किस्सा-कहिनी के नंदावत परंपरा...
हमन जब लइका राहन त अपन महतारी के मुंह ले एक ले बढ़के एक किस्सा कहिनी सुनन. मोला सुरता हे, हमर महतारी जब रायपुर ले हमर गाँव नगरगांव जावय, त पारा भर के माईलोगिन मन वोकर जगा जुरिवा जावंय. रोज संझा हमर घर के चौंरा म पारा भर के माईलोगिन मन के संगे-संग अउ कतकों लइका अउ सियान जुरिया जावंत, तहांले एक ले बढ़के एक कहानी के दौर चलय.
हमूं मनला ताज्जुब लागय, काबर के हमर महतारी पढ़ई लिखई के नांव निरक्षर रिहिस, फेर किसम किसम के कहिनी अउ लोकगीत मन के खदान रहिस. रोज नवा कहानी सुनावय. परब अउ संस्कार ले संबंधित लोकगीत घलो सुनावंय.
रायपुर म घलो ए परंपरा चलय. कमरछठ अउ अगहन बिरस्पत जइसन परब म तो हमर पारा के महराज ह हमर घर नरियर धर के आवय, अउ महतारी ल सगरी ठउर म आके कहिनी सुनाय बर अरजी करय.
पहिली हर घर म अइसन नजारा देखब आ जावय. घर के सियान सियानीन मन अपन नाती नतनीन मनला किसम किसम के कहिनी सुनावत रहंय. फेर अब ये परंपरा कोनो कोनो घर म भले दिख जावत होही, फेर जादा करके ए परंपरा ह लगभग नंदाइच गे हे.
एकर सबले बड़े कारण तो मनोरंजन के नवा नवा साधन के आविष्कार आय, फेर समाज ले विलुप्त होवत संयुक्त परिवार के परंपरा ह घलो एकर बड़का कारण आय. संयुक्त परिवार म लइका मन अपन घर के सियान मन ले किस्सा कहिनी के संगे संग अपन परंपरा अउ संस्कार ल घलो सीख जावत रहिन हें, जे ह एकल परिवार के चलागन ले नंदावत जावत हे.
मैं ह इहाँ के मूल संस्कृति ऊपर सरलग बुता करत हंव. हमर मूल संस्कृति अउ परंपरा के धीरे धीरे नंदई अउ बिगड़ई म घलो इही संयुक्त परिवार के बिखरई ह घलो एक बड़का कारण के रूप म दिखथे. काबर के हम अपन पुरखा मनले अपन संस्कृति परंपरा ल तो सीखेच नइ पावत हवन, तेकर सेती दूसर मन के देखिक देखा उंकर मन के परंपरा अउ संस्कृति ल अपना लेथन.
-सुशील भोले-9826992811
Saturday, 16 January 2021
किस्सा कहिनी के नंदावत परंपरा...
Friday, 15 January 2021
ऐतिहासिक धार्मिक स्थल तुरतुरिया...
ऐतिहासिक, धार्मिक स्थल तुरतुरिया : जहाँ पूस पूर्णिमा को भरता है विशाल मेला...
तुरतुरिया एक प्राकृतिक एवं धार्मिक स्थल है। बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 29 किमी की दूरी पर स्थित इस स्थल को सुरसुरी गंगा के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थल प्राकृतिक दृश्यों से भरा हुआ एक मनोरम स्थान है, जो कि पहाड़ियों से घिरा हुआ है। सिरपुर- कसडोल मार्ग से ग्राम ठाकुरदिया से 6 किमी पूर्व की ओर तथा बारनवापारा से 12 किमी पश्चिम की ओर स्थित है.
बताया जाता है कि सन् 1914 में तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर एच.एम्. लारी ने इस स्थल का महत्त्व समझने पर यहाँ खुदाई करवाई थी, जिसमें अनेक मंदिर और सदियों पुरानी मूर्तियाँ प्राप्त हुई।
जनश्रुति के अनुसार, त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यहीं पर था और लवकुश की यही जन्मस्थली थी।
इस स्थल का नाम तुरतुरिया पड़ने का कारण यह है कि बलभद्री नाले का जलप्रवाह चट्टानों के माध्यम से होकर निकलता है तो उसमें से उठने वाले बुलबुलों के कारण तुरतुर की ध्वनि निकलती है। जिसके कारण उसे तुरतुरिया नाम दिया गया है। इसका जलप्रवाह एक लम्बी संकरी सुरंग से होता हुआ आगे जाकर एक जलकुंड में गिरता है, जिसका निर्माण प्राचीन ईटों से हुआ है। जिस स्थान पर कुंड में यह जल गिरता है वहां पर एक गाय का मुख बना दिया गया है, जिसके कारण जल उसके मुख से गिरता हुआ दृष्टिगोचर होता है। गोमुख के दोनों ओर दो प्राचीन प्रस्तर की प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो कि विष्णु जी की हैं। इनमें से एक प्रतिमा खडी हुई स्थिति में है तथा दूसरी प्रतिमा में विष्णुजी को शेषनाग पर बैठे हुए दिखाया गया है।
कुंड के समीप ही दो वीरों की प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं बनी हुई हैं, जिनमें क्रमश: एक वीर एक सिंह को तलवार से मारते हुए प्रदर्शित किया गया है, तथा दूसरी प्रतिमा में एक अन्य वीर को एक जानवर की गर्दन मरोड़ते हुए दिखाया गया है। इस स्थान पर शिवलिंग काफी संख्या में पाए गए हैं, इसके अतिरिक्त प्राचीन पाषाण स्तंभ भी काफी मात्रा में बिखरे पड़े हैं जिनमें कलात्मक खुदाई किया गया है। इसके अतिरिक्त कुछ शिलालेख भी यहां स्थापित हैं। कुछ प्राचीन बुद्ध की प्रतिमाएं भी यहां स्थापित हैं। कुछ भग्न मंदिरों के अवशेष भी मिलते हैं। इस स्थल पर बौद्ध, वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित मूर्तियों का पाया जाना भी इस तथ्य को बल देता है कि यहां कभी इन तीनों संप्रदायों की मिलीजुली संस्कृति रही होगी। ऎसा माना जाता है कि यहां बौद्ध विहार थे, जिनमे बौद्ध भिक्षुणियों का निवास था। सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौध्द संस्कृति का केन्द्र रहा होगा। यहां से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से ऎसा अनुमान लगाया गया है कि यहां से प्राप्त प्रतिमाओं का समय 8-9 वीं शताब्दी है। आज भी यहां स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है जो कि एक प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है। पौष माह में पूर्णिमा तिथि के अवसर पर (छेरछेरा पुन्नी) यहां तीन दिवसीय मेला लगता है, तथा बड़ी संख्या में श्रध्दालु यहां आते हैं। धार्मिक एवं पुरातात्विक स्थल होने के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह स्थल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
इसके संबंध में जो कथा प्राप्त होती है, उसमें, तुरतुरिया के बारे मे कहा जाता है, कि भगवान श्री राम द्वारा परित्याग करने पर वैदेहि सीता को फिंगेश्वर के समीप सोरिद अंचल ग्राम के (रमई पाठ ) मे छोड़ गये थे वहीं माता का निवास स्थान था। सीता की प्रतिमा आज भी उस स्थान पर है। जब सीता के बारे मे महर्षि वालमिकी को पता चला तो उन्हें अपने साथ तुरतुरिया ले आये और सीता यही आश्रम में निवास करने लगी ,यहीं लव कुश का जन्म हुआ।
रोड की दूसरी ओर से एक पगडंडी पहाड़ के ऊपर जाती है, जहां माता दुर्गा का एक मंदिर है जिसे मातागढ़ कहा जाता है। पहाड़ के ऊपर से भव्य प्राकृतिक दृश्य दिखाई देता है। पहाड़ से दूसरा पहाड़ दिखाई देता है, जहाँ पर एक गुफा भी है जो बहुत ही खतरनाक प्रतीत होता है।
ऐसी जनश्रुति भी है, कि एक बंजारा (चरवाहा) अपने गाय-बछड़े को लेकर रहता था. माता ने सुंदरी स्त्री का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया, लेकिन उस चरवाहे ने उन्हें गलत नजरों से देखा और शापित होकर अपने पशु धन के साथ नष्ट हो गया. गाय गोर्रा नामक स्थान पर घंट-घुमर, सील-लोढ़ा पत्थर के रूप में पाये गये थे, उचित रख-रखाव नहीं होने के कारण चोरी हो गये.
यहाँ पर संतान प्राप्ति के लिए माता से मन्नत मांगने भी लोग आते हैं, और पशुबलि भी देते हैं.
पर्यटन स्थल धार्मिक, प्राकृतिक, आस्था, खतरा, रोमांच और पहाड़ों के अद्भुत नजारे का संयोग है तुरतुरिया..
-सुशील भोले-9826992811
ऐतिहासिक धार्मिक स्थल तुरतुरिया...
ऐतिहासिक, धार्मिक स्थल तुरतुरिया : जहाँ पूस पूर्णिमा को भरता है विशाल मेला...
तुरतुरिया एक प्राकृतिक एवं धार्मिक स्थल है। बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 29 किमी की दूरी पर स्थित इस स्थल को सुरसुरी गंगा के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थल प्राकृतिक दृश्यों से भरा हुआ एक मनोरम स्थान है, जो कि पहाड़ियों से घिरा हुआ है। सिरपुर- कसडोल मार्ग से ग्राम ठाकुरदिया से 6 किमी पूर्व की ओर तथा बारनवापारा से 12 किमी पश्चिम की ओर स्थित है.
बताया जाता है कि सन् 1914 में तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर एच.एम्. लारी ने इस स्थल का महत्त्व समझने पर यहाँ खुदाई करवाई थी, जिसमें अनेक मंदिर और सदियों पुरानी मूर्तियाँ प्राप्त हुई।
जनश्रुति के अनुसार, त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यहीं पर था और लवकुश की यही जन्मस्थली थी।
इस स्थल का नाम तुरतुरिया पड़ने का कारण यह है कि बलभद्री नाले का जलप्रवाह चट्टानों के माध्यम से होकर निकलता है तो उसमें से उठने वाले बुलबुलों के कारण तुरतुर की ध्वनि निकलती है। जिसके कारण उसे तुरतुरिया नाम दिया गया है। इसका जलप्रवाह एक लम्बी संकरी सुरंग से होता हुआ आगे जाकर एक जलकुंड में गिरता है, जिसका निर्माण प्राचीन ईटों से हुआ है। जिस स्थान पर कुंड में यह जल गिरता है वहां पर एक गाय का मुख बना दिया गया है, जिसके कारण जल उसके मुख से गिरता हुआ दृष्टिगोचर होता है। गोमुख के दोनों ओर दो प्राचीन प्रस्तर की प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो कि विष्णु जी की हैं। इनमें से एक प्रतिमा खडी हुई स्थिति में है तथा दूसरी प्रतिमा में विष्णुजी को शेषनाग पर बैठे हुए दिखाया गया है।
कुंड के समीप ही दो वीरों की प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं बनी हुई हैं, जिनमें क्रमश: एक वीर एक सिंह को तलवार से मारते हुए प्रदर्शित किया गया है, तथा दूसरी प्रतिमा में एक अन्य वीर को एक जानवर की गर्दन मरोड़ते हुए दिखाया गया है। इस स्थान पर शिवलिंग काफी संख्या में पाए गए हैं, इसके अतिरिक्त प्राचीन पाषाण स्तंभ भी काफी मात्रा में बिखरे पड़े हैं जिनमें कलात्मक खुदाई किया गया है। इसके अतिरिक्त कुछ शिलालेख भी यहां स्थापित हैं। कुछ प्राचीन बुद्ध की प्रतिमाएं भी यहां स्थापित हैं। कुछ भग्न मंदिरों के अवशेष भी मिलते हैं। इस स्थल पर बौद्ध, वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित मूर्तियों का पाया जाना भी इस तथ्य को बल देता है कि यहां कभी इन तीनों संप्रदायों की मिलीजुली संस्कृति रही होगी। ऎसा माना जाता है कि यहां बौद्ध विहार थे, जिनमे बौद्ध भिक्षुणियों का निवास था। सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौध्द संस्कृति का केन्द्र रहा होगा। यहां से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से ऎसा अनुमान लगाया गया है कि यहां से प्राप्त प्रतिमाओं का समय 8-9 वीं शताब्दी है। आज भी यहां स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है जो कि एक प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा है। पौष माह में पूर्णिमा तिथि के अवसर पर (छेरछेरा पुन्नी) यहां तीन दिवसीय मेला लगता है, तथा बड़ी संख्या में श्रध्दालु यहां आते हैं। धार्मिक एवं पुरातात्विक स्थल होने के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह स्थल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
इसके संबंध में जो कथा प्राप्त होती है, उसमें, तुरतुरिया के बारे मे कहा जाता है, कि भगवान श्री राम द्वारा परित्याग करने पर वैदेहि सीता को फिंगेश्वर के समीप सोरिद अंचल ग्राम के (रमई पाठ ) मे छोड़ गये थे वहीं माता का निवास स्थान था। सीता की प्रतिमा आज भी उस स्थान पर है। जब सीता के बारे मे महर्षि वालमिकी को पता चला तो उन्हें अपने साथ तुरतुरिया ले आये और सीता यही आश्रम में निवास करने लगी ,यहीं लव कुश का जन्म हुआ।
रोड की दूसरी ओर से एक पगडंडी पहाड़ के ऊपर जाती है, जहां माता दुर्गा का एक मंदिर है जिसे मातागढ़ कहा जाता है। पहाड़ के ऊपर से भव्य प्राकृतिक दृश्य दिखाई देता है। पहाड़ से दूसरा पहाड़ दिखाई देता है, जहाँ पर एक गुफा भी है जो बहुत ही खतरनाक प्रतीत होता है।
ऐसी जनश्रुति भी है, कि एक बंजारा (चरवाहा) अपने गाय-बछड़े को लेकर रहता था. माता ने सुंदरी स्त्री का रूप धारण कर उसे दर्शन दिया, लेकिन उस चरवाहे ने उन्हें गलत नजरों से देखा और शापित होकर अपने पशु धन के साथ नष्ट हो गया. गाय गोर्रा नामक स्थान पर घंट-घुमर, सील-लोढ़ा पत्थर के रूप में पाये गये थे, उचित रख-रखाव नहीं होने के कारण चोरी हो गये.
यहाँ पर संतान प्राप्ति के लिए माता से मन्नत मांगने भी लोग आते हैं, और पशुबलि भी देते हैं.
पर्यटन स्थल धार्मिक, प्राकृतिक, आस्था, खतरा, रोमांच और पहाड़ों के अद्भुत नजारे का संयोग है तुरतुरिया..
-सुशील भोले-9826992811
Thursday, 14 January 2021
अध्यात्म के रद्दा..
वो नागपंचमी के सुरता//
अध्यात्म के रद्दा....
जीवन का उत्तरार्द्ध ईश्वर और अपने आध्यात्मिक सिद्धांतों को पूर्ण करने के लिए होता है। शायद इसीलिए हमारी संस्कृति में इस अवस्था को वानप्रस्थ आदि आदि.. के रूप में प्रचारित किया गया है। वानप्रस्थ का तात्पर्य ही होता है, गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर सद्गति के मार्ग पर अग्रसर होना और अपने अनुभवों को लोक हित में समर्पित कर देना।
मुझे लगता है, मेरी भी यह अवस्था अब प्रारंभ हो चुकी है। वैसे अध्यात्म के प्रति मेरा झुकाव बचपन से ही रहा है। लेकिन गृहस्थ जीवन और साहित्य जगत में प्रवेश करने के पश्चात् इसमें कुछ कमी सी आ गई थी। खासकर साहित्य में जनवादी विचारों से प्रभावित होने के कारण हर प्रकार के शोषक वर्ग के प्रति आक्रोश और ईश्वर के प्रति अन्याय किए जाने का भाव।
इन सबके बीच 24 जुलाई 1994 नागपंचमी के दिन मेरे जीवन में अजीब मोड़ आया। एक सफेद वस्त्रधारी साधु दिन के करीब 10 - 10.30 बजे मेरे घर के सामने आकर रूक गये। मैं वहाँ बैठा गुड़ाखू (एक प्रकार का नशीला मंजन) घिस रहा था। वे रूके और मेरे पास आकर बोले- 'तुम्हें तर्जनी उंगली को जूठा नहीं करना चाहिए। यह देव स्थान होता है। मंजन ही करना है, तो मध्यमा उंगली से किया करो.' बस इतना बोले और वे चले गये।
आमतौर पर मैं ऐसे साधुओं की बातों पर ध्यान नहीं देता था। फिर भी जाने क्यों उनकी बातों को मानने की मन में इच्छा हुई। मैं उठा, घर के अंदर गया और तर्जनी उंगली को धोकर वापस बाहर आकर मध्यमा उंगली से गुड़ाखू घिसने लगा। ऐसा करते ही मुझे अपने अंदर मानसिक परिवर्तन का अहसास होने लगा। सावन का महीना चल ही रहा था, दो सोमवार अभी बचा हुआ था। उन दोनों सोमवार को व्रत रखने की इच्छा मेरे अंदर होने लगी। छात्र जीवन में मैं सावन सोमवार का व्रत रखता भी था, लेकिन जब हम हाई स्कूल में थे, तब हमारे दादा जी ऐसे ही सावन सोमवार को स्वर्ग सिधार गये थे, तब से व्रत का वह सिलसिला थम गया था।
फिर सोमवार आया और मैं व्रत रखकर बढ़िया पूजा-पाठ करने लगा। इसी बीच रांवाभांठा (बंजारीधाम, रायपुर) वाले मेरे साहित्यिक मित्र डॉ. सीताराम साहू मुझसे मिलने मेरे रिकार्डिंग स्टूडियो पर आए। बातों ही बातों में मेरे सामने अनायास उपस्थित हो रही विभिन्न परेशानियों के समाधान के लिए उनके गाँव में संचालित 'भोले दरबार' में आकर समाधान प्राप्त करने की बात कही।
आमतौर पर मैं ऐसे दरबार और तंत्र-मंत्र वाले लोगों से दूर ही रहता था। लेकिन एक चिकित्सा पेशा के प्रतिष्ठित व्यक्ति और मेरे घनिष्ठ साहित्यिक मित्र ऐसा कह रहे थे। उनके बार-बार जोर मारने पर मैंने दरबार में का जाने का निश्चय किया। वहाँ शिव जी की हाजिरी आई हुई थी। मुझे सवा महीने तक निर्जला व्रत रखकर शिव उपासना का सुझाव दिया गया। जनवादी विचारधारा में बह रहे एक तार्किक पत्रकार-साहित्यकार के लिए इसे सहज रूप से स्वीकार कर लेना संभव नहीं था। केवल डॉ. सीताराम साहू की बार-बार समझाइश और आग्रह के चलते मैंने कठोर व्रत को करने का निर्णय लिया।
इसी सवामासी व्रत के 21 वें दिन मेरे जीवन में अद्भुत चमत्कार हुआ। बाबा स्वयं मेरे पास आए। मेरे जीवन के उद्देश्य और कारण से परिचित कराए और उसे पूर्ण करने के लिए नियम-विधि की शिक्षा दिए। तभी मुझे नागपंचमी के दिन आए श्वेतवस्त्र धारी साधु का रहस्य भी ज्ञात हुआ।
उस नियम और विधि को जीते हुए अब मेरे जीवन का संध्या काल प्रारंभ हो चुका है। साधना काल के वे 21 वर्ष मेरे जीवन में सुशील से भोले बनने की प्रक्रिया भी है। इस बीच अब मेरे गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियां भी लगभग पूरी हो चुकीं थीं। अब जीवन के इस उत्तरार्द्ध को उस ईश्वरीय कार्य को समर्पित कर देने का विचार उत्पन्न हुआ, जिसके लिए मुझे तैयार किया गया था। उनके द्वारा दिए गये ज्ञान, यहां की मूल संस्कृति और धर्म का वास्तविक स्वरूप, जिन्हें जानने-समझने में मुझे 21 वर्ष लग गये थे। उन्हें लोगों से परिचित कराने और सद्मार्ग पर आगे बढ़ाने का प्रयास करना। बस अब जीवन का यही अंतिम ध्येय रह गया है।
लेकिन जब से मुझे पक्षाघात (लकवा) का बड़ा अटैक आया है, तब से वह उद्देश्य डांवाडोल होता लग रहा है. अपने इस उद्देश्य को मिशनरी रूप देने के लिए, धरातल पर साकार करने के लिए मैंने एक समिति "आदि धर्म जागृति संस्थान" का 28 फरवरी 2018 को विधिवत पंजीयन करवा कर पूरे प्रदेश में दौरा कर इसका चारों तरफ प्रचार प्रसार और जिला इकाइयों का गठन भी किया. इस बीच हर महीने सभा और संगोष्ठी का आयोजन भी होने लगा. प्रदेश के मिडीया में इसका प्रतिसाद भी अच्छा मिलने लगा. अच्छे अच्छे लोग हमसे जुड़ने लगे. इसी बीच 24 अक्टूबर 2018 (शरद पूर्णिमा) को आमदी नगर भिलाई के एक कार्यक्रम में मुझे पक्षाघात (लकवा) का बड़ा अटैक आ गया. तब से लेकर अब तक मैं लगभग बिस्तर पर ही हूँ, और मेरे साथ ही समिति का कार्य भी मेरी ही अवस्था को प्राप्त कर गई है.
इस बीच मैंने अपने कई सहयोगियों से मेरी जिम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा लेने के लिए अनुरोध भी किया, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. लोग हमारे इस अभियान को धरातल पर साकार होते तो देखना चाहते हैं, लेकिन स्वयं उसके लिए नेतृत्वकर्ता की भूमिका में आना नहीं चाहते.
बस अब ईश्वर से इतनी ही अपेक्षा है, कि इस मिशन को पूरा करने के लिए कोई योग्य पात्र मुझे दे दे, जो मेरे लकवा और उम्र के थपेड़ों से लाचार हो चुके हाथों के भार को अपने मजबूत और शक्तिशाली हाथों में अच्छे से सम्हाल ले... वैसे एक बात की संतुष्टि है, कि वैज्ञानिक आविष्कार के चलते अभी इंटरनेट के माध्यम से जो सोशलमीडिया संचालित हो रहा है, उनके माध्यम से मैं अपने अर्जित ज्ञान को लौगों तक पहुँचा पाने में सक्षम हो गया हूँ.
🙏🌹ऊँ नमः शिवाय 🌹🙏
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो. नं. 9826992811
तिल सकरायत ऊपर लोककथा...
'तिल सकराएत' उपर लोककथा..
"उठ पुतुर तिल पुर्री"
एक गाँव म एक झन महतारीअउ वोकर बेटा राहय। तिल सकराएत के दिन तिल के लाड़ू बनथे। तेखरे सेती वो दिन महतारी ह बड़े बिहनिया ले तिली ल धो डरे राहय। थोरिक घाम के रोस बाढ़िस तहाँ ले खटिया ल खोर म मढ़ा के सुग्घर चद्दर बिछा के तिली ल सुखोय बर बगरा दिस। ए बात ल तो सबो जानथन, के कोनों भी जिनिस ह पानी म भीजे ले फुल के बड़का असन हो जाथे। भीजे चना, उरीद, मूँग ल तो देखेच होहू। फेर तो वो तिली राहय। धोय-भीजे तिली के साइज सुक्खा तीली ले दुगुना अउ अढ़ई गुना बाढ़ जाथे। तिली पूरा खटिया भर बगर जाथे। महतारी के पाँच छै बछर के एक झन बेटा राहय तेला वोहा चेतावत कहिथे- "देखे रबे रे बेटा, कुकर-माकर अउ गाय गरू के। तिली सुखावत हे, अउ तहूँ झन खाबे। लाड़ू बनाहूँ तब खाबे। मैं तरिया ले कपड़ा-लत्ता काँच-पखार के अउ नहा-खोर के आवत हँव। तलघस तिली सुखा जही।"
तिली जतके जल्दी भीजथे ओतके जल्दी सुखाथे घलो। नहा के आवत ले तिली सुखा के खटिया भर ले आधा हो जाय राहय। तेला देख के महतारी ल भरोसा नइ होय के तिली कइसे अधिया गे। सोचथे के टूरा ह लालच मा आधा तिली ल भकोस डरे होही। टूरा ल पूछिस त टूरा काला बतावय। वो बपुरा ह तो मुँह बाँधे रखवारी करत रिहिसे। फेर महतारी के गोड़ के रिस तरुवा म चघ गे। नानकुन लइका ल कुटकुट ले छर डरिस। लइका कोन्टा डाहन पटियागे। फेर रिस म महतारी ल लइका के दसा के ज्ञान नइ हो पाइस। रिसे-रिस म महतारी तीली ल सकेल के उही डब्बा म भरथे जेन म नाप के निकाले राहय। देखथे तौ ओखर मुँह ले अकस्मात निकल जथे, अइ! तिली तो जस के तस हे। अउ मैं फोकटे-फोकट नानकुन लइका उपर उरहा-धुरहा हाँत उठा डरेंव। अउ तुरते पटियाय लइका करा जाके हुत कराय ल लगथे, "उठ पुतुर (पुत्र) तिल पुर्री, उठ पुतुर तिल पुर्री।" पुतुर कहाँ उठने वाला हे। वो तो हमेसा बर सुत गे राहय।
रिस म मनखे काय करत-करत काय कर डारथे नोनी-बाबू हो, तेन ल ये कहिनी ले जानव। जादा रिस कभू अउ काखरो बर अच्छा नइ होय।
दार-भात चुर गे, मोर कहिनी पुर गे।
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
छट्ठी-बरही...
छट्ठी-बरही...
हमर संस्कृति म अलग अलग कारज के अलग अलग महत्व हे. जम्मो कारज के एक विशेष महत्व होथे, एमा छट्ठी-बरही के घलो अपन महत्व अउ विधान हे.
जब काकरो घर म लइका अवतरथे थे त तीन दिन म महतारी ल बरही नहवाये के नेंग पूरा करे जाथे अउ छै दिन बाद छट्ठी नेंग ल राखे जाथे। छट्ठी के आगू दिन संझा बेरा माईलोगिन मन ल कांके चाहा पिये बर बलाए जाथे। कांके चाहा पिये बर बलाये के सेती गांव म अरोसी-परोसी सब एक साथ मिलजुल के खुसी मनाये के मौका पाथें।
माइलोगिन मन बर एक विशेष प्रकार के पेय पदार्थ बनाये जाथे ओला कांके चाहा कहे जाथे. कांके चाहा म अलग अलग प्रकार के उरई के जर जइसन जड़ी बूटी डार के अउ करिया तिली म बघार के बनाये जाथे, उही ल कांके चाहा कहे जाथे। उही कांके ल लईका पाये बर आये माईलोगिन मन ल देथें। कांके पियईया माईलोगिन मन लइका ल कोरा म पाके आसिरवाद देथें।
कांके चाहा के बिहान दिन छट्ठी के कार्यक्रम रख जाथे, जेमा घर म सब सगा सोदर मन आथें. सब परिवार एक जगह जुरिया के खुशी मनाथें. छट्ठी के दिन बाबू पिला मन लईका ल आसिरवाद देहे बर आथे बाबू पिला मन चाय नास्ता देथे। अउ जेला अपन सांवर बनवाना रइथे ओहा मरदनिया तिरन बईठ के अपन सांवर बनवाथें। घर के बाबू पिला मन तको सांवर बनवाथें। घर के मनखे अउ सब सगा सोदर मन सब्बो झन जुरिया के अपन अपन घर के हाल चाल के गोठ बात करत सब बइठे रइथें।
संझा बेरा म पहिलावत लईका होये रथे त समधियानो घलो आथे. ए समधियानो के नेंग म समधिन मन ल गांव के चौक ले घर तक परघा के लाये जाथे. समधिन मन घर पंहुचथें तहांले सुग्घर गोड़ हाथ धोवाके बइठार के चाहा नास्ता दिए जाथे । अवतरे लइका ल लानके आये समधियानो मन ल पवाके आशिर्वाद लेवाए जाथे. मुंधियार के गाँव बस्ती के भजन टोली वाला मन ल बुलाके घर म गायन भजनअउ सोहर गीत गवाये जाथे. उहिच बेरा म नानुकअवतरे नान्हे लइका के नाव घलो धराये जाथे. एकर सेती एला नामकरण संस्कार घलो कहे जाथे.ये जम्मो नेंग जोंग ह छै दिन के कार्यक्रम ल रखाथे तेकर सेती छट्ठी के नाम ले जाने जाथे।...
Sunday, 3 January 2021
मत बता मंदिर मस्जिद...
मत बता मोला
तोर मंदिर मस्जिद अउ चर्च
के महानता ल
मैं मजदूर अंव
कतकों भगवान अल्लाह अउ
गाड के घर ल
इही मोर हाथ ह
बनाए हे...
-सुशील भोले-9826992811