Thursday, 13 January 2022

छत्तीसगढ़ी दशा.. रामनाथ साहू-1

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                *आधुनिक काल के छत्तीसगढ़ी कविता : दशा अउ दिशा*

आलेख-रामनाथ साहू

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       आधुनिक काल के छत्तीसगढ़ी  कविता के दशा और दिशा के ऊपर बातचीत करे ले वोकर  लिखित साहित्य के पड़ताल हर ही आधार बनथे । काबर की वाचिक- परंपरा म तो बात हर हवा- हवाई हो जाए रथे । एकर  सेती, कछु भी जिनिस के  लिखित साहित्य हर ही अध्ययन- गवेषणा बर प्रमाण माने जाथे ।

                सिंघनपुर कबरा जइसन जगहा के शैलाश्रय मन  ये बताथें ,कि  जबले मनखे ये धरती म रहत रहिन तबले छत्तीसगढ़ के ये धरती हर जन शून्य  नई  रहिस अउ  जब  जनशून्य  नई  रहिस  तब मनुष्य मन आपस म बोलत रहिन भाखत रहिन, तब  वोमन के भाखा रहिस अउ  जब वोमन के भाषा रहिस , तब  वोमन के साहित्य रहिस   ही । भले ही  ये साहित्य हर लिखित नई हो सकिस ;  वैज्ञानिक रीति ले वोला सहेजे  नई जा  सकिस ।

        विशुद्धतावादी भाषा वैज्ञानिक मन छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ वांग्मय के विस्तार ला बीसवीं शताब्दी ले पहेली के स्वीकार नई करें।  एकर उल्टा बहुत जन विद्वान मन सदगुरु कबीर के योग्यतम शिष्य धनी धर्मदास ला,  छत्तीसगढ़ी के पहली कवि करार देवत उन ल छत्तीसगढ़ी के प्रथम कवि मानथें अउ ये आग्रह हर 'सत्य' घलव आय ।  धनी धर्मदास जी अपन जीवन के अवसान बेला मा छत्तीसगढ़  अइन । अउ जतेक दिन ल इहाँ रहके जइसन तइसन अपन बघेली  अवधी मिंझरे भाखा बोली म गाईन -बजाईंन । वोला छत्तीसगढ़ी ले अलग काबर करबे । वोहर निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ी आय ;छत्तीसगढ़ी साहित्य के मजबूत पूर्व पीठिका पीढ़ा आय ।

अरजी भंवर बीच नइया हो,

साहेब पार लगा दे।

तन के नहुलिया सुरती केबलिया,

खेवनहार मतवलिया हो।

हमर मन पार उतरगे,
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हमू हवन संग के जवईया हो।
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माता पिता सुत तिरिया बंधु,

कोई नईये संग के जवईया हो।
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धरमदास के अरज गोसांई,

आवागमन के मिटईया हो।
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साहेब पार लगा दे।।

 
           बिना किसी विवाद के धनी धर्मदास जी, छत्तीसगढ़ी के पहली कवि  आंय । वोकर ले लेके  भक्ति- मार्गी शाखा म गुरु घासीदास अउ वोकर पाठ चेला मन के द्वारा  'सतनाम प्रवर्तन' के  जउन  भी  पद हें , वो सब मन  विशुद्ध  साहित्यिक महत्व के  हें अउ  छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्राचीनता ल स्थापित करत हें । छत्तीसगढ़ी साहित्य म निरंतरता के अभाव तो हे , फेर अनुपस्थिति बिल्कुल भी नई ये । खैर आज के हमन के विषय 'आधुनिक युग म छत्तीसगढ़ी काव्य ' के चर्चा करे के हे ।

              आधुनिक छत्तीसगढ़ी साहित्य के चर्चा- मीमांसा ल घलव हमन, स्पष्ट रूप ले तीन खंड  म बांट सकत हन -
1 प्रथम खंड- सन  1901 ले लेके सन 1935 तक
2.दूसरा खंड-सन 1936 ले लेके सन 2000 तक।
3.तीसरा खंड-सन 2001 ले लेके आज तक।

( सरलग )

Monday, 10 January 2022

सुशील भोले वर्मा..


नाम- सुशील भोले (सुशील कुमार वर्मा)  

जन्म - 02/07/1961 (दो जुलाई सन उन्नीस सौ इकसठ) 

पिता – स्व. श्री रामचंद्र वर्मा 

माता – स्व. श्रीमती उर्मिला देवी वर्मा 

पत्नी– श्रीमती बसंती देवी

मूल ग्राम – नगरगांव, थाना-धरसीवां, जिला रायपुर छत्तीसगढ़ 

वर्तमान पता – 54-191, कस्टम कालोनी रिक्शा स्टैंड के सामने, यादव टी स्टाल वाली गली, संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर छत्तीसगढ़-492010

मोबाइल – 98269-92811

ब्लाग - www.mayarumati.blogspot.in


यूट्यूब- kavi sushil bhole


प्रकाशित कृतियाँ-

1. छितका कुरिया (काव्य  संग्रह, 1989)  

2. दरस के साध (लंबी कविता 1990)

3. जिनगी के रंग (गीत एवं भजन संकलन 1995)

4. ढेंकी (कहानी संकलन 2006, दूसरा संस्करण 2022)

5. आखर अंजोर (छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति पर आधारित लेखों का संकलन 2006, दूसरा संस्करण 2017 )

6. भोले के गोले (व्यंग्य एवं लेख संग्रह 2015)

7. सब ओखरे संतान (चारगोडि़या मनके संकलन 2017)

8. सुरता के संसार (संस्मरण मन के संकलन 2022)

9. बिहनिया के जोहार (चार डांड़ के चित्रमय रेखांकन 2022-23) 

10. कोंदा भैरा के गोठ (सोशलमीडिया के पहला धारावाहिक 2023-24) 


कालम लेखन-  

1. तरकश अउ तीर (दैनिक नवभास्कर सन-1990)

2. आखर अंजोर (दैनिक तरूण छत्ती‍सगढ़ 2006-07)

3. डहर चलती (दैनिक अमृत संदेश- 2009)

4. गुड़ी के गोठ (साप्ताहिक इतवारी अखबार 2010 से 2015)

5. बेंदरा बिनास (साप्ताहिक छत्तीसगढ़ सेवक 1988-89)

6. किस्सा कलयुगी हनुमान के (मासिक मयारू माटी 1988-89)



अन्य लेखन- 

1.प्रदेश एवं राष्ट्रीय स्तर के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कविता, कहानी, समीक्षा, साक्षात्कार आदि का नियमित रूप से प्रकाशन।

2. ‘लहर’ एवं ‘फूलबगिया’ ऑडियो कैसेट में गीत लेखन एवं गायन।

3. अनेक सांस्कृतिक मंचों द्वारा गीत एवं भजन गायन।

4. आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से कविता, कहानी, वार्ता एवं आलेखों का नियमित प्रसारण

5. छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति पर विषय विशेषज्ञ के रूप में वक्तव्य। 


संपादन एवं प्रकाशन- 

1. मयारु माटी (छत्तीसगढ़ी भाषा की प्रथम संपूर्ण मासिक पत्रिका)


सह संपादन- 

1. दैनिक अग्रदूत

2. दैनिक तरूण छत्तीगढ़

3. दैनिक अमृत संदेश

4. दैनिक छत्तीसगढ़ ‘इतवारी अखबार’

5. जय छत्तीसगढ़ अस्मिता (मासिक)

6. अनेक साहित्यिक एवं सामाजिक पत्र-पत्रिकाओं में


विशेष-

1. छत्तीसगढ़ शासन द्वारा चार किताबें 1. ढेंकी (कहानी संकलन), 2. सुरता के संसार (संस्मरण संग्रह), 3. तिलमती चाउंरमती (लोककथा), 4. संत अउ बसंत (लोककथा) को समग्र शिक्षा के अंतर्गत प्रदेश के कक्षा 1 से कक्षा 12 वीं तक के सभी पाठशालाओं के पुस्तकालयों में भेजा गया है.


2. सोशलमीडिया के पहला धारावाहिक 'कोंदा-भैरा के गोठ' के सरलग लिखई चलत हे, जे हा रायगढ़ ले यशवंत खेडुलकर जी के संपादन म छपत दैनिक 'सुघ्घर छत्तीसगढ़' के पहला पेज म सरलग छपत हे.


सम्मान-

1. छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा जिला सम्मान सन् 2007

2. डॉ. खूबचंद बघेल अगासदिया सम्मान 2014

3. छत्तीसगढ़ी साहित्य महोत्सव में शिवनाथ साहित्य सम्मान 2021

4. नार्थ अमेरिका छत्तीसगढ़ 'नाचा' द्वारा सम्मान 2023

5. जनकवि बिसम्भर यादव मरहा सम्मान 2024

इनके अतिरिक्त अनेकों सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान।

Tuesday, 28 December 2021

भारत में नववर्ष..

भारत में कई बार मनाया जाता है नववर्ष..

    भारत एक ऐसा देश है, जहां अलग-अलग जगह पर अलग-अलग समय में अपनी संस्कृति और परंपराओं के साथ नए साल का उत्सव मनाया जाता है. यहाँ केवल 1 जनवरी को ही नहीं बल्कि कई अलग-अलग समय पर नववर्ष का जश्न मनाया जाता है.

   लगभग पूरी दुनिया में 1 जनवरी को नया साल के तौर पर मनाया जाता है, जो कि वास्तव में ईसाई धर्म का नया साल है. 1 जनवरी को नए साल की शुरुआत 15 अक्टूबर 1582 से हुई थी. इसकी तारीख ग्रिगोरियन कैलेंडर के अनुसार चलती है.

    चूंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है तो यहां हर क्षेत्र में नये साल का उत्सव कृषि आधारित होता है. हमारे छत्तीसगढ़ में वैसाख माह के शुक्ल पक्ष तृतीया को अक्ती पर्व के दिन कृषि का नववर्ष मनाया जाता है, इस दिन कृषि कार्य से जुड़े कामगारों की नई नियुक्ति करने के साथ ही अन्य श्रमजीवी वर्ग की भी, जिन्हें यहाँ की भाषा में पौनी-पसारी कहा जाता है, उनकी नियुक्ति की जाती है. यहाँ की मुख्य खरीफ फसल धान की बुवाई का कार्य भी इसी दिन से प्रारंभ किया जाता है, जिसे यहाँ मूठ धरना कहा जाता है.

   तो आइए जानते हैं भारत में कब, कहाँ और किस मौसम में नया साल मनाया जाता है...

नवसंवत्सर-
चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को नवसंवत्सर कहते हैं. फसल पकने का प्रारंभ, किसानों की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है. भारतीय कैलेंडर की गणना, सूर्य और चंद्रमा के अनुसार होती है. माना जाता है कि विक्रमादित्य के काल में सबसे पहले भारत में कैलेंडर अथवा पंचाग का चलन शुरू हुआ. इसके अलावा 12 महीनों का एक वर्ष और सप्ताह में 7 दिनों का प्रचलन भी विक्रम संवत से ही माना जाता है.

उगाडी- तेलगू न्यू ईयर
यह नया साल कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में मनाया जाता है. तेलगू न्यू ईयर हिन्दी के चैत्र महीने और अंग्रेजी के मार्च-अप्रैल के बीच में पड़ता है.

गुड़ी पड़वा-
चैत्र महीने के पहले दिन यह त्योहार मनाया जाता है. मराठी और कोंकनी लोग इसे नए साल के रूप में मनाते हैं. इस दिन गुड़ी को घरों के द्वार पर लगाया जाता है.

बैसाखी- पंजाबी न्यू ईयर
बैसाखी 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है. मुख्य त्योहार खालसा के जन्म स्थान और अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में मनाया जाता है. यह त्योहार अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड में भी लोग आयोजित करते हैं.

पुथंडु- तमिल न्यू ईयर
तमिल माह Chithirai के पहले दिन यानी अप्रैल के मध्य में तमिल न्यू ईयर मनाया जाता है. इस मौके पर लोग एक दूसरे को Puthandu Vazthukal बोलते हैं. कच्चा आम, गुड़ और नीम के फूलों से त्योहार का खास डिश तैयार किया जाता है.

बोहाग बिहू- असामी न्यू ईयर
बोहाग बिहू अप्रैल के मध्य में मनाया जाता है. यह असम का सबसे खास त्योहार है.

बंगाली नववर्ष-
बंगाली नववर्ष अप्रैल महीने के मध्य में मनाया जाता है.  बंगाल में इसे पोहला बोईशाख कहा जाता है. यह बैशाख महीने का पहला दिन होता है. पोहला का अर्थ है पहला और बोइशाख बंगाली कैलेंडर का पहला महीना है. बंगाली कैलेंडर हिन्दू वैदिक सौर मास पर आधारित है. पश्चिम बंगाल के अलावा त्रिपुरा के पहाड़ी इलाकों में भी पोहला बोईशाख मनाया जाता है.

गुजराती नववर्ष-
गुजराती नववर्ष को बेस्तु वर्ष कहा जाता है. यह दिवाली के दूसरे दिन मनाया जाता है. मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज में तेज बारिश को रोकने के लिए गोर्वधन पूजा की थी. गोर्वधन पूजा के दिन से गुजराती नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है.

विषु- मलयालम नववर्ष
विषु केरल में नववर्ष का दिन है. यह मलयालम महीने मेदम की पहली तिथि को मनाया जाता है. केरल में विषु उत्सव के दिन धान की बुआई का काम शुरू होता है. विषु पर्व के अहम पहलुओं में से एक है- 'विषुकनी' की रस्म, जो घर के सभी लोग निभाते हैं. इसमें घर के लोग सुबह सबसे पहले अपने ईष्ट देवी-देवता के दर्शन करते हैं.

नवरेह- कश्मीरी नववर्ष
कश्मीर में नवरेह नव चंद्रवर्ष के रूप में मनाया जाता है. यह चैत्र नवरात्र के पहले दिन मनाया जाता है. नवरेह का त्योहार कश्मीरी पंडित बड़े उत्साह से मनाते हैं. नवरेह की सुबह लोग सबसे पहले चावल से भरे पात्र को देखते हैं. इसे समृद्धशाली भविष्य का प्रतीक माना जाता है.

हिजरी-इस्लामिक नववर्ष
इस्लामिक वर्ष मुहर्रम के पहले दिन से शुरू होता है. हिजरी एक चंद्र कैलेंडर है. इस्लामिक धार्मिक त्योहार को मनाने के लिए हिजरी कैलेंडर का ही इस्तेमाल किया जाता है.

नया वर्ष हो नया हर्ष हो, नव प्रभात का नव उजियारा
कलुषित भेदभाव मिटे, हरो मनुज मन का अंधियारा
नव वर्ष की स्वर्ण रश्मियों से आल्हादित हो गगन-धरा
नई दृष्टि पाये जग सारा, स्वागत है नव वर्ष तुम्हारा

* सुशील भोले- 98269-92811
संजय नगर, रायपुर

भारत में नववर्ष..

भारत में 1 जनवरी नहीं, कई बार मनाया जाता है नववर्ष..

    भारत एक ऐसा देश है, जहां अलग-अलग जगह पर अलग-अलग समय में अपनी संस्कृति और परंपराओं के साथ नए साल का उत्सव मनाया जाता है. यहाँ केवल 1 जनवरी को ही नहीं बल्कि कई अलग-अलग समय पर नववर्ष का जश्न मनाया जाता है.

   लगभग पूरी दुनिया में 1 जनवरी को नया साल के तौर पर मनाया जाता है, जो कि वास्तव में ईसाई धर्म का नया साल है. 1 जनवरी को नए साल की शुरुआत 15 अक्टूबर 1582 से हुई थी. इसकी तारीख ग्रिगोरियन कैलेंडर के अनुसार चलती है.

जहां 1 जनवरी को दुनियाभर में नया साल मनाया जाता है, वहीं भारत एक ऐसा देश है जहां अलग-अलग जगह पर अलग-अलग समय में अपनी संस्कृति और परंपराओं के साथ नए साल का उत्सव मनाया जाता है. चूंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है तो यहां हर क्षेत्र में नये साल का उत्सव कृषि आधारित होता है. हमारे छत्तीसगढ़ में वैसाख माह के शुक्ल पक्ष तृतीया को अक्ती पर्व के दिन कृषि का नववर्ष मनाया जाता है, इस दिन कृषि कार्य से जुड़े कामगारों की नई नियुक्ति करने के साथ ही अन्य श्रमजीवी वर्ग की भी, जिन्हें यहाँ की भाषा में पौनी-पसारी कहा जाता है, उनकी नियुक्ति की जाती है. यहाँ की मुख्य खरीफ फसल धान की बुवाई का कार्य भी इसी दिन से प्रारंभ किया जाता है, जिसे यहाँ मूठ धरना कहा जाता है.

   तो आइए हम आपको बताते हैं भारत में कब, कहाँ और किस मौसम में नया साल मनाया जाता है...

नवसंवत्सर-
चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को नवसंवत्सर कहते हैं. फसल पकने का प्रारंभ, किसानों की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है. भारतीय कैलेंडर की गणना, सूर्य और चंद्रमा के अनुसार होती है. माना जाता है कि विक्रमादित्य के काल में सबसे पहले भारत में कैलेंडर अथवा पंचाग का चलन शुरू हुआ. इसके अलावा 12 महीनों का एक वर्ष और सप्ताह में 7 दिनों का प्रचलन भी विक्रम संवत से ही माना जाता है.

उगाडी- तेलगू न्यू ईयर
यह नया साल कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में मनाया जाता है. तेलगू न्यू ईयर हिन्दी के चैत्र महीने और अंग्रेजी के मार्च-अप्रैल के बीच में पड़ता है.

गुड़ी पड़वा-
चैत्र महीने के पहले दिन यह त्योहार मनाया जाता है. मराठी और कोंकनी लोग इसे नए साल के रूप में मनाते हैं. इस दिन गुड़ी को घरों के द्वार पर लगाया जाता है.

बैसाखी- पंजाबी न्यू ईयर
बैसाखी 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है. मुख्य त्योहार खालसा के जन्म स्थान और अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में मनाया जाता है. यह त्योहार अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड में भी लोग आयोजित करते हैं.

पुथंडु- तमिल न्यू ईयर
तमिल माह Chithirai के पहले दिन यानी अप्रैल के मध्य में तमिल न्यू ईयर मनाया जाता है. इस मौके पर लोग एक दूसरे को Puthandu Vazthukal बोलते हैं. कच्चा आम, गुड़ और नीम के फूलों से त्योहार का खास डिश तैयार किया जाता है.

बोहाग बिहू- असामी न्यू ईयर
बोहाग बिहू अप्रैल के मध्य में मनाया जाता है. यह असम का सबसे खास त्योहार है.

बंगाली नववर्ष-
बंगाली नववर्ष अप्रैल महीने के मध्य में मनाया जाता है.  बंगाल में इसे पोहला बोईशाख कहा जाता है. यह बैशाख महीने का पहला दिन होता है. पोहला का अर्थ है पहला और बोइशाख बंगाली कैलेंडर का पहला महीना है. बंगाली कैलेंडर हिन्दू वैदिक सौर मास पर आधारित है. पश्चिम बंगाल के अलावा त्रिपुरा के पहाड़ी इलाकों में भी पोहला बोईशाख मनाया जाता है.

गुजराती नववर्ष-
गुजराती नववर्ष को बेस्तु वर्ष कहा जाता है. यह दिवाली के दूसरे दिन मनाया जाता है. मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज में तेज बारिश को रोकने के लिए गोर्वधन पूजा की थी. गोर्वधन पूजा के दिन से गुजराती नव वर्ष की शुरुआत मानी जाती है.

विषु- मलयालम नववर्ष
विषु केरल में नववर्ष का दिन है. यह मलयालम महीने मेदम की पहली तिथि को मनाया जाता है. केरल में विषु उत्सव के दिन धान की बुआई का काम शुरू होता है. विषु पर्व के अहम पहलुओं में से एक है- 'विषुकनी' की रस्म, जो घर के सभी लोग निभाते हैं. इसमें घर के लोग सुबह सबसे पहले अपने ईष्ट देवी-देवता के दर्शन करते हैं.

नवरेह- कश्मीरी नववर्ष
कश्मीर में नवरेह नव चंद्रवर्ष के रूप में मनाया जाता है. यह चैत्र नवरात्र के पहले दिन मनाया जाता है. नवरेह का त्योहार कश्मीरी पंडित बड़े उत्साह से मनाते हैं. नवरेह की सुबह लोग सबसे पहले चावल से भरे पात्र को देखते हैं. इसे समृद्धशाली भविष्य का प्रतीक माना जाता है.

हिजरी-इस्लामिक नववर्ष
इस्लामिक वर्ष मुहर्रम के पहले दिन से शुरू होता है. हिजरी एक चंद्र कैलेंडर है. इस्लामिक धार्मिक त्योहार को मनाने के लिए हिजरी कैलेंडर का ही इस्तेमाल किया जाता है.
-प्रस्तुति - सुशील भोले

Sunday, 26 December 2021

दिसम्बर ले आस..

मया के डोरी ले
अउ एक मोती झरत हे
सरग निसैनी ले
दिसम्बर उतरत हे..

बांचे हे भइगे
थोरके घड़ी, पल छिन
फेर हो जाही
अंगरी म वो तो गिन-गिन.

कुनकुनवत रउनिया
अउ दमोरत रतिहा के
गोरसी तापत सियान के
सोझियावत कनिहा के

कोनो बियारा म दौंरी
अउ बेलन के रेंगना
कोनो मेर के रास ल
सकेलना अउ धुंकना

नवा दिन-बादर ह
फेर परघाही नवा मौसम
बसंत के सुवागत म
करही दमादम

नवा बिहान ले बस
अतकेच हे आस
झन बोरबे तैं ह जी
ककरोच बिसवास
-सुशील भोले-9826992811

Tuesday, 21 December 2021

हाना..

गुरु के बाना अउ पुरखा के हाना
दूनों के मरम ल एके बरोबर जाना
-सुशील भोले

🌹

जवान जोगी बइद रोगी सूर के पीठ म घाव
हाथी म चढ़के भीख मांगय तेला झन पतियाव

* यदि योगी युवा हो और वैद्य रोगग्रस्त हो, शूरवीर की पीठ में घाव हो और यदि कोई हाथी पर चढ़कर भीख मांगता हो, तो ये सब विश्वास करने योग्य नहीं हैं.

🌹
पियास न चीन्हे धोबीघाट, भूख न चीन्हे बासी-भात
नींद न चीन्हे मरघट-घाट, मया न चीन्हे जात-कुजात

* प्यास सिर्फ पानी को ही पहचानता है, वह किस घाट का है इससे कोई मतलब नहीं. भूख अपनी क्षुधापूर्ति के लिए कुछ भी उदरस्थ कर लेता है. नींद के वश में होने पर आदमी श्मशान घाट नहीं देखता, ठीक उसी तरह प्रेम हो जाने पर आदमी जाति अथवा कुजाति के चक्कर में नहीं पड़ता.

🌹
अड़हा मारय टेनपा त मुंड़-कान फूट जाय
सियान मारय बात त अंतस म धंस जाय

* मूर्ख व्यक्ति लाठी से मारता है तो सामने वाले का सिर फूट जाता है, लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति जब उससे मर्मभेदी बात करता है, तो उसे कई दिनों तक सालता रहता है.

🌹
बिन आदर के पहुना, बिन आदर घर जाय
टेंड़वा मुंह कर भात परोसे, कुकुर बरोबर खाय

* बिना बुलाए या बिना आदर के किसी के घर मेहमान बनकर जाता है, तो गृहस्वामिनी उसे टेढ़ा मुंह करके भात परोसेगी और उसका खाना कुत्ते के जैसा खाना होगा.

🌹
फोकट फोदा पाइन त बाप-पूत धाइन
कौड़ी लागिस त बलाए घलो म नइ आइन

* अगर मुफ्त में मिले तो बाप-बेटा दोनों चले आए, लेकिन अगर कौड़ी खर्च करना पड़ जाए तो बुलाने से भी नहीं आएंगे.

🌹
खेती रहिके परदेस म खाय
तेकर जनम अकारथ जाय

* जिनके पास अन्नपूर्णा जैसी खेती हो, तब भी उसे छोड़कर अन्य देश में कमाना-खाना पड़ रहा है, तो ऐसे लोगों का जन्म लेना व्यर्थ है.

🌹
आमा बोवय अमली बोवय बोवय पेड़ बमूर
आन के लइका का सेवय, न कंतर न मूर

* चाहे आम का पेड़ लगाओ या इमली का या फिर बबूल का, दूसरे के लड़के की सेवा से न लागत मिलती है, न ब्याज और न ही मूलधन.

-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)
मो/व्हा. 9826992811

Monday, 13 December 2021

मोक्षदा एकादशी गीता जयंती की बधाई


मोक्षदा एकादशी : गीता जयंती विशेष..

🐚 सृष्टि का आदि धर्मशास्त्र गीता है। ‘इमं विवस्वते योगं’ (गीता, 4/1)- भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि “इस अविनाशी योग को मैंने आदि में सूर्य से कहा। सूर्य से मनु, मनु से इक्ष्वाकु और इक्ष्वाकु से राजऋषियों तक पहुँचते-पहुँचते यह इस पृथ्वी में लुप्त हो गया था। वही पुरातन अविनाशी योग मैं तेरे प्रति कहने जा रहा हूँ।” इस प्रकार लगभग 5200 वर्षों पूर्व उसी आदिज्ञान का पुनः प्रसारण मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी ‘मोक्षदा एकादशी’ को कुरुक्षेत्र (भारत) में हुआ।

🐚 परमात्मा ही सनातन है। उस सनातन का उपासक होने से ही आर्य सनातनधर्मी कहलाये। सनातन एकमात्र परमात्मा सबके हृदय में निवास करता है- ‘हृद्देशेर्जुन तिष्ठति’ (गीता, 18/61) -हृदयस्थ उस परमात्मा का उपासक होने से वही हिंदू कहलाये। तीनों शब्दों (आर्य, सनातनी व हिंदू) का अर्थ एक है और इनका आदिशास्त्र गीता है।

🐚 ‘गीता’ का सिद्धांत है- एक आत्मा ही सत्य है, परम तत्व है, अमृत स्वरूप है, कण-कण में व्याप्त है एवं ज्योतिर्मय है। उस आत्मा को प्राप्त करने की नियत विधि  है।

🐚 ‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’ ( गीता, 3/9 ) इस योग विधि यज्ञ के अतिरिक्त अन्य जो कुछ किया जाता है,वह इसी लोक का एक बंधन है,न कि कर्म। इस नियत कर्म को करके तू अशुभ अर्थात संसार बंधन से मुक्त हो जायेगा।अस्तु ,कर्म अर्थात् आराधना, चिंतन। एक ही चिंतन कर्म को योगेश्वर ने चार श्रेणियों में बाँटा, जिनका नाम वर्ण है। यह एक ही साधना के क्रमोन्नत सोपान हैं। जिसमें साधक को प्रवेश कर क्रमशः चारों सोपानो को पार कर लक्ष्य विदित करना होता है।

🐚 “अर्जुन ! यदि तू संपूर्ण पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है तब भी गीतोक्त ज्ञान रूपी नौका द्वारा नि:संदेह पार हो जायेगा।” अतः गीता पाप का निवारण है। “अत्यंत दुराचारी भी अनन्य भाव से मुझे भजता है तो वह साधु मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय से लग गया है।” अतः गीता सदाचारी और दुराचारी में दरार नहीं डालती।

🐚 ‘गीता’ के अनुसार, मनुष्य मात्र दो प्रकार का होता है – दैव और असुर। जिसके हृदय में दैवी संपद कार्यरत है वह देवताओं जैसा है और जिसके हृदय में आसुरी संपद कार्य करती है वह असुरों जैसा है। दैवी स्वभाव परम कल्याणकारी परमात्मा की तरफ तथा आसुरी स्वभाव प्रकृति के अंधकार में भटकाता है। सृष्टि में मनुष्य की यही दो जातियाँ हैं अन्य कोई तीसरी जाति नहीं।

🐚 संसार की सभी समस्याओं का समाधान गीता से है। गीता जाति-पाँति, छुआछूत, भेदभाव से मुक्त है; क्योंकि जीव भगवान का विशुद्ध अंश है- उतना ही पावन जितना स्वयं भगवान। तो फिर अस्पृश्य कैसे? यह हीन भावनाओं से मुक्ति का शास्त्र है। यह संप्रदाय मुक्त है। इसमें किसी संप्रदाय का विरोध या समर्थन नहीं है। इसमें रूढ़ियों, परंपराओं अथवा प्रथाओं का किंचित भी समावेश नहीं है। यह इन सब से मुक्त मानव- दर्शन है।

🐚 भारत के संविधान में भारतीय संस्कृति व दर्शन के 22 उद्बोधक चित्रों में एक चित्र श्रीकृष्ण का गांडीवधारी अर्जुन को गीता उपदेश देते हुए भी था। न केवल भारत अपितु विश्व के श्रेष्ठतम विद्वानों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, चिंतकों तथा संतों ने इसकी मुक्त कंठ से स्तुति की है।

धरम के मारग अइसे नइहे के बस जोगड़ा बन जावन
बन के बोझा समाज ऊपर बस माँग-माँग के खावन
ए तो कोनो धरम नइ होइस न आदर्श असन जीवन
जेला कहिथन भगवान हम उंकर कर्मयोग अपनावन

मोक्षदा एकादशी गीता जयंती के गाड़ा-गाड़ा बधाई अउ जोहार 🙏
-सुशील भोले-9826992811
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