जेकर संग कोस भर
अड़कट्टा दउंड़ देवन
खंड़ भर नदिया ल
एकसंस्सू तउर देवन
वो संगी के अब
कुछू सोर नइ मिलत हे
कोन मेर लथर के
परे हंफरत हे?
सिरतोन उमर संग
अब उहू झरत हे.
सुरता हे मोला
वो मंझनिया भर किंजरना
ए खार ले वो खार
बमरी पेंड़ म लासा हुदरना
कोस भर बजार जाके
वोला तउलना अउ बेंचना
फेर उही संगी अब
अपटे धरत हे
पांव के पनही घलो
वोला अब
गरू लगत हे
सिरतोन उमर संग
अब उहू झरत हे..
मुचमुची गोठ अउ
मया के पाती
बदला म एकर वो अब
बीमा के नवा योजना
पढ़त हे
जमा-पूंजी के सरेखा संग
बेटा-बेटी के
सपना गढ़त हे
नोनी के बिदा ले उबरिस
त बाबू खातिर
अंगरी के पोर गिनत हे
सिरतोन उमर संग
अब उहू झरत हे...
-सुशील भोले-9826992811
Thursday, 20 January 2022
उहू झरत हे...
Tuesday, 18 January 2022
अस्मिता के आत्मा संस्कृति
अस्मिता के आत्मा आय संस्कृति...
आजकाल 'अस्मिता' शब्द के चलन ह भारी बाढ़गे हवय। हर कहूँ मेर एकर उच्चारन होवत रहिथे, तभो ले कतकों मनखे अभी घलोक एकर अरथ ल समझ नइ पाए हे, एकरे सेती उन अस्मिता के अन्ते-तन्ते अरथ निकालत रहिथें, लोगन ल बतावत रहिथें, व्याख्या करत रहिथें।
अस्मिता असल म संस्कृत भाषा के शब्द आय, जेहा 'अस्मि" ले बने हे। अस्मि के अर्थ होथे 'हूँ"। अउ जब अस्मि म 'ता" जुड़ जाथे त हो जाथे 'अस्मिता" अउ ये दूनों जुड़े शब्द के अरथ होथे- 'मैं कोन आँव?", मैं कौन हूँ?, मेरी पहचान क्या है?, मोर चिन्हारी का आय? अब ये बात ल तो सबो जानथें के हर मनखे के या क्षेत्र के चिन्हारी वोकर संस्कृति होथे। एकरे सेती हमन कहिथन के जे मन छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल जीथे वोमन छत्तीसगढ़िया। अइसने जम्मो क्षेत्र के लोगन के निर्धारण उंकर संस्कृति संग होथे।
एक बात इहाँ ध्यान दे के लाइक हे के भाषा ह संस्कृति के संवाहक होथे, वोकर प्रवक्ता होथे, एकरे सेती कोनो क्षेत्र विशेष के भाषा भर ल बोले म कोनो मनखे ल वो क्षेत्र के मूल निवासी नइ माने जा सकय। अब हमन छत्तीसगढ़ के संदर्भ म देखन। इहाँ के मातृभाषा छत्तीसगढ़ी ल आज इहाँ के मूल निवासी मन के संगे-संग बाहिर ले आके रहत लगभग अउ जम्मो लोगन थोक-बहुत बोलबेच करथें, तभो ले उनला हम छत्तीसगढ़ के मूल निवासी नइ मानन, काबर उन आजो इहाँ रहि के घलोक अपन मूल प्रदेश के संस्कृति ल जीथें।
पंजाब ले आये मनखे पंजाब के संस्कृति ल जीथे, बंगाल ले आये मनखे बंगाल के संस्कृति ल जीथे, अउ अइसने आने लोगन घलो अपन-अपन मूल प्रदेश के संस्कृति ल ही जीथें, उही संस्कृति के अंतर्गत इहाँ कतकों किसम के आयोजन घलोक करत रहिथें, अपन घर के पूजापाठ अउ आने धार्मिक बुता ल घलो वोकरे अनुसार करथें। ए ह ए बात के चिन्हारी आय के वो ह आज घलोक छत्तीसगढ़ के 'चिन्हारी" ल अपन 'चिन्हारी" नइ बना पाए हे, इहाँ के अस्मिता ल आत्मसात नइ कर पाए हें। अउ जब तक वो ह इहाँ के अस्मिता ल आत्मसात नइ कर लेही तब तक वोला छत्तीसगढ़िया नइ माने जा सकय।
हम ए उदाहरण म भारत ले जा के विदेश म बसे लोगन मनला घलोक शामिल कर सकथन। आज घलो अइसन लोगन ल हम भारतीय मूल के लोगन कहिथन, भारतीय संस्कृति ल विदेश म बगराने वाला कहिथन काबर ते उन आने देश म रहि के घलोक भारत के संस्कृति ल जीथें, भारत के तिहार-बार ल मनाथें। जबकि उहाँ बसे अइसे कतकों लोगन हें, जे मन भारत के भाषा ल भुलागे हवंय, फेर संस्कृति ल आजो धरे बइठे हावंय।
क्रिकेट खेले बर इहाँ वेस्ट इंडीज के जेन टीम आथे, वोमा अइसन कतकों झन रहिथें, जे मन भारतीय मूल के होथें, उंकर मनके नाम घलोक शिवराम चंद्रपाल, नारायन जइसन भारतीय किसम के होथे, फेर उन इहाँ के भाषा ल नइ बोले सकयं। भाषा उहें के बोलथें जिहाँ अब रहिथें, तभो ले उनला भारतीय मूल के कहे जाथे, काबर ते वोकर पहिचान के या कहिन के चिन्हारी के मानक संस्कृति होथे।
अब हम छत्तीसगढ़ के संस्कृति के बात करन या कहिन के अस्मिता के बात करन। त सबले पहिली ए बात उठथे के छत्तीसगढ़ के संस्कृति का देश के आने भाग म पाए जाने वाला संस्कृति ले अलग हे? त एकर जवाब हे- हाँ बहुत अकन परब-तिहार अउ रिति-रिवाज अलग हे, अउ उही अलगे मनके सेती हम छत्तीसगढ़ ल एक अलग साँस्कृतिक इकाई मानथन, जेकर सेती ए क्षेत्र ल एक अलग राज के रूप म मान्यता दे गे हवय। वइसे कुछ अइसे घलोक तिहार-बार हे, जेला पूरा देश के संगे-संग छत्तीसगढ़ म घलोक मनाए जाथे, फेर जब अलग चिन्हारी के बात आथे त अइसन मनला अलगिया दिए जाथे।
अब प्रश्न ये उठथे के अइसन का अलग हे, जेन संस्कृति ल आने प्रदेश म नइ जिए जाय? त ए बात ल सब जानथें के मैं ह इहाँ के मूल संस्कृति ऊपर पहिली घलोक अड़बड़ लिखे हौं, अउ बेरा-बेरा म एकर ऊपर चरचा-भासन घलोक दिए हौं, तभो ले कुछ रोटहा बात ल थोक-मोक फेर करत हावंव।
सबले पहिली छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति का आय, तेला फोरिया लेथन? काबर ते आज इहां के संस्कृति के जेन रूप देखाए जावत हे, वोकर मानकीकरण ल गलत करे जावत हे। असल म कोनो भी क्षेत्र या प्रदेश के संस्कृति के मानक उहाँ के मूल निवासी मन के संस्कृति होथे, अन्य प्रदेश या देश ले आके इहाँ बस गे लोगन मन के संस्कृति ह नइ होवय, फेर कोन जनी इहाँ के तथाकथित विद्वान मनला का मनसा भरम धर लिए हे, ते उन इहाँ के मूल निवासी मनके संस्कृति ल एक डहर तिरिया दिए हें, अउ बाहिर ले आए लोगन मन के संस्कृति ल छत्तीसगढ़ के संस्कृति के रूप म लिखत-पढ़त हें। खासकर धरम के नांव म ए बुता ह जादा देखे बर मिलथे, के एक देश के एके धरम.
ये ह असल म इतिहास लेखन संग दोगलागिरी करना आय, तभो ले कुछ लोगन ए दोगलागिरी ल पूरा बेसरमी के साथ करत हें। एमा वो लोगन मन के संख्या जादा हे, जे मन उत्तर भारत ले आ के इहाँ बसे हवंय, एकरे सेती उन अस्मिता के आत्मा के रूप म संस्कृति ल छोड़ के भाषा ल बतावत रहिथें। काबर ते उन ए बात ल अच्छा से जानथें के जब इहाँ के मूल संस्कृति के बात करबो तब तो हमूँ मन गैर छत्तीसगढ़िया हो जाबो, बाहिरी हो जाबो, काबर ते छत्तीसगढ़ के संस्कृति ल तो उहू मन नइ जीययं।
अब कुछ मूल संस्कृति के बात। त सबले पहिली वो चातुर्मास के बात जेला चारोंखुंट मनाथें, फेर जे छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति म लागू नइ होय। अइसे कहिथें के चातुर्मास के चार महीना म देंवता मन बिसराम करथें या कहिन के सूत जाथें, एकरे सेती ए चार महीना (सावन, भादो, कुंवार अउ कातिक) म कोनो भी किसम के शुभ कारज (माँगलिक कार्य, जइसे- बर-बिहाव आदि) नइ करे जाय।
अब हम छत्तीसगढ़ के परब-तिहार के बात करन त देखथन के इहाँ ईसरदेव अउ गौरा के बिहाव के परब ल 'गौरा पूजा" या 'गौरी-गौरा" के रूप म इही चातुर्मास के भीतर माने कातिक महीना के अमावस्या तिथि म मनाए जाथे। अब प्रश्न उठथे, के जब इहां के बड़का भगवान के बिहाव ह देवउठनी माने चातुर्मास सिराये के पहिली हो जाथे, त ए चातुर्मास के रिवाज ह हमर छत्तीसगढ़ के संस्कृति म कहाँ लागू होइस?
मोर तो ए कहना हे के छत्तीसगढ़ के संस्कृति म चातुर्मास के इही चारों महीना ल सबले जादा शुभ अउ पवित्र माने जाथे, काबर ते इही चारों महीना- सावन, भादो, कुंवार, कातिक म ही छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति के जम्मो बड़का परब मन आथें, जेमा हरेली ले लेके कातिक पुन्नी ले चालू होवइया मेला-मड़ई परब ह आथे।
अब एक अइसे बड़का तिहार के चरचा जेला पूरा देश म मनाए जाथे, फेर वोकर कारण अउ स्वरूप म बाहिर म अउ छत्तीसगढ़ म थोर-बहुत फरक होथे, वो तिहार आय होली। होली के बारे ए बात ल जानना जरूरी हे के छत्तीसगढ़ म एला 'काम दहन" के रूप म मनाए जाथे, जबकि देश के आने भाग म 'होलिका दहन" के सेती। होलिका दहन ल सिरिफ पाँच दिन के मनाए जाथे, जे ह फागुन पुन्नी ले लेके रंग पंचमी (चइत महीना के अंधियारी पाख के पंचमी) तक चलथे। छत्तीसगढ़ म जेन 'काम दहन" मनाए जाथे वोला चालीस दिन के मनाए जाथे- बसंत पंचमी (माघ महीना अंजोरी पाख के पंचमी) ले लेके फागुन पुन्नी तक।
बिल्कुल अइसने दंसरहा के बारे म जानना घलोक जरूरी हे। काबर के इहू परब ल छत्तीसगढ़ म अउ देश के आने भाग म अलग-अलग कारण के सेती मनाए जाथे। जिहाँ देश के आने भाग म एला 'रावण वध" के सेती मनाए जाथे, उहें छत्तीसगढ़ म 'विष हरण" माने 'दंस हरन" के रूप म मनाए जाथे। मोर पहिली के लेख मन म एकर विस्तार ले जानकारी हे.
अस्मिता के जब बात होथे त भाषा अउ इतिहास के बात घलोक होथे। काबर ते इहू मन अस्मिता माने 'चिन्हारी" के अंग आयं। जिहाँ तक भाषा के बात हे त हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा सन् 1885 म लिखे छत्तीसगढ़ी भाखा के व्याकरण संग एकर प्रकाशित रूप हमर आगू म हवय, जेला अब इहाँ के राज सरकार ह प्रदेश म 'राजभासा" के दरजा दे दिए हवय, फेर केन्द्र सरकार के माध्यम ले संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल करे के बुता ह अभी घलोक बाँचे हवय।
आज छत्तीसगढ़ी भाखा म हर विधा के अंतर्गत रचना करे जावत हे, अउ अच्छा रचना करे जावत हे, जेला राष्ट्रीय स्तर के आने भाखा के साहित्य मन संग तुलना करे जा सकथे। नवा पीढ़ी के रचनाकार मन म अच्छा उत्साह देखे जावत हे, जे मन ल इहां के पत्र-पत्रिका मन म प्रकाशन के अवसर घलोक अच्छा मिलत हे। सबले बढ़िया बात ये हे के इंटरनेट के आधुनिक तकनीक के प्रयोग घलोक ह छत्तीसगढ़ी भाखा ल देश-दुनिया के चारों खुंट म पहुंचावत हे। ए सबला देख के लागथे के छत्तीसगढ़ी के आने वाला बेरा ह चमकदार रइही।
आखिरी म इतिहास के घलोक खोंची भर बात हो जाय। काबर ते इहाँ जेन किसम के इतिहास लेखन होवत हे वोकर ले मैं भारी नराज हावंव। ए देखे म आवत हे के अधकचरा जानकारी रखने वाले मन इहां इतिहासकार अउ गुन्निक बनके सबला चौपट करत हवयं। संग म इहू देखे म आवत हवय के कुछ वर्ग विशेष के मनखे मन जानबूझ के आने वर्ग के लोगन मन के बड़े-बड़े कारज मन के घलोक उपेक्षा करत हें। एमा विश्वविद्यालय मनके भूमिका घलोक ह बने नइ लागत हे। भलुक ए कहना जादा ठीक होही के आँखी मूंद के पीएचडी के डिगरी ल बांटे जावत हे। ए सब दुखद हे। भरोसा हे के ईमानदार आँखी के माध्यम ले ये सबला नवा सिरा से देखे जाही।
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 98269-92811
Friday, 14 January 2022
हमन कवि आन...
हमन,
कवि आन साहेब
कागज-पातर ल रंगथन
अउ कलम ल बउरथन
कभू अंतस के गोठ
त कभू दुखहारी के रोग
कभू राजा के नियाव
ते कभू परजा पीरा
उनन-गुनन नहीं
कहि देथन सोझ.
एकरे सेती
कोनो कहि देथे जकला
कोनो बइहा
त कोनो आतंकी
या अलगाववादी
कभू-कभू
देश अउ समाजद्रोही
घलो
फेर दरपन के कहाँ दोस होथे
वो तो बस
जस के तस देखा देथे
ठउका कवि कस
आखिर दूनों के सुभाव तो
एकेच होथे.
-सुशील भोले-9826992811
छत्तीसगढ़ी काव्य.. खैरझिटिया-4
*छत्तीसगढ़ी काव्य सृजन मा महिला शक्ति*-
जे राज के आदिकालिन साहित्य के मुहतुर अहिमन रानी गाथा, केवला रानी गाथा, रेवा रानी गाथा, दसमत कयना गाथा आदि विदुषी महिला मन ले होथें, भला वो राज के नारी शक्ति मन काव्य सिरजन मा कइसे पिछवाय रहीं। साहित्य सृजन प्रसव पीड़ा कस होथे, अउ येला नारी शक्ति मन ले जादा भला कोन जान पाही, तभे तो आज नारी शक्ति मन घलो साहित्य सृजन मा अघवा हे। वइसे तो छत्तीसगढ़ी साहित्य के पहली बेर लिखित प्रमाण भक्ति काल मा मिलथे, ये काल मा धनी धरम दास जी मन काव्य सृजन करिन। संग मा उंखर धर्मपत्नी आमीन माता के छत्तीसगढ़ी मा काव्य सृजन के बात घलो सामने आथे। आजादी के पहली छत्तीसगढ़ी के काव्य सृजन मा नारी शक्ति मनके वर्णन नइ मिले, फेर आजादी के बाद छत्तीसगढ़ी साहित्य मा उन मन बढ़ चढ़ के साहित्य सृजन करत दिखथें। लगभग साठ, सत्तर के दशक मा महिला शक्ति मन छत्तीसगढ़ी साहित्य सृजन करे बर लग गे रिहिन।फेर छत्तीसगढ़ राज बने के बाद छत्तीसगढ़ी साहित्य मा नारी शक्ति के योगदान के का कहना। 2000 के बाद के काल ला उड़ान काल बनाये मा नारी शक्ति मनके घलो भरपूर योगदान हे। ये काल मा कवयित्री मन बढ़ चढ़ के छत्तीसगढ़ी भाँखा मा साहित्य सृजन करिन अउ अभो साहित्य सिरजाते हें। सन 1968 मा प्रकाशित छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "पतरेगी" ला छत्तीसगढ़ के पहली कविता संग्रह अउ ओखर रचयिता कवयित्री डॉ निरुपमा शर्मा ला छत्तीसगढ़ी के पहली महिला कवयित्री के रूप मा माने जाथें। इही समय शकुंतला शर्मा जी मन घलो काव्य सृजन करत रिहिन, उंखर प्रथम कृति "चंदा के छाँव मा ढाई आखर" प्रकाशित होइस। आजो सरलग छत्तीसगढ़ी भाषा मा अपन मन के उदगार ला डॉ निरुपमा शर्मा,शकुंतला शर्मा के संगे संग डाँ शकुंतला तरार, डॉ अनसुइया अग्रवाल, डॉ सत्यभामा आडिल, सरला शर्मा, डॉ शैल चन्द्रा, सुधा वर्मा,उर्मिला शुक्ला, तुलसीदेवी तिवारी,मृणालिका ओझा, आशा दुबे,दीप देवी दुर्गवी,रंजना शर्मा, डॉ गिरिजा शर्मा, अर्चना पाठक,इंद्रा परमार, संतोष झाँझी,वासंती वर्मा, गीता शर्मा, ज्योति गबेल, सुधा शर्मा,संध्या रानी शुक्ला, चन्द्रावती नागेश्वर, सन्तोषी महंत श्रद्धा, गीता साहू,आशा देशमुख, शोभामोहन श्रीवास्तव, शशि साहू,आशा ध्रुव,संध्या सरगम,आशा दुबे, चित्रा श्रीवास,गीता विश्वकर्मा, सुधा शर्मा,लक्ष्मी करियारे, रश्मि रामेश्वर गुप्ता,नीलम जायसवाल,चन्द्र वैष्णव,गीता देवी हिमधर,योगेश्वरी साहू,आशा भारद्वाज, अनिता सिंह, सुधा देवांगन, आशा मेहर, आशा आजाद, द्रौपती साहू सरसिज, इंद्राणी साहू साँची,सरस्वती चौहान,डाँ मीता अग्रवाल, पद्मा साहू पर्वणी,सुधा झा,उर्मिला देवी उर्मी, अनिता मंदिलवार,प्रभा साहू,पुनीता दरियाना, सुनीता कुर्रे, प्रतिभा प्रधान, चित्ररेखा तिवारी, रामकली कारे,सुजाता शुक्ला,सुमित्रा कामड़िया, केंवरा यदु मीरा, तुलेश्वरी धुरन्धर, शैल शर्मा, प्रिया देवांगन प्रियु, मेनका वर्मा, संगीता वर्मा, भारती राजपूत, निर्मला ब्राम्हणी,द्रौपती साहू, प्रियंका गुप्ता, मधुलिका दुबे,भारती पटेल,ममता राजपूत, सरिता लहरे,अनिता चन्द्राकर, जागृति बाघमार,सुखमोती चौहान,धनेश्वरी सोनी गुल, वसुंधरा पटेल, अन्नापूर्णा पवार,सुष्मा पटेल,हिमकल्याणी सिन्हा, कविता वर्मा,गीता चन्द्राकर, सुचि भुवि,जमुना देवी गढ़ेवाल,शैलेन्द्री परिहार,गीता दुबे आदि अउ कतको कवयित्री मन व्यक्त करत हें। आवन छत्तीसगढ़ी भाषा महतारी ला समर्पित नारी शक्ति मनके मन के उद्गार के एक बानगी देखिन-
*प्राकृतिक छटा मन मा नव उमंग भर देथे, उही ला डॉ निरुपमा शर्मा जी कहिथें*
मन मउरे मउहा महक मारे ना।
सुरता के हिरना डहक मारे राजा महक मारे ना
दोनु आंखी मा तोला मैं काजर बनाएवं
नदिल गेंदवा मा रे पिरोहिल बैठारेंव ।
एक एक बोली मा चहक मारेव मैना ……..
लाली चूरी टिकली रे लाले हे महाउर
मोहनी आंखी के हे कटारी आमा मउर
हुलकथे जीउ अधिआये डारे मैना......
*सरसी छन्द मा,गोस्वामी तुलसीदास जी ला भाव पुष्प अर्पित करत, शकुन्तला शर्मा जी लिखथें*-
आशा के प्रतीक ए तुलसी धरिस एक अभियान
राम - नाव के पाइस डोगा शकुन देख अउ जान ।
रामचरित आधार बनिस हे जाग शकुन तै आज
पय-डगरी जब मिल जाथे तव सुफल होय सब काज ।
जैसे सोच समझ फल तैसे चिंतन लै आकार
शुभ चिंतन के फल भी शुभ हे देख शकुन हर बार ।
तुलसी राज-धर्म समझाइस शकुन तोर अधिकार
धर्म - अर्थ चारों ला पा ले भवसागर कर पार ।
मनखे जनम बहुत दुर्लभ हे शकुन बात ला मान
धर्म गली मा चल तुलसी कस तै मत बन अनजान ।
तुलसी - बबा बताइस धरसा शकुन तहू पहिचान
अब दिन बूडत हावै नोनी झट के तंबू तान ।
*शिक्षा के अलख जगावत शकुन्तला तरार जी लिखथें*-
पढ़े बर चल दीदी
पढ़े बर चल बहिनी
पढ़े बर चल वो दाई
भाग ल हम अपन चमकाबो
पढ़े बर चल वो दीदी
आवो चल कमला तयं
अउ चल बिमला तयं रे...
मेटाबो अगियानता के अंधियारा ला
शिक्षा के जोत बारबो रे
नान्हे-नान्हे लईका चलव
बूढ़ी दाई काकी चलव रे...
नईं हम रहिबोन अब अनपढ़ वो
बिद्या के गंगा लानबो रे
बनी भूती हम जाबोन
ठिहा कमाये जाबोन...
दिन भर मिहनत ला हम करबोन
संझा पढ़े जाबों रे...
अब कोनो नई ठगही
अंगठा हम नई चेपावन रे...
रद्दा खुदे हम अपन गढ़ लेबोन
नवा निरमान करबो रे...
*कोरोनाकाल मा जनजागरण करत आशा देखमुख जी के एक समसामयिक शंकर छंद*
आये हावय कोरोना हा, लोगन बड़ डराय।
फइलत हवय महामारी कस,कोन कहाँ लुकाय।
संसो मा सरकार घलो हे,देत हें संदेश।
जनता ला मिलके लड़ना हे,भागय सबो क्लेश।
सावचेत हें देश प्रशासन ,कोनो झन डराव।
जागरूकता फ़इलावव सब ,सुरक्षा अपनाव।
साफ सफाई बहुत जरूरी,धोवत रहव हाथ।
मेल जोल से दूर रहव सब, देश हावय साथ।।
रूप धरे ईश्वर हा देखव,डॉक्टर वो कहाय।
कतको मन के प्राण ल देखव,सेवा कर बचाय।
जनता कर्फ्यू लगत हवय जी,लोग मानौ बात।
मर जाये दुष्टिन कोरोना ,मारव अबड़ लात।
*पतझड़ जे बाद बहार आथे, दुख के बाद सुख आथे, इही बात ला, घनाक्षरी मा बाँधत शोभामोहन श्रीवास्तव जी लिखथें*-
पाना पतझर मा झरे,आवय तभे बहार ।
दुख पाछू सुख हे लगे,लहुटे पहुटे बार ।।
लहुटे पहुटे बार चलत नर ,लाख जतन कर ।
सुख के चक्कर,दुखद गली धर,कतको मर मर।
छोड़ गाँव घर,कहूँ मेर टर,नइ छोंड़य डर ।
बेरा हे खर,बोलत झरझर, पाना पतझर ।।
*बरवै छंद मा, बढ़े मँहगाई ला देखत शशि साहू जी लिखथें*-
मुँह फारे मँहगाई, सुरसा ताय।
जतका होय कमाई,मुँह मा जाय।
सबो जिनिस हर मँहगी,दुरिहा होय।
काला खाँव बचावँव,जिनगी रोय।
बाई मारय ताना, नइ तो भाय ।
घानी कस मँय बइला रथो फँदाय।
चुहके आमा दिखथे काया मोर।
मँहगाई के आघू, खडे़ धपोर।
अजगर कस फुफकारे,मारय पेट।
सबो जिनिस के बाढे़ हावय रेट।
मँहगाई हर मारे, रोजे लात।
पीठ पेट हर सँघरा रोवय रात।
*अमृत ध्वनि छंदछ्न्द मा पद्मा साहू पर्वणी राखी तिहार बर लिखथें*-
राखी के पबरित परब, पुन्नी सावन मास।
भाई बहिनी के परब, दया मया के आस ।।
दया मया के, आस जगाथे, राखी धागा ।
बाँध कलाई, प्रीत बढ़ाथे, तब ये तागा।
माथे चंदन, तिलक लगाथे, दुनिया साखी।
बहिनी बाँधय, भाई ला जी, सुग्घर राखी।।
*वीर शहीद मनके सुरता करत सार छ्न्द मा चित्रा श्रीवास जी लिखथें*-
सुरता अब तुम करलव संगी,पावन दिन हा आगे ।
मिले रहिस आजादी हमला ,हमर भाग हा जागे।।
हाँसत झूलत फाँसी चढ़गे, खुदीराम बलिदानी ।
तिलक भगत अउ लक्ष्मी बाई,देइन हे कुर्बानी।।
बेटा भारत माता के सब ,हावन भाई भाई।
मिलजुल रहिबो जम्मो मनखे, होवन नही लड़ाई।।
*रक्तदान ला महादान कहिथें, उही ला बतावत रामकली कारे जी लिखथें*-
जग मा बढ़ के हे सुनौ, रक्त दान के दान।
बूॅद - बूॅद दे रक्त ले, बाॅचय मनखे प्रान।।
बाॅचय मनखे, प्रान रक्त दे, जस ला पावव।
नेक करम के, काम आज गा, कर देखावव।।
कली कहे सुन, मानवता भर, अपनो रग मा।
सबो दान ले, रक्त दान हा, बढ़ के जग मा।।
*मद्यपान निशेष के संदेश देवत सुधा शर्मा जी कज्जल छंद मा लिखथें*-
करत हवे जिनगी उजाड़।
टूटत सबो घर परिवार ।।
बाढ़त नशा अतियाचार।
हे समात मन मा विकार।।
गारी दाई बाप देत।
बोले के गा नहीं चेत।।
कोनो देवत गला रेत।
नशा सेती सबोअचेत।।
छोड़व गा सब नशा पान।
एमा ककरो नहीं मान।।
डहर बने रेंगव मितान।
बनके सबो रहव सुजान।।
जाँगर टूटत करे काम।
दारू भठ्ठी गये शाम।।
दिए कमाय पइसा फेंक।
लाँघन लइका घर म देख।।
*कुंडलियाँ छ्न्द मा गुरु वंदना करत नीलम जायसवाल जी लिखथें*-
गुरु के चरण पखार लव, मन ले देवव मान।
गुरु के किरपा ले बनय, मूरख हा गुणवान।।
मूरख हा गुणवान, चतुर की निरमल बनथे।
जेखर पर गुरु हाथ, उही आकाश म तनथे।।
जइसे गरमी घाम, छाँव निक लागे तरु के।
वइसे शीतल होय, बचन हा हरदम गुरु के।
*नवा शिक्षा के लाभ बतावत तातन्क छ्न्द मा आशा आजाद जी लिखथें*-
शिक्षा के अनमोल रतन ले,करलव मन उजियारा जी।
हर विपदा मा पार लगाही,मिट जाही अँधियारा जी।।
जम्मो कारज बन जाथे जी,तुरते हल मिल जाथे जी।
जेखर मन मा ज्ञान दीप हे,जिनगी भर सुख पाथे जी।।
वैज्ञानिक बन जाथे कतको,खोज करें आनी बानी।
जब मशीन नावा खोजे ता,तब कहलाथे ओ ज्ञानी।।
शिक्षा के तकनीक देखले,नव विधि आज पढ़ाये गा।
प्रोजेक्टर मा चित्र देख ले,सबला देख बताये गा।।
कम्यूटर मा सबो आँकड़ा,राख सुरक्षा दे जानौ।
जनम मरन के कागद लेले,सुग्घर सुविधा ला मानौ।।
*करिया बादर देख पुष्पलता भार्गव लिखथें*-
जा रे, जा रे,करिया बादर
जा के मुहूँ लुका रे ...
संगी के सुरता आथे
करौं में ह का रे...
तैं आथस त मन मा उठथे
पीरा बिजुरी जइसे ...
का हो जाथे तन अऊ मन ला
काहव में ह कइसे...
पानी मा तन ह जरगे,उठै गुंगुवा रे
जा रे,जा रे....
वो निर्मोही ,वो परदेसी
आए नहीं अब ले....
रद्दा देखत पखरा बनगे
आंखी मोरे कबले...
का जादू करके गे हे,वो टोनहा रे
*चेत धरे बर कहत द्रोपदी साहू सरसिज लिखथें*-
द्रोपती साहू "सरसिज"महासमुन्द, छत्तीसगढ़
का गरज परे हे दूसर के,
तिहीं तोर रद्दा ला चतवार।
चर देही हरहा मन खेती,
तिहीं अपन धनहा रखवार।।
पर भरोसा रहिबे झन तैं ,
जिनगी अपन तँय संवार।
चेत लगाके बुता करबे,
होबे झन गंजहा मतवार।।
चील जइसन नेत जमाए,
बइठे जइसे हे हितवार।
केकरा कस रेंगे दुनो कोति,
वो मन नो होय तोर लगवार।।
*बसंत पंचमी मा माँ वीवापानी ला भाव पुष्प अर्पित करत गायत्री श्रीवास जी लिखथें*-
सबके मन ला भागे संगी,सुग्घर मौसम आगे |
ये बसंत पंचमी सुहावन,मन मा आस समागे|
अवतार लिये माँ हंसवाहिनी,वाणी के देवइया हा |
श्वेत वस्त्र ला धारन करथे,मातु शारदा मइया हा ||
मिल-जुल के सब पूजा करबो,हमर भाग हा जागे
*जाड़ा के आरो देवत कावेरी साहू जी लिखथें*-
जाड़ के महिना आगे दाई,जुड़हा हवा चलत हे।
सर-सर धुँकी चलत हे,हाथ अउ गोड़ कँपत हे।।
दाँत हा अइसे कटरत हे,जइसे चना चबावत हे
जूड़ चीज तो छुवन नइ भावय,ताते तात खवाथे।
बासी ला तो दुरिहा रखदे,भाते भात सुहाथे।।
पुरवइया हा मारत रहिथे,करा बरोबर जनावत हे।
गली गली मा भुर्री बरथे ,लइका सब सकलाथे।
कथरी हा तो छोड़न न भाये,जाड़ा गजब सताथे।।
साल स्वेटर छुंटय नहीं अब,सुरुज घलो लजावत हे।
*मतगयंद सवैया मा सुधा देवांगन जी लिखथें*-
आगय पावन सावन मास ह,दूध दही म नहावय भोले।
जाप करें उपवास करें, सबके जिबिया शिवशंकर बोले।
देय बने वरदान ल शंकर, दुःख हरे जिनगी नइ डोले
पीर सबो जन के हरके, शिव नाम दबे सुख भाग ल खोले।
*उपसंहार*-
छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य मा सबले जादा यदि कोनो विधा मा लिखे गेहे ता वो काव्य विधा आय। कवि मनके संख्या घलो दिन ब दिन बाढ़त दिखत हे। आज छत्तीसगढ़ मा अतेक कवि हे, जिंखर रचना अउ नाम के जिक्र कर पाना मुश्किल हे, तभो लेख मा कुछ कवि मनके नाम संघेरे के प्रयास करे हँव, उंखर नाम ला सोसल मीडिया या अन्य उपब्धत पुस्तक या फेर कोनो पत्र पत्रिका पेज मा खोज करके,पूरा जानकारी लिये जा सकथे। उदाहरण स्वरूप दिये गय कुछ पंक्ति वो कवि अउ वो काल ला पूरा के पूरा बयां करे मा घलो असक्षम हे, तभो एक बागनी देय के प्रयास होय हे। आधुनिक काल के ज्यादातर कवि मन सोशलमीडिया मा जुड़े हे, उंखर रचना मन घलो फेसबुक, वॉट्सप मा दिख जथे, उंखर मनके चाहे तो नाम खोज के पढ़े जा सकत हे, बस अतेक नाम देय के अतके कारण हे। संगे संग एक कारण यहू हे कि वो कवि मन कोन काल मा रचना लिखिन या लिखत हे। काल विशेष मा संरेखाय कवि मनके नाम घलो आघु पाछु हो सकत हे, जइसे आजादी के
पहली के कवि मन आजादी के बाद घलो लिखिन, अउ आजादी के बाद के कवि मन छत्तीसगढ़ राज निर्माण के बाद लिखत रिहिन अउ कतको लिखते हें।
पर मुख्य बात तो आधुनिक काव्य के दशा दिशा ऊपर बात करना रिहिस, आलेख मा सँरेखाय काव्य पंक्ति एक उदाहरण मात्र हे, जे वो समय ला ज्यादातर परिभाषित करत दिखिन, चाहे बात आदि काल के होय, या आधुनिक काल के। रचना के विषय वस्तु ही वो समय ला देखाथे, आधुनिक काल के समसायिक रचना जइसे कोरोना महामारी, महँगाई, बेमौसम बारिश, चन्द्रयान, शौचालय, चुनाव,धान खरीदी, मोबाइल, प्लास्टिक कचरा,नवा नवा यन्त्र औजार आदि समाज मा चलत वस्तु स्थिति के परिचय देवत दिखथे। नदी, पहाड़, धरती, पाताल, राम कृष्ण , दया मया मीत आदि सब, आदि काल मा घलो रिहिस अउ आजो यथावत हे, ता स्वभाविक हे आजो येमा रचना होही अउ होवत घलो हे। फेर वो समय मोबाइल, शौचालय, चन्द्रयान आदि कई चीज नइ रिहिस ता नइ होइस। केहे के मतलब कवि के लेखन मा धरातल मा घटत विषय वस्तु के छाप रहिथे। आज आधुनिक काल के रचना ये काल ला दर्पण कस देखाय, एखर बर कवि मन ला समाज मा चलत चीज ला विषय वस्तु बनाके लिखना चाही, ताकि अवइया पीढी मन ये युग ला पढ़ के देख सके। 2000 के बाद के काल ला उड़ान काल केहे के मोर आशय ये हे, कि ये काल के कुछ दशक बाद कवि मनके संख्या अउ काव्य लेखन मा गजब के बढ़ोतरी होइस हे। *"आधुनिक युग के साहित्य मा पंख लग गेहे"* भाषाविद मन आधुनिक काल मा साहित्य के बढ़वार देख अइसन कहत नइ थके। फेर पंख हे ता उड़ान तो दिखबे करही। आज साहित्य मा उड़ान देखते बनत हे। आज हजारों कवि कवयित्री मन छत्तीसगढ़ी काव्य के सृजन मा सरलग लगे हें। छ्न्द के छ के आय के बाद सन 2016 मा उड़ान भरत नव कलमकार मन ला *छ्न्द के छ नामक* एक माँजा डोर मिलिस, जे उन मन ला साहित्य के जमीन मा बाँधे रखिस, जेखर परिणाम स्वरूप आज छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य महतारी भाषा के अन्तस् मा बंधाये ऊँच आगास मा उड़त दिखत हे। यदि ये आंदोलन नइ रहितिस तभो ये काल उड़ान काल हो जतिस, काबर कि नव कलमकार मा साहित्य ला उड़ाय छोड़ खुदे मन के लिखत उड़ित रिहिन। आजो हवाई यात्रा सबले महँगा हे, फेर ओखर उड़े अउ उतरे के ठौर ठिकाना,तिथि बार हे तब।
जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)