Tuesday, 7 January 2014

फेसबुक की चर्चा अखबारों में...

6 जनवरी 2013 को मैंने फेसबुक पर *आम औरत पार्टी* .. की संभावनाअों पर एक पोस्ट किया था, जिसे दुर्ग-भलाई के एक अखबार ने अपनी सुर्खियों में स्थान दिया है.....
मैटर इस तरह था--
आम औरत पार्टी क्यों नहीं....
मेरे एक मित्र का कहना है कि *आम आदमी पार्टी* की तर्ज पर *आम औरत पार्टी* का भी गठन किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि महिला अधिकारों से संबंधित मुद्दों को इससे बल मिलेगा, साथ ही सत्ता में इनकी भागीदारी भी बढ़ेगी, जिससे महिलाअों के साथ हो रहे पक्षपात और अत्याचारों पर अंकुश लगेगा। आप इस विषय पर क्या कहना चाहेंगे.....



Monday, 6 January 2014

रेजा...


















चंउड़ी आये हौं जांगर बेचे बर, मैं बनिहारिन रेजा गा
लेजा बाबू लेजा गा, मैं बनिहारिन रेजा गा....

सूत उठ के बड़े बिहन्चे काम-बुता निपटाये हौं
मोर जोड़ी ल बासी खवा के रिक्शा म पठोये हौं
दूध पीयत बेटा ल छोड़ाये हौं करेजा गा... लेजा बाबू....

बेरा उवत के खड़े-खड़े देखत हावंव ए मालिक
मुड़ म आगे सुरुज-नरायन लेजा तैं ह ए मालिक
जांगर भर कोड़हूं-कमाहूं, एक बेर बेरा देजा गा.. लेजा...

बनी बिना तो ए बनिहारिन रहि जाही  लांघन
मैं नइ खाहूं त मोरो पिलवा कइसे पाही जेवन
मोर जोड़ी तो अपन कमई के नइ देवय एक बीजा गा.. लेजा..

सुशील भोले
म.नं. 41-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com

Sunday, 5 January 2014

मचान पर पैरा...

आम तौर पर पैरा (पुआल) को खलिहान या कोठार आदि में ही रखा जाता है, पर अधिकांश वन क्षेत्रों में पैरा रखने के लिए लकड़ी का मचान बनाया जाता है। कहीं-कहीं पर किसी पेंड़ को ही मचान के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा शायद इन क्षेत्रों में लकड़ी की आसानी से बहुतायत में उपलब्धता के कारण होता है। देखिये ऐसे ही दो चित्र....


Friday, 3 January 2014

पहाड़ी नदी के बीच...

बगीचा (जिला-जशपुर, छत्तीसगढ़) में छोटी-छोटी पहाड़ी नदियों का जाल बिछा हुआ है। आप जिस रास्ते से गुजरें कोई न कोई ऐसी नदी अवश्य मिलेगी। इसीलिए ये नदियाँ यहाँ के लोगों के जीवन का अंग बनी हुई हैं। मैं जिस घर पर ठहरा हुआ था, उसके दरवाजे पर भी एक ऐसी ही नदी बहती है। हम जब कभी कहीं से घूम-फिर कर आते तो इस नदी में जाकर आराम करते। एक ऐसी ही शाम नदी के बीच.....

Thursday, 2 January 2014

सरना पूजा स्थल एवं तालाब...

पहाड़ी कोरवा समाज के अध्यक्ष अंधरू राम जी ने बताया कि उनके वनग्राम राजपुर वि.खं.बगीचा जिला-जशपुर (छत्तीसगढ़) में इसी स्थल पर वे सरना पूजा करते हैं। सरना पूजा के रूप में गौरी माता की पूजा करने की बात कही गई, जिनकी एक छोटी प्रतिमा इस तालाब के ऊपरी भाग (मेड़) पर स्थापित है। लोग अंधरू राम जी को पंडा कहकर भी संबोधित करते हैं, क्योंकि यहां के देवस्थलों के मुख्य पुजारी वे ही हैं। उन्होंने गांव के ही दो-तीन अन्य लोगों को अपना शिष्य भी बना लिया है, जिनके माध्यम से वे सभी प्रकार के आध्यत्मिक कार्यों को संपन्न करते हैं।


Wednesday, 1 January 2014

नवा बछर के नवा आस....


मुंदरहा के सुकुवा बिखहर अंधियारी रात पहाये के आरो देथे। सुकुवा के दिखथे अगास म अंजोर छरियाये के आस बंध जाथे। चिरई-चिरगुन मन चंहचंहाये लगथे, झाड़-झरोखा, तरिया-नंदिया आंखी रमजत लहराए लगथें। रात भर के खामोशी नींद के अचेतहा बेरा के कर्तव्य शून्य अवस्था ले चेतना के संसार म संघराये लगथे। तब कर्म बोध होथे, अपन धरम-करम के गोठ सुझथे, सत्-सेवा के संस्कार जागथे, अपन-बिरान अउ अनचिन्हार के पहिचान होथे।

नवा बछर घलो बीतत बछर के अनुभव के माध्यम ले लोगन ल अइसने किसम के नवा आस देथे, नवा बिसवास देथे, नवा रस्ता देथे, नवा नता-गोता, संगी-साथी अउ हितवा मन के संसार देथे। अपन पाछू के करम मन के गुन-अवगुन अउ सही गलत के पहिचान कराथे। करू-कस्सा, सरहा-गलहा मन ले पार नहकाथे, खंचका-डबरा अउ कांटा-खूंटी मन ले अलगे रेंगवाथे। तब जाके मनखे ह मनखे बनथे, वोकर छाप ह जगजग ले उज्जर अउ सुघ्घर दिखथे। लोगन ओला संहराथें, पतियाथें अउ आदर्श मान के ओकर अनुसरण करथें।

छत्तीसगढ़ अभी विकास के दृष्टि ले बालपन म हवय। कुल जमा एके दसक तो बीते हे, एकर स्वतंत्र अस्तित्व के सिरजन होये। इही अवस्था ककरो भी निर्माण के बेरा होथे। वोला सुंदर आकार, संस्कार अउ सदाचार के गुन म पागे के। आज जइसे एकर नेंव रचे जाही, तइसे काल के एकर स्वरूप बनही। सैकड़ों अउ हजारों बछर ले पर के गुलामी भोगत ये माटी के रूआं-रूआं म लूटे के, हुदरे के, चुहके के, टोरे के, फोरे के, दंदोरे के, भटकाये के, भरमाये के, तरसाये के, फटकारे के चिनहा दिखत हे।

अभी घलोक एला अपन पूर्ण स्वरूप के चिन्हारी नइ मिल पाये हे। काबर ते कोनो भी राज के चिन्हारी वोकर खुद के भाखा अउ खुद के संस्कृति के स्वतंत्र पहिचान ले होथे, जे अभी तक अधूरा हे। अउ ये स्वतंत्र स्वरूप के चिन्हारी आज के पीढ़ी ल करना परही। हमर ददा-बबा मन के पीढ़ी ह एला स्वतंत्र पहिचान देवाये खातिर एक अलग प्रशासनिक ईकाई के रूप म तो बनवाये के बुता ल पूरा कर देइन। अब एकर संवागा के जोखा हम सबके हे। कइसे एला आकार देना हे, विस्तार देना हे, पहिचान देना हे, साज अउ सिंगार देना हे, ये हमार पीढ़ी के बुता आय।

ददा-बबा मन जेन सपना ल देखे रहिन हें, वो सपना ल, वो सुघ्घर रूप ल हमन ल गढऩा हे। एकर भाखा ल, साहित्य ल, कला ल, संस्कृति ल, जुन्ना आचार-व्यवहार ल, जीये के उद्देश्य अउ धर्म-संस्कार ल हमन ल बनाना हे। एकर बर पूरा ईमानदारी के साथ हर किसम के स्वारथ ले ऊपर उठके समरपित भावना ले काम करे के जरूरत हे। ए बुता सिरिफ राजनीति के माध्यम ले पूरा नइ हो सकय, एकर बर हर वो माध्यम अउ मंच ल आगू आये के जरूरत हे, जेकर द्वारा समाज संचालित होथे।

छत्तीसगढ़ ल अपन पूर्ण स्वरूप के चिन्हारी मिलय इही आसा अउ बिसवास के साथ आप सबो झन ला नवा बछर के बधाई अउ जोहार-भेंट.....

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल -  sushilbhole2@gmail.com

नवा बछर जब आथे....













नव-दुल्हिन कस सज-संवर के नवा-बछर जब आथे
जिनगी ल रसदार करे बर, नव-रस ल बरसाथे....

ठुडग़ा पेंड़ म जइसे बरसा, लाथे उल्हवा-केंवची पान
इही किसम के नवा-किरन ह जिनगी म लाथे नवा-बिहान
तब करू-कस्सा ह बिसराथे, अउ गुरतुर सबो जनाथे...
नवा-बछर जब आथे.....

सुशील भोले
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com