सुरता//
मोला घुनासी लागत हे..
आज जिनगी के संझौती बेरा म जब नींद ह छपक के धरे म घलो बुलक देथे, चोबिसों घंटा अलथी-कलथी मारे म लट्टे-पट्टे तीन चार घड़ी के पुरती अमा पाथे, त लइकई के वो दिन के सुरता गजब आथे जब कापी-किताब ल आगू म मढ़ाते नींद ह झुमराय लगय अउ पढ़ई-लिखई ल छोड़ के तनिया के सूत जावन.
हमर महतारी बतावय, लइकई म रतिहा बेरा बियारी कर के जब सबो भाई-बहिनी पढ़े बर बइठन त मोला गजब उंघासी आवय. कापी-किताब आगू माढ़े राहय अउ मैं नींद म झुमरत राहंव, अउ जब कोनो मोला हुदर के पढ़े बर काहय त मैं 'मोला घुनासी लागत हे, अब सूतहूं' कहिके उहिच जगा ढलगे ले धर लेवौं. तब हमर सियान मोला गारी देवत काहय- 'जहाँ पढ़े ले बइठिस तहाँ एकर झुमरई चालू' काहत खिसिया जावय अउ फेर मोला सूते खातिर छुट्टी मिल जावय.
अइसन घटना मोर जिनगी म कक्षा तीन के पढ़त ले घटय. जब मैं 'उंघासी' शब्द के उच्चारण ल 'घुनासी' लागत हे काहत राहंव. तब तक हमन भाठापारा शहर म राहत रेहेन. चौथी कक्षा ले मोर पढ़ई हमर पैतृक गाँव नगरगाँव म होइस, अउ हमर सियान अपन स्थानांतरण करवा के भाठापारा ले रायपुर आगे रिहिन, वोकर बाद तो अइसन दृश्य कभू नइ बनिस.
आज जिनगी के छठवाँ दशक म पाॅंव रखत वो दिन के सुरता गजब आथे, जब नींद ह हमन ल संगवारी बरोबर पोटारे राहय. उठत-बइठत पढ़त-लिखत मितानी के झुलना झुलावत राहय. तब खटिया देखे के जरूरत परय न बिछौना के. जेन जगा बइठे राहन उहिच जगा ढलंग जावन.
आज जिनगी के संझौती बेरा म जब खटिया च ह जिनगी के संगवारी बन गे हावय त नींद ह बैर भाॅंजत रहिथे. लकवा के अभेरा म परे के बाद तो चोबिसों घंटा अलथी-कलथी करत रहिथौं तभो लजकुरहिन नोनी कस नींद ह एती-वोती छॅंडलत-बुलत रहिथे.
अइसन बेरा म वो लइकई के सुरता गजब आथे, मन होथे, फेर मैं 'मोला घुनासी लागत हे' काहत निसफिक्कर होके चार घड़ी सूत लेतेंव.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Thursday, 13 July 2023
मोला घुनासी लागत हे..
Tuesday, 4 July 2023
चातुर्मास म देव बिहाव..
चातुर्मास म देव-बिहाव
हमर देश के सांस्कृतिक पटल म विविधता के गजब अकन रूप देखे ले मिलथे. जेन ह एक-दूसर के विपरीत घलो जनाथे.
अभी हमर छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक स्वरूप ल ही देख लेवौ, एक डहार जिहां कतकों साधू बैरागी मन चातुर्मास के नियम म बंधाय एक जगा बइठ के जप-तप अउ ज्ञान चर्चा म दिन पहावत हें, त दूसर डहार इहाँ के पारंपरिक संस्कृति ल जीने वाला मन अपन-अपन देवता के बर-बिहाव के जोखा मढ़ावत हें
सुने म अलकर जना सकथे के चातुर्मास के जेन चार महीना म बर-बिहाव जइसन बुता ल अशुभ अउ प्रतिबंधित बताए जाथे, उहिच प्रतिबंधित महीना म छत्तीसगढ़ म देवी-देवता मन के बिहाव के परब मनाए जाथे.
ए ह सांस्कृतिक विविधता के गजबे सुग्घर रूप आय, जे ह ए बात के घलो आरो कराथे, के छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति म चातुर्मास जइसन व्यवस्था लागू नइ होवय.
अभी बरसात के मौसम म बस्तर अंचल म बरखा के देवी देवता के रूप म चिन्हारी करइया भीमा अउ भीमिन के बिहाव के उत्सव या जगार मनाए जावत हें, त हमर एती चातर राज म कातिक अंधियारी पाख के अगोरा होवत हे, जब गौरा-ईसरदेव के बिहाव के परब ल गौरी-गौरा पूजा के रूप म मनाए जाही.
बस्तर म भीमा भीमिन ल साल पेंड़ के लकड़ी के बनाए जाथे अउ स्थायी रूप ले स्थापित करे जाथे, जबकि एती चातर राज म गौरा-ईसरदेव ल हर बछर माटी के बनाए जाथे अउ बिहाव परब कातिक अमावस के बिहान भर कोनो तरिया नंदिया म विसर्जित कर दिए जाथे.
जेन बछर पानी के गिरई थोकिन कमती असन जनाथे ते बछर तो गाँव गाँव म भीमा भीमिन के पूजा अउ बिहाव परब मनाए जाथे. वइसे भीमा भीमिन के पूजा तो लोगन हमेशा करत रहिथें, काबर ते इनला बरखा के देवता के संगे-संग गाँव के कुल देवता घलो माने जाथे, एकरे सेती इनला सुख समृद्धि के देवता के रूप म घलो माने-गौन करे जाथे.
गौरा-ईसरदेव के बिहाव परब ह कातिक अंधियारी पाख के पंचमी तिथि ले फूल कुचरे के नेंग संग चालू होथे. कोनो कोनो गाँव म फूल कुचरे के नेंग ल एकादशी के दिन करे जाथे.
पंचमी के फूल कुचरे के नेंग करे के संग इहाँ सुवा नाच के परंपरा घलो चालू हो जाथे. नोनी मन बिहनिया बेरा कातिक नहाए ले जाथें अउ संझा बेरा सुवा नाचे ले जाथें.
मैं हमेशा ए बात ल गोहरावत रहिथौं के छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक चिन्हारी ल इहाँ के मूल संस्कृति के मापदंड म लिखे अउ बताए जाना चाही, आने अंचल ले लाने गे संस्कृति अउ ग्रंथ मन के मापदंड म नहीं, तेन ह अइसने विरोधाभासी प्रसंग मनला देख के ही आय.
इहाँ कतकों अइसन परब तिहार हे जे मन आज बताए जावत प्रसंग मन ले अलगे रहिथे, हमला इही मनला जांच-टमड़ के छत्तीसगढ़ के वास्तविक रूप के चिन्हारी दुनिया के आगू म करवाना हे.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Monday, 3 July 2023
काव्य लेखन अउ खुमान साव
छत्तीसगढ़ी पद्य लेखन अउ खुमान साव....
दुनिया म जतका भाखा हे, सबो के लेखन अउ उच्चारण म कोनो न कोनो किसम के मौलिकता जरूर हे, एकरे सेती वोकर सबले हट के अलग अउ स्वतंत्र पहचान बनथे।
हमर छत्तीसगढ़ी के पद्य लेखन म घलो एक अलग अउ स्वतंत्र चिन्हारी हे, एकर लेखन स्वर अउ ताल के माध्यम ले लिखे के हे। छत्तीसगढ़ी पद्य ल स्वर अउ ताल बद्ध लिखे जाथे। महान संगीतकार स्व. खुमान लाल साव जी एकर संबंध म एक बहुत बढ़िया उदाहरण देवंय। उन बतावंय के "चंदैनी गोंदा " के रिकार्डिंग खातिर जब वोमन मुंबई गे राहंय, त एक करमा गीत - 'दिया के बाती ह वो कइसे सच बात ल कहिथे जरे के बेरा' म ताल पांच मात्रा के बाजय।
उन बतावंय के दुनिया म अउ कहूं पांच मात्रा के विषम ताल नइ होवय। सब म दू अउ चार मात्रा के सम ताल होथे।
उन बतावंय, बंबई के जतका संगीतकार उहाँ बइठे राहंय, सब माथा धर लिए राहंय, वोमन म के एको संगीतकार बहुत कोशिश करे के बावजूद वो पांच मात्रा के ताल ल बजा नइ पाइन।
आज छत्तीसगढ़ी म घलो अपन मौलिक चिन्हारी ल छोड़ के दूसर भाषा मन के परंपरा ल लिखे अउ लादे के रिवाज चल गे हवय। दूसर भाषा के लेखन शैली ल थोर बहुत अपनाना तो स्वागत योग्य बात आय। फेर आरुग दूसर भाषा के लेखन शैली ल ही हमर मूड़ में खपल देना ल स्वीकार नइ करे जा सकय।
आजकाल कविता के नॉव म हिन्दी, उर्दू अउ आने-आने भाखा मन के काव्य लेखन के परंपरा के जइसन बढ़वार हमर इहाँ देखे ले मिलत हे, वो ह सोचे के बात आय।
कोनो भी भाषा के विकास अउ सम्मान वोकर खुद के लेखन रूप के बढ़वार हो सकथे, आने के परंपरा ल अपनाय अउ थोपे म नहीं।
खुमान साव जी जब मोर 'रिकार्डिंग स्टूडियो' रिहसे त उन जब कभू रायपुर आवयं, त मोर जगा बइठे खातिर जरूर आवयं, तहाँ ले मंझनिया भर हमर मन के कतकों विषय ऊपर गोठबात चलत राहय. उन काहंय- सुन न सुशील, जे मन हिन्दी काव्य परंपरा के मुताबिक लघु गुरु के मात्रा ल गनत रहिथें न, ते मन मोला एक नइ सुहावय.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो. 9826992811
Sunday, 18 June 2023
एकलव्य परंपरा.. दिनेश चौहान
24 जून जनमदिन//
एकलव्य परंपरा के साधक दिनेश चौहान
कतकों मनखे ल मैं देखे हौं बिना काकरो अंगरी धरे, अपने सुर म रेंगत रहिथें. जइसे एकलव्य ह सिरिफ अपन मन म ही गुरु के छापा बसा के धनुर्विद्या के जम्मो मरम ल जान अउ सीख गे. ठउका अइसने दिनेश चौहान घलो हे जे अपन लगन ल ही गुरु मान के लेखन के संगे-संग चित्रकला म घलो पारंगत होगे हवय.
दिनेश चौहान के असली नॉव हे दिनेश कुमार ताम्रकार फेर ए ह रचना संसार म अपन नॉव ल दिनेश चौहान ही लिखथे. वइसे उंकर महतारी ह मया कर के उनला 'राजेन' कहिथे.
भीमसेनी एकादशी परब 24 जून बछर 1961 के धमधा जिला दुर्ग म महतारी अगासबाई ताम्रकार अउ सियान रामकृष्ण ताम्रकार जी के घर जनमे दिनेश पेशा ले सरकारी गुरुजी हे. फेर बड़ा अचरज के बात ए आय के आज तक मैं एकर भीतर सरकारी गुरुजी वाले कोनो चिन्हा नइ देखेंव.
सुभाव ले आध्यात्मिक होय के सेती दिनेश जी संग मोर गजबे जमथे. साधना काल म जब कभू मोला राजिम त्रिवेणी संगम के कुलेश्वर महादेव के दर्शन के साध होवय, त दिनेश ल ही फोन करौं.
दिनेश जी तुरते तइयार हो जावय, हाँ आना भाइया आप के संग म मोरो देव दर्शन हो जाथे. नइते भले हम रहिथन नवापारा राजिम म फेर देवता मन के दर्शन पैलगी बर महीनों बीत जथे.
वइसे उमर म मोर ले एक हफ्ता के बड़े हे दिनेश चौहान ह फेर भइया संबोधन ल उही च ह करथे.
दिनेश चौहान जी एक उत्कृष्ट श्रेणी के पाठक आय, एकरे सेती वोमन हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी दूनोच भाखा म गुरतुर लिखथें. दिनेश जी जतका सुंदर लेखन करथें वतकेच सुंदर चित्रकला म घलो निपुण हें. मैं बेरा बेरा म उंकर जगा अपन प्रकाशन ले संबंधित चित्र बनवावत रहिथौं.
अपन नियम कायदा के पक्का होय के सेती दिनेश चौहान जी कतकों बेर सरकारी तंत्र संग जूझत घलो राहय. एक बेर मैं उनला पूछेंव त उन रचनात्मक जगत म अपन नॉव ल बदल के लिखे के कारण घलो इही आदत ल बताइस.
वोकर कहना रिहिस- सरकारी रिकॉर्ड म जेन नॉव हे तेने नॉव ले कहूँ मैं सोंटा मारे छाप लेखन करहूं तब तो गड़बड़ हो जाही, तेकर ले नौकरी के अलगे अउ तुतारी बाजी के अलगे नॉव.
छत्तीसगढ़ी भाखा खातिर गजब समर्पित अउ चेतलग हे दिनेश जी ह. उंकर कहना हे- 'जम्मो तरा के स्कूल मन म छत्तीसगढ़ी भाखा ल एक अलग अउ अनिवार्य विषय के रूप म पढ़ाए जाना चाही.'
दिनेश जी बेरा बखत म अपन लेखन मनला प्रकाशन के अंजोर घलो देखावत रहिथें. उंकर सबले पहिली किताब आए रिहिसे- 'कइसे होही छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया.
छत्तीसगढ़ी भाखा म वर्ग पहेली बनाय के उन सुग्घर उदिम करे रिहिन हें, एकरे ऊपर आधारित उंकर दूसरा किताब आए रिहिसे- चौखड़ी जनउला.
अपन ताम्रकार समाज के रचनाधर्मी मन के चिन्हारी खातिर उंकर तीसरा किताब आए रिहिसे- सृजन साक्षी.
छत्तीसगढ़ी भाखा खातिर फेसबुक म लगातार लिखत अपन पोस्ट मनला एकमई कर के चौथा किताब छपवाय रिहिन हें- छत्तीसगढ़ी बर तुतारी.
दिनेश जी के पांचवा किताब 'साॅंच कहे तो मारन धावै' शीर्षक ले आए रिहिसे, जेमा अभी हालेच म बुलके महामारी 'कोरोना' के दूसर पक्ष ल लेके लिखे गे लेख मन के संगे-संग कुछ निबंध अउ व्यंग्य मनला संघारे गे रिहिसे.
मोर साधना काल म अंगरी गिनउ संगवारी रिहिन हें, जेमा दिनेश जी घलो एक रिहिन हें. एकरे सेती जब कभू मोर राजिम क्षेत्र म जाना होवय, त सबले पहिली उनला सोर कर देवत रेहेंव. तहाँ फेर दूनों झन संघरा किंजरई फिरई करन.
आज अपन जिनगी के बैसठ बछर पूरा करत दिनेश चौहान जी ल बधाई देवत गजब निक जनावत हे. एकर एक बड़का कारण तो इहू हे, के ए ह सेवानिवृत्त हो जाही, तब नंगत के किंजरई फिरई करही, हो सकथे महूं ल संगवारी बना ले करही.
शुभकामना देवत मैं एक पइत फेर उनला गोहराहूं. मैं इहाँ के मूल संस्कृति खातिर ठोसलग बुता करे बर एक पइत चेताए रेहेंव, आज फेर सुरता देवावत हौं, उन अपन लेखन के विषय इहाँ के मूल संस्कृति अउ अस्मिता ल घलो बनावंय.
जनमदिन के गाड़ा-गाड़ा बधाई...
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Sunday, 28 May 2023
छत्तीसगढ़ी म बेरा के चिन्हारी.
*छत्तीसगढ़ी में दिन-रात समय सारिणी।*
1:- भिनसरहा- लगभग 4 बजे सुबह से 5 बजे तक।
2:-झुलझुलहा- सुबह 5 बजे से लगभग 5:30 बजे तक।
3:- पँगपंगहा- सुबह सूर्योदय की लालिमा तक।
4:- बिहनिया- सूर्योदय
5:- गरुवा ढिलाती- लगभग 7 से 8 बजे तक सुबह।
5:- मंझनिया- दोपहर 12 बजे से लगभग 2 बजे तक।
6:-बेरा ढरकत-2:30 से लगभग 4 बजे तक।
7:- संझा-4 बजे से 5:- 30 लगभग।
8:- बेरा बुड़ती- सूर्यास्त समय( यही समय लगभग आगी बारने का बेरा कहलाता है।
इसे मुंधियार भी कहते हैं)
9:-बियारी के बेरा- रात में खाने का समय।
10:- दु पेटिया बियारी- गर्भवती महिलाओं के खाने का समय जो प्रायः जल्दी होता था। घर के सियान के खा लेने के बाद गर्भवती महिलाओं को जल्दी खाने को कहा जाता है। चूंकि गर्भ में एक पेट(बच्चा) और
होता है इसलिए दु पेटिया कहा जाता है।
11:-अधरतिया- रात्रि 12 बजे से आगे।
12:- सुकवा पहाती- भिनसरहा से थोड़ा पहले ( शुक्र तारा इसे हिंदी में भोर का तारा भी कहते हैं। इसके बाद बेरा झुलझुलहा होने लगता है। ।
जोहार छत्तीसगढ़ -सुशील भोले
Tuesday, 23 May 2023
कोंदा-भैरा... के सौ दिन
'कोंदा-भैरा....' के सौ दिन..
एक बड़का राजनीतिक मनखे के दूमुंहिया चरित्तर ले उठे मन म गुस्सा के प्रदर्शन खातिर सोशलमीडिया म शुरू होय सरलगहा.. 'कोंदा-भैरा के गोठ' ल आज सौ दिन पुरगे.
पहिली मैं एला दू-चार डांड़ म ही लिखे के कोशिश करत रेहेंव, तेमा आम लोगन घलो डहर चलती एला पढ़ सकय, फेर कतकों अकन ह आठ-दस डांड़ के घलो बाढ़ जावय.
शुरू म तो ए गोठ-बात म लोगन के गजब प्रतिक्रिया आवत रिहिसे, फेर धीरे-धीरे कमतियाय लगिस, जे ह स्वभाविक घलो हे. रोजेच कोन ह लिखत रइही. तभो एक बात ह मोला एला सरलग लिखे बर प्रोत्साहित करत रहिथे, वो ए के लोगन भले टिप्पणी करे बर ढेरियाथें फेर एकर कतकों भाग ल अपन टाईमलाईन के संगे-संग अउ दूसर समूह मन म शेयर जरूर करत रहिथें.
एकर लोगन के पसंद करे के एक अउ बात इहू जनाइस के एक दू अउ लोगन एकरे असन गोठ-बात के शैली म कुछ कुछ लिखे लगिन, भले वोकर मन के लिखना ह सरलग नइ दिखत हे, फेर कोशिश तो करत हें, जे ह ए कोंदा-भैरा के सफलता के सूचक आय.
पहिली तो एला थोरिक व्यंग्य के शैली म लिखे के उदिम होवत रिहिसे, फेर बीच-बीच म अइसनो विषय आगू म आ जावय जेमा गंभीरता अउ गुनिक लिखई जरूरी असन हो जावय एकरे सेती ए जम्मो गोठ-बात मन म शैली के विविधता आवत गिस.
कतकों झन अब ए जम्मो गोठ-बात मनला सकेल अउ छांट-निमार के एक किताब के रूप दे के सुझाव दे बर धर लिए हें.
देखव ए सरलगहा गोठ-बात ह अउ कतका भाग तक चल पाथे ते, काबर ते एकर खातिर रोज नवा विषय के खोजई म मोर आने संदर्भ मन म लिखई-पढ़ई अउ गुनई ह थोरिक अरझे असन होगे हे.
-सुशील भोले-9826992811
Sunday, 23 April 2023
नगरगाँव के नामकरण..
नगर के आश्रित गाँव.. नगरगाँव...
नगरगाँव के नामकरण के संबंध म अइसे जनाथे, के ए गाँव ह जुन्ना बेरा म कोनो नगर या शहर रिहिस होही. बाद म कोनो कारण ले उजर गिस होही. तब फेर एकरे आसपास लोगन रहे बर लगिन होहीं, जेला वो नगर के आश्रित गाँव के रूप म नगरगाँव कहे गिस होही.
अभी ए गाँव जिहां बसे हे, एकर उत्तर-पूर्व दिशा म एक खंडहरनुमा डीह हे, जिहां के खुदाई ले कतकों पुरातात्विक महत्व के जिनिस मिले रिहिसे. डॉ. लक्ष्मीधर झा जी ह प्रसिद्ध इतिहासकार डाॅ. रमेन्द्रनाथ मिश्र जी के मार्गदर्शन म एकर ऊपर पीएचडी के अंतर्गत शोध कार्य करे हेंं. वोमन एला कोनो प्राचीन नगरी के रूप म ही उल्लेखित करे रिहिन हें.
वइसे मोर ए कहना ह सिरिफ अनुमान आय, प्रमाणित इतिहास नहीं.