Saturday, 13 February 2016

प्रेम का बंधन एेसा....















प्रेम का बंधन एेसा जिसमें जाति धर्म न उम्र का बाधा
हर मूरत में शिव-गौरी,  हर जोड़ी में कृष्ण और राधा
*सुशील भोले*

प्रेम भी उतना पावन है....


















प्रेम भी उतना पावन है, जितना मंदिर में पूजा
रंग जाये जो इस रंग में, चढ़े न उस पर दूजा
राधा मीरा गोपियाँ सारी, सब थीं प्रेम दीवानी
हृदय-भाव को उनके, कब किसी ने है बूझा
*सुशील भोले*

Friday, 12 February 2016

आया है बसंत....










मतवाली हुई हवाएं, मादक हुए दिगन्त
सृजन का सम्मोहन जागा नाच उठा अनन्त
कोयल गाती फिर रही इस डाली उस डाली
मधु का प्याला हाथ लिए आया है बसंत....
*सुशील भोले*

Friday, 5 February 2016

माघ म लागत हावय चैत कस घाम...











माघ म लागत हावय चैत कस घाम
झन पूछ भइया अभी ले जरत हे चाम
कइसे पहाही एसो के भरे दोपहरी
गुन के अभी ले मति होगे हे बेकाम

सुशील भोले
मो. नं. 80853-05931, 98269-92811

Thursday, 4 February 2016

वसंत पंचमी और अरंडी का पौधा...

 वसंत के मादकता भरे मौसम में अरंडी के पौधे की चर्चा करना अजीब सा लग सकता है, लेकिन जिन लोगों को छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति का ज्ञान है, वे इसके महत्व को जानते हैं। यह भी जानते हैं कि इसी दिन यहां होलिका दहन या कहें काम दहन स्थल पर अरंडी (जिसे छत्तीसगढ़ी में अंडा या अंडी कहते हैं) के पौधे को गड़ाया जाता है,और फिर इसी के साथ होली/काम दहन पर्व का श्रीगणेश भी हो जाता है।

यहां यह जानना आवश्यक है कि छत्तीसगढ़ में जो होली का पर्व मनाया जाता है, वह वास्तव में 'काम दहन" का पर्व है, न कि 'होलिका दहन" का। इसीलिए इसे मदनोत्सव या वसंतोत्सव के रूप में भी स्मरण किया जाता है, जिसे माघ महीने की शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि से लेकर फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि तक लगभग चालीस दिनों का मनाया जाता है।

सती आत्मदाह के पश्चात तपस्यारत शिव के पास आततायी असुर के संहार के लिए शिव-पुत्र प्राप्ति हेतु देवताओं द्वारा कामदेव को भेजा जाता है, ताकि उसके (शिव) अंदर काम वासना का उदय हो और वे पार्वती के साथ विवाह करें, जिससे शिव-पुत्र के हाथों मरने का वरदान प्राप्त असुर के संहार के लिए शिव-पुत्र (कार्तिकेय) की प्राप्ति हो।

देवमंडल के अनुरोध पर कामदेव बसंत के मादकता भरे मौसम का चयन कर अपनी पत्नी रति के साथ माघु शुक्ल पक्ष पंचमीं को तपस्यारत शिव के सम्मुख जाता है। उसके पश्चात वासनात्मक शब्दों, दृश्यों और नृत्यों के माध्यम से शिव-तपस्या भंग करने की कोशिश की जाती है, जो फाल्गुन पूर्णिमा को शिव द्वारा अपना तीसरा नेत्र खोलकर उसे (कामदेव को) भस्म करने तक चलती है।

छत्तीसगढ़ में वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) को काम दहन स्थल पर अरंडी  का पौधा (अरंडी को छत्तीसगढ़ी में अंडा या अंडी कहते हैं ) गड़ाया जाता है, वह वास्तव में कामदेव के आगमन का प्रतीक स्वरूप होता है। इसके साथ ही यहां वासनात्मक शब्दों, दृश्यों और नृत्यों के माध्यम से मदनोत्सव का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। इस अवसर पर पहले यहां 'किसबीन नाच" की भी प्रथा थी, जिसे रति नृत्य के प्रतीक स्वरूप आयोजित किया जाता था।

'होलिका दहन" का संबंध छत्तीसगढ़ में मनाए जाने वाले पर्व के साथ कहीं पर भी दृष्टिगोचर नहीं होता। होलिका तो केवल एक ही दिन में चिता रचवाकर उसमें आग लगवाती है, और उस आग में स्वयं ही जलकर भस्म हो जाती है, तब भला उसके लिए चालीस दिनों का पर्व मनाने का सवाल ही कहां पैदा होता है? और फिर वासनात्मक शब्दों, दृश्यों और गीत-नृत्यों का होलिका से क्या संबंध है?

ज्ञात रहे कि छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति, जिसे मैं आदि धर्म कहता हूं वह सृष्टिकाल की संस्कृति है। युग निर्धारण की दृष्टि से कहें तो सतयुग की संस्कृति कहा जा सकता है, जिसे उसके मूल रूप में लोगों को समझाने के लिए हमें फिर से प्रयास करने की आवश्यकता है, क्योंकि कुछ लोग यहां के मूल धर्म और संस्कृति को अन्य प्रदेशों से लाये गये ग्रंथों और संस्कृति के साथ घालमेल कर लिखने और हमारी मूल पहचान को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।

मित्रों, सतयुग की यह गौरवशाली संस्कृति आज की तारीख में केवल छत्तीसगढ़ में ही जीवित रह गई है, उसे भी गलत-सलत व्याख्याओं के साथ जोड़कर भ्रमित किया जा रहा। मैं चाहता हूं कि मेरे इसे इसके मूल रूप में पुर्नप्रचारित करने के सद्प्रयास में आप सब सहभागी बनें...।

सुशील भोले
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल -  sushilbhole2@gmail.com

Monday, 1 February 2016

इतिहास लेखन की सत्यता...


इतिहास के नाम पर छत्तीसगढ़ में जितने भी लेखन हुए हैं, उनमें से किसी को भी निष्पक्ष और सत्यता के मापदण्ड पर खरा नहीं माना जा सकता. मैं हमेशा कहता रहा हूँ कि यहां के मूलधर्म और संस्कृति के साथ ही साथ तमाम ऐतिहासिक लेखन को एक निष्पक्ष समिति के माध्यम से पुर्नलेखन किया जाना आवश्यक है.

अभी-अभी एक ताजातरीन किताब हाथ में आयी है- "छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन का इतिहास" छत्तीसगढ़ी सेवा मंडल, छत्तीसगढ़ी भवन हांडीपारा रायपुर द्वारा प्रकाशित इस किताब के संपादक मंडल में जागेश्वर प्रसाद, जी.पी. चंद्राकर, दीनदयाल वर्मा एवं अनिल दुबे के नाम अंकित हैं. कुल 290 पृष्ठों वाली किताब का मूल्य 90 रुपए है.

चूंकि हम लोग भी छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन, भाषा और संस्कृति आंदोलन से जुड़े रहे हैं, इसलिए इच्छा हुई कि इस किताब को पूरा पढ़ा जाए. लेकिन पुस्तक को पढऩे के बाद घोर निराशा इसलिए हुई, क्योंकि इस "छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन का इतिहास" नामक किताब में एक अकेली छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी ने जो आंदोलन किया है, केवल उसके ही बारे में लिखा गया है. एक अकेली पार्टी के द्वारा किया गया, आंदोलन, संपूर्ण राज्य आंदोलन का इतिहास कैसे हो सकता है. यदि इस किताब का नाम "'छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन" में छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी की भागीदारी जैसा कोई नाम होता तो भले ही स्वीकार किया जा सकता था।

इस बात को सभी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन में प्रदेश के सैकड़ों संगठन और सभी जातीय समाज द्वारा अपने-अपने स्तर पर आवाज बुलंद किया गया था. सबसे ज्यादा यहां के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों ने इस मुद्दे को उठाया है. जहां कहीं भी छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य, संस्कृति से संबंधित कोई भी कार्यक्रम होता, तो उसमें पृथक राज्य से संबंधित कविता या वक्तव्य अवश्य गूंजता.

आश्चर्य होता है, इस तरह के इतिहास लेखन से लोगों को संकोच कैसे नहीं होता. जितने की इस तरह के लेखन देखे जा रहे हैं, सभी में केवल अपने आसपास के लोगों को ही उल्लेखित किया जाता है, ऐसे में उन्हें संपूर्ण इतिहास का दर्पण कैसे माना जा सकता है.

सुशील भोले 
संजय नगर, रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 080853-05931, 098269-92811
ईमेल - sushilbhole2@gmail.com