Thursday, 16 February 2023

सुआ, करमा ददरिया किताब राधिका वर्मा

किताब के गोठ//
परंपरा के संरक्षण करत 'सुआ, करमा अउ ददरिया'
    हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी के मयारुक रचनाकार राधिका वर्मा जी के अभी तुरते छपे किताब 'सुआ, करमा अउ ददरिया' ल पढ़ के गजबे आनंद आइस, काबर ते ए किताब ह हमर पारंपरिक गीत मन के संकलन आय, जेकर मन के संरक्षण खातिर हमन जम्मो लेखक अउ इहाँ के संस्कृति खातिर बुता करइया मनला गोहरावत रहिथन.
    राधिका वर्मा जी के अपन खुद के सिरजाय रचना मन के संग्रह 'पीरा.. मन के' पहिली पढ़े बर मिले रिहिसे, फेर अभी के संकलन ह पारंपरिक गीत मन के थाथी आय. एमा राधिका वर्मा जी अपन खुद के प्रयास ले सकेले पुरखौती गीत मन के संगे-संग रमा विश्वकर्मा, सविता सोनी, बसंती दीक्षित, पूर्णिमा वर्मा, चमेली वर्मा, लक्ष्मी वर्मा, जानकी वर्मा, कालिन्द्री, सुलक्षणा वर्मा, तुलसा वर्मा, आशालता सोनी, गीता विश्वकर्मा, श्यामा उइके, पन्ना शर्मा, केजा बाई ग्वालीन, सोनकुंवर वर्मा, उमा वर्मा आदि मन के द्वारा संचालित तीन कोरी अकन लोकगीत मनला संघारे हे.
    राधिका वर्मा जी ए किताब म लोकगीत मन के संकलन खातिर प्रेरित करइया डाॅ. निरूपमा शर्मा जी ल सुरता करत लिखे हें- छत्तीसगढ़ महिला साहित्य अउ विकास परिषद के अध्यक्ष रहत वोमन एकर मन के संकलन खातिर कहे रिहिन हें. उंकरे बताए रद्दा म ए लोकगीत मनला अपन तीर-तखार म रहइया दाई-दीदी, बहिनी, मामी, ममादाई मन जगा गिंजर-गिंजर के सकेले रेहेंव अउ सन् 2004 म एकर पांडुलिपि ल रायपुर के दादा बाड़ी जैन मंदिर म सत्यनारायण शर्मा जी जगा विमोचन करवाए रेहेंव, फेर आज 14 फरवरी 2023 के सामाजिक समरसता सम्मान समारोह जेन रायपुर के कृष्णा नगर के कर्माधाम म होइस, तिहां वो पांडुलिपि ल किताब रूप म छपवा के विमोचन करवाए  हौं.
    ए किताब के नाॅव भले 'सुआ, करमा अउ ददरिया' हे, फेर एमा एकर मन के संगे-संग सोहर गीत, शीतला माता सेवा, माता सेवा जसगीत, बारहमासी, जंवारा गीत, भोजली गीत, गौरा-गौरी गीत, जम्मो नेंग जोंग मन के बिहाव गीत, नचउड़ी गीत, लोरिक चंदा के गीत, बांस गीत, गंगोरिहा गीत, भरथरी गीत, पंथी गीत के संगे-संग कुछ हाना अउ राउत नाचा वाले दोहा मनला  संघारे गे हवय.
    कुल मिलाके ए किताब ह परंपरा अउ संस्कृति खातिर बुता करइया लोगन मन बर अनमोल खजाना बरोबर हे. मैं राधिका वर्मा जी ल ए जबर बुता खातिर बधाई देवत ए अरजी घलो करत हौं, के उन अइसने हमर दाई-काकी अउ बूढ़ी दाई मन जेन अलग अलग परब-तिहार, प्रसंग आदि म किस्सा कहानी बेरा-बखत के मुताबिक सुनावत राहंय, वोकरो मन के संकलन कहूँ हो सकय, त अउ जबड़ बुता हो जाही.
    ए ठउका उदिम खातिर राधिका जी ल एक पइत अउ बधाई.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Wednesday, 15 February 2023

फुरफुन्दी.. किताब.. कन्हैया साहू अमित

किताब के गोठ//
लइकई ल आॅंखी-आॅंखी म झुलावत 'फुरफुन्दी'

    मयारुक रचनाकार कन्हैया साहू 'अमित' के हाले म आए बाल कविता संग्रह 'फुरफुन्दी' ल हाथ म धरते अपन लइकई ह आॅंखी-आॅंखी म झुले लागिस. जब हमन फुरफुन्दी के पाछू भागत-भागत बारी-बखरी के संगे-संग स्कूल तक चल देवत रेहेन, अउ लहुटत घलो उहिच उदिम म बूड़े राहन. कभू-कभू तो फुरफुन्दी के पूछी म सुतरी बॉंध के संगी मन संग रेस घलो लड़ा देवन, के काकर फुरफुन्दी जादा उड़ियाथे.

    फुरफुन्दी किताब के भीतर म अमाते अपन लइकई के संगे-संग अपन नाती-नतुरा मन संग खेलत, उनला लुढ़ारत अउ कुछ बने बुता करे के गोठ सिखोवत जम्मो दृश्य ह चित्रमय कविता संग दिखे लागिस.

    आज के छत्तीसगढ़ी लेखन म चारों खुंट गहराई अउ चिंतन-मनन देखे म आवत हे. अब गरब होथे इहाँ के रचना संसार ल देख के अउ मन म भरोसा जागथे, के अब एला कोनो भी लोकभाषा संग सरेखा कर के देखे जा सकथे. खासकर अभी लेखन म सक्रिय नवा पीढ़ी जेन किसम ले हर विषय अउ हर विधा म कलम चलावत हे, वो ह अंतस ल आनंदित करने वाला हे.

    कन्हैया साहू जी प्राथमिक शाला म शिक्षक होए के संगे-संग एक सिद्धहस्त छंदबद्ध कविता के रचनाकार घलो आय, एकरे सेती उंकर ए संकलन म उंकर ए दूनों रूप के चिन्हारी मिलथे. नान्हे लइका मनला कक्षा म पढ़ावत-सिखावत उन उंकर मन-अंतस म झॉंके अउ टमड़े के उदिम करथें, उही मनला अपन कविता के विषय घलो बना लेथें. ठउका अइसने छंदबद्ध कविता लेखन म पारंगत होय के सेती उंकर जम्मो रचना मन म लय-ताल सउंहे दिखे लगथे. जब ए मनला पढ़बे त मन मस्तिष्क म सुर-ताल अपने-अपन गूंजे लागथे. देखव उंकर घरघुॅंदिया  खेले बर बलावत कविता ल-

आवव अघनू, अगम, अघनिया.
खेलन फुतका मा घरघुॅंदिया..
घर अॅंगना अउ कोलाबारी.
सुग्घर सबके पटही तारी..

    लइकई म फिलफिली चलाय के अपने च आनंद  होथे. देखव ए डॉंड़ ल-

चलय फिलफिली फरफर-फरफर.
अपने सुर मा सरसर-सरसर..
रिंगी-चिंगी रंग मा रंगे.
चक्कर खाय हवा के संगे..
सनन-सनन ये बड़ इतरावय.
लइका मनला पोठ लुहावय..

    ए किताब के शीर्षक रचना फुरफुन्दी ल देखव-

लइकन ला भाथे फुरफुन्दी.
सादा, लाली, छिटही बुन्दी..
पकड़े बर लइका ललचाथे.
आगू-पाछू उरभट जाथे..
फूल-फूल मा झूमे रहिथें.
कान-कान म का इन कहिथें..

    रचना मन म ओ जम्मो विषय ल संघारे के कोशिश होय हे, जेन लइका मन बर आवश्यक होथे, एकर संगे-संग जनउला अउ हाना मनला घलो संघारे गे हवय. मच्छर जेला हमन छत्तीसगढ़ी म भुसड़ी कहिथन. एकर ले संबंधित ए जनउला देखव-

बिन बलाय मैं आथॅंव जाथॅंव.
फोकट म सुजी घलो लगाथॅंव..
साफ सफाई जे नइ राहय.
वोला तुरते रोग धराथॅंव..

    पान-सुपारी खवावत एक जनउला देखव-

पॉंच परेवा पॉंचों संग.
महल भितरी एक्के रंग..
एक जगा जम्मो सकलाय.
नइ कोनो पहिचाने पाय..

    जी. एच. पब्लिकेशन, प्रयागराज ले छपे ए बाल कविता संग्रह म कुल 47 कविता मनला संग्रहित करे गे हवय. कुल 64 पेज म सकलाय ए संग्रह के कीमत 150 रु. राखे गे हवय.

    ए संकलन खातिर मैं रचनाकार कन्हैया साहू 'अमित' जी ल गाड़ा-गाड़ा बधाई संग शुभकामना देवत हौं, उन आगू घलो अइसन पोठ उदिम करत राहॅंय, छत्तीसगढ़ी के ढाबा ल भरत राहॅंय.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Thursday, 9 February 2023

बस नाॅव के होथे सिरजन..

बस नाॅव के होथे सिरजन

सोशलमीडिया के आए ले
रचनाकार मन के
रचना के
बगराव ह जबर बाढ़गे हे.
हमन अकेल्ला
ओला चारों खुंट
बगरा नइ पावन
तेकर सेती
कतकों लोगन
ओकर खाल्हे म
अपन नाॅव चटका के
बगरा देथें.
फेर
बाय असन तब जनाथे
जब वो बगरइया ह
मूल लेखक के नाॅव ल
ओ रचना ले मेटा देथे.

ककरो रचना
ओकर विचार, दर्शन
या बात ह बने लागथे
त ओकर बगराव तो
होना ही चाही
फेर
संग म
ओ रचनाकार के
मूल नाॅव अउ
पहचान घलो तो ओमा
रहना चाही.

अइसन कतकों उत्साही
बगरइया मन तो
अइसनो हें
जेन
मोर रचना ल
मोरेच जगा
ए कहिके पठो देथें
थोरिक देखिहौ तो,
मोर नवा सिरजन ल
अउ जब मैं
ओ रचना ल देखथौं
त ओ मनखे के सिरजन
बस अतके जनाथे-
ओकर खाल्हे म
मोर नाॅव के जगा
ओकर अपन नाॅव ह
ठउर पा जाए रहिथे.
-सुशील भोले-9826992811

Wednesday, 8 February 2023

गांव म हमागे जंगल के जीव

गांव म हमागे जंगल के जीव

बिधुन होके
बजावत हें
विकास के ढोल
चारों खुंट सुनावत हे
बस्ती, पारा खोर.
काहत हें-
तोर घर
एसी, कुलर संग
बिजली के अंजोर
तभे बगरही
जब
डोंगरी कस ऊॅंच-पूर
रूख वाले जंगल उजरही.
ओ भुइयाॅं के गरभ ले
करिया पखरा निकलही.
तैं गुन ले
तोला जंगल चाही ते बिजली?
तोला परंपरा के
ढेबरी-चिमनी चाही ते
विकास के अंजोरी?
विकास के सोर म
सिरतो
रूख-राई संग जम्मो
खाये-पीये के जिनिस नंदागे
इही पाय के
उहाँ के जम्मो जीव-जंत
दाना-पानी के आस म
हमर गाँव म हमागे.
-सुशील भोले-9826992811

Tuesday, 7 February 2023

सुरता के संसार.. स्वराज करुण के समीक्षा

सुरता के संसार :यादों की गठरी में छत्तीसगढ़ी रत्नों का अनमोल खज़ाना
(आलेख - स्वराज करुण  )
साहित्य में संस्मरण लेखन एक रोचक विधा है ,जिसमें लेखक अपने अनुभवों के माध्यम से माध्यम से पाठकों को ज्ञान और विचारों का अनमोल खज़ाना सौंपने की कोशिश करते हैं।हर इंसान के जीवन यात्रा में उतार चढ़ाव के साथ कई तरह के पड़ाव आते -जाते हैं ,जिनमें अच्छे लोगों से मुलाकात और अच्छी संस्थाओं से जुड़े कई यादगार प्रसंग भी होते हैं। संस्मरण लेखन एक ऐसी विधा है ,जिसमें लेखक अपनी स्मृतियों के साथ अपने विचार भी पाठकों से साझा करते हुए आगे बढ़ता है। यात्रा वृत्तांत भी यादों का एक दिलचस्प दस्तावेज होता है। छत्तीसगढ़ी साहित्य में संस्मरण लेखन की विधा को आगे बढ़ाने वाले गिने-चुने रचनाकारों में सुशील भोले भी शामिल हैं ।
      भोले जी छत्तीसगढ़ी कविता ,कहानी और निबंध विधाओं के भी जाने -माने रचनाकार हैं। वे छत्तीसगढ़ी साहित्य के लिए समर्पित हस्ताक्षर हैं। उन्होंने हिन्दी में भी खूब लिखा है। अस्वस्थ होने के बावज़ूद उनका लेखन निरन्तर जारी है। अपने लिखे हुए को वे इन दिनों  सोशल मीडिया में साझा कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा में उनके संस्मरणो का संकलन  'सुरता के संसार' (यानी यादों का संसार)  हाल ही में प्रकाशित हुआ है।इसमें उनके 39 संस्मरणात्मक आलेख शामिल हैं। उनकी यादों की इस गठरी में साहित्य ,कला और संस्कृति से जुड़े एक से बढ़कर एक रत्नों के व्यक्तित्व और कृतित्व का अनमोल खज़ाना है। मैं ग्राम खम्हरिया नगरी -सिहावा ,जिला -धमतरी की साहित्यकार श्रीमती अमिता दुबे के साथ कल सुशील भोले से मिलने और उनकी सेहत का हालचाल लेने  टिकरापारा रायपुर स्थित उनके निवास गया था।उन्होंने बड़े स्नेह से  दोनों को अपनी इस पुस्तक की सौजन्य प्रतियाँ भेंट की। घर आकर मैं भोले के 'सुरता के संसार 'में विचरण करने लगा। पुस्तक पढ़ने लगा तो बस ,उनकी प्रवाहपूर्ण छत्तीसगढ़ी  भाषा के सागर में तैरता  ही चला गया।
   पुस्तक में  पहला आलेख छत्तीसगढ़ में स्वर्णिम विहान का स्वप्न देखने और दिखाने वाले कवि और लेखक डॉ. नरेन्द्र देव्वर्मा को समर्पित है। इस आलेख का शीर्षक है --'छत्तीसगढ़ म सोनहा बिहान के सपना देखइया डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा । उल्लेखनीय है कि डॉ. वर्मा एक बड़े भाषा विज्ञानी भी थे। वे छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच 'सोनहा विहान ' के भी कुशल उदघोषक हुआ करते थे।उन्हें वर्ष 1973 में 'छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास' विषय पर अपने शोध प्रबंध के लिए पण्डित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर से पी-एच.डी. की उपाधि मिली थी । इसके पहले उन्होंने 'प्रयोगवादी काव्य और साहित्य चिन्तन'विषय पर वर्ष 1966 में सागर विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट किया था। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी गीत 'अरपा पैरी के धार -महानदी हे अपार' को छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य गीत का दर्जा दिया है। यह छत्तीसगढ़ महतारी की वंदना का गीत है।सुशील भोले ने अपनी किताब 'सुरता के संसार' में डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा के साहित्यिक ,सांस्कृतिक और पारिवारिक जीवन के प्रेरक प्रसंगों को अपने आलेख में सहेजा है। संग्रह में उनका दूसरा आलेख  प्रथम छत्तीसगढ़ी व्याकरण के रचयिता और धमतरी के अध्यापक काव्योपाध्याय हीरालाल चन्द्रनाहू के बारे में है। वे 'पण्डित हीरालाल काव्योपाध्याय' के नाम से भी लोकप्रिय हैं। उन्होंने वर्ष 1885 में छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला व्याकरण लिखा था ,जिसे सर जार्ज ग्रियर्सन ने छत्तीसगढ़ी और अंग्रेजी के साथ वर्ष 1890 में प्रकाशित किया था सुशील भोले ने पण्डित हीरालाल काव्योपाध्याय पर केन्द्रित अपना आलेख मानक रेखाचित्र के रूप में प्रस्तुत किया है।
    भोले की कृति 'सुरता के संसार ' में छत्तीसगढ़ के महान आध्यात्मिक चिन्तक स्वामी आत्मानंद पर केन्द्रित आलेख में जानकारी दी है कि स्वामीजी छत्तीसगढ़ी लेखन को अध्यात्म से जोड़ने पर विशेष बल दिया करते थे। स्वामी जी ने  भारत के महान समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद और उनके आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का आजीवन अथक प्रयास किया। रायपुर में उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन -विवेकानंद आश्रम और बस्तर अंचल के जिला मुख्यालय नारायणपुर में स्वामी विवेकानंद जी के नाम से संचालित शैक्षणिक संस्थाएं और कई सेवा प्रकल्पों से स्वामी आत्मानंद जी की भी यादेंजुड़ी हुई हैं जो  सदैव जुड़ी रहेंगी। पुस्तक में चौथा संस्मरण छत्तीसगढ़ में शब्दभेदी बाण चलाने वाले कोदूराम वर्मा के बारे में है। वहीं भोले के कुछअन्य संस्मरणों के शीर्षक देखिए  - पंडवानी के पुरोधा नारायण प्रसाद वर्मा ,छत्तीसगढ़ी साँचा म पगे साहित्यकार टिकेन्द्र नाथ टिकरिहा, सुराजी वीर अनंत राम बर्छिहा । इन शीर्षकों से ही स्पष्ट हो जाता है कि संस्मरण किन महान विभूतियों पर केन्द्रित है।
     सुशील भोले ने वर्ष 1987 में छत्तीसगढ़ी भाषा में मासिक साहित्यिक पत्रिका 'मयारू माटी'का भी सम्पादन और प्रकाशन शुरू किया था।इसके विमोचन समारोह के संस्मरण को उन्होंने 'प्रकाशन मयारू माटी के ' शीर्षक आलेख में साझा किया है। विमोचन 9 दिसम्बर 1987 को रायपुर के कुर्मी छात्रावास में हुआ था। हालांकि कुछ कठिनाइयों के कारण उन्हें 13 अंकों के बाद इसका प्रकाशन स्थगित करना पड़ा ,लेकिन छत्तीसगढ़ी साहित्य ,कला और संस्कृति के प्रचार प्रसार और विकास में 'मयारू माटी ' का योगदान आज भी याद किया जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन में यहाँ की विभूतियों के योगदान को सुशील भोले ने अपने आलेख 'राज आंदोलन म आहुति 'शीर्षक आलेख में याद किया है। अपने गृहग्राम से जुड़ी यादों को उन्होंने 'मोर गाँव नगरगाँव'के नाम से बड़ी भावुकता के साथ प्रस्तुत किया है।।  
         सुशील भोले पहले सुशील वर्मा के नाम से जाने जाते थे। उनकी जीवन यात्रा में एक ऐसा भी पड़ाव आया,जब वे आध्यात्म की दिशा में मुड़ गए और भगवान शिव के भक्त बनकर उन्होंने 21 वर्षो तक साधना की। इसके बाद वे साहित्य के क्षेत्र में 'सुशील भोले 'के नाम से सक्रिय हुए। अपने इस संस्मरण को उन्होंने 'अध्यात्म के रद्दा'(आध्यात्म का रास्ता)शीर्षक आलेख में शामिल किया है।
      छत्तीसगढ़ तालाबों का प्रदेश रहा है।भोले ने अपनी यादों की गठरी में इसे 'छै आगर छै कोरी तरिया'शीर्षक से लिखा है। उनके कुछ आलेख छत्तीसगढ़ी नाचा और कला संस्कृति के पुरातन स्वरूप की भी याद दिलाते हैं।जैसे - रतिहा के वो अलकर नाचा,इसमें वह अपने बचपन और किशोरावस्था के दिनों में अपने पैतृक गाँव 'नगर गाँव'में हुए 'किसबिन नाच' को याद करते हैं। उन्होंने सिमगा के पास हरिनभट्टा गाँव मे एक बार हुए कवि सम्मेलन का दिलचस्प वर्णन 'सुरता वो कवि नाचा'के शीर्षक आलेख में किया है । शादी ब्याह के मौसम में जब देश के अन्य ग्राम्यांचलों की तरह छत्तीसगढ़ के गाँवों में भी बारातें बैल गाड़ियों से आती -जाती थीं ,उन बारातों से जुड़ी मधुर स्मृतियों को सुशील भोले ने 'बइला गाड़ी के बरात'में संजोया है। छात्र जीवन में फिल्में देखने की चाहत हर किसी को होती है। लेखक सुशील भोले को भी होती थी।उनका आलेख 'छात्र जीवन के  मेटनी शो'  में उनकी यह दिलचस्पी प्रकट होती है। अपने एक आलेख में वह किन्नर के कठिन  जीवन  पर प्रकाश डालते हुए उनकी प्रतिभाओं को समाज में सम्मान दिलाने की मांग करते हैं।
     उन्होंने अपने आलेखों में छत्तीसगढ़ी साहित्यकार डॉ. बलदेव ,डॉ. दशरथ लाल निषाद 'विद्रोही',सन्त कवि पवन दीवान,डॉ. परदेशी राम वर्मा,डॉ. सीताराम साहू ,संगीत शिल्पी खुमान साव ,छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्न दृष्टा डॉ. खूबचन्द बघेल , छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य नाचा के पुरोधा मदन निषाद और गेड़ी नृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का सपना देखने वाले सुभाष बेलचंदन की रचनात्मक प्रतिभा को भी रेखांकित किया है। सुशील ने अपनी प्राथमिक शाला की पढ़ाई और नदी -पहाड़ , घाम -छाँव ,रेस -टीप ,पिट्ठूल, बाँटी ,भौंरा ,डंडा -पचरंगा , गिल्ली डंडा ,केंऊ -मेऊँ जैसे बचपन के परम्परा गत खेलों से जुड़ी मधुर यादों को भी लिपिबद्ध करते हुए सुरूचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।
    उनका एक आलेख 'ममा गाँव के सुरता'को पढ़कर हर पाठक को अपने मामा के गाँव की याद अनायास आने लगेगी।  सुशील ने 'जिनगी के संगवारी' शीर्षक आलेख अपनी जीवन संगिनी बसंती देवी को समर्पित किया है।वहीं अपने एक अन्य आलेख में वह साहित्यकारों के साथ गिरौदपुरी धाम की एक यात्रा को भी याद करते हैं ,जो  अठारहवीं सदी के छत्तीसगढ़ के महान समाज सुधारक तपस्वी और सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरु घासीदास जी की जन्म स्थली और कर्मभूमि है।
     पुस्तक के सभी आलेख सहज ,सरल और प्रवाहपूर्ण छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखे गए हैं । सुशील भोले की छत्तीसगढ़ी भाषा शैली में सरलता के साथ -साथ तरलता और लेखकीय तल्लीनता भी है। वैसे भी वे एक सिद्धहस्त लेखक ,सवेदनशील कवि और कहानीकार हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ी के साथ -साथ हिन्दी लेखन में भी महारत हासिल है।साहित्य के साथ -साथ पत्रकारिता में भी सक्रिय रहे हैं।  उनकी नवीनतम कृति 'सुरता के संसार ' हमें छत्तीसगढ़ की  सामाजिक ,साहित्यिक और सांस्कृतिक दुनिया के रंग -बिरंगे संसार में ले चलती है। लेखन और प्रकाशन के लिए सुशील भोले को हार्दिक बधाई और उनके उत्तम स्वास्थ्य के लिए अनेकानेक आत्मीय शुभकामनाएँ।
      - स्वराज करुण

Saturday, 4 February 2023

हमर परंपरा.. गवन के संदेशा..

हमर परंपरा//
गवन के संदेशा..
    हमर संस्कृति म कतकों अइसन परंपरा हे, जेन ह देश, काल अउ बेरा-बखत ल देखत अपन रूप म थोर-बहुत बदलाव कर लेथे. गवन, गौना या पठौनी घलो उही म के एक परंपरा आय, जेन बेरा के चलत अपन रूप म बदलाव करत हे. वइसे कतकों जगा अभी घलो अपन मूल रूप म ए ह दिख जाथे, फेर बहुते कम जगा दिखथे. आज के नवा पीढ़ी म तो कतकों झन अइसे घलो हो सकथें, जे मन ए परंपरा ले अनजान घलो होहीं.
    पहिली हमर इहाँ 'बाल विवाह' के गजबे चलन रिहिसे. कतकों नान्हे लइका मन के तो पर्रा भाॅंवर (साल डेढ़ साल के लइका जेन बिहाव के मतलब तो दुरिहा जाय, बने गतर के रेंगे घलो ले नइ सीखे राहय तइसनो मन के पर्रा म बइठार के) भॉंवर पार दिए जावत रिहिसे.
    अइसने नान्हे उमर म होवत बर-बिहाव के सेती नवा बने बहुरिया नोनी ल ओकर मइकेच म राहन देवत रिहिन हें. अउ जब दुल्हा-दुल्हीन दूनों जब घर-गृहस्थी ल जाने-समझे के उमर म पहुँच जावत रिहिन, त फेर गौना या पठौनी के रूप म नवा दुल्हीन के फेर बिरादरी करे नेंग ल पूरा करे जावत रिहिसे.
    अब ए गवन या पठौनी के जुन्ना परंपरा कमतीच देखे म आथे, फेर एकर एक बदले हुए रूप ह चारों मुड़ा दिख जाथे. अब नवा बहुरिया ह बिहाव होय के तुरते च बाद भले अपन ससुरार म रहि जाथे, तभो बिहाव होय के बाद के पहला होली परब ल अपन मइकेच म मनाथे. इही परंपरा ह गवन या पठौनी के बदले रूप आय.
    फागुन पुन्नी ले लेके चैत अंजोरी के एकम तिथि तक के बीच के जेन पंदरही होथे इही ह गवन या पठौनी के असली बेरा होथे. हमर संस्कृति म फागुन महीना ह बछर के आखिरी महीना होथे, अउ चैत अंजोरी एकम ले नवा बछर चालू होथे, जे ह माता के उपासना के घलो बेरा होथे. एकरे सेती नवा बहुरिया ल नवरात्र के इही शुभ बेरा म अपन घर लनई ल घलो शुभ माने जाथे.
    हमर इहाँ के लोकगीत मन म ए गवन या पठौनी परंपरा ले जुड़े गजब सुग्घर सुग्घर गीत सुने ले मिलय-

ये दे लाल लुगरा ओ पिंयर धोती गवन के लाल लुगरा..

कहंवा ले आथे तोर लाली-लाली लुगरा,
कहंवा ले आथे पिंयर धोती गवन के लाल लुगरा...

*****
    एक गीत बहुतेच लोकप्रिय होए रिहिसे-
जरगे मंझनिया के घाम रे आमा तरी डोला ल उतार दे..

पहिली गवन बर देवर मोर आए हो..
देवर के संग नहीं जाॅंव रे, आमा तरी डोला ल उतार दे..
*****

    एक गीत म नवा दुल्हनिया ह अपन डोकरी दाई ल काहत हे- मोर उमर तो अभी केंवची बानी के हे, तेकर सेती ए बछर भर अउ गवन झन देबे-

एसो गवन झन देबे ओ बूढ़ी दाई, मैं बांस-भिरहा कस डोलत हौं ओ...

    ए विषय म एक गीत महूं लिखे के उदिम करत रेहेंव-

महर-महर महके अमराई फागुन के संदेशा ले के
बारी म कुहके कारी कोइली सजन के संदेशा ले के...

कतका बसंत बीत गे हे जोहीं
देखत तोर रस्ता हो जाथंव बही
अब सगुन संग भेज दे पाती, गवन के संदेशा ले के...
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

Friday, 3 February 2023

अब बिरले देखे म आथे नगडेवन बजइया

अब बिरले देखे म आथे नगडेवन बजइया
    नागपंचमी परब के लकठियाते नगडेवन बजइया मन हर गली अउ गाँव म एक हाथ म बांस के बने झोपली म सॉंप धरे अउ पीठ म दूसर झोपली ल कोनो पंछा बानी के कपड़ा म बांध के ओरमाए दिख जावत रिहिन हें. दू-चार झन लइका मनला देखतीन तहाँ वो नगडेवन म नागिन धुन बजा के झोपली के सॉंप ल उघार देवंय अउ ओला हुदर-कोचक के नचाय अस करत राहंय.
    अब बेरा के संग ए नगडेवन बजइया मन घलो नहीं के बरोबर देखब म आथें. नागपंचमी परब म सॉंप देखा के दान-दक्षिणा  मंगइया तो कतकों दिख जाथें, फेर नगडेवन बजा के दान मंगइया दिखबे नइ करत हें.
    इलेक्ट्रॉनिक बाजा-रूंजी मन के आए ले हमर गजब अकन पारंपरिक बाजा मन कोनो संग्रहालय म प्रदर्शन करे के जिनिस बनत जावत हें. अउ एकरे संग ओकर बजाने वाला कलाकार घलो नंदावत जावत हें. अभी बस्तर ले एकरे ले संबंधित एक समाचार पढ़े बर मिले रिहिसे, जेमा एक समाज विशेष के मुखिया मन मोहरी बजाने वाला नइ मिले के सेती गजब चिंता फिकर करत रिहिन हें. उंकर कहना रिहिसे के उंकर देवता के पूजा-परब म मोहरी के बाजना जरूरी होथे, फेर अब पढ़े लिखे लइका मन एती चेत नइ करत हें, जेकर ले हमर परंपरा के सही रूप म निर्वहन नइ हो पावत हे. ओ मन एकर खातिर नवा लइका मनला विशेष रूप ले प्रशिक्षण दे के बात करत रिहिन हें. वइसे नवा पीढ़ी के लइका मन कला के क्षेत्र म आवत जरूर हें, फेर ओमन पारंपरिक बाजा-रूंजी ल बजाए या सीखे के बलदा इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्र ले ओकर धुन निकाल के काम चला लेवत हें.
    नगडेवन जेला हमन हिंदी म बीन कहिथन, एला विशेष किसम के तुमा (लौकी) ले बनाए जावय. वइसे तो सबो किसम के तुमा मन साग रांध के खाए के काम आथे (आजकल तुमा के रस ल औषधि के रूप म पीए के चलन घलो बनेच बाढ़ गे हवय) , फेर एमा कोनो-कोनो मन के आकार-प्रकार अलगेच होथे, जेकर सेती उंकर उपयोग कुछ अलग किसम से घलो कर लिए जाथे. जइसे चकरी किसम के तुमा ले तमुरा बनाए जाथे, त कमंडल बानी के तुमा ले कमंडल. पहिली साधु-महात्मा मन जगा कमंडल जरूर दिख जावत रिहिसे, फेर आजकल इहू ल पीतल के देखब म आ जाथे. इहाँ के वन क्षेत्र म तुमड़ी घलो दिखय, जेकर पानी ह गरमी के दिन म करसी के पानी कस जुड़ बोलय.
    नगडेवन बनाय खातिर जेन तुमा के उपयोग होवय, वोकर आगू भाग ह बेल असन गोल अउ पाछू के भाग ह लम्हरी पातर असन राहय, जेन ह अर्द्ध गोलाकार म मुड़े असन राहय. वो तुमा के बने पाक जाए के बाद ओकर भीतर के गुदा ल निकाल के खाली कर दिए जाय. ओकर पाछू के भाग मुड़े वाला होथे, ओमा आधा म पातर असन कुछ छेदा कर देथें अउ आगू डहार के मोटहा गोल भाग होथे, ओमा आठ-नौ इंच लंबा बांस के टुकड़ा म सात ठन नान्हे छेदा कर देथें. पाछू म तीन इंच के पत्ती काट के लगाए जाथे. बनाने वाले मन अपन-अपन कल्पना अउ पसंद के मुताबिक ओकर आकार अउ सजावटी कर लेथें. फेर ए नगडेवन के पाछू ले मुंह म फूंके ले तुमा म हवा भर जाथे, जेहा पत्ती ले गुजरे ले विशेष आवाज म बाजथे.
    एकर उपयोग इहाँ घुमंतू संवरा जाति के मन जादा करंय. ओमन एकर उपयोग सॉंप पकड़े खातिर घलो करंय. उंकर बात ल मानिन त, नगडेवन के बाजे ले कइसनो जहरीला साॅंप होवय एकर धुन म बिधुन होके नाचे-झूमे लगथे. जब नाचत-झूमत थक के चूर हो जाथे, तब सपेरा मन ओ सॉंप ल पकड़ के झोपली म बंद कर के रख देथें. ओमन बताथें के सॉंप ल झोपली म बंद कर के रखे के बाद दू-तीन खाय-पीये बर कुछू नइ देवंय, तब सॉंप निच्चट कमजोर हो जाथे. अइसने बेरा म फेर ओकर जहर ल निकाल के ओकर जहर वाले दांत ल टोर देथें.
    ए प्रक्रिया ल पूरा करे के बाद फेर सॉंप ल बने खवा-पीया के तंदुरुस्त करे जाथे, तेकर बाद फेर उनला प्रदर्शन खातिर लोगन के बीच लानथें.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811