Monday, 13 December 2021

मोक्षदा एकादशी गीता जयंती की बधाई


मोक्षदा एकादशी : गीता जयंती विशेष..

🐚 सृष्टि का आदि धर्मशास्त्र गीता है। ‘इमं विवस्वते योगं’ (गीता, 4/1)- भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि “इस अविनाशी योग को मैंने आदि में सूर्य से कहा। सूर्य से मनु, मनु से इक्ष्वाकु और इक्ष्वाकु से राजऋषियों तक पहुँचते-पहुँचते यह इस पृथ्वी में लुप्त हो गया था। वही पुरातन अविनाशी योग मैं तेरे प्रति कहने जा रहा हूँ।” इस प्रकार लगभग 5200 वर्षों पूर्व उसी आदिज्ञान का पुनः प्रसारण मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी ‘मोक्षदा एकादशी’ को कुरुक्षेत्र (भारत) में हुआ।

🐚 परमात्मा ही सनातन है। उस सनातन का उपासक होने से ही आर्य सनातनधर्मी कहलाये। सनातन एकमात्र परमात्मा सबके हृदय में निवास करता है- ‘हृद्देशेर्जुन तिष्ठति’ (गीता, 18/61) -हृदयस्थ उस परमात्मा का उपासक होने से वही हिंदू कहलाये। तीनों शब्दों (आर्य, सनातनी व हिंदू) का अर्थ एक है और इनका आदिशास्त्र गीता है।

🐚 ‘गीता’ का सिद्धांत है- एक आत्मा ही सत्य है, परम तत्व है, अमृत स्वरूप है, कण-कण में व्याप्त है एवं ज्योतिर्मय है। उस आत्मा को प्राप्त करने की नियत विधि  है।

🐚 ‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’ ( गीता, 3/9 ) इस योग विधि यज्ञ के अतिरिक्त अन्य जो कुछ किया जाता है,वह इसी लोक का एक बंधन है,न कि कर्म। इस नियत कर्म को करके तू अशुभ अर्थात संसार बंधन से मुक्त हो जायेगा।अस्तु ,कर्म अर्थात् आराधना, चिंतन। एक ही चिंतन कर्म को योगेश्वर ने चार श्रेणियों में बाँटा, जिनका नाम वर्ण है। यह एक ही साधना के क्रमोन्नत सोपान हैं। जिसमें साधक को प्रवेश कर क्रमशः चारों सोपानो को पार कर लक्ष्य विदित करना होता है।

🐚 “अर्जुन ! यदि तू संपूर्ण पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है तब भी गीतोक्त ज्ञान रूपी नौका द्वारा नि:संदेह पार हो जायेगा।” अतः गीता पाप का निवारण है। “अत्यंत दुराचारी भी अनन्य भाव से मुझे भजता है तो वह साधु मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय से लग गया है।” अतः गीता सदाचारी और दुराचारी में दरार नहीं डालती।

🐚 ‘गीता’ के अनुसार, मनुष्य मात्र दो प्रकार का होता है – दैव और असुर। जिसके हृदय में दैवी संपद कार्यरत है वह देवताओं जैसा है और जिसके हृदय में आसुरी संपद कार्य करती है वह असुरों जैसा है। दैवी स्वभाव परम कल्याणकारी परमात्मा की तरफ तथा आसुरी स्वभाव प्रकृति के अंधकार में भटकाता है। सृष्टि में मनुष्य की यही दो जातियाँ हैं अन्य कोई तीसरी जाति नहीं।

🐚 संसार की सभी समस्याओं का समाधान गीता से है। गीता जाति-पाँति, छुआछूत, भेदभाव से मुक्त है; क्योंकि जीव भगवान का विशुद्ध अंश है- उतना ही पावन जितना स्वयं भगवान। तो फिर अस्पृश्य कैसे? यह हीन भावनाओं से मुक्ति का शास्त्र है। यह संप्रदाय मुक्त है। इसमें किसी संप्रदाय का विरोध या समर्थन नहीं है। इसमें रूढ़ियों, परंपराओं अथवा प्रथाओं का किंचित भी समावेश नहीं है। यह इन सब से मुक्त मानव- दर्शन है।

🐚 भारत के संविधान में भारतीय संस्कृति व दर्शन के 22 उद्बोधक चित्रों में एक चित्र श्रीकृष्ण का गांडीवधारी अर्जुन को गीता उपदेश देते हुए भी था। न केवल भारत अपितु विश्व के श्रेष्ठतम विद्वानों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, चिंतकों तथा संतों ने इसकी मुक्त कंठ से स्तुति की है।

धरम के मारग अइसे नइहे के बस जोगड़ा बन जावन
बन के बोझा समाज ऊपर बस माँग-माँग के खावन
ए तो कोनो धरम नइ होइस न आदर्श असन जीवन
जेला कहिथन भगवान हम उंकर कर्मयोग अपनावन

मोक्षदा एकादशी गीता जयंती के गाड़ा-गाड़ा बधाई अउ जोहार 🙏
-सुशील भोले-9826992811
🙏🌹🙏🌹🙏

Saturday, 11 December 2021

श्यामलाल चतुर्वेदी.. सुरता..

सुरता//
श्यामलाल चतुर्वेदी : मंदरस घोरे कस झरय जेकर बानी ले छत्तीसगढ़ी
    पद्मश्री श्यामलाल चतुर्वेदी जी एक अइसन साहित्यकार रिहिन हें, जेला सरलग सुनतेच रेहे के मन लागय. मोला तो कई पइत अइसनो जनावय के उनला कविता पाठ करत सुने ले जादा एक वक्ता के रूप म सुनत रेहे जाय. अइसन कई बखत अवसर आवय जब उनला मन भर सुनई ह गजब भावय.
   मोला उनला सबले पहिली देखे अउ सुने के अवसर दिसम्बर 1987 के आखिर म तब मिले रिहिसे जब दाऊ महासिंग चंद्राकर जी के 'सोनहा बिहान' के बैनर म बिलासपुर जिला के एक गाँव म 'लोरिक चंदा' के प्रस्तुति होए रिहिसे. संयोग ले दाऊजी मोला अपन संग उहाँ अपन कार्यक्रम देखाए खातिर लेगे रिहिन हें, अउ आदरणीय चतुर्वेदी जी ल घलो उहीच मंच म सम्मान करे खातिर घलो आमंत्रित करे रिहिन हें. ठउका वोकर पंद्रहीच पहिली छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के विमोचन 9 दिसम्बर के होए रिहिसे, जेकर पहला अंक ल धर के  मैं वो कार्यक्रम म संघरे रेहेंव अउ आदरणीय चतुर्वेदी जी ल उहीच मंच म सम्मान करत भेंट करे रेंहेंव. 'मयारु माटी' के ए अंक म चतुर्वेदी जी के कहानी 'जंगो के जोमर्दी' ल हमन छापे घल़ो रेहेन. चतुर्वेदी जी घलो तब मोला अपन कविता संकलन 'पर्रा भर लाई' ल भेंट करे रिहिन हें. लोगन के फरमाइश म उन तब अपन सम्मान के आभार प्रकट करत वक्तव्य संग 'बेटी के बिदा' कविता के पाठ घलो करे रिहिन हें.
   बिलासपुर जिला (अब जांजगीर-चांपा) के गाँव कोटमी म 20 फरवरी 1926 के जनमे चतुर्वेदी जी के जिनगी म एक अइसन अद्भुत संयोग घलो आए हे, जब उनला अपन खुद के लिखे कविता ऊपर परीक्षा म जुवाब लिखे बर परे रिहिसे. बिरले लोगन के जिनगी म अइसन संयोग आवत होही. बात सन् 1976 के आय. तब उन एम.ए. (हिन्दी) के परीक्षा म ऐच्छिक विषय के रूप म छत्तीसगढ़ी भाखा के रूप म छत्तीसगढ़ी भाखा के पाठ घलो संघरे रिहिसे. चतुर्वेदी जी तब अकबकागें जब उन देखिन के  उंकर प्रश्न पत्र म उंकरेच कविता के बारे म पूछे गे रिहिसे.
     चतुर्वेदी जी साहित्य अउ पत्रकारिता दूनों के माध्यम ले एक कलमकार के कर्तव्य ल पूरा करिन हें. संगे-संग उन एक निर्विरोध सरपंच के रूप म घलो आदर्श जीवन के गाथा गढ़े हें. सन् 1965 म उन अपन गाँव कोटमी के निर्विरोध सरपंच बने रिहिन हें. तब वो मन गाँव वाले मनला संगठित कर के शराब बंदी, जंगल के संरक्षण, सड़क बनई, कुआँ खनवाए के संग तरिया मन के साफ-सफाई करे के ठोसलग बुता करे रिहिन हें.
     हमन अक्सर सुनथन के आजादी के आन्दोलन के बखत पत्रकार मन के जीवन एक ऋषि तुल्य जीवन राहय. वो मन तब एकेच संग अबड़ अकन भूमिका निभा लेवंय. पत्रकारिता के संगे-संग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाज सुधारक, स्वदेशी अउ स्वावलंबन के उपासक राहंय. चतुर्वेदी जी म घलो ए जम्मो रूप के दर्शन होवय. फेर अब के पत्रकार मन म अइसन दर्शन दुर्लभ होगे हवय. चतुर्वेदी जी नई दुनिया, युगधर्म, हिन्दुस्तान समाचार के संगे-संग छत्तीसगढ़ के अउ कतकों समाचार पत्र मन म सरलग समाचार भेजत राहंय. सन् 1949 ले वोमन पत्रकारिता के श्रीगणेश करिन माखनलाल चतुर्वेदी के कर्मवीर के संवाददाता के रूप म करिन. महाकौशल, लोकमान्य, नवभारत, नवभारत टाइम्स, युगधर्म, जनसत्ता आदि समाचार पत्र मन म प्रतिनिधि के रूप म जन-समस्या मनला उठावत राहंय. सन् 1981 म हिन्दुस्तान समाचार के श्रेष्ठ संवाद लेखन खातिर तब के मुख्यमंत्री द्वारा उनला सम्मानित घलो करे गे रिहिसे.
   चतुर्वेदी जी के साहित्यिक कृति के रूप म कविता संकलन 'पर्रा भर लाई', कहानी संकलन 'भोलवा भोलाराम बनिस' अउ लघु खण्डकाव्य 'राम-बनवास' उल्लेखनीय हे. छत्तीसगढ़ी संस्कृति मन ऊपर आधारित उंकर विभिन्न विषय के लेख कतकों पत्र-पत्रिका मन म सरलग छपत राहय. आकाशवाणी केन्द्र मनले घलो बेरा-बेरा म उंकर वार्ता सुने बर मिलत राहय.
   छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सन् 2008 म गठित करे गे 'छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग'  के प्रथम अध्यक्ष बने के गौरव घलो आदरणीय चतुर्वेदी जी ल मिले हे. 2 अप्रैल 2018 के उनला तत्कालीन राष्ट्रपति जी के हाथ ले पद्मश्री के सम्मान घलो मिलिस.
   अद्भुत प्रतिभा के धनी अउ सहज-सरल स्वभाव के ऋषि तुल्य जिनगी जीयइया साहित्य पुरोधा ह 7 दिसम्बर 2018 के ए नश्वर देंह ल के त्याग कर परमधाम के रद्दा रेंग दिन.
उंकर सुरता ल डंडासरन पैलगी 🙏
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Monday, 6 December 2021

'जोहार' अउ 'जय जोहार'

"जोहार" अउ "जय जोहार"
   एक कहावत हे- 'अड़हा बइद परान घातका'। माने अड़हा कहूं बइद ह होगे, त मरीज के मरे बिहान हे। ठउका इही किसम कहूं जे मन भाखा खातिर कारज करत हें, अउ उहू मनला भाखा अउ ओकर ले जुड़े परंपरा अउ संस्कृति के समझ नइए त उहू भाखा के मरे बिहान कस हे।
    अभी जे मन हमर भाखा के नाव म एती-वोती कूदत हें, वोमा के कतकों जब मोर संग भेंट होथे, त कहि परथें-"जय जोहार" भोले जी। मैं अतका म टमड़ डारथंव के भाखा के नाव म बिल्लस खेलइया ए लोगन के भाखा अउ संस्कृति के संबंध म कतका ज्ञान हे।
    अरे भई, 'जोहार' शब्द ह संबोधन खातिर अपन आप म पूर्ण शब्द आय, वोला अलग ले ककरो पंदोली के जरूरत नइए। जइसे- 'नमस्कार' या 'प्रणाम' ल ककरो जरूरत नइ परय। जोहार के मतलब ही नमस्कार करना, प्रणाम करना या जयकार करना होथे। जइसे हम जय नमस्कार या जय प्रणाम नइ काहन वइसने जय जोहार कहे के भी जरूरत नइए। अभिवादन खातिर सिरिफ "जोहार" कहना काफी हे।
       गांव म परंपरा हे- जब देवारी पइत पहाटिया मन मड़ई उठाए के समय सबले पहिली गांव के गंउटिया, सरपंच या सियान ल पहिली सम्मान दे के परंपरा निभाथें, त उन कहिथें- 'चलव गा पहिली दाऊ ल, मंडल ल, या सरपंच ल जोहार लेथन, तेकर पाछू दइहान या अउ कोनो आयोजन ठउर कोती जाबो'।
     असल म 'जोहार' शब्द ह 'जय' अउ 'हर' शब्द के मेल ले बने हे, जेकर अर्थ ही होथे 'हर' अर्थात शिवजी के जयकार करना. हमर ए भुइया ह जुन्ना बेरा ले बूढ़ादेव या बड़ादेव के रूप म शिव उपासक अंचल रहे हे, तेकर सेती वोकर जयकार करत ए 'जोहार' शब्द के माध्यम ले अभिवादन करत चले आवत हे.
सबो झनला जोहार🙏🌹😊
-सुशील भोले-9826992811

Thursday, 2 December 2021

छत्तीसगढ़ी लेखन म विषय अउ शब्द चयन

विचार//
छत्तीसगढ़ी लेखन म शब्द अउ विषय के चयन..
     वइसे तो छत्तीसगढ़ी ल शिक्षा संग राजकाज अउ रोजगार के भाखा बनाए के माँग गजब दिन के चलत हे, फेर जब ले छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन इहाँ होए हे, तब ले ए माँग ह बनेच जोर धरे हे. फेर मोर मन म कभू इहू बात उठथे, के का छत्तीसगढ़ी म आज हमर जगा अतका साहित्य या लेखक हे, जेन ए जम्मो क्षेत्र के माँग अउ आवश्यकता ल वोकर गरिमा के अनुरूप पूरा कर सकथे?
    अभी देखे ए जाथे के सिरिफ कविता, कहानी, कुछ लेख अउ व्यंग्य आदि मनला ही छत्तीसगढ़ी के पूरा के पूरा साहित्य मान लिए जाथे. त का अतकेच भर म समाज अउ शासन के हर वर्ग अउ क्षेत्र के आवश्यकता ल पूरा करे जा सकथे?
   मोला सुरता हे, रायपुर म एक प्रतिष्ठित दैनिक अखबार के संपादक संग हमर मनके चर्चा होए रिहिसे, तब उन कहे रिहिन हें, के उन रोज एक पेज छत्तीसगढ़ी म छापे बर तैयार हें, फेर शर्त ए हे के एकर बर वो सबो विषय के भरपूर मटेरियल आना चाही, जेकर ले एक दैनिक अखबार के जम्मो वर्ग के पाठक मनला पढ़ाए अउ संतुष्ट करे जा सकय.
    एक अखबार ह एक सामान्य रिक्शा चलाने वाला ल लेके बड़े-बड़े अधिकारी, कर्मचारी, डॉक्टर, वकील, व्यापारी, अर्थशास्त्री, इंजीनियर, वैज्ञानिक, युवा, महिला अउ लइका मन के संगे-संग राजनेता मनला घलो अपन डहार आकर्षित करे खातिर उंकर पसंद के अनुरूप सामग्री छापथे. हमन ल अइसन जम्मो विषय म रोज भरपूर अउ एक प्रतिष्ठित अखबार के गरिमा के अनुरूप सामग्री, जेमा संबंधित विषय मन म लेख अउ समाचार उपलब्ध कराए बर कहिस. हमन बहुत झन साहित्यकार मन संग चर्चा करेन अउ ए सब तमाम विषय म लिखे बर कहेन, फेर वोकर बर अपेक्षा के अनुरूप न सामग्री मिलिस न लोगन.
    एक अउ बार हमन  छत्तीसगढ़ी म राजनीतिक मासिक पत्रिका निकाले के उदिम करेन. मात्र एक-दू अंक ही निकाल पाएन, तहाँ ले भइगे. एकरो असली कारण उही रिहिसे. पत्रिका के मांग अउ गरिमा के अनुरूप भरपूर सामग्री के नइ मिल पाना. कतकों साहित्यकार मनला जोजियावन फेर नतीजा शून्य.
    अब आप बतावव, सिरिफ सरकार ऊपर लाठी धर के भीड़े भर म ए सब आवश्यकता ह पूरा हो सकथे का? का हमन ल इहू डहार चेत करे के अउ म अपन लेखन के रद्दा ल वो सब दिशा अउ विषय डहार लेगे के जरूरत नइए? सिरिफ कविता-कहानी भर म अरझे रहिबो, त फेर समाज के हर वर्ग के लोगन के साहित्यिक आवश्यकता ल कइसे पूरा कर सकबो?
    अइसन तमाम विषय मन म भरपूर लेखन के संगे-संग हमन ल भाखा के एकरूपता डहार घलो चेत करे बर लागही. एक नान्हे शब्द हे- 'अउ' एला लोगन कतका किसम ले लिखथे देखव- कोनो 'अउ' कोनो 'अऊ' त कोनो 'आउ', 'आऊ', 'अव', 'अउर', 'औ', 'आव'. अइसने कतकों शब्द हे जे मन ल जम्मो लेखक मन ल एक किसम ले लिखे के जरूरत हे. हमन ल शासन ऊपर छत्तीसगढ़ी ल शिक्षा, राजकाज अउ रोजगार के भाखा बनाए के दबाव तो बनाएच बर लागही, संगे-संग तमाम विषय अउ क्षेत्र के लोगन मन के साहित्यिक आवश्यकता ल घलो पूरा करे बर लागही तभे छत्तीसगढ़ी ह चारों मुड़ा सर्वमान्य भाखा के रूप म स्थापित हो पाही, सम्मान पा सकही.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Sunday, 7 November 2021

शीला बिनई अउ लाड़ू खवई

सुरता//
शीला बिनई अउ भक्का लाड़ू के खवई...
    जाड़ के आगमन के संग छत्तीसगढ़ के खेत-खार म धान लुवइया मन के आरो मिले लगथे. जेती देखव तेती हंसिया डोरी धरे किसान परिवार के सदस्य अपन-अपन उदिम म भीड़े दिख जाथें. कोनो ओरी धर के धान लु-लु के करपा रखत दिख जथे, त कोनो करपा मनला सकेल-सकेल के बोझा बांधत, त कोनो ओ बंधे बोझा मनला एक जगा सकेल के छोटे खरही असन रचत. इही बीच म घर-परिवार के छोटे-छोटे लइका मन किंजर-किंजर के शीला बीनत.
    ए बड़ा मोहक दृश्य होथे. हर गाँव म अउ हर खार म अइसन मनभावन नजारा देखब म आथे. हमूं मन जब गाँव म राहन, त प्रायमरी ले लेके मिडिल स्कूल के पढ़त ले ए उदिम म मगन राहन. बिहनिया स्कूल जाए के पहिली तीर-तखार के खेत म धमक देवन, अउ संझा स्कूल ले लहुटे के पाछू थोक दुरिहा के खेत मन म घलो अभर जावत रेहेन.
   धान लुवई ले लेके शीला बिनई अउ बढ़ोना बढ़ोई ले लेके धान मिंज के ओसाई अउ ओला कोठी म सहेजई तक अइसन बेरा होथे, जब इहाँ के किसान मन म औघड़दानी के रूप सहज देखे जा सकथे. हमन जब शीला बीने बर जावन त ए जरूरी नइ राहय के अपनेच खेत म जावन. जेने खेत म बोझा बांधे के बुता चलत राहय, उहिच म अभर जावन. खेत वाले मन घलो हमन ल देखय, तहाँ ले पढ़इया लइका मन आए हे कहिके जान-बूझ के बोझा ले धान ल गिरा देवंय, तेमा हमन ल आसानी के साथ जादा ले जादा शीला मिल सकय. कतकों खेत वाले मन तो हमन ल आज अपन खेत ले बोझा डोहारबो कहिके अपनेच मन संग गाड़ा बइला म बइठार के लेग जावंय, अउ शीला बीने के बाद लहुटती म गाड़ा म बइठार के बस्ती डहार लान देवंय घलो. जेन दिन बढ़ोना बढ़ोवंय, तेन दिन तो बढ़ोना के पूजा-नेंग के बाद खीर सोंहारी चघावंय, तेला खाए बर घलो देवंय.
    स्कूल के छुट्टी राहय, तेन दिन हमर मनके गदर राहय. बस बिहनिये नहाए-धोए के बाद खेत के रद्दा. हमर मन के चार-पांच लइका के टोली राहय. इतवार या छुट्टी के दिन शीला बीने के संगे-संग खारेच म पिकनिक घलो मनावन. सबो लइका अपन अपन घर ले रांधे-गढ़े के जिनिस धर के लेगन. ए सीजन म तींवरा भाजी घलो बने फोंके-फोंक ल सिलहो के रांधे के लाइक हो जाए रहिथे, तेकर चिखना तो बनाबे करन. बोइर मन घलो गेदराए ले धर ले रहिथे, वोकरो मन के पोठ मजा लेवन. हमर गाँव म खार के बीचोबीच कोल्हान नरवा बोहाथे. एकर दूनों मुड़ा के कछार म जाम के कटाकट बारी हावय. अउ इही जाड़ के दिन ह एकर सीजन आय. जम्मो बारी मन म गौंदन मता देवत रेहेन. उहाँ साग-भाजी अउ कतकों जिनिस के खेती होवय. सबके मजा ओसरी-पारी लेते राहन.
     शीला बीने ले जेन धान मिलय, तेला बने गोड़ म रमंज-रमंज के मिंजन अउ सकेलन. कमती राहय तेन दिन पसरा वाली घर जाके कभू मुर्रा, त कभू मुर्रा लाड़ू अउ कभू लाई के बने भक्का लाड़ू के सेवाद लेवन, अउ कोनो दिन शीला ह थोक जादा सकला जावय, तेन दिन वोला दुकान म बेंच के इतवार के पिकनिक खातिर जोखा करन.
     फेर अपन लइकई के ए सब बात ल गुनथन, अउ आज के दृश्य ल देखथन त एमन अब सिरिफ सपना बरोबर लागथे, काबर ते आज वैज्ञानिक आविष्कार के चलत खेतिहर मजदूर मन के जगा बड़े बड़े ट्रैक्टर अउ हार्वेस्टर ह जगा ल पोगरा लिए हे. न तो खेत म बने गढ़न के धान लुवइया दिखय, न बोझा बंधइया अउ न शीला बिनइया. हाँ कभू-कभू उहू जुन्ना दृश्य मन घलो एती-तेती दिख जाथे, फेर बहुत कम संख्या म.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Wednesday, 3 November 2021

मातर मड़ई के जोहार

मातर मड़ई के जोहार...
  हमर छत्तीसगढ़ म देवारी परब ल तीनेच दिन के मनाए जाथे. कातिक अमावस के सुरहुत्ती अउ गौरा-ईसरदेव बिहाव परब. बिहान भर नवा खाई (अन्नकूट) अउ गोवर्धन पूजा अउ वोकर बिहान भर मातर परब. हमर  इहाँ के परंपरा म मातर के दिन ही मड़ई जगाए के परंपरा ल घलो पूरा करे जाथे, तहाँ ले एकरे संग मड़ई अउ मेला के सरलग उमंग उत्साह चालू हो जाथे, जेहा महाशिवरात्रि म जाके पूरा होथे.
    हमर गाँव म गोवर्धन पूजा के बिहान भर मातर परब मनाए के रिवाज हे. गांव भर के जतका गरुवा मन के बरदी हे, सबो ल दइहान ठउर म सकेले जाथे अउ जब गांव भर के लोगन सकला जथें, त फेर वो सकलाए सबो गरुवा मनला वो जगा आंवर-भांवर घुमाए जाथे. ए बेरा म गाँव के पहाटिया समाज डहर ले दइहान ठउर म एक पूजा स्थल बनाए जाए रहिथे, जेला कतकों झन खुड़हर देव स्थापना करना घलो कहिथें. ये खुड़हर देव स्थापना या पूजा ठउर बनाए के बुता ल गोवर्धन पूजा के दिन ही पूरा कर लिए जाए रहिथे. उही मेर बोकरा के बली दिए के नेंग ल घलो पूरा करे जाथे. कतकों बछर बोकरा के बली के बलदा कोंहड़ा ल काटत घलो देखे हावन. अपन विशेष मयारुक गाय या भइंस ल वोमन ए बेरा म सोहाई घलो बांधथें.
    इही दिन हमर इहाँ मड़ई मनाए के घलो परंपरा हे. जानकर मन के अइसन कहना हे, के मड़ई ल खरीफ फसल के लुआए के बाद वोकर उल्लास के रूप म मनाए जाथे. एला अलग- अलग गाँव म अलग-अलग दिन मनाए जाथे, तेमा आसपास के दूसर गाँव वाले मन घलो अपन अपन गाँव के मड़ई ल धर के ए उल्लास म संघर सकंय. एकरे सेती गाँव के बइगा ह पंच सरपंच अउ आने सियान मन संग दिन तिथि जोंग के तीर तखार के सबो गाँव म एकर आरो कराथे.
   हमर गाँव नौकरीपेशा वाले गाँव आय तेकर सेती मातर के दिन ही मड़ई के आयोजन करे जाथे, तेमा रोजी रोजगार वाले मन मड़ई मना के बिहान भर अपन अपन बुता म संघर सकंय.
  मड़ई म गाँव के जतका ग्राम्य देवता होथे, वोकरे मन के नांव म अलग-अलग मड़ई उठाए जाथे. ए सबमें एक माई मड़ई घलो होथे, जेला माई मड़ई या कंदई मड़ई घलो कहिथें. हमर गाँव म ए माई मड़ई ल मछिन्दर बबा ह उठावय. गाँव म हमरे पारा म उन राहंय. उंकर असली नांव ल तो कभू जान नइ पाएन, हमन तो उनला मछिन्दर बबा अउ उंकर सुवारी ल मछिन्द्रिन दाई ही काहन. वोमन जात के केंवट रिहिन. उंकर मनके सरग सिधारे के बाद उंकर वंशज मन ही ए परंपरा के निर्वाह करथें.
   अइसे कहे जाथे, के मड़ई ह अच्छा फसल होए के उल्लास म ही मनाए जाथे. अउ अच्छा फसल जब वरुण देवता प्रसन्न होके भरपूर पानी बरसाथे, त होथे. एकरे सेती मड़ई परब के माई मड़ई ल केंवट या ढीमर समाज के लोगन ही उठाथें, काबर ते एमन वरुण देवता के उपासक होथें, अइसे माने जाथे.
   मातर मड़ई के परब म राउत समाज के भागीदारी अउ उत्साह ल देखतेच बनथे. एकर मन के बिना ए परब के रौनक के कल्पना घलो अबीरथा हे. जब राउत भाई मन अपन विशेष संवागा कर के गंड़वा बाजा संग दोहा पारत नाचथें, त अद्भुत दृश्य उपस्थित हो जाथे...
पान खायेन सुपारी मालिक,
सुपारी के दुई कोर.
तुम तो बइठो रंगमहल में,
जोहार लेवव मोर.

अवत दिएन गारी गोढ़ा
जावत दिएन असीस.
दूधे खाव पूते बिहाव,
जीयव लाख बरीस.

  मातर परब संग मड़ई जागरण के जोहार अउ बधाई 🙏🌹😊
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

सुरहुत्ती के दीया..

सुरहुत्ती के दीया...
    कातिक अमावस के मनाए जाने वाले परब ल हमर छत्तीसगढ़ म 'सुरहुत्ती' के नॉव ले जाने जाथे. सुरहुत्ती के दिन हमर इहाँ 'दीपदान' या कहिन के दीया चघाय के परंपरा हे. गाँव के नान्हे लइका मन ए दिन अपन तीर-तखार के जम्मो लोगन, पारा-परोसी अउ नता-रिश्ता जम्मो घर जा-जा के उंकर घर के तुलसी चौरा या अउ कोनो पबरित जगा म बरत दीया ल ले जाके मढ़ाथें. ए दिन घर के सियान मन लइका मनला कुंआ, तरिया, मंदिर-देवाला, घर के जम्मो खास-खास ठउर के संगे-संग बारी-बखरी अउ खेत के मेड़ मन म घलो दीया चढ़ाय खातिर कहिथें.
    ए बेरा म पहिली जेन दीया बनाय जाय वोहा धान के नवा फसल ले निकले चांउर पिसान के बनाए जाय. अब धीरे-धीरे ए परंपरा म बदलाव देखे बर मिलत हे. अब तो लोगन माटी के बने दीया ले ही काम चला लेथे. मोला सुरता हे. हमन जब लइका राहन त पिसान के जेन दीया चघाय राहन, वोहा बाती म जल के सेंकाय असन हो जावय तेकर तेल ल झर्रा के खा घलो देवत रेहेन. ए रतिहा सियान मन हमन ल रात भर जागे बर काहय, त रात भर जागे बर कतकों किसम के उदिम करत राहन, जेमा पिसान के सेंकाय दीया मनला चारों मुड़ा किंजर-किंजर के खाना, जुआ ठउर मन म जाके जुआ खेले बर भिड़ जाना या खेलइया मनला ठाढ़ होके देखत रहना. गौरा-ईसरदेव बिहाव के बाजा गदकय तहाँ ले उहू डहार जाके 'एक पतरी रैनी- बैनी... अउ भड़भड़ बोकरा.. '  कहिके हुंत करावत लोगन मन संग संघर जाना, सब शामिल राहय.
    हमर इहाँ नवा फसल ल अपन ईष्टदेव ल समर्पित करे के परंपरा हे, जेला इहाँ 'नवा खाई' के रूप म जाने जाथे. हमर छत्तीसगढ़ म ए नवा खाई के परंपरा ल अलग अलग समाज के लोगन तीन अलग अलग बेरा म मनाथें. इहाँ के ओडिशा सीमा ले लगे लोगन जेन उत्कल संस्कृति ल जीथें वोमन एला ऋषि पंचमी के मनाथें. गोंडी संस्कृति ल जीने वाले मन एला दशहरा के पहिली अष्टमी/नवमी के मनाथें अउ मैदानी भाग के लोगन देवारी परब म अन्नकूट के रूप म नवा खाई मनाथें.
    सुरहुत्ती परब म जेन नवा फसल के पिसान के दीया बनाए जाथे, उहू ह इही परंपरा के एक किसम के निर्वहन आय.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
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सुरहुत्ती के दीया ...
   कार्तिक अमावस्या को मनाया जाना वाला पर्व दीपावली छत्तीसगढ़ में सुरहुत्ती के नाम पर जाना जाता है। इस अवसर पर यहाँ दीपदान की परंपरा है। गांव के छोटे-छोटे बच्चे अपने आसपास और परिचितों के घरों में एक छोटा सा जलता हुआ दीपक लेकर जाते हैं, और उनके यहां के तुलसी चौंरा पर या किसी अन्य पवित्र स्थल पर उसे रख आते हैं। घर के मुखिया बच्चों को कुंआ, तालाब, मंदिर, घर के प्रमुख स्थलों और बाड़ी एवं खेतों आदि में भी दीया रखने के लिए निदेर्शित करते हैं।

  इस अवसर पर जो दीपक बनाया जाता है, वह धान की नई फसल से प्राप्त चावल के आटे से बना होता है, लेकिन नई पीढ़ी के लोग इस बात को विस्मृत करते जा रहे हैं। इसलिए वे मिट्टी से बने हुए दीपक या अन्य साधनों से बने दीए का इस्तेमाल कर लेते हैं।

  ज्ञात रहे हमारे यहां नई फसल को अपने ईष्टदेव को समर्पित कर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है, जिसे हम *नवा खाई* के नाम पर जानते हैं। यहां नवा खाई को तीन अलग-अलग अवसरों पर मनाने का रिवाज है। कई लोग ऋषि पंचमी के अवसर पर नवा खाई मनाते हैं, कई दशहरा के अवसर पर मनाते हैं और कई दीपावली के अवसर पर।

   सुरहुत्ती के अवसर पर नई फसल से प्राप्त चावल के आटे से बनाये जाने वाला दीपक भी इसी परंपरा का निर्वाह है। हम लोग जब गाँव में रहते थे. इसी नए चावल के बने दीये को बुजुर्गों के द्वारा निर्देशित स्थानों पर रखते थे. और जब दीया अपनी रोशनी बिखरने के पश्चात शांत हो जाते थे. तब हम लोग उस चावल आटे के दीए को, जो तेल और बाती से जलने की प्रक्रिया में एक प्रकार से रोटी की तरह सिंक से जाते थे. उसे उठाकर हम लोग बड़े चाव के साथ खा जाया करते थे.
* सुशील भोले -9826992811