तभे मनखे मनखे एक समान के बात करथे ।
2--प्रकृति, ऋतु, पर्व, तिहार, खेती बाड़ी के चरचा कवित्त म चित्र सहित करथे। कोनो व्याख्या करे के जरूरत नई पड़य---
क- (ऋतु)-"माघ महिना आगे संगी लगगे आमा म मउर।"
(वर्षा) "नांगर म खेत जोतत नंगरिहा बर मया के बादर
झम ले आके रतो दिस हे धार, धरती दाई के गरभ ले अब अन्नपूर्णा दाई लेहि अवतार।"
ख-- (किसानी)- "चार महीना खूब कमाएन अभी माते हे मिंजाई,
अन्नपूर्णा बनके घर आये हे, हमर लक्ष्मी दाई,"
ग-- (किसानी) -"अकती आगे, घाम ठठागे, चलव जी मूठ धरबो,
हमर किसानी के शुरुवात सम्मत ले सब करबो।"
घ-- (तिहार)- "कतेक सुग्घर हावय हमर तीजा के तिहार,
गंजमंज--गंजमंज लागत हावय ददा के दुवार!"
च- -(शीत) -"गोरसी तापे के दिन आही, अब आवत हावय जाड़,
सुरुर सुरूर पुरवाही म होवत हावय नरमी के बाढ़!"
छ--(संक्रांति)---
"सुरुज नरायन के पांव लहुटगे, अब बेरा ल लहुटाही,
सुट ले बुलकत, घड़ी-पहर के चाल कदम अरझाही,
अब तिली गुड़ के लाडू सहीं सबके दिन बाद भाही,
संग सर-सर झुमरत-नाचत पुरवाही राग बसंती गाही।"
ज-- (मौसम)-- "नवा बहुरिया के रेंगना कस लागे मौसम के चाल"!
सुशील ह हर मौसम अउ पर्व के बात करथे चित्र बनाके।छेरछेरा, हरेली, कमरछठ के पसहर भात, अक्ति, तीजा-पोरा, भोजली, मितान, दशहरा, देवारी, होली!
झ-- नोनी जात के शिक्षा बहुत मूल्य रखथे।
रिक्शा चलावत बेटी के चित्र म लिखथे--
" घर परिवार के जतक़ा बुता जम्मो मोरेच हिस्सा,
कईसे भाग लिखथे विधाता ये तिरिया जनम के,
संउहे अनदेखी करथे हमर जांगर टोर करम के!"
नारी शिक्षा के महत्व बतावत, नीति के बात कहिथे--
"चल नोनी हो जा तियार, स्कूल जाबे हब ले, पढई लिखई ह मोर भरोसा, दाई बूता म जाथे तब ले,
पढ़बे लिखबे ,जिनगी गढ़बे, बढ़ के तैं तो सब ले,
हमर देश राज के नांव जगाबे, आदर्श गढ़बे खब ले!"
नदिया नरवा पार करके नोनी मन पढ़े बर जाथें
उहि चित्र म--
"नदिया नरवा कतको उफनय, नई परय कोनो फरक,"(आज बाधा लांघ के नोनी मन पढ़थें।)
ट---नारी के किसानी काम म घलो बाधा ल लांघथे---
"एक हाथ में हे नांगर अउ एक हाथ म तुतारी,
पीठ म बेटा ल बईठारे, नांगर जोतथे महतारी,
एकरे भरोसा। घर के संवागा, इहि बाहिर के रखवार,
एकरे भरोसा चूल्हा घलो सजथे, एकरेच भरोसा खार।"
सुशील ह नारी के हर क्षेत्र के संघर्ष के चित्रण करे हे।
ठ-- -आजकल "फ्रेंडशिप दिवस"के परम्परा चालू होगे हे, विदेशी तर्ज म।
सुशीलकहिथे---
"हम तो आरुग छत्तीसगढ़िया, एक पईत मनाथन,
गंगा बारु हो चाहे भोजली होय, कई जनम साथ निभाथन!"
अइसन विविध विषय म चित्र के संग " चार डांड़ " लिखत सोशल मीडिया म अब्बड़ लोकप्रिय होगे हे।बिहनिया संगी साथी मन बाट जोहत रहिथे।
मोर अन्तस्तल ले ,सुशील के तन अउ मन के स्वास्थ्य बर शुभकामना अउ असीस।ओखर कलम चलत राहय, बुध जागत रहय, मन आनन्दित राहय।। सरस्वती कृपा बनाय राहय।
सोशल मीडिया के माध्यम ले सुशील के चित्रमय "चार डांड़"" बिहनिया के जोहार" सबके हाथ म पहुंच जाय। सब आनन्द म भरके पढंय अउ गुंनय।
लेखनी चलत राहय,- ---असीस !
-डॉ, सत्यभामा आडिल
दशहरा (दंसहरा) 5--9--2022
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Sunday, 18 September 2022
1 अक्टूबर सियान जोहार दिवस
1 अक्टूबर : सियान मनला जोहार पैलगी कर आशीष पाए के दिन..
वइसे तो सियान मन के जोहार पैलगी रोजेच करना चाही, फेर उंकर मन खातिर हमर मन म लुकाय श्रद्धा अउ सम्मान के भाव ल व्यक्त करे खातिर, उंकर मन खातिर हमर चिंता फिकर अउ कर्तव्य ल उजागर करे खातिर घलो एक दिन निश्चित करे गे हवय, अउ वो तिथि आय 1 अक्टूबर के दिन, जेला अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिन या अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस कहिथन. हमर मयारुक भाखा म कहिन त 'सियान जोहार दिवस'.
अंतर्राष्ट्रीय सियान दिवस मनाए के शुरुआत सन् 1990 म होए हे. दुनिया के सियान मन संग होवइया दुर्व्यवहार अउ अन्याय ल रोके खातिर लोगन ल एकर खातिर जागरूक करे खातिर 14 दिसंबर 1990 के ए फैसला करे गिस. तब ए फैसला लिए गिस, हर बछर 1 अक्टूबर ल अंतर्राष्ट्रीय सियान दिवस के रूप म मनाए जाही. 1 अक्टूबर 1991 के पहिली बेर सियान दिवस मनाए गिस, जेन अब सरलग हर बछर मनाए जावत हे.
एकर पहिली घलो सियान मन खातिर चिंता जतावत उंकर मन खातिर अइसन उदिम करे गे रिहिसे. सन् 1982 म विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 'वृद्धावस्था ल सुखी बनावव' नारा देके 'सबो खातिर स्वास्थ्य' अभियान चलाए गे रिहिसे. एकर बाद संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1991 म अंतर्राष्ट्रीय सियान दिवस के शुरुआत करे के पाछू 1999 ल 'अंतर्राष्ट्रीय सियान बछर' के रूप म मनाए गे रिहिसे.
ए दिन ल चुकता सियान मन खातिर समर्पित करे गे हवय. उंकर मन खातिर वृद्धाश्रम जइसन जगा मन म घलो कतकों किसम के आयोजन करके उंकर सम्मान अउ खुशी के बने चेत करे जाथे. खास करके उंकर मन खातिर सुविधा अउ उंकर समस्या ऊपर विचार करे जाथे. उंकर मनके स्वास्थ्य खातिर गजबेच चेत करे जाथे.
सियान मन हमर मन बर साक्षात देवता स्वरूप होथें. उंकर अनुभव के खजाना हमर मन बर सिरिफ एक किताब नहीं, भलुक पूरा के पूरा पुस्तकालय होथे. उंकर मनके आशीर्वाद ले हमर मन के पालन पोषण अउ बढ़ोत्तरी होय रहिथे. तब तो उंकर मन खातिर सम्मान अउ मया होना स्वाभाविक होथे. फेर एकरो ले जादा महत्वपूर्ण होथे, वो अवस्था म उंकर मन संग रहना, जब उन अक्षम अउ असहाय होथें. आज लकर-धकर के बेरा म अइसन सरलग रह पाना संभव नइए, तभो अइसन एक दिन ल तो उनला पूरा के पूरा समर्पित करना च चाही. काबर ते उनला ए उमर म तुंहर मया दुलार के छोड़ अउ तो कुछु च नइ चाही.
त आवव, हम अपन सियान मन के सम्मान करन, उनला मया देवन अउ उंकर ले आशीष के खजाना पावन.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Tuesday, 13 September 2022
सुशील यदु सुरता.. भुइया बनाइस
23 सितम्बर पुण्यतिथि म सुरता//
छत्तीसगढ़ी झंडा ल अगास म लहराए खातिर भुइॅंया बनाइस सुशील यदु
छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास म जब कभू एकर खातिर संगठन के माध्यम ले जमीनी बुता करइया मन के नाॅंव लिखे जाही त सुशील यदु के नाॅंव ल वोमा सबले आगू लिखे जाही. सन् 1981 म 'छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति' के गठन करे के बाद वोहा जिनगी के आखिरी साँस तक एकर खातिर जबर बुता करीस. आज हमन छत्तीसगढ़ी भाखा-साहित्य के अतका विस्तारित रूप देखथन, लोगन के जुराव देखथन त वोमा ए समिति अउ सुशील यदु के अपन संगी मन संग मिलके करे गे जबर मैदानी बुता के पोठ हाथ हे.
ए समिति के गठन के पहिली घलो पुरखा साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी खातिर कारज करत रेहे हें, फेर वोहा लेखन, प्रकाशन अउ मंच के माध्यम ले जनमानस म छत्तीसगढ़ी खातिर मया उपजाए के बुता रिहिसे. समिति के माध्यम ले आरुग भाखा-साहित्य खातिर रचनात्मक संगठित बुता 'छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति' ले ही चालू होय हे. एकर पाछू इहाँ छत्तीसगढ़ी सेवक के संपादक जागेश्वर प्रसाद जी के संयोजन म 'छत्तीसगढ़ी भासा-साहित्य प्रचार समिति' घलो बनिस. ए ह संयोग आय, मोला ए दूनों समिति संग जुड़े के साथ ही सचिव बनाए गे रिहिसे. ए दूनों समिति के गोष्ठी-बइठका अलग-अलग होवत राहय. छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के गोष्ठी आदि जिहां पुरानी बस्ती के देवबती सोनकर धरमशाला म जादा करके होवय, त छत्तीसगढ़ी भासा-साहित्य प्रचार समिति के गोष्ठी आदि 'छत्तीसगढ़ी सेवक' के कार्यालय म ही जादा होवय. छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के कार्यक्रम आरुग भाखा-साहित्य ऊपर आधारित रचनात्मक किसम के राहय त प्रचार समिति के बेनर म कतकों पइत छत्तीसगढ़ी ल आठवीं अनुसूची म संघारे के संगे-संग अउ अइसने विषय मनला लेके धरना प्रदर्शन के घलो आयोजन हो जावत रिहिसे.
महतारी पूना बाई अउ सियान खोरबाहरा राम यदु जी के घर 10 जनवरी 1956 के जनमे सुशील यदु के आमतौर म चिन्हारी 'छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति' के संस्थापक अध्यक्ष के रूप म ही जादा होथे. फेर वो कवि मंच के हास्य कवि के रूप म घलो अपन एक अलगेच चिन्हारी बना लिए रिहिसे. घोलघोला बिना मंगलू नइ नाचय रे, अल्ला अल्ला हरे हरे, होतेंव महूं कहूं कुकुर, नाम बड़े दरसन छोटे आदि मन तो उंकर मनपसंद कविता रिहिसे. संग म गंभीर रचना कौरव पांडव के परीक्षा अउ सुराजी बीर मन ऊपर लिखे कालजयी रचना मन घलो मंच म जबरदस्त ताली बटोरय.
उंकर लिखे कुछ गीत मन तो गजबे च लोकप्रिय घलो होए रिहिसे. 'चंदैनी गोंदा' के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के सुझाए विषय ऊपर लिखे एक गीत तो मोला आज तक गजब निक लागथे-
जिनगी पहार होगे रे
सोचे रेहेन फूल होही,
खांड़ा के धार होगे रे...
रेती महल बनगे आज बिसवास ह
बेली बंधागे हे कतकों के आस ह
पीरा ह सार होगे रे
जिनगी पहार होगे रे...
अइसने एक अउ गीत हे, जेकर नॉंव ले उंकर गीत अउ कविता के समिलहा संग्रह छपे हे-
फूल हांसन लागे रे दारि, बगिया झूमरगे
बगिया मा जब चले आये सजनी मोर, मन के मिलौनी मोरे
हरियर आमा रे घन मउरे...
तोरे पिरित के रंग मा अइसन रंगे हंव
सपना के सुरता दिन में आथे सजन मोरे
हाय रे बलम मोरे, हरियर आमा घन मउरे...
सुशील यदु के आकाशवाणी अउ दूरदर्शन ले घलो बेरा-बेरा म कविता परिचर्चा आदि के प्रसारण होवत राहय. उहें वोमन प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र 'नवभारत' म 'लोकरंग' शीर्षक ले सरलग 1993 ले 2002 तक कालम घलो लिखिन. एमा कलाकार अउ साहित्यकार मनके परिचय घलो देके काम करिन. ए बात तो सच आय, हमर इहाँ कतकों अइसन प्रतिभा हें जिनला मिडिया के मंच नइ मिल पाए के सेती लोगन के नजर ले अनजान असन रहे बर पर जाथे. आज के सोशलमीडिया के जमाना म घलो अइसन देखे बर मिल जाथे, त गुनव वो बखत जब मिडिया के अंजोर भारी दुर्लभ रिहिसे, वो बेरा अइसन मंच देना कतेक बड़े बुता रिहिसे.
सुशील यदु के गीत मन आडियो, विडियो के संगे-संग फिलिम म घलो गाये अउ संघारे गिस. सुशील यदु ह अपन लेखन के रद्दा म आए खातिर अपन महतारी पूना देवी ल प्रारंभिक प्रेरणा बतावय, जबकि गुरु उन बद्रीविशाल यदु 'परमानंद' ल मानय. हमन संग म ही परमानंद जी संग जुड़े रेहेन. पुरखा साहित्यकार हरि ठाकुर जी के उन अपन आप ल सेनापति समझय, तेकरे सेती उंकर अगुवाई म वो बखत चलत छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन के रद्दा म घलो रेंगय.
छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के माध्यम ले कतकों अइसन साहित्यकार मनला प्रकाशन के मंच घलो दिए गिस, जेमन किताब छपवाए के स्थिति म नइ रिहिन. मोला हमर गाँव नगरगांव के सूरदास कवि रंगू प्रसाद नामदेव जी के जबर सुरता हे. रंगू प्रसाद जी कुंडलियाँ के सिद्धहस्त कवि रिहिन हें, फेर उन खुद होके किताब छपवाए के स्थिति म नइ रिहिन, अइसन म छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति ह उंकर किताब 'हपट परे तो हर गंगे' छपवाए रिहिसे. अइसने हेमनाथ यदु के व्यक्तित्व अउ कृतित्व, बनफुलवा, पिंवरी लिखे तोर भाग, बगरे मोती, सतनाम के बिरवा आदि आदि अलग अलग रचनाकार मनके रचना ल छपवाए गे रिहिसे.
सुशील यदु के अपन खुद के लिखे पांच कृति घलो छपे हे- 1.छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर, 2. लोकरंग भाग-1, 3. लोकरंग भाग-2, 4. घोलघोला बिना मंगलू नइ नाचय, 5. हरियर आमा घन मउरे.
छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के माध्यम ले पुरखा साहित्यकार, कलाकार आदि मनके सुरता घलो करे जावय. समिति के सालाना जलसा म तो उंकर मनके नाम ले सम्मान घलो दिए जावत रिहिसे, फेर उंकर मनके जनम या पुण्यतिथि के बेरा म या वोकर संबंधित महीना म अलग से गोष्ठी आदि के आयोजन करे जावत रिहिसे.
पुरखा मनके सुरता करत-करत सुशील यदु घलो 23 सितम्बर 2017 के रतिहा करीब 9.30 बजे सुरता के संसार म समागे. आज उंकर बिदागरी तिथि म उंकरेच ए गीत संग उंकर सुरता-जोहार-
मोर दियना के बाती बरत रहिबे ना
चारों खूंट ला अंजोरी करत रहिबे ना...
पीरा हीरा के बाती बनायेंव
मया के आंसू के तेल भरायेंव
तन के पछीना के लेयेंव अचमन
मन अउ काया के फूल चघायेंव
दुखिया के पीरा हरत रहिबे ना
मोर दियना के बाती बरत रहिबे ना...
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Saturday, 3 September 2022
दानेश्वर शर्मा पहला छत्तीसगढ़ी कवि रिकार्ड होवइया
3 फरवरी पुण्यतिथि म सुरता//
नामी ग्रामोफोन अउ कैसेट कंपनी म रिकार्ड होवइया पहला छत्तीसगढ़ी कवि दानेश्वर शर्मा
हमन जब कभू छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत के जागरण अउ गौरवशाली रूप के बात करथन त वोकर शुरुआत 'चंदैनी गोंदा' ले ही करथन. फेर चंदैनी गोंदा के जनम होय के पहिली घलो सन् 1965 म ही दानेश्वर शर्मा जी के रचना मन के रिकार्डिंग देश के नामी ग्रामोफोन कंपनी 'हिज़ मास्टर्स वायस' ले मंजुला दासगुप्ता जी के आवाज म रिकार्ड होके आगे रिहिसे, अउ वोमा रिकार्ड होए चारों गीत- 1. कइसे के बेटी मैं तोला वो भेजंव.. 2. चल मोर जॅंवारा मड़ई देखे जाबो.. 3. मइके ल देखे होगे साल गा, भइया तुमन निच्चट बिसार देव.. 4. तपत कुरु भई तपत कुरु, बोल रे मिट्ठू तपत कुरु. ग्रामोफोन के संगे-संग आकाशवाणी के माध्यम ले चारों धूम मचावत रिहिसे.
दानेश्वर शर्मा जी के जनम दुरुग जिला के गाँव मेड़ेसरा म सियान गंगा प्रसाद जी द्विवेदी अउ महतारी इंदिरा देवी जी के घर सन् 1931 के सितम्बर महीना म अनंत चौदस के दिन होए रिहिसे. फेर स्कूल म भर्ती करवाए खातिर उंकर जनमदिन तिथि ल 10 माई 1931 लिखवा दिए गइस, जेहा आज सरकारी रिकार्ड म चारों मुड़ा चलत हे.
दानेश्वर शर्मा जी जतका सुग्घर रचनाकार रिहिन हें, वतकेच सुग्घर वक्ता अउ कवि मंच के संचालक घलो रिहिन हें. मोर सौभाग्य आय, सन् 1988 के दिसम्बर महीना म रायपुर के रामदयाल तिवारी स्कूल म होय छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य प्रचार समिति के प्रदेश स्तरीय सम्मेलन म उंकर संचालन म होय कवि सम्मेलन म मोला पहिली बेर कविता पाठ करे के अवसर मिले रिहिसे. बाद म तो कतकों मंच अउ कार्यक्रम म संघरे के अवसर मिलत राहय. दानेश्वर शर्मा जी जब 'छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग' के अध्यक्ष पद म बिराजिन तब विशेष रूप ले उंकर संगति मिलिस. उंकर कार्यकाल म छपे आयोग के वार्षिक स्मारिका म संपादक मंडल के सदस्य के रूप म काम करे के अवसर घलो मिलिस. शर्मा जी के ए अध्यक्षीय कार्यकाल ल एक सफल कार्यकाल के रूप म सदा दिन सुरता करे जाही.
दानेश्वर शर्मा जी के रचना मनला इहाँ के कतकों गायक गायिका मन अपन स्वर देके इहाँ के संगीत जगत म जिहां अपन अलगे चिन्हारी बनाइन, उहें उंकर रचना मन देश के नामी पत्र-पत्रिका- अखण्ड ज्योति, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नागपुर टाइम्स (अंगरेजी) ले लेके स्थानीय कतकों पत्रिका मन म छपे के संगे-संग आकाशवाणी के नागपुर, रायपुर, भोपाल, इंदौर, रीवां, छतरपुर अउ इलाहाबाद आदि केन्द्र ले प्रसारित होवत राहय. वोमन हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के संगे-संग अंगरेजी अउ संस्कृत म घलो लिखॅंय. दैनिक भास्कर अउ नवभारत म 'लोक दर्शन' के नाम ले कालम घलो लिखिन.
उंकर छपे किताब मनके सूची घलो बड़का हे- छत्तीसगढ़ के लोक गीत (सन् 1962), हर मौसम में छंद लिखूंगा (हिन्दी गीत संग्रह 1993), लव कुश (खण्ड काव्य 2001), लोक-दर्शन (सनातन, इस्लाम, जैन, बौद्ध, मसीही, सिख आदि दर्शन व पर्व मन ऊपर निबंध संग्रह 2003), तपत कुरु भई तपत कुरु (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह 2006), गीत अगीत (हिन्दी काव्य संग्रह 2007) आदि हे.
देश के कतकों काव्य संग्रह मन के संगे-संग रविशंकर विश्वविद्यालय के एम. ए. (हिन्दी) के लोक साहित्य विषय खातिर घलो उंकर रचना संग्रहित रहिस.
दानेश्वर शर्मा जी के चर्चा शिकागो विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'रिवोलुशनिज्म इन छत्तीसगढ़ी पोएट्री' म प्रोफेसर डाॅ. नरेंद्र देव वर्मा द्वारा लिखे लेख के माध्यम ले घलो होए हे. वोमन विश्व प्रसिद्ध संस्था 'फोर्ड फाउंडेशन' द्वारा भारत म विकास खातिर सरकारी अउ गैर सरकारी संगठन मनके 11 पुस्तक मनके संपादकीय सलाहकार रहे हें.
भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा हर बछर होवइया 'लोककला महोत्सव' के वोमन संस्थापक-संयोजक रहे हें, जिहां ले पंथी नर्तक देवदास बंजारे, पंडवानी गायिका पद्मभूषण तीजन बाई, रितु वर्मा जइसन अंतर्राष्ट्रीय कलाकार मन छत्तीसगढ़ी के डंका बजाइन. हमर मनके सौभाग्य आय, हमू मनला वरिष्ठ साहित्यकार टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जी के नाटक 'गंवइहा' ल ए प्रतिष्ठित मंच म प्रस्तुत करे के अवसर मिले रिहिसे.
जिनगी के संझौती बेरा म दानेश्वर शर्मा जी श्रीमद भागवत महापुराण अउ देवी पुराण के बढ़िया प्रवचनकार के रूप म घलो जाने जावत रिहिन हें. उनला 2006 म राष्टपति द्वारा साहित्य सम्मान के संगे-संग अउ कतकों संस्था मनके डहार ले सम्मान मिले रिहिसे.
3 फरवरी 2022 के रतिहा 8.10 बजे 91 बछर के उमर म दानेश्वर शर्मा जी ए नश्वर दुनिया ले बिरादरी लेके परमधाम के रद्दा धर लेइन. आज बिरादरी तिथि म उंकर सुरता ल पैलगी जोहार करत उंकर एक रचना-
डोंगरी सहीं अंटियावव तुम, नंदिया जस लहराव
ये जिनगी ल जीए खातिर, फूल सहीं मुस्कावव
निरमल झरना झरथय झरझर परवत अउ बन मा
रिगबिग बोथय गोंदाबारी कातिक अघ्घन मा
दियना सहीं बरव झमाझम, कुवाॅं सहीं गहिरावव
ये जिनगी ल जीए खातिर फूल सहीं मुस्कावव
तन के धरम हे मन भर करना बूता पर हित मा
हिरदे ला जलरंग करव तुम मया के अमरित मा
बिजली सहीं चमकव चमचम बादर जस घहरावव
ये जिनगी ल जीए खातिर फूल सहीं मुस्कावव
काॅंटा खूॅंटी तो रद्दा मा दस ठन आही गा
लेकिन रेंगत पाॅंव के छइहाॅं धर नइ पाहीं गा
बघवा सहीं रुतबा राखव, हिरना जस मेछरावव
ये जिनगी ल जीए खातिर फूल सहीं मुस्कावव
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811