Saturday, 7 November 2020

चंदैनी गोंदा स्वर्ण जयंती....

चंदैनी गोंदा के स्वर्ण जयंती के बेरा म...
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उपरोक्त चित्र चंदैनी गोंदा के मुख्य पर्दे का है जिसमें स्व. प्यारेलाल गुप्त के कविता की पंक्तियां अंकित हैं। ये पंक्तियां चंदैनी गोंदा का प्रदर्शन कैसा होता रहा होगा, इसकी ओर इशारा करती है।
चंदैनी गोंदा की भव्यता, प्रभाव और उद्देश्यों की एक झलक ‘‘चंदैनी गोंदा-छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा’’ नामक स्मारिका, जो 7 नवम्बर 1976 को विमोचित हुई थी। उसमें लिखे गए सम्पादकीय से मिलती है, जो यथावत प्रस्तुत है।
*लोक-संस्कृति की देहरी पर दो क्षण*

एक छोटे से खलिहान में छत्तीसगढ़ के शीर्षस्थ साहित्यकार, बुद्धिजीवी, राजनेता, लोक कलाकार और दर्शक जब एकत्रित हुए तो कितनी अशेष जिज्ञासा मन में थी। कितने प्रश्न थे जो रह-रह कर उभर रहे थे। सामने मंच था जो लोकनाट्य-शैली में बनाये गये पर्दे से सजा था। *क्या है ‘‘चंदैनी गोंदा’’ के सर्जक के मन में ?* परिष्कृत मनोरंजन या लोक-जीवन से साक्षात्कार की गंभीर चिंता? तमाशबीन की तरह लोक-संस्कृति का विद्रूप प्रस्तुत करना या लोक-संस्कृति की वास्तविक ऊष्मा को सामने लाना? तथाकथित सहानुभूति या वास्तविक करूणा ? पर्दा के उठते ही शंकायें घटने लग जाती हैं और प्रश्नों के कुहासे से एक चांद का जन्म होता है। चांद बी का पुनर्जन्म। *लोक-संस्कृति का पुनर्जागरण।* छत्तीसगढ़ की मिट्टी की सोंधी खुशबू। ‘‘चंदैनी गोंदा’’ जैसी हृदयग्राही सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का जन्म।

*स्थान-बघेरा। 07 नवम्बर 1971 की ठंडी रात। संयोजक-निर्माता और प्रस्तुतकर्ता रामचन्द्र देशमुख।*

गुलाबी ठंड से सीजती हुई पैरी की एक और रात। चारों ओर भीड़। मनुष्यों का महासागर। सघन अमराई। रोशनी से झिलमिलाता हुआ ‘‘चंदैनी गोंदा’’ का मंच। पीछे चांद और सितारों से जड़ा आसमान। मंत्रमुग्ध दर्शक। रात 9.00 बजे से सुबह 6.00 बजे तक अपलक निहारती हुई आंखें। एक दूसरे से सटे बैठे हुए लोग। एक दूसरे के सहारे रात भर खड़े हुए लोग। किसे पता रात कैसे गुजर गई। कौन सा सम्मोहन था जो रात भर अपने जादुई संस्पर्श से लोगों को बांधे रखने में समर्थ था। संगीत का वशीकरण या लोकनृत्य की अद्भुत संरचना ? गीतों की मिठास, अभिनय का अनूठा प्रदर्शन, गायकों का स्वर ? कौन बतायेगा ? नौ घंटे का यह कार्यक्रम कितने नये अनुभवों के साक्षात्कार से पूर्ण था। *गये तो अलग-अलग 50 हजार लोग थे लेकिन लौटते समय सब एक कैसे हो गये ? एक सुबह इतनी सार्थक और नई कैसे हो गई ?*
स्थान बदले। लोग बदले। लेकिन सम्मोहक स्थिति नहीं बदली। चंदैनी गोंदा के छोटे-बड़े उनचास प्रदर्शन हुए। लगभग 25 लाख लोगों ने देखा। शहर से लेकर कस्बों और गाँवों तक इस सम्मोहन का विस्तार होता चला गया। *07 नवम्बर 1971 को बघेरा में जिस अभिनव सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरूआत हुई, वह धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ अंचल के लोकजीवन की प्रामाणिक कथा बन गई। महानदी की तरह विराट, इस सांस्कृतिक जलधारा का स्पर्श छत्तीसगढ़ को उस समय मिला जब उसके होंठों पर तृषा की विकराल छाया थी और उसके आत्मगौरव की जमीन पर दरारें पड़ चुकी थीं।*
*इस पूरे दृश्य के पीछे एक चांद बी है। छत्तीसगढ़ की चांद बी। महाराष्ट्र और उड़ीसा की चांद बी। गुजरात और बंगाल की चांद बी। भारत वर्ष की चांद बी। मां की गोद और पिता के स्नेह से वंचित चांद बी। रोग भूख से जर्जर चांद बी। एक दिन इसी चांद बी की आहत पुकार ‘‘चंदैनी गोंदा’’ के सर्जक के भीतर उतरती चली गई थी। लगा था, हजारों कमजोर और असहाय हाथ उससे सहारा मांग रहे हैं। पिता का स्नेह और मां की ममता मांग रहें है। जिस्म को ढंकने के लिए वस्त्र और क्षुधा शांत करने के लिए रोटी मांग रहे हैं। कितने आर्तनाद, आहत और विवश आवाजों के बीच ‘‘चंदैनी गोंदा’’ का जन्म हुआ, यह स्वयं में एक महाकाव्य का विषय है। चांद बी आज निराधार नहीं है। उसकी पीड़ा इस अंचल की सबसे जीवंत घटना बन चुकी है और हजारों चांद बी का दर्द लाखों लोगों के भीतर नई बेचैनी के रूप में ढल चुका है। हर सर्जना के लिए ऐसी बेचैनी का होना जरूरी है। इसके बिना किसी सार्थक कृति का जन्म मुश्किल है।*

*‘‘छत्तीसगढ़ और चंदैनी गोंदा’’ धीरे-धीरे दो अगल-अलग संबोधनों की सीमा लांघकर एक दूसरे में आत्मसात हो गये। ‘‘चंदैनी गोंदा’’ प्रतीक रूप में छत्तीसगढ़ बन गया।* ‘‘चंदैनी गोंदा’’ को प्यार करने वाले लोग छत्तीसगढ़ को और अधिक गहराई से प्यार करने लगे। यहां की मिट्टी उनमें कस्तूरी गंध भरने लगी। यहां की हवा उन्हें मलयानिल का आभास देने लगी। यहां की बोली उनके हृदय में मिठास भरने लगी। यहां के लोग उनके अभिन्न और आत्मीय बनने लगे। उनकी पीड़ा और खुशी सबकी पीड़ा और खुशी बन गई। एक कृषक की जिंदगी खेत के मेड़ों को पार कर कस्बों और शहरों के भीतर समा गई। *पहली बार शहर और गाँव के बीच खड़ी हुई दीवार टूटी और सदियों से असंपृक्त लोग एक दूसरे की जिन्दगी में विलीन हो गये। किसी भी सांस्कृतिक पुनर्जागरण की यह सबसे अनिवार्य शर्त होती है, जो पूरी हुई। विगत तीन दशकों की यह सबसे बड़ी घटना थी। मानवीय रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने में सांस्कृतिक उपकरण कितने महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माध्यम हैं, इसका ज्वलंत प्रमाण ‘‘चंदैनी गोंदा’’ से मिला।*
जिंदगी को बाटने वाली सैकड़ों चीजें हैं, जोडऩे वाली गिनी चुनी। धर्म, राजनीति, शिक्षा, दर्शन जैसे कितने ही सर्जनात्मक तत्व अपनी परिणति तक पहुंचते-पहुंचते खंडित जिंदगी के अवशेष मात्र रह जाते हैं। जिंदगी को खूबसूरत बनाने की कल्पना नये अभिशाप के रूप में बदल जाती है। विघटन का यह सिलसिला तब और तेज हो जाता है जब बदलने का अहम, सर्जनात्मक प्रयासों से भी बड़ा हो जाता है। क्या यह सच नहीं है कि धर्म और राजनीति आदमी को बदलने में जब असमर्थ हो गये तब खुद जंजीर की तरह आदमी के गतिशील पांवों में जड़ गये। अगर इस जंजीर के पाश को तोडऩे वाली संस्कृति की मानवीय ताकत नहीं होती तो बीसवीं सदी का आदमी आज तक अपनी जिंदगी को दांव पर लगा चुका होता। स्वयं को पहचानने के लिए लोक-जीवन में पैठे हुए लोग लोक-संस्कृति के उदात्त तत्वों में केवल झांकते ही नहीं हैं, अपने परिष्कार के लिए उसका प्रयोग भी करते हैं। *‘‘चंदैनी गोंदा’’ छत्तीसगढ़ की आत्मा से साक्षात्कार के साथ ही आत्मपरिष्कार का एक सांस्कृतिक प्रयोग भी है।*
*‘‘चंदैनी गोंदा’’ के आत्ममुग्ध दर्शकों ने हजारों आत्मीय पत्रों में इस सांस्कृतिक विरासत की जो प्रशंसा की है उसके पीछे कोई मजबूरी या व्यावसायिक छद्म नहीं है। यह आत्म अन्वेषण के बाद हुई, अपनत्व भरी प्रतिक्रिया है। लगता है जैसे लोग खुद को संबोधित कर रहे हों’’ मैंने इस कार्यक्रम के अंतर्गत कुछ गीतों को सुना, उन्होंने मुझे गदगद कर दिया’’ - (स्व. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी) ’’चंदैनी गोंदा को यदि हम छत्तीसगढ़ की माटी से ओतप्रोत उसकी लोक संस्कृति का प्रतीक मान लें तो उचित और उपयुक्त ही होगा’’-(स्व. प्यारेलाल गुप्त)’’ ऐसा लगा कि इसके आयोजक छत्तीसगढ़ की आत्मा को साकार कर अखिल भारतीय मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं’’ -(पतिराम साव) वस्तुत: इस क्षेत्र की कला को भारतीय स्तर पर लाने के लिए यह महान प्रयोग है (चन्दूलाल चन्द्राकर) हम लोग अपनी छत्तीसगढ़ी संस्कृति को भूल गये। इसे जागृत करने का जो प्रयास किया गया वह प्रशंसनीय है। (मोहन लाल भतरिया) ऐसा लगता था जैसे हम गाँव में बैठे हैं और गाँववासियों का वास्तविक जीवन देख रहे हैं (पाल) अपनी जिंदगी में अभी तक ऐसा अद्भुत कार्यक्रम देखने में नहीं आया था। (दिलेश्वर प्रसाद) यह कार्यक्रम इतना मार्मिक है कि छत्तीसगढ़ के लोगों को अपने इतिहास एवं संस्कृति के लिए जान देने की प्रेरणा मिलती है। (पवन दीवान) चंदैनी गोंदा ने मुझे मुग्ध ही नहीं किया अपितु मुझे अपने छत्तीसगढ़ी होने का आत्म गौरव दिया। (विजेन्द्र कुमार श्रीवास्तव) The Programme was so interesting that we (though non-Chhattisgarhi) sat up to 4.30 and enjoyed ourselves thoroughly. It gave a real glimpse of Chhattisgarh. Indeed a commendable show (Mrs. Grover) *
*आज भी ‘‘चंदैनी गोंदा’’ का आयोजन जहां होता है वहां लोग लहरों की तरह उमड़ पड़ते हैं। साठ-पैंसठ हजार लोग जमीन पर, पेड़ों पर, बैलगाड़ी पर और कभी-कभी हाथी पर बैठकर अपलक यह कार्यक्रम देखते हैं। लगता है जैसे किसी विराट उत्सव में हिस्सा ले रहे हों। आफिसर, राजनेता, अध्यापक, वकील, किसान, मजदूर, वृद्ध, बच्चे, महिलायें सब एक साथ बैठकर इसे देखते हुए यह भूल जाते हैं कि उनके बीच कोई दूरी है। सब समान रूप से उद्वेलित होते हैं। ठहाके लगाते हैं। शोषण के दृश्यों को देखकर क्रोध से भर उठते हैं और जब कभी अत्याचार का जीवंत दृश्य साकार होता है, आंखें भीगने लग जाती है। कोई किसी से कुछ नहीं कहता। सब जैसे अपने में डूब जाते हैं। जागते हैं तो लगता है हम सब अभिन्न हैं। आत्मीय रिश्तों से बंधे हुए जीवन संघर्ष में रत एक ही उद्यान के फूल। फूल जो प्रतीक रूप में ‘‘चंदैनी गोंदा’’ है।*
छत्तीसगढ़ भर में फैले हुए पचास-साठ लोक कलाकारों को एकत्रित करना, लोक धुनों का संग्रह करना, लोक गीतों को समसामयिक जिंदगी के निकट ले जाना, लोक कलाकारों की स्वच्छंद अभिव्यक्ति को सर्जनात्मक आयाम देना, एक उद्देश्य पूर्ण कथानक का निर्माण करना और स्वयं प्रभावशाली अभिनेता के रूप में शरीक होना, यह रामचन्द्र देशमुख के ही वश की बात है। भावुक और संवेदनशील लोगों को एक मंच पर टिकाये रखना कितना मुश्किल काम है, यह सांस्कृतिक कार्यक्रम के संयोजकों से छिपा नहीं है। लोकप्रियता के प्रलोभन में समझौता करने वाले लोगों की भी इस क्षेत्र में कमी नहीं है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को अपने संकीर्ण मंतव्य के प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाने वाले लोग कहां नहीं मिलते। लोककला के छद्म में व्यवसाय करने वाले कितने ही लोकधर्मी कलाकारनुमा लोग आये दिनों अपना उल्लू सीधा करते हैं। ऐसी विकट स्थिति में भी लोककला का यह मंच गरिमा और अर्थवत्ता से पूर्ण है। इसका श्रेय रामचन्द्र देशमुख की निश्छल कला-दृष्टि और संवेदनशील मानवीय आस्था को ही है। अगर उनकी प्रेरक-संवेदना और कला-चेतना इसके पीछे नहीं होती तो लोक-जीवन की यह मनोरम झांकी बहुत पहले विसर्जित हो जाती।
छत्तीसगढ़ की यह सांस्कृतिक चेतना जिजीविषा का रूप धारण कर चुकी है, उसकी ऊर्जा अशेष है। यह एक अविराम यात्रा है। एक ऐसी यात्रा जो नदी की यात्रा की तरह शुरू होती है और अंतहीन विराट महासागर के रूप में बदल जाती है।
प्रणम्य हैं वे यात्री जो मानवीय-संबंधों को वास्तविक और आत्मीय रूप देने की इस खोज यात्रा में साथ चल रहे हैं।
*नारायण लाल परमार : त्रिभुवन पांडेय*

(मेरे सम्पादन में शीघ्र प्रकाश्य स्मारिका के ‘संशोधित एवं परिवर्धित’ संस्करण का अंश)
*- प्रो. सुरेश देशमुख, धमतरी*
   मो.नं. 88897-70085

पर्व और मान्यताएँ....

पर्व और मान्यताएं.....
          हमारे यहां बहुत से ऐसे पर्व हैं, जिन्हें अलग-अलग समुदायों के लोगों के द्वारा अलग-अलग अवसर पर या अलग-अलग संदर्भों के अंतर्गत मनाया जाता है। उदाहरण के लिए हम "नवा खाई" का पर्व ले सकते हैं।
छत्तीसगढ में "नवा खाई" का पर्व तीन अलग-अलग अवसरों पर मनाया जाता है। ओडिशा राज्य की सीमा से  लगे वे लोग जो उत्कल संस्कृति को जीते हैं ,इसे ऋषि पंचमी को, जो कि भादो मास को संपन्न होने वाले गणेश चतुर्थी के पश्चात् आता है, उस दिन मनाते हैं।
           गोण्डवाना की संस्कृति जीने वाले लोग इसे कुंवार मास की शुक्ल पक्ष में अष्टमी या नवमी तिथि को मनाते हैं। इसी तरह अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग के अंतर्गत आने वाले लोग जो कि मैदानी भाग में रहते हैं, इसे कार्तिक मास में मनाए जाने वाले दीपावली पर्व के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर अन्नकूट के रूप में मनाते हैं।
         नवा खाई पर्व मनाने का सभी का उद्देश्य एक ही है, अपने ईष्ट को अपनी नई फसल को समर्पित करना। किन्तु अलग-अलग तिथि और अलग-अलग रूप में इसे मना लिया जाता है।
      ऐसे ही बहुत से ऐसे पर्व हैं, जिन्हें अलग-अलग संदर्भ के अनुसार अलग-अलग समूह के लोग मनाते हैं।
             हम "छेरछेरा" पर्व को उदाहरण के रूप में ले सकते हैं। गोंडवाना की संस्कृति को मानने वाले लोग  इसे "गोटुल/घोटुल" की शिक्षा में पारंगत हो जाने के पश्चात पूस पूर्णिमा के अवसर पर तीन दिनों का पर्व मनाते हैं।
           यहां के मैदानी भाग में रहने वाले अन्य पिछड़े और सामान्य वर्ग के अंतर्गत आने वाले लोग केवल एक दिन का पर्व फसल की लुआई-मिंजाई के पश्चात् अन्न दान के रूप में मनाते हैं। इन सबसे अलग मुझे अपने साधना काल में जो ज्ञान प्राप्त हुआ, उसके अनुसार यह पर्व शिव जी द्वारा पार्वती से विवाह पूर्व लिए गये परीक्षा के अंतर्गत नट बनकर मांगा गया भिक्षा का प्रतीक स्वरूप मनाया जाने वाला पर्व है।
      मित्रों, यहां यह जानना आवश्यक है कि यहां के हर पर्व का संबंध किसी न किसी रूप में अध्यात्म से अवश्य है। आज हम उचित जानकारी के अभाव में उसे अन्य संदर्भों के अंतर्गत मनाये जाने को स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि सभी पर्वों का मूल कारण जानने के लिए कागजी प्रमाणों से ऊपर उठ कर तर्क और लोक परंपरा की कसौटी पर उसे परखना आवश्यक है।
        यहां पर मैं "होली" पर्व को उदाहरण के रूप में रखना चाहूंगा। हम आम तौर पर यह जानते हैं कि "होलिका दहन" के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है। जहां तक हम छत्तीसगढ की मूल संस्कृति के संदर्भ में बात करें तो यह सही नहीं है। यहां जो पर्व मनाया जाता है, वह "काम दहन" का पर्व है। इसीलिए हम इसे "मदनोत्सव" या "वसंतोत्सव" के रूप में भी मनाते हैं।
आप सभी को यह स्मरण होगा कि शिव पुत्र के हाथों मरने का वरदान प्राप्त ताड़कासुर के संहार के संहार के लिए तपस्यारत शिव की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा गया था। तब कामदेव वसंत का मादक भरे मौसम का चयन कर अपनी पत्नी रति के साथ शिव तपस्या भंग करने का प्रयास कर रहे थे। इस पर शिव जी कुपित हो गये और कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर दिए।
          हमारे छत्तीसगढ में इसीलिए इस पर्व को वसंत पंचमी से लेकर फाल्गुन पूर्णिमा तक लगभग चालीस दिनों का पर्व मनाया जाता है। वसंत पंचमी के दिन अरंडी नामक पौधे को होली दहन स्थल पर गड़ाया जाता है, जो कि कामदेव के आगमन के प्रतीक स्वरूप होता है। उसके पश्चात् वासनात्मक गीतों और नृत्यों के माध्यम से फाल्गुन पूर्णिमा तक इस पर्व को मनाया जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा को होली दहन स्थल पर एकत्रित लकड़ी आदि में अग्नि संचार के पश्चात यह पर्व संपन्न होता है।
          आप सोचिए, होलिका तो एक ही दिन में लकड़ी एकत्रित करवा कर उसमें अग्नि प्रज्वलित करवाती है, और स्वयं ही उसमें जलकर भस्म हो जाती है। फिर उसके लिए चालीस दिनों का पर्व मनाने की क्या आवश्यकता है? इस पर्व के अवसर पर प्रयोग किए जाने वाले वासनात्कम शब्दों, दृश्यों और नृत्यों से होलिका का क्या संबंध है?
       मित्रों, मैं हमेशा यह कहता हूं कि यहां की मूल संस्कृति को उसके वास्तिवक रूप में पुनः लिखने की आवश्यकता है, तो उसका यही सब कारण है।
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो नं 9826992811

Tuesday, 3 November 2020

डॉ. नरेंद्र देव वर्मा.. कुशल चितेरे...

डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा : छत्तीसगढ़ महतारी की महिमा के चितेरे - डॉ. चन्द्रकुमार जैन
छत्तीसगढ़ की माटी को धन्य करने वाले जिन महामानवों पर हम गर्व कर सकते हैं उनमें डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा का नाम अग्रगण्य है। वे सही अर्थ में छत्तीसगढ़ के सोनहा बिहान के स्वप्न दृष्टा और सृजेता भी थे। धन्य पिता धनीराम जी की आँखों के दो ज्योति पुंज बनकर स्वामी आत्मानंद जी और डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा ने यहाँ के जन-मन की अभिलाषाओं को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर मानो पूर्ण करने का बीड़ा उठाया। स्वामी आत्मानंद तथा डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा दोनों अपने-अपने क्षेत्र की विभूतियाँ बनकर अमर हो गए।
यह सुखद संयोग है कि छत्तीसगढ़ के राज गीत अरपा पैरी के धार के सर्जक डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा की लाड़ली मुक्तेश्वरी देवी हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की जीवन संगिनी हैं। स्वामी आत्मानंद की अनोखी वक्तृत्व कला और उनके पारदर्शी व हृदयस्पर्शी चिंतन के तो लोग दीवाने थे और आज भी हैं। डॉ.वर्मा वाग्देवी की आराधना माटी-महतारी की सेवा को समर्पित हो गए। दोनों सपूतों ने इस धरती का शुभ भावों से श्रृंगार कर अपने कर्तव्य कर्म के साथ-साथ इस माटी का भी गौरव बढ़ाया है। दोनों महतारी की अस्मिता और मानवता की तेजस्विता के प्रतीक बन गए।
छोटी सी उम्र पाकर भी मानव जीवन को एक न्यास यानी ट्रस्ट की तरह कैसे जिया जा सकता है इसकी मिसाल हमें डॉ. वर्मा के जीवन से मिलती है। जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मैया की धुन सुनते ही लोग स्तंभित हो जाते हैं। जैसे कि राष्ट्र्गान के स्वर गूँज रहे हैं।  वैसे भी वह राजगीत तो है ही। माता की ऐसी वंदना सचमुच बड़ी दुर्लभ बात है।  यह कोई बिरला सपूत ही कर पाता है।  यह गीत जैसे डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा की आत्मा का संगीत है। छत्तीसगढ़ महतारी की यह वंदना ही नहीं, सम्पूर्ण भुइँया की महिमा और उसकी खुशहाली की प्रार्थना है। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा की इस अमर रचना में समूचे छत्तीसगढ़ का वैभव एकबारगी साकार हो उठा है। यही कारण है कि स्वामी आत्मानंद ने अपने अनुज डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के बारे में स्मरण स्वरूप लिखे लेख में कहा है कि सोनहा बिहान की चतुर्दिक ख्याति की खबरें सुनकर वे भी इसकी प्रस्तुति देखने के लिए लालायित हो उठे। 1978 के अंत में महासमुंद में एक प्रदर्शन तय हुआ । स्वामी जी को डाक्टर साहब ने बताया कि आप चाहें तो उस दिन प्रदर्शन देख सकते हैं । महासमुंद में विराट दर्शक वृंद को देखकर स्वामी जी रोमांचित हो उठे । उनके भक्तों ने उन्हें विशिष्ट स्थान में बिठाने का प्रयत्न किया लेकिन डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने स्वामी जी को दर्शकों के बीच जमीन पर बैठकर देखने का आग्रह किया । स्वामी जी उनकी इस व्यवस्था से अभिभूत हो उठे । उन्होंने उस घटना को याद करते हुए लिखा है – ‘नरेन्द्र तुम सचमुच मेरे अनुज थे ।‘
वास्तव में सोनहा बिहान छत्तीसगढ़ के लिए सुबह की तलाश का पर्याय बना। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने घर परिवार, माता-पिता के लिए विवाहित जीवन को कर्त्तव्य भाव से स्वीकार किया । धनीराम जी का केवल यह सपूत ही विवाहित हुआ । उनके शेष चार बेटों में तीन तो सन्यासी हो गए, मगर एक पुत्र अविवाहित रहकर विवेकानंद विचारधारा के लिए समर्पित होकर अमूल्य सेवाएं दे रहे हैं । सही माने में डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा छत्तीसगढ़ के जागरण-पुरुष थे। इतिहास रचने वाले महामानव बनकर उनका व्यक्तित्व स्वयं एक इतिहास की मानिंद बन गया। उनका जीवन संगीत में ढला ही नहीं, खुद संगीत बन गया। सोनहा बिहान से प्रेरित होकर छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने न जाने कितनी संस्थाएं गठित कीं , होड़ सी मच गयी।  हरेक के मन में जैसे अपने हिस्से की बिहान की साझेदारी की ललक सी पैदा हो गयी।
दरअसल सच्ची साधना कभी अकेले मुक्ति के पक्ष में नहीं रहती। वह सबके कल्याण, सबकी मुक्ति का पथ प्रशस्त करने में ही अपनी मुक्ति को सार्थक मानती है। यही सार्थकता डॉ. वर्मा के जीवन की पहचान बन गयी। ऐसा जीवन मात्र सफल नहीं, सुफलदायी कहलाता है। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने हर मोर्चे पर अपनी ताकत का अहसास करवाया । वे एकांतवासी शब्द साधक या संगीत आराधक बनकर बैठ नहीं गए, बल्कि  लोगों के जीवन की राह आसान बनाने के लिए  सच्चे माटीपुत्र के रूप में काम करते रहे। उपेक्षा, तिरस्कार,  शोषण और अत्याचार के विरुद्ध उनकी आवाज़ कभी मद्धिम नहीं हुई। वे लोगों के भीतर हर तरह की पराधीनता के खिलाफ लड़ने की ताकत की पुकार बने रहे। वे कथाकार, कवि, गीतकार और दार्शनिक तो थे ही, छत्तीसगढ़ के ख्याति प्राप्त भाषा-विज्ञानी और अत्यंत कुशल मंच संचालक भी थे। गीत सृजन के साथ स्वर रचना में भी वे निष्णात थे।
अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार,

इंदरावती हा पखारे तोर पइयां,

जय हो, जय हो छत्तीसगढ़ मइयां।
ये पंक्तियाँ डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा की पहचान और छत्तीसगढ़ के मान के रूप में ढल गयीं।
स्मरणीय है कि नरेन्द्र देव वर्मा अपनी बुनियादी तालीम के दौरान एक आम विद्यार्थी ही थे। बाद में उनकी प्रतिभा में निखार आया। बी.ए. में उनकी प्रखर मेधा उभरी। यह सचमुच बड़े गर्व की बात रही कि वे सागर विश्वविद्यालय में प्रख्यात समालोचक और लेखक आचार्य नंददुलारे बाजपेयी के शिष्य थे । डॉ. नरेन्द्र देव ने सागर विश्वविद्यालय से श्रेष्ठ वक्ता के रूप में अलग पहचान बनायी। वादविवाद प्रतियोगिता में अव्वल रहे।
डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा की शादी मात्र साढ़े अठारह वर्ष की उम्र में हो गई । धनीराम जी वर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे तुलेन्द्र। यही तुलेन्द्र आगे चलकर छत्तीसगढ़ के विवेकानंद स्वामी आत्मानंद कहलाये । उसके बाद क्रमश: दूसरे क्रम के पुत्र देवेन्द्र भी बड़े भाई से प्रभावित होते दिखे । इसीलिए देवेन्द्र का ब्याह सुनिश्चित हुआ।  परन्तु, अग्रज से प्रभावित इस होनहार अनुज के बारे में याद भी रखना चाहिए कि नरेन्द्र देव वर्मा ने बार-बार लिखा है कि बड़े भैय्या का आशीष अगर उन्हें भी मिला होता तो वे भी विवाह बंधन से मुक्त होकर उन्हीं की तरह सन्यासी जीवन बिताते । स्वामी आत्मानंद ने उन्हें समझाया भी कि शायद ईश्वर उन्हें विवाहित जीवन बिताते हुए ही सेवा का दायित्व देना चाहते थे । इसलिए विचलित हुए बगैर ईश्वरीय इच्छा को मानकर कार्य करना है ।
साहित्यकार डॉ. परदेशीराम वर्मा ने बहुत सटीक लिखा है कि स्वामी जी की उदार परंपरा में ही गृहस्थ डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा भी ढले थे । उन्होंने जीवन भर जागृति और परोपकार का काम किया । भाषा एवं संस्कृति के लिए उनका नाम स्तुत्य है तो धर्म एवं लोकमंच के लिए उनका अवदान भी ऐतिहासिक है । वे विवेक ज्योति पत्रिका के संपादक रहे । स्वामी विवेकानंद जी की जन्म शताब्दी 1963 में मनाई गई । स्वामी आत्मानंद के सपनों को साकार करने के लिए नरेन्द्र देव वर्मा ने दिन रात काम किया । उन्होंने जीवन भर शाम के तीन घंटों को आश्रम के लिए सुरक्षित रखा । वे नौ बजे रात्रि तक आश्रम के कामों में व्यस्त रहते । उसके बाद घर आकर मित्रों से मिलते-जुलते और रात्रि चार बजे तक लेखन अध्ययन करते ।
यह भी कि डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा छत्तीसगढ़ के पहले बड़े लेखक है जो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समान रूप से लिखकर मूल्यवान थाती सौंप गए । वे चाहते तो केवल हिन्दी में लिखकर यश प्राप्त कर लेते । लेकिन उन्होंने छत्तीसगढ़ी की समृद्धि के लिए खुद को खपा दिया । वे पहले बड़े लेखक थे जो मंच संचालक के रूप में बेहद यशस्वी बने । सोनहा बिहान में मंच संचालक ही सबसे प्रभावी अभिनेता सिद्ध हुआ । वे कविताओं की स्वर लिपियाँ रचने वाले छत्तीसगढ़ के पहले बड़े रचनाकार सिद्ध हुए ।
डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के अग्रज स्वामी आत्मानंद ने लिखा है कि मां शारदा देवी की पावन जन्म स्थली जयरामवाटी जाकर डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा ने मां से वरदान मांगा कि उन्हें वे अपना पुत्र बना लें । और मां शारदा की कृपा से उसी दिन से नरेन्द्र देव की लेखनी में चमत्कार दिखने लगा । बेशक वे जीवन भर वे अपने अग्रज को आदर्श मानते रहे लेकिन सदगृहस्थ बनकर अपने दायित्वों का पूर्ण मनोयोग से निर्वाह भी करते रहे । इस धरती पर मात्र चार दशक की अपनी यात्रा पूरी कर डॉ. वर्मा चल बसे परन्तु  छत्तीसगढ़ महतारी के ये सपूत अपने छोटे से जीवन में वह काम कर गये जो सैकड़ों वर्षों का जीवन पाकर भी सामान्य प्रतिभा का व्यक्ति नहीं कर पाता । उन्होंने सोनहा बिहान के माध्यम से छत्तीसगढ़ को कई रत्न दिए , कई रत्नों को तराशा।  कई पत्थरों को मूरत गढ़ी और कई ज़िंदगियों में नयी उम्मीदों का संचार कर अपनी ज़िंदगी का चित्र पूरा कर इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया।

नरेंद्र देव वर्मा.. स्वामी जी..

'नरेंद्र - मेरा अनुज'
-परम पूज्य स्वामी आत्मानंद जी
स्वामी आत्मानंद ने लिखा है- डा.नरेंद्र देव वर्मा द्वारा रचित 'सोनहा बिहान' की मैंने बहुत प्रशंसा सुनी थी। एक दिन मैंने नरेंद्र से कहा, अरे जरा एक बार तो अपना वह 'सोनहा बिहान' सुनवाओ। 1978 के अंत में एक दिन उसने सूचना दी कि महासमुंद में 'सोनहा बिहान' का प्रदर्शन है और मैं चाहूं तो वहां जाकर देख सकता हूं। हम कुछ लोग रायपुर से गए। महासमुंद पहुंचने में कुछ देर हो गई। सर्वसाधारण के साथ ही उसने मेरी भी बैठने की व्यवस्था की। किसी ने उससे कहा कि अरे स्वामी जी को यहां बिठा रहे हो? सबके साथ? वहां अलग से एक कुर्सी क्यों नहीं दे देते? नरेंद्र का उत्तर तो मैं नहीं सुन पाया, पर मुझे सबके साथ ही जमीन पर बैठना पड़ा। बाद में पता चला कि नरेंद्र नहीं चाहता था कि मेरे कारण दूसरों को किसी प्रकार की असुविधा हो अथवा कार्यक्रम में किसी प्रकार से कोई विघ्न उत्पन्न हो। उसकी भावना ने मुझे भाव-विभोर कर दिया और मेरी आत्मा पुकार उठी- 'नरेंद्र, तुम सचमुच मेरे अनुज हो।'
मैंने 'सोनहा बिहान' देखा और सुना। नरेंद्र उसकी कमेंटरी (कार्यक्रम का संचालन) कर रहा था। सब कुछ अपूर्व था। उसकी तेजस्विता और स्वाभिमान के उस दिन मुझे दर्शन हुए। वह दबंग था, अन्याय के समक्ष वह झुकना नहीं जानता था, पर वह अविनयी नहीं था। अपनी जन्मभूमि छत्तीसगढ़ के प्रति उसका आहत अभिमान उसकी कमेंटरी में मानो फूट- फूट पड़ रहा था, पर मुझे लगा कि जनसभा में एक शासकीय कर्मचारी को इतना स्पष्ट होकर अपने विचार को अभिव्यक्ति देना ठीक नहीं है। 'सोनहा बिहान' में छत्तीसगढ़ के शोषण का वर्णन है। शोषण के विरुद्ध माटी की तड़प नरेंद्र के स्वर में अभिव्यंजित हुई थी। वह जब दूसरे दिन मुझसे आश्रम में मिला तो मैंने उसकी कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की, पर साथ ही यह कहते हुए मैं नहीं चूका कि शासकीय नौकरी में रहते हुए तुम्हारी इस प्रकार दोटूक बात को शायद कुछ लोग पसंद न करें। उसने मुझसे तो कुछ नहीं कहा, पर अपने एक मित्र से उसने कहा था, भैया को मेरी कमेंटरी शायद उतनी रास नहीं आई। अब क्या करूं? अपनी इस जन्मभूमि का शोषण सहा भी तो नहीं जाता। इसी के माध्यम से मैं अपनी व्यथा, अपनी टीस प्रकट किया करता हूं। मेरी यही अभिलाषा है कि धरती पुत्र जागें, अपना शोषण समझ सकें। अगर मेरे इस कार्य से रुष्ट होकर सरकार मेरी नौकरी छीन ले तो जिन लोगों के लिए मैं अपना रक्त सूखा रहा हूं, वे मेरे छत्तीसगढ़ के लोग क्या मुझे दो जून की रोटी भी नहीं देंगे?
स्वामी आत्मानंद लिखते हैं कि मैंने इस नरेंद्र को अब तक नहीं पहचाना था। उसमें अपनी माटी के लिए इतना गौरव है, उसके शोषण के लिए इतनी टीस है, उसकी उन्नति के लिए इतनी तड़पहै, यह तो मैंने पहले न जाना था और जब मुझे उसके भीतर जलने वाली आग का पता चला तो मैं अभिभूत हुए बिना नहीं रहा। छत्तीसगढ़ की पीड़ा से उसका हृदय करा रहा था। संभवतः शिक्षा के क्षेत्र में रहकर छत्तीसगढ़ के लिए कुछ न कर पाने की विवशता ही उसे कुछ क्षणों के लिए राजनीति की ओर ले गई थी। मैंने बाद में जाना था कि वह 1977 में चुनाव में भाग लेने की इच्छा रखता था। एक आज्ञाकारी अनुज की भांति उसने मेरी नाही को सम्मान दिया, पर छत्तीसगढ़ के लिए कुछ करने की भावना उसमें इतनी गहरी पैठी थी कि वह छत्तीसगढ़ी गीतों, नाटकों और लोककथाओं के माध्यम से शतधाराओं में फूट पड़ी और उसका फल वह विपुल प्रकाशित और उससे भी विपुल अप्रकाशित साहित्य है, जो वह अपने पीछे छोड़ गया है। छत्तीसगढ़ की धरती माता ने अपने इस कृती पुत्र को, लाड़ले बेटे को लेकर भविष्य के कितने सुनहरे सपने संजोए थे, पर वह तो ममता के सारे बंधन तोड़कर अस्तित्व के महासागर में जा मिला।