Thursday, 31 October 2013

आइये संकल्प लें...


आज छत्तीसगढ़ राज्य का 13 वां स्थापना दिवस है। इस अवसर पर आइये हम सब संकल्प लें कि हमारे पुरखों ने जिन उद्देश्यों को लेकर अलग राज्य का स्वप्न देखा था, उसे साकार करेंगे। यहां का शासन-प्रशासन, भाषा-संस्कृति और संपूर्ण अस्मिता की रखवाली का काम मूल निवासियों के हाथों में सौंपेंगे। जिन षडयंत्रकारी हाथों से मुक्ति के लिए अलग राज्य का आन्दोलन चला, उन हाथों से इसे मुक्त करा कर शोषण, दोहन, छल-कपट और अराजकता की स्थिति से इसे मुक्त करायेंगे। हर प्रकार के दमनकारी दृश्यों को परिवर्तित कर इसे सच्चे अर्थों में खुशहाल और समृद्ध बनायेंगे।
जय छत्तीसगढ़... जय भारत....  

Wednesday, 30 October 2013

धर मशाल ल तैं ह संगी...

धर मशाल ल तैं ह संगी, जब तक रतिहा बांचे हे
पांव संभाल के रेंगबे बइहा, जब तक रतिहा बांचे हे....

अरे मंदिर-मस्जिद कहूं नवाले, माथा ल तैं ह संगी
फेर पीरा तोर कम नइ होवय, जब तक रतिहा बांचे हे....

देश मिलगे राज बनगे, फेर सुराज अभी बांचे हे
जन-जन जब तक जबर नइ होही, तब तक रतिहा बांचे हे...

अबड़ बड़ाई सब गाये हें, सोसक ल सरकार कहे हें
हम तो सच ल कहिबो संगी, जब तक रतिहा बांचे हे...

नवा किरण तो लटपट आथे, तभो उदिम करना परही
चलौ यज्ञ कराबो आजादी के, जब तक रतिहा बांचे हे....

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com
http://www.youtube.com/watch?v=cYpgnQzgm80&feature=youtu.be

Tuesday, 29 October 2013

रौशनी बांटने का पर्व *सुरहुत्ती*


छत्तीसगढ़ में कार्तिक अमावस्या को मनाया जाने वाला पर्व *सुरहुत्ती* और *गौरा-गौरी* का विवाह ही मुख्य है, लेकिन अब इनके साथ *लक्ष्मी पूजन* को भी शामिल कर लिया गया है।
लक्ष्मी पूजन और गौरा-गौरी के विवाह पर्व को प्राय: हम सभी जानते हैं। इसलिए आज थोड़ी सी चर्चा सुरहुत्ती के संबंध में।
सुरहुत्ती छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति है। कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्यास्त के पश्चात यह दीपदान या कहें रौशनी बांटने का पर्व प्रारंभ हो जाता है। लोग अपने-अपने घरों में, खेत-खलिहानों में, कुआं-बावली जैसे जीवनदायिनी जलस्रोतों पर, रोजी-रोजगार के अन्य साधनों के पास दीपक से रौशनी करते हैं। और इन सबसे बड़ी बात यह कि जितने भी अपने ईष्ट-मित्र और पड़ोसी होते हैं, उन सबके यहां भी दीपक लेकर जाते हैं और उनके घरों के तुलसी-चौरा या घर के अन्य प्रमुख स्थल पर दीपक रख कर प्रकाश फैलाते हैं।
मुझे लगता है कि रौशनी के आदान-प्रदान का ऐसा पर्व शायद ही दुनिया के किसी अन्य भागों में होता हो, जिसमें अपने ईष्ट-मित्रों या पड़ोसियों के घर जाकर रौशनी बांटी जाती हो।
इस दिन जिस दीपक का इस्तेमाल होता है, वह नई फसल से प्राप्त चावल के आटे का होता है। आजकल लोग नये चावल के आटे उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण मिट्टी के दिये का भी इस्तेमाल कर लेते हैं।
मित्रों, आप सभी के जीवन में *सुरहुत्ती* की रौशनी फैले इन्हीं शुभकामनाओं के साथ... ऐसी गौरवशाली संस्कृति को और भी आगे बढ़ाने का आग्रह....

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
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Monday, 28 October 2013

देखे सपना धुआं होगे...


(1 नवंबर को छत्तीसगढ़ राज्य का 13 वां स्थापना दिवस है। हम लोग बचपन से राज्य आन्दोलन के साथ ही साथ यहां की भाषा, साहित्य, संस्कृति और संपूर्ण अस्मिता के लिए कार्यरत थे। लेकिन अब लग रहा है कि हम लोगों का आन्दोलन अभी भी अधूरा है। कहने के लिए भोगोलिक तौर पर राज्य का निर्माण तो हो गया है, लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर यह आन्दोलन प्रारंभ हुआ था, वह अब भी वैसा ही उपेक्षित पड़ा हुआ है।  कुछ इसी भाव पर छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखा गया मेरा यह गीत...)

राज बनगे-राज बनगे, देखे सपना धुआं होगे
चारों मुड़ा कोलिहा मन के, देखौ हुआं-हुआं होगे

का-का सपना देखे रिहिन पुरखा अपन राज बर
नइ चाही उधार के राजा, हमला सुख-सुराज बर
राजनीति के पासा लगथे, महाभारत के जुआ होगे.....

शेर-बघवा भालू-चीता, हाथी के चिंघाड़ नंदागे
सत रद्दा रेंगइया मन के इतिहास ले नांव भुलागे
जतका ढोंगी, जोगी-भोगी, तेकरे मन बर दुआ होगे....

तिड़ी-बिड़ी छर्री-दर्री, हमर चिन्हारी के परिभाषा
कला-साहित्य सबो जगा, चील-कौंवा के होगे बासा
बाहिर ले आये मन संतवंतीन, अउ घर के नारी छुआ होगे....

अरे कूदौ-फांदौ टोरौ-पोंछौ, काजर कस अंधरौटी ल
अपने खातिर बेलव-सेंकव, स्वाभिमान के रोटी ल
खूब पेराये हौ कुसियार बरोबर, सरबस छुहा-छुहा होगे...

सुशील भोले
संपर्क : 41-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा), रायपुर (छ.ग.)
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Sunday, 27 October 2013

मुखौटा ही मुखौटा है...

मुखौटा ही मुखौटा है, अदब के इस जमाने में
जुल्म जो करते, कृपा बरसती उनके तराने में....

कहां जायें किसे मानें, भरोसा हर पल बिखरता है
पाखंड के दौर में, जुगनू सूरज बन फुदकता है
कैसा ये बेशर्म जमाना, डरता नहीं लजाने में....

कैसा रिश्ता कैसा नाता, कैसा प्रेम का बंधन है
हर बात पर छलने वाला, पाता यहां अभिनंदन है
मक्कारों का बाजार सजा है, लगे हैं सच छिपाने में....

लुटेरों ने गजब ढाया, बनाया रूप सेवक का
आवरण साधु का ओढ़ा, फैलाया भ्रम देवत्व का
फिर सेंध लगाये हौले से, जनता के खजाने में....

सुशील भोले
म.नं. 41-191, कस्टम कालोनी के सामने,
डॉ. बघेल गली, संजय नगर (टिकरापारा)
रायपुर (छ.ग.) मोबा. नं. 098269 92811
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Friday, 25 October 2013

गीत गाना चाहता हूं...

मैं तुम्हारे आंसुओं का गीत गाना चाहता हूं
भूख और बेचारगी पर ग्रंथ गढऩा चाहता हूं....

जब जमीं पर श्रम का तुमने, बीज बोया था कभी
पर सृजन के उस जमीं को, कोई रौंदा था तभी
मैं उसी पल को जहां को दिखाना चाहता हूं... मैं तुम्हारे...

जब तुम्हारे घर पर पहरा, था पतित इंसान का
बेडिय़ों में जकड़ा रहता, न्याय सदा ईमान का
उन शोषकों को तुम्हारे बेनकाब करना चाहता हूं.. मैं तुम्हारे...

दर्द की परिभाषा मैंने, समझी थी वहीं पहली बार
जब तुम्हारे नयन बांध ने, ढलकाये थे अश्रु-धार
उसी दर्द को अब जीवन से, मैं भगाना चाहता हूं... मैं तुम्हारे..

सुशील भोले
41-191, कस्टम कालोनी के सामने,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853 05931, 098269 92811
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Thursday, 24 October 2013

एसो के पानी....











एसो के पानी, पानी-पानी कर दिस,
जम्मो फसल के नुकसानी कर दिस।
रोग-राई हमागे, जम्मो आसा बोहागे,
भारी परसानी म किसानी कर दिस।।
                             एसो के पानी....