Monday, 9 May 2022

वो चिट्ठी पाती के दिन..

सुरता//
वो चिट्ठी-पाती के दिन...
    इंटरनेट अउ मोबाइल के आविष्कार होए के बाद आज भले पोस्ट कार्ड, अंतर्देशीय पत्र अउ लिफाफा के दिन ह इतिहास के अंग बनगे हवय, फेर एक बेरा अइसनो रिहिसे, जब इंकर मन के अगोरा म डॅंकहार बाबू के सइकिल के घंटी सुने बर कान हमेशा बेचैन राहय. कभू महीना भर म त कभू अठोरिया म त कभू बिहाने दिन डॅंकहार बाबू के आरो संग मयारु संगी के आरो मिल जावत रिहिसे.
    सन् 1869 म आस्ट्रेलिया ले शुरू होय पोस्टकार्ड ह भारत म सन् 1879 के जुलाई महीना म आइस हे. तब इहाँ एकर कीमत 3 पइसा रिहिस. फेर हमन तब एकर माध्यम ले सोर संदेशा ले दे के चालू करेन जब ए ह 15 पइसा के होगे रिहिस, जेन ह 50 पइसा के होवत ले चलिस. तब मैं हाईस्कूल म पढ़त रेहेंव. रायपुर के रामदयाल तिवारी स्कूल म. तब हमर गाँव के संगी मन कभू-कभार एकाद पाती पठो देवत रिहिन हें. जवाब म महूं वोमन ल पठो देवत रेहेंव. फेर वोकर सुरता ह गंज अकन दिन ले राहय. फलाना ह का-का लिखे रिहिसे, अउ मैं ह जवाब म का लिखेंव. स्कूल के किताब मन के आखर ल भुला जावत रेहेन फेर संगी संग होए पाती के गोठबात ल कभू नइ भुलावत रेहेन. अइसन भुलाए बिसराए के तब चालू होइस जब मोला नंगत के चिट्ठी-पाती भेजे बर लागय अउ मोर जगा घलो नंगत के आए के जोंग माढ़िस. ए बेरा तब आइस जब 9 दिसंबर 1987 के मैं छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला मासिक पत्रिका "मयारु माटी" के प्रकाशन संपादन शुरू करेंव. तब अतका जादा पाती आवय, के वोमन ल पढ़े अउ जवाब दे म ही घंटों पहा जावत रिहिसे. वोमा के कतकों जेन विशेष किसम के लागय,  कोनो वरिष्ठ साहित्यकार के या कोनो बड़का नेता या मंत्री आदि के तेला तो फाइल बना के धर घलो लेवत रेहेंव.
    हमन इतिहास के जुन्ना पन्ना ल लहुटाथन त इहू जाने ल मिलथे, के पोस्टकार्ड के जनम होए के पहिली घलो संदेश देके चलन रिहिसे.   पहिली ए बुता खातिर पोंसे अउ सिखोए-पढ़ोए परेवा मन के माध्यम ले सोर-संदेशा भेजे जावत रिहिसे. पहिली के राजा-महाराजा मन एकर खातिर विशेष संदेशिया घलो राखत रिहिन हें, जेमा पल्ला दौड़इया घोड़ा मनला एकर खातिर विशेष रूप ले खवा-पिया के राखे जावय.
    आज इंटरनेट अउ मोबाइल के आविष्कार ह ए सबो उदिम अउ जिनिस ल इतिहास के अंग बना देइस. फेर मोला आजो सुरता हे, जब कुछु खास पाती ल हमन महीनों धरे राहन. कापी-किताब म लुका छिपा के राखन. मोला सुरता हे, छायावाद के प्रवर्तक कवि पद्मश्री पं. मुकुटधर पाण्डेय जी के एक पाती (संदेश) ल तो मैं अपन पहला कविता संकलन 'छितका कुरिया' म ब्लाक बनवा के छपवाए घलो रेहेंव. अब अइसन किसम के संदेश ह घलो ईमेल या व्हाट्सएप के माध्यम ले मिल जाथे. तब काकरो हाथ के लिखे पाती या संदेश ल सुरक्षित राखे के बात ह भुसभुसहा असन जनाथे. अब तो सइघो किताब घलो ह पीडीएफ के माध्यम ले मिनट भर म एती ले ओती चल देथे. पूरा दुनिया भर म बगर जाथे. तब काकरो मयारुक पाती अउ मोती कस लिखे अक्षर के सुरता कहाँ ले आही?
    आज तो मोला खुद सुरता नइए के मैं आखरी पाती कोन ल अउ कब लिखे रेहेंव. फेर जो हो, चिट्ठी-पाती के माध्यम ले जे अपनापन अउ खुशी तब मिलत रिहिसे वो ह आज के  विडियो कालिंग के  माध्यम ले होवइया मुंह देखिक-देखा गोठ-बात म घलो नइ मिलय.
जय हो मोर संगी के पाती
तोर सुरता आथे दिन-राती
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Wednesday, 4 May 2022

सुशील ले भोले तक के रेंगान

सुरता//
सुशील ले भोले तक के रेंगान...
    जानकर मन नाम के गजब महिमा बताथें. एकरे सेती उन भारी सोच-विचार अउ लगिन-पतरा देख-पढ़ के काकरो भी नाम ल धरथें. शायद ए परंपरा ह शिक्षा के अंजोर संग बगरत रहे हे. फेर हमर गाँव-गॅंवई म आजो ए चलन ह समाज के आखरी मुड़ा तक नइ पहुँच पाए हे. एकरे सेती आज घलो बुधवार के दिन होए लइका के नाम ल बुधारू या बुधियारिन धर दिए जाथे. फेर जिहाॅं तक हमर घर या मोर नाम के बात हे, त हमर सियान गुरुजी रिहिन हें. शहर म राहत रिहिन हें. जे मन बेरा अउ काल के चक्र अउ महत्व ल समझत रिहिन हें, तेकर मन संग संगति करत रिहिन हें. एकरे सेती उन मन काल चक्र अउ बेरा के महत्व ल घलो थोर-बहुत समझत रिहिन हें. एकरे सेती हमर सबो भाई-बहिनी मन के जनम बेरा अउ दिन-बादर ह एकक मिनट अउ सेकंड के मुताबिक उंकर डायरी म लिखाय हे. अउ वोकरेच मुताबिक मोर नाम सुशील कुमार वर्मा धराए हे.
    सरकारी रिकॉर्ड म तो आजो इहिच नाॅंव हे, फेर सार्वजनिक गतिविधि मन म एमा थोर-बहुत बदलाव आवत रेहे हे. सन् 1984 के बात आय. तब मैं दैनिक अग्रदूत प्रेस म काम करत रेहेंव. इही बछर अक्ती परब म हमर बिहाव-बंधना होइस. बिहाव तक तो सब बने-बने रिहिस. फेर बिहाव के बाद हमर संग काम करइया नोनी मन मोला ताना मारे असन गोठियावंय- 'का सर जी, तोर बिहाव होगे, तभो ले अभी तक कइसे तैं ह कुमार लिखथस? हमन तो बिहाव होइस तहाँ कुमारी ले श्रीमती लिखे ले धर लेथन, त तहूं मनला अइसने नइ करना चाही?
     वोमन बनेच ठेसरा मारंय. वो बखत अग्रदूत के आफिस म संख्या घलो वोकरे मनके जादा राहय. आखिर थक-हार के मैं ह सुशील कुमार वर्मा ले कुमार शब्द ल निकाल के सिरिफ सुशील वर्मा लिखे लगेंव. तब वोमन हाॅं अतका म चल जाही कहिके खुश होगे रिहिन हें.
     एकर ठीक दस बछर बाद सन् 1994 म मोर जीवन म अद्भुत घटना घटिस, जेकर चलत मैं नागपंचमी 24 जुलाई 1994 ले अध्यात्म के रद्दा म आएंव. (एकर उल्लेख मोर पहिली के आलेख 'अध्यात्म के रद्दा' म आगे हे, तेकर सेती घेरी-भेरी नइ ओरियावौं). वइसे मोर मस्तिष्क परिवर्तन तो नागपंचमी के दिन ही होए रिहिसे, फेर मैं विधिवत आध्यात्मिक दीक्षा अगहन महीना (तब दिसंबर म परे रिहिसे) म लिए रेहेंव. तब मैं पत्रकारिता अउ साहित्यिक गतिविधि मनला पूरा छोड़-छाड़ के अध्यात्म म बूड़ गे रेहेंव. उही बखत एक दिन मोर आध्यात्मिक रद्दा बतइया ह कहिस- 'तोला अब अपन नाम ले जातिसूचक शब्द ल निकाल देना चाही.'
    पहिली तो मोला वोकर बात समझ म नइ आइस. अउ मैं वो डहार जादा चेत घलो नइ करेंव. सन् 1995 के सावन महीना म फेर मोला वो इही बात ल कहिस. त मैं वोकरे जगा पूछेंव- 'त तहीं बता भई, का लिखे जाना चाही?' वो कहिस- 'तोर पहचान, तोर जाति के माध्यम ले नहीं, भलुक तोर ईष्ट के माध्यम ले होना चाही. तहाँ ले ज्योतिष शास्त्र के अंक मन के कुछ गुणा भाग करिस अउ कहिस- आज ले तैं अपन नाम ल सुशील भोले लिख.
    बस उही दिन ले फेर मोर सार्वजनिक गतिविधि के नाम सुशील भोले होगे. वोकरेच बताए अउ रद्दा देखाय म मैं साधना के रद्दा म बढ़तेच गेंव, जेन ह सात-सात बछर के तीन अलग-अलग चक्र (स्तर) म कुल 21 बछर तक चलिस. एमा के पहला सात बछर तो बहुतेच कठोर रिहिस, वोकर बाद के दूसरा सात बछर म थोरिक शिथिलता करिस अउ फेर तीसरा सात बछर म थोरिक अउ शिथिलता देइस. जब सात-सात बछर के तीनों चक्र, माने कुल 21 बछर पूरा होइस, तब फेर पहिली जइसे आम आदमी के जीवन जीए के अनुमति मिलिस.
जय भोले.. ऊँ नमः शिवाय..
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Monday, 2 May 2022

भाषा बिन संस्कृति कइसे बाॅंचही??

भाषा बिन संस्कृति कइसे बाॅंचही सरकार..?
हमर घर
बारों महीना खाए जाथे
बासी अउ बोरे
तभो ले
श्रमिक संगी मनला
सम्मान दे खातिर
1 मई के अउ खाएन
माई-पिल्ला खाएन
संग म फोटू खिंचाएन.
आने बछर घलो खाबो
श्रमिक संगी मन संग
खाॅंध म खॉंध जोरबो.
फेर एक बात के मोला
समझ नइ आवत हे,
बिन भाषा के
अकेल्ला संस्कृति भर ह
कइसे बॉंचे पाही?
एकर जबर संसो होवत हे.
हम सब जानथन-
अस्मिता के चिन्हारी तो
दूनों होथे-
भाषा अउ संस्कृति.
इंकरे माध्यम ले
दुनिया म लोगन
हमला जान अउ
पहचान पाथें.
फेर अभी तक तो
सरकार ह
न राजभाषा आयोग के
गठन करे हे
न तो
छत्तीसगढ़ी ल
शिक्षा के माध्यम बनाए हे.
तब तहीं बता
एक आॅंखी ल मूंदे रहिबे
अउ एके आॅंखी भर म
नटेर के देखत रहिबे,
त का
हमर जम्मो चिन्हारी ल
जगजग ले देखे पाबे ?
तब तैं
कइसे गुन डरे सरकार
संस्कृति के नाॅंव म
कुछ कला अउ परंपरा भर के
आरो ले म
जम्मो अस्मिता के
चिन्हारी अउ बढ़वार हो जाही?
सिरतोन म तोला
इहाँ के अस्मिता के संसो हे
त तोला
भाषा अउ संस्कृति
दूनों के
संगे-संग
सुध ले बर परही
तभे
हमर अस्मिता के सोर
पूरा दुनिया म बगरही.
-सुशील भोले
मो/व्हा. 9826992811

Sunday, 1 May 2022

बासी काबर खावन समझव

बासी काबर खावन समझव...

कार्बोहाइड्रेट  79•2-- 78℅,
खनिज पदार्थ  0•5--0•7℅
फाइबर   0--0℅
कैल्शियम   0•01-- 0•01℅
फॉस्फोरस   0•11--0•17℅
प्रति 100 ग्राम में-----
लौह तत्व    1•0--2•8mg
विटामिन बी   20--60 lU
प्रति 300 ग्राम में--
विटामिन A -- 0--4  IU
कैलोरी प्रति 100 ग्राम- 348- 351

     यह वैज्ञानिक विश्लेषण चावल का है, लेकिन हम चावल नहीं खाते, उसे पका कर खाते हैं। पकाना एक प्रसंस्करण क्रिया है।प्रसंस्करण से पदार्थ के गुण-धर्म बदल जाते हैं इसलिए उपरोक्त वैज्ञानिक निर्धारण को व्यवहारिक नहीं माना जा सकता।
    चावल को पका कर अनेक खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं।प्रत्येक के गुण, स्वाद और पौष्टिकता में अन्तर होता है।अतः चावल से निर्मित विविध व्यंजनों के पौष्टिकता का वैज्ञानिक निर्धारण अभी किया जाना है।
      आयुर्वेद में विभिन्न रोगों में पथ्य के रूप में चावल के अलग अलग प्रकल्प दिए जाते हैं।
भात-- चावल को जल में उबाल कर अथवा भाप में पका कर भात बनाया जाता है, इसे दाल-सब्जी आदि भक्ष्य पदार्थो के साथ खाया जाता है। यह स्वस्थ व्यक्ति का पूर्ण आहार होता है।

कृशरा- (खिचड़ी)
   चावल, दाल, कुछ पत्र शक, नमक, मिर्च, हल्दी आदि को एक साथ कुछ अधिक जल के साथ अधिक नरम होते तक पकाया जाता है उसे कृशरा कहा गया है। जिस रोगी की जठराग्नि मन्द हो जाती है उसे सुपाच्य और पूर्ण पौष्टिक आहार के रूप में कृशरा दिया जाता है।

यवागू (पेज)---
     सामान्यतः व्यक्ति जितना चावल खाता है उसकी एक चौथाई मात्रा की चार गुना जल में पकाया जाता है उसे यवागू कहा गया है। यह अल्प पौष्टिक और अधिक सुपाच्य होता है।दुर्बल तथा क्षीण जठराग्नि रोगी को यवागू देने का विधान है।

पेया ( घोटो)-
  थोड़े से चावल को दस गुना जल में अधिक देर तक पकाया जाता है। चावल के दाने यदि दिखाई दें तो उसे मथानी से मथ कर उसे पीने योग्य बना लिया जाता है। इसे पेया कहा जाता है। थोड़े अन्न से पेट भरने का अच्छा साधन है यह। यह और भी अधिक सुपाच्य होता है।

मण्ड (पसिया)-- 
       कुछ लोग चावल को अधिक जल में पका कर जलीय अंश को निथार देते हैं। निथारने की इस प्रक्रिया को पसाना कहते हैं तथा पसाने से निकले मण्ड को पसिया कहा जाता है। यह सर्वाधिक सुपाच्य  साथ ही पौष्टिक भी होता है।
      पेया और मण्ड (घोटो और पसिया) नमक डालकर दिया जाता है तो यह Oral  rehydration के लिए अति उत्तम कार्य करता है। मैं अपने चिकित्सा अभ्यास में इसका प्रयोग करता हूँ। अतिसार वमन (उल्टी) के रोगी शरीर का जलीय अंश निकल जाने से अत्यधिक दुर्बल हो जाते हैं साथ ही उनकी अंतड़ियों से पाचक रस मल के साथ निकल जाने के कारण जठराग्नि अत्यन्त क्षीण हो जाती है। तब oral rehydration अथवा intraveinous rehydration दिया जाता है। इस प्रकार दिए जाने वाले rehydration में पौष्टिकता अत्यल्प होती है। यदि रोगी मुख मार्ग से ले सकता हो तो पेया या मण्ड नमक डालकर देने से रोगी की स्थिति से  शीघ्र सुधार होता है और पाचन की समस्या भी नहीं होती।
       आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है।     छत्तीसगढ़ उष्ण कटिबंधीय प्रदेश है, यहाँ के निवासी मुख्यतः कृषक हैं। आदर्श विधि से भोजन निर्माण और उसका सेवन इनकी जीवन शैली से मेल नहीं खाता। सुबह से शाम तक खेत खार में खटने वाला ताजा गरम भोजन की व्यवस्था कैसे कर सकता है, इसलिए उसने पानी जीवन पद्धति के अनुरूप वैकल्पिक व्यवस्था कर ली। बोर बासी और बासी ऐसी ही वैकल्पिक व्यवस्था है। सैद्धांतिक रूप से बासी अन्न को निषिद्ध माना गया है परन्तु वह सिद्धांत बोरे बासी और बासी पर लागू नहीं होता। भात को गरम ही खाना चाहिए। ठण्डा हो जाने पर उसका स्वाद और पौष्टिकता दोनों हीन हो जाते हैं क्योंकि उसका जलीय अंश सूख जाता है। यदि भात ठण्डा होने लगे उस समय उसमें पर्याप्त जल डाल दिया जाए तो सजा विशिष्ट स्वाद और पौष्टिकता का निर्माण होता है। इसे बोरे बासी कहा जाता है। इसमें नमक, प्याज डालकर अचार, चटनी या सब्जी के साथ खाने पर अत्यधिक स्वादिष्ट होता है तथा इसकी पौष्टिकता भी बनी रहती है। इसमें दही या मट्ठा डालकर खाने से और भी अधिक स्वादिष्ट हो जाता है।
     भात को जल में डुबाने पर वह बोरे बासी बनता है और छः घंटे से अधिक बीत जाने पर इसे ही बासी कहा जाता है। बासी में चावल के fermentation होने के कारण खमीर उठता है, उसमें कुछ खट्टापन आ जाता है।यह अधिक सुपाच्य और ऊर्जादायक बन जाता है।इसीलिए छत्तीसगढ़ में बासी खाने को प्राथमिकता दी जाती है।
       बोरे बासी या बासी खाने से प्यास कम लगती है। इससे सिद्ध होता है कि बासी पुनर्जलीकरण का उत्तम साधन है। लू में गोंदली (प्याज ) की उपयोगिता  से सभी परिचित हैं। हमने देखा है कि बासी खाने वाले श्रमिक की कार्यक्षमता अधिक होती है।
      अनुभव सिद्ध सत्य है कि  *बासी सड़ा हुआ भोजन नहीं,अतिउत्तम खाद्य प्रसंस्करण है।*

                 -डॉ सुरेन्द्र यदु

Saturday, 30 April 2022

वो बोरे-बासी के दिन... सुरता

सुरता//
वो बोरे-बासी के दिन..
    छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा डाॅ. खूबचंद बघेल जी के एक मयारुक कविता के आज सुरता आवत हे-
  बासी के गुण कहुँ कहाँ तक,
  इसे न टालो हाॅंसी में.
  गजब बिटामन भरे हुये हैं,
  छत्तीसगढ़ के बासी में..
    पहिली उंकर ए कविता ल हमन अपन लइकई बुद्धि म परंपरा के संरक्षण-संवर्धन खातिर लिखे गे मयारुक रचना होही समझत रेहेन. वइसे खाए बर पहिली घलो बासी ल ससन भर आवन अउ आजो खाथन, फेर वोकर पौष्टिक महत्व ल समझत नइ राहन. हाँ, डोकरी दाई अतका जरूर काहय- बासी के पसिया ल घलो पीना चाही, एकर ले चूंदी बने जल्दी-जल्दी बाढ़थे अउ घन होथे. फेर अब जब ले वैज्ञानिक मन बासी उप्पर शोध कारज करिन हें अउ बताइन हें, के बासी खाए ले ब्लडप्रेशर ह कंट्रोल म रहिथे, गरमी के दिन म बासी खाए ले लू घलो नइ लगय, एकर ले हाइपर टेंशन घलो कंट्रोल म रहिथे. गरमी के दिन म बुता करइया मन के  देंह-पाॅंव के तापमान ल घलो बने-बने राखथे. संग म पाचुक होए के सेती हमर पाचन तंत्र ल घलो बरोबर बनाए रखथे. जब ले ए वैज्ञानिक शोध ल जानेन तबले अपन पुरखा मन के वैज्ञानिक सोच अउ अपन परंपरा ऊपर गरब होए लागिस.
    आज अचानक ए सब बात मनके सुरता एकर सेती आवत हे, काबर ते हमर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ह 1 मई 2022 ले श्रमिक दिवस के अवसर म श्रमिक मनके श्रम ल सम्मान दे खातिर ए दिन जम्मो छत्तीसगढ़िया मनला बोरे-बासी खाए खातिर आव्हान करे हे. बोरे-बासी के महत्व ल जन-जन म बगराए अउ एला अपन पारंपरिक गरब के रूप म जनवाए खातिर 'बोरे-बासी' डे के रूप म मनाए के अरजी करे हे.
    ए तो बने बात आय, काबर ते हम आधुनिकता अउ शहरी जीवन शैली के नांव म अपन कतकों परंपरा अउ खान-पान मनला भुलावत जावथ हन. अउ वोकर बदला म पौष्टिक विहीन खान-पान अउ परंपरा म बोजावत जावत हन. एकर बर जरूरी हे, हमर तइहा के परंपरा अउ वोकर महत्व ल नवा पीढ़ी ल बताए अउ वोकर संग जुड़े खातिर कोनो न कोनो उदिम होवत रहना चाही.
    वइसे हमर संस्कृति म 'बासी' खाए के एक रिवाज तइहा बेरा ले हे. भादो के महीना म 'तीजा' परब म जब बेटी-माई मन अपन-अपन मइके आए रहिथें, तब उपास रहे के पहिली दिन करू भात खाये के नेवता दिए जाथे अउ तीजा के बिहान दिन बासी खाये के नेवता देथें. फेर ए नेंग ह सिरिफ तीजहारिन मन खातिर ही होथे. आज बासी के महत्व ल समझे के बाद मोला अइसे लागथे, के अभी जेन 'बोरे-बासी' डे मनाए के बात सरकार डहार ले होए हे, वोला 'बासी उत्सव' के रूप म मनाए जाना चाही. जइसे आने उत्सव के बेरा जगा-जगा म वो उत्सव ले संबंधित आयोजन करे जाथे, ठउका वइसनेच जगा-जगा बासी पार्टी या बासी खवाये के भंडारा आयोजन करे जाना चाही.
    अब तो बासी खवई ह सिरिफ परंपरा या रोज के पेट भरई वाले भोजन ले आगू बढ़के सेहत अउ रुतबा के घलो प्रतीक बनत जावत हे, तभे तो फाइवस्टार होटल मन म घलो एला बड़ा शान के साथ उहाँ के  मेनू म शामिल करे जाथे, अउ लोगन वतकेच शान ले एला मंगा के खाथें घलो.
     वइसे तो हमर घर म आज घलो बारों महीना बासी के उपयोग होवत रहिथे. तभो मोला अपन लइकई के वो दिन के सुरता जरूर आथे, जब हमन मही डारे बिना बासी ल छुवत घलो नइ राहन. तब डोकरी दाई के सियानी राहय. गाँव घर म तो रोज दही-मही के व्यवस्था घलो हो जावय, फेर जब ले शहर के हवा म सांस लेवत हन, तब ले दही-मही संग बासी खवई ह अतरगे हे. बस सादा-सरबदा ही चलथे.
    आज मोला अपन लिखे कविता के चार डांड़ के जबर सुरता आवत हे-
  दिन आवत हे गरमी के, नंगत झड़क ले बासी
  दही-मही के बोरे होवय, चाहे होवय तियासी
  तन तो जुड़ लागबेच करही, मन घलो रही टन्नक
  काम-बुता म चेत रइही, नइ लागय कभू उदासी
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Thursday, 28 April 2022

गजब बिटामन भरे हे बासी म..

गजब बिटामन भरे हे छत्तीसगढ़ के बासी म...
    छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा डाॅ. खूबचंद बघेल जी के एक मयारुक कविता हे-
  बासी के गुण कहुँ कहाँ तक,
  इसे न टालो हाॅंसी में.
  गजब बिटामन भरे हुये हैं,
  छत्तीसगढ़ के बासी में..
    पहिली उंकर ए कविता ल हमन अपन परंपरा के संरक्षण-संवर्धन खातिर लिखे गे मयारुक रचना समझत रेहेन. फेर जब ले वैज्ञानिक मन बासी उप्पर शोध कारज करिन हें अउ बताइन हें, के बासी खाए ले ब्लडप्रेशर ह कंट्रोल म रहिथे, गरमी के दिन म बासी खाए ले लू घलो नइ लगय, एकर ले हाइपर टेंशन घलो कंट्रोल म रहिथे. गरमी के दिन म बुता करइया मन के  देंह-पाॅंव के तापमान ल घलो बने-बने राखथे. संग म पाचुक होए के सेती हमर पाचन तंत्र ल घलो बरोबर बनाए रखथे. जब ले ए वैज्ञानिक शोध ल जानेन तबले अपन पुरखा मन के वैज्ञानिक सोच अउ अपन परंपरा ऊपर गरब होए लागिस.
    आज अचानक ए बात के सुरता ए सेती आवत हे, काबर ते हमर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ह अब ले 1 मई श्रमिक दिवस ल बोरे-बासी के महत्व ल जन-जन म बगराए अउ एला अपन पारंपरिक गरब के रूप म जनवाए खातिर 'बोरे-बासी' डे के रूप म मनाए के अरजी करे हे.
    वइसे हमर संस्कृति म 'बासी' खाए के एक रिवाज हे. भादो महीना के तीजा परब म जब बेटी-माई मन अपन-अपन मइके आए रहिथें, तब उपास रहे के पहिली दिन करू भात खाये के नेवता दिए जाथे अउ तीजा के बिहान दिन बासी खाये के नेवता देथें. फेर ए नेंग ह सिरिफ तीजहारिन मन खातिर ही होथे. आज बासी के महत्व ल समझे के बाद मोला अइसे लागथे, के अभी जेन 'बोरे-बासी' डे मनाए के बात सरकार डहार ले होवत हे, वोला 'बासी उत्सव' के रूप म मनाए जाना चाही. जइसे आने उत्सव के बेरा जगा-जगा वो उत्सव ले संबंधित आयोजन करे जाथे, ठउका वइसनेच जगा-जगा बासी पार्टी या बासी खवाये के भंडारा आयोजन करे जाना चाही.
    अब तो बासी खवई ह सिरिफ परंपरा या रोज के भोजन ले आगू बढ़के सेहत अउ रुतबा के घलो प्रतीक बनत जावत हे, तभे तो फाइवस्टार होटल मन म घलो एला बड़ा शान के साथ उहाँ के  मेनू म शामिल करे जाथे, अउ लोगन वतकेच शान ले एला मंगा के खाथें घलो.
मोला अपन चार डांड़ के सुरता आवत हे-
  दिन आगे हे गरमी के, नंगत झड़क लव बासी
  दही-मही के बोरे होवय, चाहे होवय तियासी
  तन तो जुड़ लागबेच करही, मन घलो रही टन्नक
  काम-बुता म चेत रइही, नइ लागय कभू उदासी
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Tuesday, 26 April 2022

महतारी के सपना अउ साधना अंजोर

सुरता//
महतारी के सपना अउ साधना काल के 'अंजोर'..
    दुनिया म अइसन कोनो मनखे नइ होही, जेला कभू सपना नइ आय होही या वो ह सपना नइ देखे होही. ए बात अलग हे, के हम वो देखे सपना के माध्यम ले भविष्य के गरभ के बारे म आरो देवत इशारा ल समझ नइ पावन या वोला कुछू अलगेच रूप म समझ जाथन. कतकों लोगन तो एला हॉंसी-ठट्ठा म घलो उड़ा देथें. फेर जे मन अइसन सपना ऊपर गहन चिंतन-मनन अउ शोध कारज करे हें, उन एला भविष्य के आरो के रूप देखथें. एकर अलग-अलग बेरा अउ अलग-अलग दृश्य के अलग-अलग व्याख्या घलो करथें.
    अइसने एक सपना जेन हमर महतारी उर्मिला देवी जी देखे रहिन हें, वो ह मोला तब समझ आइस, जब मैं अपन जिनगी के लगभग आधा उमर ल पहा डारे रेहेंव. मोर जनम के समय के बारे म हमर महतारी ह हमेशा ए बतावय- 'तैं जब मोर कोंख म आएस त सांप बनके आएस.
    ए बात ल हमर परिवार वाले मन के संगे-संग अउ सबो तीर-तखार के जानकर मन घलो बतावंय. उन बतावंय- हमर घर हमर बड़े भाई के जनम के बाद अउ कोनो लइका नइ होवत रिहिसे. तेकर सेती परिवार के मन भारी पूजा-पाठ, उपास-धास अउ तिरथ-बरत करंय. आखिर सात-आठ साल के अंतराल म मोला गरभ म आएस काहंय. हमर महतारी बतावय- जब तैं मोर गरभ म आएस, त सांप बनके आएस अउ मोला कहेस- 'बेटी मोला अबड़ भूख लागत हे, कुछू खाए बर दे. अब मैं तोरे घर म रइहौं. बस अइसे कहेस अउ फेर सांप ले एक ज्योति के रूप म बदल के मोर पेट म समा गेस.'
    बिहनिया जब उठ के ए सपना के बारे म आस-परोस के मनला बताएंव, त वोमन हमर घरेच जगा एकठन भिंभोरा रिहिसे, तेमा दूध अउ लाई चढ़ाए बर कहिन. मैं सबो झन के बात ल मान के वो भिंभोरा म कटोरी भर दूध अउ दोना म लाई चढ़ाएंव. देखतेच देखते वो भिंभोरा ले एक ठन सांप निकलिस अउ हम सबके आगूच म वो दूध अउ लाई ल कूद-कूद के खाए लागिस. खाए के बाद फेर भिंभोरा म खुसरगे.
    हमर महतारी काहय- 'ए घटना अउ सपना के सेती मैं तोला हमेशा अपन ददा (हमर नाना) ह मोर घर आए हे काहंव'. वो बतावय के हमर नाना जी अपन बेरा के नामी जादूगर रिहिन हें. वो अपन छोटे भाई संग जादू के कार्यक्रम देखाए बर दुरिहा-दुरिहा तक जावंय. अइसने एक कार्यक्रम देखावत बेरा उनला उंकरेच पोंसे एक सांप ह चाब दिए रिहिसे, तेकर सेती उंकर निधन होगे रिहिसे.
    ए घटना ल सुरता करत हमर महतारी मोला भारी मया करय. एक तो अपन ददा ल अपन घर लहुट के आगे हे सोचय, ऊपर ले आठ बछर के अंतराल म घर म लइका होए के खुशी. हमर महतारी के संगे-संग पूरा परिवार अउ आस-परोस सबके अबड़ दुलार मिलय. वो बतावय- तैं अबड़ उतलइन घलो रेहे. तोर जंवरिहा जतका लइका राहंय, सबला मार देवस, ढपेल के गिरा देवस नइते कटकटा के उंकर हाथ-गोड़ ल चाब देवस. तेकर सेती उंकर महतारी मन तोर अबड़ शिकायत घलो करे बर आवंय- 'देख ले मास्टरिन तोर लइका ह मोर लइका ल चाब दिस कहिके.'
    तभो हमर महतारी ह मोला कभू मारत-पीटत नइ रिहिसे. एक तो अपन ददा आय समझय अउ ऊपर ले आठ साल बाद होए हे कहिके सोग मरय. वो ह माईलोगिन मनला लेवौ न वो लइका-लइका के खेल म हो जथे कहिके मना लेवत रिहिसे.
    हमर महतारी ह अपन जिनगी के अंतिम बेरा तक ए बात ल बतावय अउ मोला अपन ददा च आय समझ के मया करय. फेर मोला ए सपना वाले बात के असलियत के तब जानकारी होइस, जब मैं साधना म आएंव अउ मोला वोकर माध्यम ले 'ज्ञान-अंजोर' मिले लागिस. तब समझ पाएंव के वो सपना असल म का रिहिसे?
बस वोकर बारे म अतके- जय भोले.. ऊँ नमः शिवाय 🙏
(संलग्न फोटो म अपन महतारी संग मैं सुशील)
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811