इतवारी अखबार के भवानी प्रसाद मिश्र अंक का लोकार्पण 29 मार्च को छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ। न्यू सर्किट हाऊस, सिविल लाईन, रायपुर में संपन्न कार्यक्रम में भवानी प्रसाद मिश्र के सुपुत्र एवं गाधी मार्ग के संपादक अनुपम मिश्र, वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र मिश्र, कनक तिवारी, विनोद कुमार शुक्ल तथा इतवारी अखबार के सहायक संपादक सुशील भोले सहित देश एवं प्रदेश के वरिष्ठ विद्वतजन उपस्थित थे।
Saturday, 30 March 2013
कवि भवानी प्रसाद अंक का विमोचन
इतवारी अखबार के भवानी प्रसाद मिश्र अंक का लोकार्पण 29 मार्च को छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ। न्यू सर्किट हाऊस, सिविल लाईन, रायपुर में संपन्न कार्यक्रम में भवानी प्रसाद मिश्र के सुपुत्र एवं गाधी मार्ग के संपादक अनुपम मिश्र, वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र मिश्र, कनक तिवारी, विनोद कुमार शुक्ल तथा इतवारी अखबार के सहायक संपादक सुशील भोले सहित देश एवं प्रदेश के वरिष्ठ विद्वतजन उपस्थित थे।
Friday, 29 March 2013
बोरे-बासी के दिन आगे...
दही-मही संग बोरे-बासी के लगिन धरागे रे
गोंदली संग सुघ्घर झड़के के दिन आगे रे..........
सुरुज नरायन देखत हावय आँखी ल गुर्रा के
पवन बड़ोरा बनगे हावय वोकर संग धुर्रा के
हमर तो भंइसा म चढ़के तरिया तंउरे के दिन आगे रे........
ऐसन-फैसन का कहिबे उघरा-उघरा घुमथन
झंझकुर-झबड़ी के छइहाँ म मंझनी-मंझनिया खेलथन
बाँटी-भौंरा कभू त कभू छू-छुवाउल छुवागे रे.............
नंदिया खंड़ के लाल कलिंदर अड़बड़ जी ललचाथे
झिथरी बानी के केकड़ी टूरी ह टुहूं नंगत देखाथे
अइसे नखरा देखाथे, जइसे सजन आगे रे.........
पों-पों करत सइकिल चढ़के बरफ के गोला आथे
झिम-झाम कोलकी-संगसी म पइसा धरके बलाथे
हमर तो तरुवा के गरमी ह ठउका जुड़ागे रे........
सुशील भोले
संपर्क : 41-191, कस्टम कालोनी के सामने,
डॉ. बघेल गली, संजय नगर (टिकरापारा)
रायपुर (छ.ग.) मोबा. नं. 098269 92811
Wednesday, 27 March 2013
Sunday, 24 March 2013
Saturday, 23 March 2013
Wednesday, 20 March 2013
जब मैं आध्यात्मिक साधना में था...
सन् 1994 से लेकर 2007 तक (करीब 14-15 वर्षों तक) मैं आध्यात्मिक साधना में था। इसी दौरान मुझे छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति, जिसे मैं आदि धर्म कहता हूं, का ज्ञान प्राप्त हुआ था।
कुछ लोग पूछते हैं कि आदि धर्म क्या है, तो मैं उन्हें संक्षेप में केवल इतना ही कहता हंू कि सृष्टिकाल में या युग निर्धारण की दृष्टि से कहें तो सतयुग में जिन त्रिदेव की व्यवस्था थी, उनके साथ माताओं की व्यवस्था थी, और सेवक के रूप में कुछ गण-पार्षदों की व्यवस्था थी, उन्हें ही मैं आदि धर्म मानता हूं और केवल उनका ही प्रचार-प्रसार करता हूं।
ज्ञात रहे कि इसके पूर्व मैं सुशील वर्मा के नाम पर जाना जाता था। लेकिन आध्यात्मिक दीक्षा के पश्चात् गुरुदेव के आदेश पर मैं सुशील भोले लिखने लगा।
Monday, 18 March 2013
छत्तीसगढ़ी व्याकरण के सर्जक....
छत्तीसगढ़ी व्याकरण की रचना सर्वप्रथम सन् 1885 में हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा की गई थी, जिसका सन् 1890 में विश्व प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य सर जार्ज ग्रियर्सन ने अंगरेजी अनुवाद कर छत्तीसगढ़ी और अंगरेजी भाषा में संयुक्त रूप से छपवाया था, तथा यह टिप्पणी की थी कि उत्तर भारत की भाषाओं को समझने में यह छत्तीसगढ़ी व्याकरण काफी उपयोगी साबित होगा।
ज्ञात रहे, उस समय तक हिन्दी का कोई सर्वमान्य व्याकरण प्रकाशित नहीं हो पाया था। हिन्दी व्याकरण सन् 1921 में कामता प्रसाद गुरु के माध्यम से प्रकाशित हो पाया था।
हीरालाल काव्योपाध्याय का वास्तविक नाम हीरालाल चन्नाहू था, लेकिन 11 सितंबर 1884 को गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के भाई की संस्था द्वारा कलकत्ता में उन्हें काव्योपाध्याय की उपाधि प्रदान की गई थी, तब से वे अपना नाम हीरालाल काव्योपाध्याय लिखते थे। हीरालाल जी का जन्म छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के तात्यापारा नामक मोहल्ले में हुई थी। किन्तु उनका पैतृक गांव धमतरी जिला के अंतर्गत ग्राम चर्रा (कुरुद) है।
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