पर्व और मान्यताएं.....
हमारे यहां बहुत से ऐसे पर्व हैं, जिन्हें अलग-अलग समुदायों के लोगों के द्वारा अलग-अलग अवसर पर या अलग-अलग संदर्भों के अंतर्गत मनाया जाता है। उदाहरण के लिए हम "नवा खाई" का पर्व ले सकते हैं।
छत्तीसगढ में "नवा खाई" का पर्व तीन अलग-अलग अवसरों पर मनाया जाता है। ओडिशा राज्य की सीमा से लगे वे लोग जो उत्कल संस्कृति को जीते हैं ,इसे ऋषि पंचमी को, जो कि भादो मास को संपन्न होने वाले गणेश चतुर्थी के पश्चात् आता है, उस दिन मनाते हैं।
गोण्डवाना की संस्कृति जीने वाले लोग इसे कुंवार मास की शुक्ल पक्ष में अष्टमी या नवमी तिथि को मनाते हैं। इसी तरह अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग के अंतर्गत आने वाले लोग जो कि मैदानी भाग में रहते हैं, इसे कार्तिक मास में मनाए जाने वाले दीपावली पर्व के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर अन्नकूट के रूप में मनाते हैं।
नवा खाई पर्व मनाने का सभी का उद्देश्य एक ही है, अपने ईष्ट को अपनी नई फसल को समर्पित करना। किन्तु अलग-अलग तिथि और अलग-अलग रूप में इसे मना लिया जाता है।
ऐसे ही बहुत से ऐसे पर्व हैं, जिन्हें अलग-अलग संदर्भ के अनुसार अलग-अलग समूह के लोग मनाते हैं।
हम "छेरछेरा" पर्व को उदाहरण के रूप में ले सकते हैं। गोंडवाना की संस्कृति को मानने वाले लोग इसे "गोटुल/घोटुल" की शिक्षा में पारंगत हो जाने के पश्चात पूस पूर्णिमा के अवसर पर तीन दिनों का पर्व मनाते हैं।
यहां के मैदानी भाग में रहने वाले अन्य पिछड़े और सामान्य वर्ग के अंतर्गत आने वाले लोग केवल एक दिन का पर्व फसल की लुआई-मिंजाई के पश्चात् अन्न दान के रूप में मनाते हैं। इन सबसे अलग मुझे अपने साधना काल में जो ज्ञान प्राप्त हुआ, उसके अनुसार यह पर्व शिव जी द्वारा पार्वती से विवाह पूर्व लिए गये परीक्षा के अंतर्गत नट बनकर मांगा गया भिक्षा का प्रतीक स्वरूप मनाया जाने वाला पर्व है।
मित्रों, यहां यह जानना आवश्यक है कि यहां के हर पर्व का संबंध किसी न किसी रूप में अध्यात्म से अवश्य है। आज हम उचित जानकारी के अभाव में उसे अन्य संदर्भों के अंतर्गत मनाये जाने को स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि सभी पर्वों का मूल कारण जानने के लिए कागजी प्रमाणों से ऊपर उठ कर तर्क और लोक परंपरा की कसौटी पर उसे परखना आवश्यक है।
यहां पर मैं "होली" पर्व को उदाहरण के रूप में रखना चाहूंगा। हम आम तौर पर यह जानते हैं कि "होलिका दहन" के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है। जहां तक हम छत्तीसगढ की मूल संस्कृति के संदर्भ में बात करें तो यह सही नहीं है। यहां जो पर्व मनाया जाता है, वह "काम दहन" का पर्व है। इसीलिए हम इसे "मदनोत्सव" या "वसंतोत्सव" के रूप में भी मनाते हैं।
आप सभी को यह स्मरण होगा कि शिव पुत्र के हाथों मरने का वरदान प्राप्त ताड़कासुर के संहार के संहार के लिए तपस्यारत शिव की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा गया था। तब कामदेव वसंत का मादक भरे मौसम का चयन कर अपनी पत्नी रति के साथ शिव तपस्या भंग करने का प्रयास कर रहे थे। इस पर शिव जी कुपित हो गये और कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर दिए।
हमारे छत्तीसगढ में इसीलिए इस पर्व को वसंत पंचमी से लेकर फाल्गुन पूर्णिमा तक लगभग चालीस दिनों का पर्व मनाया जाता है। वसंत पंचमी के दिन अरंडी नामक पौधे को होली दहन स्थल पर गड़ाया जाता है, जो कि कामदेव के आगमन के प्रतीक स्वरूप होता है। उसके पश्चात् वासनात्मक गीतों और नृत्यों के माध्यम से फाल्गुन पूर्णिमा तक इस पर्व को मनाया जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा को होली दहन स्थल पर एकत्रित लकड़ी आदि में अग्नि संचार के पश्चात यह पर्व संपन्न होता है।
आप सोचिए, होलिका तो एक ही दिन में लकड़ी एकत्रित करवा कर उसमें अग्नि प्रज्वलित करवाती है, और स्वयं ही उसमें जलकर भस्म हो जाती है। फिर उसके लिए चालीस दिनों का पर्व मनाने की क्या आवश्यकता है? इस पर्व के अवसर पर प्रयोग किए जाने वाले वासनात्कम शब्दों, दृश्यों और नृत्यों से होलिका का क्या संबंध है?
मित्रों, मैं हमेशा यह कहता हूं कि यहां की मूल संस्कृति को उसके वास्तिवक रूप में पुनः लिखने की आवश्यकता है, तो उसका यही सब कारण है।
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो नं 9826992811
Saturday, 7 November 2020
पर्व और मान्यताएँ....
Tuesday, 3 November 2020
डॉ. नरेंद्र देव वर्मा.. कुशल चितेरे...
डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा : छत्तीसगढ़ महतारी की महिमा के चितेरे - डॉ. चन्द्रकुमार जैन
छत्तीसगढ़ की माटी को धन्य करने वाले जिन महामानवों पर हम गर्व कर सकते हैं उनमें डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा का नाम अग्रगण्य है। वे सही अर्थ में छत्तीसगढ़ के सोनहा बिहान के स्वप्न दृष्टा और सृजेता भी थे। धन्य पिता धनीराम जी की आँखों के दो ज्योति पुंज बनकर स्वामी आत्मानंद जी और डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा ने यहाँ के जन-मन की अभिलाषाओं को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर मानो पूर्ण करने का बीड़ा उठाया। स्वामी आत्मानंद तथा डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा दोनों अपने-अपने क्षेत्र की विभूतियाँ बनकर अमर हो गए।
यह सुखद संयोग है कि छत्तीसगढ़ के राज गीत अरपा पैरी के धार के सर्जक डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा की लाड़ली मुक्तेश्वरी देवी हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की जीवन संगिनी हैं। स्वामी आत्मानंद की अनोखी वक्तृत्व कला और उनके पारदर्शी व हृदयस्पर्शी चिंतन के तो लोग दीवाने थे और आज भी हैं। डॉ.वर्मा वाग्देवी की आराधना माटी-महतारी की सेवा को समर्पित हो गए। दोनों सपूतों ने इस धरती का शुभ भावों से श्रृंगार कर अपने कर्तव्य कर्म के साथ-साथ इस माटी का भी गौरव बढ़ाया है। दोनों महतारी की अस्मिता और मानवता की तेजस्विता के प्रतीक बन गए।
छोटी सी उम्र पाकर भी मानव जीवन को एक न्यास यानी ट्रस्ट की तरह कैसे जिया जा सकता है इसकी मिसाल हमें डॉ. वर्मा के जीवन से मिलती है। जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मैया की धुन सुनते ही लोग स्तंभित हो जाते हैं। जैसे कि राष्ट्र्गान के स्वर गूँज रहे हैं। वैसे भी वह राजगीत तो है ही। माता की ऐसी वंदना सचमुच बड़ी दुर्लभ बात है। यह कोई बिरला सपूत ही कर पाता है। यह गीत जैसे डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा की आत्मा का संगीत है। छत्तीसगढ़ महतारी की यह वंदना ही नहीं, सम्पूर्ण भुइँया की महिमा और उसकी खुशहाली की प्रार्थना है। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा की इस अमर रचना में समूचे छत्तीसगढ़ का वैभव एकबारगी साकार हो उठा है। यही कारण है कि स्वामी आत्मानंद ने अपने अनुज डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के बारे में स्मरण स्वरूप लिखे लेख में कहा है कि सोनहा बिहान की चतुर्दिक ख्याति की खबरें सुनकर वे भी इसकी प्रस्तुति देखने के लिए लालायित हो उठे। 1978 के अंत में महासमुंद में एक प्रदर्शन तय हुआ । स्वामी जी को डाक्टर साहब ने बताया कि आप चाहें तो उस दिन प्रदर्शन देख सकते हैं । महासमुंद में विराट दर्शक वृंद को देखकर स्वामी जी रोमांचित हो उठे । उनके भक्तों ने उन्हें विशिष्ट स्थान में बिठाने का प्रयत्न किया लेकिन डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने स्वामी जी को दर्शकों के बीच जमीन पर बैठकर देखने का आग्रह किया । स्वामी जी उनकी इस व्यवस्था से अभिभूत हो उठे । उन्होंने उस घटना को याद करते हुए लिखा है – ‘नरेन्द्र तुम सचमुच मेरे अनुज थे ।‘
वास्तव में सोनहा बिहान छत्तीसगढ़ के लिए सुबह की तलाश का पर्याय बना। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने घर परिवार, माता-पिता के लिए विवाहित जीवन को कर्त्तव्य भाव से स्वीकार किया । धनीराम जी का केवल यह सपूत ही विवाहित हुआ । उनके शेष चार बेटों में तीन तो सन्यासी हो गए, मगर एक पुत्र अविवाहित रहकर विवेकानंद विचारधारा के लिए समर्पित होकर अमूल्य सेवाएं दे रहे हैं । सही माने में डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा छत्तीसगढ़ के जागरण-पुरुष थे। इतिहास रचने वाले महामानव बनकर उनका व्यक्तित्व स्वयं एक इतिहास की मानिंद बन गया। उनका जीवन संगीत में ढला ही नहीं, खुद संगीत बन गया। सोनहा बिहान से प्रेरित होकर छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने न जाने कितनी संस्थाएं गठित कीं , होड़ सी मच गयी। हरेक के मन में जैसे अपने हिस्से की बिहान की साझेदारी की ललक सी पैदा हो गयी।
दरअसल सच्ची साधना कभी अकेले मुक्ति के पक्ष में नहीं रहती। वह सबके कल्याण, सबकी मुक्ति का पथ प्रशस्त करने में ही अपनी मुक्ति को सार्थक मानती है। यही सार्थकता डॉ. वर्मा के जीवन की पहचान बन गयी। ऐसा जीवन मात्र सफल नहीं, सुफलदायी कहलाता है। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने हर मोर्चे पर अपनी ताकत का अहसास करवाया । वे एकांतवासी शब्द साधक या संगीत आराधक बनकर बैठ नहीं गए, बल्कि लोगों के जीवन की राह आसान बनाने के लिए सच्चे माटीपुत्र के रूप में काम करते रहे। उपेक्षा, तिरस्कार, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध उनकी आवाज़ कभी मद्धिम नहीं हुई। वे लोगों के भीतर हर तरह की पराधीनता के खिलाफ लड़ने की ताकत की पुकार बने रहे। वे कथाकार, कवि, गीतकार और दार्शनिक तो थे ही, छत्तीसगढ़ के ख्याति प्राप्त भाषा-विज्ञानी और अत्यंत कुशल मंच संचालक भी थे। गीत सृजन के साथ स्वर रचना में भी वे निष्णात थे।
अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार,
इंदरावती हा पखारे तोर पइयां,
जय हो, जय हो छत्तीसगढ़ मइयां।
ये पंक्तियाँ डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा की पहचान और छत्तीसगढ़ के मान के रूप में ढल गयीं।
स्मरणीय है कि नरेन्द्र देव वर्मा अपनी बुनियादी तालीम के दौरान एक आम विद्यार्थी ही थे। बाद में उनकी प्रतिभा में निखार आया। बी.ए. में उनकी प्रखर मेधा उभरी। यह सचमुच बड़े गर्व की बात रही कि वे सागर विश्वविद्यालय में प्रख्यात समालोचक और लेखक आचार्य नंददुलारे बाजपेयी के शिष्य थे । डॉ. नरेन्द्र देव ने सागर विश्वविद्यालय से श्रेष्ठ वक्ता के रूप में अलग पहचान बनायी। वादविवाद प्रतियोगिता में अव्वल रहे।
डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा की शादी मात्र साढ़े अठारह वर्ष की उम्र में हो गई । धनीराम जी वर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे तुलेन्द्र। यही तुलेन्द्र आगे चलकर छत्तीसगढ़ के विवेकानंद स्वामी आत्मानंद कहलाये । उसके बाद क्रमश: दूसरे क्रम के पुत्र देवेन्द्र भी बड़े भाई से प्रभावित होते दिखे । इसीलिए देवेन्द्र का ब्याह सुनिश्चित हुआ। परन्तु, अग्रज से प्रभावित इस होनहार अनुज के बारे में याद भी रखना चाहिए कि नरेन्द्र देव वर्मा ने बार-बार लिखा है कि बड़े भैय्या का आशीष अगर उन्हें भी मिला होता तो वे भी विवाह बंधन से मुक्त होकर उन्हीं की तरह सन्यासी जीवन बिताते । स्वामी आत्मानंद ने उन्हें समझाया भी कि शायद ईश्वर उन्हें विवाहित जीवन बिताते हुए ही सेवा का दायित्व देना चाहते थे । इसलिए विचलित हुए बगैर ईश्वरीय इच्छा को मानकर कार्य करना है ।
साहित्यकार डॉ. परदेशीराम वर्मा ने बहुत सटीक लिखा है कि स्वामी जी की उदार परंपरा में ही गृहस्थ डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा भी ढले थे । उन्होंने जीवन भर जागृति और परोपकार का काम किया । भाषा एवं संस्कृति के लिए उनका नाम स्तुत्य है तो धर्म एवं लोकमंच के लिए उनका अवदान भी ऐतिहासिक है । वे विवेक ज्योति पत्रिका के संपादक रहे । स्वामी विवेकानंद जी की जन्म शताब्दी 1963 में मनाई गई । स्वामी आत्मानंद के सपनों को साकार करने के लिए नरेन्द्र देव वर्मा ने दिन रात काम किया । उन्होंने जीवन भर शाम के तीन घंटों को आश्रम के लिए सुरक्षित रखा । वे नौ बजे रात्रि तक आश्रम के कामों में व्यस्त रहते । उसके बाद घर आकर मित्रों से मिलते-जुलते और रात्रि चार बजे तक लेखन अध्ययन करते ।
यह भी कि डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा छत्तीसगढ़ के पहले बड़े लेखक है जो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समान रूप से लिखकर मूल्यवान थाती सौंप गए । वे चाहते तो केवल हिन्दी में लिखकर यश प्राप्त कर लेते । लेकिन उन्होंने छत्तीसगढ़ी की समृद्धि के लिए खुद को खपा दिया । वे पहले बड़े लेखक थे जो मंच संचालक के रूप में बेहद यशस्वी बने । सोनहा बिहान में मंच संचालक ही सबसे प्रभावी अभिनेता सिद्ध हुआ । वे कविताओं की स्वर लिपियाँ रचने वाले छत्तीसगढ़ के पहले बड़े रचनाकार सिद्ध हुए ।
डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के अग्रज स्वामी आत्मानंद ने लिखा है कि मां शारदा देवी की पावन जन्म स्थली जयरामवाटी जाकर डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने मां से वरदान मांगा कि उन्हें वे अपना पुत्र बना लें । और मां शारदा की कृपा से उसी दिन से नरेन्द्र देव की लेखनी में चमत्कार दिखने लगा । बेशक वे जीवन भर वे अपने अग्रज को आदर्श मानते रहे लेकिन सदगृहस्थ बनकर अपने दायित्वों का पूर्ण मनोयोग से निर्वाह भी करते रहे । इस धरती पर मात्र चार दशक की अपनी यात्रा पूरी कर डॉ. वर्मा चल बसे परन्तु छत्तीसगढ़ महतारी के ये सपूत अपने छोटे से जीवन में वह काम कर गये जो सैकड़ों वर्षों का जीवन पाकर भी सामान्य प्रतिभा का व्यक्ति नहीं कर पाता । उन्होंने सोनहा बिहान के माध्यम से छत्तीसगढ़ को कई रत्न दिए , कई रत्नों को तराशा। कई पत्थरों को मूरत गढ़ी और कई ज़िंदगियों में नयी उम्मीदों का संचार कर अपनी ज़िंदगी का चित्र पूरा कर इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया।
नरेंद्र देव वर्मा.. स्वामी जी..
'नरेंद्र - मेरा अनुज'
-परम पूज्य स्वामी आत्मानंद जी
स्वामी आत्मानंद ने लिखा है- डा.नरेंद्र देव वर्मा द्वारा रचित 'सोनहा बिहान' की मैंने बहुत प्रशंसा सुनी थी। एक दिन मैंने नरेंद्र से कहा, अरे जरा एक बार तो अपना वह 'सोनहा बिहान' सुनवाओ। 1978 के अंत में एक दिन उसने सूचना दी कि महासमुंद में 'सोनहा बिहान' का प्रदर्शन है और मैं चाहूं तो वहां जाकर देख सकता हूं। हम कुछ लोग रायपुर से गए। महासमुंद पहुंचने में कुछ देर हो गई। सर्वसाधारण के साथ ही उसने मेरी भी बैठने की व्यवस्था की। किसी ने उससे कहा कि अरे स्वामी जी को यहां बिठा रहे हो? सबके साथ? वहां अलग से एक कुर्सी क्यों नहीं दे देते? नरेंद्र का उत्तर तो मैं नहीं सुन पाया, पर मुझे सबके साथ ही जमीन पर बैठना पड़ा। बाद में पता चला कि नरेंद्र नहीं चाहता था कि मेरे कारण दूसरों को किसी प्रकार की असुविधा हो अथवा कार्यक्रम में किसी प्रकार से कोई विघ्न उत्पन्न हो। उसकी भावना ने मुझे भाव-विभोर कर दिया और मेरी आत्मा पुकार उठी- 'नरेंद्र, तुम सचमुच मेरे अनुज हो।'
मैंने 'सोनहा बिहान' देखा और सुना। नरेंद्र उसकी कमेंटरी (कार्यक्रम का संचालन) कर रहा था। सब कुछ अपूर्व था। उसकी तेजस्विता और स्वाभिमान के उस दिन मुझे दर्शन हुए। वह दबंग था, अन्याय के समक्ष वह झुकना नहीं जानता था, पर वह अविनयी नहीं था। अपनी जन्मभूमि छत्तीसगढ़ के प्रति उसका आहत अभिमान उसकी कमेंटरी में मानो फूट- फूट पड़ रहा था, पर मुझे लगा कि जनसभा में एक शासकीय कर्मचारी को इतना स्पष्ट होकर अपने विचार को अभिव्यक्ति देना ठीक नहीं है। 'सोनहा बिहान' में छत्तीसगढ़ के शोषण का वर्णन है। शोषण के विरुद्ध माटी की तड़प नरेंद्र के स्वर में अभिव्यंजित हुई थी। वह जब दूसरे दिन मुझसे आश्रम में मिला तो मैंने उसकी कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की, पर साथ ही यह कहते हुए मैं नहीं चूका कि शासकीय नौकरी में रहते हुए तुम्हारी इस प्रकार दोटूक बात को शायद कुछ लोग पसंद न करें। उसने मुझसे तो कुछ नहीं कहा, पर अपने एक मित्र से उसने कहा था, भैया को मेरी कमेंटरी शायद उतनी रास नहीं आई। अब क्या करूं? अपनी इस जन्मभूमि का शोषण सहा भी तो नहीं जाता। इसी के माध्यम से मैं अपनी व्यथा, अपनी टीस प्रकट किया करता हूं। मेरी यही अभिलाषा है कि धरती पुत्र जागें, अपना शोषण समझ सकें। अगर मेरे इस कार्य से रुष्ट होकर सरकार मेरी नौकरी छीन ले तो जिन लोगों के लिए मैं अपना रक्त सूखा रहा हूं, वे मेरे छत्तीसगढ़ के लोग क्या मुझे दो जून की रोटी भी नहीं देंगे?
स्वामी आत्मानंद लिखते हैं कि मैंने इस नरेंद्र को अब तक नहीं पहचाना था। उसमें अपनी माटी के लिए इतना गौरव है, उसके शोषण के लिए इतनी टीस है, उसकी उन्नति के लिए इतनी तड़पहै, यह तो मैंने पहले न जाना था और जब मुझे उसके भीतर जलने वाली आग का पता चला तो मैं अभिभूत हुए बिना नहीं रहा। छत्तीसगढ़ की पीड़ा से उसका हृदय करा रहा था। संभवतः शिक्षा के क्षेत्र में रहकर छत्तीसगढ़ के लिए कुछ न कर पाने की विवशता ही उसे कुछ क्षणों के लिए राजनीति की ओर ले गई थी। मैंने बाद में जाना था कि वह 1977 में चुनाव में भाग लेने की इच्छा रखता था। एक आज्ञाकारी अनुज की भांति उसने मेरी नाही को सम्मान दिया, पर छत्तीसगढ़ के लिए कुछ करने की भावना उसमें इतनी गहरी पैठी थी कि वह छत्तीसगढ़ी गीतों, नाटकों और लोककथाओं के माध्यम से शतधाराओं में फूट पड़ी और उसका फल वह विपुल प्रकाशित और उससे भी विपुल अप्रकाशित साहित्य है, जो वह अपने पीछे छोड़ गया है। छत्तीसगढ़ की धरती माता ने अपने इस कृती पुत्र को, लाड़ले बेटे को लेकर भविष्य के कितने सुनहरे सपने संजोए थे, पर वह तो ममता के सारे बंधन तोड़कर अस्तित्व के महासागर में जा मिला।
Monday, 19 October 2020
शक्ति लहरी सप्तधरा धाम..
शक्ति लहरी सतधरा धाम : जहाँ लगता है मकर संक्रांति पर विशाल मेला.....
छत्तीसगढ की शक्तिपीठों में अब शक्ति लहरी सतधरा धाम का नाम भी प्रमुखता से जुड़ने लगा है। लगभग पिछले एक शताब्दी पूर्व से स्थापित माता के इस मंदिर में भक्तजनों का आना निरंतर बढ़ता जा रहा है।
सात नदियों के एक साथ मिलने से सतधरा या सप्तधारा के नाम से जाने जाना वाला यह स्थल गरियाबंद जिला महासमुंद जिला और रायपुर जिला की सीमारेखा पर ग्राम हथखोज के अंतर्गत स्थित है। ऐसी मान्यता है कि यहां महानदी, सोढुल नदी और पैरी नदी की तीन धाराओं के साथ सूखा नदी, सरगी नदी, केशवा नदी और बगनई नदी आपस में एक साथ मिलती हैं, इसीलिए इस विराट भू-भाग में फैले संगम को सप्तधारा या सतधरा कहते हैं।
यहां यह उल्लेखनीय है कि संभवतः समूचे छत्तीसगढ में नदियों का संगम स्थल इतना विस्तारित कहीं पर नहीं है, जितना विस्तारित यहां का संगम पाट है।
माता जी के यहां पर स्थापित होने के संबंध में बताया जाता है, कि माता की यह बिना शीश वाली प्रतिमा नदी में बहकर आयी है, जो एक यादव को यह प्राप्त हुई है। बताया जाता है कि वह व्यक्ति अपनी भैंसों को लेकर संगम स्थल पर जाया करता था, वहां उसकी भैंस एक स्थान विशेष पर हमेशा चमक जाती थी। यादव को आश्चर्य होता था कि आखिर भैंस यहां पर चमक या झिझक क्यों जाती है। उसने उस स्थल को ठीक से देखकर रेत में टटोलने लगा कि आखिर यहां है क्या? तब यह प्रतिमा उसके हाथों में आयी।
बताया जाता है, कि तब माता ने उस यादव को स्वप्न दिया कि मुझे यहां से निकालकर अन्य स्थल पर स्थापित करवा दो। उन्होंने बताया कि मुझे उठाकर ले जाते समय हर कदम पर एक-एक नारियल रखते जाना और जहां पर नारियल अपने आप फूट जाए उस स्थल पर मुझे स्थापित कर देना। वर्तमान में स्थापित जगह पर ही नारियल के फूटे जाने का जिक्र किया जाता है।
वर्तमान में यह स्थल देवी उपासना के प्रमुख पीठ के रूप में विकसित हो रहा है। राजिम से महासमुंद को जोड़ने वाले इस मार्ग पर स्थित सूखा नदी पर भव्य पुल बन जाने के कारण यहां से होकर गुजरने वालों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, इसका प्रतिफल मंदिर के दर्शनार्थियों के लिए भी सार्थक रहा है, उनकी संख्या में भी वृद्धि हुई है।
यहां पर प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर तीन दिनों का मेला भरता है। मेला का स्वरूप दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। इसी अवसर पर यहां सूखा लहरा लिया जाता है। बताया जाता है, कि संगम स्थल की रेत पर लोग लोट कर लहरा लेते हैं। जिसके भाग्य में होता है, वह उंगली के स्पर्श मात्र से काफी दूर तक लुढ़कते हुए चला जाता है, और निढाल होने के पश्चात ही रूकता पाता है।
माता के इस स्थल पर नवरात्र के दोनों ही अवसर पर ज्योति कलश की स्थापना की जाती है, जहां श्रद्धालु अपनी मनोकामना को लेकर ज्योति प्रज्वलित करते हैं।
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
अंगारमोती माँ...
भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाली माँ अंगारमोती...
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 90 किमी की दूरी पर धमतरी जिले के ग्राम चंवर में अंगारमोती माँ का मंदिर स्थापित है।
बताया जाता है कि अंगार मोती का यह मंदिर 600 वर्ष पुराना है, जो गंगरेल बाँध बनने के बाद डूब गया था। लोगों के अनुसार चंवर गांव के बीहड़ जंगल में माँ स्वयं प्रगट हुईं और अपने तेज के प्रभाव से पूरे क्षेत्र को आलोकित कर दिया, जिससेे प्रभावित होकर लोगों ने सन् 1972 में गंगरेल बाँध के पास ही माँ अंगारमोती का मंदिर पुनः स्थापित किया।इनके पास ही शीतला माता, माँ दन्तेशवरी और भैरव बाबा भी स्थापित है। इनके दर्शन के लिए लोग देश - विदेश से आते हैं।
मान्यता है कि श्रद्धा के साथ जो भी भक्त नारियल बाँधता है, माँ उसकी मुराद जरुर पूरा करती है। यहाँ नवरात्र में भक्त मनोकामना ज्योति भी जलाते हैं।
ऐसा कहा जाता है कि अंगार मोती अगारा ऋषि की पुत्री है, ये सभी वन देवियों की बहन मानी जाती हैं। इन्हें प्रकृति और हरी भरी वादियों से विशेष लगाव है, शायद इसीलिए इन्हें वनदेवी कहा जाता है.
बताया जाता है कि माता बहुत चमत्कारी हैं, इनके आशीर्वाद से नि:संतान महिलाओं की सूनी गोद भी हरी-भरी हो जाती है ।
माँ विंध्यवासिनी की बहन मानी जाने वाली अंगारमोती
माँ की कृपा सदियों से भक्तों पर बरसती आ रही है. श्रध्दालु भी पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ माता की आराधना करते हैं ।।
🙏जय माँ अंगारमोती 🙏
शीतला मंदिर के बइगा...
शीतला मंदिर के बइगा मेर ले लाने हावौं आगी
जोत-जंवारा के बदना म हमूं बने हावन भागी
खुल जाही अब भाग हमरो दाई सउंहत आही
बरसाही असीस के बरसा संग खुशहाली लाही
सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 98269-92811