अंतर्राष्ट्रीय महतारी भाखा दिवस : छत्तीसगढ़ी खातिर अरजी...
सन् 1999 ले विश्व स्तर म महतारी भाखा दिवस मनाए के चलन होए हे. काबर 21 फरवरी 1952 के बंगलादेश के ढाका यूनिवर्सिटी म पढ़इया लइका अउ सामाजिक कार्यकर्ता मन तत्कालीन पाकिस्तानी सरकार के भाषायी नीति के विरोध करत उहाँ के अपन महतारी भाखा बांग्ला के अस्तित्व बचाए रखे खातिर जबर प्रदर्शन करे रिहिन हें. जेकर सेती पाकिस्तानी पुलिस ह वोकर मन ऊपर गोली बरसाए ले धर लिए रिहिसे. तभो प्रदर्शनकारी मन डटेच रिहिन. आखिर ए लगातार विरोध के चलत उहाँ के तत्कालीन सरकार ल बांग्ला भाषा ल आधिकारिक रूप ले भाषा के दर्जा देना परिस. फेर आगू चलके ए भाषायी आन्दोलन म शहीद होए लइका मन के सुरता म यूनेस्को ह सन् 1999 म 21 फरवरी ल महतारी भाखा दिवस मनाए के घोषणा करे रिहिसे.
महतारी भाखा दिवस मनाए के मुख्य उद्देश्य दुनिया भर म भाषायी अउ सांस्कृतिक विविधता के प्रचार प्रसार करना रिहिसे. संगवारी हो, अंतर्राष्ट्रीय स्तर म महतारी भाखा दिवस के संदर्भ म आज हमर अपन महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी खातिर दू आखर गोठियाए के मन होवत हे. काबर ते छत्तीसगढ़ी खातिर घलो कतकों बछर ले कोनो न कोनो किसम के आन्दोलन होतेच हे.
जब हमर देश म सन् 1956 म अलग भाषायी अउ सांस्कृतिक आधार म जम्मो राज्य मनके पुनर्गठन करे खातिर 'राज्य पुनर्गठन आयोग' के स्थापना करे गे रिहिसे, तभेच ले हमर पुरखा मन घलो छत्तीसगढ़ राज्य के अपन खुद के भाखा अउ संस्कृति होए के आधार म अलग छत्तीसगढ़ राज खातिर मांग चालू करिन. राज आन्दोलन के नेंव रचिन. ए राज आन्दोलन के संगे-संग भाखा खातिर घलोक आवाज उठते रहिस. जम्मो गुनी साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी म जादा ले जादा लिखे के चालू करिन. हमर असन नेवरिया लिखइया-पढ़इया मन आरुग छत्तीसगढ़ी म पत्र-पत्रिका निकाले के उदिम घलो करेन, तेमा छत्तीसगढ़ी के लेखक के संगे-संग पाठक मनके संख्या म घलोक बढ़ोत्तरी होवय. ए सबके परिणाम ए होइस के 1 नवंबर सन् 2000 के अलग छत्तीसगढ़ राज के अस्तित्व तो स्थापित होगे, फेर भाषा के आधिकारिक दर्जा अभी तक नइ मिल पाए हे. हाँ, ए बीच ए जरूर होइस, के छत्तीसगढ़ सरकार ह 'छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग' के गठन जरूर करिस, जेकर ले कतकों किसम के भाखा अउ साहित्य ले संबंधित आयोजन होवत रहिथे. फेर असल मांग आजो जस के तस हे. महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी म पढ़ई-लिखई के संग राजकाज के जम्मो बुता.
एकर खातिर हमर देश के संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक छत्तीसगढ़ी ल संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल होना जरूरी हे. वइसे राज सरकार के हाथ म अतका अधिकार होथे, के वो ह केन्द्र सरकार द्वारा आठवीं अनुसूची म शामिल करे बिना घलो एला इहाँ प्राथमिक शिक्षा के माध्यम बना सकथे. बस जरूरी हे, ईमानदार नीयत के.
जिहां तक एला आठवीं अनुसूची म शामिल करे के बात हे, त एकर खातिर हमर इहाँ के कोनो भी राष्ट्रीय राजनीतिक दल ईमानदार नइ दिखय. जब केन्द्र के कुर्सी म एक दल वाले मन बइठथें, त दूसर मन आठवीं अनुसूची के नांव म राजनीतिक खुडवा खेलथें. अउ जब दूसर दल वाले मन केन्द्र के कुर्सी म अभर परथें, त दूसर दल वाले मन खुडवा खेलथें. कुल मिलाके दूनों दल वाले ओसरीपारी खुडवा खेलत रहिथें.
इहाँ कुछ क्षेत्रीय दल वाले घलो हें, फेर उंकर मन के संख्या बल अतका नइहे, के केन्द्र वाले मनके कान ल पिरवा सकयं. तब एकर समाधान के रद्दा कइसे खुलही?
निश्चित रूप ले जइसे बांग्ला भाषा खातिर उहाँ के पढ़इया लइका अउ समाजसेवी मन लड़िन-भिड़िन अउ कुर्बानी देइन, ठउका छत्तीसगढ़ी खातिर घलो अइसने करे बर लागही.
हमर इहाँ रविशंकर विश्वविद्यालय म एमए छत्तीसगढ़ी पढ़इया लइका मन ए बुता ल ठउका करत हें. एक-दू साहित्यिक अउ आने संगठन वाले मन घलो अपन सख भर हुंकार भरत रहिथें, फेर मोर अरजी हे, के इंकर मन संग इहाँ के जतका छत्तीसगढ़िया समाज हे, उंकर संगठन हे, उहू मन ए उदिम म खांध म खांध जोर आगू आवयं अउ अपन महतारी भाखा ल संवैधानिक दर्जा के मिलत ले सड़क के लड़ाई ल लड़त राहयं. अउ एक अउ बात, जब कहूँ इहाँ जनगणना होथे, त अपन महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी लिखवावयं. स्कूल मन म घलोक गुरुजी मन लइका मनके मातृभाषा के कालम म बिना पूछे-सरेखे हिन्दी लिख देथें. एकर बर घलो सावचेत रेहे के जरूरत हे. अभी सबो स्कूल म लइका मनके मातृभाषा पूछे जाने वाला हे, एमा जम्मो पालक मनला चेत करके मातृभाषा छत्तीसगढ़ी लिखवाए के उदिम करना चाही.
जय छत्तीसगढ़.. जय छत्तीसगढ़ी
-सुशील भोले-9826992811
Sunday, 20 February 2022
अंतर्राष्ट्रीय महतारी भाखा दिवस छत्तीसगढ़ी
Saturday, 12 February 2022
मया : जस देबे तस पाबे..
मया : जस देबे तस पाबे...
मया के बंधना अइसे जेमा जाति धरम न उमर के बाधा.
सबो मुरति म शिव-गौरी सबो जोड़ी म कृष्ण संग राधा..
प्रेम अलौकिक है. प्रेम शाश्वत है. प्रेम किसी को भी हो सकता है. यह जाति, धर्म, क्षेत्र की सीमा और संस्कृति को नहीं मानता. यह पानी की तरह रंगहीन है. सभी ने अपने -अपने ढंग से प्रेम की व्याख्या की है. प्रेम को किसी भी परिभाषा में बांधना असंभव है. इसे शब्दों के गांठों में बांधना मुश्किल है. यह मित्र, गुरु-शिष्य, भाई- बहन, माता -पिता संग पुत्र-पुत्री, पति-पत्नी आदि सभी स्थानों पर विधमान होता है.
हाँ, यह अवश्य है, कि प्रत्येक स्थान पर इसकी प्रकृति अलग -अलग होती हैं. यह अचानक आता है और सब कुछ बदल देता है. यह सर्वव्यापी है. यह बहुआयामी है. प्रेम जीवन का आधार है. इसके बिना जीवन नीरस है. गौतम बुद्ध ने कहा भी है- 'प्रेम ही जीवन है'.
इसे हम प्यार, मोहब्बत, इश्क, मया कहते हैं. प्रेम सुरक्षा है. प्रेम वासना है. कहते हैं प्रेम की गहराई में कहीं न कहीं शारीरिक घनिष्टता छिपी होती है. प्रेम दो आत्माओं का मिलन होता है. प्रेम है तो जीवन है. प्रेम एक बहता हुआ दरिया है. प्रेम की अनिभूति अपने आप में परिपूर्ण और बेजोड़ है. प्रेम शक्ति है. प्रेम का स्वरुप भी गजब है. कहीं यह ढकी है तो कहीं यह निर्लज्ज होकर खड़ा हो जाता है और समाज को चुनौती देता है. साहित्य में प्रेम अन्तःसलिला की भांति जीवन सिचता है तो कहीं यह जीवन को उजाड़ कर नाश कर देता है. कहीं यह बच्चों सा मासूम निश्छल है, तो कहीं छल कपट से भरपूर. युगों-युगों से साहित्य में प्रेम के अलग-अलग प्रकार के स्वरुप है. कोई इसी रोमांटिक भाव में व्यक्त करता है तो किसी के यहाँ यह आराम, सुख-सुविधाओं और संरक्षण के एवज में जिन्दगी को उसकी सारी आशाओं आकांक्षाओं को गिरवी रखे हुए है. कहीं यह पूर्णता को प्राप्त करता है तो कहीं यह शुरू में या बीच में ही दम तोड़ देता है. बिना प्रेम के कोई भी रचना असंभव है.
कबीर के शब्दों में 'प्रेम न बाड़ी उपजी प्रेम न हाट बिकाय राजा परजा जेहि रुचे सिर हैं सोई लै जाय!'
लेकिन आज का प्रेम तो बाजारू हो गया है. आज प्रेम पर बाजार हावी है. लोगों ने प्रेम के स्वरुप को बदल दिया है. आज प्रेमी -प्रेमिका इन्टरनेट के माध्यम से प्रेम का इजहार करते हैं. आज का प्रेम फेसबुकिया प्रेम, ऑरकुट प्रेम, चैटिंग आदि रूपों में विभक्त हो गया हैं. आज प्रेम को विभिन्न नामों से पुकारा जाता हैं. प्रोमिस डे. रोज डे , किस डे ,हग डे, वेलेन्टाइन डे और न जाने कौन -कौन से नाम हैं इस प्रेम के. प्रेम के रास्ते में सुख और दुःख दोनों का एहसास होता है. इसमें लाभ और हानि दोनों प्राप्त होता है या कहें कि यह लाभ और हानि दोनों का मिश्रित रूप है. यह बात सत्य है कि
प्रेम मनुष्य को मनुष्य बनाता है और प्रेम ही जीवन है. प्रेम के बिना जीवन असंभव है. प्रेम दो दिलों को मिलाता जरुर है, मगर बहुत दिलों को तोड़कर. प्रेम के रास्ते में बहुत खतरे हैं. इस राह में बहुत धोखे हैं. इसके कारण बहुत से घर बर्बाद हुए हैं. यह कभी एकतरफा है, तो कभी दोतरफा. लेकिन नुकसान दोनों में है. एकतरफा प्यार कभी सफल नहीं होता है. जबकि दोतरफा प्यार सफल होकर भी असफल है. एक तरफ़ा प्यार काफी खतरनाक होता है. इसमे प्रेमी-प्रेमिका दोनों में से किसी एक के जीवन पर संकट के बादल मंडराते रहता है. प्रेम की कोई उम्र सीमा नहीं होती है और न ही इसका कोई धर्म होता है. यह तो धर्म निरपेक्ष होता है. प्रेम बड़े-बड़ों को भी होता है. प्रेम कभी न खत्म होने वाला भाव है.
मैंने इसे चार पंक्तियों में लिखने का प्रयास किया है-
मया मरम अउ मीठ बोली जस देबे तस पाबे
जेन पिरित के संगी होही तेला तब पोगराबे
कतकों होवय कंचन काया या दौलत के ढेरी
फेर म एकर पर जाबे त जीवन भर पछताबे
-सुशील भोले-9826992811
Wednesday, 9 February 2022
संगवारी टैक्स...
संगवारी टैक्स..
जब-जब
बजट पेश करे
अउ
वोकर ऊपर
सदन ले लेके
सड़क तक
चर्चा होए के
दिन-बादर आथे
तब-तब
मोला
बड़ा डरहुंत
धुंकधुंकासी जनाथे.
सरकार कहूँ
संगवारी के
जादा संख्या ऊपर घलो तो
टैक्स नइ लगा देही?
काबर ते
मोर संगी मनके संख्या ह
मोर आय ले
कतकों गुना
जादा हे...
-सुशील भोले-9826992811
कपिलनाथ कश्यप जी सुरता
6 मार्च जयंती म सुरता//
छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला महाकवि कपिलनाथ कश्यप
आज अलग छत्तीसगढ़ राज अउ छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के बने के बाद छत्तीसगढ़ी लिखई के संगे-संग पढ़ई घलो ह पांखी लगा के उड़ियाए ले धर लिए हे, तेमा वैज्ञानिक आविष्कार के चलत इंटरनेट के माध्यम ले आए सोशलमीडिया ह एमा सोन ऊपर सोहागा चढ़ा दिए हे. एकरे सेती आज छत्तीसगढ़ी ल अपन माटी राज छत्तीसगढ़ के संगे-संग दुनिया भर म थोक-बहुत तो पढ़ेच जावत हे. फेर आज के उड़ान के जनम कइसे गढ़न होइस. एकर नेंव म कोन मन अउ कतका मिहनत ले पखरा रचिन तेनो ल तो सरेखे जाना जरूरी हे.
छत्तीसगढ़ी के नेंव ल टमड़े ले जानबा मिलथे, के जे मन के एमा जबड़ बुता हे, वोमा महाकवि कपिलनाथ कश्यप जी के नांव सोन आखर म लिखाय दिखथे. कपिलनाथ कश्यप जी ल छत्तीसगढ़ी भाखा के पहला महाकवि के रूप म चिन्हारी करे जाथे, जे मन वो बेरा छत्तीसगढ़ी भाखा म तीन महाकाव्य श्री रामकथा, श्री कृष्ण कथा अउ श्री महाभारत कथा लिख के छत्तीसगढ़ी भाखा के भंडार ल पोठ करे हें. ए तीनों महाकाव्य के संगे-संग हीरा कुमार (खण्ड काव्य), सीता के अगनी परीछा (खण्ड काव्य), अब तो जागौ रे (काव्य संग्रह), डहर के कांटा (काव्य संग्रह), नावा बिहान (एकांकी), अंधियारी रात (एकांकी), गोहार (एकांकी), गुरावट बिहा (एकांकी), ग्राम सुधार (एकांकी), पापी पेट (एकांकी), निबंध निसेनी (निबंध) लिख के छत्तीसगढ़ी के कोठी ल लबालब भरे के बड़का बुता करे हें.
6 मार्च 1906 म जांजगीर-चांपा जिला के गाँव पौना के संपन्न किसान शोभानाथ अउ महतारी चन्द्रावत देवी के घर जनमे कपिलनाथ कश्यप जी के लगाव छात्र जीवन ले ही साहित्य डहार रिहिस. फेर उंकर लेखन राजस्व विभाग के नौकरी म आए बाद चालू होइस. तब उन हिन्दी म ही साहित्य रचना करंय.
इहाँ ए बात म चर्चा करे के मन होवत हे, के एक छत्तीसगढ़ी महतारी भाखा वाले मनखे हिन्दी म लिखे के शुरुआत काबर करथें? पहिली के जम्मो पुरखा साहित्यकार मन के संगे-संग हमू मन अइसने करेन. एकर असल कारन आय, शिक्षा के माध्यम. भले हमर मनके महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी आय, फेर हम सबके स्कूली पढ़ई हिन्दी माध्यम ले होए हे, तेकर सेती साहित्य लेखन के शुरुआत घलो हिन्दी ले होए हे. एकरे सेती हमन महतारी भाखा म प्राथमिक शिक्षा होना चाही कहिके सरकार जगा गोहरावत रहिथन. अभी के केन्द्र सरकार ह तो जेन नवा शिक्षा नीति के घोषना करे हे, तेमा महतारी भाखा के माध्यम ले ही प्राथमिक शिक्षा होना चाही कहे हे, फेर राज सरकार ह अभी एती चेत नइ कर पाए हे. वइसे राज सरकार के मुखिया ह घलो एक पइत कहे रिहिन के महतारी भाखा के माध्यम ले ही प्राथमिक शिक्षा चालू होही कहिके फेर ए कथन ह अभी स्कूल मन म जमीनी रूप ले लागू नइ हो पाए हे. भरोसा करथन, के अवइया बेरा म अइसन हो पाही, तब छत्तीसगढ़ी महतारी भाखा वाले मन घलो साहित्य लेखन के शुरुआत ही छत्तीसगढ़ी ले करहीं.
कश्यप जी के जुन्ना पोथी मनला देखे ले जानबा मिलथे, के उनला लेखन खातिर प्रेरणा वो बेरा के प्रतिष्ठित एकांकीकार रहे उंकर गुरु रामकुमार वर्मा जी ले इर्विन क्रिश्चियन कालेज इलाहाबाद म पढ़त खानी ही मिलिस, जिहां ले उन सन् 1931 म स्नातक परीक्षा पास करिन. अउ फेर राजस्व विभाग के नौकरी म आए के बाद नौकरी ले कुछ बेरा निकाल के साहित्य साधना म लगावंय. तब उन वैदेही विछोह, युद्ध आमंत्रण, बावरी राधा, श्रीराम जानकी विवाह अउ राम राज्य आदि खण्ड काव्य के सृजन करिन. ए सबो खण्ड काव्य हिन्दी म रहिन. उंकर पहला रचना के प्रकाशन 1968 म "विदेही विछोह" के रूप म होइस, जे ह प्रयास प्रकाशन ले छपे रिहिसे.
सन् 1968 के बेरा ह उंकर जीवन के महत्वपूर्ण बेरा आय. इही बखत उंकर जीवन म बड़का बदलाव घलो आइस. राजस्व विभाग के नौकरी ले सेवानिवृत्त होए के बाद उन बिलासपुर म रहे लगिन, तब ए क्षेत्र के साहित्यकार मन संग उंकर मेलमिलाप बाढ़िस. इही मन म वो बखत एमए करत विनय कुमार पाठक, बलराम पांडेय आदि मन संग भेंट होइस. फेर इंकरे मन के कहे अउ प्रोत्साहित करे म उन छत्तीसगढ़ी म लिखे के शुरुआत करिन. फेर मन म इहू गुनत रहिन, के छत्तीसगढ़ी म लिखहूं त विद्वान अउ गुनी साहित्यकार मन का गुनहीं सोचहीं? आखिर बड़ सोच-विचार के अपन ईष्ट देव ल सुमर के "श्रीराम कथा" महाकाव्य के रचना करिन.
छायावाद के प्रवर्तक कवि पं. मुकुटधर पांडेय जी कश्यप जी के 'श्रीराम कथा' ल देख के दंग रहिगें. अउ वोला सिरिफ आठेच दिन म पूरा पढ़ डारिन. संग म भूमिका लिखिन. जेमा उन लिखिन- "कविवर कपिलनाथ कश्यप का मैं अत्यंत कृतज्ञ हूँ, जिनकी वजह से मुझे छत्तीसगढ़ी में 'श्रीराम कथा' पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ
इसमें पद-पद पर उनकी रामभक्ति का परिचय मिलता है. कवि ने अपने जीवन भर की कमाई श्री राम के चरणों में चढ़ा दी है, भगवान भावग्राही हैं, उसे अवश्य स्वीकार करेंगे. कवि का जीवन धन्य हो गया. उनकी लेखनी सफल हो गई."
कश्यप जी के छत्तीसगढ़ी म लिखे ए पहला महाकाव्य ल 'मानस चतुस्ती शताब्दी समारोह समिति' ह बरिस 1974 म छपवाइस, जेला मध्यप्रदेश साहित्य परिषद ले बरिस 1975 म लोक साहित्य के प्रतिष्ठित "ईसुरी पुरस्कार" ले सम्मानित करे गिस.
कश्यप जी जेन बखत ये सब रचना मनला सिरजाईन तब आज के जइसन प्रचार-प्रसार के गंज अकन साधन उपलब्ध नइ रिहिस, जेकर सेती लोगन उंकर साहित्य के गरिमा ल वतका नइ टमड़ पाइन जतका टमड़े जाना रिहिसे. उन श्रीराम कथा, श्रीकृष्ण कथा महाभारत, श्रीमद्भागवत गीता जइसन पोथी पुराण ल छत्तीसगढ़ी म लिखके बड़का संत ऋषि मन जइसे तपस्या करे हें.
आज मैं "कपिलनाथ कश्यप जयंती आयोजन समिति" ले दूनों हाथ के दसों अंगरी ल जोर के अरजी करत हंव, के उन श्रद्धेय कश्यप जी के ए जम्मो धरोहर मनला पोथी के रूप म जादा ले जादा छपवाए के संगे-संग वोमा के प्रमुख प्रसंग मनला संगीतबद्ध करवा के जन-जन म बगराए के घलो बुता करय. एकर ले जे मन पोथी-पतरा पढ़े नइ पावंय उहू मनला संगीत के माध्यम ले भगवान कथा अउ अध्यात्म के अमरित पान करे के भाग मिल जाही.
आवव कश्यप जी के पहला छत्तीसगढ़ी महाकाव्य 'श्रीराम कथा' के डांड़ देखिन-
होनहार हर होबे करथे चाहे लाख उपाय करा.
बिना बलाय जबरन आथे, चाहे कतको बांध धरा..
जब काकरो पतन होथे त वोकर बुद्धि भ्रष्ट हो जाथे ए बात ल कतका सुग्घर लिखे हें-
जब जेकर जात्ती आ जाथे वोकर बुद्धि नठा जाथे.
काम बिगड़ जाये के पाछू मुड़ पटक के पछताथे..
'श्रीराम कथा' के बाद कश्यप जी 'श्री कृष्ण कथा' के सिरजन करिन. ए महाकाव्य के संदर्भ म छायावाद के प्रवर्तक कवि पं. मुकुटधर पाण्डेय लिखथें- ' कश्यप जी ने छत्तीसगढ़ी में कृष्ण कथा सुलभ कर दी, कथा का आधार भागवत पुराण है. यह उनके पूर्व जन्म के पुण्य का ही फल है. कश्यप जी ने इस महाकाव्य का सृजन कर अध्यात्म की ओर प्रवृत होकर परलोक को सुधारने के लिए श्री कृष्ण की बाल लीला का वर्णन बड़े ही तन्मयता से किया है-
ठग ठग दूध पियाथस मोला
चूंदी छू के कहय कन्हइया,
कतक बेर ले दूध पियाबे
चिटको अबले बढ़िस न मइया.
उधो अउ गोपी मनके प्रसंग के चार डांड़ देखव, जेमा उधो के निरगुण ज्ञान ल ठुकरावत दू आखर कहि देथें-
बिन सोंचे समझे उधो तू ब्रज म आया
महुरा भरे स्याम संदेशा इहा सुनाया
लेगे ठग के कान्हा ला अक्रुर इहाँ ले
अइसे लगथे जाहव अव प्रान इहाँ ले.
गीता म भगवान कृष्ण कर्म के संदेश देवत कहे हें- 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' एला कश्यप जी छत्तीसगढ़ी म कतका सुग्घर कहे हें-
करम जोग निस्काम बीज के अरजुन नास न होवय.
उल्टा वोकर साधक ला, चिटको फल दोस न होवय..
यदा यदा ही धर्मस्य... वाले श्लोक के छत्तीसगढ़ी रूप देखव-
जब जब होथे हानि धरम के, अधरम बढ़ जाथे संसार.
तब तब रच के रूप अपन मैं परगट होथंव ले अवतार..
धार्मिक महत्व के तीनों महाकाव्य के संगे-संग अउ जम्मो विषय म अपन लेखनी ल रेंगइया कश्यप जी के प्राथमिक शिक्षा अपन बड़े भाई हीरालाल जी के छांव म राहत गाँवेच म होइस, तेकर पाछू मिडिल के पढ़ई बिलासपुर म करिन, फेर नवमी ले लेके उच्च शिक्षा ल इलाहाबाद म 1931 म पूरा करिन. छात्र जीवन के बेरा उन स्वाधीनता आन्दोलन म घलो संघरिन, जेकर सेती जेलयात्रा घलो करे ल परिस. राजस्व विभाग के कतकों पद म राहत उन बछर 1961 म दुरुग जिला ले सेवानिवृत्त होके साहित्य के अथाह साधना म मगन होगिन. हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी साहित्य संसार ल गौरवान्वित करत ए महाकवि महामानव ह 2 मार्च 1985 के नश्वर देंह के त्याग करत परमधाम के रद्दा रेंग देइन.
उंकर सुरता ल डंडासरन पैलगी... सेवा जोहार 🙏
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Sunday, 6 February 2022
नइ करन अबेर...
नइ करन अबेर.....
(अपन नाती म गोदी म उठाए लिखे रचना)
तैं उत्ती के सुरुज
अउ
मैं हंव संझौती बेर
तभो ले
चल खेल लेथन
नइ करन अबेर...
सुरता हे मोला
अपन मड़िया के रेंगना
घानीमुनी किंदरत
भदरस ले गिरना
महतारी ह हमर
ठउका बतावय
जझरंग ले कूद देस
कहिके हंसावय
अब तो
अइसनेच
तोरो हे फेर
आ चल खेल लेथन
नइ करन अबेर...
अपन लइकई ल
तोरेच म झांकत हंव
बबा के हंसना ल
तोर मेर संघारत हंव
जांगर अब थकत हे
तभो नइ लागय ढेर
आ फेर खेल लेथन
नइ करन अबेर...
-सुशील भोले-9826992811
Friday, 4 February 2022
थोरिक अउ रेंग लेइन...
थोरिक अउ रेंग लेइन...
बेरा के ढरती
उमर के पहाती
करम के कमई ल
थोरिक अउ उजरा लेइन
चल संगी
थोरिक अउ रेंग लेइन.
भले अटकत हे सांस
लागत हे
जइसे गड़त हे फांस
फेर अंतस ल टांठ करके
थोरिक अउ बटोर लेइन
चल संगी
थोरिक अउ रेंग लेइन.
बस अब दिखत हे
हमर अंतिम बसेरा
मयारुक अस जनावत हे
ए तो सुग्घर डेरा
जिनगी के गाड़ी ल
थोरिक अउ ढकेल लेइन
चल संगी
थोरिक अउ रेंग लेइन
-सुशील भोले-9826992811
Wednesday, 2 February 2022
काबर? संदर्भ छत्तीसगढ़ आन्दोलन
काबर??
आजादी अउ अधिकार
के बात म
जब कोनो
आन्दोलन होथे
त कवि लेखक मन
वोकर
जबर गुनगान करथें
वीर रस के धारा बोहवाथें
कतकों किताब अउ
अखबार ल
आखर म सजाथें.
फेर मोला
गजब अचरज लागथे
जब
अपन अस्मिता अउ
स्थानीय चिन्हारी के
स्वतंत्र पहचान खातिर
करे गे
छत्तीसगढ़ राज के
आन्दोलन अउ
वोला
नेंव कोड़े ले लेके
राज के सिरजे तक
जम्मो बुता-काम
अउ रोजी-रोजगार ल
छोड़ के भीड़े
सुराज के अलख जगइया
राज आन्दोलनकारी मनके
जसगान
कोनो डहार
काबर नइ सुनाय?
कोनो कवि लेखक के
कलम
काबर नइ फड़फड़ाय??
-सुशील भोले-9826992811