Tuesday, 13 September 2022

सुशील यदु सुरता.. भुइया बनाइस

23 सितम्बर पुण्यतिथि म सुरता//
छत्तीसगढ़ी झंडा ल अगास म लहराए खातिर भुइॅंया बनाइस सुशील यदु
    छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास म जब कभू एकर खातिर संगठन के माध्यम ले जमीनी बुता करइया मन के नाॅंव लिखे जाही त सुशील यदु के नाॅंव ल वोमा सबले आगू लिखे जाही. सन् 1981 म 'छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति' के गठन करे के बाद वोहा जिनगी के आखिरी साँस तक एकर खातिर जबर बुता करीस. आज हमन छत्तीसगढ़ी भाखा-साहित्य के अतका विस्तारित रूप देखथन, लोगन के जुराव देखथन त वोमा ए समिति अउ सुशील यदु के अपन संगी मन संग मिलके करे गे जबर मैदानी बुता के पोठ हाथ हे.
    ए समिति के गठन के पहिली घलो पुरखा साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी खातिर कारज करत रेहे हें, फेर वोहा लेखन, प्रकाशन अउ मंच के माध्यम ले जनमानस म छत्तीसगढ़ी खातिर मया उपजाए के बुता रिहिसे. समिति के माध्यम ले आरुग भाखा-साहित्य खातिर रचनात्मक संगठित बुता 'छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति' ले ही चालू होय हे. एकर पाछू इहाँ छत्तीसगढ़ी सेवक के संपादक जागेश्वर प्रसाद जी के संयोजन म 'छत्तीसगढ़ी भासा-साहित्य प्रचार समिति' घलो बनिस. ए ह संयोग आय, मोला ए दूनों समिति संग जुड़े के साथ ही सचिव बनाए गे रिहिसे. ए दूनों समिति के गोष्ठी-बइठका अलग-अलग होवत राहय. छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के गोष्ठी आदि जिहां पुरानी बस्ती के देवबती सोनकर धरमशाला म जादा करके होवय, त छत्तीसगढ़ी भासा-साहित्य प्रचार समिति के गोष्ठी आदि 'छत्तीसगढ़ी सेवक' के कार्यालय म ही जादा होवय. छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के कार्यक्रम आरुग भाखा-साहित्य ऊपर आधारित रचनात्मक किसम के राहय त प्रचार समिति के बेनर म कतकों पइत छत्तीसगढ़ी ल आठवीं अनुसूची म संघारे के संगे-संग अउ अइसने विषय मनला लेके धरना प्रदर्शन के घलो आयोजन हो जावत रिहिसे.
    महतारी पूना बाई अउ सियान खोरबाहरा राम यदु जी के घर 10 जनवरी 1956 के जनमे सुशील यदु के आमतौर म चिन्हारी 'छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति' के संस्थापक अध्यक्ष के रूप म ही जादा होथे. फेर वो कवि मंच के हास्य कवि के रूप म घलो अपन एक अलगेच चिन्हारी बना लिए रिहिसे. घोलघोला बिना मंगलू नइ नाचय रे, अल्ला अल्ला हरे हरे, होतेंव महूं कहूं कुकुर, नाम बड़े दरसन छोटे आदि मन तो उंकर मनपसंद कविता रिहिसे. संग म गंभीर रचना कौरव पांडव के परीक्षा अउ सुराजी बीर मन ऊपर लिखे कालजयी रचना मन घलो मंच म जबरदस्त ताली बटोरय.
    उंकर लिखे कुछ गीत मन तो गजबे च लोकप्रिय घलो होए रिहिसे. 'चंदैनी गोंदा' के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के सुझाए विषय ऊपर लिखे एक गीत तो मोला आज तक गजब निक लागथे-

जिनगी पहार होगे रे
सोचे रेहेन फूल होही,
खांड़ा के धार होगे रे...
रेती महल बनगे आज बिसवास ह
बेली बंधागे हे कतकों के आस ह
पीरा ह सार होगे रे
जिनगी पहार होगे रे...

    अइसने एक अउ गीत हे, जेकर नॉंव ले उंकर गीत अउ कविता के समिलहा संग्रह छपे हे-

फूल हांसन लागे रे दारि, बगिया झूमरगे
बगिया मा जब चले आये सजनी मोर, मन के मिलौनी मोरे
हरियर आमा रे घन मउरे...
तोरे पिरित के रंग मा अइसन रंगे हंव
सपना के सुरता दिन में आथे सजन मोरे
हाय रे बलम मोरे, हरियर आमा घन मउरे...

     सुशील यदु के आकाशवाणी अउ दूरदर्शन ले घलो बेरा-बेरा म कविता परिचर्चा आदि के प्रसारण होवत राहय. उहें वोमन प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र 'नवभारत' म 'लोकरंग' शीर्षक ले सरलग 1993 ले 2002 तक कालम घलो लिखिन. एमा कलाकार अउ साहित्यकार मनके परिचय घलो देके काम करिन. ए बात तो सच आय, हमर इहाँ कतकों अइसन प्रतिभा हें जिनला मिडिया के मंच नइ मिल पाए के सेती लोगन के नजर ले अनजान असन रहे बर पर जाथे. आज के सोशलमीडिया के जमाना म घलो अइसन देखे बर मिल जाथे, त गुनव वो बखत जब मिडिया के अंजोर भारी दुर्लभ रिहिसे, वो बेरा अइसन मंच देना कतेक बड़े बुता रिहिसे.
    सुशील यदु के गीत मन आडियो, विडियो के संगे-संग फिलिम म घलो गाये अउ संघारे गिस. सुशील यदु ह अपन लेखन के रद्दा म आए खातिर अपन महतारी पूना देवी ल प्रारंभिक प्रेरणा बतावय, जबकि गुरु उन बद्रीविशाल यदु 'परमानंद' ल मानय. हमन संग म ही परमानंद जी संग जुड़े रेहेन. पुरखा साहित्यकार हरि ठाकुर जी के उन अपन आप ल सेनापति समझय, तेकरे सेती उंकर अगुवाई म वो बखत चलत छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन के रद्दा म घलो रेंगय.
    छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के माध्यम ले कतकों अइसन साहित्यकार मनला प्रकाशन के मंच घलो दिए गिस, जेमन किताब छपवाए के स्थिति म नइ रिहिन. मोला हमर गाँव नगरगांव के सूरदास कवि रंगू प्रसाद नामदेव जी के जबर सुरता हे. रंगू प्रसाद जी कुंडलियाँ के सिद्धहस्त कवि रिहिन हें, फेर उन खुद होके किताब छपवाए के स्थिति म नइ रिहिन, अइसन म छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति ह उंकर किताब 'हपट परे तो हर गंगे' छपवाए रिहिसे. अइसने हेमनाथ यदु के व्यक्तित्व अउ कृतित्व, बनफुलवा, पिंवरी लिखे तोर भाग, बगरे मोती, सतनाम के बिरवा आदि आदि अलग अलग रचनाकार मनके रचना ल छपवाए गे रिहिसे.
    सुशील यदु के अपन खुद के लिखे पांच कृति घलो छपे हे- 1.छत्तीसगढ़ के सुराजी बीर, 2. लोकरंग भाग-1, 3. लोकरंग भाग-2, 4. घोलघोला बिना मंगलू नइ नाचय, 5. हरियर आमा घन मउरे.
    छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के माध्यम ले पुरखा साहित्यकार, कलाकार आदि मनके सुरता घलो करे जावय.  समिति के सालाना जलसा म तो उंकर मनके नाम ले सम्मान घलो दिए जावत रिहिसे, फेर उंकर मनके जनम या पुण्यतिथि के बेरा म या वोकर संबंधित महीना म अलग से गोष्ठी आदि के आयोजन करे जावत रिहिसे.
    पुरखा मनके सुरता करत-करत सुशील यदु घलो 23 सितम्बर 2017 के रतिहा करीब 9.30 बजे सुरता के संसार म समागे. आज उंकर बिदागरी तिथि म उंकरेच ए गीत संग उंकर सुरता-जोहार-

मोर दियना के बाती बरत रहिबे ना
चारों खूंट ला अंजोरी करत रहिबे ना...
पीरा हीरा के बाती बनायेंव
मया के आंसू के तेल भरायेंव
तन के पछीना के लेयेंव अचमन
मन अउ काया के फूल चघायेंव
दुखिया के पीरा हरत रहिबे ना
मोर दियना के बाती बरत रहिबे ना...
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Saturday, 3 September 2022

दानेश्वर शर्मा पहला छत्तीसगढ़ी कवि रिकार्ड होवइया

3 फरवरी पुण्यतिथि म सुरता//
नामी ग्रामोफोन अउ कैसेट कंपनी म रिकार्ड होवइया पहला छत्तीसगढ़ी कवि दानेश्वर शर्मा
     हमन जब कभू छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच के माध्यम ले छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत के जागरण अउ गौरवशाली रूप के बात करथन त वोकर शुरुआत 'चंदैनी गोंदा' ले ही करथन. फेर चंदैनी गोंदा के जनम होय के पहिली घलो सन् 1965 म ही दानेश्वर शर्मा जी के रचना मन के रिकार्डिंग देश के नामी ग्रामोफोन कंपनी 'हिज़ मास्टर्स वायस' ले मंजुला दासगुप्ता जी के आवाज म रिकार्ड होके आगे रिहिसे, अउ वोमा रिकार्ड होए चारों गीत- 1. कइसे के बेटी मैं तोला वो भेजंव.. 2. चल मोर जॅंवारा मड़ई देखे जाबो.. 3. मइके ल देखे होगे साल गा, भइया तुमन निच्चट बिसार देव.. 4. तपत कुरु भई तपत कुरु, बोल रे मिट्ठू तपत कुरु.  ग्रामोफोन के संगे-संग आकाशवाणी के माध्यम ले चारों धूम मचावत रिहिसे.
    दानेश्वर शर्मा जी के जनम दुरुग जिला के गाँव मेड़ेसरा म सियान गंगा प्रसाद जी द्विवेदी अउ महतारी इंदिरा देवी जी के घर सन् 1931 के सितम्बर महीना म अनंत चौदस के दिन होए रिहिसे. फेर स्कूल म भर्ती करवाए खातिर उंकर जनमदिन तिथि ल 10 माई 1931 लिखवा दिए गइस, जेहा आज सरकारी रिकार्ड म चारों मुड़ा चलत हे.
    दानेश्वर शर्मा जी जतका सुग्घर रचनाकार रिहिन हें, वतकेच सुग्घर वक्ता अउ कवि मंच के संचालक घलो रिहिन हें. मोर सौभाग्य आय, सन् 1988 के दिसम्बर महीना म रायपुर के रामदयाल तिवारी स्कूल म होय छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य प्रचार समिति के प्रदेश स्तरीय सम्मेलन म उंकर संचालन म होय कवि सम्मेलन म मोला पहिली बेर कविता पाठ करे के अवसर मिले रिहिसे. बाद म तो कतकों मंच अउ कार्यक्रम म संघरे के अवसर मिलत राहय. दानेश्वर शर्मा जी जब 'छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग' के अध्यक्ष पद म बिराजिन तब विशेष रूप ले उंकर संगति मिलिस. उंकर कार्यकाल म छपे आयोग के वार्षिक स्मारिका म संपादक मंडल के सदस्य के रूप म काम करे के अवसर घलो मिलिस. शर्मा जी के ए अध्यक्षीय कार्यकाल ल एक सफल कार्यकाल के रूप म सदा दिन सुरता करे जाही.
    दानेश्वर शर्मा जी के रचना मनला इहाँ के कतकों गायक गायिका मन अपन स्वर देके इहाँ के संगीत जगत म जिहां अपन अलगे चिन्हारी बनाइन, उहें उंकर रचना मन देश के नामी पत्र-पत्रिका- अखण्ड ज्योति, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नागपुर टाइम्स (अंगरेजी) ले लेके स्थानीय कतकों पत्रिका मन म छपे के संगे-संग आकाशवाणी के नागपुर, रायपुर, भोपाल, इंदौर, रीवां, छतरपुर अउ इलाहाबाद आदि केन्द्र ले प्रसारित होवत राहय. वोमन हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के संगे-संग अंगरेजी अउ संस्कृत म घलो लिखॅंय. दैनिक भास्कर अउ नवभारत म 'लोक दर्शन' के नाम ले कालम घलो लिखिन.
    उंकर छपे किताब मनके सूची घलो बड़का हे- छत्तीसगढ़ के लोक गीत (सन् 1962), हर मौसम में छंद लिखूंगा (हिन्दी गीत संग्रह 1993), लव कुश (खण्ड काव्य 2001), लोक-दर्शन (सनातन, इस्लाम, जैन, बौद्ध, मसीही, सिख आदि दर्शन व पर्व मन ऊपर निबंध संग्रह 2003), तपत कुरु भई तपत कुरु (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह 2006), गीत अगीत (हिन्दी काव्य संग्रह 2007) आदि हे.
    देश के कतकों काव्य संग्रह मन के संगे-संग रविशंकर विश्वविद्यालय के एम. ए. (हिन्दी) के लोक साहित्य विषय खातिर घलो उंकर रचना संग्रहित रहिस.
    दानेश्वर शर्मा जी के चर्चा शिकागो विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'रिवोलुशनिज्म इन छत्तीसगढ़ी पोएट्री' म प्रोफेसर डाॅ. नरेंद्र देव वर्मा द्वारा लिखे लेख के माध्यम ले घलो होए हे. वोमन विश्व प्रसिद्ध संस्था 'फोर्ड फाउंडेशन' द्वारा भारत म विकास खातिर सरकारी अउ गैर सरकारी संगठन मनके 11 पुस्तक मनके संपादकीय सलाहकार रहे हें.
    भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा हर बछर होवइया 'लोककला महोत्सव' के वोमन संस्थापक-संयोजक रहे हें, जिहां ले पंथी नर्तक देवदास बंजारे, पंडवानी गायिका पद्मभूषण तीजन बाई, रितु वर्मा जइसन अंतर्राष्ट्रीय कलाकार मन छत्तीसगढ़ी के डंका बजाइन. हमर मनके सौभाग्य आय, हमू मनला वरिष्ठ साहित्यकार टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जी के नाटक 'गंवइहा' ल ए प्रतिष्ठित मंच म प्रस्तुत करे के अवसर मिले रिहिसे.
    जिनगी के संझौती बेरा म दानेश्वर शर्मा जी श्रीमद भागवत महापुराण अउ देवी पुराण के बढ़िया प्रवचनकार के रूप म घलो जाने जावत रिहिन हें. उनला 2006 म राष्टपति द्वारा साहित्य सम्मान के संगे-संग अउ कतकों संस्था मनके डहार ले सम्मान मिले रिहिसे.
    3 फरवरी 2022 के रतिहा 8.10 बजे 91 बछर के उमर म दानेश्वर शर्मा जी ए नश्वर दुनिया ले बिरादरी लेके परमधाम के रद्दा धर लेइन. आज बिरादरी तिथि म उंकर सुरता ल पैलगी जोहार करत उंकर एक रचना-

डोंगरी सहीं अंटियावव तुम, नंदिया जस लहराव
ये जिनगी ल जीए खातिर, फूल सहीं मुस्कावव

निरमल झरना झरथय झरझर  परवत अउ बन मा
रिगबिग बोथय गोंदाबारी कातिक अघ्घन मा
दियना सहीं बरव झमाझम, कुवाॅं सहीं गहिरावव
ये जिनगी ल जीए खातिर फूल सहीं मुस्कावव

तन के धरम हे मन भर करना बूता पर हित मा
हिरदे ला जलरंग करव तुम मया के अमरित मा
बिजली सहीं चमकव चमचम बादर जस घहरावव
ये जिनगी ल जीए खातिर फूल सहीं मुस्कावव

काॅंटा खूॅंटी तो रद्दा मा दस ठन आही गा
लेकिन रेंगत पाॅंव के छइहाॅं धर नइ पाहीं गा
बघवा सहीं रुतबा राखव, हिरना जस मेछरावव
ये जिनगी ल जीए खातिर फूल सहीं मुस्कावव

-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Thursday, 25 August 2022

तीजा उपास अउ करू भात

तीजा उपास अउ करू भात
    हमर इहाँ के तीजहारिन मन तीजा उपास के बिहान भर घरों घर किंजर किंजर के बासी खाये ले जादा, उपास के पहिली दिन करू भात खाये म जादा रुचि लेथें. वइसे तीजा उपास संग करू भात खाये के कोनो आध्यात्मिक कारण तो नइहे, फेर एकर आयुर्वेदिक महत्व जरूर हे.
    जानकर मनके कहना हे- करू भात के रूप म खाये जाने वाला करेला के साग म कतकों किसम के आयुर्वेदिक गुण होथे, जेकर ले उपसनिन मनला, जेन कटकर ले 24 घंटा के निरजला उपास रहिथें, वोमा जादा पियास नइ जनाए के संगे-संग अउ कतकों किसम के लाभ होथे. शायद इही सबला चेत करके हमर पुरखा मन उपास के पहिली करू भात के रूप म करेला खाये के नेंग बनाए होही.
    वैज्ञानिक मनके कहना हे- करेला म विटामिन A, B अउ C पाए जाथे. एकर छोड़े कैरोटीन, बीटाकैरोटीन, लूटीन, आयरन, जिंक, पोटैशियम, मैग्नीशियम अउ मैगजीन आदि घलो पाए जाथे. जेकर सेती उपास रहे के सेती होइवया जलन या गरमी ले बचाथे. पित्त, कफ रुधिर विकार ले बचाथे. पाण्डुरोग, प्रमेह अउ कृमि के नास घलो करथे.
    आजकल बजार म बड़े बड़े हाइब्रिड करेला जादा देखे म आथे, फेर जानकर मनके कहना हे- अइसन बड़का बड़का करेला के बदला छोटे छोटे करेला, जेला हमन अपन घर बारी म मिलने वाला देशी किसम घलो कहि देथन, वोकर उपयोग करना चाही. ए छोटे करेला मन म पौष्टिक तत्व बड़े करेला के अपेक्षा जादा होथे. वइसे करेला के बजार भाव अभी ले तमतमाये बर धर लिए हे. तभे तो कतकों झन अभी ले फ्रीज आदि म सकेले बर धर लिए हें.
-सुशील भोले-9826992811

Tuesday, 23 August 2022

पेउस म सौ गुना जादा होथे पोषक तत्व

सामान्य दूध ले सौ गुना जादा फायदा करथे 'पेउस'
    जेकर मन के घर म गाय-गोरू पोंसे जाथे, वोमन उंकर लइका जनमे के तुरंत बाद निकलने वाला पिंयर गाढ़ा दूध ल बने चुरो जमा के 'पेउस' जरूर खाए होहीं. अपन हितु-पिरितु मन घर अमराए अउ खवाए घलो होही.
    गाय या भइंस के जनमे के बाद के पहला अउ दूसरा दिन के दूध म पोषक तत्व के मात्रा विशेष रूप ले जादा होथे. चिकित्सा वैज्ञानिक मन के कहना हे- सामान्य दिन के दूध म जतका मात्रा म पोषक तत्व होथे, वोकर ले लगभग सौ गुना तक जादा पोषक तत्व ए बखत होथे. वइसे तो एमा एक सप्ताह तक पोषक तत्व के मात्रा म बढ़ोतरी पाए जाथे, फेर वोमा धीरे धीरे कमी आए लगथे. शुरू शुरू के दूध ह तो बने जमथे घलो, वोकर बाद के ह खुजरी असन होए लागथे. खुजरी माने जइसे फटे दूध ह दिखथे, तइसे बरोबर हो जाथे. तभो एमा मिठास अउ पोषक तत्व रहिथेच. जबकि फटे दूध तो अमसुर बानी के जनाथे.
    चिकित्सा वैज्ञानिक मन के कहना हे- पहला अउ दूसरा दिन के दूध म कुछ विशेष किसम के एंटीबॉडीज होथे, जेहा गाय के थन ले निकलथे. जेकर सेवन ले शरीर ल कई किसम के फ्लू अउ इंफेक्शन ले  बचाए जा सकथे. संग म वो ह शरीर के मांसपेशी ल मजबूत करथे अउ वजन घलो ल घटाथे.
    शायद लइका जनमे के बाद के महतारी मन के दूध म अइसने अद्भुत विशेषता होए के सेती हमरो महतारी मनला अपन लइका मनला तुरंत स्तनपान कराए के सलाह डॉक्टर मन देथें.
    गाय-गोरू के दूध के पेउस जमाए के बारे म जानकर मन के कहना हे- एमा मिठास बढ़ाए बर शक्कर के बदला गुड़ के उपयोग करना आयुर्वेदिक दृष्टि ले जादा लाभकारी होथे.
    गाँव म राहन त अबड़ पेउस खाए बर मिलय. दूध के दुहना ल करो के करौनी घलो गजब खाए हावन, फेर अब शहर म ए सब सपना बरोबर जनाथे. वइसे कभू-कभार इहों दर्शन हो जाथे, फेर वो ह अंगरी म गिनउ कस हे.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Wednesday, 17 August 2022

एक ले जादा परब म होवथे भरम

एक ले जादा परब अउ संदर्भ के सेती होवत हे भरम...
    आज इंटरनेट के माध्यम ले सोशलमीडिया के चलन संग कतकों अइसन परब अउ उंकर मनले जुड़े संदर्भ मन के आने-आने जुड़ाव देखे बर मिलत हे. एकेच दिन म दू अलग अलग परब के जुड़ना ह सिरिफ संयोग के बात आय, फेर हमर मन के अज्ञानता अउ दूसर मनके देखे बताए संदर्भ ह लोगन म भरम के बीजा बोवत हे. एकर सेती लोगन आपस म ही बहसबाजी अउ तर्क वितर्क करे बर धर लिए हें.
    आवव छत्तीसगढ़ ले जुड़े कुछ अइसने परब मन के मूल स्वरूप अउ आज लोगन ल देखाए जावत आने स्वरूप ल थोरिक टमड़ के देखथन.
    अभी हमन कमरछठ परब मनाए हावन. एला आजकल हलषष्ठी के रूप म बताए जावत हे. आज ले दस पंदरा साल पहिली तक हमन ए हलषष्ठी नाम ल सुने तक नइ रेहेन. छत्तीसगढ़ पुरखौती बेरा ले कमरछठ ही मनावत अउ सुनत आए हे. कमरछठ जेन संस्कृत भाषा के 'कुमार षष्ठ' के अपभ्रंश ले बने शब्द आय. ए ह कुमार अर्थात कार्तिकेय आय. पूरा देवमंडल म कार्तिकेय ल ही कुमार कहे जाथे. एकरे सेती आज के दिन महतारी मन उंकर माता पिता के सगरी बनाके पूजा करथें. तेमा उंकरो लइका मन कार्तिकेय जइसे श्रेष्ठ, योग्य अउ दीर्घायु हो सकय. फेर सोशलमीडिया के संगे-संग अउ आने मीडिया मन के माध्यम ले अन्य प्रदेश ले अवइया ग्रंथ अउ लोगन के बताए बात के सेती एला बलराम जयंती के रूप म प्रचारित करे जाय लगे हे. एक बात तो आप मन स्पष्ट जान लेवव, इहाँ के मूल निवासी समाज ह आदिकाल ले जेन परब ल जीयत आए हे, वो ह बलराम ऊपर आधारित तो बिल्कुल नइ हो सकय.
    अभी अवइया महीना म 'दशहरा' अवइया हे. इहू म अइसने झिंकातानी असन बात हो सकथे. काबर ते 'दंसहरा' ल विजयादशमी के रूप म ही प्रचारित करे जाथे. असल म दशहरा अउ विजयादशमी दू अलग अलग पर्व आय, जेन हमर मनके अज्ञानता के सेती गड्डमड्ड होके एक होगे हे. विजयादशमी ल सबो जानथें. भगवान राम द्वारा आततायी रावण ऊपर विजय प्राप्त करे के परब आय. फेर दशहरा ह असल म 'दंसहरा'आय. दंस अर्थात विष अउ हरा अर्थात हरण के परब. मतलब ए ह विषहरण के परब आय. उही विषहरण जेला शिव जी ह समुद्र मंथन ले निकले विष के करे रिहिसे. एकरे सेती उनला 'नीलकंठ' घलो कहे जाथे. काबर ते उन वो विष ल अपन कंठ माने टोटा म रख लिए रिहिन हें, जेकर सेती उंकर टोटा नीला अर्थात नीलकंठ होगे रिहिसे. दंसहरा के दिन नीलकंठ पक्षी ल देखना शुभ माने जाथे. काबर ते वोला ए दिन शिव जी के प्रतीक माने जाथे. फेर हम ए दू अलग अलग परब ल एकमई कर डारे हावन.
    हमर इहाँ एकर पाछू एक अउ परब आथे, जेला हम सब 'छेरछेरा' के नाम ले जानथन. एकरो संदर्भ म लोगन के अलग अलग मान्यता हे. इहाँ के मैदानी भाग म एला खरीफ फसल के मिंजाई कुटाई के पाछू उत्सव के रूप म दान दे के परब के रूप म मनाए जाथे. जबकि इही ल इहाँ के सब्जी उत्पादक मरार समाज के मन शाकंभरी जयंती के रूप म मनाथें. इहाँ के मूल निवासी समाज एला गोटुल/घोटुल के शिक्षा म पारंगत होए के पाछू तीन दिन के परब के रूप म मनाथें. मोला जेन ज्ञान मिले रिहिसे, तेकर अनुसार ए ह भगवान शंकर द्वारा बिहाव के पहिली पार्वती के परीक्षा ले खातिर नट के रूप म नाचत गावत जाके भिक्षा मांगे के प्रतीक स्वरूप मनाए जाथे. एकरे सेती ए दिन लोगन बने सज-सम्हर के नाचत गावत कुहकी पारत भिक्षा मांगे बर जावंय. अब अइसन नजारा देखई ह नहीं के बरोबर होगे हे. फेर हमन जब गाँव म राहन त छेरछेरा म हमर गाँव के कलाकार टोली वाले मनला ए दिन पूरा रौ म देखन.
    हमर इहाँ एक होली के परब घलो मनाए जाथे, जेला होलिका दहन के रूप म प्रचारित करे जाथे. ए ह छत्तीसगढ़ के संदर्भ म पूर्ण सत्य नोहय. हमर छत्तीसगढ़ म जेन परब मनाए जाथे वो ह असल म 'कामदहन' के परब आय. एकर ले संबंधित कथा सुने होहू- ताड़कासुर नाम के एक असुर ह शिव पुत्र के हाथ ही मरे के वरदान पाके भारी अतलंगी करत रहिथे. काबर ते शिव जी तो सती के आत्मदाह के बाद घोर तपस्या म लीन हो जाए रहिथे. अइसे म कहाँ ले शिव पुत्र आही अउ कोन वोला मारही? गुन के भारी अतलंगी मचावत रहिथे.
    एकरे समाधान के सेती देवता मन कामदेव जगा अरजी करथें के कइसनों कर के शिव तपस्या ल भंग कर तेमा वोहा तपस्या ले उठय, पार्वती संग बिहाव करय, तब शिव पुत्र के आगमन होवय, जेहा ताड़कासुर के अतलंगी ले मुक्ति देवावय.
    देवता मनके अरजी विनती करे ले कामदेव ह अपन सुवारी रति संग बसंत के मादकता भरे मौसम म जाके शिव तपस्या भंग करे के उदिम करथे. वोमन वासनात्मक गीत-नृत्य के प्रदर्शन करथें, तेमा शिव के मन म घलो काम के जागरण हो सकय. फेर इहाँ उल्टा हो जाथे. शिव जी अपन तीसरा नेत्र ल खोल के कामदेव ल ही भसम कर देथे.
    हमर छत्तीसगढ़ म जेन होली के परब मनाए जाथे, वोहा कुल चालीस दिन, बसंत पंचमी ले लेके फागुन पुन्नी तक मनाए जाथे. बसंत पंचमी के दिन हमर इहाँ जेन होले डांड़ म अंडा पेंड़ गड़ियाये जाथे, वो ह असल म कामदेव के आगमन के प्रतीक स्वरूप ही होथे. वोकर साथ ही इहाँ रोज होले डांड़ म नाचे गाये के सिलसिला चालू हो जाथे. इहाँ ए बात ध्यान राखे के लाइक हे, ए होले गीत नृत्य म वासनात्मक शब्द अउ दृश्य मन के गजब चलन होथे. काबर ते कामदेव अउ रति शिव तपस्या भंग करे बर अइसन उदिम करे रहिथें.
    आपे मन गुनव- कहूँ ए परब ह सिरिफ होलिका दहन के सेती होतीस, त चालीस दिन के काबर मनाए जातीस? होलिका तो एके दिन म चीता रचवाईस, वोमा आगी ढिलवाइस अउ खुदे जल के भसम होगे. वोकर बर चालीस दिन के परब काबर? वासनात्मक गीत-नृत्य अउ शब्द ले होलिका के का संबंध? 
    संगी हो, हमर इहाँ के पूरा के पूरा परब तिहार अउ वोकर मनले जुड़े संदर्भ के नवा सिरा ले समीक्षा करे के जरूरत हे, तभे हमर मूल पहचान बांचे पाही. कहूँ आने आने क्षेत्र ले अवइया लोगन के संगत म उंकर बताए अउ देखाए रद्दा म अंखमुंदा रेंगबो त इहाँ के अस्मिता अउ सांस्कृतिक अस्तित्व के जउंहर हो जाही. अपन स्वतंत्र सांस्कृतिक चिन्हारी खातिर हमला अपन अस्मिता के पारंपरिक रूप के अनुसार लेखन, पढ़न करे बर लागही. नवा पीढ़ी ल आरूग रूप सौंपे बर लागही.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Monday, 8 August 2022

लोक परंपरा 'नंगमत'

लोक परंपरा के मोहक रूप 'नंगमत'
    हमर छत्तीसगढ़ म सांस्कृतिक विविधता के अद्भुत दर्शन होथे. इहाँ कतकों अइसन परब अउ परंपरा हे, जेला कोनो अंचल विशेष म ही बहुतायत ले देखे बर मिलथे. हमर इहाँ एक 'नरबोद' परब मनाए जाथे, एला जादा कर के वन्यांचल क्षेत्र म ही जादा कर के देखे जाथे. ठउका अइसने 'नंगमत' के परंपरा घलो हे, जेला क्षेत्र विशेष म ही बहुतायत ले देखे जाथे.
    'नंगमत' के आयोजन ल जादा करके नागपंचमी के दिन ही करे जाथे. वइसे कोनो-कोनो गाँव म एकर आयोजन ल हरेली के दिन घलो कर लिए जाथे. जानकर मन के कहना हे, बरसात के दिन म सांप-डेड़ू जइसन जहरीला जीव-जंतु खेत-खार आदि म जादा कर के निकलथे, अउ ठउका इही बेरा खेती किसानी के बुता घलो भारी माते रहिथे, अइसन म लोगन ल खेत-खार जाएच बर लागथेच एकरे सेती उंकर मनके प्रकोप ले बांचे खातिर एक प्रकार के पूजा-बंदना करे जाथे. उंकर मनके जस गीत गा के सुमिरन करे जाथे.
    ग्रामीण संस्कृति म बइगा कहे जाने वाला मंत्र साधक के अगुवाई म नंगमत के आयोजन होथे. एमा बइगा ह अपन अउ मंत्र साधक चेला मन संग मिलके नंगमत के जोखा मढ़ाथे. बताए जाथे, जे बइगा ह सांप चाबे के जहर ल उतारे म सक्षम होथे, तेनेच ह ए आयोजन के अगुवाई करथे, अउ ए आयोजन म जेन चेला के सबो चेला मन म श्रेष्ठ प्रदर्शन करथे, वोला ए सांप के जहर उतारे वाले बुता म या कहन बइगई करे के अनुमति देथे. बाकी चेला मनला घलो अनुमति होथे, फेर वो मनला सिरिफ छोटे-मोटे फूक-झाड़ के ही.
    इहाँ ए बात जाने के लाइक हे, हमर छत्तीसगढ़ म हरेली परब के दिन अपन-अपन मांत्रिक शक्ति के पुनर्जागरण या पुनर्पाठ करे के परंपरा हे. इही दिन गुरु-शिष्य बनाए के परंपरा हे, जेला इहाँ पाठ-पिढ़वा देना या लेना कहे जाथे. ठउका अइसने च नंगमत के आयोजन ले जुड़े परंपरा घलो हे.
    वइसे नंगमत के आयोजन ल सांप मनके पूजा-सुमरनी अउ  पुराना पीढ़ी द्वारा नवा पीढ़ी ल अपन परंपरा के पोषण अउ आगू ले जाए के जिम्मेदारी खातिर प्रेरित करे के उद्देश्य खातिर घलो करे जाथे. कतकों लोगन खातिर ए ह सिरिफ मनोरंजन के माध्यम होथे, तेकर सेती वो मन सावन महीना के लगते एकर आयोजन के जोखा म लग जाथें. एकर मनोरंजक रूप के आनंद ले खातिर आस-पास के गांव वाले मन घलो गंज संख्या म सकलाथें.
    नंगमत के शुरुआत गाँव के ठाकुर देव, मेड़ो देव अउ आने जम्मो ग्राम्य देवता मन के संगे-संग अपन-अपन ईष्ट देवता मनके पूजा-सुमरनी के साथ होथे. जइसे गौरा-ईसरदेव परब म कोनो विशेष जगा ले पवित्र माटी लान के चौंरा बनाए जाथे, ठउका अइसने च एकरो खातिर नाग मनके रेहे के ठउर जेला भिंभोरा या बांबी आदि कहे जाथे, उहाँ ले माटी लान के एकरो खातिर एक चौंरा बनाए जाथे, जेमा पूजा-अर्चना करे जाथे. जस गीत गाने वाला सेउक मन नाग देवता के मांदर-ढोलक,   झांझ-मंजीरा संग जस गान करथें.-

गुरुसर गुरुसर गुर नीर गुरु साहेर शंकर
गुरु लक्ष्मी गुरु तंत्र मंत्र गुरु लखे निरंजन
गुरु बिना हुम ला हो काला रचे हो नागिन

गुरु के आवत जनि सुन पातेंव
चौकी चंदन पिढ़ुली मढ़ातेंव
लहुर छोड़ के अंगना बहारतेंव
रूंड काट मुंड बइठक देतेंव
जिभिया कलप के हो....

    इही बीच बइगा ह अपन मंत्र शक्ति के प्रयोग ले इच्छित लोगन के ऊपर नाग या अन्य सांप मनके आव्हान करथे, जेकर ले उनमा उंकर आगमन होथे, तहाँ ले जेन सांप उंकर ऊपर आए रहिथे, वोकरे अनुसार वोमन झूमथें-नाचथें, अंटियाथें-फुफकारथें, भुइयां म घोनडइया मारथें. इही बेरा ह देखइया मन बर मोहनी हो जाथे. एक निश्चित बेरा के बाद वोकर मन के शरीर ले वो सांप ल उतारे के परंपरा ल पूरा करे जाथे.
    आखिर म वो जगा सकलाय लोगन ल परसाद बांटे जाथे. ए परसाद म नांगजरी के विशेष महत्व होथे. उहू ल लोगन ल अउ आने परसाद संग संघार के दिए जाथे. एला कोनो भी बिखहर सांप के जहर उतारे बर रामबाण माने जाथे. ए नांगजरी ल बइगा ह विशेष पूजा-पाठ कर के लाने रहिथे. हमन ल बताए जाय, रिंगनी पेंड़ के जड़ ल कोनो निश्चित दिन म निमंत्रण देके, रतिहा म पूजा-पाठ कर के लाने जाथे. नंगमत के परंपरा ल पूरा करे के बाद जेन चेला ल विशिष्ट रूप ले मंत्र दीक्षा दिए जाथे, वोला कहूँ जगा ले भी सांप चाबे के जानकारी मिलथे, उहाँ जाना जरूरी होथे.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811