24 जून जनमदिन//
एकलव्य परंपरा के साधक दिनेश चौहान
कतकों मनखे ल मैं देखे हौं बिना काकरो अंगरी धरे, अपने सुर म रेंगत रहिथें. जइसे एकलव्य ह सिरिफ अपन मन म ही गुरु के छापा बसा के धनुर्विद्या के जम्मो मरम ल जान अउ सीख गे. ठउका अइसने दिनेश चौहान घलो हे जे अपन लगन ल ही गुरु मान के लेखन के संगे-संग चित्रकला म घलो पारंगत होगे हवय.
दिनेश चौहान के असली नॉव हे दिनेश कुमार ताम्रकार फेर ए ह रचना संसार म अपन नॉव ल दिनेश चौहान ही लिखथे. वइसे उंकर महतारी ह मया कर के उनला 'राजेन' कहिथे.
भीमसेनी एकादशी परब 24 जून बछर 1961 के धमधा जिला दुर्ग म महतारी अगासबाई ताम्रकार अउ सियान रामकृष्ण ताम्रकार जी के घर जनमे दिनेश पेशा ले सरकारी गुरुजी हे. फेर बड़ा अचरज के बात ए आय के आज तक मैं एकर भीतर सरकारी गुरुजी वाले कोनो चिन्हा नइ देखेंव.
सुभाव ले आध्यात्मिक होय के सेती दिनेश जी संग मोर गजबे जमथे. साधना काल म जब कभू मोला राजिम त्रिवेणी संगम के कुलेश्वर महादेव के दर्शन के साध होवय, त दिनेश ल ही फोन करौं.
दिनेश जी तुरते तइयार हो जावय, हाँ आना भाइया आप के संग म मोरो देव दर्शन हो जाथे. नइते भले हम रहिथन नवापारा राजिम म फेर देवता मन के दर्शन पैलगी बर महीनों बीत जथे.
वइसे उमर म मोर ले एक हफ्ता के बड़े हे दिनेश चौहान ह फेर भइया संबोधन ल उही च ह करथे.
दिनेश चौहान जी एक उत्कृष्ट श्रेणी के पाठक आय, एकरे सेती वोमन हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी दूनोच भाखा म गुरतुर लिखथें. दिनेश जी जतका सुंदर लेखन करथें वतकेच सुंदर चित्रकला म घलो निपुण हें. मैं बेरा बेरा म उंकर जगा अपन प्रकाशन ले संबंधित चित्र बनवावत रहिथौं.
अपन नियम कायदा के पक्का होय के सेती दिनेश चौहान जी कतकों बेर सरकारी तंत्र संग जूझत घलो राहय. एक बेर मैं उनला पूछेंव त उन रचनात्मक जगत म अपन नॉव ल बदल के लिखे के कारण घलो इही आदत ल बताइस.
वोकर कहना रिहिस- सरकारी रिकॉर्ड म जेन नॉव हे तेने नॉव ले कहूँ मैं सोंटा मारे छाप लेखन करहूं तब तो गड़बड़ हो जाही, तेकर ले नौकरी के अलगे अउ तुतारी बाजी के अलगे नॉव.
छत्तीसगढ़ी भाखा खातिर गजब समर्पित अउ चेतलग हे दिनेश जी ह. उंकर कहना हे- 'जम्मो तरा के स्कूल मन म छत्तीसगढ़ी भाखा ल एक अलग अउ अनिवार्य विषय के रूप म पढ़ाए जाना चाही.'
दिनेश जी बेरा बखत म अपन लेखन मनला प्रकाशन के अंजोर घलो देखावत रहिथें. उंकर सबले पहिली किताब आए रिहिसे- 'कइसे होही छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया.
छत्तीसगढ़ी भाखा म वर्ग पहेली बनाय के उन सुग्घर उदिम करे रिहिन हें, एकरे ऊपर आधारित उंकर दूसरा किताब आए रिहिसे- चौखड़ी जनउला.
अपन ताम्रकार समाज के रचनाधर्मी मन के चिन्हारी खातिर उंकर तीसरा किताब आए रिहिसे- सृजन साक्षी.
छत्तीसगढ़ी भाखा खातिर फेसबुक म लगातार लिखत अपन पोस्ट मनला एकमई कर के चौथा किताब छपवाय रिहिन हें- छत्तीसगढ़ी बर तुतारी.
दिनेश जी के पांचवा किताब 'साॅंच कहे तो मारन धावै' शीर्षक ले आए रिहिसे, जेमा अभी हालेच म बुलके महामारी 'कोरोना' के दूसर पक्ष ल लेके लिखे गे लेख मन के संगे-संग कुछ निबंध अउ व्यंग्य मनला संघारे गे रिहिसे.
मोर साधना काल म अंगरी गिनउ संगवारी रिहिन हें, जेमा दिनेश जी घलो एक रिहिन हें. एकरे सेती जब कभू मोर राजिम क्षेत्र म जाना होवय, त सबले पहिली उनला सोर कर देवत रेहेंव. तहाँ फेर दूनों झन संघरा किंजरई फिरई करन.
आज अपन जिनगी के बैसठ बछर पूरा करत दिनेश चौहान जी ल बधाई देवत गजब निक जनावत हे. एकर एक बड़का कारण तो इहू हे, के ए ह सेवानिवृत्त हो जाही, तब नंगत के किंजरई फिरई करही, हो सकथे महूं ल संगवारी बना ले करही.
शुभकामना देवत मैं एक पइत फेर उनला गोहराहूं. मैं इहाँ के मूल संस्कृति खातिर ठोसलग बुता करे बर एक पइत चेताए रेहेंव, आज फेर सुरता देवावत हौं, उन अपन लेखन के विषय इहाँ के मूल संस्कृति अउ अस्मिता ल घलो बनावंय.
जनमदिन के गाड़ा-गाड़ा बधाई...
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Sunday, 18 June 2023
एकलव्य परंपरा.. दिनेश चौहान
Sunday, 28 May 2023
छत्तीसगढ़ी म बेरा के चिन्हारी.
*छत्तीसगढ़ी में दिन-रात समय सारिणी।*
1:- भिनसरहा- लगभग 4 बजे सुबह से 5 बजे तक।
2:-झुलझुलहा- सुबह 5 बजे से लगभग 5:30 बजे तक।
3:- पँगपंगहा- सुबह सूर्योदय की लालिमा तक।
4:- बिहनिया- सूर्योदय
5:- गरुवा ढिलाती- लगभग 7 से 8 बजे तक सुबह।
5:- मंझनिया- दोपहर 12 बजे से लगभग 2 बजे तक।
6:-बेरा ढरकत-2:30 से लगभग 4 बजे तक।
7:- संझा-4 बजे से 5:- 30 लगभग।
8:- बेरा बुड़ती- सूर्यास्त समय( यही समय लगभग आगी बारने का बेरा कहलाता है।
इसे मुंधियार भी कहते हैं)
9:-बियारी के बेरा- रात में खाने का समय।
10:- दु पेटिया बियारी- गर्भवती महिलाओं के खाने का समय जो प्रायः जल्दी होता था। घर के सियान के खा लेने के बाद गर्भवती महिलाओं को जल्दी खाने को कहा जाता है। चूंकि गर्भ में एक पेट(बच्चा) और
होता है इसलिए दु पेटिया कहा जाता है।
11:-अधरतिया- रात्रि 12 बजे से आगे।
12:- सुकवा पहाती- भिनसरहा से थोड़ा पहले ( शुक्र तारा इसे हिंदी में भोर का तारा भी कहते हैं। इसके बाद बेरा झुलझुलहा होने लगता है। ।
जोहार छत्तीसगढ़ -सुशील भोले
Tuesday, 23 May 2023
कोंदा-भैरा... के सौ दिन
'कोंदा-भैरा....' के सौ दिन..
एक बड़का राजनीतिक मनखे के दूमुंहिया चरित्तर ले उठे मन म गुस्सा के प्रदर्शन खातिर सोशलमीडिया म शुरू होय सरलगहा.. 'कोंदा-भैरा के गोठ' ल आज सौ दिन पुरगे.
पहिली मैं एला दू-चार डांड़ म ही लिखे के कोशिश करत रेहेंव, तेमा आम लोगन घलो डहर चलती एला पढ़ सकय, फेर कतकों अकन ह आठ-दस डांड़ के घलो बाढ़ जावय.
शुरू म तो ए गोठ-बात म लोगन के गजब प्रतिक्रिया आवत रिहिसे, फेर धीरे-धीरे कमतियाय लगिस, जे ह स्वभाविक घलो हे. रोजेच कोन ह लिखत रइही. तभो एक बात ह मोला एला सरलग लिखे बर प्रोत्साहित करत रहिथे, वो ए के लोगन भले टिप्पणी करे बर ढेरियाथें फेर एकर कतकों भाग ल अपन टाईमलाईन के संगे-संग अउ दूसर समूह मन म शेयर जरूर करत रहिथें.
एकर लोगन के पसंद करे के एक अउ बात इहू जनाइस के एक दू अउ लोगन एकरे असन गोठ-बात के शैली म कुछ कुछ लिखे लगिन, भले वोकर मन के लिखना ह सरलग नइ दिखत हे, फेर कोशिश तो करत हें, जे ह ए कोंदा-भैरा के सफलता के सूचक आय.
पहिली तो एला थोरिक व्यंग्य के शैली म लिखे के उदिम होवत रिहिसे, फेर बीच-बीच म अइसनो विषय आगू म आ जावय जेमा गंभीरता अउ गुनिक लिखई जरूरी असन हो जावय एकरे सेती ए जम्मो गोठ-बात मन म शैली के विविधता आवत गिस.
कतकों झन अब ए जम्मो गोठ-बात मनला सकेल अउ छांट-निमार के एक किताब के रूप दे के सुझाव दे बर धर लिए हें.
देखव ए सरलगहा गोठ-बात ह अउ कतका भाग तक चल पाथे ते, काबर ते एकर खातिर रोज नवा विषय के खोजई म मोर आने संदर्भ मन म लिखई-पढ़ई अउ गुनई ह थोरिक अरझे असन होगे हे.
-सुशील भोले-9826992811
Sunday, 23 April 2023
नगरगाँव के नामकरण..
नगर के आश्रित गाँव.. नगरगाँव...
नगरगाँव के नामकरण के संबंध म अइसे जनाथे, के ए गाँव ह जुन्ना बेरा म कोनो नगर या शहर रिहिस होही. बाद म कोनो कारण ले उजर गिस होही. तब फेर एकरे आसपास लोगन रहे बर लगिन होहीं, जेला वो नगर के आश्रित गाँव के रूप म नगरगाँव कहे गिस होही.
अभी ए गाँव जिहां बसे हे, एकर उत्तर-पूर्व दिशा म एक खंडहरनुमा डीह हे, जिहां के खुदाई ले कतकों पुरातात्विक महत्व के जिनिस मिले रिहिसे. डॉ. लक्ष्मीधर झा जी ह प्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ. रमेन्द्रनाथ मिश्र जी के मार्गदर्शन म एकर ऊपर पीएचडी के अंतर्गत शोध कार्य करे हेंं. वोमन एला कोनो प्राचीन नगरी के रूप म ही उल्लेखित करे रिहिन हें.
वइसे मोर ए कहना ह सिरिफ अनुमान आय, प्रमाणित इतिहास नहीं.
Friday, 31 March 2023
जबर पुष्टई के जेवन बासी
बासी काबर खावन..?
आय ए ह जबर पुष्टई जेवन
जे मनखे मन हमर छत्तीसगढ़ के पारंपरिक जेवन 'बासी' ल सरहा पदार्थ मानथें, वोला खाये ले छिनमिनाथें या खाये ले मना करथें, असल म अइसन मनखे मन ए अतिउत्तम खाद्य पदार्थ के गुन अउ पौष्टिकता ले अनजान हें.
आयुर्वेद के जानकर डॉ. सुरेन्द्र यदु जी के कहना हे- "मेरे जीवन भर के अनुभव से यह सिद्ध हुआ है कि बासी सड़ा हुआ भोजन नहीं, अतिउत्तम खाद्य प्रसंस्करण है."
वैज्ञानिक शोध ले ए जानकारी मिले हे के चॉंऊर म-
कार्बोहाइड्रेट 79•2-- 78℅,
खनिज पदार्थ 0•5--0•7℅
फाइबर 0--0℅
कैल्शियम 0•01-- 0•01℅
फॉस्फोरस 0•11--0•17℅
प्रति 100 ग्राम में-----
लौह तत्व 1•0--2•8mg
विटामिन बी 20--60 lU
प्रति 300 ग्राम में--
विटामिन A -- 0--4 IU
कैलोरी प्रति 100 ग्राम- 348- 351
ए ह चाॅंउर के वैज्ञानिक विश्लेषण आय. फेर हमन सोज्झे चाॅंउर ल नइ खावन, भलुक वोला रांध के खाथन. ए रंधई-चुरोई ह एक किसम के प्रसंस्करण क्रिया आय।
प्रसंस्करण ले वो पदार्थ के गुण-धर्म बदल जाथे. एकरे सेती चाॅंउर के उपरोक्त वैज्ञानिक निर्धारण ल व्यवहारिक नइ माने जा सकय।
चाॅंउर ल रांध के या पका चुरो के कतकोंअकन खाद्य पदार्थ बनाये जाथे। उन सबो के गुण, स्वाद अउ पुष्टई म अन्तर होथे । एकरे सेती चाॅंउर ले बने जम्मो किसम के व्यंजन या कहिन खाये के जिनिस मन के पौष्टिकता के वैज्ञानिक निर्धारण अभी करे जाना बांचे हे।
डाॅ. यदु के कहना हे- आयुर्वेद म अलग-अलग रोग मन म पथ्य के रूप में चाॅंउर के अलग अलग प्रकल्प दिए जाथे. जइसे-
भात-- चाॅंउर ल पानी म डबका के या भाप म चुरो के भात बनाए जाथे, एला दार-साग आदि खाये के जिनिस मन संग खाये जाथे। ए ह एक स्वस्थ मनखे खातिर पूर्ण आहार होथे।
खिचरी- चाॅंउर, दार, कुछ साग-भाजी, नून, मिरचा, हरदी आदि ल एके संग मिंझार के थोरिक पानी संग चुरोए जाथे, उही ल खिचरी कहिथन. जेन रोगी के जठराग्नि मन्द या शिथिल हो जाथे, वोला सुपाच्य अउ पूर्ण पौष्टिक आहार के रूप म इही खिचरी या कृशरा ल दिए जाथे.
पेज- एक सामान्य मनखे जतका चाॅंउर खाथे, वोकर पाव भर या एक चौथाई भाग ल चार गुना पानी म चुरोए जाथे, उही ल पेज या यवागू कहे जाथे। ए ह अल्प पौष्टिक अउ जादा सुपाच्य होथे। कमजोर अउ कम जठराग्नि वाले रोगी ल अइसने पेज दे के नियम हे।
घोटो- थोरकुन चाॅंउर ल दस गुना पानी म बनेच बेर ले चुरोए जाथे। चाॅंउर के दाना मन कहूँ दिखत राहय, त उनला घोटनी म बने घोट के पीए के लइक बना लिए जाथे। इही ल घोटो या पेया कहे जाथे। ए ह थोरकुन अन्न म घलो पेट भरे के अच्छा साधन आय। ए ह सुपाच्य घलो जादा होथे।
पसिया-- कुछ लोगन चाॅंउर ल जादा पानी म रांध के वोकर पानी जेला पसिया कहिथन, वोला निथार दथें। निथारे के ए प्रक्रिया पसाना कहे जाथे, अउ ए पसाये ले निकले मण्ड ल पसिया कहे जाथे। ये ह सबले जादा सुपाच्य होए के संगे-संग पौष्टिक घलो होथे ।
घोटो अउ पसिया म नून डार दिए जाय त ए ह Oral rehydration खातिर अति उत्तम कार्य करथे। डॉ. यदु कहिथें- 'मैं अपने चिकित्सा अभ्यास में इसका प्रयोग करता हूँ। अतिसार वमन (उल्टी) के रोगी शरीर का जलीय अंश निकल जाने से अत्यधिक दुर्बल हो जाते हैं साथ ही उनकी अंतड़ियों से पाचक रस मल के साथ निकल जाने के कारण जठराग्नि अत्यन्त क्षीण हो जाती है। तब oral rehydration अथवा intraveinous rehydration दिया जाता है। इस प्रकार दिए जाने वाले rehydration में पौष्टिकता अत्यल्प होती है। यदि रोगी मुख मार्ग से ले सकता हो तो पेया या मण्ड नमक डालकर देने से रोगी की स्थिति से शीघ्र सुधार होता है और पाचन की समस्या भी नहीं होती।'
आवश्यकता के मुताबिक ही आविष्कार होथे-
छत्तीसगढ़ उष्ण कटिबंधीय राज्य आय, इहाँ के निवासी मन जादा करके खेती-किसानी ले जुड़े हें। आदर्श विधि ले जेवन बनाना अउ वोकर उपयोग करना इहाँ के जीवन शैली संग मेल नइ खावय। बिहनिया ले संझा तक खेत खार म खटने वाला मनखे ताजा गरमा-गरम जेवन के व्यवस्था कइसे कर सकथे, एकरे सेती वोहा अपन जीवन पद्धति के अनुरूप वैकल्पिक व्यवस्था कर लेइस। बोरे अउ बासी ह वोकर वैकल्पिक व्यवस्था बनिस. सैद्धांतिक रूप ले बासी अन्न के खवई ल निषिद्ध माने जाथे, फेर ए सिद्धांत ह बोरे अउ बासी म लागू नइ होवय। भात ल गरम ही खाना चाही। ठण्डा हो जाय के बाद वोकर स्वाद अउ पौष्टिकता दूनों कम हो जाथे, काबर ते उंकर जलीय अंश सूख जाथे। कहूँ भात ठण्डा होय लागे उही बेरा म वोमा बने अकन पानी डार दिये जाय त वोमा विशिष्ट स्वाद अउ पौष्टिकता के निर्माण होथे। एमा नून, गोंदली डार के अचार, चटनी या साग-भाजी संग खाये म गजबेच स्वादिष्ट होथे अउ एकर पौष्टिकता घलो बने रहिथे। एमा दही या मही डार के खाए ले अउ स्वादिष्ट हो जाथे।
भात ल पानी म बोरे ले वो हा बोरे बनथे अउ छः घंटा ले जादा बेरा बीत जाय म इही बोरे ल ही बासी कहे जाथे। बासी म चाॅंउर के fermentation होए के सेती खमीर उठथे, तब वोमा थोकन खट्टापन आ जाथे। तब ए हा अउ जादा सुपाच्य अउ ऊर्जादायक बन जाथे। एकरे सेती छत्तीसगढ़ म बासी खवई ल प्राथमिकता दिए जाथे।
बोरे या बासी खाये ले प्यास कम लागथे। एकर ले सिद्ध होथे के बासी पुनर्जलीकरण के उत्तम साधन आय. लू म गोंदली (प्याज ) के उपयोगिता ले सबो झन परिचित हावन। हमन देखे हावन के बासी खवइया कमइया या श्रमिक के कार्यक्षमता जादा च होथे।
ए ह अनुभव सिद्ध सत्य आय के, 'बासी ह सड़े होय जेवन नहीं, भलुक अति उत्तम खाद्य प्रसंस्करण आय।'
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Sunday, 26 March 2023
कोंदा भैरा के गोठ... एक प्रयोग
सोशलमीडिया म कॉलम लेखन के प्रयास//
** कोंदा-भैरा के गोठ **
वइसे तो मैं रायपुर ले निकलइया दैनिक अखबार नव भास्कर, तरुण छत्तीसगढ़, अमृत संदेश मन म साप्ताहिक स्तंभ या कॉलम गजब लिखत रेहे हौं. साप्ताहिक छत्तीसगढ़ी सेवक, इतवारी अखबार अउ मासिक 'मयारु माटी' म घलो थोर-बहुत लिखे के उदिम होय रिहिसे, फेर सोशलमीडिया म रोज के लिखना ह नवा अनुभव अउ प्रयोग आय.
वइसे दैनिक 'राष्ट्रीय हिन्दी मेल' म कुछ दिन तक 'तुतारी' शीर्षक ले रोज लिखे के उदिम घलो करत रेहेंव, जेन वो अखबार के पहला पृष्ठ म पहला कालम के सबले नीचे के भाग म छपय. फेर वो लिखई म अखबार के संपादक अउ मालिक के राजनीतिक विचारधारा अउ संबंध के सुरता घलो राखे बर लागय, तेकर सेती मन के बात लिखना ह मुश्किल कस जनावय. एकरे सेती तीन-चार महीना के पाछू लिखना बंद कर दिए रेहेंव.
जबकि सोशलमीडिया ह तो 'अपन हाथ जगन्नाथ' बरोबर हे. जस मन म विचार आवय, लिख लौ, फेर एहू मा मोर संग हर वर्ग के लोगन जुड़े हें. राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, व्यवसायी, गृहस्थ, छात्र आदि सबो किसम के लोगन.
वइसे तो मैं सोशलमीडिया म रोज के चार डांड़ के एक नान्हे कविता संग संदर्भित फोटो पोस्ट करे के उदिम घलो करत रेहेंव, जेला लोगन गजब सॅंहरावत रिहिन हें, फेर एकर मन के विषय कोनो परब, तिहार या विषय विशेष ही राहत रिहिसे. कतकों अइसन विषय अउ घटना हे, जे मन एमा संघर नइ पावत रिहिसे.
एक दिन अखबार म पढ़े बर मिलिस, के हमर इहाँ के एक प्रतिष्ठित राजनीतिक मनखे ह दूसर राज्य म जाके उहाँ के महतारी भाखा के मान बढ़ावत हे. मोला सुरता हे, ए उही मनखे आय, जेकर जगा हमन हमर महतारी भाखा ल आठवीं अनुसूची म शामिल करे खातिर संसद म बात रखे खातिर वोकर जगा गोहराए रेहेंन, तब वो ह हमन ल लंदर-फंदर जवाब दे के टरका दिए रिहिसे. तब हमन वो बखत वोकर ए व्यवहार के निंदा करत रायपुर के अखबार मन म नंगत के समाचार छपवाए रेहेन. आज जब अखबार म वोकर दूसर राज्य के महतारी भाखा खातिर उमड़त मया ल देख के मोला थोक गुस्सा असन लागिस. गुनेंव- अइसन राजनीतिक दुमुंहा मन बर कुछू सोंटा वाले गोठ घलो होना चाही. तब मन म विचार आइस, के सोशलमीडिया म एकाद कुछ शब्द म अपन बात कहे वाले गोठ लिखना चाही.
गूगल महराज के कृपा ले एक ठन कार्टून मिलिस, जेमा अइसे-तइसे कर के लिखेंव -'कोंदा-भैरा के गोठ' अउ वोमा अपन मन म उठत बात ल लिख के सोशलमीडिया के जम्मो प्लेटफार्म म ढील दिएंव.
संयोग ले वो दिन (26 फरवरी 2023) छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के वार्षिक जलसा रायपुर के दूधाधारी संत्सग भवन म होवत रिहिसे. चारों मुड़ा के छत्तीसगढ़ी प्रेमी मन जुरियाए रिहिन हें. मोर वो पोस्ट के गजब तारीफ करीन अउ ए उदिम ल लगातार लिखे के बात कहीन. कतकों झन फोन अउ मैसेज घलो करीन. आज ए उदिम ल एक महीना पूरगे. चारों मुड़ा ले लोगन के सुग्घर-सुग्घर प्रतिक्रिया आवत हे, तेकर सेती जनावत हे, के ए ह अभी अउ लिखाही. फेर के दिन लिखाही तेकर भरोसा नइए. काबर ते सोशलमीडिया के प्लेटफार्म म विविध आचार-विचार के लोगन जुड़े हें, सबो के मन के अनुरूप विषय खोजई अउ एकरो ले जादा कमती ले कमती शब्द म अपन बात रखना थोरिक मुश्किल जनाथे. काबर ते लोगन ए प्लेटफार्म म लंबा-चौड़ा पोस्ट ल पढ़े बर ढेरियाथें.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Friday, 17 March 2023
कला संस्कृति रखवार मन्तराम यादव
1 जुलाई जनमदिन//
छत्तीसगढ़ी कला-संस्कृति के जोखा करइया डाॅ. मन्तराम यादव
छत्तीसगढ़ी कला-संस्कृति खातिर जबर बुता करइया डाॅ. मन्तराम जी यादव के पूरा जिनगी भर के जीवन-दर्शन अउ कारज ल देखथौं त मोर मुंह ले ये चार डांड़ अपनेच अपन निकल परथे-
बिन घिसाए लगय नहीं माथ म ककरो चंदन
न होवय पूरा एकर बिन 'भोले' के पूजा-वंदन
अइसनेच होथे जिनगी घलो महके खातिर
धरथे जे संघर्ष के रद्दा होथे वोकरे अभिनंदन
गाँव देवरहटा (लोरमी) जिला मुंगेली के सियान बइहा राम जी यादव अउ महतारी बतसिया देवी के घर 1 जुलाई सन् 1951 के जनमे डाॅ. मन्तराम जी यादव बहुआयामी व्यक्तित्व के कर्मयोगी मनखे आय. मैं जेन किसम के लोगन ल पसंद करथौं, आगू के डांड़ म सुरता, सरेखा करत गिनथौं ठउका वइसने. मोर मानना हे- 'हम अपन कला-संस्कृति के उज्जर रूप के रखवारी करत वोकर बढ़ोत्तरी करे के उदिम करीन, त एकर बर सिरिफ कागज-कलम भर म लिखे ले जादा भुइयॉं म उतर के ठोसहा बुता करे बर लागही.' मोर ए मानक म डाॅ. मन्तराम जी ठउका फिट बइठथें. उन कागज-कलम म जतका लिखीन, वोकर ले जादा मैदान म उतर के बुता करीन. चारों खुंट, चाहे सामाजिक बुता होय, सांस्कृतिक बुता होय या फेर जनजागृति के आने अउ कुछू बुता. उन सबोच म कर्मयोगी के भूमिका म भुइयॉं म भीड़े दिखीन.
मैं जब दैनिक छत्तीसगढ़ के साप्ताहिक पत्रिका 'इतवारी अखबार' के संपादन कारज करत रेहेंव तभे ले उंकर संपादन म हर बछर छपइया पत्रिका 'रऊताही' के संग्रहणीय अंक मनला देखत अउ पढ़त रेहेंव. मन्तराम जी के अनन्य सहयोगी साहित्यकार कृष्ण कुमार भट्ट 'पथिक' जी के माध्यम ले उंकर जम्मो कारज अउ गतिविधि मन के जानकारी घलो मिलत राहय. फेर उंकर संग प्रत्यक्ष भेंट तब होइस, जब मैं शारीरिक अस्वस्थता के सेती घर म ही रहे लगेंव. उन वरिष्ठ साहित्यकार चेतन भारती जी संग खुद मोर ठीहा म पधारे रिहिन.
उंकर संग मेल-भेंट अउ गोठबात ले मन-अंतस जुड़ाय कस लागिस. काबर ते आज अइसन निष्काम कर्मयोगी मनखे बिरले देखब म आथे, जेन बिना कोनो स्वारथ के अपन उदिम म सरलग भीड़े रहिथे. मन्तराम जी संग गोठबात म उंकर अउ कई रुचि मन के जानबा घलो होवत गिस. जइसे उन अपन निजी समाज, जेन एक किसम के परंपरा के रूप म बंधुआ प्रथा के अंग बने राहय, वोकर ले मुक्ति के अंजोर बगराईन, उनला बंधुआ प्रथा ले मुक्त कराइन. अंचल के पिछड़ा कहे जाने वाला लोगन ल एकफेंट करे खातिर सम्मेलन करवाईन, अपन जनमभूमि गाँव देवरहटा म सन् 1993 ले सरलग अहीर नृत्य अउ शौर्य प्रदर्शन के कारज इहाँ के प्रसिद्ध परब 'छेरछेरा' के दिन करवावतेच हें, एमा उन साहित्यिक अउ सांस्कृतिक प्रतिभा मन के हर बछर सम्मान घलो करथें. उन व्यक्तिगत रूप ले आध्यात्मिक परानी आयॅं, तेकर सेती कतकों किसम के धार्मिक आयोजन घलो करवातेच रहिथें.
आज उंकर जनमदिन के बेरा म उंकरेच लिखे ए चार डांड़ के सुरता करत उनला गाड़ा-गाड़ा बधाई संग शुभकामना पठोवत हौं, के उन अपन सोनहा अउ प्रेरणादायी जिनगी के शतक पूरा करॅंय-
काॅंटे ना हो राहों में
ताकत ना हो बाहों में
सपने ना हो आंखों में
तो क्या जाने जीने का मजा.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811