Thursday, 10 September 2020

काव्योपाध्याय हीरालाल चन्नाहू...

11 सितम्बर स्मरण दिवस....
छत्तीसगढ़ी के प्रथम व्याकराणाचार्य - काव्योपाध्याय हीरालाल चन्नाहू

छत्तीसगढ़ में 2004 में राज्य सरकार ने राजभाषा का दर्जा दिया तो उसकी विकास यात्रा को नई गति मिली। छत्तीसगढ़ी भाषा में लेखन और प्रकाशन में बढ़ोत्तरी हुई लोकभाषा छत्तीसगढ़ी को राजभाषा के सिंहासन तक पहुंचाने में अनेक विद्वानों ने लम्बे समय तक साधना की। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा और डॉ. शंकर शेष ने छत्तीसगढ़ी के भाषा वैज्ञानिक अध्ययन पर महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. रमेश चंद्र मेहरोत्रा ने छत्तीसगढ़ी को भाषा के रूप में स्थापित करने में काफी योगदान दिया। पंडित लोचन वे प्रसाद पांडेय और पद्मश्री पंडित मुकुटधर पांडेय ने छत्तीसगढ़ी को समृद्ध बनाने के लिए उसमें श्रेष्ठ रचनाएं लिखी और विश्व विख्यात ग्रंथों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया।
छत्तीसगढ़ में जो राजभाषा बनाने अथवा पूर्ण भाषा के रूप में स्वीकार करने जब चर्चा तक नहीं थी तब छत्तीसगढ़ के एक महान सपूत श्री हीरालाल ने छत्तीसगढ़ी के व्याकरण की रचना कर दी थी। यह कितना महत्वपूर्ण ग्रंथ था इसका अनुमान इस तथ्य से लगता है कि उसका अंग्रेजी में अनुवाद सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने किया। श्री हीरालाल को उनके योगदान के लिए अपने समय की प्रसिद्ध उपाधि काव्योपाध्याय प्रदान की गई। श्री हीरालाल का जन्म 1856 ईस्वी में रायपुर में हुआ। आपके पिता श्री बालाराम एक व्यापारी थे। चंद्रनाहू कुर्मी समाज में उनका बड़ा सम्मान था। श्री बालाराम के आठ बच्चों में हीरालाल सबसे बड़े थे श्री हीरालाल के घर का वातावरण पवित्र था। माता जी बड़ी धर्मपरायण थीं। बचपन से ही हीरालाल में पढ़ने की लगन थी आपने 1874 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। अगले ही वर्ष उन्हें रायपुर के जिला स्कूल में सहायक शिक्षक की नियुक्ति मिल गई।
पढ़ाने के साथ ही उन्हें पढ़ने में भी बहुत आनंद आता था। छत्तीसगढ़ी तो उनकी मां बोली थी उन्होंने अंग्रेजी, संस्कृत, उड़िया, गुजराती, बंगाली, मराठी, उर्दू आदि भाषाओं का गंभीर अध्ययन किया। रायपुर और फिर बिलासपुर में अध्ययन करने के बाद श्री हीरालाल धमतरी के एंग्लो वर्नाकुलर टाउन स्कूल में प्रधानाध्यापक हो गये। धमतरी में उन्होंने स्थायी रूप से रहने का मन बना लिया। प्रधान पाठक वह 1882 में हो गये थे। पढ़ने-पढ़ाने के साथ ही वे धमतरी के सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी सक्रिय रहते थे, वे श्रेष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता थे, जिससे उन्हें बहुत प्रतिष्ठा मिली। वे धमतरी नगरपालिका के अध्यक्ष भी रहे।
छत्तीसगढ़ी के व्याकरण की रचना का कार्य उन्होंने 1881 में शुरु किया, जिसे 1885 में उन्होंने पूरा कर लिया। प्रसिद्ध लेखक और इतिहासकार पंडित लोचन प्रसाद पांडेय ने इस व्याकरण पर एक महत्वपूर्ण लेख लिखा। प्रसिद्ध भाषाविद सर जार्ज ग्रिर्यसन ने उसका अंग्रेजी में अनुवाद किया और उसे ‘जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ’ बंगाल में प्रकाशन के लिए भेजा। सन् 1890 में उसका प्रकाशन हुआ तो श्री हीरालाल की गिनती देश के प्रमुख व्याकरण शास्त्रियों में होने लगी। पंडित लोचन प्रसाद पांडेय ने लिखा कि सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने इस व्याकरण की जी खोल कर प्रशंसा की। श्री पांडेय ने अपने लेख में कहा, ‘हीरालाल जी अध्ययनशील स्वभाव के। वे अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे श्रेष्ठ भाषाशास्त्री थे। सन् 1885 में बंगाल अकादमी ऑफ म्यूजिक के महाराजा सर सुरेंद्र मोहन ठाकुर ने उन्हें नवकांड दुर्गायन के लेखन के लिए काव्योपाध्याय की पद्वी प्रदान की। छत्तीसगढ़ी उन्हें छत्तीसगढ़ के प्रथम वैयाकरणी के रूप में सदैव याद रखेगा।’
सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने श्री हीरालाल के छत्तीसगढ़ी व्याकरण का अंग्रेजी में अनुदित उपन्यास दो खंडों में प्रकाशित कराया तो हीरालाल जी का यश तो चारों तरफ फैला ही, स्वयं उनमें भी एक नया आत्मविश्वास जाग उठा। वह लेखन के कार्य को अधिक गंभीरता से लेने लगे। वे गीत एवं कविताएं भी लिखते थे। सन् 1881 में उनकी पुस्तक ‘शाला गीत चंद्रिका’ लखनऊ के नवल किशोर प्रेस ने प्रकाशित किया। हिंदी के अनेक साहित्यकारों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। लेखन में उनकी रूचि बढ़ती गई। दोनों की शैली में श्री हीरालाल ने दुर्गा सप्तशती का रूपांतरण किया। इस धार्मिक पुस्तक का नाम उन्होंने 'दुर्गायन' रखा। काव्योपाध्याय सम्मान उन्हें इसी काव्य कृति पर मिला था। उन दिनों बंगाल कला, साहित्य एवं संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र था। बंगाल का विद्वत समाज सहज ही किसी से प्रभावित नहीं होता था। बहुत सूक्ष्म परीक्षण के पश्चात् ही वह किसी लेखक तथा उसकी पुस्तक को मान्यता देता था।
‘दुर्गायन’ के प्रकाशन के बाद बंगाल संगीत अकादमी, जो ‘बंगाल अकादमी ऑफ म्यूजिक’ के नाम से दूर-दूर तक विख्यात थी ने एक भव्य सम्मान समारोह आयोजित किया, राजा सुरेंद्र मोहन ठाकुर की पहल पर उसमें श्री हीरालाल को आमंत्रित करके उनका अभिनंदन किया था। ग्यारह सितम्बर, 1884 में आयोजित उस ऐतिहासिक समारोह में उन्हें एक स्वर्ण पदक सहित काव्योपाध्याय की उपाधि प्रदान की गई।
श्री हीरालाल सार्वजनिक जीवन भेंट लेखन दोनों में इतने सक्रिय रहने लगे कि अपने स्वास्थ्य की देखभाल का समय नहीं निकाल पाते थे। वे धमतरी की डिस्पैंसरी कमेटी के सभापति के रूप में नागरिकों के स्वास्थ्य को तो पूरा ध्यान रखते, परंतु अपने शरीर के प्रति असावधान होते गाय। परिणाम यह हुआ कि उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। परंतु उस स्थिति में भी लिखने-पढ़ने के कार्य को उन्होंने जारी रखा। बीमारी की हालत में ही उनकी तीसरी पुस्तक ‘गीत रसिक’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। इसके बाद उनकी दो और पुस्तकें ‘अंग्रेजी रायल रीडर खंड-1 और अंग्रेज रायल रीडर खण्ड-दो’ प्रकाशित हुई। ये मुख्यतः विद्यार्थियों के लिए उपयोग पुस्तकें थीं।
श्री हीरालाल बड़े दयालु और परोपकारी थे। दीन-दुखियों की बहुत सहायता करते थे। दुर्भाग्य से उनका पारिवारिक जीवन सुखी न रहा। उनके दो विवाह हुए परंतु दोनों ही पत्नियां अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकीं। दोनों में किसी के भी कोई संतान नहीं हुई, इसलिए हीरालाल जी संतान-सुख से वंचित रहे। परंतु अपने निजी जीवन के अभाव से वह कभी दुखी नहीं रहे। एक बड़े समाज को वे अपना परिवार मानते थे। इस विशाल परिवार के बच्चे-बच्चियों को अच्छी शिक्षा देने उनके स्वास्थ्य की देखभाल में वह काफी समय दिया करते थे।
श्री हीरालाल आशुकवि थे। किसी भी विषय पर तत्काल कविता कह देते थे। छत्तीसगढ़ के अन्य महापुरुष पिंगलाचार्य जगन्नाथ प्रसाद भानु उनके प्रशंसक थे। भानु जी का कहना था कि श्री हीरालाल चलते- बड़ी सहजता के साथ काव्य रचना कर लेते हैं। हिंदी और छत्तीसगढ़ी के श्रेष्ठ कवि, इतिहासकार और पत्रकार श्री हरि ठाकुर ने अपनी पुस्तक 'छत्तीसगढ़ के रत्न' में काव्योपाध्याय श्री हीरालाल के जीवन एवं लेखन पर विस्तार से प्रकाश डाला है। श्री ठाकुर के अनुसार हीरालाल जी कुछ कविताओं का इतालवी भाषा में अनुवाद हुआ था उनकी अंतिम और प्रसिद्ध पुस्तक 'छत्तीसगढ़ व्याकरण' और उसके लेखक की प्रशंसा करते हुए श्री ग्रिर्यसन ने लिखा, ‘‘मैं श्री हीरालाल को गिने-चुने विद्वतजनों की मंडली के एक महत्वपूर्ण सदस्य की मान्यता देता हूं। आप जैसे विद्वान अपने समय एवं क्षेत्र की दो गंभीर एवं प्रामाणिक जानकारी देते हैं उसी के आधार पर ज्ञान का संचय होता है। भारत की विभिन्न भाषाओं के राष्ट्रीय सर्वेक्षण का कार्य इन्हीं विद्वानों के योगदान से संपन्न हो पाता है। इन्हीं के माध्यम से प्राप्त ज्ञान से हम भारत की भिन्न-भिन्न भाषाओं के पारस्परिक संबंधों को जान पाने में समर्थ होते हैं।’’
श्री हीरालाल काव्योपाध्याय संगीत एवं गणित के भी श्रेष्ठ जानकार थे। उनकी बहुमुखी प्रतिभा से ज्ञान के क्षेत्र को बहुत बड़े योगदान की अपेक्षा थी। परंतु उदर रोग से पीड़ित होने के कारण उनकी जीवन शक्ति क्षीण होने लगी। उनकी इच्छा शक्ति तो प्रबल थी, परंतु शरीर साथ छोड़ता जा रहा था।
वे संगीत और गणित पर महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखना चाहते थे,परंतु छत्तीसगढ़ी व्याकरण के बाद वे और कोई पुस्तक नहीं लिख सके, अक्टूबर 1890 में मात्र 44 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी के श्रेष्ठ कवि तथा इतिहासकार पंडित लोचन प्रसाद पांडेय ने उनके द्वारा लिखित और जॉर्ज ग्रियर्सन द्वारा अंग्रेजी में अनूदित 'छत्तीसगढ़ी व्याकरण' का परिवर्धन करके उनके प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया। श्री हीरालाल काव्योपाध्याय के व्याकरण से प्रेरणा लेकर अनेक भाषा शास्त्रियों ने उसके कार्य को विस्तार दिया। डॉ. नरेंद्र देव वर्मा ने छत्तीसगढ़ी को लोकभाषा से एक भारतीय भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए 'छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्वविकास' ग्रंथ की रचना की। इतिहासकार डॉ. प्रभुलाल मिश्रा और डॉ. रमेंद्र नाथ मिश्रा ने सर जॉर्ज ग्रियर्सन तथा श्री हीरालाल काव्योपाध्याय के योगदान पर आधारित एक विस्तृत पुस्तक तैयार की है।
-रमेश नैयर

Sunday, 30 August 2020

नवा खाई परब....

नवाखाई परब...
अपन मेहनत ले उपजाए खरीफ फसल ल अपन ईष्ट देव ल समर्पित करे के परब आय "नवाखाई परब"। फेर ये परब ल अलग- अलग वर्ग के मन अलग- अलग तिथि म मनाथें। ये ह हमर संस्कृति के विविधता के ठउका चिन्हारी आय, के एकेच ठन परब ल अलग- अलग संदर्भ या अलग- अलग तिथि म घलो मना लेथन, जबकि परब मनाए के उद्देश्य एके होथे।
छत्तीसगढ़ म " नवाखाई परब " ल घलो अइसने अलग- अलग बेरा म मनाथें। इहाँ उत्कल संस्कृति जीने वाले मन जे उड़िसा सीमा क्षेत्र के रहइया आयं, उन एला भादो महीना के अंजोरी पाख के ऋषि पंचमी के दिन मनाथें। इहाँ के गोंडवाना के संस्कृति ल जीने वाला मन ए परब ल कुंवार महीना के अंजोरी पाख म दशहरा तिथि के आसपास अष्टमी या नवमी के मनाथें। जबकि इही "नवाखाई परब" ल इहाँ के मैदानी भाग म रहइया सामान्य वर्ग अउ ओबीसी के लोगन मन कातिक अमावस्या के मनाए जाने वाला देवारी परब बखत "अन्नकूट" के रूप म मनाथें।
ये हमर संस्कृति के विविधता के एक अच्छा उदाहरण आय, के एके ठन परब ल हमन अलग- अलग बेरा म मना लेथन, फेर ए सबके उद्देश्य एके आय अपन नवा फसल ल अपन ईष्ट ल समर्पित करना। अइसने बहुत अकन परब हे, जेकर संदर्भ अलग- अलग वर्ग के मन अलग- अलग बताथें या मानथें। तेकर सेती कहिथंव, के ए बाहिर ले दिखत अलगाव के नाम म लड़े-झगरे के बदला सबके सम्मान करत एक-दूसर ल सहयोग करना चाही।
-सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान रायपुर
मो. 9826992811

Saturday, 18 July 2020

हमर हरेली तिहार....

हमर हरेली तिहार......

खेती किसानी संग मंत्र जगाए के परब हरेली...
    छत्तीसगढ़ राज के जतका मूल परब-तिहार हे, सबके संबंध कोनो न कोनो रूप ले अध्यात्म संग जरूर हे। ए बात अलग आय के आज हम उंकर मूल कारण ल भूलागे हावन, तेकर सेती प्रकृति या खेती-किसानी संग जोड़ के वोला कृषि संस्कृति के रूप म बताए अउ जाने लगथन।
इहां के संस्कृति म सावन महीना के पहला परब "हरेली" के संग घलो अइसनेच बात हे। ए दिन जम्मो किसान अपन नांगर- बक्खर संग आने जम्मो कृषि यंत्र के धो-मांज के पूजा करथें। एकरे सेती एकर चिन्हारी ल कृषि पर्व के रूप म बताए जाथे। फेर एकर आध्यात्मिक पक्ष के अनदेखा कर देथें।

    आप सबो झन जानथौ के इही दिन या एकर आगू रतिहा जम्मो गाँव मन म गाँव बनाए के परंपरा ल घलो पूरा करे जाथे। इहाँ के ग्रामीण संस्कृति म "बइगा" कहे जाने वाला "मांत्रिक" मन इही दिन अपन-अपन मंत्र के पुनर्पाठ करथें। माने साल भर म वोला फिर से जागृत करथें। कतकों झन मन इही दिन मांत्रिक गुरु अउ शिष्य घलो बनाथें। गुरु शिष्य के रूप म परब मनाथें।

    इहाँ ए बात जाने के लाइक हे, के सावन महीना के इही अमावस के दिन महादेव ह मांत्रिक शक्ति के उदगार या प्रकट करे हें। अइसे लोकमान्यता हे के, उन अपन त्रिशूल म बंधाए सिंघिन ल फूंक के मंत्र मन के उद्घोष करे हें, उनला प्रगट करे रिहिन हें। अब ये कतका सही अउ कतका कल्पना के बात आय, एला तो उहिच ह जानय, फेर ए बात सोला आना सच आय, के हरेली परब के संबंध अध्यात्म संग जरूर हे। मंत्र के माध्यम ले लोकहित के भावना घलो साक्षात नजर आथे. हमर इहाँ ए दिन गाँव के लोहार समाज के मन अपन-अपन मालिक घर जाथें अउ उंकर घर के चौखट म खीला ठेंसथें. अइसने बइगा मन घर के दुआर मन लीम पाना खोंचथें. इही किसम घर के माई दरवाजा के संगे-संग कोठा आदि म गोबर के पुतरीनुमा जेन छापा बनाए जाथे, सबके भाव संबंधित घर के हर प्रकार के रोग राई अउ बाहरी बाधा आदि ले सुरक्षा के ही भाव रहिथे.

    आज के दिन ल गाँव के पहाटिया समाज के मन अड़बड़ नियम ले मानथें।तिहार के आगू दिन भिनसरहा लेे बने नहा-धो के  जंगल जाथें अउ मवेशी मन बर जड़ी-बूटी खोज के लाथें। रातभर जाग के कांदा--कुसा ला उसनथें। उसने के बेरा रात भर पहरा देथें, के काहीं  जीव जंतु वोमा झन खुसर जाए । साथ में टोटका घलो करथें। ये काम ला पुरुष मन करथें. अपन देव धामी के पूजा करथें, सहड़ा देवता म चढ़ाथें । घर के मुहाटी म लीम के डारा ला खोचथें ।

    सूत उठ के बिहनिया लेे गाँव के किसान मन हा अपन अपन घर लेे दार-चांऊर, नून, मिर्चा, खम्हार पान मा धर के पहाटिया कना जाथें,  उंकर मन करा लेे गोंदली, दसमूल कांदा ला घर म  लान के अपन गाय, बछरू, बईला,  ला पिसान के लोंदी अउ नून संग खवाथें।

    हरेली तिहार के एक दिन आगू ले नारी  परानी मन  हा घर दुआर ला गोबर पानी म  लिप -बहार के छरा-छिटका दे डारे रथें। घर- घर म उरिद दार  संग लपेट के कोचई पान के ईडहर  के साग चुरथे ।

    लाईका मन बर बांस के गेंड़ी बनाथें.  पांव मढ़ाए बर बांस के तिकोनिया  कमचिल लगा के माटी तेल डार देथें, लईका मन वोमे चढ़ के रेंगाही तब चर्र--चर्र आवाज करथे त लइका मन खुश हो जाथें, कतकों झन तो एकरे सेती एला गेंड़ी तिहार घलो कहिथें. हमन जब लइका रेहेन, त हमर गाँव म ए दिन गेंड़ी दौड़ के प्रतियोगिता घलो होवय. एकर संगे-संग नरियर फेंकउला के घलो प्रतियोगिता होवय. गजब आनंद आवय.

    अभी हमर छत्तीसगढ़ सरकार ह इहाँ के जम्मो स्कूल मन म हरेली परब मनाए के आदेश निकाले हे, जेमा लइका मन बर गेंड़ी दौंड़ के प्रतियोगिता आयोजित करे के घलो उल्लेख हे. ए ह अच्छा बात आय, लइका मनला बचपन ले ही अपन संस्कृति-परंपरा संग जुड़े अउ समझे खातिर ठउका उदिम साबित होही. एकर खातिर सरकार के जतका बड़ाई करे जाय कम हे.
-सुशील भोले
आदि धर्म जागृति संस्थान रायपुर
मो.9826992811

Wednesday, 17 June 2020

जुड़वास परब....

जुड़वास परब...
    छत्तीसगढ़ के संस्कृति म कृषि अउ ऋषि संस्कृति के अद्भुत मेल देखे बर मिलथे. हमर इहाँ एक डहर जिहां विशुद्ध आध्यात्मिक संस्कृति के दर्शन होथे, उहें दूसर डहर आरूग खेती किसानी अउ प्रकृति ले जुड़े परब-तिहार मन के घलोक दर्शन होथे.
    जुड़वास या माता पहुंचनी परब ह घलो अइसने समिलहा संस्कृति के दर्शन कराथे. चइत, बइसाख अउ जेठ के उसनत गरमी के बाद जब अगास म अंकरस के बादर उमड़त-घुमड़त असाढ़ के आए के आरो देथे, तब इहाँ के गाँव गाँव म जुड़वास के परब मनाए जाथे.
    असाढ़ महीना के अमावस्या के या फेर सोमवार या बिरस्पत के दिन बइगा के अगुवाई म गाँव के शीतला मंदिर मन म गाँव के जम्मो मनखे चांउर-दार,  तेल अउ हरदी धर के जाथें, माता म चघाथें, अउ संग म सेउक मन जुड़वास जस के गायन वादन करथें.
    ए बात वैज्ञानिक रूप ले प्रमाणित हे, तेल अउ हरदी के कई किसम के आयुर्वेदिक महत्व हे, लोगन जब तेल हरदी धरे शीतला माता के मंदिर जाथें, त पूरा गाँव के वातावरण म प्रभाव बगर जाथे, जे ह कई किसम के रोग राई ले बचाव करथे.

असाढ़ आगे बरखा लेके ए महीना आय खास
गाँव बस्ती के शीतला देवी झोंक लेवव जुड़वास 
तेल हरदी धर सुमिरत हावन तोला करत जोहार
रोग-राई अउ महामारी ले बचा अब तुंहरे हे आस

-सुशील भोले-9826992811
संजय नगर, रायपुर

Sunday, 14 June 2020

जय जगन्नाथ.....

जय जगन्नाथ...
छत्तीसगढ़ की संस्कृति में कई ऐसी संस्कृतियों का भी समावेश हो गया है, जो मुख्य रूप से पड़ोसी राज्यों की संस्कृति कहलाती हैं। ऐसी ही संस्कृतियों में आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया को मनाया जाने वालाओ पर्व रथयात्रा भी शामिल है। आज इस पर्व को समूचे छत्तीसगढ़ राज्य के शहरी एवं ग्रमीण इलाकों में किसी न किसी रूप में मनाया ही जाता है, जबकि मूल रूप से इस पर्व को ओडिशा राज्य के प्रतिनिधि पर्व के रूप में जानते हैं।

छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में इससे संबंधित गीत भी गाया जाता है, जिसे जगन्नतिहा गीत कहते हैं। पहले जब आवागमन की कोई खास सुविधा नहीं थी तब यहां के श्रद्धालु तीर्थाटन के लिए पैदल ही जगन्नाथपुरी जाते थे। ऐसा कहा जाता है कि इस कठिन यात्रा से जो लोग वापस जिन्दा आ जाते थे, उन्हें समूचे ग्रामवासी बाजागाजा के साथ भगवान जगन्नाथ का यशगान करते घर तक लाते थे। इसे ही जगन्नतिहा गीत कहते हैं।

पड़ोसी राज्य ओडिशा का पुरी क्षेत्र जिसे पुरुषोत्तम पुरी, शंख क्षेत्र, श्रीक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्री जगन्नाथ की मुख्य लीला-भूमि है। उत्कल प्रदेश के प्रधान देवता जगन्नाथ जी ही माने जाते हैं। यहां के वैष्णव धर्म की मान्यता है कि राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं श्री जगन्नाथ हैं। इसी प्रतीक के रूप श्री जगन्नाथ से संपूर्ण जगत का उद्भव हुआ है।

श्री जगन्नाथ पूर्ण परात्पर भगवान है और श्रीकृष्ण उनकी कला का एक रूप है। ऐसी मान्यता श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य पंच सखाओं की है। पूर्ण परात्पर भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी में आरंभ होती है। यह रथयात्रा पुरी का प्रधान पर्व भी है। इसमें भाग लेने के लिए, इसके दर्शन लाभ के लिए हजारों, लाखों की संख्या में बाल, वृद्ध, युवा, नारी देश के सुदूर प्रांतों से आते हैं। सबसे प्रतिष्ठित समारोह जगन्नाथ पुरी में मनाया जाता है। यह स्थान भुवनेश्वर से साठ किमी की दूरी पर है। यहां का जगन्नाथ मंदिर अपनी ऐतिहासिक रथयात्रा के लिए सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है।

पश्चिमी समुद्रतट से लगभग डेढ़ किमी दूर उत्तर में नीलगिरि पर्वत पर स्थित यह प्राचीन मंदिर कलिंग वास्तुशैली में बना 12वीं सदी का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर का निर्माण नरेश चोडग़ंग ने करवाया था। नौ दिनों की यह रथयात्रा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली है। इसे श्री गुण्डिचा यात्रा भी कहते हैं। इस रथयात्रा का विस्तृत वर्णन स्कंद पुराण में मिलता है, जहां श्रीकृष्ण ने कहा है कि पुष्य नक्षत्र से युक्त आषाढ़ मास की द्वितीया तिथि को मुझे, सुभद्रा और बलभद्र को रथ में बिठाकर यात्रा कराने वाले मनुष्य की सभी मनो: कामनाएं पूर्ण होती हैं। इस रथयात्रा महोत्सव में श्रीकृष्ण के साथ राधिका जी न होकर सुभद्रा और बलराम होते हैं, जिसके संबंध में एक विशेष कथा प्रचलित है।

पौराणिक कथा
एक समय द्वारिकापुरी में माता रोहिणी से श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी व अन्य रानियों ने राधारानी व श्रीकृष्ण के प्रेम-प्रसंगों एवं ब्रज-लीलाओं का वर्णन करने की प्रार्थना की। जिस पर माता ने श्रीकृष्ण व बलराम से छिपकर एक बंद कमरे में कथा सुनानी आरंभ की और सुभद्रा को द्वार पर पहरा देने को कहा, किन्तु कुछ ही समय पश्चात् श्रीकृष्ण एवं बलराम वहां आ पहुंचे। सुभद्रा के द्वारा अंदर जाने से रोकने पर श्रीकृष्ण व बलराम को कुछ संदेह हुआ और वे बाहर से ही अपनी सूक्ष्मशक्ति द्वारा अंदर की माता द्वारा वर्णित ब्रजलीलाओं को श्रवण करने लगे।

कथा सुनते-सुनते श्रीकृष्ण, बलराम व सुभद्रा के हृदय में ब्रज के प्रति अद्भुत भाव एवं प्रेम उत्पन्न हुआ तथा उनके हाथ व पैर सिकुडऩे लगे। वे तीनों राधा रानी की भक्ति में इस प्रकार भाव-विभोर हो गए कि स्थायी प्रतिमा के समान प्रतीत होने लगे। अत्यंत ध्यानपूर्वक देखने पर भी उनके हाथ-पैर दिखाई नहीं देते थे।

श्री सुदर्शन ने भी द्रवित होकर लंबा रूप धारण कर लिया। उसी समय देवमुनि नारद वहां आ पहुंचे और भगवान के इस रूप को देखकर अत्यंत आश्चर्यचकित हुए तथा भक्तिपूर्वक प्रणाम करके श्रीहरि से कहा कि हे प्रभु! आप सदा इसी रूप में पृथ्वी पर निवास करें। भगवान श्रीकृष्ण ने कलियुग में इसी रूप में नीलांचल क्षेत्र (पुरी) में प्रकट होने की सहमति प्रदान की। कलियुग आगमन के पश्चात् एक समय मालव देश के राजा इंद्रद्युम्न को समुद्र में तैरता हुआ लकड़ी का एक बहुत बड़ा  टुकड़ा मिला। राजा के मन में उस टुकड़े को निकलवा कर भगवान श्रीहरि की मूर्ति बनवाने की इच्छा जागृत हुई।

उसी समय देव शिल्पी विश्वकर्मा ने बढ़ई रूप में वहां आकर राजा की इच्छानुसार प्रतिमा निर्माण का प्रस्ताव रखा और कहा कि 'मैं एक एकांत बंद कमरे में प्रतिमा निर्माण करुंगा तथा मेरी आज्ञा न मिलने तक उक्त कमरे का द्वार न खोला जाए अन्यथा मैं मूर्ति-निर्माण बीच में ही छोड़कर चला जाऊंगा"। राजा ने शर्त मान ली, किन्तु कई दिन व्यतीत होने पर भी जब बढ़ई की ओर से कोई समाचार न मिला तो राजा ने द्वार खोलकर कुशलक्षेम लेने की आज्ञा दी।

जब द्वार खोला गया तो बढ़ई रूपी विश्वकर्मा अंतर्धान हो चुके थे और वहां लकड़ी की तीन अपूर्ण मूर्तियां मिलीं। उन अपूर्ण प्रतिमाओं को देखकर राजा अत्यंत दु:खी हो श्रीहरि का ध्यान करने लगे। राजा की भक्ति-भाव से प्रसंन होकर भगवान ने आकाशवाणी की 'हे राजन! देवर्षि नारद को दिए वरदान अनुसार हमारी इसी रूप में रहने की इच्छा है, अत: तुम तीनों प्रतिमाओं को विधिपूर्वक प्रतिष्ठित करवा दो"।

अंतत: राजा ने श्रीहरि की इच्छानुसार नीलाचल पर्वत पर एक भव्य मंदिर बनवाकर वहां तीनों प्रतिमाओं की स्थापना करवा दी। जिस स्थान पर मूर्ति निर्माण हुआ था, वह स्थान गुण्डिचाघर कहलाता है, जिसे ब्रह्मलोक और जनकपुर भी कहते हैं। ये तीन मूर्तियां ही भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा जी के स्वरूप हैं।

दस दिवसीय महोत्सव
पुरी का जगन्नाथ मंदिर के दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षयतृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से हो जाता है। कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं।

गरुड़ध्वज
जगन्नाथ जी का रथ गरुड़ध्वज या कपिलध्वज कहलाता है। 16 पहियों वाला यह रथ 13.5 मीटर ऊंचा होता है जिसमें लाल और पीले रंग के वस्त्र का प्रयोग होता है। विष्णु का वाहक गरुड़ इसकी रक्षा करता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे 'त्रैलोक्यमोहिनी" या 'नंदीघोष" रथ कहते हैं।

तालध्वज
बलराम का रथ 'तलध्वज" के नाम से पहचाना जाता है। यह रथ 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है। यह लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को 'उनानी" कहते हैं। 'त्रिब्रा", 'घोरा", 'दीर्घशर्मा" व 'स्वर्णनावा" इसके अश्व हैं। जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है, वह 'वासुकी" कहलाता है।