Thursday, 14 January 2021

अध्यात्म के रद्दा..

वो नागपंचमी के सुरता//
     अध्यात्म के रद्दा....
    जीवन का उत्तरार्द्ध ईश्वर और अपने आध्यात्मिक सिद्धांतों को पूर्ण करने के लिए होता है। शायद इसीलिए हमारी संस्कृति में इस अवस्था को वानप्रस्थ आदि आदि.. के रूप में प्रचारित किया गया है।   वानप्रस्थ का तात्पर्य ही होता है, गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर सद्गति के मार्ग पर अग्रसर होना और अपने अनुभवों को लोक हित में समर्पित कर देना।

       मुझे लगता है, मेरी भी यह अवस्था अब प्रारंभ हो चुकी है। वैसे अध्यात्म के प्रति मेरा झुकाव बचपन से ही रहा है। लेकिन गृहस्थ जीवन और साहित्य जगत में प्रवेश करने के पश्चात् इसमें कुछ कमी सी आ गई थी। खासकर साहित्य में जनवादी विचारों से प्रभावित होने के कारण हर प्रकार के शोषक वर्ग के प्रति आक्रोश और ईश्वर के प्रति अन्याय किए जाने का भाव।

         इन सबके बीच 24 जुलाई 1994 नागपंचमी के दिन मेरे जीवन में अजीब मोड़ आया। एक सफेद वस्त्रधारी साधु दिन के करीब 10 - 10.30 बजे मेरे घर के सामने आकर रूक गये। मैं वहाँ बैठा गुड़ाखू (एक प्रकार का नशीला मंजन) घिस रहा था। वे रूके और मेरे पास आकर बोले-  'तुम्हें तर्जनी उंगली को जूठा नहीं करना चाहिए। यह देव स्थान होता है। मंजन ही करना है, तो मध्यमा उंगली से किया करो.' बस इतना बोले और वे चले गये।

       आमतौर पर मैं ऐसे साधुओं की बातों पर ध्यान नहीं देता था। फिर भी जाने क्यों उनकी बातों को मानने की मन में इच्छा हुई। मैं उठा, घर के अंदर गया और तर्जनी उंगली को धोकर वापस बाहर आकर मध्यमा उंगली से गुड़ाखू घिसने लगा। ऐसा करते ही मुझे अपने अंदर मानसिक परिवर्तन का अहसास होने लगा। सावन का महीना चल ही रहा था, दो सोमवार अभी बचा हुआ था। उन दोनों सोमवार को व्रत रखने की इच्छा मेरे अंदर होने लगी। छात्र जीवन में मैं सावन सोमवार का व्रत रखता भी था, लेकिन जब हम हाई स्कूल में थे, तब हमारे दादा जी ऐसे ही सावन सोमवार को स्वर्ग सिधार गये थे, तब से व्रत का वह सिलसिला थम गया था।

         फिर सोमवार आया और मैं व्रत रखकर बढ़िया पूजा-पाठ करने लगा। इसी बीच रांवाभांठा (बंजारीधाम, रायपुर) वाले मेरे साहित्यिक मित्र डॉ. सीताराम साहू मुझसे मिलने मेरे रिकार्डिंग स्टूडियो पर आए। बातों ही बातों में मेरे सामने अनायास उपस्थित हो रही  विभिन्न परेशानियों के समाधान के लिए उनके गाँव में संचालित 'भोले दरबार' में आकर समाधान प्राप्त करने की बात कही।

       आमतौर पर मैं ऐसे दरबार और तंत्र-मंत्र वाले लोगों से दूर ही रहता था। लेकिन एक चिकित्सा पेशा के प्रतिष्ठित व्यक्ति और मेरे घनिष्ठ साहित्यिक मित्र ऐसा कह रहे थे। उनके बार-बार जोर मारने पर मैंने दरबार में का जाने का निश्चय किया। वहाँ शिव जी की हाजिरी आई हुई थी। मुझे सवा महीने तक निर्जला व्रत रखकर शिव उपासना का सुझाव दिया गया। जनवादी विचारधारा में बह रहे एक तार्किक पत्रकार-साहित्यकार के लिए इसे सहज रूप से स्वीकार कर लेना संभव नहीं था। केवल डॉ. सीताराम साहू की बार-बार समझाइश और आग्रह के चलते मैंने कठोर व्रत को करने का निर्णय लिया।

     इसी सवामासी व्रत के 21 वें दिन मेरे जीवन में अद्भुत चमत्कार हुआ। बाबा स्वयं मेरे पास आए। मेरे जीवन के उद्देश्य और कारण से परिचित कराए और उसे पूर्ण करने के लिए नियम-विधि की शिक्षा दिए। तभी मुझे नागपंचमी के दिन आए श्वेतवस्त्र धारी साधु का रहस्य भी ज्ञात हुआ।

        उस नियम और विधि को जीते हुए अब मेरे जीवन का संध्या काल प्रारंभ हो चुका है। साधना काल के वे 21 वर्ष मेरे जीवन में सुशील से भोले बनने की प्रक्रिया भी है। इस बीच अब मेरे गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियां भी लगभग पूरी हो चुकीं थीं। अब जीवन के इस उत्तरार्द्ध को उस ईश्वरीय कार्य को समर्पित कर देने का विचार उत्पन्न हुआ, जिसके लिए मुझे तैयार किया गया था। उनके द्वारा दिए गये ज्ञान, यहां की मूल संस्कृति और धर्म का वास्तविक स्वरूप, जिन्हें जानने-समझने में मुझे 21 वर्ष लग गये थे। उन्हें लोगों से परिचित कराने और सद्मार्ग पर आगे बढ़ाने का प्रयास करना। बस अब जीवन का यही अंतिम ध्येय रह गया है।

    लेकिन जब से मुझे पक्षाघात (लकवा) का बड़ा अटैक आया है, तब से वह उद्देश्य डांवाडोल होता लग रहा है. अपने इस उद्देश्य को मिशनरी रूप देने के लिए, धरातल पर साकार करने के लिए मैंने एक समिति "आदि धर्म जागृति संस्थान" का 28 फरवरी 2018 को विधिवत पंजीयन करवा कर पूरे प्रदेश में दौरा कर इसका चारों तरफ प्रचार प्रसार और जिला इकाइयों का गठन भी किया. इस बीच हर महीने सभा और संगोष्ठी का आयोजन भी होने लगा. प्रदेश के मिडीया में इसका प्रतिसाद भी अच्छा मिलने लगा. अच्छे अच्छे लोग हमसे जुड़ने लगे. इसी बीच 24 अक्टूबर 2018 (शरद पूर्णिमा) को आमदी नगर भिलाई के एक कार्यक्रम में मुझे पक्षाघात (लकवा)  का बड़ा अटैक आ गया. तब से लेकर अब तक मैं लगभग बिस्तर पर ही हूँ, और मेरे साथ ही समिति का कार्य भी मेरी ही अवस्था को प्राप्त कर गई है.
   इस बीच मैंने अपने कई सहयोगियों से मेरी जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा लेने के लिए अनुरोध भी किया, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. लोग हमारे इस अभियान को धरातल पर साकार होते तो देखना चाहते हैं, लेकिन स्वयं उसके लिए नेतृत्वकर्ता की भूमिका में आना नहीं चाहते.
     बस अब ईश्वर से इतनी ही अपेक्षा है, कि इस मिशन को पूरा करने के लिए कोई योग्य पात्र मुझे दे दे, जो मेरे लकवा और उम्र के थपेड़ों से लाचार हो चुके हाथों के भार को अपने मजबूत और शक्तिशाली हाथों में अच्छे से सम्हाल ले... वैसे एक बात की संतुष्टि है, कि वैज्ञानिक आविष्कार के चलते अभी इंटरनेट के माध्यम से जो सोशलमीडिया संचालित हो रहा है, उनके माध्यम से मैं अपने अर्जित ज्ञान को लौगों तक पहुँचा पाने में सक्षम हो गया हूँ.
🙏🌹ऊँ नमः शिवाय 🌹🙏
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो. नं. 9826992811

तिल सकरायत ऊपर लोककथा...


     'तिल सकराएत' उपर लोककथा..
"उठ पुतुर तिल पुर्री"
    
     एक गाँव म एक झन महतारीअउ वोकर बेटा राहय। तिल सकराएत के दिन तिल के लाड़ू बनथे। तेखरे सेती वो दिन महतारी ह बड़े बिहनिया ले तिली ल धो डरे राहय। थोरिक घाम के रोस बाढ़िस तहाँ ले खटिया ल खोर म मढ़ा के सुग्घर चद्दर बिछा के तिली ल सुखोय बर बगरा दिस। ए बात ल तो सबो जानथन, के कोनों भी जिनिस ह पानी म भीजे ले फुल के बड़का असन हो जाथे। भीजे चना, उरीद, मूँग ल तो देखेच होहू। फेर तो वो तिली राहय। धोय-भीजे तिली के साइज सुक्खा तीली ले दुगुना अउ अढ़ई गुना बाढ़ जाथे। तिली पूरा खटिया भर बगर जाथे। महतारी के पाँच छै बछर के एक झन बेटा राहय तेला वोहा चेतावत कहिथे- "देखे रबे रे बेटा, कुकर-माकर अउ गाय गरू के। तिली सुखावत हे, अउ तहूँ झन खाबे। लाड़ू बनाहूँ तब खाबे। मैं तरिया ले कपड़ा-लत्ता काँच-पखार के अउ नहा-खोर के आवत हँव। तलघस तिली सुखा जही।"
    तिली जतके जल्दी भीजथे ओतके जल्दी सुखाथे घलो। नहा के आवत ले तिली सुखा के खटिया भर ले आधा हो जाय राहय। तेला देख के महतारी ल भरोसा नइ होय के तिली कइसे अधिया गे। सोचथे के टूरा ह लालच मा आधा तिली ल भकोस डरे होही। टूरा ल पूछिस त टूरा काला बतावय। वो बपुरा ह तो मुँह बाँधे रखवारी करत रिहिसे। फेर महतारी के गोड़ के रिस तरुवा म चघ गे। नानकुन लइका ल कुटकुट ले छर डरिस। लइका कोन्टा डाहन पटियागे। फेर रिस म महतारी ल लइका के दसा के ज्ञान नइ हो पाइस। रिसे-रिस म महतारी तीली ल सकेल के उही डब्बा म भरथे जेन म नाप के निकाले राहय। देखथे तौ ओखर मुँह ले अकस्मात निकल जथे, अइ! तिली तो जस के तस हे। अउ मैं फोकटे-फोकट नानकुन लइका उपर उरहा-धुरहा हाँत उठा डरेंव। अउ तुरते पटियाय लइका करा जाके हुत कराय ल लगथे, "उठ पुतुर (पुत्र) तिल पुर्री, उठ पुतुर तिल पुर्री।" पुतुर कहाँ उठने वाला हे। वो तो हमेसा बर सुत गे राहय।
  रिस म मनखे काय करत-करत काय कर डारथे नोनी-बाबू हो, तेन ल ये कहिनी ले जानव। जादा रिस कभू अउ काखरो बर अच्छा नइ होय।
दार-भात चुर गे, मोर कहिनी पुर गे।
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

छट्ठी-बरही...

छट्ठी-बरही...
   हमर संस्कृति म अलग अलग कारज के अलग अलग महत्व हे. जम्मो कारज के एक विशेष महत्व होथे, एमा छट्ठी-बरही के घलो अपन महत्व अउ विधान हे.
   जब काकरो घर म लइका अवतरथे थे त तीन दिन म महतारी ल बरही नहवाये के नेंग पूरा करे जाथे अउ छै दिन बाद छट्ठी नेंग ल राखे जाथे। छट्ठी के आगू दिन संझा बेरा माईलोगिन मन ल कांके चाहा पिये बर बलाए जाथे। कांके चाहा पिये बर बलाये के सेती गांव म अरोसी-परोसी सब एक साथ मिलजुल के खुसी मनाये के मौका पाथें।  
   माइलोगिन मन बर एक विशेष प्रकार के पेय पदार्थ बनाये जाथे ओला कांके चाहा कहे जाथे. कांके चाहा म अलग अलग प्रकार के उरई के जर जइसन जड़ी बूटी डार के अउ करिया तिली म बघार के बनाये जाथे, उही ल कांके चाहा कहे जाथे। उही कांके  ल  लईका पाये बर आये माईलोगिन मन ल देथें। कांके पियईया माईलोगिन मन  लइका ल कोरा म पाके   आसिरवाद देथें।
कांके चाहा के बिहान दिन छट्ठी के कार्यक्रम रख जाथे,  जेमा घर म सब सगा सोदर मन आथें. सब परिवार एक जगह जुरिया के खुशी मनाथें. छट्ठी के दिन बाबू पिला मन लईका ल आसिरवाद देहे बर आथे बाबू पिला मन चाय नास्ता देथे। अउ जेला अपन सांवर बनवाना रइथे ओहा मरदनिया तिरन बईठ के अपन सांवर बनवाथें। घर के बाबू पिला मन तको   सांवर बनवाथें। घर के मनखे अउ सब सगा  सोदर मन सब्बो झन जुरिया के अपन अपन घर के हाल चाल के गोठ बात करत सब बइठे रइथें।
   संझा बेरा म पहिलावत लईका होये रथे त समधियानो घलो आथे. ए समधियानो के नेंग म  समधिन मन ल गांव के चौक ले घर तक परघा के लाये जाथे. समधिन मन घर पंहुचथें तहांले  सुग्घर गोड़ हाथ धोवाके बइठार के चाहा नास्ता दिए जाथे । अवतरे लइका ल लानके आये समधियानो मन ल पवाके आशिर्वाद लेवाए जाथे.  मुंधियार के गाँव बस्ती के भजन टोली वाला मन ल बुलाके घर म गायन भजनअउ सोहर गीत गवाये जाथे.  उहिच बेरा म नानुकअवतरे नान्हे लइका के नाव घलो धराये जाथे. एकर सेती एला नामकरण संस्कार घलो  कहे जाथे.ये जम्मो नेंग जोंग ह छै दिन के कार्यक्रम ल रखाथे तेकर सेती छट्ठी के नाम ले जाने जाथे।...

Sunday, 3 January 2021

मत बता मंदिर मस्जिद...

मत बता मोला
तोर मंदिर मस्जिद अउ चर्च
के महानता ल
मैं मजदूर अंव
कतकों भगवान अल्लाह अउ
गाड के घर ल
इही मोर हाथ ह
बनाए हे...
-सुशील भोले-9826992811

Sunday, 20 December 2020

कौशल्या जन्मभूमि...???

कौशल्या जन्मभूमि...???
  भगवान राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि के नाम पर इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजनीति गरमा गई है. कांग्रेस जहाँ राजधानी रायपुर  के पूर्व दिशा में लगभग 25 कि. मी. की दूरी पर स्थित ग्राम चंदखुरी, जहाँ विश्व का एकमात्र "कौशल्या मंदिर" है, जिसमें माता कौशल्या की गोद में भगवान राम बालक रूप में विराजित हैं, उसे ही जन्मभूमि के रूप में मानकर उस स्थल का विकास करना चाहती है, वहीं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता और और पूर्व संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर इस स्थल को केवल कौशल्या मंदिर होने और जन्मभूमि बिलासपुर जिला के ग्राम कोसला में होने का दावा कर रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमनसिंह भी अजय चंद्राकर के बयान के साथ खड़े हो गये हैं. इधर जोगी कांग्रेस ने भी इन दोनों ही पार्टियों को एक सप्ताह के अंदर प्रमाण प्रस्तुत करने की चेतावनी दे दी है.
   यहाँ यह जानना आवश्यक है, कि कौशल्या जन्मभूमि के रूप में यहाँ के विद्वान एकमत नहीं हैं. चंदखुरी को जन्मभूमि मानने वालों की संख्या तो ज्यादा ही है. इसके साथ ही ग्राम कोसला को मानने वाले भी कम संख्या में नहीं हैं. वहीँ कुछ विद्वान जांजगीर जिला के ग्राम कोसिर को भी कौशल्या जन्मभूमि होना मानते हैं. वहाँ स्थित "कोसिर माता" के मंदिर को कौशल्या बताने का प्रयास करते हैं. इनके अतिरिक्त कुछ विद्वानों का यह भी मत है, कि कौशल्या चूंकि दक्षिण कोसल की राजकन्या थी, तो उसका जन्म राजभवन में हुआ होगा, और चूंकि उस समय यहाँ की राजधानी श्रीपुर (सिरपुर) थी, तो कौशल्या का जन्म भी सिरपुर में ही हुआ होगा.
   जितने मत उतनी मान्यता. पर किसी के पास सर्व स्वीकृत प्रमाण नहीं है. किन्तु एक बात अवश्य है, कि चंदखुरी को स्वीकार करने वालों की संख्या निश्चित रूप से अधिक है. पूर्व के सरकार के समय बनी "राम वन गमन पथ शोध समिति" के सदस्य भी चंदखुरी को ही जन्मभूमि मानकर उस स्थल के विस्तार के लिए प्रयास करने का अनुरोध सरकार से किए थे.
  जहाँ तक मेरा व्यक्तिगत विचार है. मैं भी चंदखुरी को ही कौशल्या जन्मभूमि के रूप में स्वीकार करता हूँ. मैं उस समय से चंदखुरी स्थित कौशल्या मंदिर जा रहा हूँ, जब वह स्थल उजाड़ टापू की तरह दिखाई देता था. तब वहाँ तक जाने के लिए आज की तरह कोई पक्का मार्ग नहीं था, लोग तालाब में तैरकर वहाँ तक पहुंचते थे. नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालुओं की बाहुल्यता को देखते हुए लकड़ी और बांस बल्लियों से चैलीनुमा अस्थायी मार्ग बना दिया जाता था.
   ग्राम चंदखुरी को देखकर एक बात तो स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई ऐतिहासिक गाँव है. वहाँ पुरातात्विक महत्व के मंदिर और मूर्तियां, कारीगरी युक्त पत्थर अनेक स्थानों पर बिखरे हुए दिख जाते हैं, जो इस बात का अहसास कराते हैं, कि भले ही यह किसी राज्य की राजधानी न रहा हो,   किन्तु कोई प्राचीन ऐतिहासिक स्थल तो अवश्य ही है.
   कौशल्या मंदिर के संबंध में मेरा एक आलेख कुछ वर्ष पूर्व राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हुआ था. मेरे ब्लाग और फेसबुक पर भी रिलीज़ हुआ था. उसे पढ़कर राम जन्मभूमि समिति अयोध्या से जुड़े एक सदस्य मुझसे चंदखुरी मंदिर स्थल से जटायु समाधि की फोटो खिंचकर भेजने के लिए अनुरोध किए थे. तब तक मैं जटायु समाधि स्थल के संबंध में अपरिचित था. हाँ इतना अवश्य है कि जिस स्थल को जटायु समाधि बताया गया, वहाँ पर पहले एक बेर का पेड़ था, जिसके सहारे से लगा हुआ एक बड़ा सा पत्थर गड़ा हुआ था, जिसमें जटायु की आकृति अंकित थी. अभी दो-तीन वर्ष पूर्व और जाना हुआ, तब वहाँ रावण के राजवैद्य सुषैन की समाधि होने का भी ज्ञान हुआ. इसके संबंध में बताया गया कि लक्ष्मण जी को मूर्छा से बचाने के पश्चात सुषैन वैद्य वापस लंका न जाकर इधर आ गये थे, उन्हें डर था कि लक्ष्मण जी को मूर्छा से जागृत करने के कारण रावण या उसके अन्य कोई अनुयायी इन्हें जान से मार डालेंगे. इसलिए यहाँ आकर राजाश्रय मांगकर रहने लगे. कौशल्या मंदिर परिसर में एक लम्बा सा पत्थर का रखा हुआ है, इसे  ही सुषैन वैद्य का समाधि बताया जाता है. उसके संबंध में यह जन आस्था है कि उस स्थल की मिट्टी को लगाने से अनेक प्रकार के रोगों से मुक्ति मिल जाती है.
  एक प्रश्न मन में बार-बार उठ जाता है कि पंद्रह वर्षों तक यहाँ भाजपा की सरकार थी. अजय चंद्राकर जी स्वयं संस्कृति मंत्री रहे हैं, तब इस कौशल्या जन्मभूमि के विवाद को स्पष्ट कर ऐतिहासिक सच्चाई को प्रमाणित क्यों नहीं किया गया? अब विपक्ष में जाने के पश्चात ज्ञान चक्षु अचानक कैसे जागृत हो गया?
  आप इस पर क्या कहते हैं...???
-सुशील भोले-9826992811
संजय नगर, रायपुर

कौशल्या जन्मभूमि...???

कौशल्या जन्मभूमि...???
  भगवान राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि के नाम पर इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजनीति गरमा गई है. कांग्रेस जहाँ राजधानी रायपुर  के पूर्व दिशा में लगभग 25 कि. मी. की दूरी पर स्थित ग्राम चंदखुरी, जहाँ विश्व का एकमात्र "कौशल्या मंदिर" है, जिसमें माता कौशल्या की गोद में भगवान राम बालक रूप में विराजित हैं, उसे ही जन्मभूमि के रूप में मानकर उस स्थल का विकास करना चाहती है, वहीं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता और और पूर्व संस्कृति मंत्री अजय चंद्राकर इस स्थल को केवल कौशल्या मंदिर होने और जन्मभूमि बिलासपुर जिला के ग्राम कोसला में होने का दावा कर रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमनसिंह भी अजय चंद्राकर के बयान के साथ खड़े हो गये हैं. इधर जोगी कांग्रेस ने भी इन दोनों ही पार्टियों को एक सप्ताह के अंदर प्रमाण प्रस्तुत करने की चेतावनी दे दी है.
   यहाँ यह जानना आवश्यक है, कि कौशल्या जन्मभूमि के रूप में यहाँ के विद्वान एकमत नहीं हैं. चंदखुरी को जन्मभूमि मानने वालों की संख्या तो ज्यादा ही है. इसके साथ ही ग्राम कोसला को मानने वाले भी कम संख्या में नहीं हैं. वहीँ कुछ विद्वान जांजगीर जिला के ग्राम कोसिर को भी कौशल्या जन्मभूमि होना मानते हैं. वहाँ स्थित "कोसिर माता" के मंदिर को कौशल्या बताने का प्रयास करते हैं. इनके अतिरिक्त कुछ विद्वानों का यह भी मत है, कि कौशल्या चूंकि दक्षिण कोसल की राजकन्या थी, तो उसका जन्म राजभवन में हुआ होगा, और चूंकि उस समय यहाँ की राजधानी श्रीपुर (सिरपुर) थी, तो कौशल्या का जन्म भी सिरपुर में ही हुआ होगा.
   जितने मत उतनी मान्यता. पर किसी के पास सर्व स्वीकृत प्रमाण नहीं है. किन्तु एक बात अवश्य है, कि चंदखुरी को स्वीकार करने वालों की संख्या निश्चित रूप से अधिक है. पूर्व के सरकार के समय बनी "राम वन गमन पथ शोध समिति" के सदस्य भी चंदखुरी को ही जन्मभूमि मानकर उस स्थल के विस्तार के लिए प्रयास करने का अनुरोध सरकार से किए थे.
  जहाँ तक मेरा व्यक्तिगत विचार है. मैं भी चंदखुरी को ही कौशल्या जन्मभूमि के रूप में स्वीकार करता हूँ. मैं उस समय से चंदखुरी स्थित कौशल्या मंदिर जा रहा हूँ, जब वह स्थल उजाड़ टापू की तरह दिखाई देता था. तब वहाँ तक जाने के लिए आज की तरह कोई पक्का मार्ग नहीं था, लोग तालाब में तैरकर वहाँ तक पहुंचते थे. नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालुओं की बाहुल्यता को देखते हुए लकड़ी और बांस बल्लियों से चैलीनुमा अस्थायी मार्ग बना दिया जाता था.
   ग्राम चंदखुरी को देखकर एक बात तो स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई ऐतिहासिक गाँव है. वहाँ पुरातात्विक महत्व के मंदिर और मूर्तियां, कारीगरी युक्त पत्थर अनेक स्थानों पर बिखरे हुए दिख जाते हैं, जो इस बात का अहसास कराते हैं, कि भले ही यह किसी राज्य की राजधानी न रहा हो,   किन्तु कोई प्राचीन ऐतिहासिक स्थल तो अवश्य ही है.
   कौशल्या मंदिर के संबंध में मेरा एक आलेख कुछ वर्ष पूर्व राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हुआ था. मेरे ब्लाग और फेसबुक पर भी रिलीज़ हुआ था. उसे पढ़कर राम जन्मभूमि समिति अयोध्या से जुड़े एक सदस्य मुझसे चंदखुरी मंदिर स्थल से जटायु समाधि की फोटो खिंचकर भेजने के लिए अनुरोध किए थे. तब तक मैं जटायु समाधि स्थल के संबंध में अपरिचित था. हाँ इतना अवश्य है कि जिस स्थल को जटायु समाधि बताया गया, वहाँ पर पहले एक बेर का पेड़ था, जिसके सहारे से लगा हुआ एक बड़ा सा पत्थर गड़ा हुआ था, जिसमें जटायु की आकृति अंकित थी. अभी दो-तीन वर्ष पूर्व और जाना हुआ, तब वहाँ रावण के राजवैद्य सुषैन की समाधि होने का भी ज्ञान हुआ. इसके संबंध में बताया गया कि लक्ष्मण जी को मूर्छा से बचाने के पश्चात सुषैन वैद्य वापस लंका न जाकर इधर आ गये थे, उन्हें डर था कि लक्ष्मण जी को मूर्छा से जागृत करने के कारण रावण या उसके अन्य कोई अनुयायी इन्हें जान से मार डालेंगे. इसलिए यहाँ आकर राजाश्रय मांगकर रहने लगे. कौशल्या मंदिर परिसर में एक लम्बा सा पत्थर का रखा हुआ है, इसे  ही सुषैन वैद्य का समाधि बताया जाता है. उसके संबंध में यह जन आस्था है कि उस स्थल की मिट्टी को लगाने से अनेक प्रकार के रोगों से मुक्ति मिल जाती है.
  एक प्रश्न मन में बार-बार उठ जाता है कि पंद्रह वर्षों तक यहाँ भाजपा की सरकार थी. अजय चंद्राकर जी स्वयं संस्कृति मंत्री रहे हैं, तब इस कौशल्या जन्मभूमि के विवाद को स्पष्ट कर ऐतिहासिक सच्चाई को प्रमाणित क्यों नहीं किया गया? अब विपक्ष में जाने के पश्चात ज्ञान चक्षु अचानक कैसे जागृत हो गया?
  आप इस पर क्या कहते हैं...???
-सुशील भोले-9826992811
संजय नगर, रायपुर

Wednesday, 2 December 2020

अगहन बिरस्पत....

अगहन बिरस्पत म होथे लक्ष्मी दाई के बासा...
    कार्तिक पुन्नी के बिहान दिन ले अगहन महीना लगथे। अउ अगहन महीना मा जउन दिन बिरस्पत परथे उही दिन हमर छत्तीसगढ़ म घरो घर अगहन बिरस्पत के परब ल बड़ उछाह ले मनाए जाथे। गजब मान गौन के संग लक्ष्मी दाई के पूजा करथें।
   एकर तैयारी बुधवार के संझा बेरा ले घर के साफ सफाई, अँगना परछी कुरिया के लिपाई। घर के मुहाटी मा सुघर चउँक पुरके माईलोगिन  मन बने चउंक पुरथें, रंगोली बनाथें। लक्ष्मी दाई ल जेन जगा स्थापित करथें उहू जगा ला सफ्फा करके चाउँर पिसान ला घोर के चउँक पुरथें घर के चारों मुड़ा के साफ सफाई करके लक्ष्मी दाई के स्थापना करथें। सुघर आमा पान, फूल पान, नरियर, आँवला फल, आँवला पत्ती, केरा पत्ता,
अउ कंद मूल जिमी काँदा, धान के बाली मा सजा के कलश के स्थापना करथें। अउ बुधवारेच के रतिहा म सबो जूठा बरतन भाड़ा ला माँज धो के रखथें. घर मुहाटी ले लक्ष्मी दाई के वास (स्स्थापना स्थल) तक चाउँर पिसान के सुघर पांव के छापा बनाथें। राते मा माता करा दीया बार के रखथें।
    बिरस्पत के मुँधरहा ले घर के माईलोगिन मन उठ जाथें, नहा धोके घर के दुवारी, रंगोली अउ तुलसी चौंरा मा दीया बारथें। दीया बार के घर के दरवाजा ला खुल्ला राखथें। जेन हा दिन भर खुलेच रहिथे। पूजा पाठ करके माईलोगिन मन उपास घलो रहिथें अउ लक्ष्मी दाई के ध्यान मा मगन रहिथें।
    ये पूजा के एक ठन अउ खास बात हवय, बुधवारे के दिन महिला मन अपन अपन घर मा सबो मनखे ला चेता के रखे रहिथे आज चुंदी, नाखून नइ कटाना हे, साबुन से नहाना नइ हे, बाल नइ धोना हे, पइसा खरचा भी नइ करना हे, कपड़ा लत्ता धोय के मनाही हे कहिके चेताँय रहिथें। माने भारी नियम धियम माने बर परथे। माईलोगिन मन सुघर नवा नवा लुगरा पहिन के टिकली, माँहुर, काजर आँज अपन आप ला सुंदर अउ स्वच्छ बनाय रखथें। ये दिन पीला फल, पीला कपड़ा,  पीला भोग के बड़ महत्व रहिथे। दान मा केला फल, भोग मा चना के दाल ला बड़ शुभदायी मानथे।
     पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक पुन्नी के साथे मा अगहन के शुरुआत हो जथे, माईलोगिन मन अपन घर के सुख समृद्धि अउ यश, धन खातिर माता लक्ष्मी के आराधना करथें। येकर पीछू मान्यता इही हे के माता लक्ष्मी अगहन महीना मा क्षीरसागर ले निकल के पृथ्वी लोक मा विचरण करत रहिथें। जेन मन धरम करम से माता के पूजा पाठ करथें तेकर घर आके वोहा वास करथे। अउ ओकर घर मा सुख, शाँति, समृद्धि अउ ऐश्वर्य के वास हो जथे। इही मान्यता खातिर ये तिहार ला हमर छत्तीसगढ़ म घलो नियम धियम अउ पारंपरिक रूप ले मनाये जाथे। ये दिन लक्ष्मी पूजा के संगे-संग सुरुज देवता के पूजा, शंख के पूजा ल भारी फलदायी मानथें। अइसे मान्यता हावय सुरुज देव के किरण हा कीटाणु ला नष्ट कर देथे अउ शरीर ला निरोग बनाथे। तेकर सेती सब बिहनिया बिहनिया जल चढ़ाके आशीष माँगथें।
एक उछाह अउ बिश्वास के साथ अगहन बिरस्पत के परब ल महिला मन बड़ ऊर्जा अउ धरम करम अउ संयमित रहिके मनाथें।
बोलो अगहन बिरस्पत की जय
लक्ष्मी दाई के जय🙏
सुशील भोले-9826992811