Thursday, 30 May 2024

छत्तीसगढ़ी म रात दिन के समय सारणी

छत्तीसगढ़ी में दिन-रात समय सारिणी... 

1:- भिनसरहा/मुंदराहा- लगभग 4 बजे सुबह से 5 बजे तक।
2:-झुलझुलहा- सुबह 5 बजे से लगभग 5:30 बजे तक।
3:- पँगपंगहा- सुबह सूर्योदय की लालिमा तक।
4:- बिहनिया- सूर्योदय
5:- गरुवा ढिलाती- लगभग 7 से 8 बजे तक सुबह।
5:- मंझनिया- दोपहर 12 बजे  से लगभग 2 बजे तक।
6:-बेरा ढरकत-2:30 से लगभग 4 बजे तक।
7:- संझा-4 बजे से 5:- 30 लगभग।
8:- बेरा बुड़ती- सूर्यास्त समय ( यही समय लगभग आगी बारने का बेरा कहलाता है। इसे मुंधियार और गोधूलि वेला भी कहते हैं) एकर पाछू के बेरा ल भइंसा अंधियार कहिथें। 
9:-बियारी के बेरा- रात में खाने का समय। (बिहनिया के नाश्ता ल बासी होगे गा? मंझनिया के भोजन ल जेवन होगे गा अउ रतिहा के बियारी कर डारेव जी? ) 
10:- दु पेटिया बियारी- गर्भवती महिलाओं के खाने का समय जो प्रायः जल्दी होता था। घर के सियान के खा लेने के बाद गर्भवती महिलाओं को जल्दी खाने को कहा जाता है। चूंकि गर्भ में एक पपेट बच्चा) और
होता है इसलिए दु पेटिया कहा जाता है।
11:-अधरतिया- रात्रि 12 बजे से आगे।
12:- सुकवा पहाती- भिनसरहा से थोड़ा पहले ( शुक्र तारा इसे हिंदी में भोर का तारा भी कहते हैं। इसके बाद बेरा झुलझुलहा होने लगता है। ।

जोहार छत्तीसगढ़
-सुशील भोले

Tuesday, 21 May 2024

कोंदा भैरा के गोठ-19

कोंदा भैरा के गोठ-19

-हमर इहाँ आज घलो कतकों लोगन हनुमान जी ल बेंदरा (बंदर) समझ जाथें जी भैरा, फेर मोला ए ह सही नइ जनावय.
   -बिल्कुल सही नोहय जी कोंदा.. उहू मन हमरे मन असन मानव ही रिहिन हें.. इहाँ के मूल निवासी समाज के मनखे रिहिन हें. 
   -हव महू ल अइसने जनाथे.. अब जइसे हमन इहाँ नाग या नागवंशी समाज के लोगन मनला जानथन नहीं.. ठउका वइसने.
   -हव इहू मन मूल निवासी समाज के लोगन आॅंय.. नाग या नागवंशी के मतलब सॉंप या सॉंप के वंशज नइ होवय, ठउका वइसने वानर कहे ले बेंदरा या बेंदरा मन के वंशज नइ होवय.
   -हव इही बात सही आय.. हमर इहाँ बिंझवार अउ संवरा जाति के मूल निवासी समाज वाले मनला बाली अउ ओकर भाई सुग्रीव के वंशज माने जाथे. बाली ले बिंझवार अउ सुग्रीव ले संवरा.. अउ हमन तो सब ए बात ल जानथन के बाली, सुग्रीव अउ हनुमान सबो एके प्रजाति के लोगन रिहिन हें... इहाँ के मूल निवासी समाज के लोगन रिहिन हें.
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-बोरे-बासी हमर खानपान के संगे-संग हमर संस्कृति के घलो अंग आय जी भैरा, तभो ले कतकों लोगन एकर हिनमान करे असन गोठियाथें.
   -असल म ए ह लोगन के छोटे नजरिया अउ अज्ञानता के सेती आय जी कोंदा.. आज तो ए ह वैज्ञानिक रूप ले प्रमाणित होगे हावय के बासी ह तन अउ मन दूनों बर गुनकारी हे, तभे तो हमर पुरखा मन एला संस्कृति म घलो संघारे रिहिन हें. हमर इहाँ तीजा के निर्जला उपास के बिहान भर उपसहीन मनला बासी खाए के नेवता नेवते जाथे.
   -हव जी.. अउ तैं जानत हस संगी.. जांजगीर चांपा जिला के गाँव चोरभट्ठी म डंगचघीन दाई के एक मंदिर हे, इहाँ डंगचघीन दाई ल बासी के ही भोग परसाद चघाए जाथे.
   -अच्छा.. बासी के भोग? 
   -हव.. अउ लोगन बताथें के डंगचघीन दाई ह उहाँ बासी के भोग चघइया हर मनखे के मनोकामना ल पूरा करथे.
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-ए ज्योतिष मन आज 4 मई ले शुक्र ल अउ 8 मई ले गुरु ह लुका जही काहत हें जी भैरा तहाँ ले वोकर मन के उवे के बाद 9 जुलाई ले ही फेर बर बिहाव असन शुभ कारज हो पाही कहिथें.
   -तैं तो जानत हस जी कोंदा मैं ह सिरिफ छत्तीसगढ़ के पारंपरिक संस्कृति ल मानथौं आने-आने देश राज ले आए लोगन के चोचला मन ल नहीं.. अउ तहीं बता अइसन सब होय के पाछू घलो अक्ती परब म भॉंवर पर जाथे नहीं? 
   -हव गा..करइया मन आर्य समाज अउ कोर्ट म बारों महीना करथें, फेर हमर असन कतकों अड़हा मन पोथी-पतरा वाले मन के गोठ ल मान डारथन ना.
   -मैं तो सिरिफ हमर मूल संस्कृति ल मानथौं संगी जेन ह निरंतर जागृत देवता के संस्कृति आय.. हमर इहाँ तो चातुर्मास म घलो बिहाव के परंपरा हे, त ए शुक्र अउ गुरु ग्रह ह काय जिनिस आय. 
   -अच्छा.. चातुर्मास म घलो बिहाव? 
   -हव.. देवउठनी के पहिली कातिक अमावस के गौरा-ईसरदेव के बिहाव के परब मनाथन नहीं.. ठउका अइसने सावन म भीमा देव अउ भीमिन के बिहाव करथन ना.. अउ जब हमन अपन देवता के बिहाव परब ल चातुर्मास म करथन त हमर मन के बिहाव करे म का हे.. कभू भी कर सकथन.
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-देखे जी भैरा इहू बछर के 10-12 वीं बोर्ड म नोनी मन अगुवा गें हवंय.
   -हव जी कोंदा.. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारा ह बढ़िया छाहित होवत हे, सबोच लोगन बेटी मन के पढ़ई-लिखई बर गजब चेत करत हें, तभे तो चारों मुड़ा के बड़का पद-पॉवर म घलो बेटी मन ही दिखत हें.
   -सही आय संगी, फेर तैं एक बात के चेत करे हावस? 
   -का बात के जी? 
   -बेटी मन के चेत करई म टूरा पिला मन पढ़ई-लिखई के संग जम्मोच बुता म पिछवावत जावत हें.
   -हव.. अब वो मन ह गाँड़ा कस बछवा किंजरत रइहीं त पिछवाबे करहीं.
   -फेर ए ह हम सब बर गुने अउ चेत करे के बात आय.. बेटी मन आज अतेक पढ़ डारे हें, ते ओकर मन बर योग्य लइका नइ मिलत हे. कतकों नोनी मन तो बिन बिहाव के ही बूढ़ावत हें. 
   -हाँ ए तो संसो के बात आय संगी.. दाई-ददा मनला बेटी के संगे-संग बेटा मनला घलो पढ़ाए लिखाए अउ योग्य बनाए के उदिम करना चाही.
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-माईलोगिन मन अपन चेहरा के सुंदरई ल बढ़ाए बर का-का जतन नइ करंय जी भैरा.. कभू नइ सुने राहन तइसनो उदिम करत देख के अचरज घलो लागथे ना.
   -सही कहे जी कोंदा.. कतकों बेर तो मरनी-हरनी म जाथे तभो फैशन परेड म जावत हे तइसे बानी के पोतत-चमकावत रहिथे जी. 
     -हव ना.. फेर दक्षिण कोरिया के माईलोगिन मन के अलगेच टोटका हे संगी.. वो मन तो अपन चेहरा म रोज पचास थपरा मार घलो खा लेथें जी.
   -वाह भई.. चेहरा के सुघरई खातिर थपरा घलो खा लेथें! 
   -हव.. एला उहाँ 'स्लैप थेरेपी' कहे जाथे. रोज अपन गाल ल अंगाकर रोटी बरोबर रझारझ पोआ लेथें. उहाँ चेहरा म निखार लाए बर ए थपरा मरवाए के परंपरा ह सैकड़ों बछर ले चलत हे कहिथें.
   -बने हे संगी.. रहि जा तो हमर घर के सियानीन ल पूछ के देखहूं, वो ह सुघरई के अइसन विधि ल पसंद करही धुन नहीं ते?
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-धरम-करम के गोठ ल सुनबे तहाँ ले भारी अकबकासी लागथे जी भैरा.. काकर ल पतियावन अउ काकर ल नहीं तइसे कस हो जाथे.
   -जे मनखे ह तप-साधना के जतका गहराई म उतरे रहिथे, जेन ज्ञान के स्रोत ल टमड़े रहिथे, वो ह ओकरे मुताबिक गोठियाथे जी कोंदा.
   -तभो ले रे भई.. हमर असन मन बर तो मरना कस हो जाथे.. सबो के गोठ ह आने च आने कस जनाथे.
   -हमन जब पढ़त रेहेन त गुरुजी ह चार अंधरा अउ एक हाथी के किस्सा बतावय नहीं.. बस धरम के बारे म घलो उही बात लागू होथे.
   -कइसे गढ़न के जी? 
   -जइसे एक झन अंधरा ह हाथी के पीठ ल टमड़ीस त हाथी ल कोठ असन बताइस, दूसर ह कान ल छू परीस त हाथी ल सूपा कस बताइस, तीसर ह पॉंव ल छू परीस त हाथी ल खंभा बरोबर बताइस अउ चौथा ह हाथी के पूछी ल धर परीस त ओ ह हाथी ल डोरी कस बताइस. बस धरम के संबंध म घलो अइसने हे, जे ह जतका गहिर म जाके टमड़ीस वो ह वतके बताइस. फेर वो सबो के बात ह धरम के ही अंग आय, भले पूर्ण नोहय. जइसे सबो अंधरा मन हाथी के ही अंग ल छूए रिहिन.
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-तितली मन ल देखबे त कतका निक जनाथे न जी भैरा, फेर तैं जानथस राष्ट्रीय तितली के खिताब जेन 'आॅरेंज आॅकलीफ' नॉव के तितली ल मिले हे, वोकर बसेरा हमर छत्तीसगढ़ म हे.
   -वाह भई.. राष्ट्रीय तितली के खिताब धारी के बसेरा हमर छत्तीसगढ़ म हे जी कोंदा? 
   -हव.. हमर देश म करीब 15 सौ किसम के तितली पाए जाथे, जेमा के 'आॅरेंज आॅकलीफ' नॉव के तितली ल बछर 2021 म राष्ट्रीय तितली के खिताब दिए गे हवय. ए ह हमर छत्तीसगढ़ के भोरमदेव वाइल्डलाइफ सेंचुरी अउ अचानकमार टाइगर रिजर्व क्षेत्र म देखे म आथे. ए ह न जब अपन पॉंखी ल खोलथे त अद्भुत रंगबिरंगी हो जाथे अउ पॉंखी ल सकेलते साथ कोनो पेड़ के सुक्खा पाना अस जनाथे, एकर इही छद्मभेषी रूप के सेती एला देखना ह कुदरत के करिश्मा ल देखे बरोबर जनाथे.
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-आजकाल तोला कवि लहुटत हे कहिके सुने म आथे जी भैरा.
   -अब लिखे के उदिम तो करथौं जी कोंदा.. फेर पहिली डांड़ ल लिखथौं तहाँ ले मन म कतकों किसम के उभुच-चुभुक घलो होए ले धर लेथे.
   -कइसन ढंग के उभुच-चुभुक जी? 
   -कभू शासन के तंत्र म बइठे  लोगन मोर रद्दा म छेंका तो नइ लगवा देहीं.. त कभू गाँव के गौंटिया-महाजन मन मोर जीए के आसरा म आगी तो नइ ढीलवा देही? फेर ए रद्दा म अबड़ झन डेढ़ होशियार घलो हें बताथें, जे मन खुद तो कुछू करय-धरय नहीं, बस दूसर मनला ए ह अइसे होही.. वो ह वइसे होही कहिके हुदरत कोचकत रहिथे बस. 
   -वाह भई.. फोकट छाप, हुसियार मनला तैं झझकथस जी.. दुनिया के चारों मुड़ा अइसन मनखे मिल जाथे.. जे मन जतका बड़का जोजवा होथे, वो मन अपन ल वतके बड़का गुनिक समझथें. तैं उंकर मन के मटमटई बकबकई ल अनदेखा कर के अपन रद्दा म रेंगत राह बस. आज तो तोरे कस लिखइया मन के जरूरत हे संगी, जे ह सच ल सच कह सकय.
   -अब उदिम तो करथौंच.. कला-साहित्य के देवता के पंदोली के आस ले के.
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-हमर रायपुर के टूरी हटरी वाले भगवान जगन्नाथ खातिर ए बछर नवा रथ बनत हे जी भैरा.. भगवान ह ए बछर के यात्रा ल इही नवा रथ म करही.
   -ए तो बने बात आय जी कोंदा.. तोला सुरता हे ना जब हमन रथयात्रा के दिन रथ ल तीरे बर जावन त कइसे चर्र-चर्र बाजत अलकर बानी के जनावय.
   -हव.. ओकरे सेती वो चालीस बछर जुन्ना रथ ल बलदहीं. ए रथ म स्टेयरिंग के संग ब्रेक घलो रइही, जेकर ले एला भीड़ म घलो रेंगाय म सोहलियत परही. नवा रथ ल हबीब नॉव के एक मुस्लिम मनखे ह अपन बेटा रियाज संग मिल के बनावत हे. ओकर कहना हे- रथ ल बनाय खातिर वो ह कोनो किसम के मोलभाव नइ करे हे, मंदिर समिति डहार ले बंद लिफाफा म जतका दे दिए जाही, वो ह श्रद्धा के साथ ओला झोंक लेही.
   -वाह भई ए तो सुग्घर बात आय.. कोनो धरम के मनखे होय ईश्वरीय आस्था ऊपर तो श्रद्धा भाव होना चाही.
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-सूखा मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान के अंतर्गत जैन समाज ह इहाँ के जुन्ना तरिया मन के खनई करे के जोम जमावत हे जी भैरा.. ए उदिम म अभी 15 जिला के 20 तरिया मनला खनवाहीं.
   -ए तो बने बात आय जी कोंदा.. हमर छत्तीसगढ़ म तो वइसे घलो छै आगर छै कोरी तरिया के परंपरा रहे हे. आज के पीढ़ी भले तरिया नरवा अउ कुआँ बावली के महत्व ल भुलावत जावत हे, फेर हमर पुरखा मन ए सबके जबर महत्व समझंय.
   -सही आय जी.. हमर इहाँ तो तरिया के संरक्षण अउ महत्व ल देखावत तरिया के बिहाव करे के घलो परंपरा रहे हे. तब ए माने जाय के जेन गाँव म जतका जादा तरिया वो गाँव वतके जादा समृद्ध.
   -जैन समाज वाले मन अभी तक कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश अउ गुजरात के कुल 100 तरिया मनला जीवनदान दे चुके हें, उंकर कहना हे के ए अभियान ह पूरा देश भर म चलत रइही.
   -बहुत बढ़िया संगी.. सबो समाज के लोगन ल पानी के संरक्षण के महत्व ल समझत अइसन उदिम करना चाही.
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-पुलिस विभाग के लेखाजोखा म अभी घलो अइसन उर्दू अउ फारसी के शब्द चलन म हे, जेला आम आदमी तो कहूँ जावय, हमर असन थोक-बहुत लिखे-पढ़े मन घलो नइ समझन जी भैरा.
   -तोर कहना सही आय जी कोंदा.. वइसन शब्द मनला बलद के इहाँ के स्थानीय भाखा के शब्द बउरना चाही, जेकर ले सबो किसम के लोगन वो शब्द के अरथ ल समझ सकय. 
   -सही आय जी.. अभी मध्यप्रदेश के पुलिस विभाग ह उर्दू अउ फारसी के 69 शब्द मन के जगा हिंदी शब्द बउरे के आदेश निकाले हे.
   -ए तो बने बात आय.. हमर छत्तीसगढ़ म घलो अइसन करना चाही. अब जइसे पुलिस वाले मन ताजिरात-ए-हिंद लिख देथें, अब तहीं बता एला गाँव गंवई के कतका झन मनखे समझत होहीं? 
   -अइसने इमदाद शब्द लिखे जाथे, ए ह हमर मन बर करिया आखर भइंस बरोबर होगे. अब कहूँ इही 'इमदाद' ल सहयोग करना या पंदोली देवई लिखे जाही त सबो झन समझ जाही.
   -सही आय जी.. इहाँ के सरकार ल ए मुड़ा चेत करना चाही, शासन प्रशासन म चलत अइसन शब्द मनला हिंदी के संगे-संग छत्तीसगढ़ी, सरगुजिया, हल्बी, गोंडी जइसन भाखा म का कहे जाथे इहू ल लिखे जाना चाही.
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-अध्यात्म के रद्दा अबड़ अलकर हे जी भैरा.. एक डहार तो तुंहर असन मन देवी-देवता के पूजा-उपासना के गोठ करथव त ए रद्दा म अइसनो लोगन हें, जे मन कोनो देवी-देवता या ईश्वर के कोनो अस्तित्व नइए कहिथें.
   -अपन-अपन ज्ञान अउ अनुभव के बात आय जी कोंदा.. अब तहीं मोला बता- अतेक विशाल ब्रम्हांड ल कोनो शक्ति तो संचालित करत होही, ते ए सब ह अपने अपन व्यवस्थित रूप म अपन बुता ल करत होहीं? 
   -अपने अपन रेंगतीन.. मनमर्जी ले बुता करतीन तब तो सब छदर-बदर हो जातीस जी संगी.
   -हव.. ठउका कहेस- सब अंते-तंते अउ छदर-बदर हो जातीस, अउ अइसन नइ होवते त एकर मतलब तो ए हे ना के कोनो न कोनो तो सुपर पॉवर हे, जे ह ए सबला  संचालित करत हे.
    -बात तो वाजिब जनाथे संगी.
   -बस.. इही वाजिब ह वो सुपर पॉवर आय, जेला कोनो भगवान कहि देथे त कोनो ईश्वर या गॉड त कोनो रब अउ खुदा या प्रकृति शक्ति.
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-हमन कतकों राष्ट्रीयता अउ भाईचारा के गोठ करत आने राज ले आए लोगन ल मया करन जी भैरा, फेर वो मन कोनो न कोनो किसम ले अपन बाहरी होय के सबूत देइच देथें.
   -महूं कतकों बखत अइसन अनुभव करे हौं जी कोंदा.. खासकर के इहाँ के अस्मिता अउ संस्कृति ले जुड़े मामला म तो निश्चित रूप ले.
   -सिरतोन आय.. अभी देखना गिरौदपुरी धाम म गुरु बाबा घासीदास जी के आस्था ले जुड़े जैतखाम ल काट के नुकसान पहुंचाए के मामला म घलो अइसने होय हे. 
   -सिरतोन आय जी.. कोनो भी छत्तीसगढ़िया मजदूर या ठेकादार होतीस त वो ह बाबा जी के आस्था ले जुड़े प्रतीक ल नुकसान पहुंचाए के बारे म सोचतीस घलो नहीं, फेर आने राज ले आए मजदूर मन इहाँ के ठेकेदार के आस्था ले जुड़े प्रतीक ल अपन गुस्सा प्रदर्शन के माध्यम बनाइन.
   -हव भई.. नल जल मिशन ले जुड़े काम के पइसा पूरा नइ मिले के सेती ठेकादार ले गुसियाय रिहिन हें, त वोकर घर म घुसर के टोर-फोर करतीन, बस्ती भीतर के सार्वजनिक आस्था के प्रतीक ल काबर?
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Wednesday, 24 April 2024

अक्ती किसानी के नवा बछर

अक्ती हमर किसानी के नवा बछर
   छत्तीसगढ़ म जेन अक्ती के परब मनाए जाथे, वो ह किसानी के नवा बछर के रूप म ही मनाए जाथे. पुतरा-पुतरी के बिहाव या ए दिन बर-बिहाव खातिर शुभ मुहूर्त संग अउ कतकों अकन जुड़े मान्यता मन ओकर सहायक परंपरा के अंग आय, जे मन आने-आने क्षेत्र ले आए लोगन संग इहाँ आ के सॉंझर-मिंझर होवत गे हवंय.
   हमर इहाँ अक्ती के दिन जेन सबले बड़का परंपरा के निर्वाह करे जाथे ओला हमर महतारी भाखा म 'मूठ धरना' कहिथन. ए मूठ धरई ह असल म अपन-अपन खेत म खरीफ के नवा फसल खातिर बीजा बोवई के शुरुआत आय. 
   ए बीज बोए के परंपरा ल पूरा करे खातिर गाँव के सबो किसान अपन-अपन घर ले धान लेके एक निश्चित जगा सकलाथें. कोनो कोनो गाँव म ठाकुर देव या ठाकुर दिया म सकलाथें त कोनो गाँव म अउ कोनो मेर, जिहां वो गाँव के बइगा ह सबो झन के बिजहा ल संघार के पूजा पाठ करथे, मंत्र के माध्यम ले अभिमंत्रित करथे. तहाँ ले सबो किसान मनला वो अभिमंत्रित धान के बिजहा ल बॉंट दिए जाथे. किसान मन इही अभिमंत्रित धान के बिजहा ल अपन खेत म लेग के बोवाई करथें.
   कतकों गाँव मन म बइगा के द्वारा बिजहा के धान ल अभिमंत्रित करे के परंपरा नइ देखे म आवय. तब अइसन गाँव के किसान मन अपन खेत म ओनारे बर रखे धान के बिजहा ल अपन कुल देवता, ग्राम देवता आदि मन म समर्पित करत खेत डहार जाथे अउ जतका बिजहा बॉंच जथे वो मनला खेत म बो देथे. ए किसम 'मूठ धरे' के परंपरा संपन्न हो जाथे.
   अक्ती परब के दिन ही संझौती बेरा गाँव के सब किसान अउ पौनी पसारी संग कमइया मन कोनो चउंक-चाकर जगा म सकलाथें, जिहां अपन-अपन सामरथ के मुताबिक सौंजिया, पहाटिया, मरदनिया, धोबी आदि मन के नवा बछर खातिर नियुक्ति करथें. जे सौंजिया, कमइया अउ पौनी पसारी मन अपन जोंगे धान-पान अउ रुपिया पइसा के मुताबिक ठाकुर मन ले हुंकारू पा जाथें, ते मन अपन-अपन ठाकुर के पॉंव-पैलगी कर के चोंगी-माखुर पीयत बुता-काम ल लग जाथें.
    ए सब के संग ही अक्ती के दिन ले कतकों नवा कारज जइसे नवा करसी म पानी पीए के, आमा जइसन मौसमी फल ल टोरे अउ खाए के शुरुआत घलो करथें. 
   नान-नान नोनी मन बर ए ह पुतरा-पुतरी के बिहाव के मयारुक बेरा होथे. अक्ती के आगू दिन संझौती बेरा बने बाजा-रूंजी संग चुलमाटी के नेंग करे रहिथें, तेला ए दिन मड़वा ठउर म लानथें तहाँ ले तेल, हरदी मायन, बरात परघनी आदि सबो नेंग ल पूरा करत टिकावन करथें, पुतरा-पुतरी के बिहाव ल संपन्न करथें.
   अक्ती के दिन ढाबा भरे के घलो परंपरा हे. ए दिन किसान मन अपन-अपन अंगना म गोबर के तीन ठक खंचवा बनाथें. इही गोबर ले बने खंचवा ल ढाबा कहे जाथे.
   फेर ए ढाबा म एक म  धान दूसर म ओन्हारी जइसे- तिंवरा या राहेर अउ तीसर म पानी भरे जाथे बने टिपटिप ले.
   ढाबा म धान ओन्हारी अउ पानी भरे के बाद फेर ओकर आगू म हूमधूप देके पूजा करे जाथे. तेकर पाछू फेर बिजहा बोनी के टुकना म बीजहा, कुदारी, आगी पानी अउ हूमधूप धर के खेत म बोवई के मूठ धरे जाथें.
   अक्ती के दिन घर के देवाला म नवा फल ल नवा करसी के पानी खातिर चढ़ाए जाथे. अपन पुरखा मनला सुरता कर के तरिया या नदिया म उरई के पौधा (घास) गड़िया के नवा करसी या तांबा के चरू म पानी डारथें. अपन पुरखा मनला पानी दिए जाथे, जइसे पितर तरपन म करे जाथे.
    ए किसम सब अपन अपन परंपरा अउ मान्यता के मुताबिक अक्ती परब ल मनाथें.

अक्ती आगे घाम ठठागे चलव जी मूठ धरबो
अपन किसानी के शुरुआत सुम्मत ले सब करबो
बइगा बबा पूजा कर के सबला पहिली सिरजाही
फेर पाछू हम ओरी-ओरी बिजहा ल ओरियाबो
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा 9826992811

Monday, 22 April 2024

कोंदा भैरा के गोठ-18

कोंदा भैरा के गोठ-18

-पहिली अक्ती के दिन ले नवा करसी ल बउरे के शुरूआत करत रेहेन जी भैरा, फेर अब तो फागुन चइत म ही मुंह चपियाए ले धर लेथे.
   -हव जी कोंदा.. गरमी ह दिन के दिन लाहो लेवत हे.. अब तो लगते फागुन ले ही जुड़ पानी बर टोटा के आस बाढ़ जाथे, फेर ए बछर तो अउ अतलंग होही काहत हें.
   -अच्छा.. अइसे का? 
   -हव.. देश के मौसम वैज्ञानिक मन के कहना हे के ए बछर अप्रैल ले जून तक सरलग तीन महीना नंगतेच दंदोरही गरमी ह.. अउ जानत हस..? 
   -बताना भई. 
   -लू जेला हमन झॉंझ-बड़ोरा कहिथन ते ह पहिली असन सिरिफ दू-चार दिन के नहीं, भलुक ए बछर बीस दिन तक गदर मचा देही काहत हें.
   -जउंहर होगे.. ए सब ह पर्यावरण के अनदेखी अउ ग्लोबल वार्मिंग के नतीजा आय संगी जे ह अउ बाढ़ते जाही, तइसे जनाथे मोला.
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-पहिली के चुनाव म मुहर-ठप्पा लगाय के नियम नइ रिहिसे जी भैरा.
   -त कइसन चुनाव होवय जी कोंदा? 
   -हमर देश के शुरूआती दू आम चुनाव म प्रत्याशी मन के नॉव अउ ओकर चुनाव चिन्ह के छप्पा लगे वाला अलग अलग मतपेटी रख दिए जावय. मतदाता ह अपन मतपत्र ल अपन पसंद के उम्मीदवार के मतपेटी म डार देवय.
   -अच्छा..! 
   -हव.. दू चुनाव के बाद जब मतपत्र म मुहर-ठप्पा लगाय के शुरुआत होइस, त कतकों झन तो ए नवा पद्धति के विरोध घलो करीन.
   -हाँ.. फेर अब तो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन आगे हवय ना.
   -हाँ सही आय.. अउ हो सकथे अवइया बेरा म वोट डारे के अउ कुछू नवा आविष्कार हो सकथे, फेर शुरूआती दू चुनाव के ऐतिहासिक महत्व हे.. वो बखत के बिना मुहर-ठप्पा वाले मतदान ल "मुहर न ठप्पा, जीत गए कक्का" वाले दौर कहिके आज तक सुरता करे जाथे.
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-ए बछर के नवरात म निरई माता के दरस करे बर चलबो नहीं जी भैरा.
   -मोला नइ ओसरही तइसे जनाथे जी कोंदा.. फेर उहाँ तो बछर म एके दिन भर दरस कर सकथन आने दिन तो बंद रहिथे कहिथें.
   -हव.. चैत नवरात के पहला इतवार के माता के जात्रा लगथे. ए दिन दुरिहा-दुरिहा लोगन अपन मनोकामना पूरा होय के सेती आथें अउ बोकरा के पूजवन देथें. ए बछर अवइया इतवार के मुंदरहा 4 बजे ले बिहनिया 9 तक दरस कर सकथन. 
   -अब मोर भाग म एसो माता के दरस के जोंग नइहे तइसे जनाथे जी संगी.. उहाँ के जोत ह माता के किरपा ले अपने अपन नौ दिन ले बिन तेल के बरथे कइथें ना? 
   -हव सही आय.. फेर गरियाबंद जिला के मोहेरा गाँव के डोंगरी म बिराजे निरई माता के मंदिर म माईलोगिन मन के जवई प्रतिबंधित हे. वो मन उहाँ के परसाद तको नइ खावंय.
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-पहिली नवरात आवय तहाँ ले नौ दिन के सोवा हमर मन के माता गुड़ी या चौंरा म ही होवय जी भैरा.
   -सही आय जी कोंदा.. बियारी कर के घर ले निकलन तहाँ ले माता देवाला के जस-सेवा म संघर जावत रेहेन. अधरतिहा के होवत ले माता के सेवा म गावत बजावत मगन राहन, तहाँ ले चार पहर रतिहा ल गुड़ी चौंरा म ही ढलंग के बीता देवन.
   -हव जी.. फेर अब वो लइकुसहा उमर के जोश संग हमर बोली भाखा के शब्द मन घलो नंदावत जावत हावय न.. अब कोनो माता के ठउर ल गुड़ी या देवाला कहाँ कहिथें, सब के सब मंदिर कहि देथें.
   -हव जी हमर परंपरा मन म आने ठउर ले आए नेंग-जोंग संग शब्द मन घलो साॅंझर-मिंझर होवत जावत हे.
   -एकर सबले बड़का कारण ए आय संगी, के हम अपन गुड़ी देवाला के पूजा उपासना ल खुद करे ले छोड़ के अंते-अंते ले आए लोगन मनला सउंपत जावत हावन, तेकरे सेती उन हमर परंपरा म अपन संग लाने शब्द संग परंपरा मनला संघारत जावत हें. हमला अपन परंपरा के आरुग रूप के रक्षा करना हे, त जम्मो पूजा सेवा ल अपन खुद के हाथ ले ही करे बर लागही.
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-अभी चैत अंजोरी एकम के जशपुर के वनवासी कल्याण आश्रम म आदिवासी मन के सबले बड़का परब सरहुल सरना पूजा महोत्सव म इहाँ के मुखिया ह कहिस हे जी भैरा के आदिवासी मन ले बड़का हिंदू अउ कोनो नइए. वो मन कहिन के हमन शिव अउ पार्वती के पूजा करथन, जे मन आदिवासी मनला हिंदू नोहय कहिथें, वो मन विधर्मी आय.. अउ अइसन विधर्मी मन ले हमला बॉंच के रहना चाही.
   -एक पइत महूं ल जशपुर जिला के बगीचा क्षेत्र म जाए के अवसर मिले हे जी कोंदा.. मैं जब उहाँ के सरना पूजा स्थल म गे रेहेंव त उहाँ के पहाड़ी कोरवा आदिवासी समाज के अध्यक्ष ह घलो मोला अइसने बताय रिहिसे.
   -अच्छा.. अइसे? 
   -हव.. मोला राजपुरी नामक गाँव के सरना पूजा स्थल के संगे-संग उहाँ के पहाड़ी म स्थापित जम्मो देवी देवता मनला देखाए रिहिन हें.
   -फेर हमर ए मैदानी भाग के आदिवासी विद्वान मन ए बात ल नइ मानंय, उंकर कहना हे के सांस्कृतिक अउ संवैधानिक दूनों रूप ले ही आदिवासी मन हिंदू धर्म या संप्रदाय के अंग नोहय.
   -हो सकथे अलग अलग क्षेत्र के आदिवासी मन के पूजा उपासना के प्रतीक अउ मान्यता अलग अलग होही.
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-अभी नवरात म दुर्गा सप्तशती के पाठ तो करत होबे न जी भैरा? 
   -करथौं न जी कोंदा.. कभू-कभू मन होथे त अइसने आने बखत घलो कर लेथौं.
   -ए तो बने बात आय जी संगी, फेर तैं जानथस दुर्गा सप्तशती के रचना हमर छत्तीसगढ़ म ही मार्कंडेय ऋषि ह करे रिहिसे? 
   -वाह भई.. ए बात ल तो कभू नइ सुने रेहेन संगी! 
   -हाँ.. हमर बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर ले 40 कि.मी. दुरिहा मारकंडी नदिया के तीर चपका नॉव के गाँव हे, इहें ऋषि मार्कंडेय ह राहत रिहिसे, जिहां महादेव के आशीर्वाद ले दुर्गा सप्तशती के संगे-संग मार्कंडेय पुराण के रचना वो मन करे रिहिन हें.
   -भारी अचरज के गोठ आय संगी हम अपने तीर-तखार के इतिहास अउ गौरव ले अनचिन्हार बने हावन.
   -हव जी.. कतकों दृष्टि ले ऐतिहासिक चपका गाँव म आज घलो मार्कंडेय ऋषि के धुनी अउ प्रतिमा ल प्रत्यक्ष देखे जा सकथे. इहाँ एक प्राकृतिक जलस्रोत घलो हे. संग म देखे के लाइक अउ कतकों देव मूर्ति अउ जगा हें.
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-हमर रायपुर म माता जी के एक अइसे मंदिर हे जी भैरा जिहां यादव समाज के मन ही पुजारी होथें.
   -अच्छा.. कोन मंदिर के बात आय जी कोंदा? 
   -इहाँ के कुशालपुर चौक म दंतेश्वरी माता के मंदिर म. अउ तैं जानथस जी संगी इही जगा के खोखोपारा स्कूल ले मैं ह मिडिल पास करे हौं.
   -वाह भई..! 
   -हव.. चौदहवीं शताब्दी म ए जगा गजब जंगल रिहिसे, तब गरुवा चराय बर एक गणेशिया बाई नॉव के यादव महिला ह जावय. वो देखय के एक ठ गाय ह एक जगा खड़ा होवय तहाँ ले वोकर दूध ह अपने अपन गिरत जावय. जब एकर जानकारी वो बखत के हैहयवंशी राजा म मिलिस त वो जगा ल खनवाइस त उहाँ दंतिका के रूप म एक प्रतिमा मिलिस. तब उहाँ मंदिर बना के वोला दंतेश्वरी नॉव ले चिन्हारी करे गिस. काबर ते गणेशिया बाई के रूप में यादव मन उहाँ माता जी के पहिली सेवा करे रिहिन हें, तेकर सेती आज तक यादव मन ही इहाँ सेवा करथें, अभी राजू यादव ह इहाँ के पुजारी हे.
   -ए तो बने बात आय जी जेकर मन के माध्यम ले मंदिर बने हे उही मनला उहाँ के पुजारी होना चाही सबोच जगा.
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-रायपुर के ऐतिहासिक कंकाली मंदिर अउ तरिया हे ना जी भैरा पहिली वो जगा इहाँ के मसानघाट रिहिसे.
   -अच्छा.. अइसे का जी कोंदा? 
   -हव.. करीब सात सौ साल पहिली बद्रीनाथ धाम ले आए नागा साधु मन एला बनवाए रिहिन हें. मोर बचपना इही पारा म बीते हे संगी . 
   -अच्छा.
   -हव.. मसानघाट होय के सेती नागा साधु मन ए जगा तांत्रिक क्रिया करत राहंय. एमा के कृपालु गिरी जी के सपना म कंकाली दाई आइस अउ ए जगा तरिया कोड़वाय बर कहिस. जब ए जगा तरिया कोड़े गिस त वोमा ले माता जी के मूर्ति ह निकलिस, जेला उहाँ स्थापित करे गिस. तरिया के बीच म एक शिव जी के मंदिर घलो हे, जेहा बारों महीना पानी म बूड़े रहिथे. मंदिर के ऊपर के कलश वाले हिस्सा भर ह दिखथे. हमन लइका रेहेन ना त उहाँ अबड़ कूद कूद के नहाए हावन. 
   -अच्छा.. त वो शिव मंदिर ह कभू नइ दिखय का? 
   -दिखथे ना.. एक दू पइत जब तरिया के चिखला ल हेरे बर पानी ल अंटवाए गिस तब दिखे रिहिसे. हमन अपन आॅंखी म देखे हावन.
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-हमर देश म हरियाणा एक अइसे राज्य आय जी भैरा जे ह 75 साल ले जादा के जुन्ना पेड़ मनला पेंशन देही.
   -वाह भई.. जइसे सियान मनखे मनला सरकार ह पेंशन देथे तइसने सियनहा पेड़ मनला पेंशन जी कोंदा! 
   -हव संगी.. हर बछर 2,750 रुपिया के पेंशन ह वो मनखे के खाता म जाही, जे ह वो पेड़ के देखरेख करही.
   -ए तो बने निक बात आय संगी.. एकर ले पेड़ पौधा मन के संरक्षण डहार लोगन के चेत जाही, जे गरीब मनखे मन पेड़ के सेवा जतन करहीं वो मनला आर्थिक लाभ हो जाही अउ सबले बड़का बात ए के जे मन बिन सोचे गुने जुन्ना रूख मनला काट डारथें वोकरो ले बचाव होही.
   -हव सही आय.. अभी 3,810 पेड़ के चिन्हारी करे गे हवय, जेमा बर, पीपर, लीम, आमा, डूमर अउ कदम आदि के पेड़ शामिल हें.
    -निश्चित रूप ले एकर ले पर्यावरण संतुलन के दिशा म जबर सफलता मिलही, हमर देश के आने सबो राज्य सरकार मनला घलो अइसने कुछू उदिम करना चाही.
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-हमर इहाँ के जोत जंवारा के विसर्जन म पहिली नान-नान बाबू पिला मन ले लेके जवनहा अउ सियनहा सबोच आदमी जात मनला ही बाना-सांग गोभे, झूमत-नाचत देखे रेहेन जी भैरा, फेर अभी ए बखत तीन झन बेटी मनला घलो बाना सांग धारण करे देखेन भई. 
   -अच्छा.. ए ह कहाँ के बेटी मन आय जी कोंदा? 
   -हमर रायपुर के ही आय संगी. एमा के एक नोनी वैभवी निर्मलकर जेन कक्षा 11 वीं म पढ़थे ते ह बताइस के उंकर घर म दूनों नवरात्रि म जोत जंवारा बोवय त वो ह वोकर देख-रेख करे के संग ही नौ दिन के उपास घलो करय. तब पाछू के चैत नवरात्रि म वोकर मन म ए प्रेरणा आइस के उहू ह जंवारा विसर्जन म सांग धारण करय. 
   -ए तो बने बात आय संगी.. आस्था के प्रदर्शन या कोनो भी धरम के कारज ह सिरिफ पुरुष मन के पोगरौती क्षेत्र नोहय, बेटी महतारी मन घलो अइसन सब कर सकथें.
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-पहिली जब नवा नवा सिनेमा बने के चालू होए रिहिसे न जी भैरा तब माईलोगिन मन के भूमिका ल आदमी च मन निभावय.
   -हव जी कोंदा.. जइसे हमर इहाँ के नाचा-गम्मत म परी अउ जनाना सब आदमीच मन बनयं तइसे कहि दे.
   -हव.. नाचा अउ गंड़वा बाजा म तो अभी ले आदमी मन ही परी बन के नाचत दिख जाथें, फेर सिनेमा म घलो तब खोजे म घलो माईलोगिन मन नइ मिलत रिहिन हें, आज भले फिलिम म काम करे बर सब लाईन लगे रहिथें, एकरे सेती सिनेमा जगत के भीष्म पितामह के रूप म प्रसिद्ध दादा साहेब फाल्के ह बछर 1917 म अपन फिलिम 'लंका दहन' म अन्ना सालुंके ल सीता के रोल करवाए रिहिसे.. अउ मजेदार बात जानथस संगी.. राम के रोल ल घलो उहिच ह करे रिहिसे.
   -वाह भई.. राम अउ सीता दूनों के रोल ल एकेच आदमी ह? 
   -हव..अन्ना सालुंके ह पहिली आदमी आय जे ह महिला अउ पुरुष के दू भूमिका ल एके संग एके फिलिम म निभाए रिहिसे, ए बात ल इतिहास म सुरता रखे जाही संगी.
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-ए द्वापर त्रेता के गोठ करइया इतिहासकार मन हमर छत्तीसगढ़ के प्राचीनता ल सिरिफ पॉंच हजार बछर जुन्ना बताथें जी भैरा.. फेर अभी मानव विज्ञान सर्वेक्षण विश्वविद्यालय के एंथ्रापाॅलाजी विभाग के शोधकर्ता मन बस्तर के अबूझमाड़ इलाका म जेन शोध कारज करे हें, उंकर मन के कहना हे के अबूझमाड़ क्षेत्र म 30 ले 70 हजार बछर पहिली मानव सभ्यता अस्तित्व म रिहिस.
   -वाह भई.. ए तो हमर मन बर गरब करे के लाइक बात आय जी कोंदा.
   -हव जी संगी.. मानव विज्ञान सर्वेक्षण के प्रमुख डॉ. पीयुष रंजन साहू के कहना हे के बस्तर के कतकों जगा के पथरा मन के नमूना सकेले गे हवय जेकर ले जनाथे के 70 हजार बछर पहिली इहाँ मानव सभ्यता विकसित होइस. उंकर कहना हे के कार्बन डेटिंग अउ जादा शोध करे म कतकों चौंकाने वाला तथ्य मन के जानकारी मिल सकही. 
   वो मन बताइन के शोधार्थी मन पॉंच बछर तक अबूझमाड़, बीजापुर, सुकमा, बारसूर अउ दंतेवाड़ा ले गुजरइया प्रमुख नदिया मन के तीर-तखार म खोज अभियान ल फोकस करे रिहिन.
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-दुनिया बर राम ह भगवान होही जी भैरा फेर छत्तीसगढ़ बर तो वो ह सिरिफ भॉंचा ही आय. 
   -सिरतोन कहे जी कोंदा इहाँ के परंपरा म अइसन कतकों जिनिस दिख जाथे जेकर ले ए बात ह प्रमाणित होथे.
   -हव ना.. हमन इहाँ भाॅंचा के पॉंव परे के परंपरा ल तो जानबे करथन के ओकर कारण का आय? ठउका अइसने हमर रायपुर के पुरानी बस्ती म एक मंदिर हे जेला जैतूसाव मठ के रूप म जानथन, इहाँ हर बछर रामनवमी माने राम के जनमतिथि के छै दिन बाद वोकर छट्ठी मनाए के परंपरा हे. 
   -अच्छा..! 
    -हव.. ए ह इहाँ के गजब जुन्ना परंपरा आय.. जइसे हमन अपन घर-परिवार म होय लइका के छट्ठी मनाथन न ठउका वइसनेच ए मठ म राम के छट्ठी मनाए जाथे, माईलोगिन मन बने सोहर गाथें अउ तहाँ ले फेर उनला ओसहा लाड़ू अउ कॉंके परोसे जाथे. सिरतोन संगी गजब निक जनाथे.
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Tuesday, 16 April 2024

सुशील भोले को जनकवि मरहा सम्मान

सुशील भोले जनकवि बिसंभर यादव 'मरहा' सम्मान' से सम्मानित
    रायपुर. साहित्य एवं पत्रकारिता के साथ ही छत्तीसगढ़ की पारंपरिक संस्कृति के उन्नयन में अविस्मरणीय योगदान के लिए राजधानी रायपुर के वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार एवं संस्कृति मर्मज्ञ सुशील भोले को जनकवि बिसंभर यादव 'मरहा' सम्मान 2024 से सम्मानित किया गया. 
    माँ कल्याणी शीतला मंदिर मरौदा टैंक रिसाली भिलाई द्वारा विगत बारह वर्षों से चैत्र नवरात्रि के अवसर पर षष्ठमी तिथि को प्रतिवर्ष यह प्रतिष्ठित सम्मान छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्ति को प्रदान किया जाता है. इसी श्रृंखला में इस वर्ष सुशील भोले को प्रतिष्ठित बिसंभर यादव मरहा सम्मान से सम्मानित किया गया.
    अंचल के प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. परदेशी राम वर्मा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे. उन्होंने इस अवसर पर अपने उद्बोधन में बिसंभर यादव 'मरहा' को स्मरण करते हुए कहा कि मरहा जी जनकवि तो थे ही साथ ही वे महाकवि भी थे. वे बड़े बड़े कवि सम्मेलन के मंच के साथ ही गाँव गाँव में आयोजित होने वाले रामायण कार्यक्रम के मंचों पर भी अपनी कविता की प्रस्तुति देते थे और उसके माध्यम से जनजागरण का कार्य करते थे. मरहा जी कोई पूंजीपति या धन्नासेठ नहीं थे, उसके बावजूद उनके नाम पर प्रतिवर्ष सम्मान समारोह आयोजित करने के लिए मैं माँ कल्याणी शीतला मंदिर समिति को हृदय से बधाई देता हूँ.
   'मरहा' सम्मान से इस वर्ष सम्मानित होने वाले साहित्यकार सुशील भोले ने मरहा जी को स्मरण करते हुए कहा कि वे जब छत्तीसगढ़ी भाषा की प्रथम मासिक पत्रिका 'मयारु माटी' के विमोचन कार्यक्रम के सिलसिले में 'चंदैनी गोंदा' के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख के ग्राम बघेरा स्थित निवास पर गये थे, तब दाऊ जी ने ही पहली बार बिसंभर यादव मरहा जी से उनका परिचय कराया था. उसके पश्चात तो मरहा जी के साथ विभिन्न कार्यक्रमों में नियमित रूप से मुलाकात होती थी. उन्होंने कहा कि मरहा जी की कविता जितनी सहज और सरल होती थी, वे स्वयं भी उतने ही सरल और मयारुक व्यक्ति थे. उनके साथ 
 कविता पाठ करने का अनेकों बार अवसर मिला. उन्होंने मरहा जी स्मृति में प्रतिवर्ष सम्मान समारोह आयोजित करने के लिए माँ कल्याणी शीतला मंदिर के सदस्यों को साधुवाद दिया.
    इस अवसर पर कवि बलराम चंद्राकर के संचालन में भव्य कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया, जिसमें विरेंद्र तिवारी, गायत्री श्रीवास, मनोज श्रीवास्तव, पूरन जायसवाल, राजेश चौहान तथा लोकेश मानिकपुरी सहित स्थानीय कवियों ने देर रात तक काव्य पाठ कर उपस्थित जनसमुदाय को कविता रस से सराबोर किया.

Monday, 15 April 2024

विजय मिश्रा अउ झंगलू-मंगलू

वरिष्ठ पत्रकार विजय मिश्रा जी हमार ठीहा म पधारे रिहिन. ए बेरा म उन अपन हालेच म छप के आए किताब 'गोठ झंगलू-मंगलू के' भेंट करिन.
   छत्तीसगढ़ राज्य बने के आरो बछर 2000 म जनाए ले धरत रिहिसे, ठउका उही बेरा म अक्टूबर 2000 ले उन दैनिक अग्रदूत म छत्तीसगढ़ी भाखा म समसामयिक विषय मन ऊपर हास्य-व्यंग्य के शैली म क्षणिका लिखे के शुरू करिन, जे ह अग्रदूत के पहला पेज म सरलग छपय. 
   ठउका इहिच बेरा म जे दिन छत्तीसगढ़ राज्य बने के घोषणा होइस, उहिच दिन 1 नवंबर 2000 ले टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जी घलो दैनिक अग्रदूत म ही छत्तीसगढ़ी भाखा म सरलग संपादकीय लिखे के शुरू करिन.
   छत्तीसगढ़ी भाखा के बढ़वार अउ प्रोत्साहन खातिर ए ह दैनिक अग्रदूत के जबर बुता रहिस. एक हिन्दी के दैनिक अखबार म छत्तीसगढ़ी म सरलग कॉलम संग संपादकीय के छपई. ए जबर बुता ल जब कभू छत्तीसगढ़ी भाखा के विकास के इतिहास लिखे जाही, त वोमा विशेष रूप ले उल्लेखित करे जाही.
   ए ह संयोग के बात आय के मोरो अखबार लाईन के शुरुआत ह दैनिक अग्रदूत ले ही होय हे. मोर जिनगी के पहला कविता अउ कहानी के प्रकाशन घलो दैनिक अग्रदूत म ही होय हे.
   आज जब भाई विजय मिश्रा जी ह अपन सरलग लिखे कॉलम के किताब रूप ल मोर घर म आ के भेंट करिन, त मोला गजबे निक लागीस संग म अपन वो जुन्ना दिन के सुरता घलो आगे. 
    विजय मिश्रा जी ल उंकर ए किताब 'गोठ झंगलू-मंगलू के' खातिर गाड़ा गाड़ा बधाई संग शुभकामना हे.
-सुशील भोले

Sunday, 7 April 2024

मित्र मिलन में स्मरण हो आया फिर छात्र जीवन

आर.डी.तिवारी मित्र मिलन में फिर स्मरण हो आया हमारा छात्र जीवन
    साठ वर्ष से ऊपर के लोग जब मिलते हैं, तो बेटा-बहू, रिटायर पेंशन और विभिन्न बीमारियों से होते हुए घर का बंटवारा और भाई भाई की लड़ाई तक पहुँच जाते हैं. अक्सर इस वर्ग के लोगों की चर्चा का विषय ऐसा ही कुछ होता है, लेकिन हम आर. डी. तिवारी स्कूल के छात्र लगभग पैतालीस वर्ष के अंतराल के पश्चात् एक साथ मिले तो फिर से उसी स्कूली जीवन की याद में खो गये.
   जैसा कि मुझे लग ही रहा था, कि इतने वर्षों के बाद मिल रहे बाल सखाओं में से कुछ को तो शायद पहचान ही नहीं पाऊंगा और हुआ भी ऐसा ही. हम जब उस समय पढ़ रहे थे, तो हमारी कक्षा में लगभग 38 छात्र थे. रविवार 7 अप्रैल को जब चंगोरा भाठा स्थित अभिनंदन पैलेस में मिले तो कुल 23 मित्र ही उपस्थित हो पाए. वहाँ ज्ञात हुआ कि कुछ मित्र तो अब इस दुनिया में ही नहीं रहे और कुछ किसी कारण से आ नही पाए.
   वहाँ उपस्थित मित्रों में से तीन को पहचानने में मुझे थोड़ा समय लगा. एक जिसे देवीदीन कहकर परिचित कराया जा रहा था, मुझे बिल्कुल भी याद नहीं आ रहा था. उसका भारी भरकम शरीर.. लगता था कहीं का धन्नासेठ हमारे सामने आकर बैठ गया है. 
   तब त्रिलोचन में मुझे बताया- अबे.. इसको हम लोग चकरा नहीं कहते थे. 'चकरा' शब्द मेरे मष्तिष्क पर कौंधा.. तभी स्मरण हो आया कि यह तो वही है, जब हम लोग फुटबॉल खेलते थे, तो यह शख्स फुटबॉल को आउट लाईन के किनारे किनारे लेकर भागता था. बीच मैदान में कभी खेलता ही नहीं था.
   दूसरा मित्र जिसने अपना नाम झंगलुराम ढीमर बताया. मैं इसे भी नहीं पहचान पाया, तब उसी ने बताया- भैया हम लोग साथ में वॉलीबॉल नहीं खेलते थे. तब मुझे धीरे धीरे समझ में आया कि हम पढ़ाई करने के साथ ही वॉलीबॉल भी साथ में खेलते थे.
   तीसरा मित्र जिसे मैं पहचान नहीं पाया, उसका नाम है- राजू महावादी. महावादी सरनेम सुनकर मुझे साधना महावादी का स्मरण हो आया, जिसे हम लोग टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा लिखित नाटक 'गंवइहा' में गायिका रूप में गाना गवाए थे. तब राजू ने बताया कि साधना उसकी चचेरी बहन है, और हम लोग हांडीपारा में टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा जी के घर के सामने ही रहते थे. तब मैं राजू महावादी को भी पहचान पाया.
   वर्ष 1978-79 में पढ़कर निकले हमारे मित्रों में से कुछ तो अब सेवानिवृत्त हो गये हैं. ज्ञानेश शर्मा छत्तीसगढ़ योग आयोग के अध्यक्ष पद को सुशोभित कर चुके हैं. नरेंद्र बंछोर एंटी करप्शन ब्यूरो के डीएसपी पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. डॉ. ध्रुव कुमार पाण्डेय महाविद्यालय के प्राध्यापक पद से तो अशोक शर्मा बैंक अधिकारी के पद से. 
    ऐसे ही शत्रुहन यादव आरडीए से, राजू शर्मा और मनोज सोनी नगर निगम से. हरीश अवधिया और दीपक ब्राहा शिक्षा विभाग से. लेकिन प्यारेलाल सेन अभी जे.आर.दानी में व्याख्याता के पद पर तो डॉ. अशोक शर्मा छत्तीसगढ़ महाविद्यालय में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं. इसी तरह योगेन्द्र यदु भी शासकीय सेवा में सक्रिय हैं.
   त्रिलोचन सिंह, गगन पंजवानी, मुश्ताक अहमद और प्रधान सिंह होरा, लीलाधर महोबिया, जीतेन्द्र अग्रवाल, नंदकिशोर श्रीवास अपने अपने पुराने व्यवसाय में ही मगन हैं.
   आमतौर पर यह माना जाता है कि किसी भी व्यक्ति का साठ वर्ष से ऊपर का जीवन बोनस का जीवन होता है, इसलिए इस बोनस के जीवन को हम सभी को हंसते हुए सक्रिय रहकर व्यतीत करना चाहिए. इसी बात को ध्यान में रखकर हम सभी मित्रों ने निर्णय लिया कि इस तरह का मिलन कार्यक्रम अब नियमित रूप से किया करेंगे. वर्ष में कम से कम दो बार दीपावली और होली मिलन के बहाने तो जरूर मिलेंगे.
-सुशील वर्मा भोले