Wednesday, 1 May 2019

पुरखा मन के सुरता के परब पितर पाख

पुरखा मन के सुरता के परब..* पितर-पाख*
हमर संस्कृति म देवी-देवता मन के सुरता अउ पूजा-पाठ करे के संगे-संग अपन पुरखा मनला घलोक सुरता करे अउ श्रद्धा के साथ जल तरपन करे के रिवाज हे, जेला हमर इहां पितर पाख के नांव ले जाने जाथे। पितर पाख ल कुंवार महीना के अंधियारी पाख म मनाए जाथे। लगते कुंवार के पितर बइसकी होथे जेन ह अमावस्या के पितर-खेदा के संग पूरा होथे।

पितर पाख म अपन पुरखा मन के कम से कम तीन पीढ़ी के सुरता करे जाथे। एमा जेन तिथि म वोकर मन के स्वर्गवास होए रहिथे। तेनेच तिथि म उंकर नांव ले विशेष रूप ले जल अरपन करके चीला, बोबरा, बरा आदि के भोग लगाए जाथे। फेर माई लोगिन मनला पहिली बछर तो ओकर स्वर्गवास के तिथि म पितर मिलाय के नेंग ल करे जाथे, वोकर बाद फेर सिरिफ नवमीं तिथि म उंकर तरपन कर दिए जाथे। माने नवमी तिथि ह जम्मो महिला मन के पितर-तिथि कहे जा सकथे।

पितर पाख के लगते माई लोगिन मन घर के दुवारी ल बने गोबर म लीप के वोमा चउंक, रंगोली आदि बनाथें अउ फूल चढ़ा के सजाथें। वोकर पाछू उरिद दार के बरा बनाथें जेमा नून नइ डारे जाय। संग म बोबरा, गुरहा चीला आदि घलोक बनाए जाथे अउ साग के रूप म तरोई ल आरुग तेल म छउंके जाथे। ए जानबा राहय के ए पाख म तरोई के विशेष महत्व होथे। घर के दरवाजा म जेन गोबर लीप के चउंक पूरे जाथे वोमा आने फूल मन के संगे-संग तरोई के फूल घलोक चढ़ाए जाथे। वइसने साग तो सिरिफ तरोई ल तेल म छउंक के दिए जाथे अउ पितर मनला जेन जगा हूम-धूप अउ बरा-बोबरा दिए जाथे उहू ल तरोई के पान म रख के दिए जाथे। अइसे मानता हे के तरोई तारने वाला जिनीस आय काबर ते ये शब्द के उत्पत्ति तारन ले तरोई होए हे। वइसे तरोई ह पाचक अउ स्वादिष्ट होथे जेमा अनेकों किसम के पुस्टई होथे फेर बने नरम-नरम घलोक होथे, जेला भोभला डोकरा-डोकरी मन आसानी के साथ पगुरा के लील डारथें। आखिर पितर मन ला तो हमन उहिच रूप म सुरता करथन न।

वइसे तो अपन पुरखा मन के कई पीढ़ी तक के सुरता अउ तरपन करना चाही फेर जे मन अइसन करे म अपन आप ल सक्षम नइ पावंय वोमन पितर पाख म गया जी (बिहार राज्य) म जाके उंकर तरपन करके हर बछर के सुरता अउ तरपन ले मुकति पा जथें। अइसे मानता हे के जेकर मन के तरपन ल पितर पाख म गया जी म कर दिए जाथे वोमन ल मोक्ष प्राप्त हो जाथे, वोकर बाद फेर वोकर मन के तरपन करना जरूरी नइ राहय। वइसे जेकर मन के श्रद्धा अउ सामरथ हे वोमन अपन पुरखा मन के सुरता अउ तरपन गया जी म तरपन करे के बाद घलोक कर सकथें। एमा कोनो किसम के बंधन या दोस नइ माने जाय। तरपन देवइया मनला जल-अरपन करे के बेर उत्ती मुड़ा म मुंह करके जल अरपन करना चाही अउ ए बखत अपन खांध म सादा रंग के कांचा कपड़ा पंछा आदि घलोक रखना चाही।

सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 098269-92811

Sunday, 21 April 2019

बड़े जतन म बनथे अपन घर...

बड़े जतन म बनथे संगी अपन घर
सुग्घर निरमल छइयां होथे अपन बर
दूसर के कतकों महल हो फेर होथे दूसर
स्वाभिमान इहें जागथे होथे गुजर बसर
-सुशील भोले 9826992811

Sunday, 14 April 2019

जंवारा विसर्जन....

कइसे के जोरंव जोरा छूटत हे दाई तोर कोरा ओ,
रोवत रोवतअंतस भितरी फूटत हे दाई फोरा ओ...

Tuesday, 9 April 2019

सतबहिनिया माता की पूजा परंपरा...

सतबहिनिया माता की पूजा परंपरा...
छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति इस देश में प्रचलित वैदिक या कहें शास्त्र आधारित संस्कृति से बिल्कुल अलग हटकर एक मौलिक और स्वतंत्र संस्कृति है। पूर्व के आलेखों में इस पर विस्तृत चर्चा की जा चुकी है।  इसी श्रृंखला में अभी नवरात्रि  के अवसर पर माता की पूजा-उपासना और उनके विविध रूपों या नामों पर भी चर्चा करने की इच्छा हो रही है।

आप सभी जानते हैं, कि नवरात्र में वैदिक मान्यता के अनुसार माता के नौ रूपों की उपासना की जाती है। जबकि छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति में माता के सात रूपों की पूजा-उपासना की जाती है,  जिन्हें हम सतबहिनिया माता के नाम से जानते हैं। यहाँ की संस्कृति प्रकृति पर आधारित संस्कृति है, इसलिए यहाँ प्रकृति पूजा के रूप में जंवारा बोने और उसकी पूजा-उपासना करने की परंपरा है।

हमारे यहाँ सतबहिनिया माता के जिन सात रूपों की उपासना की जाती है,  उनमें मुख्यतः - शीतला दाई,  मावली दाई,  बूढ़ी माई,  ठकुराईन दाई, कुंवर माई,  मरही माई, दरश माता आदि प्रमुख हैं।  इनके अलावा भी अलग- अलग लोगों से और कई अन्य नाम ज्ञात हुए हैं,  जिनमें -कंकालीन दाई,  दंतेश्वरी माई,  जलदेवती माता,  कोदाई माता या अन्नपूर्णा माता आदि-आदि नाम बताए जाते हैं।
हमारे यहाँ सतबहिनिया माता की पूजा-उपासना आदि काल से होती चली आ रही है, इसीलिए यहाँ के प्राय: सभी गाँव,  शहर और मोहल्ले में शीतला माता,  मावली माता, सतबहिनिया माता आदि के मंदिर देखे जाते हैं।
-सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान
संजय नगर,  रायपुर
मो/व्हा.9826992811

Monday, 8 April 2019

चुनी के रोटी...

सील-लोढ़ा म घंस के पीस ले पताल चिरपोटी
संग म वोकर परोस दे तैं तो  चुनी के रोटी
एला जे खा लेही रात-दिन तोरेच  गुन गाही
कब्ज होय नहीं संग पाइल्स-मोटापा ले बचाही
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Sunday, 7 April 2019

जन्म दिवस पर...

एक छंद है आज समर्पित,
प्रिय तुम्हारे जन्म दिवस पर
जीवन खुशियों से भर जाये
ज्यूं जल भरता ऋतु-पावस पर
रिद्धि-सिद्धि सब मंगल गावें,
नृत्य करें देव-अप्सरा
स्वर्ग लोक मुदित हर्षावे,
देख-देख कर यह वसुंधरा
हर मौसम के रंग निराले,
छाये तुम्हारे मानस पर
प्रिय तुम्हारे जन्म दिवस पर...
प्रिय तुम्हारे...
-सुशील भोले
मो. 98269-92811

प्रेम में.....

प्रेम नि: स्वार्थ होता है,
वो केवल देना जानता है,
मांगता कुछ भी नहीं।
स्वार्थ से परे होता है,
प्रेम में वाणी का नहीं,
मन का निरंतर
संवाद होता है।
प्रेम असीम है,
बिन बोले ही,
सबकुछ बोलने का
उदाहरण है।
प्रेम में अधिकार
होता ही नहीं,
सिर्फ त्याग होता है,
कल्याण होता है, 
और समर्पण होता है।
-सुशील-9826992811