Sunday, 16 November 2014

छत्तीसगढ़ी दिवस पर संगोष्ठी...

कालिन्दी शिक्षा महाविद्यालय लालपुर, रायपुर में छत्तीसगढ़ी दिवस के अवसर पर शुक्रवार 28 नवंबर 2014 को अपरान्ह 1 बजे से संगोष्ठी का आयोजन किया गया है।

संस्था के प्राचार्य डॉ. सुखदेवराम साहू *सरस* ने जानकारी दी है कि रायपुर नगर निगम के उपायुक्त डॉ. जे.आर. सोनी के मुख्यआतिथ्य में आयोजित उक्त संगोष्ठी में सुशील भोले छत्तीसगढ़ी संस्कृति पर, सुधा वर्मा छत्तीसगढ़ी परंपरा पर, दिनेश चौहान छत्तीसगढ़ी जनउला पर, शीतल शर्मा छत्तीसगढ़ी सिनेमा पर एवं चंद्रशेखर चकोर छत्तीसगढ़ी लोकखेल पर अपना वक्तव्य देंगे।

इसके अतिरिक्त संस्था के छात्र अपनी विभिन्न प्रस्तुति देंगे। ज्ञात रहे इस दिन महाविद्यालय के समस्त शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं छत्तीसगढ़ी में ही बातचीत एवं कार्य करते हैं।

Saturday, 15 November 2014

छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़ के पत्रकार...

छत्तीसगढ़ राज्य की जनभाषा छत्तीसगढ़ी को प्रदेश स्तर पर *राजभाषा* का दर्जा मिले लगभग 7 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अभी भी यह यहां की शिक्षा और राजकाज की भाषा नहीं बन पायी है। राज्य शासन द्वारा राजभाषा आयोग का जरूर गठन किया गया है, लेकिन अधिकार और संसाधन की कमियों के कारण उससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहा है।

इस संबंध में जब भी राज्य शासन के प्रतिनिधियों से चर्चा की जाती है, तो वे केन्द्र सरकार पर ठिकरा फोड़ते हुए कह देते हैं जब तक केन्द्र इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं करेगा, तब तक हम भी कुछ नहीं कर सकते।

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग ने अपने स्तर पर केन्द्र शासन से आठवींं अनुसूची में छत्तीसगढ़ी को शामिल करने के लिए काफी प्रयास किया है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी  अपने-अपने स्तर के अनुरूप बहुत कुछ किये हैं और कर रहे हैं। लेकिन मेरा इस प्रदेश के समस्त पत्रकारों से प्रश्न है कि वे यहां की जनभाषा के लिए क्या कर रहे हैं, आज तक क्या किये हैं? क्या ये अपने-अपने समाचार पत्र, पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर छत्तीसगढ़ी के लिए अलग से पृष्ठ, कार्यक्रम और समय आरक्षित किये हैं?  क्या ऐसा कर सकते हैं? प्रदेश और केन्द्र सरकार पर   इसके लिएनियमित रूप से दबाव बना सकते हैं?      

लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस (28 नवंबर) के अवसर पर  मेरा प्रदेश के समस्त पत्रकार बंधुओं से आग्रह है कि वे छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अुनसूची में शामिल करवाने के लिए अपने-अपने स्तर पर ईमानदार प्रयास करें। छत्तीसगढ़ी को जनभाषा के साथ ही साथ संवैधानिक भाषा, राजकाज और शिक्षा की भाषा बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दें।

सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल -  sushilbhole2@gmail.com

Wednesday, 12 November 2014

लोक संस्कृति के ढेलवा-रहचुली मेला- मड़ई



छत्तीसगढ़ के संस्कृति म मेला-मड़ई मनके घलोक महत्वपूर्ण स्थान हे। मड़ई के शुरूआत जिहां देवारी ले होथे, उहें मेला के आयोजन ह कातिक पुन्नी ले होथे, जेन ह महाशिवरात्रि (फागुन अंधियार तेरस) तक चलथे। छत्तीसगढ़ के भीतर जतका भी सिद्ध शिव स्थल हे, उन सबो म मेला भराथे जेमा राजिम, सिरपुर, शिवरीनारायण, रायपुर के महादेवघाट आदि मन पूरा प्रदेश भर म परसिद्ध हें जिहां चारों मुड़ा के मनखे सैमो-सैमो करत रहिथें। एकर छोड़े अउ कतकों जगा हे जिहां स्थानीय स्तर म अलग-अलग तिथि म मेला आयोजन होवत रहिथे।

खेत म खड़े धान के सोनहा लरी जब बियारा अउ बियारा ले मिसा- ओसा के घर के माई कोठी म खनके लगथे, तब ये मेला-मड़ई के शुरूआत होथे। एकरे सेती कतकों लोगन एला कृषि संस्कृति के अंग मानथें। फेर जिहां तक देखब म आथे के एकर संबंध कोनो न कोना किसम ले अध्यात्म संग जुड़े होथे। छत्तीसगढ़ आदिकाल ले बूढ़ादेव के रूप म भगवान शिव के उपासक रहे हे, एकरे सेती इहां जतका भी बड़का मेला के आयोजन होथे, जम्मो ह सिद्ध शिव स्थल म ही होथे। पहिली ए अवसर ए बधई(पूजवन) देके घलोक चलन रिहीसे। फेर जइसे-जइसे लोगन म शिक्षा के प्रसार होवत जावत हे वइसे-वइसे अब मरई-हरई के रीत ह कमतियावत जावत हे। बिल्कुल वइसने जइसे पहिली जंवारा बोवइया वाले मन अनिवार्य रूप ले बधई देवयं, फेर अब उहू मन सेत (सादा, बिन पूजवन के) जंवारा बो लेथें तइसने मेला-मड़ई म घलोक लोगन अपन मनौती ल सिरिफ नरियर आदि फल-फलहरी म भगवान ल मना लेथें। फेर कतकों मनखे अभी घलोक पूजवन के रिवाज ल धरे बइठे हें।
मेला संग जुड़े ये आध्यात्मिक रूप ह ए बात के जानबा देथे के एकर संबंध सिरिफ खेती-किसानी वाला नहीं भलुक आध्यात्मिक संस्कृति संग घलोक हे। फेर एकर गलत रूप म व्याख्या के संगे-संग एकर आयोजन के कारन अउ रूप ल घलोक बदले जावत हे जेला कोनो भी रूप म अच्छा नइ केहे जा सकय। उदाहरण के रूप म छत्तीसगढ़ के प्रयाग कहे जाने वाला राजिम के प्रसिद्ध पारंपरिक मेला जेला अब कुंभ के रूप म प्रचारित करे जावत हे तेला ले सकथन।

मेला के कोनो भी बड़का आयोजन ल कुंभ के संज्ञा तो दिए जा सकथे फेर वोकर कारन ल बदलना ह अच्छा बात नोहय। छत्तीसगढ़ के संगे-संग देश म भरने वाला जम्मो मेला ह सिरिफ शिव स्थल म ही भरथे, एकरे सेती नानपन ले ये सुनत आये रहे हन के राजिम मेला ह कुलेश्वर महादेव के नांव म भराथे। फेर अब जब ले एकर नांव ल कुंभ कर दिए गेहे तब ले एकर कारन ल राजीव लोचन के नांव म भरने वाला बताए जाथ्ेा। एहर इहां के मूल संस्कृति के संग खिलवाड़ आय जेला कोनो भी रूप म माफी नइ करे जा सकय। सरकार अउ कथित संस्कृति मर्मज्ञ मनला अपन अइसन गलती ल सुधारना चाही।

राजिम मेला के संगे-संग इहां पंचकोसी यात्रा के महत्व घलो बताये जाथे, जेमा राजिम के संगम म स्थित कुलेश्वर महादेव के संगे-संग चंपेश्वर महादेव (चांपाझार या चम्पारण्य), बम्हनिकेश्वर महादेव (बम्हनी), फणिकेश्वर महादेव (फिंगेश्वर), अउ कमरेश्वर महादेव (कोपरा) के एके संग दरसन करे के रिवाज हे, तभे ये राजिम मेला के दरसन लाभ ह पूरा छाहित होके मिलथे।

मेला चाहे कहूंचो के होवय, वोकर रूप ह बड़का होवय ते छोटका होवय। फेर जब तक वोमा ढेलवा, रहचुली अउ कुसियार के कोंवर-कोंवर डांग नइ दिखय तब तक मन नइ भरय। लोगन होत मुंदरहा मेला तीर के नंदिया-नरवा म नहा-धो के भगवान भोलेनाथ के पूजा-पाठ करथें। तेकर पाछू फेर चारों-मुड़ा कटाकट भराये मेला (बाजार) ल घूमथें- फिरथें। रंग-रंग के जिनिस बिसाथें। अउ जब मन भर के ढेलवा-रहचुली झूल लेथें, त फेर, कांदा, कुसियार, ओखरा झड़कत घर लहुटथें।
(फोटो-उदंती.काम, और गूगल महाराज से)

सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com

Tuesday, 11 November 2014

वंदे मातरम...











घर-घर ले अब सोर सुनाथे वंदे मातरम
लइका-लइका अलख जगाथें वंदे मातरम...
देश के पुरवाही म घुरगे वंदे मातरम
सांस-सांस म आस जगाथे वंदे मातरम
रग-रग म तब जोश जगाथे वंदे मातरम....
उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम मिलके गाथें
कहूं बिपत आये म सब खांध मिलाथें
तब तोर-मोर के भेद भुलाथे वंदे मातरम....
हितवा खातिर मया लुटाथे वंदे मातरम
बैरी बर फेर रार मचाथे वंदे मातरम
अरे पाक-चीन के छाती दरकाथे वंदे मातरम...
सुवा-ददरिया-करमा धुन म वंदे मातरम
भोजली अउ गौरा म सुनथन वंदे मातरम
तब देश के खातिर चेत जगाथे वंदे मातरम...
सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com

Saturday, 8 November 2014

कब होबो सजोर...












सुन संगी मोर, कब होबो सजोर
आंखी ले झांकत हे, आंसू के लोर....
काला अच्छे दिन कहिथें, मन मोर गुनथे
तिड़ी-बिड़ी जिनगी ल, मोती कस चुनथे
किस्मत गरियार होगे, ते लेगे कोनो चोर.....
सरकार तो देथे, आनी-बानी के काम
बीच म कर देथे फेर, कोन हमला बेकाम
मुंह के कौंरा नंगाथे, देथे कनिहा ल टोर....
रंग-रंग के गोठ होथे, रंग-रंग के बोल
आगे सुराज कहिके, पीटत रहिथें ढोल
फेर बरही दीया सुख के, कब होही अंजोर...
सुशील भोले 
म.नं. 54-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
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Tuesday, 4 November 2014

नरेन्द्र वर्मा की किताबों का विमोचन...

वरिष्ठ साहित्यकार नरेन्द्र वर्मा की चार किताबों का विमोचन रविवार 2 नवंबर 2014 को भाठापारा के शा. उ. मा. शाला के सभागार में गरिमामय माहौल में संपन्न हुआ। स्थानीय विधायक शिवरतन शर्मा के मुख्य आतिथ्य एवं वरिष्ठ साहित्यकार एवं सृजनगाथा डॉट कॉम के संपादक जय प्रकाश मानस की अध्यक्षता में 1-भाटापारा के साहित्यिक जातरा, 2- तब अउ अब, 3- बइहा (खलील जिब्रान की रचनाओं का छत्तीसगढ़ी अनुवाद) एवं 4- थरहा नामक किताबों का विमोचन हुआ।
इस अवसर पर सुशील भोले, संजीव तिवारी, चेतन भारती, रवीन्द्र गिन्नौरे, बलदेव भारती, डॉ. सुधीर पाठक, डॉ. नरेश वर्मा, चोवाराम बादल आदि विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थे। विमोचन समारोह के पश्चात काव्य गोष्ठी का भी आयोजन किया गया, जिसमें उपस्थित कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।





Monday, 3 November 2014

राष्ट्रभाषा-राष्ट्रसंस्कृति

इस देश की हर भाषा राष्ट्रभाषा है, हर संस्कृति राष्ट्रसंस्कृति है। इन सभी का संरक्षण हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।

*सुशील भोले*
दैनिक नवप्रदेश के 5 नवंबर 2014 के अंक में मेरा फेसबुक वाल का पोस्ट.....