Sunday, 30 August 2020

नवा खाई परब....

नवाखाई परब...
अपन मेहनत ले उपजाए खरीफ फसल ल अपन ईष्ट देव ल समर्पित करे के परब आय "नवाखाई परब"। फेर ये परब ल अलग- अलग वर्ग के मन अलग- अलग तिथि म मनाथें। ये ह हमर संस्कृति के विविधता के ठउका चिन्हारी आय, के एकेच ठन परब ल अलग- अलग संदर्भ या अलग- अलग तिथि म घलो मना लेथन, जबकि परब मनाए के उद्देश्य एके होथे।
छत्तीसगढ़ म " नवाखाई परब " ल घलो अइसने अलग- अलग बेरा म मनाथें। इहाँ उत्कल संस्कृति जीने वाले मन जे उड़िसा सीमा क्षेत्र के रहइया आयं, उन एला भादो महीना के अंजोरी पाख के ऋषि पंचमी के दिन मनाथें। इहाँ के गोंडवाना के संस्कृति ल जीने वाला मन ए परब ल कुंवार महीना के अंजोरी पाख म दशहरा तिथि के आसपास अष्टमी या नवमी के मनाथें। जबकि इही "नवाखाई परब" ल इहाँ के मैदानी भाग म रहइया सामान्य वर्ग अउ ओबीसी के लोगन मन कातिक अमावस्या के मनाए जाने वाला देवारी परब बखत "अन्नकूट" के रूप म मनाथें।
ये हमर संस्कृति के विविधता के एक अच्छा उदाहरण आय, के एके ठन परब ल हमन अलग- अलग बेरा म मना लेथन, फेर ए सबके उद्देश्य एके आय अपन नवा फसल ल अपन ईष्ट ल समर्पित करना। अइसने बहुत अकन परब हे, जेकर संदर्भ अलग- अलग वर्ग के मन अलग- अलग बताथें या मानथें। तेकर सेती कहिथंव, के ए बाहिर ले दिखत अलगाव के नाम म लड़े-झगरे के बदला सबके सम्मान करत एक-दूसर ल सहयोग करना चाही।
-सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान रायपुर
मो. 9826992811

Saturday, 18 July 2020

हमर हरेली तिहार....

हमर हरेली तिहार......

खेती किसानी संग मंत्र जगाए के परब हरेली...
    छत्तीसगढ़ राज के जतका मूल परब-तिहार हे, सबके संबंध कोनो न कोनो रूप ले अध्यात्म संग जरूर हे। ए बात अलग आय के आज हम उंकर मूल कारण ल भूलागे हावन, तेकर सेती प्रकृति या खेती-किसानी संग जोड़ के वोला कृषि संस्कृति के रूप म बताए अउ जाने लगथन।
इहां के संस्कृति म सावन महीना के पहला परब "हरेली" के संग घलो अइसनेच बात हे। ए दिन जम्मो किसान अपन नांगर- बक्खर संग आने जम्मो कृषि यंत्र के धो-मांज के पूजा करथें। एकरे सेती एकर चिन्हारी ल कृषि पर्व के रूप म बताए जाथे। फेर एकर आध्यात्मिक पक्ष के अनदेखा कर देथें।

    आप सबो झन जानथौ के इही दिन या एकर आगू रतिहा जम्मो गाँव मन म गाँव बनाए के परंपरा ल घलो पूरा करे जाथे। इहाँ के ग्रामीण संस्कृति म "बइगा" कहे जाने वाला "मांत्रिक" मन इही दिन अपन-अपन मंत्र के पुनर्पाठ करथें। माने साल भर म वोला फिर से जागृत करथें। कतकों झन मन इही दिन मांत्रिक गुरु अउ शिष्य घलो बनाथें। गुरु शिष्य के रूप म परब मनाथें।

    इहाँ ए बात जाने के लाइक हे, के सावन महीना के इही अमावस के दिन महादेव ह मांत्रिक शक्ति के उदगार या प्रकट करे हें। अइसे लोकमान्यता हे के, उन अपन त्रिशूल म बंधाए सिंघिन ल फूंक के मंत्र मन के उद्घोष करे हें, उनला प्रगट करे रिहिन हें। अब ये कतका सही अउ कतका कल्पना के बात आय, एला तो उहिच ह जानय, फेर ए बात सोला आना सच आय, के हरेली परब के संबंध अध्यात्म संग जरूर हे। मंत्र के माध्यम ले लोकहित के भावना घलो साक्षात नजर आथे. हमर इहाँ ए दिन गाँव के लोहार समाज के मन अपन-अपन मालिक घर जाथें अउ उंकर घर के चौखट म खीला ठेंसथें. अइसने बइगा मन घर के दुआर मन लीम पाना खोंचथें. इही किसम घर के माई दरवाजा के संगे-संग कोठा आदि म गोबर के पुतरीनुमा जेन छापा बनाए जाथे, सबके भाव संबंधित घर के हर प्रकार के रोग राई अउ बाहरी बाधा आदि ले सुरक्षा के ही भाव रहिथे.

    आज के दिन ल गाँव के पहाटिया समाज के मन अड़बड़ नियम ले मानथें।तिहार के आगू दिन भिनसरहा लेे बने नहा-धो के  जंगल जाथें अउ मवेशी मन बर जड़ी-बूटी खोज के लाथें। रातभर जाग के कांदा--कुसा ला उसनथें। उसने के बेरा रात भर पहरा देथें, के काहीं  जीव जंतु वोमा झन खुसर जाए । साथ में टोटका घलो करथें। ये काम ला पुरुष मन करथें. अपन देव धामी के पूजा करथें, सहड़ा देवता म चढ़ाथें । घर के मुहाटी म लीम के डारा ला खोचथें ।

    सूत उठ के बिहनिया लेे गाँव के किसान मन हा अपन अपन घर लेे दार-चांऊर, नून, मिर्चा, खम्हार पान मा धर के पहाटिया कना जाथें,  उंकर मन करा लेे गोंदली, दसमूल कांदा ला घर म  लान के अपन गाय, बछरू, बईला,  ला पिसान के लोंदी अउ नून संग खवाथें।

    हरेली तिहार के एक दिन आगू ले नारी  परानी मन  हा घर दुआर ला गोबर पानी म  लिप -बहार के छरा-छिटका दे डारे रथें। घर- घर म उरिद दार  संग लपेट के कोचई पान के ईडहर  के साग चुरथे ।

    लाईका मन बर बांस के गेंड़ी बनाथें.  पांव मढ़ाए बर बांस के तिकोनिया  कमचिल लगा के माटी तेल डार देथें, लईका मन वोमे चढ़ के रेंगाही तब चर्र--चर्र आवाज करथे त लइका मन खुश हो जाथें, कतकों झन तो एकरे सेती एला गेंड़ी तिहार घलो कहिथें. हमन जब लइका रेहेन, त हमर गाँव म ए दिन गेंड़ी दौड़ के प्रतियोगिता घलो होवय. एकर संगे-संग नरियर फेंकउला के घलो प्रतियोगिता होवय. गजब आनंद आवय.

    अभी हमर छत्तीसगढ़ सरकार ह इहाँ के जम्मो स्कूल मन म हरेली परब मनाए के आदेश निकाले हे, जेमा लइका मन बर गेंड़ी दौंड़ के प्रतियोगिता आयोजित करे के घलो उल्लेख हे. ए ह अच्छा बात आय, लइका मनला बचपन ले ही अपन संस्कृति-परंपरा संग जुड़े अउ समझे खातिर ठउका उदिम साबित होही. एकर खातिर सरकार के जतका बड़ाई करे जाय कम हे.
-सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान रायपुर
मो.9826992811

Wednesday, 17 June 2020

जुड़वास परब....

जुड़वास परब...
    छत्तीसगढ़ के संस्कृति म कृषि अउ ऋषि संस्कृति के अद्भुत मेल देखे बर मिलथे. हमर इहाँ एक डहर जिहां विशुद्ध आध्यात्मिक संस्कृति के दर्शन होथे, उहें दूसर डहर आरूग खेती किसानी अउ प्रकृति ले जुड़े परब-तिहार मन के घलोक दर्शन होथे.
    जुड़वास या माता पहुंचनी परब ह घलो अइसने समिलहा संस्कृति के दर्शन कराथे. चइत, बइसाख अउ जेठ के उसनत गरमी के बाद जब अगास म अंकरस के बादर उमड़त-घुमड़त असाढ़ के आए के आरो देथे, तब इहाँ के गाँव गाँव म जुड़वास के परब मनाए जाथे.
    असाढ़ महीना के अमावस्या के या फेर सोमवार या बिरस्पत के दिन बइगा के अगुवाई म गाँव के शीतला मंदिर मन म गाँव के जम्मो मनखे चांउर-दार,  तेल अउ हरदी धर के जाथें, माता म चघाथें, अउ संग म सेउक मन जुड़वास जस के गायन वादन करथें.
    ए बात वैज्ञानिक रूप ले प्रमाणित हे, तेल अउ हरदी के कई किसम के आयुर्वेदिक महत्व हे, लोगन जब तेल हरदी धरे शीतला माता के मंदिर जाथें, त पूरा गाँव के वातावरण म प्रभाव बगर जाथे, जे ह कई किसम के रोग राई ले बचाव करथे.

असाढ़ आगे बरखा लेके ए महीना आय खास
गाँव बस्ती के शीतला देवी झोंक लेवव जुड़वास 
तेल हरदी धर सुमिरत हावन तोला करत जोहार
रोग-राई अउ महामारी ले बचा अब तुंहरे हे आस

-सुशील भोले-9826992811
संजय नगर, रायपुर

Sunday, 14 June 2020

जय जगन्नाथ.....

जय जगन्नाथ...
छत्तीसगढ़ की संस्कृति में कई ऐसी संस्कृतियों का भी समावेश हो गया है, जो मुख्य रूप से पड़ोसी राज्यों की संस्कृति कहलाती हैं। ऐसी ही संस्कृतियों में आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया को मनाया जाने वालाओ पर्व रथयात्रा भी शामिल है। आज इस पर्व को समूचे छत्तीसगढ़ राज्य के शहरी एवं ग्रमीण इलाकों में किसी न किसी रूप में मनाया ही जाता है, जबकि मूल रूप से इस पर्व को ओडिशा राज्य के प्रतिनिधि पर्व के रूप में जानते हैं।

छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में इससे संबंधित गीत भी गाया जाता है, जिसे जगन्नतिहा गीत कहते हैं। पहले जब आवागमन की कोई खास सुविधा नहीं थी तब यहां के श्रद्धालु तीर्थाटन के लिए पैदल ही जगन्नाथपुरी जाते थे। ऐसा कहा जाता है कि इस कठिन यात्रा से जो लोग वापस जिन्दा आ जाते थे, उन्हें समूचे ग्रामवासी बाजागाजा के साथ भगवान जगन्नाथ का यशगान करते घर तक लाते थे। इसे ही जगन्नतिहा गीत कहते हैं।

पड़ोसी राज्य ओडिशा का पुरी क्षेत्र जिसे पुरुषोत्तम पुरी, शंख क्षेत्र, श्रीक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्री जगन्नाथ की मुख्य लीला-भूमि है। उत्कल प्रदेश के प्रधान देवता जगन्नाथ जी ही माने जाते हैं। यहां के वैष्णव धर्म की मान्यता है कि राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं श्री जगन्नाथ हैं। इसी प्रतीक के रूप श्री जगन्नाथ से संपूर्ण जगत का उद्भव हुआ है।

श्री जगन्नाथ पूर्ण परात्पर भगवान है और श्रीकृष्ण उनकी कला का एक रूप है। ऐसी मान्यता श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य पंच सखाओं की है। पूर्ण परात्पर भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी में आरंभ होती है। यह रथयात्रा पुरी का प्रधान पर्व भी है। इसमें भाग लेने के लिए, इसके दर्शन लाभ के लिए हजारों, लाखों की संख्या में बाल, वृद्ध, युवा, नारी देश के सुदूर प्रांतों से आते हैं। सबसे प्रतिष्ठित समारोह जगन्नाथ पुरी में मनाया जाता है। यह स्थान भुवनेश्वर से साठ किमी की दूरी पर है। यहां का जगन्नाथ मंदिर अपनी ऐतिहासिक रथयात्रा के लिए सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है।

पश्चिमी समुद्रतट से लगभग डेढ़ किमी दूर उत्तर में नीलगिरि पर्वत पर स्थित यह प्राचीन मंदिर कलिंग वास्तुशैली में बना 12वीं सदी का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर का निर्माण नरेश चोडग़ंग ने करवाया था। नौ दिनों की यह रथयात्रा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली है। इसे श्री गुण्डिचा यात्रा भी कहते हैं। इस रथयात्रा का विस्तृत वर्णन स्कंद पुराण में मिलता है, जहां श्रीकृष्ण ने कहा है कि पुष्य नक्षत्र से युक्त आषाढ़ मास की द्वितीया तिथि को मुझे, सुभद्रा और बलभद्र को रथ में बिठाकर यात्रा कराने वाले मनुष्य की सभी मनो: कामनाएं पूर्ण होती हैं। इस रथयात्रा महोत्सव में श्रीकृष्ण के साथ राधिका जी न होकर सुभद्रा और बलराम होते हैं, जिसके संबंध में एक विशेष कथा प्रचलित है।

पौराणिक कथा
एक समय द्वारिकापुरी में माता रोहिणी से श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी व अन्य रानियों ने राधारानी व श्रीकृष्ण के प्रेम-प्रसंगों एवं ब्रज-लीलाओं का वर्णन करने की प्रार्थना की। जिस पर माता ने श्रीकृष्ण व बलराम से छिपकर एक बंद कमरे में कथा सुनानी आरंभ की और सुभद्रा को द्वार पर पहरा देने को कहा, किन्तु कुछ ही समय पश्चात् श्रीकृष्ण एवं बलराम वहां आ पहुंचे। सुभद्रा के द्वारा अंदर जाने से रोकने पर श्रीकृष्ण व बलराम को कुछ संदेह हुआ और वे बाहर से ही अपनी सूक्ष्मशक्ति द्वारा अंदर की माता द्वारा वर्णित ब्रजलीलाओं को श्रवण करने लगे।

कथा सुनते-सुनते श्रीकृष्ण, बलराम व सुभद्रा के हृदय में ब्रज के प्रति अद्भुत भाव एवं प्रेम उत्पन्न हुआ तथा उनके हाथ व पैर सिकुडऩे लगे। वे तीनों राधा रानी की भक्ति में इस प्रकार भाव-विभोर हो गए कि स्थायी प्रतिमा के समान प्रतीत होने लगे। अत्यंत ध्यानपूर्वक देखने पर भी उनके हाथ-पैर दिखाई नहीं देते थे।

श्री सुदर्शन ने भी द्रवित होकर लंबा रूप धारण कर लिया। उसी समय देवमुनि नारद वहां आ पहुंचे और भगवान के इस रूप को देखकर अत्यंत आश्चर्यचकित हुए तथा भक्तिपूर्वक प्रणाम करके श्रीहरि से कहा कि हे प्रभु! आप सदा इसी रूप में पृथ्वी पर निवास करें। भगवान श्रीकृष्ण ने कलियुग में इसी रूप में नीलांचल क्षेत्र (पुरी) में प्रकट होने की सहमति प्रदान की। कलियुग आगमन के पश्चात् एक समय मालव देश के राजा इंद्रद्युम्न को समुद्र में तैरता हुआ लकड़ी का एक बहुत बड़ा  टुकड़ा मिला। राजा के मन में उस टुकड़े को निकलवा कर भगवान श्रीहरि की मूर्ति बनवाने की इच्छा जागृत हुई।

उसी समय देव शिल्पी विश्वकर्मा ने बढ़ई रूप में वहां आकर राजा की इच्छानुसार प्रतिमा निर्माण का प्रस्ताव रखा और कहा कि 'मैं एक एकांत बंद कमरे में प्रतिमा निर्माण करुंगा तथा मेरी आज्ञा न मिलने तक उक्त कमरे का द्वार न खोला जाए अन्यथा मैं मूर्ति-निर्माण बीच में ही छोड़कर चला जाऊंगा"। राजा ने शर्त मान ली, किन्तु कई दिन व्यतीत होने पर भी जब बढ़ई की ओर से कोई समाचार न मिला तो राजा ने द्वार खोलकर कुशलक्षेम लेने की आज्ञा दी।

जब द्वार खोला गया तो बढ़ई रूपी विश्वकर्मा अंतर्धान हो चुके थे और वहां लकड़ी की तीन अपूर्ण मूर्तियां मिलीं। उन अपूर्ण प्रतिमाओं को देखकर राजा अत्यंत दु:खी हो श्रीहरि का ध्यान करने लगे। राजा की भक्ति-भाव से प्रसंन होकर भगवान ने आकाशवाणी की 'हे राजन! देवर्षि नारद को दिए वरदान अनुसार हमारी इसी रूप में रहने की इच्छा है, अत: तुम तीनों प्रतिमाओं को विधिपूर्वक प्रतिष्ठित करवा दो"।

अंतत: राजा ने श्रीहरि की इच्छानुसार नीलाचल पर्वत पर एक भव्य मंदिर बनवाकर वहां तीनों प्रतिमाओं की स्थापना करवा दी। जिस स्थान पर मूर्ति निर्माण हुआ था, वह स्थान गुण्डिचाघर कहलाता है, जिसे ब्रह्मलोक और जनकपुर भी कहते हैं। ये तीन मूर्तियां ही भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा जी के स्वरूप हैं।

दस दिवसीय महोत्सव
पुरी का जगन्नाथ मंदिर के दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षयतृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से हो जाता है। कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं।

गरुड़ध्वज
जगन्नाथ जी का रथ गरुड़ध्वज या कपिलध्वज कहलाता है। 16 पहियों वाला यह रथ 13.5 मीटर ऊंचा होता है जिसमें लाल और पीले रंग के वस्त्र का प्रयोग होता है। विष्णु का वाहक गरुड़ इसकी रक्षा करता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे 'त्रैलोक्यमोहिनी" या 'नंदीघोष" रथ कहते हैं।

तालध्वज
बलराम का रथ 'तलध्वज" के नाम से पहचाना जाता है। यह रथ 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है। यह लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को 'उनानी" कहते हैं। 'त्रिब्रा", 'घोरा", 'दीर्घशर्मा" व 'स्वर्णनावा" इसके अश्व हैं। जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है, वह 'वासुकी" कहलाता है।

Wednesday, 25 March 2020

छत्तीसगढ़ और आध्यात्मिक समृद्धि.....

छत्तीसगढ़ और आध्यात्मिक समृद्धि....
छत्तीसगढ आध्यात्मिक रूप से इतना समृद्ध है, कि इसे न किसी बाहरी संत की आवश्यकता है, न बाहरी ग्र॔थ की आवश्यकता है, और न ही किसी बाहरी तंत्र या मंत्र की। जरूरी है तो केवल अपने मूल को जानने, समझने और पुनः उसे आत्मसात करने की।
आइए, हम यहाँ के मूल ज्ञान और संस्कृति का "आखर अंजोर" चहुँ ओर फैलाएं....

-सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान
मो/व्हा. 9826992811

Monday, 13 January 2020

ईसाई और मुसलमान क्यों बनते हैं?.....

*ईसाई और मुसलमान क्यों बनते हैं ?*
– स्वामी विवेकानन्द
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अगर हमारे देश में कोई नीच जाति में जन्म लेता है , तो वह हमेशा के लिए गया – बीता समझा जाता है , उसके लिए कोई आशा – भरोसा नहीं ।

( पत्रावली भाग २ , पृ. ३१६ )

आइए , देखिए तो सही , त्रिवांकुर में जहाँ पुरोहितों के अत्याचार भारतवर्ष में सब से अधिक हैं , जहाँ एक एक अंगुल जमीन के मालिक ब्राह्मण हैं,वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है !

( पत्रावली भाग १ , पृ. ३८५ )

यह देखो न – हिंदुओं की सहानुभूति न पाकर मद्रास प्रांत में हजारों पेरिया ईसाई बने जा रहे हैं , पर ऐसा न समझना कि वे केवल पेट के लिए ईसाई बनते हैं । असल में हमारी सहानुभूति न पाने के कारण वे ईसाई बनते हैं ।

( पत्रावली भाग ६ , पृ. २१५ तथा नया भारत गढ़ो पृ. १८)

भारत के गरीबों में इतने मुसलमान क्यों हैं ? यह सब मिथ्या बकवाद है कि तलवार की धार पर उन्होंने धर्म बदला । जमींदारों और पुरोहितों से अपना पिंड छुड़ाने के लिए ही उन्होंने ऐसा किया , और फलत: आप देखेंगे कि बंगाल में जहाँ जमींदार अधिक हैं , वहाँ हिंदुओं से अधिक मुसलमान किसान हैं । ( पत्रावली भाग ३ , पृ. ३३०, नया भारत गढ़ो, पृ . १८ )

हमने राष्ट्र की हैसियत से अपना व्यक्तिभाव खो दिया है और यही सारी खराबी का कारण है । हमे राष्ट्र में उसके खोये हुए व्यक्तिभाव को वापस लाना है और जनसमुदाय को उठाना है।

( पत्रावली भाग २ , पृ. ३३८ )

भारत को उठाना होगा , गरीबों को भोजन देना होगा , शिक्षा का विस्तार करना होगा और पुरोहित – प्रपंच की बुराइयों का निराकरण करना होगा । सब के लिए अधिक अन्न और सबको अधिकाधिक सुविधाएँ मिलती रहें । ( पत्रावली भाग ३ , पृ ३३४ )

पहले कूर्म अवतार की पूजा करनी चाहिए । पेट है वह कूर्म । इसे पहले ठंडा किये बिना धर्म-कर्म की बात कोई ग्रहण नहीं करेगा । देखते नहीं , पेट की चिन्ता से भारत बेचैन है।धर्म की बात सुनाना हो तो पहले इस देश के लोगों के पेट की चिंता दूर करना होगा । नहीं तो केवल व्याख्यान देने से विशेष लाभ न होगा ।

(पत्रावली भाग ६ , पृ १२८ )

पहले रोटी और तब धर्म चाहिए । गरीब बेचारे भूखों मर रहे हैं , और हम उन्हें आवश्यकता से अधिक धर्मोपदेश दे रहे हैं !

( पत्रावली भाग ५ , पृ. ३२२ )

लोगों को यदि आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा न दी जाय तो सारे संसार की दौलत से भी भारत के एक छोटे से गाँव की सहायता नहीं की जा सकती है ।

( पत्रावली भाग ६ , पृ ३५० )

लोग यह भी कहते थे कि अगर साधारण जनता में शिक्षा का प्रसार होगा , तो दुनिया का नाश हो जायगा । विशेषकर भारत में , हमें समस्त देश में ऐसे सठियाये बूढे मिलते हैं , जो सब कुछ साधारण जनता से गुप्त रखना चाहते हैं । इसी कल्पना में अपना बड़ा समाधान कर लेते हैं कि वे सारे विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं । तो क्या वे समाज की भलाई के लिए ऐसा कहते हैं अथवा स्वार्थ से अंधे हो कर ? मुट्ठी भर अमीरों के विलास के लिए लाखों स्त्री-पुरुष अज्ञता के अंधकार और अभाव के नरक में पड़े रहें ! क्योंकि उन्हें धन मिलने पर या उनके विद्या सीखने पर समाज डाँवाडोल हो जायगा ! समाज है कौन ? वे लोग जिनकी संख्या लाखों है ? या आप और मुझ जैसे दस – पाँच उच्च श्रेणी वाले !!

( नया भारत गढ़ो , पृ. ३१ )

यदि स्वभाव में समता न भी हो , तो भी सब को समान सुविधा मिलनी चाहिए । फिर यदि किसी को अधिक तथा किसी को अधिक सुविधा देनी हो , तो बलवान की अपेक्षा दुर्बल को अधिक सुविधा प्रदान करना आवश्यक है । अर्थात चांडाल के लिए शिक्षा की जितनी आवश्यकता है , उतनी ब्राह्मण के लिए नहीं । ( नया भारत गढ़ो , पृ . ३८ )

जब तक करोड़ों भूखे और अशिक्षित रहेंगे , तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूँगा , जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है , परंतु जो उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता ! वे लोग जिन्होंने गरीबों को कुचलकर धन पैदा किया है और अब ठाठ-बाट से अकड़कर चलते हैं, यदि उन बीस करोड़ देशवासियों के लिए जो इस समय भूखे और असभ्य बने हुए हैं , कुछ नहीं करते , तो वे घृणा के पात्र हैं ।

( नया भारत गढ़ो , पृ. ४४ – ४५ )

एक ऐसा समय आयेगा जब शूद्रत्वसहित शूद्रों का प्राधान्य होगा , अर्थात आजकल जिस प्रकार शूद्र जाति वैश्य्त्व अथवा क्षत्रियत्व लाभ कर अपना बल दिखा रही है , उस प्रकार नहीं , वरन अपने शूद्रोचित धर्मकर्मसहित वह समाज में आधिपत्य प्राप्त करेगी । पाश्चात्य जगत में इसकी लालिमा भी आकाश में दीखने लगी है , और इसका फलाफल विचार कर सब लोग घबराये हुए हैं। ‘सोशलिज्म’ , ‘अनार्किज्म’,’नाइहिलिज्म’ आदि संप्रदाय इस विप्लव की आगे चलनेवाली ध्वजाएँ हैं । ( पत्रावली भाग ८ , पृ. २१९-२०, नया भारत गढ़ो पृ. ५६ )

ईसाई और मुसलमान क्यों बनते हैं?.....

*ईसाई और मुसलमान क्यों बनते हैं ?*
– स्वामी विवेकानन्द
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अगर हमारे देश में कोई नीच जाति में जन्म लेता है , तो वह हमेशा के लिए गया – बीता समझा जाता है , उसके लिए कोई आशा – भरोसा नहीं ।

( पत्रावली भाग २ , पृ. ३१६ )

आइए , देखिए तो सही , त्रिवांकुर में जहाँ पुरोहितों के अत्याचार भारतवर्ष में सब से अधिक हैं , जहाँ एक एक अंगुल जमीन के मालिक ब्राह्मण हैं,वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है !

( पत्रावली भाग १ , पृ. ३८५ )

यह देखो न – हिंदुओं की सहानुभूति न पाकर मद्रास प्रांत में हजारों पेरिया ईसाई बने जा रहे हैं , पर ऐसा न समझना कि वे केवल पेट के लिए ईसाई बनते हैं । असल में हमारी सहानुभूति न पाने के कारण वे ईसाई बनते हैं ।

( पत्रावली भाग ६ , पृ. २१५ तथा नया भारत गढ़ो पृ. १८)

भारत के गरीबों में इतने मुसलमान क्यों हैं ? यह सब मिथ्या बकवाद है कि तलवार की धार पर उन्होंने धर्म बदला । जमींदारों और पुरोहितों से अपना पिंड छुड़ाने के लिए ही उन्होंने ऐसा किया , और फलत: आप देखेंगे कि बंगाल में जहाँ जमींदार अधिक हैं , वहाँ हिंदुओं से अधिक मुसलमान किसान हैं । ( पत्रावली भाग ३ , पृ. ३३०, नया भारत गढ़ो, पृ . १८ )

हमने राष्ट्र की हैसियत से अपना व्यक्तिभाव खो दिया है और यही सारी खराबी का कारण है । हमे राष्ट्र में उसके खोये हुए व्यक्तिभाव को वापस लाना है और जनसमुदाय को उठाना है।

( पत्रावली भाग २ , पृ. ३३८ )

भारत को उठाना होगा , गरीबों को भोजन देना होगा , शिक्षा का विस्तार करना होगा और पुरोहित – प्रपंच की बुराइयों का निराकरण करना होगा । सब के लिए अधिक अन्न और सबको अधिकाधिक सुविधाएँ मिलती रहें । ( पत्रावली भाग ३ , पृ ३३४ )

पहले कूर्म अवतार की पूजा करनी चाहिए । पेट है वह कूर्म । इसे पहले ठंडा किये बिना धर्म-कर्म की बात कोई ग्रहण नहीं करेगा । देखते नहीं , पेट की चिन्ता से भारत बेचैन है।धर्म की बात सुनाना हो तो पहले इस देश के लोगों के पेट की चिंता दूर करना होगा । नहीं तो केवल व्याख्यान देने से विशेष लाभ न होगा ।

(पत्रावली भाग ६ , पृ १२८ )

पहले रोटी और तब धर्म चाहिए । गरीब बेचारे भूखों मर रहे हैं , और हम उन्हें आवश्यकता से अधिक धर्मोपदेश दे रहे हैं !

( पत्रावली भाग ५ , पृ. ३२२ )

लोगों को यदि आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा न दी जाय तो सारे संसार की दौलत से भी भारत के एक छोटे से गाँव की सहायता नहीं की जा सकती है ।

( पत्रावली भाग ६ , पृ ३५० )

लोग यह भी कहते थे कि अगर साधारण जनता में शिक्षा का प्रसार होगा , तो दुनिया का नाश हो जायगा । विशेषकर भारत में , हमें समस्त देश में ऐसे सठियाये बूढे मिलते हैं , जो सब कुछ साधारण जनता से गुप्त रखना चाहते हैं । इसी कल्पना में अपना बड़ा समाधान कर लेते हैं कि वे सारे विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं । तो क्या वे समाज की भलाई के लिए ऐसा कहते हैं अथवा स्वार्थ से अंधे हो कर ? मुट्ठी भर अमीरों के विलास के लिए लाखों स्त्री-पुरुष अज्ञता के अंधकार और अभाव के नरक में पड़े रहें ! क्योंकि उन्हें धन मिलने पर या उनके विद्या सीखने पर समाज डाँवाडोल हो जायगा ! समाज है कौन ? वे लोग जिनकी संख्या लाखों है ? या आप और मुझ जैसे दस – पाँच उच्च श्रेणी वाले !!

( नया भारत गढ़ो , पृ. ३१ )

यदि स्वभाव में समता न भी हो , तो भी सब को समान सुविधा मिलनी चाहिए । फिर यदि किसी को अधिक तथा किसी को अधिक सुविधा देनी हो , तो बलवान की अपेक्षा दुर्बल को अधिक सुविधा प्रदान करना आवश्यक है । अर्थात चांडाल के लिए शिक्षा की जितनी आवश्यकता है , उतनी ब्राह्मण के लिए नहीं । ( नया भारत गढ़ो , पृ . ३८ )

जब तक करोड़ों भूखे और अशिक्षित रहेंगे , तब तक मैं प्रत्येक उस आदमी को विश्वासघातक समझूँगा , जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है , परंतु जो उन पर तनिक भी ध्यान नहीं देता ! वे लोग जिन्होंने गरीबों को कुचलकर धन पैदा किया है और अब ठाठ-बाट से अकड़कर चलते हैं, यदि उन बीस करोड़ देशवासियों के लिए जो इस समय भूखे और असभ्य बने हुए हैं , कुछ नहीं करते , तो वे घृणा के पात्र हैं ।

( नया भारत गढ़ो , पृ. ४४ – ४५ )

एक ऐसा समय आयेगा जब शूद्रत्वसहित शूद्रों का प्राधान्य होगा , अर्थात आजकल जिस प्रकार शूद्र जाति वैश्य्त्व अथवा क्षत्रियत्व लाभ कर अपना बल दिखा रही है , उस प्रकार नहीं , वरन अपने शूद्रोचित धर्मकर्मसहित वह समाज में आधिपत्य प्राप्त करेगी । पाश्चात्य जगत में इसकी लालिमा भी आकाश में दीखने लगी है , और इसका फलाफल विचार कर सब लोग घबराये हुए हैं। ‘सोशलिज्म’ , ‘अनार्किज्म’,’नाइहिलिज्म’ आदि संप्रदाय इस विप्लव की आगे चलनेवाली ध्वजाएँ हैं । ( पत्रावली भाग ८ , पृ. २१९-२०, नया भारत गढ़ो पृ. ५६ )