Wednesday, 29 November 2023

गोरसी तापत अंगाकर खाए के मजा

सुरता//
गोरसी तापत अंगाकर खाए के मजा
    तब जाड़ ह हमर मन बर तिहार बरोबर जनावय. अघ्घन-पूस दू महीना तो गजबे निक जनावय. हमर गाँव-गंवई म ए बेरा ह धान मिंजई के बेरा होथे. धान मिंजई माने बेलन खेदना अउ बीच-बीच म बेलन ले उतर के चारों मुड़ा बगरे पैर म उलानबाटी खेलना.
    गाँव म किसान-किसानीन, बनिहार-कमईया सबोच के दिनचर्या बियारा म पैर बगराना, बेलन फॉंदना, कलारी म खोभा मारना, धान के दाना मन झरझें, त पैरा ल झर्रावत हेरना अउ पैरावंट म गॉंजत जाना, पैर के झरे जम्मो धान मनला सकेल के एक तीर म रास मढ़ाना, फूल-पान नरियर चघा के हूम-धूप देना. तेकर पाछू फेर वोला काठा म राम ले लेके सरा (1 ले 20) तक के गिनती गिनत नापना. एक सरा माने एक खॉंड़ी पूर जाय त फेर एक बाजू म वोकर खातिर एक मुठा धान के कुढ़ेना मढ़ा देना. अइसने एकक मुठा करत बीस मुठा हो जावय, त फेर एक गाड़ा (बीस खॉंड़ी) के वो सबो कुढ़ेना ल एक तीर सकेल दिए जाय.
    घर के सियान- सियानीन मन तो अतकेच म चिथियाय राहंय, फेर हमन कूद-फॉंद अउ एती-वोती धूम-धड़ाका म राहन. सूत के उठन तहाँ ले बियारा के आगू म गड्ढा खान के बनाए कौड़ा म आगी तापना. थोकिन चरचराए असन लागिस तहाँ ले मुखारी चगलत तरिया जाना, फेर उहाँ नहाए के पहिली घठौंदा म बगरे चिरी मनला सकेल के भुर्री बारना. भुर्री के दगत ले धरारपटा तरिया म कूद के निकलना अउ झटपट कपड़ा पहिर के फेर भुर्री तापना.
   घर म आवन त घीव चुपरे अंगाकर रोटी बर झपेट्टा मारन. अउ देखन त अंगाकर के फोकला अतका मन हमर बॉंटा म राहय अउ वोकर जम्मो गुदा मनला हमर बिन दॉंत के भोभला बबा खातिर अलगिया दे राहय. हमन बस गोरसी तापत फोकला अतका ल झड़कन तहाँ फेर स्कूल के बेरा हो जावय.
    संझा स्कूल ले लहुटे के पाछू फेर बियारा म धान मिंजाय बर बगरे पैर म चलत बेलन म चढ़ना, बीच-बीच म उलानबाटी खेलना चालू हो जावय. कभू-कभू बियारा म गाड़ा ल पैरा म तोप के रतिहा के रखवारी करइया मन बर बनाए कुंदरा म खुसरना, उहाँ माढ़े जिनिस मनला देखना-हुदरना बस अतकेच म बेरा पहा जावय.
    मुंधियार अस जनावय त फेर घर कोती जाना, चिमनी अंजोर म गुरुजी मन घर म लिखे-पढ़े बर कुछू अढ़ोय राहय तेला सिध पारन. फेर रतिहा बियारी के पाछू डोकरी दाई जगा कहानी सुनना. सबो भाई-बहिनी गोरसी के आंवर-भांवर बइठ के कहानी सुनन. एक झन कोनो ह हुंकारू देवय. हमर तो कहानी सुनत ही नींद पर जावय, कतका जुवर कोन ह हमला खटिया म ढनगा दिस तेकरो गम नइ मिलय.
   इतवार के छुट्टी के दिन के दिनचर्या ह थोरिक अलगे राहय.  ए दिन बिहनिया गोरसी तापत अंगाकर रोटी दमोरे के पाछू खेत डहार जावन. कोनो मिठहूं असन बोइर के पेड़ म चढ़ना, कोनो पाके असन दिखत बोइर वाले डारा ल हलाना, फेर खाल्हे म उतर के पेंठ के दूनों खीसा म खसखस के बोइर ल भरना तहाँ ले खेत म उल्होए तिंवरा भाजी ल सुरर-सुरर के हकन के कोल्हान नरवा कोती बढ़ जावन. कभू कभू तो सबो संगी तिंवरा भाजी ल रॉंध के खाए खातिर तेल-फूल जइसे जम्मो जिनिस मनला अपन-अपन घर ले धर ले राहन अउ नरवा खंड़ म आगी सिपचा के वोला रॉंध के खावन. ए किसम वो छुट्टी के दिन हमर मन के तिंवरा भाजी अउ बटकर के पिकनिक पार्टी हो जावय.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर

Saturday, 18 November 2023

कोंदा भैरा के गोठ-9

कोंदा भैरा के गोठ-9

-कतकों लोगन अभी घलो सुवा गीत ल नारी विरह के गीत कहिथें जी भैरा.
   -अइसन कहइया मन छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति ले अनचिन्हार होथें जी कोंदा.
   -अइसे का?
   -हव.. नारी विरह के गीत होतीस, त एला आने विरह गीत मन असन बारों महीना नइ गाए जातीस.. सिरिफ कातिक महीना के अंधियारी पाख म गौरा-ईसरदेव बिहाव तक ही काबर गाये जाथे? असल म ए ह गौरा-ईसरदेव बिहाव के संदेशा गीत आय.
   -अच्छा... तुंहर इहाँ कब ले चालू होथे ए सुवा गीत के चलन हा?
   -हमर गाँव म तो कातिक अंधियारी पंचमी ले चालू होथे, इही दिन गौरा-ईसरदेव परब खातिर फूल कुचरे के नेंग घलो होथे.
   -अच्छा.. हमर इहाँ तो फूल कुचरे के नेंग ह एकादशी के होथे जी.
   -कतकों जगा अलग-अलग मान्यता देखे ले मिलथे. हमन जइसे गौरा-ईसरदेव बिहाव ल कातिक के अंधियारी पाख म अमावस के मनाथन त कतकों जगा कातिक के अंजोरी पाख म पुन्नी के दिन मनाथें.
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-कातिक जोहार जी भैरा. कते डहार ले आवत हस ते?
   -जोहार जी कोंदा.. एदे लइका मनला आज ले कातिक नहाए ले जाही कहिके उठा के आवत हौं. हमन लइकई म कातिक नहाए ले जावन तेकर सुरता हे नहीं जी संगी?
   -रइही कइसे नहीं संगी.. पारा भर के नोनी मनला मुंदरहा ले उठावन तहाँ तरिया जावन.
  -हव जी उंकर मन बर फूल अउ बेलपान तो हमीं मन सकेलन, फेर उंकर मन के नाहवत ले तरिया पार के चिरी-उरी अउ सुक्खा असन दिखत लकड़ी मन ल सकेल के भुर्री बारन.
  -सही आय संगी, नोनी मन नहा-धो के थोकन भुर्री ताप लेवंय तहाँ ले महादेव के पूजा करय अउ भोग-परसाद चघावय, ते मनला तो फेर हमीं मन झड़कन ना.
    -हव जी.. अउ संझा बेरा जब नोनी मन सुवा नाचे बर जावंय, तब वो मनला मिले चॉंउर-दार ल धरे बर झोला घलो तो हमीं मन धरे राहन ना.
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-चल बजार डहार नइ जावस जी भैरा.. देवरिहा दीया बाती के लेन-देन करे बर?
   -मैं तो हमरे गाँव म बिसा डारथौं जी कोंदा.. कुम्हार पारा जाथौं अउ जतका लागथे बिसा लाथौं. फेर हमर इहाँ तो तेरस ले सुरहुत्ती तक के नेंग वाले दीया मनला नवा चॉंउर पिसान के बनाथन. तब एती-तेती कहाँ भटकबे?
   -वाह भई.. फेर बजार म तो रंग-रंग फैशन वाला आथें जी संगी.. बने छाॅंट के सुघ्घर असन जिनिस ले म निक लागथे.. चीन-ऊन जइसन आने देश ले घलो आथें कहिथें. आज के लइका मन उही मन ला भाथें.
   -मोला अपन देश-राज म बने जिनिस ही सुहाथे जी संगी.. हमरे तीर-तखार के लोगन दू पइसा कमावय बपरा मन.. कहाँ परदेशी मन के मोह म परबे? अउ ऐशन-फैशन वाले दीया-बाती चाही, त आजकाल महिला समूह वाली माईलोगिन मन एक ले बढ़ के एक गोबर के मयारुक दीया बनावत हें, एकर मन जगा बिसा लेना.. कहाँ आने देश वाले मन जगा पइसा डारे बर जाबे.
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-तुंहर इहाँ के बहुरिया मन आजकाल के नवा चलन वाला उपास-धास रहिथे नहीं जी भैरा?
   -कइसन ढंग के नवा चलन वाला जी कोंदा?
   -अरे.. काली सिनेमा उनिमा वाले मन असन करवाचौथ के नइ रिहिन जी.
   -टार बुजा ल.. कइसे गोठियाथस तैं ह.. अरे भई हमर इहाँ तो एकर ले बढ़ के तीजा के उपास रहिथे तब ए सब नवा-नवा चोचला काबर?
   -हमर इहाँ के नेवरिन मन तो जहाँ कोनो ल कुछू नवा चलागन म देखिन तहाँ उहू मन उम्हियाय परथें.
   -ए सब हीनता अउ छोटे पन के चिन्हारी आय. जे मन अपन आप ल छोटे अउ पिछड़े समझथें ना उही मन दूसर के पिछलग्गू बने म अपन गरब समझथें. फेर मोर तो कहना हे संगी- जिहां तक सम्मान के बात हे, त सबो के संस्कृति अउ परंपरा के सम्मान करना चाही, फेर जीना चाही सिरिफ अपन संस्कृति ल.. काबर ते सिरिफ अपन संस्कृति ही ह आत्मगौरव के बोध कराथे, जबकि दूसर के संस्कृति ह गुलामी के रद्दा देखाथे.
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-अब हमर सब परब-तिहार मन व्यापारी मन के चकाचौंध म बूड़े विज्ञापन के पाछू परके मॉंहगी-मॉंहगी जिनिस बिसाय भर के चिन्हारी बनत जावत हे जी भैरा.
   -तोर कहना महूं ल वाजिब जनाथे जी कोंदा. अब देखना हमर ए धनतेरस परब ल टीवी पेपर मन के विज्ञापन अउ मुहुर्त मनला देखबे त अइसे जनाथे जइसे ए ह सिरिफ देखावा, चढ़ावा अउ फैशन वाले जिनिस मन के बिसाय के मुहुर्त वाला परब भर आय.
   -सिरतोन आय संगी.. जबकि ए ह असल म हमर खेत म मुस्की ढारत खड़े अन्नपूर्णा दाई संग पेड़ पौधा अउ प्रकृति के पूजा के परब आय. धनतेरस के दिन किसान मन खेत म खड़े धान-पान ल सकेले के पहिली वोकर पूजा करथें, वो मन मानथें के अब हमन जम्मो लोगन खातिर बछर भर के जीवकोपार्जन खातिर अन्न के व्यवस्था कर डारेन. ए बेरा वो ह अपन खेत के मेड़ म पौधा घलो लगाथे. प्रकृति के आभार जताथे. अउ फेर सुरहुत्ती देवारी मान के धान लुवई के शुरुआत करथे.
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-तुंहर डहार देवरिहा लिपई-पोतई ओसरगे तइसे जनावत हे जी भैरा?
   -हव जी कोंदा.. अब मड़ई के रतिहा खातिर नाचा लगाए बर जाना हे.
   -वाह भई.. पाछू बछर वाले मन के नाचा तो बड़ मयारुक रिहिसे, फेर उही मनला नइ लगा लेतेव.
   -आजकाल के लइका मन नवा-नवा कहिके गोहराथें गा.
   -हाँ ए बात तो हे. फेर इहू बछर मातर के दिन ही मड़ई मढ़ावत हौ ना?
   -हहो.. सुरहुत्ती के दिन मड़ई बना के जलदेवता के आशीष खातिर कुआँ तीर मढ़ा देबोन, फेर मातर के दिन गाँव के सब सियान मन बाजा-रूंजी संग परघाय बर आहीं तब फेर वोला जगाए के नेंग कर के मातर ठउर म लेग जाबोन.
   -हहो.. हमरो डहार अइसने करथें, सुरहुत्ती के दिन मड़ई ल बनाए जाथे अउ मातर के दिन फेर वोला जगाए जाथे.
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-चुनावी शोर शराबा के बीच हमर अबूझमाड़ के मलखम्ब उस्ताद मन के एक सुंदर अउ गरब करे के लाइक खबर आए हे जी भैरा.
   -कइसन गढ़न के खबर जी कोंदा?
   -हमर देश के प्रतिष्ठित 'इंडिया गॉट टैलेंट' प्रतियोगिता ल जीते के. एकर पहिली घलो ए मन देश के अउ अबड़ अकन प्रतियोगिता मन म अपन कला के जौहर देखावत कतकों पदक पाए रिहिन हें.
   -वाजिब म ए ह संहराय के लाइक बात आय संगी. अबूझमाड़ जइसन क्षेत्र ले निकल के पूरा देश भर म अपन प्रतिभा के परचम लहराना अनुकरणीय हे.
   -हव जी.. अउ एकर ले इहू बात साबित होथे के हमर गाँव-गंवई के प्रतिभा मनला सही अवसर अउ मार्गदर्शन मिल जाय, त उन कोनो भी क्षेत्र के लोगन ले हर किसम के प्रतियोगिता म बीस ही साबित हो सकथें. ए मलखम्ब के प्रदर्शन म मनोज प्रसाद, पारस यादव, नरेंद्र गोटा, युवराज सोम, फूलसिंह सलाम, श्यामलाल पोटाई, सलाम, राकेश वरदा, मोनू नेताम, राजेश कोर्राम, शुभम पोटाई, अजमत फरीदी, समीर शोरी सुरेश पोटाई शामिल रहिन, जिनला 20 लाख रुपिया नगद के संग आर्टिगो कार मिलही.
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-आज हमर इहाँ विधानसभा चुनई के पहला चरण के मतदान हे जी भैरा. ए बखत तैं काकर सरकार बनावत हावस?
   -उही ल तो गुनत हौं जी कोंदा. एदे सबो पार्टी वाले मन के घोषणा पत्र मनला खंधोलत हावंव, फेर ए मन म के कोनोच म इहाँ के जनभाखा छत्तीसगढ़ी के माध्यम ले जम्मो शिक्षा दे अउ राजकाज चलाय के बात नइ लिखाय हे.
   -हव जी उही ल महूं खोजत रेहेंव.. का-का फोकट म बॉंटे जाही, काला कामे संघारे जाही ते मन तो लिखाय हे, फेर इहाँ आत्मा भाखा अउ संस्कृति खातिर काकरोच चेत नइए तइसे जनाइस.
   -मैं तो शुरू ले कहिथौं संगी- राष्ट्रीय दल मन के भरोसा हमर अस्मिता के बढ़वार ह मुसकुल जनाथे. काबर ते एकर मन के मापदंड क्षेत्रीय अस्मिता के स्वतंत्र चिन्हारी कभू नइ हो सकय. एकर बर तो एक मजबूत क्षेत्रीय दल ही चाही, फेर अभी इहाँ जतका अइसन  दल हें, बौद्धिक अउ सैद्धांतिक रूप म कोनोच ह ए विषय म पोठहा नइ जनावय.
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-सुरहुत्ती के जोहार जी भैरा.. कोन कोती के जवई होवत हे?
   -जोहार जी कोंदा.. एदे मंडल पारा कोती देवरिहा बधई दे खातिर जावत हौं गा.
   -बधाई दे बर ते बधई दे बर?
   - तिहरहा शुभकामना देथे तइसने गा.
   -त एला शुद्ध रूप ले 'बधाई' कहना चाही. 'बधई' कहे म अलकरहा हो जाही.
  -अइसे का?
   -हहो.. हमर छत्तीसगढ़ी भाखा म बधई मतलब पूजवन देना होथे. जबकि शुभकामना बर बधाई कहे जाना चाही. वइसे बधाई ह छत्तीसगढ़ी के शब्द नोहय, फेर अइसन कतकों शब्द हे, जे मनला चलन म सरलग बउरे जावत हे. त ए मनला जस के तस बउरे जाना चाही. बरपेली छत्तीसगढ़ीकरण करे के चक्कर म अर्थ के अनर्थ हो जाही.
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-हमर देश के राजनीति म किसान मन बर कभू ठोसहा नीति बना के उनला सत्ता पाए के केंद्र म नइ राखे जावत रिहिसे जी भैरा.
   -ए बात तो वाजिब आय जी कोंदा एकरे सेती तो देश के चारों मुड़ा ले किसान मन के आत्महत्या करे के संग खेत-खार ल बेच-भांज के शहर डहर पलायन करे के खबर सरलग आवत राहय, फेर ए दरी हमर छत्तीसगढ़ म ए नजारा ह बदले असन जनावत हे.
   -हव जी संगी.. पहिली बेर छत्तीसगढ़ के राजनीति म किसान मन केंद्र बिंदु म हावंय. सबोच पार्टी वाले मन उनला खुश करे के उदिम म भीड़े हें.
  -हव जी.. पहिली किसान मन सरकारी उपेक्षा ले हलाकान होके खेती मनला बेचे के ही बुता करंय, जेमा अन्ते ले अवइया व्यापारी अउ धन्नासेठ मन काबिज हो जावत रिहिन हें, फेर अब नजारा ह आने जनाथे.
  -सही आय.. किसान मन बर अभी के नीति अउ उदारवादी बेरा ह हरित क्रांति ले बढ़ के सोनहा क्रांति कस जनावत हे.
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-हमर इहाँ सुरहुत्ती के रतिहा जेन जुआ खेले के चलन दिखथे, ए ह आय तो अंधविश्वास ही, फेर सैकड़ों बछर ले अइसन चलत आवत हे जी भैरा.
   -हव जी कोंदा.. हमूं मनला हमर बूढ़ी दाई मन जुआ खेले बर काहंय, उन काहंय- आज के रतिहा जुआ नइ खेलबे त वो जनम म छूछु-मुसवा बन जाबे.
   -हाँ.. सबो घर के सियान मन अइसने गढ़न के काहंय, तेकरे सेती तो ए बखत के जुआ ह महामारी कस रूप बगरगे हवय. अउ तैं जानथस हमर छत्तीसगढ़ म अइसन जुआ के एक रूप जेला खड़खड़िया कहिथन एकर चलन ह अढ़ई हजार बछर पहिली ले चलत आय के प्रमाण मिले हे.
   -अच्छा!
   -हहो.. राजधानी रायपुर ले 32 किमी दुरिहा खारून नदिया के तीर म जेन तरीघाट हे ना उहाँ के जुन्ना बस्ती के डीह (टीला) के खनई म अइसने माटी के पके वाले गोटी (लुडो) मिले हे, जेला पुरातत्व विभाग ह उहेंच बने संग्रहालय म रखवाय हे.
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-ए बखत के चुनई म जे मन जीतहीं ते मनला बड़े आदमी बना देबो काहत हें जी भैरा.
   -अच्छा.. फेर हमर इहाँ तो बड़े आदमी मन के देखे सबके पलई चमकथे जी कोंदा, तब भला कोन बड़े आदमी बनइया मनला चुनहीं, फोकट म मरे बर, उंकर मार-गारी खाए बर?
   -अइसे..?
   -हहो.. हमन ला बड़े आदमी नहीं, भलुक देवता मनखे चाही जी संगी देवता मनखे.. बड़े आदमी मन तो न कुछू काम करय, न कुछू कारज.. वो मन तो लोगन संग सिरिफ गारी-गुफ्तार अउ पटकिक-पटका म मगन रहिथें. कभू काकरो काटे अंगरी तक म नइ.... देखथस नहीं हमर गाँव-गंवई के बड़े आदमी मनला, कइसे अति करथें तेला?
    -सिरतोन आय संगी.. हमला जनता के सुख-दुख म खांध म खांध जोर के रेंगइया देवता मनखे के चुनाव करना हे जी, जेन ह सही अरथ म जनता के सेवा कर सकय, लोगन के सच्चा प्रतिनिधि बन सकय.
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-हमर इहाँ लइका के जनम धरे के तुरतेच बाद ओकर संग जुड़े गर्भनाल ल तुरते काटे के परंपरा हे जी भैरा.
   -हव जी कोंदा.. देखे तो अइसने हावन.
   -फेर आस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय स्वास्थ्य अउ चिकित्सा अनुसंधान परिषद के एक शोध म ए बताए गे हवय के गर्भनाल ल तुरते काटे के बदला कम से कम दू मिनट अगोरा कर के काटे ले जनम लेवइया लइका के जीवन के संभावना ह बाढ़ जाथे.
   -अच्छा!
   -हहो.. डॉ. अन्ना लेने सीलडर अउ प्रोफेसर लिसा एस्की के शोध ले ए जानबा होए हे, के गर्भनाल ल देरी म काटे ले होवइया लइका के शरीर म रेड ब्लड सेल्स ह 60 प्रतिशत तक बाढ़ जाथे अउ वॉल्यूम म 30 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी होथे. एकर ले जनम धरे के तुरते बाद होवइया मृत्यु ल रोके के संभावना ह 91 प्रतिशत तक बाढ़ जाथे.
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- गाँव ले तिहार मान के आ गेव जी भैरा?
   -कहाँ जी कोंदा.. ए बछर शहर म घर रखवारी के बुता मोरे रिहिसे, तेकर सेती गाँव नइ जा पाएंव.
   -अइसे?
   -हहो.. अब शहर म घलो घर बनवा परे हन त इहों देवता-धामी मन के आगू म दीया-बाती करे बर लागथे ना जी.
   -हाँ ए बात तो हे संगी.. फेर परब-तिहार ह गाँवे म निक जनाथे जी. वो कहिथें ना.. हमर देश के आत्मा गाँव म बसथे कहिके तेन ह सिरतोन आय. काबर ते गाँव म ही हमर परंपरा अउ संस्कृति ह जीयत हे.
   -हव जी सही आय.. हमर परब-तिहार तो गाँवेच म जीयत हे, शहर म तो भइगे फट-फट फट-फट फटाका फोरिस तहाँ ले झर गे. अउ जादा होगे त टूरा पिला मन दारू पी के लड़ई-झगरा म माते रहिथें .. अतकेच ह शहर के तिहार आय.. न ककरो संग जोहार-भेंट न ककरो संग निक-बोल.
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-अइसने जुड़हा दिन-बादर म गोरसी तापत अंगाकर रोटी दमकाय म गजबे मजा आथे जी भैरा.
   -सिरतोन आय जी कोंदा.. मार चर्रस चर्रस सेंकाय वाले अंगाकर के फोकला ल झड़के म अउ निक लागथे.
   -हव जी.. फेर उमर के संग अब अंगाकर भीतर के गुदा ल ही खा सकथन.. फोकला ल चाबे अस करबे त दांत ह गवाही दे असन नइ करय.
   -मोरो उही हाल जनाथे संगी.. लइकई म फोकलाच फोकला ल बने घी लगा के सोंधे-सोंध झड़कन अउ बबा ल गुदा मनला देवत जावन.
   - फेर अब तइहा के बात ल बइहा लेगे असन होगे संगी.. उमर के संग सब उल्टा होगे हे. गुदा ल हमन झड़कथन अउ बने सोंधे-सोंध फोकला ल नाती डहार अमर देथन.
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-लोकतंत्र के महान परब म अपन भूमिका तो हमन निभा डारेन जी भैरा.. अब एकर परिणाम के अगोरा हे, ए बखत काकर भाग म राजयोग लिखाय हे ते.
   -हव जी कोंदा, फेर एक बात ऊपर तैं ह चेत करे हावस?
   -का बात ऊपर जी संगी?
   -अभी के चुनई म गाँव-गंवई के लोगन तो बढ़-चढ़ के मतदान करे हें, फेर शहरिया मन ढेरियाय असन दिखत हें.
   -अच्छा!
   -हहो.. अभी निर्वाचन आयोग ह मतदान प्रतिशत के जेन सूची जारी करे हे, तेकर मुताबिक शहरिया मन अल्लर परे असन वोट दिए हें. तेमा राजधानी रायपुर वाले मन तो सबले पिछवाय हें, इहाँ मतदान के सबले कम प्रतिशत हे.
   -मतलब जेन गाँव-गंवई के लोगन ल हमन पिछड़ा अउ अनपढ़ कहिथन, ते मन मतदान के जागरूकता देखाय म अगुवाय हें, अउ शहर के शेखचिल्ली मन पिछवाय हें.
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-हमर गाँव म तो मातर के दिन ही संझौती बेरा मड़ई के आयोजन हो जाथे, फेर धमतरी क्षेत्र म गंगरेल बॉंध तीर के दाई अंगारमोती के आशीष पाए के बाद ही मड़ई के उत्सव चालू होथे जी भैरा.
   -अइसे का जी कोंदा?
   -हहो.. अंगारमोती म हर बछर देवारी माने के बाद जेन पहला शुक्रवार आथे, उहीच दिन मड़ई भराथे. ए दिन इहाँ हजारों लोगन अंगारमोती दाई के आशीष पाए बर जुरियाथें. जे माईलोगिन मन संताए पाए के आस म आए रहिथें वो मन इहाँ हाथ म नरियर धरे मुड़ उघरा कर के ओरीओर सूत जाथें, तब उहाँ के पुजारी ह अंगारमोती दाई के संग अउ आने देवी देवता मन के डांग- डंगनी मनला धर के उंकर मन ऊपर ले उखरा पॉंव रेंगत नहाकथे. मान्यता हे, के एकरे ले वो जम्मो माईलोगिन मन के मनोकामना पूरा होथे. ए बेरा म आसपास के 52 गॉंव के देवी देवता मनला ल नेवता दे के अंगारमोती दाई के दरबार म बलवाए जाथे.
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Thursday, 26 October 2023

कोंदा भैरा के गोठ-8

कोंदा भैरा के गोठ-8

-आज बस्तर दशहरा ल बिन कोनो बाधा के मनाय खातिर काछन देवी ह अनुमति देही जी भैरा.. चलना काछन देवी के दरस करे बर नइ जावस?
    -काछन देवी.. ए ह का होथे जी कोंदा?
   -75 दिन चलइया विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के ए ह सबले महत्वपूर्ण विधान आय, जेमा काछन देवी ह आज कुंवार अमावस के कांटा के झूलना म बइठ के दशहरा मनाय के अनुमति देथे.
   -अच्छा.
   -हहो.. पनिका, मिरगान या माहरा समाज के कुंवारी नोनी ऊपर काछन देवी के सवारी आथे. पाछू बछर आठ साल के पीहू नॉव के नोनी ऊपर सवारी आय रिहिसे, इहू बछर उहिच नोनी ऊपर काछन देवी ह बिराजित होय हे, एकरे सेती कक्षा दूसरी म पढ़इया पीहू ह रोज संझा-बिहनिया देवी के पूजा-पाठ म लगे हे. आज वोला बेल के बड़े-बड़े कांटा ले बने झुलना म बइठारे जाही, जेमा बइठ के राजा ल फूल दे के दशहरा परब ल मनाय के अनुमति देही.
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-अभी नवरात म उपास-धास तो चलत होही जी भैरा?
   -हव जी कोंदा.. माता रानी के किरपा ले पूरा नौ दिन सक जाथौं.
   -अच्छा हे.. कई किसम के रोग-राई मन के नियंत्रण म उपास-धास ह फायदा के होथे.. अउ फरहार म का लेवत होबे?
   -चोबीस घंटा म एक पइत साबुदाना, सिंघाड़ा जइसन जिनिस मन ला ले के पानी उनी पी लेथौं जी संगी.
   -स्वास्थ्य विशेषज्ञ मन के कहना हे के साबुदाना अउ सिंघाड़ा जइसन जिनिस के बलदा मिलेट्स माने हमर इहाँ जेन कोदो, कुटकी, रागी जइसन मोटहा अनाज मिलथे ना अइसन मन के उपयोग करे जाय त ए ह शरीर खातिर जादा फायदा के हो सकथे.
   -अच्छा!
   -हव.. अइसने भाजी-पाला मन म घलो कोंहड़ा, रखिया जइसन फाइबर वाले जिनिस मन के उपयोग करे म कतकों किसम के रोग-राई मन घलो नियंत्रण म रइही.
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-हमर छत्तीसगढ़ म अइसन कतकों परंपरा हे, जे मन देश के अउ कहूँ भाग म देखब म नइ आय जी भैरा.
   -ए बात तो सिरतोन आय जी कोंदा.. अब देखना बस्तर दशहरा के ही विधान मनला काछन देवी ले कुवांर अमावस के अनुमति मिले के  बाद कुवांर अंजोरी एकम माने नवरात के पहला दिन जोगी बिठाई के रसम करे गिस.
   -अच्छा..
   -हव.. एमा सिरहासार भवन म 6 ×3 फुट के गड्ढा कोड़े जाथे, जेमा हल्बा जनजाति के लोगन ल मावली देवी के पूजा करे के बाद बइठारे जाथे. ए बछर आमाबल गाँव के 22 बछर के रघु ल जोगी के रूप म बइठारे गे हे, जे ह पूरा 9 दिन तक योगासन के मुद्रा म उही गड्ढा म बइठे रइही.
   -वाह भई.. अद्भुत हे हमर इहाँ के परंपरा अउ एकर साधक मन. जय मावली दाई.
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-पंचमी जोहार जी भैरा.
   -जोहार जी कोंदा.. आज पंचमी के तुमन कोन माता के पूजा करत हौ जी?
   -हमन तो इहाँ के जेन पारंपरिक पूजा विधि, प्रतीक अउ मान्यता हे तेकरे मुताबिक पूजा-सुमरनी करथन संगी.
  -अच्छा.. माने नौ दिन ले नौ माता मन के जेन परंपरा हे तेकर मुताबिक नइ करौ?
   -हमर इहाँ के परंपरा म सतबहिनिया माता के पूजा परंपरा हे. हमन पुरखौती बेरा ले इही दाई मन के पूजा- सुमरनी करत आवत हन. हाँ.. फेर अब कतकों लोगन जेन इहाँ के मूल परंपरा ले परिचित नइए वो मन जरूर नौ माता मन के मान्यता के मुताबिक चल लेथें.
   -अच्छा हे... सम्मान तो सबो के करना चाही जी, फेर जिहां तक जिए के बात हे, त सिरिफ अपन मूल संस्कृति ल ही जीना चाही.
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-दाई-ददा के सेवा ल भगवान के सेवा मान के उंकर जतन करे के बात ल पोथी-पतरा म पढ़े-सुने बर मिल जावत रिहिसे जी भैरा, फेर अभी मैं हमर गाँव के एक सीमा नॉव के नोनी ल घलो अपन सियान के देखरेख अउ सेवा खातिर अपन जम्मो सांसारिक सुख-सुविधा ल छोड़ के अइसने सेवा-जतन करत देखे हौं.
   -भागमानी मनला अइसन शिक्षा अउ संस्कार मिले रहिथे जी कोंदा. अपन निजी मोह-माया ले उबर के दाई-ददा के सेवा ह सबले बढ़ के परमारथ अउ देव सेवा के कारज होथे, एकरे सेती तो आज घलो हमन श्रवण कुमार के नॉव ल जानथन न.
   -हव जी.. भगवान गणेश ल घलो तो अपन महतारी-सियान ल पूरा दुनिया मान के उंकर तीन भांवर किंजर के पूजा करे के सेती प्रथम पूज्य के आशीर्वाद मिले रिहिसे.
   -सिरतोन आय संगी.. अपन जीयत दाई-ददा के सेवा ह सबो जिनिस खातिर फलदायी होथे. अइसन सेवा करइया के नॉव ह जुग-जुग बर अम्मर हो जाथे.
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-ए बछर हमर गाँव म के घर जंवारा बोए हें जी भैरा?
   -याहा... ए कुवांर नवरात म कहाँ जंवारा बोथें जी कोंदा.. हाँ.. चइत वाले म बोथें भई बदना बदे वाले मन.
   -अरे हव जी.. मोरो चेत ह कती अभर गे रिहिसे ते.
   -हमन लइका रेहेन त जंवारा सरोए के दिन भंइसासुर बनन तेकर सुरता हे नहीं जी?
   -रइही कइसे नहीं संगी.. मार तरिया के चिखला-माटी ल देंह भर बोथ के तरिया म जामे नार-ब्यार मनला मुड़ म बोहे राहन अउ जंवारा सरोए बर जावत लोगन के आंवर-भांवर  कूदत राहन.
   -हव जी.. हमर इहाँ के कतकों परंपरा मन शास्त्र आधारित परंपरा ले अलगेच हे भई.. दुर्गा दाई ह जेन भंइसासुर (महिषासुर) के संहार करथे, हमर इहाँ वोकरो मान-गौन अउ पूजा करे जाथे.
   -हव जी.. जंवारा सरोए के बेर तो लोगन भंइसासुर बनबे करथें, इहाँ के कतकों गाँव मन म भंइसासुर (भंइसादेव) के देवता के रूप म पूजा घलो करे जाथे. उंकर निर्धारित ठउर  म हूम-धूप दिए जाथे.
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-छत्तीसगढ़ राज स्थापना दिवस के बधाई जी भैरा.
   -तहूं ल बधाई जी कोंदा, हमर नवा राज सिरजन दिवस के.
   -मन म खुशी तो होथे संगी अलग छत्तीसगढ़ राज बने के, फेर हमर पुरखा मन के सपना ह आजो अधूरा जनाथे.
   -कइसे भला?
   -हमर पुरखा मन ह भाषाई अउ सांस्कृतिक अस्मिता ऊपर आधारित अलग छत्तीसगढ़ राज के सपना देखे रिहिन हें. उन चाहत रिहिन हें, के इहाँ भाखा अउ संस्कृति के स्वतंत्र पहचान बनय, फेर अइसन आज राज बने दू दशक बीते के बाद घलो नइ हो पाय हे.
   -हाँ जी अइसन तो महू ल जनाथे. आने-आने राज म लिख के लाने गे पोथी-पतरा मनला ही इहाँ के सांस्कृतिक चिन्हारी के मापदंड के रूप म हमर आगू म रखे जाथे. भाखा के घलो इही घ हाल हे.
   -हव जी संगी अउ जब तक अइसन होवत रइही.. हमर भाखा संस्कृति के स्वतंत्र पहचान नइ बनही तब तक अलग छत्तीसगढ़ राज निर्माण के अवधारणा अधूरा ही रइही.
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-एक बात मोला समझ नइ आय जी भैरा, मैं देखथौं ते कतकों झन अइसन साधू, संत अउ तपस्वी हें, जे मन कोनो न कोनो किसम के शारीरिक दुख-पीरा म बूड़ेच असन दिखथें. भई हमर असन लंदर-फंदर मनखे के अइसन तकलीफ ह तो फभ जथे, फेर तपस्वी मन घलोक अइसनेच म अभरे रहिथें.
   -हाँ.. अइसन तो होथेच जी भैरा.. एला अध्यात्म म प्रारब्ध भोग कहिथें.
   -प्रारब्ध भोग?
   -हहो.. अउ एला पूरा करे बिना कोनो ल मोक्ष या कहिन सद्गति नइ मिलय.
   -अच्छा... ताज्जुब हे भई!
   -ए ह वो तपस्वी मन के पाछू जनम मन म कोनो भी कारन ले होय गुण-दोस मनला बराबर करे के एक प्रक्रिया होथे, जेला अध्यात्म के भाखा म प्रारब्ध भोग कहे जाथे. मान ले वो तपस्वी ह ए जनम म ए प्रारब्ध भोग ल पूरा नइ करही, त वोला फेर दूसर जनम ले बर लागही, फेर वोला पूरा करेच बर लागही.
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-कातिक जोहार जी भैरा. कते डहार ले आवत हस?
   -जोहार जी कोंदा.. एदे लइका मनला आज ले कातिक नहाए ले जाही कहिके उठा के आए हौं. हमन लइकई म कातिक नहाए ले जावन तेकर सुरता हे नहीं जी संगी?
   -रइही कइसे नहीं संगी.. पारा भर के नोनी मनला मुंदरहा ले उठावन तहाँ तरिया जावन.
  -हव जी उंकर मन बर फूल अउ बेलपान तो हमीं मन सकेलन, फेर उंकर मन के नाहवत ले तरिया पार के चिरी-उरी अउ सुक्खा असन लकड़ी मन ल सकेल के भुर्री बारन.
  -सही आय संगी, नोनी मन नहा-धो के भुर्री ताप लेवय तहाँ ले महादेव के पूजा करय अउ भोग-परसाद चघावय, ते मनला तो फेर हमीं मन झड़कन ना.
   हव जी.. अउ संझा बेरा जब नोनी मन सुवा नाचे बर जावंय, तब वो मनला मिले चॉंउर-दार ल धरे बर झोला घलो तो हमीं मन धरे राहन ना.
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-अब देवी देवता मनला दे जाने वाला बलि प्रथा म थोक-बहुत बदलाव अउ कमी आवत असन जनाथे जी भैरा. काली महाअष्टमी परब के दिन ऐतिहासिक बस्तर दशहरा के बेरा म निशा जात्रा म रतिहा 12 बजे 12 बोकरा मन के बलि दे गइस. पहिली न इहाँ रियासत काल के बेरा म अतके अकन भैंसा के बलि दे जावय.
   -सबके अपन परंपरा अउ मान्यता होथे जी कोंदा, फेर मोला लागथे के देवी-देवता मनला सात्विक पूजा ले घलो मनाए जा सकथे. हमर गाँव म पहिली मातर परब म बोकरा अउ कुकरा मन के बलि दे जावय, अब बोकरा के बलदा कोंहड़ा रखिया मनला काट के काम चला लेथें.
   -अच्छा हे संगी.. हमर रायपुर के बंगाली समाज वाले मन अभी अष्टमी के दिन काली माता के पूजा म सादा रंग के कोंहड़ा अउ कुसियार के पूजवन देइन हें. अइसने सबो समाज के लोगन मनला सोच-विचार करत सात्विकता डहर बढ़ना चाही.
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-लोगन ल अगुवा बन के मुड़ म पागा खापे के गजब साध रहिथे जी भैरा.
   -ए तो मानव स्वभाव आय जी कोंदा.. कोनो पगबंधी के पागा अउ पगरईती के पागा के अंतर ल भले नइ समझय, तभो ले अस्मिता के रखवार होय के रूप म अपन आप ल सबले बड़का गुनिक अउ सबले जादा योग्य मानथे.
   -हव जी संगी.. महूं ल अइसने जनाथे, तभे तो उन ए बात ल समझ नइ पावंय के पगबंधी कोनो मनखे के मरे के बाद दशगात्र के दिन वोकर बड़े बेटा या उत्तराधिकारी के मुड़ म खापे जाथे, जबकि पगरईती के पागा वोकर मुड़ म खापे जाथे, जे ह कोनो बड़का बुता या कारज के सियानी करे खातिर सबले योग्य अउ गुनिक जनाथे.
   -हव जी.. हमन ल अइसन नासमझ लोगन के सियानी ले बांच के रेहे बर लागही.. अइसन मन के हाथ म अपन अस्मिता ल रखवारी ल सौंपे नइ जा सकय.
   -सही आय संगी.. सड़क म वानर सेना बरोबर उछल कूद करना आने बात आय अउ कोनो गंभीर विषय म कारज करना आने बात.
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-अब जिनगी के संझौती बेरा म धरम के कुछू ठोसहा बुता करे के मन होथे जी भैरा.
    -ए तो बने बात ए जी कोंदा.. अउ मोला लागथे के लोगन ल धरम के नॉव म बगरे डर, अज्ञानता अउ अंधविश्वास ले बचाय के उदिम ह सबले ठोसहा बुता हो सकथे.
   -वो कइसे?
   -चाहे कोनो धरम-पंथ हो सबो म लोगन ल देवी-देवता के नॉव म डरवाए, भरमाए अउ अंधविश्वास म बोरे के जादा चलन देखे ले मिलथे. अइसे करबे त अइसे हो जाही अउ अइसे नइ करबे त दइसे. भइगे.. अतके के नॉव ले ही लोगन चमकथें-झझकथें अउ उंकर भंवरलाल म अरझत जाथें, अपन सरी जिनिस अउ जिनगी ल उंकर बहकावा म खिरोवत जाथें.
   -तोर कहना वाजिब आय संगी.. देवी-देवता मन कोनो दुष्ट-चंडाल नइ होय जेमा उन फोकटे-फोकट कोनो ल दुख-तकलीफ या पीरा देहीं. उन तो लोक कल्याण अउ सुख-शांति के पोषक होथें. असल म ए तो जे मन देवी-देवता मन के आड़ म अपन रोजगार चलाथें ना वोकर मन के बगराय भरम-जाल होथे. आज जरूरी हे, लोगन ल अइसन भरम जाल ले निकाले जाय. आज के बेरा म इही सबले बड़े धरम कारज आय.
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-बछर 2019 म 3 नवंबर के राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान म आयोजित राज्योत्सव म हमर राज के राजगीत 'अरपा पैरी के धार... ' ल राजगीत घोषित करे गे रिहिसे जी भैरा.. तैं जानथस आज हमन एला जेन धुन म सुनथन वोकर पहिली एला दू अउ धुन म गाये जावत रिहिसे.
   -अच्छा.. बताना जी कोंदा.
   -डॉ. नरेंद्र देव वर्मा जी जब ए गीत ल लिखिन तब उन खुदेच एला अपन बनाए धुन म गावंय. पाछू जब उन 'सोनहा बिहान' संग जुड़िन त वो बखत उहाँ के गायक केदार यादव ह एमा थोड़ा परिमार्जित कर के अपन ढंग ले गाये लगिस. बाद म जब शास्त्रीय संगीत के जानकर गोपाल दास वैष्णव जी के हाथ म ए गीत आइस, त उन एकर धुन म अउ परिमार्जित करीन. ए नवा परिमार्जित धुन ह सोनहा बिहान के सर्जक महासिंह चंद्राकर जी ल गजब सुहाइस, त फेर वो ह एला केदार यादव के बलदा ममता चंद्राकर जगा मंच म गवाए लगिन, फेर आगू चल के ममता के ही आवाज म एकर रिकार्डिंग होइस, जे आज हम सब के कंठ म राजगीत के रूप म बिराजे हे.
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-शरद पुन्नी के आते मौसम म कुंवर जुड़हा के आरो मिले ले धर ले हे जी भैरा..
   -हव जी कोंदा.. मोर घर तो अब ए चरमस्सी जुड़हा म गोरसी तापे के उदिम चालू हो जाही.
   -हाँ भई सियाना देंह-पॉंव खातिर जोखा तो करेच बर लागथे. महूं ह ए चार महीना म जुड़हा बानी के खान-पान ले बाॅंच के रहिथौं.
   -फेर ए जुड़हा बेरा ह जवनहा मन बर देंह-पॉंव ल तंदरुस्त राखे के बढ़िया बेरा होथे जी संगी.. हमन जब वो अवस्था म रेहेन तब रोज मुंदरहा ले उठन अउ बस्ती के बाहिर म पैंठू म जाके कसरत करन, तहाँ ले बेरा के उवत ले कबड्डी नइते अउ काॅंही खेल खेलतेच राहन.
   -हर उमर के अलग उदिम होथे जी संगी.. अब हमर बर वो सब हा तइहा ल बइहा लेगे बरोबर होगे हे.
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