Saturday, 30 November 2024

मुख्यमंत्री ने कोंदा भैरा के गोठ का विमोचन किया

मुख्यमंत्री के हाथों "कोंदा भैरा के गोठ" विमोचित.. 
   रायपुर। साहित्यकार सुशील भोले द्वारा सोशलमीडिया के सभी मंच पर प्रतिदिन धारावाहिक के रूप में पोस्ट किए जा रहे छत्तीसगढ़ी धारावाहिक "कोंदा भैरा के गोठ" का छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के अवसर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री विष्ण देव साय के हाथों विमोचन किया गया। रायपुर सांसद श्री बृजमोहन अग्रवाल ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। इस अवसर पर अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्ध हास्य कवि पद्मश्री डॉ. सुरेन्द्र दुबे एवं इतिहासकार डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र विशेष अतिथि के रूप में मंचस्थ थे.
   सिविल लाइन, रायपुर स्थित सर्किट हाउस के कम्यूनिटी हाल में आयोजित इस कार्यक्रम में पूरे प्रदेश भर से आए साहित्यकार उपस्थित थे। 
   छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा प्रकाशित "कोंदा भैरा के गोठ" में प्रतिदिन लिखे जा रहे धारावाहिक के प्रारंभिक दिनों की 177 कड़ियों को समाहित किया गया है। कोंदा भैरा के गोठ की भूमिका पं. सुंदर लाल शर्मा राज्य अलंकरण से सम्मानित साहित्यकार डॉ. सत्यभामा आड़िल ने लिखी है, तथा शुभकामना के दो शब्द सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. परदेशी राम वर्मा ने प्रेषित किया है।

Sunday, 24 November 2024

कोंदा भैरा के गोठ-27

कोंदा भैरा के गोठ-27

-अपन धरम-पंथ के लोगन मन के बीच बिहाव करना ही ह बने जनाथे जी भैरा.
   -बने जनाथे घलो अउ बने जिनगी भर खटाथे घलो जी  कोंदा.
   -हव जी सही आय.. बिलासपुर के विकास चंद्रा संग एक मसीही समाज के नोनी ह मया बंधना के सेती हिंदू रीति ले बिहाव तो करे रिहिसे, फेर वो ह हिंदू परंपरा के कभू सम्मान नइ करत रिहिसे अउ ते अउ अपन पति संग पूजा पाठ घलो म नइ संघरत रिहिसे उल्टा चर्च जवई करत रिहिसे, तेकरे सेती विकास ह फेमिली कोर्ट ले वोला तलाक़ दिए रिहिसे.
   -बने करिस.. भई जेन माईलोगिन ह अपन आदमी के धरम परंपरा के कारज म संघरत नइ रिहिसे वोला तो तलाक़ देना ही चाही.
   -हव.. फेर वो माईलोगिन ह फेमिली कोर्ट के फैसला ल हाईकोर्ट म चुनौती दे रिहिसे, त हाईकोर्ट ह घलो फेमिली कोर्ट के फैसला ल सही बतावत कहिस- पति संग सहधर्मिणी के कर्तव्य पूरा नइ करना ह धार्मिक मान्यता के अपमान अउ मानसिक क्रूरता आय.

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-गौरा-ईसरदेव परब के बेरा म काली काँसी डोरी वाला सोंटा मरवाए नहीं जी भैरा? 
   -इहू पूछे के बात आय जी कोंदा.. हर बछर मैं गौरा-ईसरदेव के आशीर्वाद पाए बर सोंटा मरवाथौं.
   -बहुत बढ़िया.. वइसे ए ह आय तो हमर पुरखा मन के बनाए एक परंपरा ही, फेर ए ह वैज्ञानिक दृष्टि ले घलो बड़ महत्तम के होथे.
   -अच्छा.. अइसे का जी? 
   -हहो.. ए सोंटा ल काँसी के काँदी (सुक्खा पैरा) के डोरी ल बने पाँच दिन तक तेल म बोर के राखे जाथे, जेकर हाथ म सटाक ले परे ले हमर नस के सफेद रक्त कोशिका  (white blood cells) मन ह सक्रिय हो जाथें.. सफेद रक्त कोशिका मन के सक्रिय होय ले करीब पचास किसम के बीमारी मन अपने अपन ठीक हो जाथें.. ए सोंटा के माध्यम ले शरीर ल मिले एक्यूप्रेशर के क्रिया ले कैंसर के लक्षण कहूँ जनावत होही त उहू ल ए सफेद रक्त कोशिका मन खतम कर देथें.
   -वाह भई.. तब तो अब मैं ह हर बछर अपन घर के लइका मनला घलो सोंटा मरवाए बर कइहौं.

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-हमर देश म तइहा जुग ले गाय ल महतारी बरोबर मानत आवत हावन‌ जी भैरा तभो ले अब इहाँ 'कत्लखाना' मन के संख्या म होवत बढ़ोत्तरी ह भारी ताज्जुब बरोबर जनाथे.
   -हव जी कोंदा.. पहिली गाँव के कोनो घर अइसन नइ राहत रिहिसे जिहाँ एको ठन गाय गरुवा नइ राहत रिहिस‌ होही, फेर अब टेक्टर अउ हार्वेस्टर जइसन मशीन ले खेती होय के सेती बने असन किसान घर घलो गाय गरुवा दिखे ले नइ धरय. 
   -हव जी.. ए ह देश म होवत धार्मिक सांस्कृतिक अउ औद्योगिक बदलाव के सेती घलो होही तइसे जनाथे.
   -कुछू होवय, फेर इहाँ अभी कोनो कोनो संत महात्मा मन गाय ल राष्ट्रमाता घोषित करे के माँग करथें ना, ते ह मोला वाजिब जनाथे.
   -गाय के महत्ता ल तो अफ्रीकी देश सूडान के मुंदरी आदिवासी मन ठउका जानथें, उहाँ एला सबले बड़े धन अउ खजाना माने जाथे.
   -अच्छा..! 
   -हव.. एकरे सेती गाय के रखवारी बर वोमन‌ खाँध म एके 47 जइसन हथियार टाँग के किंजरत रहिथें.

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-धर्म खातिर आस्था ह बहुते सुग्घर बात आय जी भैरा, फेर एकर नॉव ले बगराए जाने वाला अफवाह ल समझना अउ बाँचना घलो जरूरी होथे.
   -सही आय जी कोंदा.. कतकों अफवाह ह बिन मुड़ी पूछी के होथे तभो लोगन वोमा झपाए परथें.
   -हव जी.. अभी वृंदावन के बाँकेबिहारी मंदिर ले खबर आए हे- उहाँ हाथी के मुँह ले टपकत पानी ल लोगन भगवान के चरणामृत आय कहिके पीये बर लुलुवावत झपाय परत हें.
   -वाह भई..! 
   -हव.. फेर उहाँ मंदिर म सेवा करइया आशीष गोस्वामी ह बताइस के असल म वो पानी ह मंदिर म लगे एसी अउ सफाई आदि ले निकलने वाला पानी आय. 
   -भाग भइगे..! 
   -राजस्थान पत्रिका म छपे ए खबर ह वायरल होवत हमन ल चेतावत हे, के कोनो ह कौवा कान ल लेगे कहि दिस त अपन कान ल टमड़े बिन कौवा के पाछू नइ भागना चाही.

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-छत्तीसगढ़ी म एक कहावत हे- 'बेर्रा अबड़ भोगावत हे' एकर मतलब समझथस जी भैरा? 
   -कोन जनी जी कोंदा.. रोगहा.. बेर्रा ल हम गारी होही कहिके भर समझथन! 
   -दू अलग अलग प्रजाति के जिनिस ले सिरजे जिनिस ल 'संकरनस्ल' कहिथन न उही आय.. बेर्रा.
   -अच्छा.. जेकर दाई अलगे अउ ददा अलगे जात समाज के होथे तइसने? 
‌  -हव.. अब ठउका समझे.. अउ ए संकरनस्ल के जिनिस मन उत्ताधुर्रा बाढ़थें.. उही ल हमर सियान मन 'बेर्रा अबड़ भोगावत हे' काहँय.. अब इहाँ के राजनीति म अइसने बेर्रा मन के संख्या म भारी बढ़ोत्तरी आवत हे, ए मन खाथे-पीथें तो इहाँ के अन्न-जल ल फेर गुन गाथें अनगँइहा मन के.
   -अच्छा.. अभी भिलाई के विधायक ह कुरूद के तरिया के नॉव ल अनगँइहा गायिका के नॉव म धर दिए हे तइसने.. जबकि वो तरिया के नॉव ह नगर पालिक निगम के रिकॉर्ड म पहिली ले पंथी सम्राट देवदास बंजारे के नॉव म दर्ज‌ हे.
   -हव संगी.. हमन ल अब अइसने बेर्रा किसम के राजनीतिक मन ले इहाँ के परब-तिहार, नदिया-तरिया, गाँव-गँवई जइसन सबो चिन्हारी ल बँचा के राखे बर लागही, तभे छत्तीसगढ़ ह छत्तीसगढ़ रहि पाही नहीं ते इहू ह परदेशियागढ़ बन जाही.

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-रायपुर के दादाबाड़ी म चलत प्रवचन के श्रृंखला म विराग मुनि जी कहिन जी भैरा के आज सबो झन अपने मान्यता ल ही सबो के ऊपर थोपना चाहत हें, उनला लागथे के उहिच भर सही हे अउ बाकी सब गलत हें.
  -ए बात तो महूंँ ल वाजिब जनाथे जी कोंदा.. जतका धरम-पंथ के संत मनला सुन ले सब अपनेच ल श्रेष्ठ कहिथें अउ आने मनला कमजोरहा.
   -विराग मुनि जी कहिन के आज हम कहाँ ले कहाँ पहुँच गे हावन.. हमर देश म विद्या ल कभू बेचे नइ जावत रिहिसे.. अन्न देवई या काकरो ईलाज खातिर मदद करई ल सेवा अउ पुन्य परसाद माने जावत रिहिसे, फेर आज इही तीनों ह सबले बड़े कारोबार बनगे हे.
   -सिरतोन आय संगी.. धरम-करम के परिभाषा अंते-तंते जनाथे.
   -हव.. वो मन के कहना हे के आज के कतकों संत मन तो भगवान के भक्ति उपासना ल छोड़ के अपने भक्त बनाय म मगन रहिथें.. संत समाज म घलो विकृति आगे हवय.
   -सही आय.. काकर ल मानन अउ काकर ल नहीं तइसे होगे हावय.

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-हरदेव लाला मंदिर म काली छत्तीसगढ़ी चिन्हारी मन के 'उजियार' देखे ले गे रेहे नहीं जी भैरा? 
   -हव.. अइसन सुग्घर उदिम मन म तो मैं कइसनो कर के पहुँची जथौं जी कोंदा.. लइका मन के सुग्घर सुग्घर चित्रकारी, कलाकारी अउ कविता पाठ ल देख सुन के मन गदगद होगे रिहिसे.
   -होबेच करही जी, फेर मोला लागथे के अब हमन ल  पंडवानी या भरथरी जइसन अनगँइहा मन के गाथा के बलदा हमर आरंग के राजा मोरध्वज के वो गाथा ल गाना चाही, जेन ह अपन बेटा ल आरा म दू फाँकी चीर के भगवान के आगू म मढ़ा दिए रिहिसे.
   -हव जी.. भगवान कृष्ण ह जइसे इंद्रदेव के पूजा परंपरा ल बंद करवा के अपन तीर के गोवर्धन पूजा के परंपरा चालू करवाए रिहिसे तइसने.
   -हव.. हमूं मनला अइसने करे बर लागही, अंते तंते के लोगन अउ पात्र मन के गाथा ल छोड़ के अपन इहाँ के गौरव मनला दुनिया भर बगराए के उदिम करना चाही.
   -मैं तो इहू कहिथौं संगी के हमला अइसन जम्मो आयोजन मनला मनोरंजन के संग ज्ञान अउ जनजागरण के माध्यम घलो बनाना चाही.

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-अब तो हमरो इहाँ चार लइका बियाय बर जोर देवत हें जी भैरा.. कइसे करबे तैं ह? 
   -कोन ह अइसन काहत हे जी कोंदा? 
   -दूसर धरम-पंथ वाले मन के बाढ़त जनसंख्या ल देखत हमरो धरम के रखवार मन अइसने करे बर काहत हें जी.
   -वइसे सुने म अइसन गोठ ह बड़ा निक बानी के जनाथे ना, फेर जेकर घर-परिवार हे चोरो-बोरो लोग-लइका हे, ते मन जानथें के उँकर मन के सम्मान जनक शिक्षा अउ भरन-पोसन खातिर कतका मरे-खपे ल परथे.
   -सही आय जी.. डिड़वा मनखे जेकर लोग न लइका परिवार के व्यवस्था कइसे होही तेकर चिंता न फिकर.. वइसन मन का जानहीं चार लइका बियाय ले कइसे का हो जाही तेला? 
   -तभो ले ए गोठ ऊपर चिंतन होना चाही अइसे लागथे मोला.
   -चितन तो सबो गोठ ऊपर होना चाही के वोकर मन के पाले-पोसे के जिम्मेदारी कोन लेही या फेर वो मनला कीरा-मकोरा बरोबर जिनगी जीए बर ढकेल दिए जाही?

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-हमर शहर म तो अभी ले बिन पँखा के सूते-बसे नइ सकन तभो ले काली जेठौनी परब म भुर्री तापे के नेंग ल करे हावन जी भैरा.
   -गरमी ह तो हमरो कोती थिरावन नहीं काहत हे जी कोंदा तभो ले हमूँ मन जुन्ना सूपा, झेंझरी मनला बार के आगी तापे हावन.
   -पहिली के बेरा म जेठौनी के आवत ले जाड़ ह बनेच दँदोरे ले धर ले राहय तभो सियान मन भुर्री बारे अउ तापे खातिर जेठौनी के शुभ परब के अगोरा करँय.
   -हव जी.. जइसे गरमी के मौसम म अक्ती परब ले ही नवा करसी म पानी पीए के शुरुआत करथन तइसने गढ़न.
   -सही आय जी.. जाड़ होवय चाहे गरमी फेर उन दूनों ले राहत पाए के शुरुआत खातिर शुभ परब के अगोरा करे जावय इही ह आज हमर परंपरा बनगे हावय.

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-बिन गुरु के काकरो उद्धार नइ होय काहत रिहिसे जी भैरा.. गाँव के मंडल ह. 
   -बने तो काहत रिहिसे जी कोंदा.. हर मनखे ल अपन जिनगी म एक आध्यात्मिक गुरु जरूर बनाना चाही, काबर ते पूजा-उपासना के फल तो ऊपर वाला ही देथे, फेर वोला गुरु के माध्यम ले ही देथे.
   -अच्छा.. अउ गुरु बनाए बिन पूजा उपासना करत रहिबे तभो फल नइ देवय? 
   -देथे.. फेर अधूरा देथे.. विधिवत गुरु बनाए के पाछू ही पूरा देथे.
   -एकरे सेती तो महूँ ह थथमराए असन होगे हौं.. काला गुरु बनावौं अउ काला नहीं, काबर ते आजकाल रंग-रंग के गुरु देखब म आथे.
   -ऊपर के चकाचक अउ रूप-रंग भर ल देखबे ते अलहन हो जाथे.. वोकर कर्म अउ जीवन दर्शन ल घलो देखना चाही.. आजकाल वंश परंपरा के रूप म फलाना ह गुरु के बेटा आय कहिके घलो नइ अभरना चाही.
   -हव जी बने काहत हस.. तभे तो सियान मन 'गुरु बनावौ जान के अउ पानी पीयौ छान के' काहँय.
   -हव.. फेर आजकाल तो सिधवा बरोबर चोला खाप के हुँड़रा भेड़िया मन घलो किंजरत रहिथें.. अइसन मनला कहूँ गलती म गुरु बना परबे त वो तोला कुकरी चोरा के खवई ल घलो पुन्न के कारज बता देही.

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-राजनीति के अगास म 'बँटोगे तो कटोगे' नारा ह गजब चलत हे जी भैरा.
   -नारा भर के चले ले का होथे जी कोंदा.. नारा लगइया मन के चाल-चरित्तर म घलो तो वइसन दिखना चाही.
   -हव जी सिरतोन आय.. हमर इहाँ तो मंदिर-देवाला तक म भेदभाव देखे ले मिलथे.. वीआईपी मन बर खुसरे के आने रद्दा अउ आम लोगन बर आने.
    -वाह.. आजकाल तो टिकट घलो मिले लगे हे.. अतका के टिकट म एती ले अउ वतका के टिकट म वोती ले.. अब तहीं बता अइसन भेदभाव ले कोनो भी समाज ह एक हो सकथे? मोला तो सिख समाज के वो दृश्य गजब मनभावन लागथे संगी, जिहाँ गुरुद्वारा मन म बड़े बड़े वीआईपी मन घलो लोगन के जूठा बर्तन अउ जूता के सफाई करत रहिथें.
   -अरे अतके ल कहिथस.. जब ज्ञानी जैलसिंह जी राष्ट्रपति रिहिन हें तब उनला तनखैया घोषित कर के स्वर्णमंदिर म जूता साफ करे के आदेश दिए गे रिहिसे.. अउ सिरतोन म संगी जैलसिंह जी वो आदेश के पालन करे रिहिन हें.. अब तैं बता तोर समाज म अइसन संभव हे? 
   -कहाँ पाबे संगी? 
   -हांँ.. जब तक ऊँच-नीच छोटे बड़े के मानसिकता ल पोंस के राखबे, तब तक भइगे नारा भर लगावत रहिबे.. एक नइ हो सकस.

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-देश सेवा खातिर फौज म ही जाना जरूरी नइए जी भैरा.. हम जिहाँ रहिथन उहेंच ले देश सेवा के रद्दा निकाल सकथन. 
   -हाँ ए बात ल तो महूँ मानथौं जी कोंदा.. काबर ते देश सेवा के कतकों रूप हो सकथे.
   -सही आय.. हमर रायपुर के फाफाडीह चौक म एक होटल हे- नीलकंठ रेस्टोरेंट.. इहाँ फौजी मन के विशेष रूप ले सम्मान करे जाथे.
   -अच्छा.. वो कइसे? 
   -इहाँ जे फौजी ह वर्दी पहिन के जाथे वोला पचास प्रतिशत छूट म भोजन करवाए जाथे, अउ कोनो फौजी ह सिविल ड्रेस म चल देथे त वोला पचीस प्रतिशत छूट दिए जाथे.
   -वाह भई..! 
   -रेस्टोरेंट के संचालक मनीष बताथे- वोकर सियान के संगे-संग उन तीनों भाई एनसीसी कैडेट रहें हें, तेकर सेती देश सेवा म जाए के बहुत इच्छा रिहिसे, फेर पारिवारिक ज़िम्मेदारी के सेती फौज म जा नइ पाईन, एकरे सेती देश सेवा खातिर फौजी भाई मनला विशेष छूट के साथ भोजन करवाए के बुता करत हावन.. वो बताथे के उँकर रेस्टोरेंट म रोज 10-15 फौजी आ जाथें.. कभू कोनो शहीद के माता पिता आ जाथें त उनला नि:शुल्क भोजन करवाए जाथे.

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-छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस अवइया हे जी भैरा.
   -हव जी कोंदा.. 28 नवंबर के हर बछर मनाथन न.. इही दिन बछर 2007 म छत्तीसगढ़ विधानसभा म छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के रूप म मान्यता देवइया विधेयक ह सर्वसम्मति ले पास होए रिहिसे, तेकरे सेती जम्मो भाखा प्रेमी मन ए दिन ल छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के रूप म मनाथन.
   -हव बने कहे.. फेर तैं जानथस संगी हमर सरकार ह आजतक छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के रूप म मनाए खातिर विधिवत शासकीय परिपत्र जारी नइ करे हे.
   -डॉ. रमन सिंह जी मुख्यमंत्री रिहिन हें तब तो हर बछर छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस मनाए के घोषणा करे रिहिन हें ना? 
   -हव करे रिहिन हें ना, फेर वो ह आजतक सिरिफ घोषणा ही बन के रहिगे हे.. एकर संबंध म शासन द्वारा विधिवत परिपत्र जारी नइ करे गे हे, एकरे सेती हमर इहाँ के जम्मो शासकीय संस्थान मन म छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस मनाए नइ जाय.
   -वाह भई.. सरकार ल ए डहार चेत करना चाही अउ "हमन बनाए हावन त हमींच मन सँवारबो" के नारा ल सच साबित करत तुरते परिपत्र जारी कर के जम्मो शासकीय संस्थान मन म छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस मनाए के ठोसहा बुता करना चाही.

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-किन्नर मनला सुप्रीम कोर्ट ह जब तृतीय लिंग के रूप म स्वतंत्र चिन्हारी दिए रिहिसे तब मैं रायपुर के किन्नर मन संग भेंट कर के एक लंबा लेख अउ उँकर पीरा ल रेखांकित करत गीत लिखे रहेंव जी भैरा- "घर म रहि के घलो मैं बिरान होगेंव, कइसे बहिनी-भाई बर घलो आन होगेंव.'
  - किन्नर मन के जीवन तो होथेच पीरा के खदान जी कोंदा.
   -सही कहे संगी, फेर अभी बलौदाबाजार जगा के एक खदान म मिले किन्नर काजल के हत्या अउ लाश ले संबंधित खबर ह मोला झकझोर डरिस.
   -वो कइसे? 
   -खबर म बताए गे हवय- रायपुर के जोरा बस्ती म किन्नर मन के मठ हे, जिहाँ के मुखिया बने बर या कहिन उहाँ के वर्चस्व खातिर निशा अउ तपस्या नॉव के किन्नर मन काजल नॉव के किन्नर ल सुपारी दे के मरवा दिस.
   -वाह भई..! किन्नर मठ के वर्चस्व खातिर सुपारी..? 
   -हव जी.. उहू म 12 लाख रुपिया के सुपारी! बलौदाबाजार पुलिस ह ए पूरा मामला के खुलासा करे हे, जेमा दूनों किन्नर संग तीन झन सुपारी लेवइया मनला गिरफ्तार करे हे.
   -बाप रे.. अइसन किन्नर मन ले संवेदनशील होय के बलदा सचेत रहे के जरूरत जनावत हे.

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-अब के लइका मन तो भइगे चिरई पिला कस होगे हें जी भैरा.. पाँखी ह थोक-बहुत जामे अस होइस तहाँ ले कुँदरा ले उड़िया जाथें.
   -ठउका कहे जी कोंदा.. पढ़ा-लिखा के बर-बिहाव करे तहाँ ले नौकरी के ओढ़र म शहर के रद्दा धर लेथें.
   -हव भई.. दाई-ददा मन इहाँ घिलरत हन.. केपकेप करत बिदागरी के रद्दा जोहत हन, फेर हमर मन के देखइया-जतनइया कोनोच नइए.. कभू-कभार उन हमर सुध ले बर आ घलो जथें, त भइगे पहुना बरोबर.. बिहनिया आईन अउ संझा चले गेईन.. रतिहा तक ल नइ बिलमयँ.
   -ए ह अब हमरे भर मन के बात नइ रहिगे हे जी संगी पूरा बस्ती उजार परत हे.. सबोच गाँव के.. इहाँ गाँव के गौंटिया मंडल मन बरोबर सुग्घर जिनगी ल छोड़ के शहर के धुर्रा धुँगिया म बिट्टाए बर लुलुआए परे हें.
   -सही कहे संगी.. शहर के चकाचौंध ह दुरिहा ले देखत भर के आय.. तीर म जाबे त जानबे कतका मुश्किल हे उहाँ जिनगी जीना, फेर ए परलोखिया मनला कोन समझावय.

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-हमर देवी देवता मन म कालभैरव ही अइसे देवता आय जी भैरा जेला मंद-मउहा के भोग लगाए जाथे.
   -हाँ ए बात तो हे जी कोंदा बताए जाथे के ए ह शिव जी के पाँचवा अवतार आय जे ह देवी के रक्षा खातिर अवतार लिए रिहिन हें.. बताथें के वोमन युद्ध के मैदान म रहिथें.. भोलेनाथ ह कालभैरव जी ल कोतवाल घलो नियुक्त करे रिहिन हें, तेकर सेती ए मन हर देवी मंदिर म बिराजे रहिथें.
   -अच्छा..! 
   -हव.. वइसे तो जम्मो जगा के मंदिर मन म कालभैरव जी ल मंद के ही भोग लगथे, फेर हमर छत्तीसगढ़ के रतनपुर महामाया मंदिर म अगहन महिना के अँधियारी पाख के आठे के दिन सात्विक भोग लगाए जाथे.
   -अच्छा.. वो काबर? 
   -ए दिन इँकर जयंती होथे, तेकरे सेती इनला ए दिन बाल स्वरूप मान के सात्विक भोग लगाए जाथे. बाकी दिन आने मंदिर मन असन मंद के भोग लगथे.. असल म कालभैरव ल तामसिक देवता माने जाथे जे ह युद्ध के मैदान म रहिथे.. एकरे सेती इनला मंद जइसे तामसिक भोग चढ़ाए जाथे.

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-हमर परब तिहार, देवता-धामी अउ उपास-धास सबो ह बेटी माई मन के ही भरोसा बाँचे रहिगे हे जी भैरा.
   -ए बात ल तो सिरतोन कहे जी कोंदा.. उहू म वो बेटी माई मन ए सबला माने जाने म अगुवा हें, जेकर मन के नेरवा ह गाँव-गँवई म गड़े हे, शहरिया चोला ओढ़े मन म एमा थोरिक कमी देखे जाथे.
   -सिरतोन कहे संगी, फेर कभू-कभू मैं इहू गुनथौं के ए मनला हमर देश के संविधान ह उनला उँकर अधिकार अउ सुरक्षा खातिर कतका अकन व्यवस्था करे हे, तेकरो जानकारी रहिथे ते नहीं? 
   -हाँ.. इहू ह बड़ जरूरी बात आय.. आज सबो वर्ग अउ ठउर के बेटी माई मनला एकर खँचित जानबा होना चाही.. उँकर दाई-ददा, भाई-बंद सबो ल ए डहार चेत करना चाही, काबर ते जतका जरूरी हमर परब-संस्कृति के बढ़वार हे, वतकेच जरूरी महतारी बेटी मन के सुरक्षा अउ अधिकार घलो हे.
   -हव जी आज 26 नवंबर के संविधान दिवस के बेरा म आवव परन करीन के हमन ए मुड़ा म ठोसहा कारज करबोन.. काबर ते बेटी माई मन सम्मान के साथ रइहीं, तभे हमर परब-संस्कृति घलो सम्मान जनक स्थिति म बाँचे रहि पाही.
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Sunday, 17 November 2024

आगाज में कविता..

हमरूह प्रकाशन दिल्ली के साझा काव्य संकलन 'आगाज-1' के पृष्ठ 111 एवं 112 पर प्रकाशित मेरी रचना- इतिहास बोल रहा है..

Thursday, 14 November 2024

कविता.. विकास होगे..!

विकास होगे..! 
निच्चट कोलकी म हे
मोर कुँदरा ह. 
ए मुड़ा 
न कार आ सकय
न फटफटी
एकरे सेती
कार म रेंगइया
अउ फटफटी म बुलइया
न तो सरकार
एती आवय
न उँकर कोनो डारा-शाखा.
तभे तो
हमर कोलकी
आज ले अद्दर परे हे.
फेर लोगन बताथें-
सरकार के रिकॉर्ड म
हमर कोलकी ह
पक्का चमचमावत
सिरमिट के
गली म 
लहुट गे हे.
कोनो कोनो बताथें-
बिजली के
डेड़हत्था सादा पोंगरी
घलो ओरमे हे, 
फेर रतिहा 
कभू कुछू जिनिस 
बिसर जाथे त
देशी मंद के बोतल ल
कुलुप के बनाए 
चिमनी के अँजोर म
टमड़ के 
वोला उचा लेथन
आजो ले.
-सुशील भोले

Monday, 28 October 2024

कोंदा भैरा के गोठ-26

कोंदा भैरा के गोठ-26
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-हमर छत्तीसगढ़ के पारंपरिक कला संस्कृति ल लेके अब बने जागरुकता देखे बर मिलत हे जी भैरा.
   -ए तो बने बात आय जी कोंदा.. हमर छत्तीसगढ़ ह काकरो ले कोनोच जिनिस म कमती नइए.. बस लोगन पर के पाछू भटके ल छोड़ के अपन गौरव ल जानयँ.. आत्मसात करयँ.
   -सही आय जी.. राजधानी रायपुर के डीडीनगर गोल चौक म अभी के नवरत म आरुग छत्तीसगढ़ी परंपरा म पंडाल बनाय गे हवय तेला देख के गरब के अनुभव होथे.. इहाँ माता के सुमरनी ल सुवा, करमा अउ पंथी जइसन गीत नृत्य के माध्यम ले करे जाथे.
   -वाह भई..! 
    -हव जी.. ए पंडाल म संघरे बर आरुग छत्तीसगढ़ी सँवाँगा म जाए बर लागथे, नइते उहाँ निंगन नइ देवय.
   -ए तो बहुतेच बढ़िया बात आय संगी.. मैं तो इही किसम इहाँ के आध्यात्मिक संस्कृति, पूजा विधि अउ जीवन पद्धति के घलो बात करथौं.. हमला काकरोच खातिर आने मन के मुंह देखे के जरूरत नइए. 
   -धीर लगा के सब होही संगी.. राजधानी के पंडाल ले अभी जेन सांस्कृतिक गंगा के धारा निकले हे, ए ह पूरा राज भर संचरही अउ कला संस्कृति ले होवत आध्यात्मिक जीवन पद्धति तक जाही.
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-हमर छत्तीसगढ़ म एक अइसन मंदिर घलो हे जी भैरा जिहाँ परसाद के रूप म दहीबड़ा, मिर्चा भजिया अउ समोसा जइसन लसुन गोंदली वाले तामसिक जिनिस ही चघाए जाथे.
   -वाह भई.. हम तो अइसन कभू नइ सुने रेहेन जी कोंदा! 
   -हाँ.. बिलासपुर के चिंगराजपारा म धूमावती माता के मंदिर हे.. इहाँ सिरिफ शनिच्चर भर के अइसन चढ़ाए जाथे.. इहाँ माता धूमावती के माता पार्वती के विधवा रूप म पूजा करे जाथे एकरे सेती उनला लुगरा घलो सादा रंग के ही चढ़ाए जाथे.
   -मोला सुन के ही बड़ा अचरज लागत हे संगी.
   -एमा अचरज के का बात हे जी.. अभी नवरात तो चलतेच हे, जा के माता के दरस कर के आजा.. अउ सँउहे अपन आँखी म देख ले.. वइसे इहाँ खाली हाथ वाली माईलोगिन मन विशेष रूप ले आथें बताथें.. जे मन एक चिट्ठी म लिख के अपन समस्या मनला माता जी ल बताथें अउ फेर माता के आशीष ले वो जम्मो दुख पीरा ले मुक्ति पा जाथें.
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-धोबी समाज ह अब समाज के वो लोगन मनला, जे मन आने समाज के नोनी मन संग बिहाव कर डारे हें उनला  कुछ प्रतिबंध के संग अपन समाज म मिलाए के निर्णय लिए हें जी भैरा.
   -ए तो बहुत बढ़िया बात आय जी कोंदा.. इहाँ के मनवा कुर्मी समाज म तो अइसन अंतर्जातीय बिहाव वाले मनला समाज म संघारे के परंपरा बनेच दिन ले चलत हे.
   -अच्छा.. बनेच दिन ले चलत हे? 
   -हव.. समाज के जागरूक लोगन महाधिवेशन म प्रस्ताव पास करवाए रिहिन हें.. उंकर कहना रिहिसे के वो अंतर्जातीय बिहाव वाले जोड़ा ले जेन संतान के जनम होथे आखिर वोकर मन के का अपराध हे तेमा उनला समाज ले बाहिर रखे जाय? 
  -सिरतोन आय.. लइका मन के का कसूर? 
   -अइसने शासन ह जब आजीवन कारावास के सजा 14 बछर के देथे, त हमूं मनला ए मनला 14 बछर बाद समाज म संघार लेना चाही, ए मान के.. के इंकरो आजीवन कारावास/निष्कासन पूरा होगे.
  -बहुत बढ़िया बात अउ तर्क संगी.. सबो समाज वाले मनला अइसन प्रगतिशील सोच अपनाना चाही.
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-हमर छत्तीसगढ़ के कतकों गाँव के भाँठा म रावन के पुतरा ह बारों महीना हाँसत-खुलखुलावत खड़े रहिथे जी भैरा.
   -हव जी कोंदा.. महूं आकब करे हौं.. अब हमरेच गाँव के भाँठा म देख लेना.. लीला मंडली वाले मन हर बछर नवा रावन बनाय बर लागथे कहिके भाँठा म सिरमिट के रावन ठढ़िया दिए हें.
   -हव जी.. फेर कतकों गाँव मन म तो मैं वो रावन के पूजा होवत घलो देखे हौं.. कुछू परब-तिहार होय या उत्सव-जलसा सबोच पइत रावन के पूजा कर के नरियर चघाए जाथे.
   -हमरे परोसी गाँव मोहदी म घलो तो अइसने होथे.. हमूं मन उहाँ खेलकूद म जावन त भाँठा के रावन म नरियर चघा के घोलंड के पाँव परन. 
  -हव भई.. गुरुजी च मन रावन म नरियर चघा के पाँव परे बर काहय न.. अउ सिरतोन म संगी.. तहाँ ले खेलकूद के पहला इनाम हमरे गाँव ल मिलय.
   -हव जी.. ब्लॉक स्तरीय खेलकूद के चैम्पियन शील्ड हमारे गाँव म आवय‌ हर बछर.
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-आरंग जगा के गाँव कठिया म एक झन शिवदास नॉव के बाबा ह तरिया के पानी ऊपर रेंगत-रेंगत नहाकहूं कहिके गाँव के लोगन मनला काली जुवर सकेल डारे रिहिसे जी भैरा.
   -अच्छा.. त पानी ऊपर रेंगिस हे के नहीं जी कोंदा? 
   -कहाँ पाबे बइहा.. तउंरत तउंरत जावत रिहिसे.. बीच तरिया म थथमराय असन‌ होगे त बचाव दल ह वोला कइसनो कर के तरिया ले बाहिर निकालिस हे.
   -ले बता.. सिद्धी फिद्धी के नॉव म लोगन अइसन अलहन ल काबर नेवता दे डारथें कहिथौं.
   -कतकों सिद्ध मनखे मन अइसन कर डारथें जी संगी, फेर अइसन सिद्धी ह कोनो विशेष बुता बखत काम करथे.. शेखी बघारे असन प्रदर्शन खातिर वोकर उपयोग करहूँ कहिबे त इही मनखे बरोबर हिनमान पाबे.
   -सही आय.. तप सिद्धी ह प्रदर्शन के विषय नोहय.
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-आने भाखा ले आने वाले शब्द मनला छत्तीसगढ़ी म बउरत बेरा एती-तेती ले टोर-भाँज के लमिया देथें जी भैरा.
   -कइसे गढ़न के कहे जी कोंदा? 
   -प्रकृति ल परकरिति, संस्कृति ल संसकरिति अइसने गढ़न के अउ शब्द मनला घलो लमिया डारथें.
   - महूंँ ह कोनो कोनो ल अइसन लिखत देखे हौं.. अउ एकर खातिर वोमन तर्क ए देथें के गाँव-गँवई के सियान मन तो अइसने लमिया के गोठियाथें. असल म का हे ना.. कोनो भी भाखा के मानक उहाँ के पढ़े लिखे शिक्षित लोगन ल माने जाना चाही, जे मन कोनो भी शब्द के शुद्ध अउ आरुग उच्चारण करथें.. वो मनला नहीं, जे मन शब्द के उच्चारण सही नइ कर सकयँ.
   -तोर कहना वाजिब हे, फेर कतकों झन तो उही सियनहा मन के उच्चारण ल मानक माने जाना चाही कहिके मुड़पेलवा करथें.
   -तैं रायपुर के गोल बजार जाबे, उहाँ पसरा म लिमउ बेचत माईलोगिन मनला सुनबे.. वो मन लिमउ ल लीम्बू कहिथें.. काबर जानथस- हिंदी के नींबू अउ छत्तीसगढ़ी के लिमउ ल जोड़-ताड़ के आधा एती के अउ आधा शब्द वोती के कर के 'लीम्बू' कहिथें. अब तहीं बता अइसन मन के शब्द ल मानक माने जा सकथे?
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-तुंहर इहाँ के सियान के अस ल इलाहाबाद नइ लेगे रेहेव कहिके सुने ल मिलिस हे जी भैरा? 
   -ठउका सुने हावस जी कोंदा.. अरे भई जब हमर छत्तीसगढ़ के राजिम म साक्षात त्रिवेणी संगम हे, त फेर एती-तेती भटके के का जरूरत हे.
   -तोरो कहना  वाजिब जनाथे संगी.. मैं तो कहिथौं अइसने गढ़न के पिंडा परवाए खातिर लोगन जेन गया जी लेगथें ना.. वोकरो नेंग ल हमर छत्तीसगढ़ म ही कर लेना चाही.
   -बिल्कुल कर लेना चाही.. राजिम अउ शिवरीनारायण ए दूनों हमर इहाँ अइसन पबरित ठउर हे, जिहाँ अस सरोए अउ पिंडा परवाए दूनों के विकल्प के रूप म विकसित करे जा सकथे.. मैं तो अपन घर के लइका मनला चेता के रखहूँ के मोर दरी तुमन एती-तेती भटके के बलदा राजिम अउ शिवरीनारायण म ही दूनों नेंग ल सिध पार लेहू.
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-अभी कुवाँर अंजोरी दसमीं के हमन विजयदशमी परब मनाए हावन नहीं जी भैरा? 
   -हव मनाए तो हावन जी कोंदा.. गाँव के भाँठा म रावन के पुतरा म आगी ढीले रेहेन.
   -हव.. इहिच ह तो मोला थोकिन अनफभिक बानी के जनाथे.. एक डहार किष्किन्धा काण्ड के चौपाई 11 ले 18 म 'गत ग्रीषम बरषा रितु आई'.. ले लेके 'बरषा गई निर्मल रितु आई' काहत ए बताए गे हवय के भगवान राम ह असाढ़, सावन, भादो अउ कुवांँर के शरदपुन्नी तक के चौमासा ल प्रबरषण पहाड़ के गुफा म रहिन हें कहिके, त फेर वो गुफा म राहत बेरा ही रावन ल कइसे मार डारिन? 
   -तोरो प्रश्न ह वाजिब जनाथे संगी.. एक डहार हम पढ़थन के चौमासा म तो भगवान गुफा म रहिन हें, त फेर चौमासा के सिराय बिन.. वो गुफा ले निकले अउ लंका पहुँचे बिन रावन ल मार कइसे डारिन होहीं? 
   -मोला लागथे संगी के राम ह चौमासा के पूरा चार महीना उहाँ नइ रिहिन होहीं. जेकर पत्नी के हरण होय हे, वो चार महीना हाथ गोड़ सकेल के कइसे बइठे सकही? 
   -कोन जनी भई.. फेर पोथी म तो वइसने पढ़े बर मिलथे..!
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-शरदपुन्नी के दिन सक्ती जिला के गाँव तांदुलाडीह म गोंड़ परिवार के जेन दू भाई मनला गुरु भक्ति म ब्रह्मलीन साधना करत मरगें कहिके सुनाय रिहिसे, तेन ह तो वोकर बहिनी अमरिका के टोटा ल मसक के मारे के सेती मरे रिहिसे कहिथें जी भैरा.
   -तभे तो मोला साधना करत मरे के बात ह अनभरोसिल कस जनाय रिहिसे जी कोंदा.. कभू कोनो साधना करत मरहीं गा.. भई हमूंँ मन कतकों साधक मनला देखे हावन, फेर अइसन कभू सुने नइ रेहेन.
   -हव जी.. असल म वो लइका मन के बहिनी अमरिका ल ए भरम रिहिसे के वो ह मरे मनखे मनला अपन मंत्र साधना ले जीया डारही, इही बात ल सिद्ध करे खातिर वो अपन महतारी बहिनी अउ एक भाई ल अपन डहार संघार के  वोकर ए साधना के बात ल अंधविश्वास कहइया दूनों भाई मनला पहिली तो जहरीला धुँगिया सूँघा के बेहोश करीस तेकर पाछू दूनों के टोटा ल मसक के मार डारिस.
   -अइसन साधना के बात ह मोला आरुग अंधविश्वास जनाथे संगी.
   -ए ह अंधविश्वास नहीं.. मूर्खता के पराकाष्ठा आय अउ ए ह दुख के बात आय के चारों मुड़ा अइसन नजारा देखे ले मिलत हे.
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-इहाँ के मूलनिवासी मन के देवी देवता मन के अपमान करे के उदिम अभी घलो चलतेच हे जी भैरा.
   -ए तो जब ले अनगँइहा मन इहाँ आए हें तब ले चलत हे जी कोंदा.. डॉ. दयाशंकर शुक्ल के शोधग्रंथ छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य का अध्ययन  के प्रथम संस्करण ल पढ़बे वोमा लिखाय हे- इहाँ के आदिवासी मन के जंगली देवता ऊपर आर्य देवता मनला स्थापित करे के काम तेज गति ले चलत हे.'
   -वाह भई.. जंगली देवता..! 
   -हव दूसरा संस्करण म महीं ह वोला संपादित करे रेहेंव तेकर सेती सुरता हे.. अब गरियाबंद ले खबर आय हे- उहाँ दसेरा परब के आदिवासी परंपरा के अनुसार सिरहा (पुजारी) ह देवी के अवतार धर के पहुंचिस, तेला युवराज पांडेय ह डंडा म मार के देवी ल अपमान जनक गारी घलो दिस.
   -वाह भई.. वोला इहाँ के देवी देवता अउ परंपरा के समझ नइए का जी? 
   -कोन जनी भई.. ए घटना के सेती आदिवासी मन भारी रोसियाइन.. धरना प्रदर्शन घलो करिन त कहूँ जाके युवराज पांडेय अउ तुषार मिश्रा के खिलाफ पुलिस ह अपराध दर्ज करे हे.
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-हमर इहाँ के हर समाज के अपन परंपरा अउ नेंग होथे जी भैरा.
   -हव जी कोंदा सही आय.. एकदम अलगे जेन अउ दूसर समाज म देखे सुने म नइ आवय. 
   -हव जी सही आय.. अब हमर इहाँ के बिरहोर जनजाति ल ही देख लेना.. वो मन बर-बिहाव म टिकावन के रूप म दुल्हा बाबू ल टुकना, टँगिया, हँसिया अउ बेंदरा धरे के फाँदा देथें.
   -वाह भई.. बेंदरा धरे के फाँदा! 
   -हव.. अभी रविशंकर विश्वविद्यालय म होय एक विशेष उद्बोधन म बिरहोर जनजाति मन बर बुता करत पद्मश्री जागेश्वर राम यादव ह ए बात के जानकारी दिस हे.
   -वो समाज ह तइहा बेरा ले जंगल झाड़ी म राहत आवत हे, वो दृष्टि ले उहाँ रेहे खातिर अइसन टिकावन ह वाजिब घलो तो जनाथे.
   -सही आय, फेर अब जागेश्वर राम यादव के सरलग बुता के सेती उहू मन म थोर बहुत बदलाव के आरो मिले लगे हे.
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-असल म हमर छत्तीसगढ़ म देवारी तो तीनेच दिन के होथे जी भैरा.. कातिक अमावस के सुरहुत्ती, गौरा-ईसरदेव बिहाव, वोकर बिहान भर गोवर्धन पूजा अउ तेकर बिहान भर मातर, फेर इहाँ एक अइसनो गाँव हे जिहाँ ए देवारी परब ल एक हफ्ता पहिलीच ले मना लिए जाथे.
   -एक हफ्ता पहिली जी कोंदा? 
   -हव.. राजधानी रायपुर ले करीब 55 किमी दुरिहा बसे गाँव सेमरा जेन धमतरी, दुर्ग अउ बालोद जिला के सीमा म हे. 
   -अच्छा..! 
   -हव.. गाँव के मन बताथें के पहिली इहाँ कटाकट जंगल रिहिसे तब गाँव म एक पेड़ के खाल्हे म एक बाबा बइठे रिहिन हें, उही बेरा जंगल ले एक बघवा आइस अउ बाबा संग लड़े लगिस. शेर ह बाबा के मुड़ी अउ देंह ल अलग कर दिस, जेमा के मुड़ी ह हमर गाँव सेमरा म अउ देंह ह परोसी गाँव बोरझरा म गिरिस. पाछू बाबा ह हमर गाँव के लोगन ल सपना दिस के मोर हिसाब ले तुमन इहाँ तिहार बार ल मानहू त ए गाँव म सुख समृद्धि बने रइही. वोकर बाद बाबा सिरदार देव के मंदिर बनाए गिस अउ फेर उही ल गाँव के ईष्टदेव मानत हर बछर हफ्ता भर पहिली इहाँ देवरी मनाना शुरू होइस, जेन ह अभी घलो सरलग चलत हे.
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-पलंग सुपेती म सूतइया.. स्पंज वाले कोंवर सोफा म बइठइया शहरिया मन घलो अब हमर गाँव के गाँथे-तीरे खटिया के महात्तम ल समझे लगे हें जी भैरा.
   -समझबे करहीं जी कोंदा.. तइहा बेरा ले चलत हमर खटिया ह शरीर खातिर बड़ उपयोगी अउ मयारुक होथे.. ए ह प्राकृतिक रूप ले एक्यूप्रेशर के बुता करथे.
   -हव जी एकरे सेती अब रायपुर जइसन शहर म जुन्ना बेरा के खटिया के माँग अउ चलन बाढ़त हे.. न्यूरो थैरेपिस्ट अउ फिजियो थैरेपिस्ट मन के कहना हे- पारंपरिक तरीका ले आँटे गे बगई डोरी म गँथाय खटिया हमर देंह के हवा ल संतुलित राखथे.. ए ह पीठ पीरा अउ देंह के पीरा सबो ले बँचाथे, जेन ह आजकाल बेड, तख्त अउ स्पंज वाले गद्दा म सूते बइठे के सेती होवत हे.
   -हव जी फेर खटिया के अँचावन ल बने टाँठ तिराय रहना चाही, इहू चेत करना जरूरी हे.. नइते पीठ पीरा ह बाढ़ घलो सकथे.
   -सही आय.. हमर इहाँ सूते खातिर खटिया त बइठे खातिर मचोली घलो गाँथे राहय हमर बबा ह.
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-हमर मन के बेरा म तिहार बार म जेन फटाका फोरन तेन ह कतकों बाजय धुँगिया उड़ावय फेर कोनो ल नुकसान नइ करत रिहिसे जी भैरा फेर अब तो अइसन रोसहा रोसहा फटाका आगे हवय ते तोर कान-नाक के छेदरा बोजा जाही तइसे जनाथे.
   -हव जी कोंदा.. अभी रायपुर के बजार म 130 डेसिबल तक के आवाज वाला फटाका आय हे बताथें.. कहूँ ए फटाका के फूटत बेरा तैं भोरहा म कान-नाक ल तोपे बर भूला जाबे त जउँहर हो जाही.
   -हव भई.. अइसन मनला पूरा प्रतिबंधित करना चाही.. हमन अपन लइकई म कइसे बढ़िया कुधरी मनला सकेल के वोमा छोटे छोटे दनाका मनला गड़िया के फोरन. फटाका के फूटते कुधरी मन छटकय अउ धुर्रा उड़ियावय त कतका निक लागय.
   -हव जी संगी.. हमन कहूँ बस्ती ले बाहिर भाँठा म जावन त उहाँ गोबर चोता मन म सुतरी बम ल खोंच के फोर देवत रेहेन.. भारी आनंद आवय संगी.
   -अब वो दिन बेरा गय.. नवा जमाना के नवा उदिम आगे, फेर एमा मनोरंजन कम अउ खतरा जादा होगे हे.
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-सुनत हस भैरा.. काली एक झन मोला डाॅक्टर के उपाधि देबोन कहिके लुढ़ारत रिहिसे.
   -भाग भइगे.. तैं ह कब ले लोगन के नरी टमड़े ले सीख गेस जी अउ कब ले सुजी बेधे के बुता करत हस.. हमला तो गमे नइए? 
‌‌  -अरे वइसनहा डाॅक्टर थोरहे बइहा.. साहित्य के काहत रिहिसे.
   -टार बुजा ल.. अइसनो ह मोला फदित्ता बरोबर जनाथे.. भई हमन कोंदा लेड़गा मनखे.. अपन नॉव के आगू डाॅक्टर लिखई फबही गा? 
   -उही ल तो महूंँ कहेंव- हमन जइसन पाथन तइसन जतर-कतर लिख बइठथन.. त फेर वो ह साहित्य कहाँ ले होगे.. मोला डाॅक्टर फॉक्टर के पदवी झन देहू ददा.. उल्टा जी के काल हो जही.
   -बने कहेस.
   -तभो ले वो काहत रिहिसे- आजकाल अइसने तो चलत हे गा.. एकाद ठन फर्जी बानी के संस्था के नॉव धर ले अउ तहाँ ले मटमटहा किसम के लिखइया पढ़इया मनला किसम किसम के प्रमाण पत्र बाँटत राह.
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मयारु माटी देवारी अंक 1988

छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला संपूर्ण मासिक पत्रिका "मयारु माटी" के बछर 1988 के देवारी अंक के पीडीएफ ह रायगढ़ के साहित्यकार भाई बसंत राघव के सद्प्रयास ले मिले हे. बहुत झन संगी मन 'मयारु माटी' वो बखत कइसन निकलत रिहिसे कहिके पूछत रहिथें, वोकर मन के जिज्ञासा शांत करे खातिर ए अंक के पीडीएफ। अवइया बेरा म एकर साफ प्रति बनाय अउ पोस्ट करे के कोशिश करबोन, अभी एहा सिरिफ जिज्ञासा शांत करे खातिर..
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