कब खुलबे जी आचारसंहिता
तोर सेती होगे जिनगी बिरथा
कोनो काम सिध नइ पर पाय
कहूं जाबे ते तोरे छेंका बताय
जइसे गांधीबबा के तीन बेंदरा
देखय न बोलय कान घलो भैरा
सुशील भोले 😊
Friday, 17 May 2019
कब खुलबे आचारसंहिता..
Wednesday, 15 May 2019
कबीर जयंती की शुभकामनाएं..
कबीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ....
संसारभर में भारत की भूमि ही तपोभूमि (तपोवन) के नाम से विख्यात है। यहाँ अनेक संत, महात्मा और पीर-पैगम्बरों ने जन्म लिया। सभी ने भाईचारे, प्रेम और सद्भावना का संदेश दिया है। इन्हीं संतों में से एक संत कबीरदासजी भी हुए हैं। इनका जन्म संवत् 1455 की ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था। इसीलिए ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा के दिन देश भर में कबीर जयंती मनाई जाती है।
महात्मा कबीर समाज में फैले आडम्बरों के सख्त विरोधी थे। उन्होंने लोगों को एकता के सूत्र का पाठ पढ़ाया। वे लेखक और कवि थे। उनके दोहे इंसान को जीवन की नई प्रेरणा देते थे। कबीर ने जिस भाषा में लिखा, वह लोक प्रचलित तथा सरल थी। उन्होंने विधिवत शिक्षा नहीं ग्रहण की थी, इसके बावजूद वे दिव्य प्रभाव के धनी थे।
कबीरदासजी को हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही संप्रदायों में बराबर का सम्मान प्राप्त था। दोनों संप्रदाय के लोग उनके अनुयायी थे। यही कारण था कि उनकी मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से।
किंतु इसी छीना-झपटी में जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा। यह कबीरजी की ओर से दिया गया बड़ा ही सशक्त संदेश था कि इंसान को फूलों की तरह होना चाहिए- सभी धर्मों के लिए एक जैसा भाव रखने वाले, सभी को स्वीकार्य।
बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने तथा अपनी-अपनी रीति से उनका अंतिम संस्कार किया। ऐसे थे कबीर।
आइए उस महान विभूति को उनकी जयंती पर नमन करें।
-सुशील भोले
व्हा.9826992811
बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएं..
बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ....
वेसक (पालि: वेसाख, संस्कृत: वैशाख) एक उत्सव है जो विश्व भर के बौद्धों एवं अधिकांश हिन्दुओं द्वारा मनाया जाता है। यह उत्सव बुद्धपूर्णिमा को मनाया जाता है जिस दिन गौतम बुद्ध का जन्म और निर्वाण हुआ था तथा इसी दिन उन्हें बोधि की प्राप्ति हुई थी। विभिन्न देशों के पंचांग के अनुसार बुद्धपूर्णिमा अलग-अलग दिन पड़ता है। विभिन्न देशों में इस पर्व के अलग-अलग नाम हैं। उदाहरण के लिए, हांग कांग में इसे बुद्ध जन्मदिवस कहा जाता है, इण्डोनेशिया में 'वैसक' दिन कहते हैं, सिंगापुर में 'वेसक दिवस' और थाइलैण्ड में 'वैशाख बुच्छ दिन' कहते हैं।
-सुशील भोले
Wednesday, 1 May 2019
कमरछठ और महुआ का उपयोग
कमरछठ और महुआ का उपयोग?
कार्तिकेय जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने वाला पर्व "कमरछठ" को बलराम जयंती के रूप में "हलषष्ठी" कहकर प्रचारित किया जाना कितना तर्क संगत और सत्य है? इस पर विचार किया जाना आवश्यक लगता है।
मेरे द्वारा पूर्व में किये गये पोस्ट (लेख) में संस्कृत भाषा के "कुमार षष्ठ" शब्द को छत्तीसगढ़ी अपभ्रंश के रूप में "कमरछठ" बनना बताया गया था। इस पर अनेक मित्रों ने इसकी सत्यता पर प्रश्न किया था।
मित्रों, यहां की मूल संस्कृति, जिसे मैं "आदि धर्म" कहता हूं, शिव परिवार पर आधारित संस्कृति है। इसीलिए यहां के हर एक पर्व का संबंध किसी न किसी रूप में शिव और उनके परिवार पर आधारित होता है।
आप सभी जानते हैं, कि यहां के मूल निवासियों के जीवन में "महुआ" का कितना महत्व है? जन्म से लेकर मृत्यु तक यह (महुआ) इनके जीवन का अनिवार्य अंग है। तब आपको क्या लगता है, कि जिस "कमरछठ" पर्व में महुआ पत्ते की पतरी, महुआ डंगाल का दातून और पसहर को पकाने (खोने) के लिए चमचा (करछुल) के रूप में महुआ-डंगाल का उपयोग और सबसे बड़ी बात, इसकी पूजा में चढ़ाए जाने वाले प्रसाद में (लाई के साथ) सूखे हुए महुए के फूल उपयोग में लाया जाता है, वह "आदि संस्कृति" के बजाए किसी अन्य संस्कृति का अंग होगा?
मित्रों, यह़ा के मूल धर्म और संस्कृति के ऊपर मनगढंत किस्सा-कहानी गढ़कर जिस तरह भ्रमित किया जा रहा है, बहुत चिंतनीय है। हमारी मूल पहचान को समाप्त करने के लिए सैकड़ों वर्षों से षडयंत्र रचा जा रहा है। बहुत जरूरी है, कि हम अपनी संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन के नेतृत्व का ध्वज अपने हाथों में धारण करें। आइए "आदि धर्म जागृति संस्थान" के मिशनरी कार्य में हाथ से हाथ मिलाकर जुड़़े।
-सुशील भोले -9826992811
पोरा: नंदीश्वर जन्मोत्सव
पोरा : नंदीश्वर जन्मोत्सव..
भाद्रपद अमावस्या को भगवान शिव के सबसे प्रिय भक्त, सेवक और सवारी नंदीश्वर का जन्मोत्सव पूरे छत्तीसगढ़ में पोरा पर्व के रूप में धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।
पोरा पर्व के अवसर पर मिट्टी से बने नंदी की पारंपरिक व्यंजनों का भोग लगाकर पूजा की जाती है। बच्चे इस दिन मिट्टी से बने नंदी (बैल) को खिलौनों के रूप में खेलते भी हैं। इस अवसर पर बैल दौड़ का आयोजन भी किया जाता है।
ज्ञात रहे कि छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति, जिसे मैं आदि धर्म कहता हूं, वह सृष्टिकाल की संस्कृति है। युग निर्धारण की दृष्टि से कहें तो सतयुग की संस्कृति है, और यह किसी न किसी दृष्टि से अध्यात्म पर आधारित है। इसकी अपनी स्वयं की पूजा और उपासना की विधि है, जुवन पद्धती है, जिसे उसके मूल रूप में लोगों को समझाने और सिखाने के लिए हमें फिर से सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है, क्योंकि कुछ लोग यहां के मूल धर्म और संस्कृति को अन्य प्रदेशों से लाये गये ग्रंथों और संस्कृति के साथ घालमेल कर लिखने और हमारी मूल पहचान को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।
मित्रों, सतयुग की यह गौरवशाली संस्कृति आज की तारीख में केवल छत्तीसगढ़ में ही जीवित रह गई है, उसे भी गलत-सलत व्याख्याओं के साथ जोड़कर भ्रमित किया जा रहा। मैं चाहता हूं कि मेरे इसे इसके मूल रूप में पुर्नप्रचारित करने के इस सद्प्रयास में आप सब सहभागी बनें...।
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 098269-92811
पहिली सुमरनी तोर गजानन
पहिली सुमरनी तोर...
हमर इहां के परब-तिहार मन म भादो महीना के अड़बड़ महात्तम हे। ए महीना ल शिव-पार्षद मन के महीना कहे जाथे काबर के भगवान शिव के तीन प्रमुख पार्षद या गण मन के उत्पत्ति ये भादो महीना म होए हे। भादो के अंधयारी पाख के छठ तिथि म स्वामी कार्तिकेय के जनम जेला इहां कमरछठ के रूप म मनाये जाथे। भादो अमावस्या के नंदीश्वर के जनम जेला इहां पोरा के रूप म मनाये जाथे, अउ भादो अंजोरी पाख के चउथ तिथि के गणनायक गणेश के जनम होये हे। एकरे सेती ए तिथि ले पूरा दस दिन तक उत्सव के रूप म मनाए जाथे।
उपलब्ध ग्रंथ मन के पढ़े ले अइसे जानबा मिलथे के गनेस के उत्पत्ति माता पारवती ह अपन सरीर के मइल ले करे हे। एक पइत उन घर म अकेल्ला रहिन हें त नहाए के बेरा घर के पहरादारी करे खातिर एक गण (सेवक) के आवश्यकता परीस। एकरे सेती उन अपन सरीर के मइल ले एक ठन मुरती बना के वोमा जीव के संचार कर दिस अउ वोला अस्त-शस्त्र धरा के घर के दरवाजा म खड़ा करके नहाए ले चल दिस। अतके म भगवान शंकर आइन। तब गनेस वोला घर भीतर खुसरन नइ दिस। भोलेनाथ वोला अब्बड़ समझाइस- बुझाइस, लइका आय कहिके भुलवारीस-चुचकारीस अउ डेरवाइस घलोक। फेर गनेस मानबे नइ करीस भलुक वोकर संग लड़े-झगरे ले धर लेइस त रिस के मारे शंकर जी ह गनेस के टोटच ल काट दिस अउ घर भीतर खुसरगे।
पारवती जब नहा-धो के बाहिर निकलीस त भोलेनाथ ल ठाढ़े पाइस। वो ह अकचकाके पूछथे तुमन ल दरवाजा म कोनो छेंकीस नहींं का? भोलेनाथ कहिन- एक झन उतलइन लइका छेंकत रिहीसे फेर मैं वोला मार के भीतर आगेंव। अतका म पारवती ह गनेस के कटे मुड़ ल धर के रोए लागीस अउ वोला जीयाए खातिर गोहराए लागीस। आखिर म भोलेनाथ ल वतकेच जुवर मरे एकठन हाथी के मुड़ी ल मंगवा के गनेस के सरीर म जोर के वोमा जीवन के संचार करे बर लागीस। अइसे किसम गनेस ल एक नवा सिर अउ नवा नांव मिलिस-गजानन। गनेस जी अपन जन्म काल ले ही बड़ गुनीक अउ विद्धान रिहीसे तेकरे सेथी जब वोकर अउ स्वामी कार्तिकेय के बीच पृथ्वी के परिक्रमा करे के बात उठिस त वो अपन माता-पिता के परिक्रमा कर के उंकर आगू म हाथ जोड़ के बइठगे। स्वामी कार्तिकेय जब मयूर म बइठे-बइठे पृथ्वी के परिक्रमा करके आइस अउ गनेस ल माता-पिता के आगू हाथ जोड़ के बइठे देखिस त ये सोच के खुश होगे के शर्त के मुताबिक प्रथम पूज्य के अधिकार अब वोला मिल जाही काबर ते गनेस तो पृथ्वी के परिक्रमा करेच नइए। फेर जब गनेस ह अपने तर्क शक्ति द्वारा ए बात ल साबित करीस के माता-पिता के परिक्रमा ह पृथ्वी के परिक्रमा के समान होथे अउ वोला तो मैं ह कब के कर डरे हौं, त भगवान भोलेनाथ वोला समस्त देवमंडल म प्रथम पूज्य के अधिकार (वरदार) दे दिस।
अउ संग म जतका भी गण-पार्षद (सेवक) रिहिस हे तेकर मन के मुखिया बना दिस। एकरे सेती उनला विघ्न विनाशक के संगे-संग गणनायक माने गण मनके मुखिया घलोक कहे जाथे। सही बात आय ज्ञान ह हमेशा श्रेष्ठ होथे, बड़े होथे। तर्क अउ विवेक के द्वारा ही जम्मो किसम के संकट या विघ्न ले उबरे जा सकथे। भगवान गनेस ल एकरे सेती विघ्न विनाशक कहे जाथे, काबर के उन अपन ज्ञान अउ तर्क शक्ति के द्वारा जम्मो किसम के विघ्न-बाधा मन ले मुक्ति देवाथे।
भगवान गनेस के जन्मोत्सव ल पूरा देस के संगे-संग अब हमर छत्तीसगढ़ म घलो पूरा दस दिन तक पूरा उल्लास के साथ मनाए जाथे। जगा-जगा पंडाल बनाके उंकर प्रतिमा स्थापित करे जाथे। रोज संझा-बिहनिया उंकर पूजा करे जाथे अउ कई किसम के सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन करे जाथे। भारत म प्रारंभ होए स्वतंत्रता आंदोलन म घलोक गनेस के सार्वजनिक पूजा के बड़का योगदान हे। एकर बहाना पूरा पारा-मोहल्ला के मनखे एक जगा सकलावंय अउ भगवत चरचा के संगे-संग देस के आजादी के चरचा घलोक करंय। अब तो सहर के संगे-संग गांव-गंवई म घलोक बड़े-बड़े प्रतिमा के स्थापना ए अवसर म करे जाथे। कतकों अकन सामाजिक अउ सांस्कृतिक संस्था मन गनेस उत्सव के स्थल सजावट अउ अनंत चौदस के बाद निकलने वाला विसर्जन झांकी के सजावट ऊपर ईनाम घलोक देथें।
- सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 098269-92811
पुरखा मन के सुरता के परब पितर पाख
पुरखा मन के सुरता के परब..* पितर-पाख*
हमर संस्कृति म देवी-देवता मन के सुरता अउ पूजा-पाठ करे के संगे-संग अपन पुरखा मनला घलोक सुरता करे अउ श्रद्धा के साथ जल तरपन करे के रिवाज हे, जेला हमर इहां पितर पाख के नांव ले जाने जाथे। पितर पाख ल कुंवार महीना के अंधियारी पाख म मनाए जाथे। लगते कुंवार के पितर बइसकी होथे जेन ह अमावस्या के पितर-खेदा के संग पूरा होथे।
पितर पाख म अपन पुरखा मन के कम से कम तीन पीढ़ी के सुरता करे जाथे। एमा जेन तिथि म वोकर मन के स्वर्गवास होए रहिथे। तेनेच तिथि म उंकर नांव ले विशेष रूप ले जल अरपन करके चीला, बोबरा, बरा आदि के भोग लगाए जाथे। फेर माई लोगिन मनला पहिली बछर तो ओकर स्वर्गवास के तिथि म पितर मिलाय के नेंग ल करे जाथे, वोकर बाद फेर सिरिफ नवमीं तिथि म उंकर तरपन कर दिए जाथे। माने नवमी तिथि ह जम्मो महिला मन के पितर-तिथि कहे जा सकथे।
पितर पाख के लगते माई लोगिन मन घर के दुवारी ल बने गोबर म लीप के वोमा चउंक, रंगोली आदि बनाथें अउ फूल चढ़ा के सजाथें। वोकर पाछू उरिद दार के बरा बनाथें जेमा नून नइ डारे जाय। संग म बोबरा, गुरहा चीला आदि घलोक बनाए जाथे अउ साग के रूप म तरोई ल आरुग तेल म छउंके जाथे। ए जानबा राहय के ए पाख म तरोई के विशेष महत्व होथे। घर के दरवाजा म जेन गोबर लीप के चउंक पूरे जाथे वोमा आने फूल मन के संगे-संग तरोई के फूल घलोक चढ़ाए जाथे। वइसने साग तो सिरिफ तरोई ल तेल म छउंक के दिए जाथे अउ पितर मनला जेन जगा हूम-धूप अउ बरा-बोबरा दिए जाथे उहू ल तरोई के पान म रख के दिए जाथे। अइसे मानता हे के तरोई तारने वाला जिनीस आय काबर ते ये शब्द के उत्पत्ति तारन ले तरोई होए हे। वइसे तरोई ह पाचक अउ स्वादिष्ट होथे जेमा अनेकों किसम के पुस्टई होथे फेर बने नरम-नरम घलोक होथे, जेला भोभला डोकरा-डोकरी मन आसानी के साथ पगुरा के लील डारथें। आखिर पितर मन ला तो हमन उहिच रूप म सुरता करथन न।
वइसे तो अपन पुरखा मन के कई पीढ़ी तक के सुरता अउ तरपन करना चाही फेर जे मन अइसन करे म अपन आप ल सक्षम नइ पावंय वोमन पितर पाख म गया जी (बिहार राज्य) म जाके उंकर तरपन करके हर बछर के सुरता अउ तरपन ले मुकति पा जथें। अइसे मानता हे के जेकर मन के तरपन ल पितर पाख म गया जी म कर दिए जाथे वोमन ल मोक्ष प्राप्त हो जाथे, वोकर बाद फेर वोकर मन के तरपन करना जरूरी नइ राहय। वइसे जेकर मन के श्रद्धा अउ सामरथ हे वोमन अपन पुरखा मन के सुरता अउ तरपन गया जी म तरपन करे के बाद घलोक कर सकथें। एमा कोनो किसम के बंधन या दोस नइ माने जाय। तरपन देवइया मनला जल-अरपन करे के बेर उत्ती मुड़ा म मुंह करके जल अरपन करना चाही अउ ए बखत अपन खांध म सादा रंग के कांचा कपड़ा पंछा आदि घलोक रखना चाही।
सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 098269-92811