तीजा उपास अउ करू भात
हमर इहाँ के तीजहारिन मन तीजा उपास के बिहान भर घरों घर किंजर किंजर के बासी खाये ले जादा, उपास के पहिली दिन करू भात खाये म जादा रुचि लेथें. वइसे तीजा उपास संग करू भात खाये के कोनो आध्यात्मिक कारण तो नइहे, फेर एकर आयुर्वेदिक महत्व जरूर हे.
जानकर मनके कहना हे- करू भात के रूप म खाये जाने वाला करेला के साग म कतकों किसम के आयुर्वेदिक गुण होथे, जेकर ले उपसनिन मनला, जेन कटकर ले 24 घंटा के निरजला उपास रहिथें, वोमा जादा पियास नइ जनाए के संगे-संग अउ कतकों किसम के लाभ होथे. शायद इही सबला चेत करके हमर पुरखा मन उपास के पहिली करू भात के रूप म करेला खाये के नेंग बनाए होही.
वैज्ञानिक मनके कहना हे- करेला म विटामिन A, B अउ C पाए जाथे. एकर छोड़े कैरोटीन, बीटाकैरोटीन, लूटीन, आयरन, जिंक, पोटैशियम, मैग्नीशियम अउ मैगजीन आदि घलो पाए जाथे. जेकर सेती उपास रहे के सेती होइवया जलन या गरमी ले बचाथे. पित्त, कफ रुधिर विकार ले बचाथे. पाण्डुरोग, प्रमेह अउ कृमि के नास घलो करथे.
आजकल बजार म बड़े बड़े हाइब्रिड करेला जादा देखे म आथे, फेर जानकर मनके कहना हे- अइसन बड़का बड़का करेला के बदला छोटे छोटे करेला, जेला हमन अपन घर बारी म मिलने वाला देशी किसम घलो कहि देथन, वोकर उपयोग करना चाही. ए छोटे करेला मन म पौष्टिक तत्व बड़े करेला के अपेक्षा जादा होथे. वइसे करेला के बजार भाव अभी ले तमतमाये बर धर लिए हे. तभे तो कतकों झन अभी ले फ्रीज आदि म सकेले बर धर लिए हें.
-सुशील भोले-9826992811
Thursday, 25 August 2022
तीजा उपास अउ करू भात
Tuesday, 23 August 2022
पेउस म सौ गुना जादा होथे पोषक तत्व
सामान्य दूध ले सौ गुना जादा फायदा करथे 'पेउस'
जेकर मन के घर म गाय-गोरू पोंसे जाथे, वोमन उंकर लइका जनमे के तुरंत बाद निकलने वाला पिंयर गाढ़ा दूध ल बने चुरो जमा के 'पेउस' जरूर खाए होहीं. अपन हितु-पिरितु मन घर अमराए अउ खवाए घलो होही.
गाय या भइंस के जनमे के बाद के पहला अउ दूसरा दिन के दूध म पोषक तत्व के मात्रा विशेष रूप ले जादा होथे. चिकित्सा वैज्ञानिक मन के कहना हे- सामान्य दिन के दूध म जतका मात्रा म पोषक तत्व होथे, वोकर ले लगभग सौ गुना तक जादा पोषक तत्व ए बखत होथे. वइसे तो एमा एक सप्ताह तक पोषक तत्व के मात्रा म बढ़ोतरी पाए जाथे, फेर वोमा धीरे धीरे कमी आए लगथे. शुरू शुरू के दूध ह तो बने जमथे घलो, वोकर बाद के ह खुजरी असन होए लागथे. खुजरी माने जइसे फटे दूध ह दिखथे, तइसे बरोबर हो जाथे. तभो एमा मिठास अउ पोषक तत्व रहिथेच. जबकि फटे दूध तो अमसुर बानी के जनाथे.
चिकित्सा वैज्ञानिक मन के कहना हे- पहला अउ दूसरा दिन के दूध म कुछ विशेष किसम के एंटीबॉडीज होथे, जेहा गाय के थन ले निकलथे. जेकर सेवन ले शरीर ल कई किसम के फ्लू अउ इंफेक्शन ले बचाए जा सकथे. संग म वो ह शरीर के मांसपेशी ल मजबूत करथे अउ वजन घलो ल घटाथे.
शायद लइका जनमे के बाद के महतारी मन के दूध म अइसने अद्भुत विशेषता होए के सेती हमरो महतारी मनला अपन लइका मनला तुरंत स्तनपान कराए के सलाह डॉक्टर मन देथें.
गाय-गोरू के दूध के पेउस जमाए के बारे म जानकर मन के कहना हे- एमा मिठास बढ़ाए बर शक्कर के बदला गुड़ के उपयोग करना आयुर्वेदिक दृष्टि ले जादा लाभकारी होथे.
गाँव म राहन त अबड़ पेउस खाए बर मिलय. दूध के दुहना ल करो के करौनी घलो गजब खाए हावन, फेर अब शहर म ए सब सपना बरोबर जनाथे. वइसे कभू-कभार इहों दर्शन हो जाथे, फेर वो ह अंगरी म गिनउ कस हे.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Wednesday, 17 August 2022
एक ले जादा परब म होवथे भरम
एक ले जादा परब अउ संदर्भ के सेती होवत हे भरम...
आज इंटरनेट के माध्यम ले सोशलमीडिया के चलन संग कतकों अइसन परब अउ उंकर मनले जुड़े संदर्भ मन के आने-आने जुड़ाव देखे बर मिलत हे. एकेच दिन म दू अलग अलग परब के जुड़ना ह सिरिफ संयोग के बात आय, फेर हमर मन के अज्ञानता अउ दूसर मनके देखे बताए संदर्भ ह लोगन म भरम के बीजा बोवत हे. एकर सेती लोगन आपस म ही बहसबाजी अउ तर्क वितर्क करे बर धर लिए हें.
आवव छत्तीसगढ़ ले जुड़े कुछ अइसने परब मन के मूल स्वरूप अउ आज लोगन ल देखाए जावत आने स्वरूप ल थोरिक टमड़ के देखथन.
अभी हमन कमरछठ परब मनाए हावन. एला आजकल हलषष्ठी के रूप म बताए जावत हे. आज ले दस पंदरा साल पहिली तक हमन ए हलषष्ठी नाम ल सुने तक नइ रेहेन. छत्तीसगढ़ पुरखौती बेरा ले कमरछठ ही मनावत अउ सुनत आए हे. कमरछठ जेन संस्कृत भाषा के 'कुमार षष्ठ' के अपभ्रंश ले बने शब्द आय. ए ह कुमार अर्थात कार्तिकेय आय. पूरा देवमंडल म कार्तिकेय ल ही कुमार कहे जाथे. एकरे सेती आज के दिन महतारी मन उंकर माता पिता के सगरी बनाके पूजा करथें. तेमा उंकरो लइका मन कार्तिकेय जइसे श्रेष्ठ, योग्य अउ दीर्घायु हो सकय. फेर सोशलमीडिया के संगे-संग अउ आने मीडिया मन के माध्यम ले अन्य प्रदेश ले अवइया ग्रंथ अउ लोगन के बताए बात के सेती एला बलराम जयंती के रूप म प्रचारित करे जाय लगे हे. एक बात तो आप मन स्पष्ट जान लेवव, इहाँ के मूल निवासी समाज ह आदिकाल ले जेन परब ल जीयत आए हे, वो ह बलराम ऊपर आधारित तो बिल्कुल नइ हो सकय.
अभी अवइया महीना म 'दशहरा' अवइया हे. इहू म अइसने झिंकातानी असन बात हो सकथे. काबर ते 'दंसहरा' ल विजयादशमी के रूप म ही प्रचारित करे जाथे. असल म दशहरा अउ विजयादशमी दू अलग अलग पर्व आय, जेन हमर मनके अज्ञानता के सेती गड्डमड्ड होके एक होगे हे. विजयादशमी ल सबो जानथें. भगवान राम द्वारा आततायी रावण ऊपर विजय प्राप्त करे के परब आय. फेर दशहरा ह असल म 'दंसहरा'आय. दंस अर्थात विष अउ हरा अर्थात हरण के परब. मतलब ए ह विषहरण के परब आय. उही विषहरण जेला शिव जी ह समुद्र मंथन ले निकले विष के करे रिहिसे. एकरे सेती उनला 'नीलकंठ' घलो कहे जाथे. काबर ते उन वो विष ल अपन कंठ माने टोटा म रख लिए रिहिन हें, जेकर सेती उंकर टोटा नीला अर्थात नीलकंठ होगे रिहिसे. दंसहरा के दिन नीलकंठ पक्षी ल देखना शुभ माने जाथे. काबर ते वोला ए दिन शिव जी के प्रतीक माने जाथे. फेर हम ए दू अलग अलग परब ल एकमई कर डारे हावन.
हमर इहाँ एकर पाछू एक अउ परब आथे, जेला हम सब 'छेरछेरा' के नाम ले जानथन. एकरो संदर्भ म लोगन के अलग अलग मान्यता हे. इहाँ के मैदानी भाग म एला खरीफ फसल के मिंजाई कुटाई के पाछू उत्सव के रूप म दान दे के परब के रूप म मनाए जाथे. जबकि इही ल इहाँ के सब्जी उत्पादक मरार समाज के मन शाकंभरी जयंती के रूप म मनाथें. इहाँ के मूल निवासी समाज एला गोटुल/घोटुल के शिक्षा म पारंगत होए के पाछू तीन दिन के परब के रूप म मनाथें. मोला जेन ज्ञान मिले रिहिसे, तेकर अनुसार ए ह भगवान शंकर द्वारा बिहाव के पहिली पार्वती के परीक्षा ले खातिर नट के रूप म नाचत गावत जाके भिक्षा मांगे के प्रतीक स्वरूप मनाए जाथे. एकरे सेती ए दिन लोगन बने सज-सम्हर के नाचत गावत कुहकी पारत भिक्षा मांगे बर जावंय. अब अइसन नजारा देखई ह नहीं के बरोबर होगे हे. फेर हमन जब गाँव म राहन त छेरछेरा म हमर गाँव के कलाकार टोली वाले मनला ए दिन पूरा रौ म देखन.
हमर इहाँ एक होली के परब घलो मनाए जाथे, जेला होलिका दहन के रूप म प्रचारित करे जाथे. ए ह छत्तीसगढ़ के संदर्भ म पूर्ण सत्य नोहय. हमर छत्तीसगढ़ म जेन परब मनाए जाथे वो ह असल म 'कामदहन' के परब आय. एकर ले संबंधित कथा सुने होहू- ताड़कासुर नाम के एक असुर ह शिव पुत्र के हाथ ही मरे के वरदान पाके भारी अतलंगी करत रहिथे. काबर ते शिव जी तो सती के आत्मदाह के बाद घोर तपस्या म लीन हो जाए रहिथे. अइसे म कहाँ ले शिव पुत्र आही अउ कोन वोला मारही? गुन के भारी अतलंगी मचावत रहिथे.
एकरे समाधान के सेती देवता मन कामदेव जगा अरजी करथें के कइसनों कर के शिव तपस्या ल भंग कर तेमा वोहा तपस्या ले उठय, पार्वती संग बिहाव करय, तब शिव पुत्र के आगमन होवय, जेहा ताड़कासुर के अतलंगी ले मुक्ति देवावय.
देवता मनके अरजी विनती करे ले कामदेव ह अपन सुवारी रति संग बसंत के मादकता भरे मौसम म जाके शिव तपस्या भंग करे के उदिम करथे. वोमन वासनात्मक गीत-नृत्य के प्रदर्शन करथें, तेमा शिव के मन म घलो काम के जागरण हो सकय. फेर इहाँ उल्टा हो जाथे. शिव जी अपन तीसरा नेत्र ल खोल के कामदेव ल ही भसम कर देथे.
हमर छत्तीसगढ़ म जेन होली के परब मनाए जाथे, वोहा कुल चालीस दिन, बसंत पंचमी ले लेके फागुन पुन्नी तक मनाए जाथे. बसंत पंचमी के दिन हमर इहाँ जेन होले डांड़ म अंडा पेंड़ गड़ियाये जाथे, वो ह असल म कामदेव के आगमन के प्रतीक स्वरूप ही होथे. वोकर साथ ही इहाँ रोज होले डांड़ म नाचे गाये के सिलसिला चालू हो जाथे. इहाँ ए बात ध्यान राखे के लाइक हे, ए होले गीत नृत्य म वासनात्मक शब्द अउ दृश्य मन के गजब चलन होथे. काबर ते कामदेव अउ रति शिव तपस्या भंग करे बर अइसन उदिम करे रहिथें.
आपे मन गुनव- कहूँ ए परब ह सिरिफ होलिका दहन के सेती होतीस, त चालीस दिन के काबर मनाए जातीस? होलिका तो एके दिन म चीता रचवाईस, वोमा आगी ढिलवाइस अउ खुदे जल के भसम होगे. वोकर बर चालीस दिन के परब काबर? वासनात्मक गीत-नृत्य अउ शब्द ले होलिका के का संबंध?
संगी हो, हमर इहाँ के पूरा के पूरा परब तिहार अउ वोकर मनले जुड़े संदर्भ के नवा सिरा ले समीक्षा करे के जरूरत हे, तभे हमर मूल पहचान बांचे पाही. कहूँ आने आने क्षेत्र ले अवइया लोगन के संगत म उंकर बताए अउ देखाए रद्दा म अंखमुंदा रेंगबो त इहाँ के अस्मिता अउ सांस्कृतिक अस्तित्व के जउंहर हो जाही. अपन स्वतंत्र सांस्कृतिक चिन्हारी खातिर हमला अपन अस्मिता के पारंपरिक रूप के अनुसार लेखन, पढ़न करे बर लागही. नवा पीढ़ी ल आरूग रूप सौंपे बर लागही.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Monday, 8 August 2022
लोक परंपरा 'नंगमत'
लोक परंपरा के मोहक रूप 'नंगमत'
हमर छत्तीसगढ़ म सांस्कृतिक विविधता के अद्भुत दर्शन होथे. इहाँ कतकों अइसन परब अउ परंपरा हे, जेला कोनो अंचल विशेष म ही बहुतायत ले देखे बर मिलथे. हमर इहाँ एक 'नरबोद' परब मनाए जाथे, एला जादा कर के वन्यांचल क्षेत्र म ही जादा कर के देखे जाथे. ठउका अइसने 'नंगमत' के परंपरा घलो हे, जेला क्षेत्र विशेष म ही बहुतायत ले देखे जाथे.
'नंगमत' के आयोजन ल जादा करके नागपंचमी के दिन ही करे जाथे. वइसे कोनो-कोनो गाँव म एकर आयोजन ल हरेली के दिन घलो कर लिए जाथे. जानकर मन के कहना हे, बरसात के दिन म सांप-डेड़ू जइसन जहरीला जीव-जंतु खेत-खार आदि म जादा कर के निकलथे, अउ ठउका इही बेरा खेती किसानी के बुता घलो भारी माते रहिथे, अइसन म लोगन ल खेत-खार जाएच बर लागथेच एकरे सेती उंकर मनके प्रकोप ले बांचे खातिर एक प्रकार के पूजा-बंदना करे जाथे. उंकर मनके जस गीत गा के सुमिरन करे जाथे.
ग्रामीण संस्कृति म बइगा कहे जाने वाला मंत्र साधक के अगुवाई म नंगमत के आयोजन होथे. एमा बइगा ह अपन अउ मंत्र साधक चेला मन संग मिलके नंगमत के जोखा मढ़ाथे. बताए जाथे, जे बइगा ह सांप चाबे के जहर ल उतारे म सक्षम होथे, तेनेच ह ए आयोजन के अगुवाई करथे, अउ ए आयोजन म जेन चेला के सबो चेला मन म श्रेष्ठ प्रदर्शन करथे, वोला ए सांप के जहर उतारे वाले बुता म या कहन बइगई करे के अनुमति देथे. बाकी चेला मनला घलो अनुमति होथे, फेर वो मनला सिरिफ छोटे-मोटे फूक-झाड़ के ही.
इहाँ ए बात जाने के लाइक हे, हमर छत्तीसगढ़ म हरेली परब के दिन अपन-अपन मांत्रिक शक्ति के पुनर्जागरण या पुनर्पाठ करे के परंपरा हे. इही दिन गुरु-शिष्य बनाए के परंपरा हे, जेला इहाँ पाठ-पिढ़वा देना या लेना कहे जाथे. ठउका अइसने च नंगमत के आयोजन ले जुड़े परंपरा घलो हे.
वइसे नंगमत के आयोजन ल सांप मनके पूजा-सुमरनी अउ पुराना पीढ़ी द्वारा नवा पीढ़ी ल अपन परंपरा के पोषण अउ आगू ले जाए के जिम्मेदारी खातिर प्रेरित करे के उद्देश्य खातिर घलो करे जाथे. कतकों लोगन खातिर ए ह सिरिफ मनोरंजन के माध्यम होथे, तेकर सेती वो मन सावन महीना के लगते एकर आयोजन के जोखा म लग जाथें. एकर मनोरंजक रूप के आनंद ले खातिर आस-पास के गांव वाले मन घलो गंज संख्या म सकलाथें.
नंगमत के शुरुआत गाँव के ठाकुर देव, मेड़ो देव अउ आने जम्मो ग्राम्य देवता मन के संगे-संग अपन-अपन ईष्ट देवता मनके पूजा-सुमरनी के साथ होथे. जइसे गौरा-ईसरदेव परब म कोनो विशेष जगा ले पवित्र माटी लान के चौंरा बनाए जाथे, ठउका अइसने च एकरो खातिर नाग मनके रेहे के ठउर जेला भिंभोरा या बांबी आदि कहे जाथे, उहाँ ले माटी लान के एकरो खातिर एक चौंरा बनाए जाथे, जेमा पूजा-अर्चना करे जाथे. जस गीत गाने वाला सेउक मन नाग देवता के मांदर-ढोलक, झांझ-मंजीरा संग जस गान करथें.-
गुरुसर गुरुसर गुर नीर गुरु साहेर शंकर
गुरु लक्ष्मी गुरु तंत्र मंत्र गुरु लखे निरंजन
गुरु बिना हुम ला हो काला रचे हो नागिन
गुरु के आवत जनि सुन पातेंव
चौकी चंदन पिढ़ुली मढ़ातेंव
लहुर छोड़ के अंगना बहारतेंव
रूंड काट मुंड बइठक देतेंव
जिभिया कलप के हो....
इही बीच बइगा ह अपन मंत्र शक्ति के प्रयोग ले इच्छित लोगन के ऊपर नाग या अन्य सांप मनके आव्हान करथे, जेकर ले उनमा उंकर आगमन होथे, तहाँ ले जेन सांप उंकर ऊपर आए रहिथे, वोकरे अनुसार वोमन झूमथें-नाचथें, अंटियाथें-फुफकारथें, भुइयां म घोनडइया मारथें. इही बेरा ह देखइया मन बर मोहनी हो जाथे. एक निश्चित बेरा के बाद वोकर मन के शरीर ले वो सांप ल उतारे के परंपरा ल पूरा करे जाथे.
आखिर म वो जगा सकलाय लोगन ल परसाद बांटे जाथे. ए परसाद म नांगजरी के विशेष महत्व होथे. उहू ल लोगन ल अउ आने परसाद संग संघार के दिए जाथे. एला कोनो भी बिखहर सांप के जहर उतारे बर रामबाण माने जाथे. ए नांगजरी ल बइगा ह विशेष पूजा-पाठ कर के लाने रहिथे. हमन ल बताए जाय, रिंगनी पेंड़ के जड़ ल कोनो निश्चित दिन म निमंत्रण देके, रतिहा म पूजा-पाठ कर के लाने जाथे. नंगमत के परंपरा ल पूरा करे के बाद जेन चेला ल विशिष्ट रूप ले मंत्र दीक्षा दिए जाथे, वोला कहूँ जगा ले भी सांप चाबे के जानकारी मिलथे, उहाँ जाना जरूरी होथे.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811
Friday, 29 July 2022
नंदावत परंपरा अखाड़ा के..
नंदावत परंपरा अखाड़ा के..
हमन कक्षा चौथी म रेहेन त पाठ 18 म एक कविता पढ़न-
सूरज के आते भोर हुआ,
लाठी लेझिम का शोर हुआ
यह नागपंचमी झम्मक-झम,
यह ढोल-ढमाका ढम्मक-ढम
मल्लों की जब टोली निकली,
यह चर्चा फैली गली-गली
दंगल हो रहे अखाड़े में,
चंदन चाचा के बाड़े में.
ठउका कक्षा तीसरी के पाठ 17 म घलो एक कविता पढ़न-
इधर उधर जहाँ कहीं,
दिखी जगह चले वहीं
कमीज को उतार कर,
पचास दंड मारकर
अजी उठे अजब शान है,
अरे ये पहलवान है.
सफेद लाल या हरा,
लंगोट कस झुके जरा
अजब की शान है,
अरे ये पहलवान हैं.
अइसन नजारा तब वाजिब म जगा-जगा देखे बर मिल जावत रिहिसे. लोगन अपन लइका मनला अखाड़ा म भेजना अउ उहाँ के दांवपेंच सिखवाना ल गरब के संगे-संग लइका के शारीरिक अउ मानसिक विकास खातिर बहुत जरूरी मानत रिहिन. फेर अब जइसे-जइसे आधुनिकता अउ वैज्ञानिकता के नाव म शारीरिक कौशल के पारंपरिक तरीका ले दुरिहावत जावत हन, वइसे-वइसे शारीरिक सुदृढ़ता के संगे-संग अपन परंपरा अउ संस्कृति ल घलो बिसरावत जावत हन.
हमर पारा म हरदेव लाल मंदिर हे. इहाँ हर बछर नागपंचमी के दिन पूरा छत्तीसगढ़ स्तरीय कुश्ती के आयोजन होवय, जेमा रायपुर के सबो नामी पहलवान मन तो आबे च करंय. दुरुग, भेलई, नांदगांव, बिलासपुर, धमतरी, महासमुंद जइसन शहर के पहलवान मन घलो आवंय अउ बिहनिया ले रतिहा के होवत के अपन-अपन जोड़ के पहलवान मन संग शारीरिक कला-कौशल के प्रदर्शन करंय. लोगन खवई-पियई ल छोड़ के दिन भर उंकर मन के कुश्ती के मजा लेवत राहंय. फेर ए सब अब सिरिफ 'सुरता' के विषय बनके रहिगे हे. अइसने अउ कतकों जगा आयोजन होवय.
एकर खातिर माटी ल कोड़-खान के विशेष रूप ले तैयार करे जाय. कतकों जगा के अखाड़ा मन तो मंदिर बरोबर पवित्र अउ सुरक्षित रहय, जिहां हनुमान जी के विशेष रूप ले पूजा-पाठ होवय. पहलवान मन जेन माटी म कुश्ती लड़थें, वोला महतारी के रूप म सम्मान देथें अउ मानथें. विशेषज्ञ मन बताथें- कुश्ती के अखाड़ा के माटी म दूध, मही, सरसों के तेल, हल्दी अउ लिमउ घलो मिंझारे जाथे. जेकर ले वो माटी ह एकदम कोंवर अउ फुरहुर हो जाथे.
इहाँ ए जानना जरूरी हे, हमर छत्तीसगढ़ म पहिली इही अखाड़ा के पवित्र माटी ल नागपंचमी परब के कुश्ती संपन्न होए के बाद भोजली बोवइया मन अपन-अपन घर लेगंय अउ उही म भोजली बो के भोजली दाई के सेवा करंय. अब तो कुश्ती अउ अखाड़ा के परंपरा ह लट्टे-पट्टे दिखथे, त अइसन म वोकर माटी म भोजली बोए के परंपरा घलो देखे म नइ आवय.
आजकल तो लोगन अखाड़ा जाए के बलदा जिम जाए लगे हें. उहाँ सिंथेटिक कपड़ा के बने मैट म कुश्ती के अभ्यास करथें. देश विदेश म आयोजित होने वाला कुश्ती प्रतियोगिता मन घलो अइसने मैट म होए लगे हे. फेर जानकर मन बताथें, जेन आनंद अउ माटी संग जुड़ाव के अनुभुति माटी के मैदान म होवय, वो ह मैट म नइ होवय.
हमर गाँव म कुश्ती वाला अखाड़ा तो मैं नइ देखे रेहेंव, फेर अस्त्र-शस्त्र चलाए के संग अउ आने शारीरिक कला-कौशल के प्रदर्शन करने वाला अखाड़ा जरूर देखन. एमा पारंगत लोगन पर्व विशेष के दिन अपन ए कला के जबरदस्त प्रदर्शन गाँव के मैदान म करंय. गाँव म कभू बरात आवय या हमर गाँव ले बरात कोनो आने गाँव जावय, त एकर मन के अद्भुत कला-कौशल के दर्शन बरात परघनी के बेरा रात भर देखे ले मिलय. सब अपन-अपन कला के प्रदर्शन करंय. ए ह लोगन ल अतेक भावय, ते लोगन दुल्हा बाबू संग जेवनास घर म जाए अउ दूधभत्ता म शामिल होए के बलदा अखाड़ा के आनंद म ही बूड़े रहि जावंय. अब तो बर-बिहाव ह घलो एक दिन अउ कभू-कभू तो एके जुवर म संपन्न हो जाथे, त अइसन म भला वो रात-रात भर के परघनी अउ अखाड़ा के करतब कहाँ देखे ले मिलही?
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा.9826992811
Tuesday, 26 July 2022
गेंड़ी प्रसंग...
गेंड़ी प्रसंग...
हमर छत्तीसगढ़ म हरेली एक अइसे परब आय, जेला लइका मन गजब उत्साह के साथ अगोरा करथें. काबर ते ए दिन वोमन ल बांस के बने गेंड़ी म चघे अउ नंगत किंजरे के अवसर मिलथे. एकरे सेती लइका मन ए हरेली परब ल 'गेंड़ी परब' के रूप म घलो चिन्हारी करथें.
वइसे तो ए परब म गेंड़ी काबर बनाए जाथे, एकर ए परब ले संबंधित का महत्व हे, ए बात कोनो ठोस कारण नइ मालूम होवय. अउ ते अउ एकर कोनो आध्यात्मिक कारण घलो समझ म नइ आवय. फेर चेतलग सियान मन के कहना हे, एला चम्मास के गहीर बरसा के सेती किचिर-काचर माते चिखला ले लइका मनला बचा के रेंगाए खातिर बनाए गे होही. तेमा वोमन चिखला-पानी ल नाहकत घलो स्कूल, कोनो तरिया या अपन संगी-साथी मन संग मेल-भेंट करे बर आसानी के साथ जा सकय. एकरे सेती ए हरेली परब के बहाना गेंड़ी बनाए के नेंग ल घलो कर दिए जाथे.
ठउका अइसने एकर विसर्जन खातिर घलो कोनो अलग से परब नइ मनाए जाय, तभो ले एला नरबोद परब के दिन टोर-टुरा के विसर्जित कर दिए जाथे. ए नरबोद परब ल वनांचल क्षेत्र म बहुतायत म मनाए जाथे. ए परब ल 'पोरा तिहार' के बिहान दिन मनाए जाथे.
ए नरबोद परब म सबो गाँव वाले मन पोरा के दिन के बांचे रोटी-पीठा अउ घर म जतका सदस्य होथे, वो सबो के नाव ले जुन्ना खटिया के डोरी ल गांठ बांध के, घर के जम्मो परेशानी-समस्या, रोग-राई, खाज-खजरी ल प्रतीक स्वरूप एक ठन पोतका म बांध के सकलाथें. गांव के बइगा ह सांहड़ा देव के पूजा-पाठ करथे. तहाँ ले सबो गाँव वाले मन संग सियार म पहुँचा देथे. ए तिहार म हरेली के दिन बनाए गेंड़ी ल घलो टोर-टुरा के सरोय के परंपरा ल पूरा करे जाथे. गेंड़ी ल गांव के सियार म एक पेंड़ जगा सात भांवर गोल घूम के टोरे जाथे. बइगा ह इही जगा हूम-धूप देके सबो गाँव भर के लाए पोतका मनला बार के रोग-राई ल छोड़ देथे.
एकर बाद लइका मन गाँव के सबो रोग-राई, बीमारी-परेशानी, दुख-दरद ल ले जा रे नरबोद कहिके चिल्लावत सियार म नहका देथे. बाद म बेलवा डारा, कर्रा डारा ल खेत, घर, बारी-बखरी, कोठार आदि म खोंचे जाथे. एकर मानता हे, के एकर ले जम्मो किसम के परेशानी दुरिहा रहिथे.
आज गेंड़ी ह प्रतियोगिता के संगे-संग कला के प्रदर्शन के रूप घलो धर लिए हे, एकरे सेती अब एला बारो महीना कोनो न कोनो रूप म देखे जा सकथे.
अभी हमर छत्तीसगढ़ सरकार ह हरेली के दिन सबो स्कूल मन म लइका मन खातिर गेंड़ी दौड़ के प्रतियोगिता आयोजित करे बर आदेश निकाले हे, तेनो ह गजब सहराय के लाइक हे. काबर ते एकर माध्यम ले लइका मन अपन परंपरा अउ भाखा संग जुड़त जाही.
-सुशील भोले-9826992811
Tuesday, 19 July 2022
राज्य आन्दोलन ऐतिहासिक पाती
छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन ले जुड़े ऐतिहासिक पाती...
छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन के इतिहास म 28 जनवरी 1956 के राजनांदगाँव म होए 'छत्तीसगढ़ी महासभा' के बइठका अउ गठन ल सदा दिन सुरता करे जाही, काबर ते इही दिन छत्तीसगढ़ ल अलग राज्य के चिन्हारी मिले खातिर करे गे आन्दोलन के नेंव रचे गे रिहिसे.
छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा डाॅ. खूबचंद बघेल के चिंतन-मनन ले उपजे ए जबर बुता के परिणाम आज हम ए देश के नक्शा म छत्तीसगढ़ राज्य के स्वतंत्र अस्तित्व देखत हावन.
वो बखत 'छत्तीसगढ़ी महासभा' के लोकप्रियता अउ लोगन के ओकर संग जुड़ाव कतेक जबर रिहिस होही, ए ह ए 'पाती' ले प्रमाणित होथे. ए पाती ह छत्तीसगढ़ी महासभा के अध्यक्ष डॉ. खूबचंद बघेल के नाॅंव ले जारी होए हे, जेहा प्रिंटेड माने प्रेस म छपे वाला आय. वो बेरा म प्रेस म कोनो पाती ल छपवाय के मतलब होथे, वोहा हजारों के संख्या म छपे अउ लोगन ल भेजे गे रिहिस होही.
ए संलग्न पाती, जेन पुरखा साहित्यकार कोदूराम जी दलित ल भेजे गे रिहिसे, ए ह उंकर सपूत साहित्यकार अरुण निगम जी के माध्यम ले मिले हे. ए पाती म दुर्ग पोस्ट विभाग के जेन ठप्पा लगे हे, वोमा 19-3-1957 के तारीख छपे हे. पाती म 'छत्तीसगढ़ी महासभा' के गठन के साल भर बाद होए बइठका अउ वोकर खातिर निर्धारित विषय के जानकारी हवय. पाती भेजइया के रूप म अध्यक्ष डॉ. खूबचंद बघेल अउ व्यवस्थापक के रूप म केयूर भूषण जी के नाॅंव छपे हे.
-सुशील भोले-9826992811